मेरे प्रिय आत्मन्!
सबसे पहले एक प्रश्न पूछा है कि
भगवान, साधक को प्रकाश की किरण मिले, उसको सतत बनाए रखने के लिए क्या किया जाए?
मैंने सुबह कहा, जो अनुभव हो आनंद का, जो शांति का, आनंद का अनुभव हो, उसे हम सतत चौबीस घंटे अपने भीतर बनाए रखें। कैसे बनाए रखेंगे?
दो रास्ते हैं। एक रास्ता तो है कि हम उस चित्त-स्थिति को, जो ध्यान में अनुभव हुई, उसका जब भी हमें अवसर मिले, पुनः स्मरण करें। जैसे ध्यान के समय शांत श्वास ली है। जब भी दिन में समय मिले, जब आप कोई विशेष काम में नहीं लगे हैं, उस समय श्वास को धीमा कर लें और नाक के पास जहां श्वास का कंपन हो, उसका थोड़ा सा स्मरण करें। उस स्मरण के साथ ही उस भाव को फिर से आरोपित कर लें कि आप आनंदित हैं, प्रफुल्लित हैं, शांत हैं, स्वस्थ हैं। उस भाव को पुनः स्मरण कर लें। जब भी स्मरण आ जाए--सोते समय, उठते समय, रास्ते पर जाते समय--जहां भी स्मरण आ जाए, उस भाव को पुनः आवर्तित कर लें।
उसका परिणाम होगा कि दिन में अनेक बार वह स्मृति, वह स्मरण आपके भीतर आघात करेगा और कुछ समय में आपको उसे अलग से याद करने की जरूरत न रह जाएगी। वह आपके साथ वैसे ही रहने लगेगा, जैसे श्वासें आपके साथ हैं।
एक तो इस भाव-स्थिति को बार-बार स्मरण करना। जब भी खयाल मिल जाए--बिस्तर पर लेट गए हैं, स्मरण आया है, ध्यान की स्थिति को वापस दोहराने का भाव कर लें। रास्ते पर घूमने गए हैं, रात्रि को चांद के नीचे बैठे हैं, किसी दरख्त के पास बैठे हैं, कोई नहीं है, कमरे में अकेले बैठे हैं, पुनः स्मरण कर लें। बस में सफर कर रहे हैं, या ट्रेन में सफर कर रहे हैं, अकेले बैठे हैं, आंख बंद कर लें, उस भाव-स्थिति को पुनः स्मरण कर लें। दिन के व्यस्त काम-काज में भी, दफ्तर में भी, दो मिनट के लिए कभी उठ जाएं, खिड़की के पास खड़े हो जाएं, गहरी श्वास ले लें, उस भाव-स्थिति को स्मरण कर लें।
दिन में ऐसा अगर दस-पच्चीस बार, मिनट आधा मिनट को भी उस स्थिति को स्मरण किया, तो उसका सातत्य घना होगा और कुछ दिनों में आप पाएंगे, उसे स्मरण नहीं करना होता है, वह स्मरण बना रहेगा। तो यह एक रास्ता, ध्यान में जो अनुभव हो, उसे इस भांति निरंतर विचार के माध्यम से स्वयं की स्मृति में प्रवेश दिलाने का है।
दूसरा रास्ता, रात्रि को सोते समय, जैसे अभी मैंने आपको संकल्प करने के लिए कहा है, जब संकल्प आपका प्रगाढ़ जिस रास्ते से होता है, उसी रास्ते से ध्यान की स्मृति को भी कायम रखा जा सकता है। जब ध्यान का एक अनुभव आने लगे, तो रात्रि को सोते समय वही प्रक्रिया करें और उस वक्त यह भाव मन में दोहराएं कि ध्यान में मुझे जो भी अनुभव होगा, उसकी स्मृति मुझे चौबीस घंटे बनी रहेगी। जो मैंने संकल्प के लिए प्रयोग बताया है--श्वास को बाहर फेंक कर संकल्प करने का या श्वास को भीतर लेकर संकल्प करने का--जब आपको कुछ अनुभव आने लगे शांति का, तो इसी प्रक्रिया के माध्यम से यह संकल्प मन में दोहराएं कि ध्यान में मुझे जो भी अनुभव होगा, वह मुझे चौबीस घंटा, एक सतत अंतःस्मरण उसका मेरे भीतर बना रहेगा।
इसको दोहराने से आप पाएंगे कि आपको बिना किसी कारण के अचानक दिन में कई बार ध्यान की स्थिति का खयाल आ जाएगा। ये दोनों संयुक्त करें, तो और भी ज्यादा लाभ होगा। फिर अभी हम विचार और भाव की शुद्धि के संबंध में जब बात करेंगे, तो इस संबंध में और बहुत सी बातें चर्चा हो सकेंगी। लेकिन इन दोनों बातों का प्रयोग किया जा सकता है।
बहुत सा समय चौबीस घंटे का हमारे पास व्यर्थ होता है, जिसका हम कोई उपयोग नहीं करते। उस व्यर्थ के समय में अगर ध्यान की स्मृति को दोहराते हैं, तो बहुत अंतर पड़ेगा।
इसको कभी इस तरह खयाल करें। अगर आपको दो वर्ष पहले किसी व्यक्ति ने गाली दी थी, दो वर्ष पहले आपका किसी ने अपमान किया था, दो वर्ष पहले कहीं आपके साथ कोई दुर्घटना घटी थी, अगर आप आज भी उसे स्मरण करने बैठेंगे, तो उस पूरी घटना को स्मरण करते-करते आप यह भी हैरान हो जाएंगे कि घटना को स्मरण करते-करते आपके शरीर की और चित्त की अवस्था भी उसी छाप को ले लेगी, जो दो वर्ष पहले घटित हुआ होगा। अगर दो वर्ष पहले आपका कोई भारी अपमान हुआ था, आप आज बैठ कर अगर उसका स्मरण करेंगे कि वह घटना कैसे घटी थी और कैसे अपमान हुआ था, तो आप स्मरण करते-करते हैरान होंगे कि आपका शरीर और आपका चित्त उसी अवस्था में पुनः पहुंच गया है और आप जैसे फिर से अपमान को अनुभव कर रहे हैं।
