मैं सीढ़ियां चढ़ रहा हूं, तो मुझे एक सीढ़ी पर पैर रखना पड़ता है, ताकि मैं वहां रहा आऊं कम से कम जहां था। और एक पैर उठाता हूं वहां पहुंचने को कि जहां मुझे पहुंचना है। जब मैं वहां पहुंच जाता हूं, तब मैं दूसरा उठाता हूं, क्योंकि यह पैर अब आश्र्वस्त हो गया है, एक जगह मिल गई है। अब मैं दूसरा उठा लेता हूं, नहीं तो अधर में हो जाऊंगा। अधर का डर इतना ज्यादा है कि दोनों एक साथ नहीं उठा सकता, नहीं तो गिर जाऊंगा। और दोनों एक साथ उठाऊंगा, तो यह भी डर है कि जहां था हो सकता है उससे भी पीछे गिर जाऊं। इसलिए उसको तो मैं पकड़े रहता हूं।
अगर मेरे पास दस हजार हैं, तो दस हजार को मैं बचाता हूं और मुझे बीस हजार चाहिए तो मैं बीस हजार के लिए कदम उठाता हूं। दोहरे काम करता हूं। दस हजार को प्रिजर्व करता हूं और बीस हजार की आकांक्षा करता हूं। यह दोनों एक साथ चलेगा।
यानी इसको ठीक से समझा जाए तो बिलकुल गणित का नियम है कि जिसे चलना है उसे अपने को खंडित करना पड़ता है। और जो अपने को खंडित करेगा, वह चलेगा। और जब चलेगा, तो एक पैर जो उठ रहा है उससे विपरीत पैर खड़ा रहेगा, प्रतीक्षा करेगा कि तुम खड़े हो जाओ तो मैं चलूं।
तो जिसको हम प्रेम कर रहे हैं, उसको हमें घृणा भी करनी पड़ेगी। जब प्रेम थक जाएगा, तो हम घृणा करेंगे; जब घृणा थक जाएगी, तो हम प्रेम करेंगे। तो जिससे हम प्रेम करेंगे, उससे हम लड़ेंगे चौबीस घंटे। वे दोनों कदम हैं। जब लड़ लेंगे, तब फिर दया आ जाएगी कि क्या कर लिया! पश्र्चात्ताप पकड़ेगा, फिर प्रेम कर लेंगे। जब फिर प्रेम कर लेंगे, तो फिर उपद्रव शुरू हो जाएगा, थोड़ी देर में हम फिर लड़ लेंगे। इसलिए पूरी जिंदगी करना और न करना, डूइंग और अनडूइंग का खेल है। एक ही काम को करेंगे, फिर उसी को अनडन भी करना पड़ेगा, फिर उसको मिटाना भी पड़ेगा।
यह सारी बात समझ में आ जाए--इसको कुछ करने का नहीं है सवाल--यह सिर्फ समझ में आ जाए कि ऐसा है, तो फिर बात साफ है। और अगर मुझे दुख और द्वंद्व में रहना है, तो गति करनी चाहिए। और अगर मुझे निर्द्वंद्व हो जाना है, तो गति की फिकर छोड़ देनी चाहिए। उस हालत में न तो आदमी प्रेम करता है, न घृणा को इकट्ठा करता है। न आदर देता है, न अनादर को इकट्ठा करता है। वह दोनों नहीं करता है। तब भी कुछ होता है, फिर कुछ होता है जब वह कुछ भी नहीं करता, फिर कुछ होता है। और इसलिए वह हमेशा तीसरी बात है। वह जो होती है, वह जो बैठे-बैठे होती है: वह फिर टोटल होती है; क्योंकि उसमें बांटने की जरूरत नहीं है। चलेंगे तो बंटते हैं, अगर बैठे रहेंगे तो बंटते नहीं हैं: तब हम टोटल होते हैं।
जैसे मैं अभी बैठा हूं, तो न मेरे बाएं पैर में कोई फर्क है, न मेरे दाएं पैर में, वे दोनों एक हैं, वे मुझमें इकट्ठे हैं। मैं उठा कि उनमें फर्क शुरू हुआ। सब गति डाइलेक्टिकल है। यह जो मार्क्स और हीगल का जो खयाल है न, वह बिलकुल ठीक है। सब गति डाइलेक्टिकल है। उसे वे कहते हैं कि जब पूंजीवाद बन रहा है दुनिया में--तो साथ बुरी की ताकतें इकट्ठी... इधर अमीर धन इकट्ठा कर रहा है, उधर गरीब की ताकतें इकट्ठी होती जा रही हैं, एक ही साथ। अमीर जितना अमीर होगा, गरीब उतना क्रोधित होगा। और गरीब मजबूत होता जा रहा है। इधर अमीर मजबूत हो रहा है, उधर गरीब मजबूत हो रहा है। बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा कि गरीब अमीर पर हावी हो जाए। वह दूसरा कदम है, वह इसी के साथ तैयार हो रहा है। इसी के साथ तैयार हो रहा है!
समाज की, व्यक्ति की, जीवन की सब प्रक्रियाएं डाइलेक्टिकल हैं। और ध्यान जो है वह नॉन-डाइलेक्टिकल है। और इसीलिए जो लोग भी डाइलेक्टिस में सोचते हैं, वे लोग परमात्मा को नहीं मान पाते। मार्क्स नहीं मान सका उसका कुल कारण इतना है। वह यह नहीं मान सकता है कि कोई ऐसा भी हो सकता है जिसमें विरोध नहीं है।
प्रश्न:
डाइलेक्टिकल यानी द्वंद्व?
द्वंद्व। द्वंद्व। हां, द्वंद्व ही। यानी सब विकास विरोध के द्वारा होता है।
प्रश्न:
विरोध से, कंपेरिजन से, विरोध से ही होता है?
विरोध से होता है। विरोध से ही होता है। विरोध से ही सारा होता है।
प्रश्न:
ऐसे ही जैसे आदमी धंधा, रोजगार, विवाह, कुटुंब सब चला सकता है? सपोज कि टोटल सरेंडर हो गया...?
हां-हां, बिलकुल चलता रहेगा, चला सकने का सवाल नहीं है।
प्रश्न:
कोई आदमी, समझो, ग्राहक मुझे दो हजार रुपये बना कर लेकर गया, तो फिर वह उसके पीछे कोई बवाल नहीं है, मतलब उसको कुछ कहना ही नहीं है?
असल में, असल में, जो आदमी दो हजार रुपया आपसे ले गया है, उसमें पीड़ा दो हजार जाने की नहीं है, क्योंकि कभी दो हजार आप दान भी कर देते हैं, तब पीड़ा नहीं होती है।
प्रश्न:
बना कर ले गया।
नहीं, आपको पीड़ा यह है कि मुझे बुद्धू बना कर ले गया। मेरे अहंकार को चोट पहुंच गई। दो हजार तो दान भी देते हैं, तब पीड़ा नहीं होती है, खुशी होती है कि मैंने दो हजार दान दिए हैं। क्योंकि कोई मुझे बना कर नहीं ले गया है, मैंने दिए हैं। और एक आदमी बना कर ले गया है। और आपको पक्का पता नहीं है कि दान वाला भी बना रहा है कि नहीं बना रहा है। उसका आपको पता नहीं है। दान वाले की तरकीब ऐसी हो सकती है कि वह भी बना रहा है। वह भी बना रहा है। मगर उसमें आपको वह इतना सुख दे रहा है कि दान तुमने दिया है।
चोर उतना समझदार नहीं है, संन्यासी समझदार है, बस और कोई फर्क नहीं है। चोर जो है वह समझदार नहीं है, वह बेचारा रात घुस कर घर में से ले जा रहा है और आपको तकलीफ दे जा रहा है। और एक दूसरा आदमी आ रहा है वह सेवक है, संन्यासी है, महात्मा है, फलां है, ढिकां है, वह कहता है कि--और वह आपके अहंकार को तृप्ति करके ले जा रहा है। यानी आपसे लेकर जा रहा है वह भी, लेकिन वह आपके अहंकार को तृप्ति दे जाता है। पीछे आपको सुगंध दे जा रहा कि हां, मैंने दिए हैं। पीड़ा इसकी नहीं है कि कोई आपसे दो हजार ले गया है। दो हजार की पीड़ा नहीं है। पीड़ा कुछ और है।
तो मैं जो कह रहा हूं, जो आदमी सहज जी रहा है उससे चाहे कोई दान में ले जाए और उससे चाहे कोई चोरी में ले जाए। वह इतना ही कहेगा कि दो हजार अपने पास थे, और अब नहीं हैं। न तो वह दान में अकड़ जाएगा और न वह चोरी में एकदम दुखी हो जाएगा। वह इतना ही कहेगा कि दो हजार थे और अब नहीं हैं। इतनी फैक्चुअल होगी उसकी समझ। और इसमें किसी से क्या कहना है कि कोई ले गया, कि कोई समझा कर ले गया, कि कोई दबा कर ले गया, इससे किसी से कोई प्रयोजन नहीं है। ऐसा आदमी का जो जीना है, वही जीना धार्मिक जीना है।
प्रश्न:
ऐसा तो बड़ा मुश्किल है।
मुश्किल हम समझते हैं, मुश्किल हम समझते हैं, ईश्र्वर बाबू। मुश्किल हम समझते हैं, इसलिए मुश्किल हो जाती है। नहीं तो सब तरह का जीना संभव है। जिस जिंदगी में अंत में मृत्यु सभी कुछ मिटा देती है, उसमें किसी भी तरह का जीना संभव है, उसमें सब पॉसिबिलिटीज खुली हुई हैं।
यानी मैं यह कहता हूं, जब हम कहते हैं कि कठिन है, तो उसका मतलब यह है कि एक जीने का खास ढंग हम कहते हैं कि यह कठिन है। यानी मेरे पास हो सकता है कि बहुत बड़ा मकान न हो, हां, यह हो सकता है। लेकिन बिना मकान के जीना कठिन है, यह किसने कहा? यह हो सकता है कि मेरे पास बहुत बड़ी गाड़ी न हो, यह हो सकता है। लेकिन बहुत बड़ी गाड़ी न हो तो जीना कठिन है, यह किसने कहा? न, हम जब कहते हैं, जीना कठिन है, तो हमारी जीने की एक व्याख्या और हमारे जीने का एक नक्शा है कि ऐसा जीना। ऐसा जीना कठिन हो जाएगा।
लेकिन पूछना यह है कि ऐसे जीने में सुख मिल रहा है? या ऐसे जीवन के कठिन हो जाने पर भी सुख मिल सकता है? पूछना कुछ और है, जानना कुछ और है।
प्रश्न:
नहीं, इसमें भूल जाए जो आपने बात कही न, समझो कि दान दे दिया, या कोई आदमी लूट कर, अपितु वह अपने को मूर्ख बना दे रहा है, उसे उसी समय भूल जाना चाहिए, परंतु वह आदमी कभी भूल नहीं सकता है?
नहीं-नहीं। जब आप कहें कि भूल जाना चाहिए, तब तो नहीं भूल सकेंगे आप। न, यह मैं नहीं कर रहा हूं। मैं यह नहीं कह रहा हूं, मुझे जानना चाहिए कि ऐसा हुआ। ऐसा हुआ!