हमारे चित्त में संग्रह है और वह विलीन नहीं होता। जो भी अनुभव होते हैं, वे संगृहीत हो जाते हैं। अगर उनकी स्मृति को फिर से पुकारा जाए, तो वे अनुभव जगाए जा सकते हैं और हम दुबारा उन्हीं अनुभूतियों में प्रवेश पा सकते हैं। मनुष्य के मन से कोई भी स्मृति नष्ट नहीं होती है।
तो अगर आज सुबह आपको ध्यान में अच्छा लगा हो, तो दिन में दस-पांच बार उसका पुनर्स्मरण बहुत महत्वपूर्ण होगा। उस भांति वह स्मृति गहरी होगी। और बार-बार स्मरण आ जाने से वह चित्त के स्थायी स्वभाव का हिस्सा बनने लगेगी। इसे, यह जो प्रश्न पूछा है, इस भांति अगर इस पर प्रयोग हुआ, तो लाभ होगा। और यह करना चाहिए।
अक्सर मनुष्य की भूल यह है कि जो भी गलत है, उसका तो वह स्मरण करता है; और जो भी शुभ है, उसका स्मरण नहीं करता। मनुष्य की बुनियादी भूलों में से एक यह है कि जो भी नकारात्मक है, निगेटिव है, उसका वह स्मरण करता है; और जो भी विधायक है, उसका स्मरण नहीं करता। आपको शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आप प्रेम से भरे हुए थे; शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आपने स्वास्थ्य की कोई बहुत अदभुत अनुभूति की थी; शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आप बहुत शांत हो गए थे। लेकिन आपको वे स्मरण रोज आते हैं, जब आप क्रोधित हुए थे, जब आप अशांत हुए थे; जब किसी ने आपका अपमान किया था, या आपने किसी से बदला लिया था। आप उन-उन बातों को निरंतर स्मरण करते हैं, जो घातक हैं; और उनका स्मरण शायद ही होता हो, जो कि आपके जीवन के लिए विधायक हो सकती हैं।
विधायक अनुभूतियों का स्मरण बहुत बहुमूल्य है। उन-उन अनुभूतियों को निरंतर स्मरण करने से दो बातें होंगी। सबसे महत्वपूर्ण तो यह होगा कि अगर आप विधायक अनुभूतियों को स्मरण करते हैं, तो उन अनुभूतियों के वापस पैदा होने की संभावना आपके भीतर बढ़ जाएगी। जो आदमी घृणा की बातों को बार-बार याद करता हो, बहुत संभावना है, आज भी घृणा की कोई घटना उससे घटेगी। जो आदमी उदासी की बातों को बार-बार स्मरण करता हो, बहुत संभव है, आज वह फिर उदास होगा। क्योंकि उसके एक तरह के झुकाव पैदा हो जाते हैं और वही बातें उसमें पुनरुक्त हो जाती हैं। ये, ये जो भाव हैं, स्थायी बन जाते हैं और जीवन में उन-उन भावों का बार-बार पैदा हो जाना आसान हो जाता है।
इसको अपने भीतर विचार करें कि आप किस तरह के भावों को स्मरण करने के आदी हैं। हर आदमी स्मरण करता है। किस तरह के भावों को आप स्मरण करने के आदी हैं? और यह स्मरण रखें कि अतीत के जिन भावों को आप स्मरण करते हैं, भविष्य में आप उन्हीं भावों को, बीजों को बो रहे हैं और उनकी फसल को काटेंगे। अतीत का स्मरण भविष्य के लिए रास्ता बन जाता है।
स्मरणपूर्वक, जो व्यर्थ है, जिसका कोई उपयोग नहीं है, उसे याद न करें। उसका कोई मूल्य नहीं है। अगर उसका स्मरण भी आ जाए, तो रुकें और उस स्मरण को कहें कि बाहर हो जाओ, तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है। कांटों को भूल जाएं और फूलों को स्मरण रखें। कांटे जरूर बहुत हैं, लेकिन फूल भी हैं। जो फूलों को स्मरण रखेगा, उसके जीवन में कांटे क्षीण होते जाएंगे और फूल बढ़ जाएंगे। और जो कांटों को स्मरण रखेगा, उसके जीवन में हो सकता है, फूल विलीन हो जाएं और केवल कांटे रह जाएं।
हम क्या स्मरण करते हैं, वही हम बनते चले जाते हैं। जिसका हम स्मरण करते हैं, वही हम हो जाते हैं। जिसका हम निरंतर विचार करते हैं, वह विचार हमें परिवर्तित कर देता है और हमारा प्राण हो जाता है। इसलिए शुभ, सद, जो भी आपको श्रेष्ठ मालूम पड़े, उसे स्मरण करें। और जीवन में--इतना दरिद्र जीवन कोई भी नहीं है कि उसके जीवन में कोई शांति के, आनंद के, सौंदर्य के, प्रेम के क्षण न घटित हुए हों। और अगर आप उनके स्मरण में समर्थ हो गए, तो यह भी हो सकता है कि आपके चारों तरफ अंधकार हो, लेकिन आपकी स्मृति में प्रकाश हो और इसलिए चारों तरफ का अंधकार भी आपको दिखायी न पड़े। यह भी हो सकता है, आपके चारों तरफ दुख हो, लेकिन आपके भीतर कोई प्रेम की, कोई सौंदर्य की, कोई शांति की अनुभूति हो और आपको चारों तरफ का दुख भी दिखायी न पड़े। यह संभव है, यह संभव है कि बिलकुल कांटों के बीच में कोई व्यक्ति फूलों में हो। इसके विपरीत भी संभव है। और यह हमारे ऊपर निर्भर है।
यह मनुष्य के ऊपर निर्भर है कि वह अपने को कहां स्थापित कर देता है, वह अपने को कहां बिठा देता है। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम स्वर्ग में रहते हैं या नरक में रहते हैं। मैं आपको कहना चाहूंगा, स्वर्ग और नरक कोई भौगोलिक स्थान नहीं हैं। वे मानसिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियां हैं। हममें से अधिकतर लोग दिन में कई बार नरक में चले जाते हैं और कई बार स्वर्ग में आ जाते हैं। और हममें से कई लोग दिन भर नरक में रहते हैं। और हममें से कई लोग स्वर्ग में वापस लौटने का रास्ता ही भूल जाते हैं। लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो चौबीस घंटे स्वर्ग में रहते हैं। इसी जमीन पर, इन्हीं स्थितियों में ऐसे लोग हैं, जो स्वर्ग में रहते हैं। आप भी उनमें से एक बन सकते हैं। कोई बाधा नहीं है, सिवाय कुछ वैज्ञानिक नियमों को समझने के।
एक स्मरण मुझे आया। बुद्ध का एक शिष्य था, पूर्ण। उसकी दीक्षा पूरी हुई, उसकी साधना पूरी हुई। पूर्ण ने कहा कि ‘अब मैं जाऊं और आपके संदेश को उनसे कह दूं, जिनको उसकी जरूरत है।’ बुद्ध ने कहा, ‘तुम्हें मैं जाने की आज्ञा तो दूं, लेकिन एक बात पूछ लूं: तुम कहां जाना चाहोगे?’ बिहार में एक छोटा सा हिस्सा था ‘सूखा’। पूर्ण ने कहा, ‘मैं सूखा की तरफ जाऊं। अब तक कोई भिक्षु वहां नहीं गया। और वहां के लोग आपके अमर संदेश से वंचित हैं।’
बुद्ध ने कहा, ‘वहां कोई नहीं गया, इसके पीछे कारण था। वहां के लोग बहुत बुरे हैं। हो सकता है, तुम वहां जाओ, वे तुम्हारा अपमान करें। वे तुम्हें गालियां दें, तुम्हें परेशान करें, तो तुम्हारे मन में क्या होगा?’ पूर्ण ने कहा, ‘मैं उन्हें धन्यवाद दूंगा। धन्यवाद दूंगा कि वे केवल गालियां देते हैं, अपमान करते हैं, लेकिन मारते नहीं।’ उसने कहा, ‘मैं उन्हें धन्यवाद दूंगा कि वे गालियां देते हैं, अपमान करते हैं, लेकिन मारते नहीं हैं। मार भी सकते थे।’ बुद्ध ने कहा, ‘यह भी हो सकता है कि उनमें से कोई तुम्हें मारे, तो तुम्हारे मन को क्या होगा?’ उसने कहा, ‘मैं धन्यवाद दूंगा कि वे मारते हैं, लेकिन मार ही नहीं डालते हैं। वे मार भी डाल सकते थे।’
बुद्ध ने कहा, ‘मैं अंतिम एक बात और पूछता हूं। यह भी हो सकता है, कोई तुम्हें मार ही डाले, तो तुम्हारे मन को क्या होगा?’ उसने कहा, ‘मैं धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल हो सकती थी।’ उस पूर्ण ने कहा, ‘मैं धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल हो सकती थी। मैं उनका अनुग्रह मानूंगा।’ बुद्ध ने कहा, ‘तब तुम कहीं भी जाओ। अब इस जमीन पर सब जगह तुम्हारे लिए परिवार है, क्योंकि जिसके हृदय की यह स्थिति है, उसके लिए इस जमीन पर कोई कांटे नहीं हैं।’
कल मैं बात करता था रास्ते में। महावीर के लिए कहा जाता है--बड़ी झूठी बात लगेगी--महावीर के लिए कहा जाता है कि वे जब रास्तों पर चलते थे, तो कांटे अगर सीधे पड़े हों, तो वे उलटे हो जाते थे। यह बात कितनी झूठ है! कोई कांटे को क्या मतलब कि कौन चलता है? किसी कांटे को क्या प्रयोजन कि महावीर चलते हैं या कौन चलता है? और कांटे कैसे सीधे पड़े हों तो उलटे हो जाएंगे? और मैंने सुना है कि मोहम्मद के बाबत कहा जाता है कि जब वे अरब के गर्म रेगिस्तानों में चलते थे, तो एक बदली उनके ऊपर छाया किए रहती थी। यह कितनी झूठी बात है! बदलियों को क्या प्रयोजन कि नीचे कौन चलता है? मोहम्मद चलते हैं या कौन चलता है, वे कैसे छायाएं करेंगी?
लेकिन मैं आपसे कहूं, ये बातें सच हैं। कोई कांटे उलट कर उलटे नहीं होते और कोई बदलियां नहीं चलतीं, लेकिन इनमें हमने कुछ सचाइयां जाहिर की हैं। हमने कुछ सचाइयां जाहिर की हैं, इन बातों में हमने कुछ प्रेम भरी बातें कहीं हैं। हमने यह कहना चाहा है कि जिस आदमी के हृदय में कोई कांटा नहीं रह गया, इस जगत में उसके लिए कोई कांटा सीधा नहीं है। और हमने यह कहा है कि जिस आदमी के हृदय में उत्ताप नहीं रह गया, इस जगत में उसके लिए हर जगह एक छायादार बदली है और उसे कहीं कोई धूप नहीं है। हमने यह कहना चाहा है। और यह बड़ी सच बात है।
हमारे चित्त की स्थिति हम जैसी बनाए रखेंगे, यह दुनिया भी ठीक वैसी बन जाती है। न मालूम कौन सा चमत्कार है कि जो आदमी भला होना शुरू होता है, यह सारी दुनिया उसे एक भली दुनिया में परिवर्तित हो जाती है। और जो आदमी प्रेम से भरता है, इस सारी दुनिया का प्रेम उसकी तरफ प्रवाहित होने लगता है। और यह नियम इतना शाश्वत है कि जो आदमी घृणा से भरेगा, प्रतिकार में घृणा उसे उपलब्ध होने लगेगी। हम जो अपने चारों तरफ फेंकते हैं, वही हमें उपलब्ध हो जाता है। इसके सिवाय कोई रास्ता भी नहीं है।