कल मैं मर जाऊंगा, कल बूढ़ा हो जाऊंगा, तब मैं क्या कहूंगा, किसको कहूंगा, किसने मुझे चीट किया? कल मैं बूढ़ा हो जाऊंगा और जवानी चली जाएगी, किसने मुझे चीट किया? नहीं, लेकिन बूढ़ों को कहीं न कहीं शक बना रहता है कि जो अब जवान हैं उन्होंने चीट कर दिया, इसलिए बूढ़ा जवान पर नाराज रहता है। मां जवान बेटी पर नाराज रहती है, उसे कहीं बहुत गहरे लग रहा है कि कुछ चीटिंग हो गई, कि यह लड़की तो जवान हो गई और मैं बूढ़ी हो गई। हालांकि इसको साफ कोई कह नहीं रहा है कहीं भी। इसे कोई साफ नहीं कह रहा है। मेरा मतलब समझे न? लेकिन कौन किसको चीट कर रहा है? कौन किसको चीट कर रहा है? और चूंकि अंत में सब छीन ही जाता है--चाहे आप चीट करें और चाहे चीट किए जाएं। यह एक बड़े मजे की बात है।
अभी मैं एक घर में ठहरा था। तो घर के बच्चे--रात को मैं मीटिंग से लौटा--तो घर के बच्चे मोनोपॉली खेल रहे थे, वे व्यापार खेल रहे थे। और भारी शोरगुल मचा हुआ था। और उसमें कोई चिल्ला रहा था कि इसने मुझे धोखा दे दिया और इसने ऐसा किया। और वे पूरे गंभीर थे। पूरे गंभीर थे। व्यापार चल रहा था पूरा, वे पूरे गंभीर थे। वे पूरे गंभीर थे और पूरे लड़े जा रहे थे, और बिलकुल ही झगड़े की हालत थी। तो मैं वहां से निकला, तो उस कमरे में से तो... मैं भी वहां रुक गया और मैंने पूछा कि किसने किसको धोखा दे दिया? तो उन्होंने कहा कि आप निपटारा करवा दें। इसने यह धोखा दिया है, यह चाल गलत चली है हमारे ऊपर।
तो मैंने उनसे कहा कि यह खेल कितनी देर चलने वाला है?
तो उन्होंने कहा: अब तो बारह बज गए, बस अब खत्म होने के करीब है।
तो मैंने कहा: खत्म हो जाने के बाद जिसने धोखा दिया और जिसने धोखा खाया, उनमें क्या फर्क होगा?
उन्होंने कहा: कोई फर्क नहीं होगा।
तो मैंने... तब अचानक उन बच्चों को एकदम खयाल आया, और वे सब हंसने लगे। उन्होंने कहा कि तब तो कोई फर्क नहीं होगा।
जब आखिरी हिसाब में कोई फर्क नहीं रह जाता...
प्रश्न:
खयाल नहीं है न!
हां, तो हमें आखिरी हिसाब का कोई खयाल नहीं है। और आखिरी हिसाब चूंकि सबको बराबर कर जाता है, इसलिए क्या फर्क पड़ता है इससे कि कौन...। नहीं, इसलिए सवाल असल में यह नहीं है कि किसने धोखा दिया, किसने धोखा खाया, सवाल यह है कि वह आखिरी हिसाब है, उसके पहले कौन सुख से जीया, कौन दुख से जीया? असली सवाल यह है।
और मेरा मानना यह है कि वे अगर दस-आठ बच्चे खेल रहे थे, तो बारह बजे तो खेल बंद हो गया, सब दुकानें बंद करके वे जा चुके हैं। लेकिन जिसने सोचा था कि मैं धोखा खा गया, उसकी रात में फर्क पड़ जाएगा, उसकी नींद में फर्क पड़ जाएगा। जिसने सोचा था कि मैं धोखा दे आया, उसकी नींद भी तकलीफ की हो जाएगी। यानी अभी यह खेले खेल में खेले थे न, तो अब सवाल असल में यह है कि हम जब रहे खेल में तब हम सुखी रहे, अगर हम तब सुखी रहे तो खेल के बाद भी सुख की धारा छूट जाएगी।
यह सारी पूरी जिंदगी में हम, हम ऐसी जिंदगी बनाएं यह मूल्यवान नहीं है। मूल्यवान यह है कि जिंदगी ऐसी हो कि आनंद दे जाए, और उसकी मैं बात कर रहा हूं। वह हमेशा नॉन-डाइलेक्टिकल होगी। उसमें द्वंद्व नहीं होगा, उसमें विरोध नहीं होगा। उसमें चीजें जैसी हैं हैं।
अब एक आदमी आता है और वह मुझसे कहता है कि ईश्र्वर बाबू आपके खिलाफ यह कह रहे थे। तो मैं कहता हूं कि कह रहे होंगे। ईश्र्वर बाबू हैं, उनको जो ठीक लगता है, वह कह रहे होंगे। एक आदमी कहता कि फलां आदमी आपको भगवान मानता है। मैं कहता हूं, वह उसकी समझ है, वह मानता होगा। कोई कहता है, आपको कोई आदमी साधु नहीं मानता, शैतान मानता है। मैं कहता हूं, वह उसकी समझ होगी। इसमें मैं कहां आता हूं?
प्रश्न:
वह रिएक्शन हो जाएगा।
हां। इसमें मैं कहां आता हूं? यह मैंने सुन ली बात। और मैंने कहा कि तुमने भी मेहनत की और खबर पहुंचाई, कृपा है। इससे ज्यादा कोई बात नहीं है।
प्रश्न:
उसके कारण रिएक्शन होता है।
हां, उसके कारण। उसका कारण यह नहीं है कि उस आदमी ने कहा कि मैं शैतान हूं, इसलिए रिएक्शन आया। मैं मनवाना चाहता हूं लोगों को कि मैं शैतान नहीं हूं, इसलिए रिएक्शन आया। उसके कहने से नहीं। जो सारी तकलीफ है, हम कुछ और कारण खोजते हैं, जो असली कारण नहीं हैं।
मैं अपने मन में मानता हूं कि ईश्र्वर बाबू को दुनिया में जाकर कहना चाहिए कि मैं भगवान हूं, तब महीपाल जी ने खबर दी कि वे तो कह रहे थे कि आप कुछ भी नहीं हैं। तब तकलीफ शुरू हुई। तकलीफ का कारण ईश्र्वर बाबू नहीं हैं। तकलीफ का कारण मैं ही हूं। क्योंकि मैं यह मान रहा था कि यह करना चाहिए, जो नहीं किया गया, और उलटा किया जा रहा है, तब मैं दुखी हो गया। लेकिन यह कभी मैंने माना ही नहीं था। यह कभी मैंने माना नहीं था। मैं जो हूं वह हूं। कौन क्या कहता है यह मैंने कभी हिसाब नहीं रखा है और चाहा नहीं है। तो आप, कौन क्या कह रहा है, इससे क्या तकलीफ बनती है। कोई तकलीफ नहीं बनती।
तो हमारे एक्सपेक्टेशंस जो हैं, हमारी अपेक्षाएं हमारी तकलीफ का कारण बनती हैं, दूसरों का व्यवहार नहीं।
जैसे मैं यहां आया, तो मैं अगर मान कर आया हूं कि अब मैं जब आऊं, तो आपको उठ कर नमस्कार करना चाहिए। और नहीं किया गया नमस्कार और आप सब बैठे रहे, तो मैं दुखी हो सकता हूं। आपके नमस्कार न करने से नहीं--वह मैं सीढ़ियों पर तैयारी कर रहा था कि आप नमस्कार करें। अचानक फ्रस्ट्रेशन हुआ है, वह नहीं किया गया है। लेकिन अगर मैं सीढ़ियों से चढ़ते हुए यह सोच कर नहीं ही आया था कि आप नमस्कार करें, तो जैसा कमरा था वैसा मैं स्वीकार करूंगा, क्योंकि इससे क्या मतलब है? मेरी कोई अपेक्षा न थी। इसमें लोग बैठे थे तो स्वीकार करूंगा, खड़े हुए थे तो स्वीकार करूंगा; नमस्कार करेंगे तो स्वीकार करूंगा, नहीं करेंगे तो स्वीकार करूंगा। क्योंकि इस कमरे को कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसका तय करके मैं नहीं आया हुआ था।
तो जिंदगी में जो लोग कैल्कुलेशन से चलते हैं, वे दुखी होते चले जाते हैं। क्योंकि उनका सब हिसाब पहले से तय है कि क्या होना चाहिए, क्या नहीं होना चाहिए, क्या नहीं होना चाहिए।
प्रश्न:
यह जो टोटल सरेंडर आप कहते हैं न, दुनिया वाले तो यह कभी मानने वाले नहीं हैं। नहीं तो आदमी साधु जैसा, समझो पागल जैसा है, सभ्य नहीं है...। विवेक से, थोड़ी बुद्धि से काम करे तो ठीक है, नहीं तो सब जगह फेल्योर ही होगा।
यह जो हमारी तकलीफ है न, हमारी तकलीफ यह है कि हम यह मान कर चल रहे हैं कि सक्सेस हो जाएगी, इसलिए फेल्योर का डर है। मैं जो कह रहा हूं वह यह कह रहा हूं कि हम यह समझ कर चल रहे हैं कि एक तो सफलता होनी चाहिए ही। और हम कभी यह नहीं सोच रहे हैं कि सफलता विफलता के बिना कैसे हो सकती है? क्योंकि सफलता और विफलता, मैं कह रहा हूं कि एक ही मन के दो पैर हैं। जो आदमी सफल होगा, वह रोज विफल भी होगा और रोज सफल भी होगा। आज इलेक्शन जीतेगा, कल हारेगा। आज लोग प्रशंसा करेंगे, कल निंदा करेंगे। आज ऊपर होगा, कल नीचे होगा।
वह लाओत्से कहता था कि कभी ऐसी जगह चढ़ना ही मत, जहां से गिरना पड़े। लेकिन हमारी इच्छा यह होती है कि ऐसी जगह चढ़ जाएं, जहां से सब गिर गए हों और हम न गिरें। हमारी इच्छा यह होती है। बल्कि हम ऐसी जगह चढ़ जाएं, जहां कभी कोई न चढ़ पाया हो। हमारी जो इच्छा है वह यह है कि हम ऐसी जगह चढ़ जाएं, जहां कभी कोई न चढ़ पाया हो। जहां जो भी चढ़ा हो, गिर गया हो। और वहां मैं न गिर पाऊं, तो सफलता है। सफलता का और कोई मतलब नहीं है।
लेकिन जहां कभी कोई न चढ़ पाया हो, तो हम सोचते हैं कि वह लोगों कि कमजोरी रही होगी कि वे न चढ़ पाए। लेकिन बात यह है कि जहां कभी कोई न चढ़ पाया हो, वह उस जगह की खूबी है कि वहां चढ़ा नहीं जा सकता। वहां किसी की...
आदमी करोड़ों वर्ष से है, सब आदमी ने वहीं चढ़ने की कोशिश की है। वह जिस पॉइंट पर हम पहुंचना चाहते हैं, वह सुई की नोक है, जिस पर खड़ा नहीं हुआ जा सकता। लेकिन छलांग लगा कर सुई की नोक का छोटा सा अनुभव तो लिया ही जा सकता है, गिरने के पहले। खड़ा तो नहीं हुआ जा सकता। जैसे एक आदमी छलांग लगाता है जमीन पर, तो हवा में आ तो सकता है, रुक नहीं पाता, वापस जमीन पर पहुंच जाता है। लेकिन एक भ्रम आ जाता है कि जब थोड़ी देर रुक सका, तो ज्यादा देर क्यों नहीं रुक सकता हूं! दिमाग तो कहता है कि थोड़ी देर तो रुक ही गया था। और अगर अच्छी तरह से छलांग लगाई जाए, तो और ज्यादा देर रुक सकता हूं। और जरा ज्यादा ताकत बढ़ाई जाए, तो और ज्यादा देर रुक सकता हूं।
लेकिन जंपिंग का स्वभाव ही ऐसा है कि वह सिर्फ भ्रम होता है, आपके पहुंचने और लौटने के बीच में जरा भी गैप नहीं है। आप रुकते एक सेकेंड नहीं हैं, लेकिन सिर्फ भ्रम होता है। जब आप जमीन पर उचकते हैं, तो जब आप ऊपर गए और जब आपने नीचे आना शुरू किया, इन दोनों के बीच क्षण भर भी आप नहीं ठहरते हैं। या तो आप जाते रहते हैं या आते रहते हैं, बीच में कभी नहीं रुकते जहां कि जिसको आप सफलता कह सकें। पुरानी विफलता और नई विफलता के बीच में छलांगें लगती रहती हैं। यानी जो मैं यह कह रहा हूं वह यह कह रहा हूं कि एक विफलता और दूसरी विफलता के बीच में छलांग लगती रहती है। और वह जो बीच में थोड़ा सा आपको भ्रम पैदा होता है कि सफल हो गया था--वह आपको होता है भ्रम कि वह निकल गया हाथ से, इसलिए दूसरी छलांग लगानी पड़ती है।
और सफलता यानी क्या? यानी सफलता का क्या मतलब है?