तो चौबीस घंटे उन क्षणों का स्मरण करें, जो जीवन में अदभुत थे, ईश्वरीय थे। वे छोटे-छोटे क्षण, उनका स्मरण करें और उन क्षणों पर अपने जीवन को खड़ा करें। और उन बड़ी-बड़ी घटनाओं को भी भूल जाएं, जो दुख की हैं, पीड़ा की हैं, घृणा की हैं, हिंसा की हैं। उनका कोई मूल्य नहीं है। उन्हें विसर्जित कर दें, उन्हें झड़ा दें। जैसे सूखे पत्ते दरख्तों से गिर जाते हैं, वैसे जो व्यर्थ है, उसे छोड़ते चले जाएं; और जो सार्थक है और जीवंत है, उसे स्मरणपूर्वक पकड़ते चले जाएं। चौबीस घंटे इसका सातत्य रहे। एक धारा मन में बहती रहे शुभ की, सौंदर्य की, प्रेम की, आनंद की।
तो आप क्रमशः पाएंगे कि जिसका आप स्मरण कर रहे हैं, वे घटनाएं बढ़नी शुरू हो गयी हैं। और जिसको आप निरंतर साध रहे हैं, उसके चारों तरफ दर्शन होने शुरू हो जाएंगे। और तब यही दुनिया बहुत दूसरे ढंग की दिखायी पड़ती है। और तब ये ही लोग बहुत दूसरे लोग हो जाते हैं। और ये ही आंखें और ये ही फूल और ये ही पत्थर एक नये अर्थ को ले लेते हैं, जो हमने कभी पहले जाना नहीं था। क्योंकि हम कुछ और बातों में उलझे हुए थे।
तो मैंने जो कहा, ध्यान में जो अनुभव हो--थोड़ा सा भी प्रकाश, थोड़ी सी भी किरणें, थोड़ी सी भी शांति--उसे स्मरण रखें। जैसे एक छोटे से बच्चे को उसकी मां सम्हालती है, वैसे जो भी छोटी-छोटी अनुभूतियां हों, उन्हें सम्हालें। उन्हें अगर नहीं सम्हालेंगे, वे मर जाएंगी। और जो जितनी मूल्यवान चीज होती है, उसे उतना सम्हालना होता है।
जानवरों के भी बच्चे होते हैं, उनको सम्हालना नहीं होता। और जितने कम विकसित जानवर हैं, उनके बच्चों को उतना ही नहीं सम्हालना होता, वे अपने आप सम्हल जाते हैं। जैसे-जैसे विकास की सीढ़ी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे आप पाते हैं--अगर मनुष्य के बच्चे को न सम्हाला जाए, वह जी ही नहीं सकता। मनुष्य के बच्चे को न सम्हाला जाए, वह जी नहीं सकता। उसके प्राण समाप्त हो जाएंगे। जो जितनी श्रेष्ठ स्थिति है जीवन की, उसे उतने ही सम्हालने की जरूरत पड़ती है।
तो जीवन में भी जो अनुभूतियां मूल्यवान हैं, उनको उतना ही सम्हालना होता है। उतने ही प्रेम से उनको सम्हालना होता है। तो छोटे से भी अनुभव हों, उन्हें सम्हालें; वैसे ही जैसे...। आपने पूछा, कैसे सम्हालें? अगर मैं आपको कुछ हीरे दे दूं, तो आप उन्हें कैसे सम्हालेंगे? अगर आपको कोई बहुमूल्य खजाना मिल जाए, उसे आप कैसे सम्हालेंगे? उसे आप कैसे सम्हालेंगे? उसे आप कहां रखेंगे? उसे आप छिपा कर रखना चाहेंगे; उसे अपने हृदय के करीब रखना चाहेंगे।
एक भिखमंगा मरता था एक अस्पताल में। और जब पादरी उसके पास गया और डाक्टरों ने कह दिया कि वह मरने को है। और पादरी उसके पास गया अंतिम भगवान की प्रार्थना करवाने के लिए। उससे कहा, ‘तुम हाथ जोड़ो।’ उसने एक ही हाथ उठाया। एक हाथ की मुट्ठी बंद थी। पादरी ने कहा, ‘दोनों हाथ जोड़ो।’ उसने कहा, ‘क्षमा करें, दूसरा मैं नहीं खोल सकता हूं।’
वह आदमी मरने को है और दूसरा हाथ नहीं खोल रहा है! वह मर गया दो क्षण बाद। हाथ खोला गया। कुछ गंदे सिक्के वह इकट्ठे किए हुए था, जिस पर उसने मुट्ठी बांधी हुई थी। कुछ गंदे सिक्के! उसे पता है, मर रहा है, लेकिन मुट्ठी बंधी हुई है!
साधारण सिक्कों को हम सम्हालना जानते हैं, सब जानते हैं। और जो श्रेष्ठतम सिक्के हैं, उन्हें सम्हालने का हमें कुछ पता नहीं है। और हम उसी भिखमंगे की तरह हैं, जो एक दिन मुट्ठी बंद किए हुए पाए जाएंगे। और जब उनकी मुट्ठी खोली जाएगी, तो कुछ गंदे सिक्कों के सिवाय वहां कुछ भी नहीं मिलेगा।
उन अनुभूतियों को सम्हालें, वे ही असली सिक्के हैं, जिन्होंने आपके जीवन को स्फुरणा दी हो, प्रेरणा दी हो, आपके भीतर कुछ परिवर्तित किया हो, कुछ कंपित हुआ हो, कुछ श्रेष्ठ की तरफ आपके भीतर लपट पैदा हुई हो। और उन्हें इस भांति सम्हालें। ये दो रास्ते मैंने कहे। क्रमशः प्रयोग करने से बात समझ में आ सकेगी।
एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि
भगवान, सेक्स एक सृजनात्मक शक्ति है। पति-पत्नी के संबंध में उसका क्रिएटिव उपयोग कैसे किया जाए?