इधर मैं एक अलग शब्द का प्रयोग करता हूं, उसको मैं कहता हूं: ‘सुफलता।’ सफलता नहीं; सुफलता।
यानी, फलवान हो जाना ही काफी नहीं है, अच्छे फलवान होना जरूरी है। फल ही लग गए और कड़वे हुए, तो क्या मानी है। सफल होना काफी नहीं है; सुफल होना काफी है। और सुफल बड़ी और बात है।
और मैं मानता हूं कि सुफल तभी लगते हैं जब कोई सफल होने की चेष्टा नहीं करता और विफल होने की फिकर नहीं करता, तब सुफल लग जाते हैं जीवन में। सफल होने की चेष्टा न हो, विफल होने की भीति न हो, तब सुफल संभावना बनती है।
और जब हम यह कहते हैं कि यह हो नहीं सकता, तब हमारा सब कहने का कारण सिर्फ इतना ही है कि हम मान कर चल रहे हैं कि कुछ जो हमने बना रखा ढांचा, यह होना चाहिए। यह नहीं हो सकेगा। यह नहीं हो सकेगा। यह तो नहीं हो सकेगा। और आप क्या समझ रहे हैं कि करके आप इसको कर लेंगे? यानी, मैं यह कह रहा हूं--वह तो मैं समझ गया कि मेरी बात मान लेंगे तो शायद यह नहीं हो सकेगा। लेकिन क्या आप सोचते हैं कि जो आप कर रहे हैं वह करके आप कर लेंगे? तो वैसा भी नहीं हो सकेगा। असल में यह तो हो ही नहीं सकेगा। लेकिन इसमें यह भ्रम रहेगा कि हमने कोशिश की, उसमें यह रहेगा कि हमने कोशिश ही नहीं की। यानी, बस इतना ही फर्क पड़ेगा। यह सफलता तो होने वाली नहीं है।
प्रश्न:
अभी मन में बहुत समझ बनी, बाहर कुछ नहीं है।
उसका कुल कारण, उसका कुल कारण इतना है, उसका कुल कारण इतना है कि आमतौर से गैर-समझ में साहस होता है और समझदार में साहस नहीं होता है। तकलीफ यह है। यह भी जिंदगी के पैराडाक्सेस में से एक है। गैर-समझदार में साहस होता है, समझदार में साहस नहीं होता। तो गैर-समझदार गैर-समझ की चीजों में ताकत लगा कर लगा रहता है, करता रहता है जोश में। और समझदार समझता बहुत है, लेकिन कर नहीं पाता, वह ताकत नहीं लगा पाता।
समझ के साथ साहस की बड़ी जरूरत होती है।
और साहस ऐसा मामला है कि कोई सोचता हो कि हममें होगा तभी तो हम करेंगे। ऐसा नहीं है साहस। साहस ऐसी चीज है कि आप करेंगे तो ही होगा। यानी यह जो, यह जो कठिनाई है... एक आदमी कहे कि नदी में मैं उतरूंगा तब, जब मैं तैरना सीख लूंगा। तो ठीक है, यह कभी नहीं होने वाला। नदी में पहली बार तो बिना तैरे जाने ही उतरना पड़ेगा। और वह जो घबड़ाहट पैदा होगी नदी में बिना तैरे जाने उतरने से, उसी से तैरना निकलता है। उसी से तैरना निकलता है।
अभी मैं आया तो एक मित्र साथ थे, करोड़पति हैं। तो वे मुझसे कहने लगे कि आपकी बातें समझ में आती हैं, लेकिन एक मुझे बड़ी कठिनाई है, आप कहते हैं कि सब मनुष्यों को प्रेम किया जाना चाहिए। और मैं तो किसी भी मनुष्य को देखता हूं, तो मुझे ऐसा लगता है कि बस यह मुझसे रुपया खींचने आया हुआ है, तो मैं कैसे प्रेम करूं? मैं तो प्रेम नहीं कर सकता। मैं तो प्रेम नहीं कर सकता।
तो जो मैंने आपसे कहा, मैंने उनसे वह कहा। मैंने कहा कि वह आपसे कितने रुपये ले जा सकता है? कोई करोड़पति तो रुपये खींचने आपके पास आता नहीं है। कोई गरीब आदमी आता है--कोई स्कूल का मास्टर है, कोई पढ़ने वाला विद्यार्थी है, किसी की पत्नी बीमार है, किसी का कोई... आता है आपके पास। वह आपसे कितने ले जाएगा? क्योंकि उस गरीब आदमी की ले जाने की हिम्मत भी तो गरीब ही होती है। वह कोई करोड़ रुपये तो ले नहीं जाएगा आपसे। आप दे भी दो, तो भी घबड़ा कर वहीं मर जाएगा, ले जा नहीं सकता। दस-पचास रुपये आपसे ले जा सकता है।
तो मैंने उनसे कहा: आप एक प्रयोग करें।
उन्होंने कहा: क्या?
मैंने कहा कि अब जो आदमी आए आपके पास--एक सात दिन का प्रयोग करें--कि वह आपसे पच्चीस मांगे, आप उसको पचास दे दें, और देखें क्या हुआ।
उन्होंने कहा: कितना हर्जा हो जाएगा।
मैंने कहा: कोई खास हर्जा नहीं होगा, आप इसे सात दिन करके देखें।
वे सात दिन बाद मेरे पास आए और मुझसे कहने लगे, मैं चकित हो गया कि जैसा मैं झंझट में पड़ जाता था वैसा वह आदमी झंझट में पड़ गया! उसने पच्चीस मांगे बहुत हिम्मत करके, मैंने उसको पचास दे दिए, मैंने कहा: यह ले जाओ, और जब जरूरत हो तो आ जाना। तो वह एकदम मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा: नहीं, आप क्या कह रहे हैं? नहीं-नहीं, पचास नहीं, मुझे पच्चीस चाहिए। मैंने कहा: तुम पचास ले जाओ। और उन्होंने कहा: और मैं पहली दफा अनुभव कर पाया कि उसने क्या मुझे चीट किया।
यानी वह, वह जो तकलीफ थी वह यह थी कि पच्चीस में से झटक न लेंगे। आपने तो मुझे पचास दिए। तो वह तकलीफ तो गई, वह तकलीफ तो रही नहीं। और वे कहने लगे कि मैं इतना हंसा पीछे उस आदमी की परेशानी देख कर कि वह कैसी मुश्किल में पड़ गया। उसने दरवाजे तक लौट-लौट कर मुझे गौर से देखा कि बात क्या है। यानी मैं पच्चीस ही मांगने आया हूं, इस आदमी ने पचास दे कैसे दिए!
उन्होंने कहा कि मैं इतना शांति से सोया उस रात कि मैं कभी सोया ही नहीं था। और मुझे बार-बार हंसी आई इस बात पर कि... और तब उन्होंने कहा कि मुझे खयाल आया कि जब कोई मुझसे पच्चीस मांगने आता है, और किसी तरह दस-पांच मैं उसको देता हूं, या नहीं देता हूं, या पच्चीस देता हूं, तो जिस तरह की संतोष की नींद वह सोता होगा और मैं ऐसा असंतुष्ट रह जाता हूं, आज हालत उलटी हो गई है। आज वह आदमी रात भर सो नहीं पाएगा। क्योंकि बार-बार उसे खयाल आएगा कि मामला क्या है? यानी मैंने पचास दे कैसे दिए! तो मैंने उनसे कहा कि अब वह आदमी दुबारा आए, तो आप मुझे बताना। वह छह महीने हो गए। उन्होंने कहा कि वह आदमी दुबारा नहीं आया। वह आदमी दुबारा नहीं आया है।
हम जो, हम जो... मेरा कहना यह है कि हम प्रयोग ही नहीं करते जीवन में। और मैं यह कहता हूं कि प्रयोग से हम डरते हैं, और डरने का क्या है हमारे पास, खो क्या जाएगा? यानी सबसे बड़ी कठिनाई है कि एक दफा हम यही पक्का पता लगा लें कि खोने को क्या है हमारे पास जो खो जाएगा? और ऐसा क्या है जिसको हम बचा कर बचा लेंगे आखिर में? यानी कुछ बचने वाला नहीं है, तो सिर्फ नासमझ बचाने की कोशिश में लगे हैं।
यानी मैं यह पूछता हूं कि पूर आ गया है और सारा गांव डूब रहा है, और कुछ लोग अपने घर का सामान अपने सिर पर लिए हुए उस पूर में तैरे चले जा रहे हैं। वे कहते हैं, कुछ बचा लेंगे। मैं अगर बिना कुछ सामान लिए चला जा रहा हूं तैरता हुआ, तो वे मुझसे कहते हैं, तुम मूढ़ हो, तुम बिलकुल पागल हो। अरे कुछ बचा लो, पूर आ गया है। और मैं उनसे कहता हूं कि जब सागर में पहुंचना सुनिश्र्चित हो गया है, पूर ही पूर है और जमीन पानी से डूबी है, तो तुम नाहक उतना बोझ ढोए जा रहे हो इतनी देर और। यानी मतलब यह है कि कम से कम मैं तो हलके होने का मजा ले ही रहा हूं, तुम वह मजा भी नहीं ले पा रहे हो। जब कि यह पक्का है कि यह सागर में नदी गिर ही जानी है, और तुम और तुम्हारा सामान दोनों गिर जाने हैं। तो अंत में कौन पागल था, तय करना जरा मुश्किल है। लेकिन चूंकि अधिक लोग अपना-अपना सामान बचाए हुए हैं, इसलिए मैं ही पागल लगूंगा। इसलिए मैं ही पागल लगूंगा। जहां जिंदगी मौत में ही समाप्त हो जानी है...।
प्रश्न:
सोच-समझ हो जिंदगी में, आखिरी में तो नष्ट होती है।
हूं, हूं।
प्रश्न:
लेकिन मैं आपको बताऊं, कोई आदमी को पंद्र्रह हजार रुपये का एक मकान बेच दिया, उसने बारह हजार दिया, हमने कब्जा दे दिया, तीन हजार नहीं दिया। अब वह पंद्रह दिन के बाद कहता है, अब मेरे पास नहीं है। अच्छा, नहीं है, छोड़ दिया, जो भी होगा देखेंगे। ऐसा करते-करते आधी दुनिया अपने को भी पागल गिनने लगेगी?
कोई हर्जा नहीं है। कोई हर्जा नहीं है।
प्रश्न:
समाज के साथ जीना बड़ा मुश्किल है।
न, न, न। यह हमारा खयाल ही गलत है।
प्रश्न:
कोई आदमी पच्चीस रुपये लेने को आता है, अपन पचास दे देते हैं, वह बोलता है, तू देता ही डबल है, तो फिर वह क्या करे। उसको तकलीफ है तो वह बोल दे।
हम कभी समझ नहीं पाते हैं। हमारी जो सारी तकलीफ है वह यह है, हमारी सारी तकलीफ है वह यह है कि हम यह कभी सोच ही नहीं पाते हैं कि जब हम एक पैसा बिना लिए हुए जमीन पर आते हैं, तो जो भी हम दे रहे हैं, ले रहे हैं; और जब बिना एक पैसा लिए विदा होना पड़ता है, तो जो भी हम ले रहे हैं, दे रहे हैं वह सिवाय खेल से ज्यादा मूल्य का नहीं है। उस खेल में किसने धोखा दिया है और किसने ज्यादा पैसे बना लिए हैं, और किसने नोट इकट्ठे कर लिए हैं, और किसके पास कम पड़ गए हैं--यह जहां तक खेल के भीतर देखने का संबंध है, बड़ा मीनिंगफुल है; लेकिन जहां जरा खेल के ऊपर से देखने का संबंध है, वहां बड़े हंसने योग्य है। और चूंकि हम खेल के भीतर ही खड़े होकर इसकी सार्थकता देखने की कोशिश करते हैं, इसलिए तकलीफ हो जाती है।
जैसे समझो कि कुछ लोग फुटबॉल खेल रहे हैं, या वालीबॉल खेल रहे हैं, और वे यहां से गेंद को वहां फेंक रहे हैं और वहां से गेंद को यहां फेंक रहे हैं। और वे भारी गंभीर हैं और जान दांव पर लगाए हुए हैं। और भीड़ बिलकुल उत्सुक खड़ी है कि अगर एक हार गया तो गोली चल जाए, कि लकड़ी चल जाए, कि हत्या हो जाए, कुछ भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। इतनी गंभीरता है। और खेल के भीतर जो भी सम्मिलित हो गया है, वह इतना ही गंभीर है और इतना ही उत्तेजित है। और एक आदमी खेल के बाहर खड़े होकर देखे, तो वह बहुत हैरान होगा कि एक गेंद को इस तरफ से उस तरफ फेंकना, उस तरफ से इस तरफ फेंकना, इसमें ये लोग इतना रस क्यों ले रहे हैं? इस खेल के बाहर। खेल के भीतर तो बड़ा अर्थपूर्ण है--हार है और जीत है। और हार और जीत इस पर है कि गेंद इस तरफ गई कि उस तरफ गई, इस सब पर हार-जीत निर्भर है। लेकिन खेल के बाहर अगर कोई घड़ी भर को खड़े होकर देखे, तो उसे सच में ऐसा लगे कि बड़ा पागलपन मालूम हो रहा है। बहुत पागल मालूम हो रहा है।
नहीं, लेकिन वे भी गेंद को नहीं फेंक रहे हैं, गेंद के साथ अहंकार चल रहा है। गेंद तो सिर्फ बहाना है और निमित्त है। बाहर से तो इतना ही दिख रहा है कि गेंद इधर से उधर जा रही है, लेकिन गेंद के साथ अहंकार जुड़ा हुआ है। गेंद सिर्फ निमित्त है। घोषणा करेगी गेंद इस बात की कि किसका अहंकार जीता और किसका हारा। लेकिन अगर अहंकार की गेंद के भी बाहर खड़े होकर कोई देखे--कि समझ लो कि मैं हार गया और तुम जीत गए, फिर क्या है? तो चीजें बहुत एब्सर्ड मालूम पड़ेंगी कि बड़ी एब्सर्ड चीजें हैं। यानी मामला ऐसा है...
मैं लाओत्सु का निरंतर कहता हूं न, वह कहता है कि एक आदमी मुझे हराने आया, तो मैं जल्दी से लेट गया चित, मैंने कहा, चित हो जाऊं न! वह आदमी तब खड़ा ही था। मैंने कहा, मैं चित हो जाऊं न! आ जाओ मेरी छाती पर बैठ जाओ! वह आदमी जरा परेशान हो गया। मैंने कहा, जल्दी से बैठ जाओ और जीतने का तुम मजा ले लो, ताकि मैं अपने काम में लग जाऊं।
अगर वह आदमी लाओत्सु के ऊपर बैठ गया है, तो म़ूढ मालूम पड़ा होगा। पागल कौन था? यानी सवाल यह है कि इसमें पागल कौन था? हो सकता है उसने बाहर जाकर लोगों को कहा होगा कि कुछ नहीं, मैं इन्हें अभी चित करके चला आ रहा हूं। लेकिन पागल कौन था?
और अगर कहीं कोई आखिरी हिसाब है इस दुनिया में, तो उस दिन लाओत्सु हंसता देखा जाएगा और वह आदमी रोता हुआ देखा जाएगा। क्योंकि उस आखिरी हिसाब में पता चलेगा कि इस आदमी ने बड़ा पागलपन किया है। और यह आदमी अदभुत समझ का आदमी है। यह कह रहा है कि जल्दी से करो, क्योंकि इसमें देर लगेगी। नाहक तुम कोशिश करोगे, मैं रोकूंगा, यह बहुत देर-दार हो जाएगी, और समय खराब होगा और मेरा काम भी अटकेगा। तो मैं जल्दी से लेटा जाता हूं, तुम मेरे ऊपर बैठ जाओ और तुम खबर कर देना कि चित करके आ गए हैं।
लेकिन तब उस आदमी को मजा भी न रहा, क्योंकि यह आदमी खुद चित हुआ जा रहा। चित करने में मजा था। उसको करने में मजा था कि कर दिया न! तो वह करने में मजा था। ऊपर बैठ जाने का मजा था। तो इसने बिठा लिया, तो सब बेमानी हो गया है।
मैं जो कह रहा हूं, निश्र्चित ही मैं जो बात कह रहा हूं वह अंततः बिलकुल ही पागलपन की है। इस दुनिया में, जिसको कि पागलों ने बनाया, और उनका जो खेल है और उसके नियम हैं, उसमें बिलकुल पागलपन की बात है।
अभी मैं एक कहानी पड़ता था, पीछे कभी कहा भी। एक पागल आदमी एक सड़क के किनारे बैठा हुआ है। डंडी बांध रखी है और धागा बांध रखा है और मछलियां पकड़ रहा है, सड़क पर बैठा हुआ। कोई पानी-वानी नहीं है। तो जो भी उधर से निकलता है तो वह उसको समझता है कि पागल है। कि यह क्या कर रहे हो? तो वह कहता है, मछलियां पकड़ रहा हूं। तो वह आदमी हंसता है और वह कहता है, कितनी पकड़ीं अब तक? तो वह कहता है, तुम भी बड़े पागल, अरे कहीं सड़क पर मछलियां पकड़ी जाती हैं! वह जो आदमी है वह यही काम कर रहा सुबह से। वह सुबह से यही काम कर रहा है। और सांझ को वह कहता है कि मैं यह देख रहा हूं कि यहां से एक भी समझदार आदमी निकलता है जो कुछ न पूछे? एक आदमी नहीं निकलता। जो भी निकलता है वही पूछता है कि क्या कर रहे हो? वह कहता है, मछलियां पकड़ रहा हूं। तो कितनी पकड़ी अब तक? क्योंकि वह आदमी इसको पागल सिद्ध करने की कोशिश में है। तो वह कहता है कि अरे, बड़े पागल हो, कहीं सड़क पर मछलियां पकड़ी जाती हैं! और तब वह आदमी उदास होकर चला जाता है, जो भी आता है।
खेल के भीतर के नियम हैं और खेल के बाहर खड़े होने की क्षमता है।
मैं धार्मिक या संन्यासी उसको कहता हूं जो खेल के बाहर खड़े होकर खेल को देख लेता एक दफा। एक दफा भी खयाल में आ जाए खेल के बाहर से बात, तो आप दूसरे आदमी हो गए। फिर खेलिए या न खेलिए, वह सब अलग मामला, उससे कोई मतलब नहीं है। बिलकुल दूसरे आदमी हो गए।
कठिनाई जो आपको मालूम हो रही है इसलिए मालूम हो रही है कि आपके मन का एक हिस्सा यह बात समझ लेता है कि ठीक है और आपके मन का दूसरा हिस्सा अभी भी ठीक माने जा रहा है कि वह खेल के नियम ठीक हैं, नहीं तो सब गड़बड़ हो जाएगा। दोहरे हिस्से हो जाते हैं। इससे सब गड़बड़ हो जाती है।
लेकिन इधर मैं सोचता हूं कि अगर कभी भी कोई हिम्मत करके देखे, तो यह इतने आनंद का अनुभव होता है कि जिसका कोई हिसाब ही नहीं है, जिसका कोई हिसाब ही नहीं है। कोई हिसाब ही नहीं है। यानी, चूंकि ले क्या जाओगे?
अभी मैं--एक मजा हुआ--खंडवा मैं आया, तो स्ट्राइक हो गए। तो एक छोटी ट्रेन इंदौर जाती है, उसमें मैं बैठा, वह कोई घंटे भर से छूटेगी। एक आदमी आया। अकेला ही था मैं। तो उसने आकर खिड़की के पास आकर कहा कि मैं बड़ी तकलीफ में हूं। तो मैंने कहा कि तुम तकलीफ मत सुनाओ, तुम यह बोलो मैं कर क्या सकता हूं? तो उसने मुझे गौर से देखा। क्योंकि तकलीफ सुनाना खास जरूरी बात है, तभी वह आपको झंझट में डाल देता है। वह बता रहा है कि मेरी पत्नी बीमार है, और फिर आप उसको मना नहीं कर सकते कि हम चार आने न देंगे। जब आप उसकी कहानी सुन लेते हैं, तो आप फंस जाते हैं, खेल के भीतर आ जाते हैं। जब उससे आप उसकी पूरी कहानी सुन लेते हैं, वह बताता है कि मेरी पत्नी बीमार है, और बच्चा भूखा मर रहा है, और मैं बड़ी मुसीबत में पड़ा हुआ हूं। तो या तो आप यह कहिए कि यह सब झूठ है; जो कि एक दुखी आदमी से कहना अत्यंत कठोर मालूम पड़ता है। और या फिर अब आप अगर मान लेते हैं कि ऐसा है, तो फिर उसको कुछ देना जरूरी हो जाता है।
मैंने उससे कहा: तुम तकलीफ मत सुनाओ, तुम यह बोलो मैं क्या कर सकता हूं? उसने मुझे गौर से देखा। उसने कहा: मैं तो तकलीफ भी सुनाता हूं, तब भी मुश्किल से कोई कुछ करता है। आप बिना ही तकलीफ सुने? तुम यह बोलो कि मैं कर क्या सकता हूं? तो उसने बड़ी हिम्मत करके कहा कि मुझे एक रुपया दे दें। मैंने कहा: तुम्हारी हिम्मत बहुत कमजोर है। इतनी सी तकलीफ है, जो एक रुपये से पूरी हो जाएगी? उसने कहा: नहीं-नहीं, तकलीफ तो बहुत बड़ी है। तकलीफ तो बहुत बड़ी है। तो तुम एक रुपया क्यों मांगते हो? मैंने कहा: तुम ठीक से ही मांग लो। तो उसने मुझे देखा, वह समझा कि शायद मैं मजाक कर रहा हूं, कि बात मजाक की होगी। एक रुपया बहुत था। एक गरीब आदमी, एक भिखारी और क्या मांग सकता था?