यह बड़ी बहुमूल्य बात पूछी है। शायद ही ऐसे लोग होंगे, जो इस तरह के, जिनके लिए इस तरह का प्रश्न उपयोगी न हो, सार्थक न हो। दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं। एक वे लोग हैं, जो सेक्स की, काम की शक्ति से पीड़ित हैं। और एक वे लोग हैं, जिन्होंने काम की शक्ति को प्रेम की शक्ति में परिणत कर लिया है।
आप जान कर हैरान होंगे, प्रेम और काम, प्रेम और सेक्स विरोधी चीजें हैं। जितना प्रेम विकसित होता है, सेक्स क्षीण हो जाता है। और जितना प्रेम कम होता है, उतना सेक्स ज्यादा हो जाता है। जिस आदमी में जितना ज्यादा प्रेम होगा, उतना उसमें सेक्स विलीन हो जाएगा। अगर आप परिपूर्ण प्रेम से भर जाएंगे, आपके भीतर सेक्स जैसी कोई चीज नहीं रह जाएगी। और अगर आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है, तो आपके भीतर सब सेक्स है।
सेक्स की जो शक्ति है, उसका परिवर्तन, उसका उदात्तीकरण प्रेम में होता है। इसलिए अगर सेक्स से मुक्त होना है, तो सेक्स को दबाने से कुछ भी न होगा। उसे दबा कर कोई पागल हो सकता है। और दुनिया में जितने पागल हैं, उसमें से सौ में से नब्बे संख्या उन लोगों की है, जिन्होंने सेक्स की शक्ति को दबाने की कोशिश की है। और यह भी शायद आपको पता होगा कि सभ्यता जितनी विकसित होती है, उतने पागल बढ़ते जाते हैं, क्योंकि सभ्यता सबसे ज्यादा दमन सेक्स का करवाती है। सभ्यता सबसे ज्यादा दमन, सप्रेशन सेक्स का करवाती है! और इसलिए हर आदमी अपने सेक्स को दबाता है, सिकोड़ता है। वह दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है, अनेक बीमारियां पैदा करता है, अनेक मानसिक रोग पैदा करता है।
सेक्स को दबाने की जो भी चेष्टा है, वह पागलपन है। ढेर साधु पागल होते पाए जाते हैं। उसका कोई कारण नहीं है सिवाय इसके कि वे सेक्स को दबाने में लगे हुए हैं। और उनको पता नहीं है, सेक्स को दबाया नहीं जाता। प्रेम के द्वार खोलें, तो जो शक्ति सेक्स के मार्ग से बहती थी, वह प्रेम के प्रकाश में परिणत हो जाएगी। जो सेक्स की लपटें मालूम होती थीं, वे प्रेम का प्रकाश बन जाएंगी। प्रेम को विस्तीर्ण करें। प्रेम सेक्स का क्रिएटिव उपयोग है, उसका सृजनात्मक उपयोग है। जीवन को प्रेम से भरें।
आप कहेंगे, हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं, आप शायद ही प्रेम करते हों; आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। प्रेम करना और प्रेम चाहना, ये बड़ी अलग बातें हैं। हममें से अधिक लोग बच्चे ही रह कर मर जाते हैं। क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है। प्रेम करना बड़ी अदभुत बात है। प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है।
छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं, परिवार उनको प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए, तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं, तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है, वह दुख झेलता है। क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता, प्रेम केवल किया जाता है। चाहने में पक्का नहीं है, मिलेगा या नहीं मिलेगा। और जिससे तुम चाह रहे हो, वह भी तुमसे चाहेगा। तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे। दुनिया में जितना पति-पत्नियों का संघर्ष है, उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है।
इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आपकी आकांक्षा प्रेम चाहने की है हमेशा। चाहते हैं, कोई प्रेम करे। और जब कोई प्रेम करता है, तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है, वह दूसरा भी प्रेम करना केवल वैसे ही है जैसे कि कोई मछलियों को मारने वाला आटा फेंकता है। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है। वह आटा मछलियों को दे नहीं रहा है, वह मछलियों को चाहता है, इसलिए आटा फेंक रहा है। इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखायी पड़ते हैं, वे केवल प्रेम पाना चाहने के लिए आटा फेंक रहे हैं। थोड़ी देर वे आटा खिलाएंगे, फिर...।
और दूसरा व्यक्ति भी जो उनमें उत्सुक होगा, वह इसलिए उत्सुक होगा कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा। थोड़ी देर बाद पता चलेगा, वे दोनों भिखमंगे हैं और भूल में थे; एक-दूसरे को बादशाह समझ रहे थे! और थोड़ी देर बाद उनको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी।
दुनिया में दाम्पत्य जीवन नरक बना हुआ है, क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं, देना कोई भी जानता नहीं है। सारे झगड़े के पीछे बुनियादी कारण इतना ही है। और कितना ही परिवर्तन हो, किसी तरह के विवाह हों, किसी तरह की समाज व्यवस्था बने, जब तक जो मैं कह रहा हूं अगर नहीं होगा, तो दुनिया में स्त्री और पुरुषों के संबंध अच्छे नहीं हो सकते। उनके अच्छे होने का एक ही रास्ता है कि हम यह समझें कि प्रेम दिया जाता है, प्रेम मांगा नहीं जाता, सिर्फ दिया जाता है। जो मिलता है, वह प्रसाद है, वह उसका मूल्य नहीं है। प्रेम दिया जाता है। जो मिलता है, वह उसका प्रसाद है, वह उसका मूल्य नहीं है। नहीं मिलेगा, तो भी देने वाले का आनंद होगा कि उसने दिया।
अगर पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें, तो जीवन स्वर्ग बन सकता है। और जितना वे प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे, उतना ही--अदभुत जगत की व्यवस्था है--उन्हें प्रेम मिलेगा। और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे--जितना वे प्रेम देंगे, उतना ही सेक्स उनका विलीन होता चला जाएगा।
गांधी जी पीछे वहां लंका में थे। वे कस्तूरबा के साथ लंका गए। वहां जो व्यक्ति था, जिसने उनका परिचय दिया पहली सभा में, उसने समझा कि बा आयी हैं साथ, शायद ये गांधी जी की मां होंगी। बा से उसने समझा कि गांधी जी की मां भी साथ आयी हुई हैं। उसने परिचय में गांधी जी के कहा कि ‘यह बड़े सौभाग्य की बात है कि गांधी जी भी आए हैं और उनकी मां भी आयी हुई हैं।’
बा तो बहुत हैरान हो गयीं। गांधी जी के सेक्रेटरी जो साथ थे, वे भी बहुत घबड़ा गए कि भूल तो उनकी है, उनको बताना चाहिए था कि कौन साथ है। वे बड़े घबड़ा गए कि शायद बापू डांटेंगे। शायद कहेंगे कि ‘यह क्या भद्दी बात करवायी!’ लेकिन गांधी जी ने जो बात कही, वह बड़ी अदभुत थी। उन्होंने कहा कि ‘मेरे इन भाई ने मेरा जो परिचय दिया, उसमें भूल से एक सच्ची बात कह दी है। कुछ वर्षों से बा मेरी पत्नी नहीं है, मेरी मां हो गयी है।’ उन्होंने कहा, ‘कुछ वर्षों से बा मेरी पत्नी नहीं है, मेरी मां हो गयी है!’