बहुत उसने हिम्मत आखिरी कर ली थी। एक रुपये का भी पक्का भरोसा तो नहीं था उसे। रुपया मांगेगा, तब दो आने मिल सकते हैं, इसकी संभावना रही होगी। उसने बहुत ही हिम्मत की, तो उसने कहा, अच्छा, आप नहीं मानते हैं तो दो रुपया दे दें। उसने मुझसे कहा कि आप नहीं मानते हैं तो दो रुपया दे दें। मैंने उसको दो रुपया दे दिया। वह कुछ बड़ी बेचैनी में चला गया।
वह पांच-सात मिनट बाद वापस आया। कोट उतार आया, टोपी रख आया। मैंने कहा, यह अजीब आदमी है, यह तो वापस आ गया। कोट-टोपी बदल कर आ गया! नीचे रख आया होगा। आकर उसने कहा कि मैं बड़ी तकलीफ में हूं। मैंने कहा: तुम तकलीफ की बात ही मत करो। तुम तो यह बताओ कि मैं कर क्या सकता हूं तुम्हारे लिए? तब तो उसने मुझे ऐसे देखा कि मैं निपट पागल हूं। यानी, हद हो गई, यह आदमी है कैसा! मतलब, अभी इससे दो रुपये ले गए हैं। तो तुम यह बात बताओ कि मैं तुम्हारे लिए कर क्या सकता हूं?
उसने कहा: आप मुझे पांच रुपये दे दें। वह बहुत हिम्मत बढ़ा कर आया है। मैंने उसे पांच रुपये दे दिए और कहा कि जाओ। अब इसकी बड़ी मुसीबत हो गई। अब मुसीबत यह हो गई कि यह आदमी, अब इसको छोड़ना इतनी जल्दी ठीक भी नहीं है और अब जाना भी उसे बड़ा मुश्किल होने लगा।
लेकिन वह फिर आया। अबकी दफा पीली पगड़ी रख कर आ गया। और उसने कहा कि मैं मेरी टिकट गुम गई। मैंने कहा: तुम टिकट-विकट की बात ही मत करो। उसने कहा कि मुझे जाना है। मैंने कहा: उससे मुझे कुछ मतलब नहीं, तुम यह बताओ, मैं तुम्हारे लिए कर क्या सकता हूं?
तो उसने कहा कि आप आदमी हो कि क्या हो, आप पागल तो नहीं हो? आप मुझे पहचाने नहीं?
मैंने कहा: मैं तो इस परेशानी में पड़ा था कि मालूम होता है, तुम मुझे पहचान नहीं पा रहे, बार-बार दूसरा आदमी समझ कर आ रहे। उससे मैंने कहा कि मैं यही सोच रहा हूं, मैं भी यही सोच रहा हूं कि यह आदमी मालूम होता है भूल जाता है और बार-बार मेरे पास आ जाता है। मैंने उससे कहा: फिर भी तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं? उसने कहा: कुछ मुझे नहीं करवाना है, मुझे कुछ भी नहीं करवाना है। कुछ और तो नहीं चाहिए? उसने कहा: मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।
लेकिन उस आदमी ने कहा कि अब मैं किसी को धोखा नहीं दे सकूंगा। क्योंकि मैं खुद ही धोखा खा गया। और बूढ़ा आदमी था। उसने कहा कि मैं किसी को धोखा नहीं दे सकूंगा, मैं खुद ही धोखा खा गया।
और क्या बनता और बिगड़ता क्या है? वह आदमी सात रुपये ले गया, उससे क्या बन और बिगड़ गया? और मेरे पास होते तो दुनिया का क्या भला हुआ जा रहा था और उसके पास है तो क्या बुरा हुआ जा रहा है। यानी, अंततः हो क्या रहा है?
प्रश्न:
हर आदमी सोचता है कि बुद्धू बना कर गया इसलिए दुख होता है।
हां। तो वह जो, वह जो तकलीफ है न, वह जो तकलीफ है, वह जो तकलीफ है, जिंदगी ही तुम्हें बुद्धू बना रही है, तुम्हें खयाल में नहीं है। जन्म मिल जाता है, कोई तुमसे पूछता नहीं; मौत आ जाती है, कोई तुमसे पूछता नहीं, जिंदगी ही बुद्धू बना रही है। बना रहा है तो भगवान ही बुद्धू बना रहा है। जहां कुछ भी पता नहीं, वहां बुद्धू हम हैं। अब इसमें और अगर एकाध आदमी भी थोड़ा-बहुत सहायता बंटा रहा है, तो इसमें हर्ज क्या है। यहां, जहां हमें कुछ भी पता नहीं है, वहां बुद्धिमान होने की बात ही पागलपन है।
तुम्हारे पेट में खाना कौन पचा रहा है, कौन खून बना रहा है, क्यों बना रहा है, किसलिए बना रहा है, कुछ भी पता नहीं है। किसलिए आकाश है, किसलिए चांद-तारे हैं, किसलिए जमीन है, किसलिए नदियां बहती हैं, फिर बादल बनती हैं, यह कुछ भी तो पता नहीं है।
जहां कुछ भी पता नहीं है, वहां एक आदमी और मुझे थोड़ा धोखा दे गया और दो रुपये ले गया, तो इसको भी मैं क्यों परेशानी का कारण बना लूं? मतलब, बुद्धू तो मैं हूं। क्योंकि यहां कुछ भी तो पता नहीं है, बुद्धिमानी है कहां?
नहीं, लेकिन असल कारण यह है कि हम छोटी-छोटी चीजों में बुद्धिमान होकर यह खयाल पैदा कर लेना चाहते हैं कि नहीं, बुद्धिमान हम हैं। और ये बड़े सवाल ही चारों तरफ से घेरे खड़े हैं, जिनका कोई उत्तर नहीं है, इनकी तरफ आंख नहीं उठाते, छोटे-मोटे खेल के भीतर उत्तर बना लेते हैं और समझ लेते हैं कि हम बुद्धिमान हैं।
असल में चूंकि हम बुद्धू हैं, इसलिए बुद्धू होने की बात खुल न जाए, इससे हम चौबीस घंटे डरे रहते हैं। वह है बात। वह असलियत है। क्योंकि अज्ञानी हम हैं, वह असलियत है। इसलिए कोई उसको जरा सा भी उकसा देता है, उखाड़ देता है, तो हम फिर परेशान हो जाते हैं और हम उस पर टूट पड़ते हैं कि इसने सब गड़बड़ कर दी। हालांकि वह बेचारा कुछ नहीं कर रहा है। वह सिर्फ इतना ही कर रहा है कि आपका कपड़ा उठा कर कह रहा है कि इसके नीचे चमड़ी है, और वह कुछ भी नहीं कर रहा है। वह चमड़ी है, चाहे कपड़ा वह उठाए और चाहे न उठाए।
जिस दिन हमें यह समझ में आ जाए कि जहां जीवन का क ख ग भी पता नहीं है, वहां और क्या मतलब है? यानी, अज्ञान की चूंकि स्वीकृति नहीं है हमारे मन में कि हम अज्ञानी हैं; इसलिए कोई अज्ञानी सिद्ध कर दे, तो पीड़ा होती है। लेकिन अज्ञान की स्वीकृति हो जाए, तो फिर क्या पीड़ा है? इतना ही हम कहेंगे कि भई, तूने ठीक किया, हम अज्ञानी थे, तूने और बताया कि अज्ञानी हैं। तेरी बड़ी कृपा है। तूने हमको जाहिर कर दिया कि हम अज्ञानी हैं।
ऐसी प्रतीति और ऐसी स्वीकृति धार्मिक आदमी का जन्म बनती है। नहीं तो धार्मिक नहीं बन सकता आदमी।
प्रश्न:
तो ऐसा धार्मिक बन कर फिर बाद में जीना पड़ेगा?
तो जीएंगे कब तक? ऐसे भी कब तक जीएंगे? ऐसे भी कब तक जीएंगे? न भी बने धार्मिक, तो भी कब तक जीएंगे?
प्रश्न:
सब मूर्ख गिनेंगे?
हां-हां, गिन लेंगे, गिन लेंगे। और कौन कह सकता है कि जिसको सब मूर्ख गिनते हैं, जो अपने को मूर्ख गिनवा देता है, वह आदमी बुद्धिमान है या नहीं, यह कौन कह सकता है? कौन कह सकता है?
प्रश्न:
और जो आपके लिए भी बुरा कहे और हमें दुख लगता है तो?
नहीं लगना चाहिए।
प्रश्न:
पर हमारे अहंकार को चोट लगती है?
तुम्हारे अहंकार को चोट लगती है। मेरे को बुरे कहने से तुम्हारा कोई सवाल नहीं है।
प्रश्न:
मगर हमको चोट लगती है?
तुम्हें चोट लगती है कि हम जिसको इतना अच्छा मानते हैं, तो मतलब यह आदमी हमको बुद्धू सिद्ध कर रहा है कि वह बुरे हैं। तुम्हारी तकलीफ तुम्हारी है, मुझसे उसका कुछ लेना-देना नहीं है। मैं कहीं आता नहीं उसमें। यानी जिसको हम कहते हैं कि इतना अच्छा आदमी है, उसको यह कह रहे हैं कि लंपट है। यह हमको गलती किए जा रहा है आदमी। हम जिसको कहते हैं गुरु कहिए, तो यह कहता है कि वह आदमी सुनने योग्य नहीं है बिलकुल। हम कहते हैं, चरण छूने योग्य है। यह आदमी कहता है, देखने योग्य नहीं है। तो यह आदमी हमारी बुद्धि पर शक किए जा रहा है। यह हमको कह रहा है कि तुम बुद्धू हो, तुम किसके पास पड़े हो, जो किसी काम का नहीं है, उसके पास तुम जा रहे हो। मुझसे कुछ लेना-देना नहीं है। मुझे नाहक बीच में फंसा मत लेना। वह तुम्हारी लड़ाई आपसी है। उससे मुझसे कुछ संबंध नहीं है।
मगर तुम्हें तकलीफ हो जाती है। और तुम सिद्ध करने में लग जाओगी। और उस सिद्ध करने में जैसे वह मुझे बड़ी-बड़ी गालियां देगा, वैसी बड़ी-बड़ी तुम मेरी प्रशंसा करोगी। वह प्रशंसा भी तुम ईजाद करोगी, क्योंकि जिसको तुमने पूजा है उसकी प्रशंसा तुम्हें ईजाद करनी पड़ेगी।
सब भगवान भक्त बनाते हैं, क्योंकि भक्त को बिना भगवान बनाए बड़ी मुश्किल पड़ जाएगी। वह उसको सिद्ध करना पड़ता है कि हां, हमारा गुरु बिलकुल भगवान है। महात्मा है, परम महात्मा है, यह है, वह है। उसको बेचारे को सिद्ध करना पड़ता है, क्योंकि अगर वह नहीं है, तो वह जो पैर छुए थे, वह सब, उसका क्या होगा। उसके लिए रेशनेलाइज करना पड़ता है उसे। और जितना वह करता है, उसको पता नहीं है, कि जितना वह जोर से भगवान सिद्ध करेगा, उतना जिसको कि भगवान उसे नहीं मानना है, वह उतनी भूलें खोज कर ले आएगा।
और तुमने जो भगवान खड़ा किया है, उसमें भूलें बहुत जल्दी मिल जाएंगी, क्योंकि वह भगवान तुम्हारा खड़ा किया हुआ है। उसमें भूलें बहुत मिल जाएंगी। तुमने तो कह दिया कि हमारे भगवान को पसीना ही नहीं निकलता। अब गर्मी पड़ेगी और पसीना निकलेगा, तो वह जो विरोधी है, वह देख कर चला जाएगा। वह कहेगा, सब अफवाह है, भगवान नहीं है, पसीना निकलते देखा है। बस खत्म हो गया मामला। और तुमने इसलिए कहा था कि भगवान की देह से कहीं पसीना निकलता है। वह महावीर की देह से पसीना नहीं निकलता। कितनी ही धूप पड़े पसीना नहीं निकलता। क्योंकि साधारण देह थोड़े ही है कि पसीना निकल आए उससे!
प्रश्न:
ऐसा जीने का कोई मार्ग हो सके--जिसे टोटल सरेंडर कर जीए तो चेतना जाग्रत हो, किसी से ऐसी भूल ही न हो, न ही कृपा का पात्र होवे, न ही किसी की...?
यह भी हमारा सोचना कि भूल हो ही नहीं, हमारे अहंकार की अपेक्षा है। भूल होगी। स्वीकृति का मतलब यह नहीं है कि भूल न हो। तो वह स्वीकृति कहां रही फिर! ताकत लगाएंगे कि भूल न हो जाए, तो फिर सरेंडर कैसे होगा? सरेंडर तो वही कर सकता है, जो कहता है कि हमें पता ही नहीं कि क्या भूल है और क्या ठीक है। हमें पता ही नहीं है कुछ। वह यह कहता है कि हमें यह पैर प्यारे लगे, तो हमने सिर रख दिया। अब पता नहीं, यह हैं या नहीं, यह हमें कुछ पता नहीं है। हमको लगे प्यारे और तुमको प्यारे नहीं लगे, बात खत्म हो गई है। तुमको ऐसा लगा कि इसके सिर पर लट्ठ मार दें, तुमने लट्ठ मार दिया। यह तुम्हारा लगना था, यह हमारा लगना था। और हमें कुछ पता नहीं कि तुम ठीक हो कि हम ठीक हैं। मेरा मतलब समझे न? हमें इसका पक्का ही पता होता तब तो कुछ निर्णय हो जाता। वह निर्णय नहीं हो पाता।
ईसाई मानते हैं कि जीसस भगवान का बेटा है। यहूदी मानते हैं कि लंपट, आवारा है, इसको सूली के सिवाय कोई रास्ता नहीं इसको सुधारने का। लेकिन यह ईसाई की मान्यता है और वह यहूदी की मान्यता है। और जीसस का कोई पता नहीं कि वह कौन हैं। कोई पता नहीं है। उसका पता हो भी नहीं सकता। उसका कोई पता नहीं हो सकता।
यानी मेरा कहना यह है कि हम अपने अज्ञान को अगर स्वीकार करते हैं, तो हम भूल करने को तो स्वीकार कर ही लेते हैं। इसमें कोई कठिनाई ही नहीं है। भूल हमसे हो ही सकती है। और जो आदमी भूल को स्वीकार ही कर लेता है कि हो ही सकती है, वह झगड़े में नहीं पड़ता। वह कहता है, हो गई होगी, हो सकता है। और तब एक सरलता आनी शुरू होती है। और वह सरलता द्वंद्व नहीं पैदा करती है। वह सरलता द्वंद्व पैदा नहीं करती। और निर्द्वंद्व चित्त हुए बिना कोई शांति नहीं है।
प्रश्न:
डे-टुडे के काम-धंधे में बड़ी दिक्कत होती है, ऐसा हो ही नहीं सकता?
अब मैं यह पूछता हूं कि अभी दिक्कत नहीं हो रही है?
प्रश्न:
अभी भी हो रही है।
नहीं तो फिर सवाल यह है कि अगर अभी न हो रही होती, अगर अभी न हो रही होती, दिक्कत बिलकुल न हो रही होती, तब तो सवाल ही न था। दिक्कत हो रही है। और वह दूसरा प्रयोग तो कभी किया नहीं। जिन्होंने किया है, वे तो कहते हैं, नहीं होती है। जैसे मैं कहता हूं कि नहीं हुई है दिक्कत।
प्रश्न:
दिक्कत तो हो जाती है।
नहीं, मेरा मतलब नहीं समझे आप। मैं जो कह रहा हूं, आप जो कर रहे हैं उसमें दिक्कत हो रही है। नहीं हो रही है तब तो सवाल ही नहीं उठता। बात ही खत्म हो गई है। फिर तो मुझसे पूछने का कोई प्रश्न ही नहीं है।
प्रश्न:
फिर तो कोई बात नहीं है।
हां, नहीं है बात। दिक्कत तो हो रही है। और मैं जो कहता हूं कि यह भी एक जीने का ढंग है। वह आप कहते हैं, उसमें बहुत दिक्कत हो जाएगी। और उसका आपको कोई पता नहीं है, क्योंकि आप जीए नहीं हैं। और मैं तो कहता हूं कि उसमें कभी दिक्कत नहीं होती है।
मैं नौकरी पर था। जिस दिन मैंने नौकरी छोड़ी, तो मैंने घर खबर की कि वह नौकरी छोड़ आया हूं। तो घर के लोग बड़े परेशान हुए। उन्होंने कहा: तुम यह क्या करते हो, सड़क पर खड़े हो जाओगे! मैंने कहा: नौकरी पर था तब भी सड़क पर ही खड़ा था। तुम भूखे मर जाओगे! तो मैंने कहा कि मरना होता ही है। और मरने के बाद क्या पता चलता होगा कि भूखे मरे कि खाकर मरे। तो मर ही जाऊंगा, इससे कोई ऐसी चिंता की बात नहीं है। ठीक है। मैंने कहा: वह तो छोड़ ही दी है। मैंने कहा उनको कि दूसरा कोई उपाय ही नहीं है।
वे बड़े चिंतित हुए, बड़े परेशान हुए--कि हम क्या इंतजाम करें, क्या न इंतजाम करें? मैंने कहा: तुम अपना इंतजाम करो, वही ठीक है। यानी, मेरी तुम क्यों फिकर करते हो? अब मैं गैर-इंतजाम के जीकर देखना चाहता हूं।
और मैं इतना हैरान हुआ हूं कि जब तक नौकरी पर था और व्यवस्था कर रहा था, तब हजार चीजें थीं, जो व्यवस्था नहीं हो सकती थीं। और जब से वह मैंने छोड़ दिया, तो मैंने व्यवस्था भी छोड़ दी। इसलिए जो हो जाता है, वह मेरी व्यवस्था है; जो नहीं होता है, उसका मुझे सवाल ही नहीं है।
अभी कोई, मुझसे एक बहिन मिली और उसने कहा कि मैं कुछ पूछना चाहती हूं, निजी है, आप क्रोधित तो नहीं होंगे। मैंने कहा: पूछो। उसने कहा कि कई दफा मुझे ऐसा लगता है कि आपकी कई जरूरतें पूरी न हो पाती होंगी, तो मैं कुछ कर सकूं। मैंने कहा: मेरी जब जरूरत पूरी हो जाती है, तभी मैं समझ पाता हूं कि जरूरत थी। क्योंकि मेरे पास पूरा करने का तो कोई उपाय भी नहीं है। तो जब जरूरत पूरी हो जाती है, तब मुझे पता चलेगा कि अरे, यह जरूरत थी! इस कमरे में यह कुर्सी भी होनी चाहिए थी। जब कुर्सी आ जाती है, तभी मुझे पता चलता है। और जब नहीं आती है, तब मैं समझता हूं कि नहीं है कुर्सी। तो गैर-कुर्सी के कमरे में जीता हूं, कुर्सी आ जाती है तो कुर्सी वाले कमरे में जीता हूं। कमरा है तो कमरे में जी लूंगा, कमरा नहीं है तो बाहर जी लूंगा।
मेरा कहना यह है, यह जो एक दफा खयाल आ जाए न, तो कठिनाई सिर्फ इसमें ही नहीं है, सिर्फ कठिनाई इसमें ही नहीं है। बाकी कठिनाई सब है। और बराबर किसी भी दिन दुनिया को अगर अच्छा बनना है और अच्छे आनंद से जीना है, तो कुछ ऐसे ही जीना पड़ेगा।
वह एक मित्र एक किताब दे गए थे ‘इक्वान’ पर। बहुत अदभुत है वह किताब। वह आपके पास हो तो उसे देखना चाहिए। वह इक्वान का प्रयोग बड़ा मीनिंगफुल है। ठीक संन्यासी को जैसा होना चाहिए, वैसा है।
अब एक आदमी है, जो इक्वान ही है। तो वह सब छोड़ दिया है, वह पैसा-वैसा नहीं रखता है, वह कुछ नहीं रखता है। वह सड़क पर चला जाता है, और आपके जूते में गंदगी है, तो वह कहता है, रुकिए, जरा मैं आपका जूता साफ कर दूं। और पैसे नहीं लेता हूं। पैसे नहीं लेता हूं! अगर जूता गंदा है, तो मैं साफ कर देता हूं। और मैं फुर्सत में हूं। और मुझे कोई काम नहीं है। अगर आप नाराज न हों, तो एक मिनट रुक जाएं, मैं जूता साफ कर देता हूं।
वह इक्वानी आपका जूता साफ कर देता है। अब आप बड़ी बेचैनी में पड़ जाते हैं। आप उसे कहते हैं कि चलो चाय तो पी लो। वह कहता है, मैं चाय ले चुका हूं। मैं दो जूते और साफ कर चुका हूं। अब मैं तुम्हारे लिए क्या करूं? वह कहता है, कुछ करने की बात नहीं है। कभी जूता गंदा हो तो मैं इधर उपलब्ध होता हूं, मैं जूता साफ कर देता हूं।
वह आदमी दिन भर जूते साफ करता रहता है। किसी घर के सामने कचरा साफ कर देता है। कहीं थक जाता है तो किसी से पूछ लेता है, यहां लेट जाऊं? रात सो लूं न यहां? कोई उसे खाने के लिए बुला कर ले जाता है, कोई उसके लिए कपड़े दे देता है। न वह कपड़े इकट्ठे करता है, न वह खाना इकट्ठा करता है।
और आज जापान में ऐसी इक्वान कम्युनिटीज कई हैं। हर गांव में दस-पच्चीस लोग जो इक्वान ही हैं, जो यही काम करते हैं। उनको आप खबर कर आते हैं कि हमारे घर बारात आने वाली है। तो वे कहते हैं, हम आ जाएंगे। हम बड़े फुर्सत में हैं, हमें कोई काम नहीं है। वे आकर दिन भर काम करते हैं, सांझ जाने लगते हैं, आप उनसे कहते हैं, खाना तो खा जाओ, तो वे कहते हैं, आपकी कृपा है। खाना खा लेते हैं, धन्यवाद देकर चले जाते हैं। नहीं कहते, वे चुपचाप चले जाते हैं धन्यवाद देकर कि आपने हमें काम दिया, आपकी बड़ी कृपा है। हम बड़े खाली बैठे हैं। हम बिलकुल निकम्मे आदमी हैं।
उसमें बड़े से बड़े घरों के लड़के भी जाकर प्रयोग किए और हैरान रह गए हैं कि जिंदगी तब भी चलती है। और जिंदगी एक और अनूठे ढंग से चलती है। जिसका कोई, कोई कैल्कुलेशन नहीं है, कुछ पता नहीं कि कल सुबह क्या करना पड़ेगा। जो बन सकेगा, वह आदमी कर देगा।
कठिनाई नहीं है, कठिनाई नहीं है--मगर हमें चूंकि खयाल नहीं है कि वह भी हो सकता है।
प्रश्न:
जैसा आप बोलते हैं, समझो कि ऐसा है कि वह जो काम करता है करने दो। पर कुछ तो अपने से उलटा भी काम पड़े, तो कोई गंदा करने के लिए बता दिया जाए, तो पीछे वह उलटा काम भी आ जाएगा तो वह करके नहीं लाएगा? उलटा काम, तो उलटा काम भी बता दे सकता है कोई?