सच्चा संन्यासी वह है, जिसकी एक दिन पत्नी मां हो जाए; पत्नी को छोड़ कर भाग जाने वाला नहीं। सच्चा संन्यासी वह है, जिसकी एक दिन पत्नी मां बन जाए। सच्ची संन्यासिनी वह है, जो एक दिन अपने पति को अपने पुत्र की तरह अनुभव कर पाए।
पुराने ऋषि सूत्रों में एक अदभुत बात कही गयी है। पुराना ऋषि कभी आशीर्वाद देता था कि ‘तुम्हारे दस पुत्र हों और ईश्वर करे, ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो जाए।’ बड़ी अदभुत बात थी। ये आशीर्वाद देते थे वधु को विवाह करते वक्त कि ‘तुम्हारे दस पुत्र हों और ईश्वर करे, तुम्हारा ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो जाए।’ यह अदभुत कौम थी और अदभुत विचार थे। और इसके पीछे बड़ा रहस्य था।
अगर पति और पत्नी में प्रेम बढ़ेगा, तो वे पति-पत्नी नहीं रह जाएंगे, उनके संबंध कुछ और हो जाएंगे। और उनसे सेक्स विलीन हो जाएगा और वे संबंध प्रेम के होंगे। जब तक सेक्स है, तब तक शोषण है। सेक्स शोषण है! और जिसको हम प्रेम करते हैं, उसका शोषण कैसे कर सकते हैं? सेक्स एक व्यक्ति का, एक जीवित व्यक्ति का अत्यंत गर्हित और निम्न उपयोग है। अगर हम उसे प्रेम कर सकते हैं, तो हम उसके साथ ऐसा उपयोग कैसे कर सकते हैं? एक जीवित व्यक्ति का हम ऐसा उपयोग कैसे कर सकते हैं अगर हम उसे प्रेम करते हैं? जितना प्रेम गहरा होगा, वह उपयोग विलीन हो जाएगा। और जितना प्रेम कम होगा, वह उपयोग उतना ज्यादा हो जाएगा।
इसलिए जिन्होंने यह पूछा है कि सेक्स एक सृजनात्मक शक्ति कैसे बने, उनको मैं यह कहूंगा कि सेक्स बड़ी अदभुत शक्ति है। शायद इस जमीन पर सेक्स से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। मनुष्य जिस चीज से क्रियमाण होता है, मनुष्य के जीवन का नब्बे प्रतिशत हिस्सा जिस चक्र पर घूमता है, वह सेक्स है; वह परमात्मा नहीं है। वे लोग तो बहुत कम हैं, जिनका जीवन परमात्मा की परिधि पर घूमता है। अधिकतर लोग सेक्स के केंद्र पर घूमते और जीवित रहते हैं।
सेक्स सबसे बड़ी शक्ति है। यानी अगर हम ठीक से समझें, तो मनुष्य के भीतर सेक्स के अतिरिक्त और शक्ति ही क्या है, जो उसे गतिमान करती है, परिचालित करती है। इस सेक्स की शक्ति को, इस सेक्स की शक्ति को ही प्रेम में परिवर्तित किया जा सकता है। और यही शक्ति परिवर्तित होकर परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग बन जाती है।
इसलिए यह स्मरणीय है कि धर्म का बहुत गहरा संबंध सेक्स से है। लेकिन सेक्स के दमन से नहीं--जैसा समझा जाता है--सेक्स के सब्लिमेशन से है। सेक्स के दमन से धर्म का संबंध नहीं है। ब्रह्मचर्य सेक्स का विरोध नहीं है, ब्रह्मचर्य सेक्स की शक्ति का उदात्तीकरण है। सेक्स की ही शक्ति ब्रह्म की शक्ति में परिवर्तित हो जाती है। वही शक्ति, जो नीचे की तरफ बहती थी, अधोगामी थी, ऊपर की तरफ गतिमान हो जाती है। सेक्स ऊर्ध्वगामी हो जाए, तो परमात्मा तक पहुंचाने वाला बन जाता है। और सेक्स अधोगामी हो, तो संसार में ले जाने का कारण होता है।
वह प्रेम से परिवर्तन होगा। प्रेम करना सीखें। और प्रेम करने का मतलब, अभी हम जब आगे भावनाओं के संबंध में बात करेंगे, तो आपको पूरी तरह समझ में आ सकेगा कि प्रेम करना कैसे सीखें। लेकिन इतना मैं अभी फिलहाल कहूं।
एक मित्र ने पूछा है कि
भगवान, संत या साधु मिल-जुल कर एक टीम के रूप में काम क्यों नहीं करते?