हां-हां।
प्रश्न:
जूता साफ करता है, ऐसा धोबी का कपड़ा बनाए, तो बोला कि किसी की औरत उठा ला जा।
यह जो बात है न, यह जो बात है, यह जो बात है न, कोई अगर उससे बोल देता है कि किसी की औरत उठा लाओ। कोई अगर उससे बोलता है कि जाकर फलां घर में चोरी कर लाओ। तो इक्वानी का जो मतलब है, वह यह नहीं कह रहा है कि आप जो कहेंगे वह मैं कर दूंगा। वह यह कह रहा है कि मैं फुर्सत में हूं और यह काम कर सकता हूं, अगर आप करवा लेते हैं, तो धन्यवाद। वह आपका कोई नौकर नहीं है। क्योंकि आप तो उस पर कोई मालकियत कर ही नहीं सकते, क्योंकि वह आपसे कुछ लेता नहीं है।
प्रश्न:
वह तो सच्चा करने के लिए है।
हां। मुझसे आप चोरी करवा सकते हैं, आप कहते हैं, दस हजार रुपये देंगे, आप चोरी कर आओ। लेकिन मैं कहता हूं, मैं कुछ लेता ही नहीं हूं, आप मुझसे चोरी कैसे करवा सकते हैं? जो कुछ ले सकता है, उससे चोरी करवा सकते हैं। यह हो सकता है कि चोर के दाम कम-ज्यादा हो सकते हैं--कि एक पुलिसवाला है, तो उसका पांच रुपया दाम, उससे चोरी करवा लो; राष्ट्रपति है, तो उसका पांच लाख दाम है। बस दाम का फर्क है। दाम बढ़ाते जाओ और आप पाओगे कि वह जगह आ गई, जहां यह आदमी भी चोरी कर सकता है।
लेकिन इक्वानी से तो आप चोरी करवा नहीं सकते, क्योंकि वह यह कहता है कि आपसे मुझे कुछ लेना ही नहीं है। यह तो मेरी मौज है कि आपका जूता साफ कर दिया। और धन्यवाद मैं देता हूं आपको, क्योंकि आपने बड़ी कृपा की कि आप दो क्षण रुके और मुझ निकम्मे आदमी को थोड़ा सा काम दे दिया। और मुझे बड़ा आनंद आया। जूता अच्छा साफ हो गया न, अब आप जाइए।
वह आपका मालिक है, वह आपका नौकर नहीं है। वह आपका नौकर होता, तब तो आप उससे कुछ करवा सकते हैं। वह किसी का नौकर नहीं है। उससे आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि कल तुम इस गांव में रुकना। तो कौन उसको रोक सकता है? वह अगर आज सांझ आपके घर में ईंट आकर रख गया है, मकान में नौकरी कर गया है, दिन भर आकर ईंटें जमा गया है, मेहनत कर गया है, तो आप यह नहीं कह सकते हैं कि कल भी आ जाना। वह कहेगा कि कल की कल देखी जाएगी। कल सुबह निकम्मा रहा, बेकाम रहा और मौज आई तो आ जाऊंगा।
अभी मैं जालंधर था, तो वहां एक संन्यासी मेरे पास आए। वह अदभुत आदमी हैं। वह मुझसे बहुत दूर से कोई सौ मील पैदल चल कर आया। उसके पास कुछ पैसे-वैसे नहीं थे। वह सौ मील चल कर आया। तो उसने आकर मुझे कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। क्या मुश्किल है? उसने कहा: मैं बड़े आनंद में था, और आनंद यह था कि मैं भीख मांग लेता था, खा लेता था। और मैं मास्टर था पहले स्कूल का। तो किसी के घर में पूछ लेता था कि बच्चे वगैरह हों, तो मैं घंटे-दो घंटे पढ़ा जाऊं, क्योंकि खाली हूं। तो ऐसे मैं गांव में दस-पांच बच्चों को पढ़ा आता था जब मुझे मौज होता था। उससे कुछ मैं लेता नहीं था। बस गांव में भीख मांग लेता था। तो सारा गांव मुझे भीख दे ही देता था जिसके घर भी जाता। क्योंकि सब लोग मास्टर जी कहते कि वे मास्टर जी आ गए। और मैं भीख मांग लेता।
उधर एक गांव में एक जमींदार है। उसने मुझसे से कहा कि तुम अब बूढ़े हो गए हो, तुम कहां यहां-वहां फिरते हो, मेरे घर के बच्चों को पढ़ाना और यहीं रहने लगो। तो मैं उसके घर रह गया। उसके बच्चों को पढ़ाता। फिर वह कहने लगा कि जाकर फलाना काम कर आओ। तो मैं वह काम भी कर देता। फिर एक दिन उसका कोई झगड़ा-फसाद हो गया, और उसने मुझसे कहा कि अदालत में चल कर गवाही दो। तो मैंने कहा: वह मैं नहीं दूंगा। तो उसने कहा कि तू नमकहराम है। तो मैंने कहा: अरे, तू बड़ा पागल है। मैं नमकहराम! मैंने तुझसे कभी कुछ लिया नहीं, तेरे सब काम करता रहा। उससे गवाही दिलवाना चाही कि नहीं यह ऐसा मामला नहीं है, पक्ष में गवाही दे दो। तो उसने कहा कि तू नमकहराम है।
मैंने कहा: तू बड़ा पागल आदमी है, मतलब मैं नमकहराम हूं? क्योंकि मैंने तेरे से कभी कुछ लिया नहीं। हां, इतनी भूल हो गई कि मैं स्थायी रूप से तेरी रोटी खाता रहा। हालांकि तेरी रोटी से मैंने बहुत ज्यादा काम कर दिया। इतनी मुझसे गलती हो गई। तो मैं जाता हूं। और मैं जैसा अलग घर में रोज मांग लेता था, अलग घर में रोज सो जाता था; नहीं तो झाड़ के नीचे सो जाता था, वैसा ही सो जाऊंगा।
तो वह मुझसे पूछने आया था कि मैं वहीं से चला आ रहा हूं। तो अब आपका क्या खयाल है? मैंने कहा: ठीक ही तुझे अनुभव हुआ है। मैंने कहा: इन दोनों हालतों में तुझे क्या फर्क लगा?
उसने कहा कि वह साल भर के पहले जो मेरा आनंद था, वह बात ही और थी। जब से मैं उसके घर रहने लगा, तब से बड़े उपद्रव हो गए। क्योंकि उसने धीरे-धीरे--टेकन फॉर ग्रांटेड हो गया वह, कि यह सब करेगा अब। बच्चों को भी पढ़ाएगा, वह पानी भी ले आओ। वह उसने धीरे-धीरे उसको नौकर मान लिया। क्योंकि वह उसको खाना देता है और रहने की जगह देता है।
तो मैंने उससे कहा कि यह तो बिलकुल उसको छोड़ आना था। और छोड़ ही देना चाहिए। क्योंकि यह सवाल नहीं है, वह कोई नौकर नहीं है आपका।
और ऐसी जिंदगी भी संभव है। और संन्यासी का मतलब ही यह था। संन्यासी का और कोई मतलब न था। संन्यासी का मतलब ही यह था कि वह एक ऐसी जिंदगी जीया है, जो उससे बनता है वह कर देता है। आपको अच्छा लगता है, आप दो रोटी खिला देते हैं, बात खत्म हो जाती है। वह असल में संन्यासी का मतलब है: नो इस्टैब्लिश्मेंट का जो दिमाग है कि वह इस्टैब्लिश नहीं करता। कल के लिए इंतजाम नहीं करता, जी लेता है। और कुछ आश्र्चर्य तो नहीं है कि पूरा गांव इस ढंग से जीए, क्यों न जी सके। यानी, अभी भी हम क्या कर रहे हैं?
समझ लो कि एक गांव है, जिसमें पांच सौ आदमी हैं। मैं आपके जूते साफ करता हूं, तो आप मुझे चार आने देते हैं। कोई मेरा कपड़ा धोता है, तो मैं उसको चार आने देता हूं। हम कर क्या रहे हैं, अभी भी क्या कर रहे हैं? यानी, अभी भी हम यही तो कर रहे हैं न! मगर बहुत चक्कर से यह होता है। यह सीधा भी हो सकता है। कि गांव में पांच सौ आदमी हैं, उनको मेहनत को भी चाहिए, खाने को भी चाहिए। वह जाकर खेत पर भी काम कर आता है, कोई बाजार में काम कर आता है, कोई यह काम कर आता है, कोई वह काम कर आता है। और इस सबसे काम से संपत्ति तो पैदा होती है।
तो इधर मेरी एक दृष्टि और निरंतर बनती जाती है, जिसे मैं कहता हूं, पीरियाडिकल संन्यास, कि हम सावधिक संन्यास लें। कितना ही सुविधापूर्ण आदमी तीन महीने के लिए अनइस्टैब्लिश्ड हो जाए। और तीन महीने घूम आए, जाकर छुट्टी लेकर घर से। और तीन महीने जीकर देखे। उसकी, उसकी पुलक और है। और ऐसे ही मैं सोचता हूं...
प्रश्न:
एसेंशियल होती जा रही है।
हां, करीब-करीब। लेकिन उसकी और मनःस्थिति है। और दूसरा मुझे खयाल पकड़ता है कि ऐसी छोटी कम्युनिटिज भी--जैसे कि पचास आदमी एक फार्म पर रहते हैं, गांव पर निकल जाते हैं, वह काम करके लौट आते हैं। गांव वाले खाना दे देते हैं, वह कुछ कर देते हैं, वह अपना पूरा कर लेते हैं वहां जाकर। और वह कम्युनिटी भी बदलती रहे। पचास आदमी तीन महीने के लिए आए हैं, वे चले गए हैं; पचास दूसरे लोग आ गए हैं, वे वहां रहे हैं।
आश्रम का मतलब यह होना चाहिए कि वहां एक... । इसके आनंद की हमें अभी कल्पना नहीं हो सकती कि इसका आनंद क्या हो सकता है। यानी ऐसी हालत में जीना जहां कल की कोई सुरक्षा का सवाल नहीं है। कल जो होगा होगा। नहीं होगा नहीं होगा। कल का कुछ पता ही नहीं है। हमें खयाल ही नहीं हो सकता कि उस जीने का क्या मतलब हो सकता है, उसकी फ्लावरिंग क्या है, वह हमें पता नहीं है।
इसलिए जब आप यह कहते थे न कि कठिन है, तब आपको खयाल में नहीं है; संभव नहीं है, तब आपको खयाल में नहीं है कि आप क्या कह रहे हैं। वह बिलकुल संभव है। और जरा भी कठिन नहीं है। और उसके छोटे-छोटे प्रयोग करके देखना चाहिए। उसमें ऐसा बनता-बिगड़ता क्या है।
अगर आप तीन महीने के लिए चले जाते हैं और घर कह जाते हैं कि हमारा पता ही मत रखना कि कहां जाते हैं। और तीन महीने ऐसे जीकर देखते हैं। आप बिलकुल इतने समृद्ध आदमी होकर लौटेंगे कि जिसका हिसाब नहीं है। क्योंकि कुछ अनुभव हैं, जो सिर्फ गरीब को ही हो सकते हैं। कुछ अनुभव सिर्फ गरीब को ही हो सकते हैं। कुछ अनुभव सिर्फ उसी को हो सकते हैं, जो बिलकुल असुरक्षा में जीता है। जो सुरक्षित को हो ही नहीं सकते।
और जिसको हम फ्रीडम कहते हैं न, स्वतंत्रता जिसको कहते हैं, वह ऐसा अनुभव है जो उसी को हो सकता है जो इनसिक्योरिटी में रहता है। वही सिर्फ मुक्त-भाव का थोड़ा अनुभव...। और एक दफा तीन महीने का ऐसा प्रयोग करके आएं, तो फिर आप हैरान होंगे कि यह तो जिंदगी में भी किया जा सकता है। चूंकि यह, क्यों इतना जोर से मैं कहता हूं, इसलिए जोर से कहता हूं कि अंततः चूंकि खोने को कुछ भी नहीं है। इसलिए खोने का इतना डर क्या? और चूंकि अंततः सभी खो जाएगा, इसलिए बचाने का इतना पागलपन क्या? अगर कोई बचा कर बचा लेता होता, तो हम सोचते कि बात है। कोई बचा कर भी नहीं बचा पाता है।
खेल के बाहर खड़े होकर देखने की बात है। और खेल के भीतर तो ठीक है। वह खेल के भीतर तो ठीक है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
इसमें कुछ मत करिए। नींद आ जाए, तो नींद को स्वीकार कर लीजिए। उसको अस्वीकार मत करिए। उसको स्वीकार कर लीजिए। नींद भी बड़ी आध्यात्मिक है, जितना जागना आध्यात्मिक है। उससे कम आध्यात्मिक नहीं है नींद।
प्रश्न:
ऐसा।
हां। नींद में कोई पाप नहीं है। वह उतनी ही आध्यात्मिक है, जितनी कि जागरूकता।
प्रश्न:
नींद में लेकिन भान तो रहती नहीं?
भान की भी इतनी क्या फिकर, इतनी फिकर करने की जरूरत नहीं भान की। नहीं तो चिंता बन जाएगी।
प्रश्न:
अच्छा।
हां। भान न रह जाएगा, चिंता हो जाएगी। न, इतनी फिकर करने की जरूरत नहीं है। नींद आए, तो नींद में चले जाइए। आंख खुल जाए और जागरण आ जाए, तो जागरण में चले जाइए। इन दोनों पहलुओं को एक साथ स्वीकार कर लीजिए।
प्रश्न:
अच्छा।
हां। नहीं तो नींद से लड़ेंगे, तो वह जो आप जो कह रहे हैं न, स्तब्धता रह जाती है, वह नींद से लड़ने की वजह से हो रहा है। आप नींद से लड़िए मत, ताकि ये दोनों चीजें एक-दूसरे में न घुस जाएंगे। नींद नींद में रहे, जागना जागने में रहे। अगर दोनों एक-दूसरे में घुस जाएंगे, तो स्तब्धता आ जाएगी। जिसमें कुछ समझ में नहीं पड़ेगा।
प्रश्न:
लेकिन मन ऐसा अभ्यस्त हो रहा है तो वहां जाने के लिए मना करता है, मन दुखता है कि नींद नहीं आनी चाहिए?
न, वह सुनी हुई बात है। मन-वन नहीं है, वह संस्कार है। किताबों में लिखा है नींद तामसिक है, फलाना, ढिकाना। नींद से ज्यादा आध्यात्मिक क्या हो सकता है। वह किताबों में लिखा हुआ है।
प्रश्न:
तो वह अज्ञान है न?
तो अज्ञान भी ब्रह्म है और ज्ञान भी ब्रह्म है। उसमें अज्ञान कौन अलग से आएगा, कहां से आएगा। ब्रह्म ही अज्ञानी भी है।
प्रश्न:
लेकिन हम सोते ही हैं, तो ऐसी दशा है।
इतनी स्वीकृति चाहिए। इसी को आस्तिकता कहता हूं मैं। नींद है तो नींद है, जागना है तो जागना है। और भान रहा तो भान रहा और न रहा तो न रहा। इन दोनों के भाव को जब स्वीकार करेंगे, तब जो भान आएगा, वह बात ही अलग है। उसका आपको पता नहीं है। तब वह भान नींद में भी बना रहेगा और जागने में भी बना रहेगा। लेकिन वह भान आएगा जब टोटल एक्सेप्टिबिलिटी होगी। नींद भी स्वीकार है, पाप भी स्वीकार है, बुराई भी स्वीकार है, सब स्वीकार है, जो हो रहा है हो रहा है। वह सब ब्रह्म ही तो कर रहा है। आप उसमें बाधा कैसे डाल पाएंगे? न डाल पाएंगे।
यानी, हमको कुछ खयाल ऐसा है कि अगर कहीं ब्रह्म होगा, तो चौबीस घंटे जागा हुआ रहेगा। सोएगा नहीं। अब तक खत्म हो गया होगा, दिमाग खराब हो जाएगा अगर ऐसा करेगा तो। वह भी सो रहा होगा। वह भी सोएगा ही। सोना विश्राम है उसमें। जब जागोगे तो सोना भी पड़ेगा ही।
प्रश्न:
आधे को स्वीकार न करें?
हां, आधे को स्वीकार न करें; पूरे को, जैसा है। तब एक भान आएगा। और वह भान बहुत अलग है। वह आपका लाया हुआ नहीं है। वह आया हुआ है। और उसकी कीमत बहुत है।
प्रश्न:
वह कब आता है?
वही तो, आप लाने की कोशिश में लगते हैं, इसलिए पूछते हैं, कब आता है? वही तो मैं कह रहा हूं कि लगिए मत उस कोशिश में।
प्रश्न:
पूछा कि तकलीफ है।
वह चिंता मत बनाइए ध्यान को। क्योंकि ध्यान और चिंता का कभी मेल नहीं हो सकता। अगर आपने ध्यान को भी चिंता बना लिया, तो फिर कभी ध्यान उपलब्ध नहीं होगा।
प्रश्न:
नहीं, चिंता तो नहीं रहती, लेकिन जैसा...
वह चिंता ही है न!
प्रश्न:
अच्छा।
क्यों क्या जरूरत है कब आएगा? जब आना होगा आ जाएगा और नहीं आना होगा नहीं आएगा। जो मैं कह रहा हूं, दोनों पहलू एक साथ स्वीकृत होने चाहिए, तभी आएगा, नहीं तो नहीं आएगा। मेरी कठिनाई समझ रहे हैं न आप? मेरी कठिनाई यह है कि ठीक है, आ जाएगा तो आ जाएगा, नहीं तो कोई पक्का ठेका तो लिया नहीं है कि आएगा ही। और किसे हम रिस्पांसिबल ठहराएंगे नहीं आएगा तो?
समझ लो, नहीं आया ध्यान, तो किसको पकड़ कर कहेंगे कि नहीं आया? नहीं आया तो नहीं आया, आ गया तो आ गया। जब इतनी सरलता से आप लेंगे, तो आ जाएगा।
प्रश्न:
ऐसा।
हां। मगर ‘ऐसा’ कहने में वही डर मौजूद है, क्योंकि आप कहेंगे, तब तो ठीक है, आ जाएगा, तो फिर हम ऐसा ही कर लेंगे। लेकिन आने के लिए ही करेंगे। तब फिर चिंता पैदा हो जाएगी। मैं जो कह रहा हूं वह यह कि आप इसको चिंता मत बनाएं, टेंशन मत बनाएं। जब आप कहते हैं न कि ऐसा, तो उसमें ऐसा लगता है कि तब फिर ठीक है, यह तरकीब अच्छी रही, इससे आ जाएगा। न, यह आने की तरकीब नहीं है। न, यह आने की तरकीब नहीं है। आ सकता है अगर तरकीब न लगाएं तो।
प्रश्न:
सहज।
सहज ही आएगा, नहीं तो नहीं आएगा। और हमारा माइंड इतना चालाक है कि वह हर चीज को तरकीब बनाना चाहता है। वह कहता है, अच्छा चलो, फिर यही कर लेंगे। अगर आप कहते हैं कि इससे आ जाएगा, तो यही कर लेंगे, तो भी लाना तो हमको है ही। फिर बस, यहीं पर गड़बड़ हो जाती है। लाने-वाने की भी क्या जरूरत है? क्या हर्जा है न आया तो? क्या खोया जा रहा है? ब्रह्म को कोई कमी नहीं मालूम पड़ रही आप अगर ध्यान में नहीं जा रहे तो! ठीक चल रहा है। काहे के लिए झंझट कर रहे। अगर बूंद सागर में नहीं गिर रही है, तो सागर को कौन सी तकलीफ है। मत गिरो।
प्रश्न:
बूंद को तकलीफ होती है?
बूंद को भी तकलीफ नहीं है। बूंद को भी तकलीफ यह है कि कुछ नासमझ उसको सिखा रहे हैं कि तुझे सागर होना चाहिए। वह तकलीफ हो सकती है। क्या जरूरत है सागर होने की? बूंद अपने में भी काफी है। और जिस दिन बूंद इतनी अपने में काफी हो जाएगी कि समझेगी कि मैं काफी हूं, उसी दिन सागर हो जाएगी। फिर फर्क क्या रहा? वह पर्याप्त होने का बोध ही सागर होना है न! अगर बूंद भी यह समझ ले कि ठीक है, मैं जो हूं हूं, मैं क्यों सागर हो जाऊं? जब सागर बूंद होने को तैयार नहीं, तो मैं क्यों सागर हो जाऊं? ठीक है, मैं मैं हूं, तुम तुम हो, तो उसी दिन हो जाएगी। उस दिन चिंता गई, दौड़ गई, तनाव गया, बूंद सागर हो जाएगी।
हम प्रत्येक चीज को फौरन विधि बनाते हैं न, यही तकलीफ है। और विधि में सारा उपद्रव है।
प्रश्न:
ध्यान की गहराई में कैसे उतरा जाता है?
अरे, वही तो बीमारी वह बता रहे हैं। वही बीमारी है। वही बीमारी है। वही बीमारी वह कह रहे हैं।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
न, मैं यह कह रहा हूं कि जब हम सब स्वीकार कर लेते हैं, तो गहराई में उतर जाते हैं। कैसे उतरा जा सकता है, यह नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि यह कांसिक्वेंस है। जब हम सब स्वीकार कर लेते हैं, तो उथले में रहने का उपाय नहीं रह जाता। आप उतर ही जाएंगे गहरे में, करेंगे क्या!
लेकिन कोई पूछता है कि ‘हमें गहरे में उतरना है।’ जब वह कहता है, ‘उतरना है,’ तब वह यह कह रहा है, उथले में हमें नहीं रहना है। बस, वह स्वीकार में नहीं है वह। आधे को निषेध कर रहा है, आधे को मान रहा है। और मैं यह कह रहा हूं कि जब वह पूरे को स्वीकार करे, तो ही गहराई में उतर सकता है।
इसलिए गहराई में उतरने की आकांक्षा गहराई में नहीं ले जाएगी, वह भी उथले में बिठा देगी। हां, जो व्यक्ति कहता है, कहीं जाना ही नहीं है, जो है है--उथले में हैं तो हर्ज क्या है, उथले की बुराई क्या है? यानी मैं यह पूछता हूं कि उथले में ऐसी बुराई क्या है? और अगर उथला न हो, तो गहरा होगा कैसे? उथला जो है वह गहरे का ही हिस्सा है। और अगर गहरा ब्रह्म है, तो उथला कौन है? वह भी तो ब्रह्म ही है। वह जरा ऊपर वाले ब्रह्म हैं, वह जरा नीचे वाले ब्रह्म हैं, ऐसा कोई फर्क तो नहीं है। और जब हम इन दोनों को एक साथ स्वीकार कर लेते हैं, तब एक गहराई मिलती है, जो न उथलाई है, न गहराई है। वह बात ही और है। उसके लिए कोई शब्द नहीं है कहने को। उसके लिए कोई शब्द नहीं है कहने को।