बहुत अच्छा पूछा है कि संत लोग, वे लोग जिन्हें सत्य उपलब्ध हुआ है, एक साथ मिल-जुल कर काम क्यों नहीं करते? मैं आपको कहूं कि संतों ने आज तक मिल-जुल कर ही काम किया है। और मैं आपको यह भी कहूं कि न केवल जीवित संतों ने मिल-जुल कर काम किया है, लेकिन पच्चीस सौ वर्ष पहले जो संत मर गए हैं, वे भी उनके साथ आज काम कर रहे हैं, जो जिंदा हैं। यानी न केवल समसामयिक रूप से कंटेंप्रेरी संत साथ काम करते हैं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से, ट्रेडीशनल रूप से संतों का काम एक साथ है।
मैं जो कह रहा हूं, अगर वह सच है, तो उसके पीछे बुद्ध और महावीर और कृष्ण और क्राइस्ट के हाथ हैं। अगर जो मैं कह रहा हूं, वह सच है, तो उनकी आवाज उसमें मिली-जुली है। और अगर मेरी आवाज में कोई ताकत मालूम होती है, तो वह मेरी अकेले की नहीं हो सकती; वह उन सारे लोगों की है, जिन्होंने कभी भी उन शब्दों को कहा होगा।
लेकिन जो संत नहीं हैं, वे जरूर कभी साथ मिल कर काम नहीं कर सकते। और ऐसे बहुत से संत हैं, जो संत नहीं हैं, लेकिन संत मालूम होते हैं। उस हालत में दुर्जन लोग मिल कर काम कर सकते हैं, लेकिन वैसे तथाकथित साधु मिल कर काम नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते हैं? उनका संतत्व अहंकार के विसर्जन से पैदा नहीं हुआ है, उनका संतत्व भी अहंकार की तृप्ति का एक माध्यम है। और जहां अहंकार है, वहां मिलन नहीं होता। और जहां अहंकार है, वहां कोई मिलन हो ही नहीं सकता। क्योंकि अहंकार हमेशा ऊपर होना चाहता है।
मैं एक जगह था। वहां बहुत से साधु आमंत्रित थे। एक बहुत बड़ा जलसा था। बहुत बड़े-बड़े साधु आमंत्रित थे। नाम उनके नहीं लूंगा, क्योंकि किसी को दुख हो। मुल्क के बहुत बड़े-बड़े लोग वहां थे। जिन्होंने आयोजन किया था, उनकी बड़ी आकांक्षा थी कि सारे लोग एक ही मंच पर बैठ कर बोलें। लेकिन वे ‘संत’ राजी नहीं हुए! क्योंकि उन्होंने कहा कि ‘कौन नीचे बैठेगा, कौन ऊपर बैठेगा?’ क्योंकि उन्होंने कहा कि ‘हम ऊपर बैठेंगे, नीचे नहीं बैठ सकते।’ उन्होंने कहा या कहलवाया। और कहने वाला तो फिर भी सरल होता है, कहलाने वाला और भी जटिल और कपटी होता है। उन्होंने कहलवाया कि वे कोई एक साथ नहीं बैठ सकते।
उनका मंच व्यर्थ गया। वहां एक-एक आदमी को बैठ कर बोलना पड़ा। बड़ा मंच बनाया था कि सौ लोग बैठ सकें। लेकिन सौ साधु एक साथ कैसे बैठ सकते हैं? उसमें कोई शंकराचार्य थे, जो कि बिना अपने सिंहासन के नीचे नहीं बैठ सकते। और अगर वे नीचे नहीं बैठ सकते हैं, तो उनके सिंहासन के बगल में दूसरे संत कैसे बैठ सकते हैं नीचे!
और तब बड़ी हैरानी होगी, जिनको अभी कुर्सियों में भी ऊंचाइयां और नीचाइयां हैं और जिन्हें अभी इसमें भी माप-तौल है कि कौन कितना ऊंचा बैठा है और कौन कितने नीचे बैठा है, इनके चित्त कहां बैठे होंगे, यह पता चल सकता है।
दो साधु इसलिए आपस में मिल नहीं सकते कि पहले कौन नमस्कार करेगा! क्योंकि पहले कौन हाथ जोड़ेगा? क्योंकि जो हाथ जोड़ेगा, वह नीचा हो जाएगा। हद आश्चर्य की बात है! हम मानते रहे हैं सदा से कि जो पहले हाथ जोड़ ले, वह ऊंचा है। लेकिन वे संत समझते हैं कि जो पहले हाथ जोड़ेगा, वह नीचा हो जाएगा!
मैं एक बड़े साधु के सत्संग में था। एक बहुत बड़े राजनीतिज्ञ भी वहां गए हुए थे। उन साधु को तो ऊपर तख्त पर बिठाया गया था, हम सारे लोग नीचे बैठे थे। सत्संग शुरू हुआ। उन राजनीतिज्ञ ने कहा कि ‘मैं सबसे पहले यह पूछूं कि हम नीचे बैठे हैं, आप ऊपर क्यों बैठे हैं? अगर आप भाषण भी कर रहे होते, तब भी ठीक था। यह तो सत्संग है। वार्ता होगी। और आप इतने ऊपर चढ़े हैं कि बातचीत मुश्किल ही होगी। आप कृपा करके नीचे आ जाएं।’ लेकिन वे साधु नीचे नहीं आ सके। और उस राजनीतिज्ञ ने पूछा, ‘अगर नीचे न आ सकते हों, कोई ऐसा कारण हो, तो हमें समझाएं कि ऊपर बैठने का कारण क्या है?’
वे खुद तो नहीं बोल सके, बहुत घबड़ा गए। उनके एक साधु ने उत्तर दिया कि ‘यह परंपरागत है कि वे ऊपर बैठें।’ उस राजनीतिज्ञ ने कहा कि ‘ये आपके गुरु होंगे। लेकिन हमारे गुरु नहीं हैं!’ उस राजनीतिज्ञ ने यह भी कहा, ‘हमने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया, आपने हाथ नहीं जोड़े, आपने हमको आशीर्वाद दिया। अगर समझ लीजिए, कोई दूसरा साधु मिलने आया होता और आप आशीर्वाद देते, तो झगड़ा हो जाता। आपको भी हाथ जोड़ने चाहिए।’ उत्तर मिला कि ‘वे हाथ नहीं जोड़ सकते हैं, क्योंकि यह परंपरागत नहीं है।’ वह बात इतनी खराब हो गयी कि वह गोष्ठी आगे चल ही नहीं सकती थी।
मैंने उन साधु को कहा कि ‘मुझे आज्ञा दें कि मैं इन राजनीतिज्ञ को थोड़ी सी बातें कहूं।’ उन्होंने मुझे आज्ञा दी। वे चाहे कि चलो यह निपटारा हुआ। बात आगे बढ़े। यहां से खत्म हो। मैंने उन राजनीतिज्ञ को कहा, ‘आपको सबसे पहले आकर यह क्यों दिखायी पड़ा कि वे ऊपर बैठे हुए हैं? सबसे पहले आपको यह कैसे दिखायी पड़ा कि वे ऊपर बैठे हुए हैं?’ और मैंने कहा कि ‘अब मैं कृपा करके यह पूछूं, आपको यह दिखायी पड़ा कि वे ऊपर बैठे हैं या आपको यह दिखायी पड़ा कि मैं नीचे बिठाया गया हूं? क्योंकि यह भी हो सकता था, आप भी ऊपर बिठाए गए होते, तो मैं नहीं समझता कि आपने यह प्रश्न पूछा होता। हम सारे लोग नीचे होते और आप भी उनके साथ ऊपर होते, तो मैं नहीं समझता कि यह प्रश्न आपने पूछा होता। इसलिए दिक्कत उनके ऊपर बैठने से नहीं है, दिक्कत आपके नीचे बैठने से है।’
उन राजनीतिज्ञ ने मेरी तरफ देखा। वे उन दिनों बड़ी हुकूमत में थे और हिंदुस्तान के अग्रणी लोगों में से थे। उन्होंने मेरी तरफ बड़े गौर से देखा और उन्होंने बड़ी सरलता जाहिर की। उन्होंने कहा कि ‘मैं स्वीकार करता हूं, मुझे यह कभी किसी ने कहा नहीं, मुझमें बहुत अहंकार है।’
साधु बहुत प्रसन्न हुए। और जब हम विदा होने लगे, साधु ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘आपने अच्छा मुंहतोड़ जवाब दिया।’ मैंने उनको कहा कि ‘वह जवाब उनके लिए नहीं था, वह आपके लिए भी था।’ और मैंने उनको कहा कि ‘मुझे दुख है, वह आदमी ज्यादा सरल साबित हुआ और आप उतने सरल भी साबित नहीं हुए। उसने स्वीकार किया कि मेरा अहंकार है, लेकिन आपने यह भी स्वीकार नहीं किया, उलटे आपने अपने अहंकार का पोषण कर लिया मेरे उत्तर से!’
ऐसे जो संत हैं, ऐसे जो साधु हैं, वे मिल कर काम नहीं कर सकते हैं। उनका तो सारा काम किसी की दुश्मनी में है। उनका तो सारा जोश किसी की दुश्मनी में है। अगर कोई दुश्मन न हो, तो वे कुछ कर ही नहीं सकते। उनकी तो सारी क्रिया किसी की घृणा और विरोध से निकल रही है। इतने जितने संप्रदाय हैं, इतने जितने धर्म हैं, इनके नामों से जो साधु खड़े हैं, उनको कोई नासमझ ही साधु कह सकता है। क्योंकि साधु का पहला लक्षण तो यह होगा कि वह किसी धर्म का नहीं रह जाएगा। साधु का पहला लक्षण तो यह होगा, उसकी कोई सीमा नहीं रह जाएगी, उसका कोई संप्रदाय नहीं होगा। उसका कोई घेरा नहीं होगा। वह सबका होगा। और उसका पहला लक्षण यह होगा, उसकी अहंता मिट गयी होगी, उसकी अस्मिता विलीन हो गयी होगी।
लेकिन ये सब तो अहंकार को बढ़ाने और पोषण करने के उपाय हैं। स्मरण रखिए, बहुत धन से भी अहंकार तृप्त होता है। बहुत त्याग मैंने किया है, इससे भी तृप्त होता है। बहुत ज्ञान मेरे पास है, इससे भी तृप्त होता है। मैंने सब लात मार दिया दुनिया पर, इससे भी तृप्त होता है। और इनकी जिनकी तृप्तियां हैं, वे कभी साथ नहीं हो सकते। अहंकार अकेला विभाजक तत्व है और निर-अहंकारिता अकेला जोड़ने वाला तत्व है। तो जहां निरहंकार है, वहां जोड़ है।
एक बार कबीर जहां रहते थे, उनके गांव के पास से एक मुसलमान फकीर था फरीद, उसका निकलना हुआ। उसके कुछ साथी और वह यात्रा पर निकले थे। उसके साथियों ने फरीद से कहा कि ‘बड़ा सुयोग है, रास्ते में कबीर का भी निवास पड़ता है। उनकी कुटी पर हम दो दिन रुकें। और आप दोनों की चर्चा होगी, तो हमें बहुत आनंद होगा। आप दोनों मिलेंगे और बातें करेंगे, तो हम सुन कर बहुत लाभान्वित होंगे।’ फरीद ने कहा, ‘जरूर रुकेंगे, मिलेंगे भी; लेकिन चर्चा शायद ही हो।’ उन्होंने कहा, ‘क्यों?’ फरीद ने कहा, ‘चलें रुकें। मिलेंगे भी, रुकेंगे भी; चर्चा शायद ही हो।’
कबीर के शिष्यों को पता चला, तो उन्होंने कहा कि ‘यहां से फरीद निकलने को हैं। हम उन्हें रोक लें। बहुत आनंद होगा। दो दिन आपकी बातें होंगी।’ कबीर ने कहा, ‘मिलेंगे जरूर। जरूर रोको, बहुत आनंद होगा।’
फरीद रोका गया। फरीद और कबीर गले मिले। वे दोनों खुशी में रोए। लेकिन दो दिन उनमें कोई बात नहीं हुई। वे दोनों विदा हो गए। शिष्य बहुत निराश हुए। जब वे दोनों विदा हो गए, दोनों के शिष्यों ने पूछा, ‘आप कुछ बोले नहीं!’ उन्होंने कहा, ‘हम क्या बोलते! जो वे जानते हैं, वही हम जानते हैं।’ फरीद ने कहा, ‘जो मैं जानता हूं, वही कबीर जानते हैं। हम बोलते क्या? और हम दो भी कहां हैं, जो हम बोलते। कोई तल है, जहां हम एक हैं।’
वहां बोलने तक का विरोध नहीं है संतों में--बोलने तक का! डायलाग भी संभव नहीं है। वह भी एक विरोध है। उस तल पर संतों का सनातन काम एक ही हो रहा है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है विरोध का। वे किसी हिस्से में पैदा हुए हों, किसी कौम में और किसी ढंग से रहे हों, उनमें कोई विरोध नहीं है। लेकिन जो संत नहीं हैं, स्वाभाविक है, उनमें विरोध हो। इसलिए स्मरण रखें, संतों में कोई विरोध नहीं है। और जिनमें विरोध हो, इसे कसौटी समझें कि वे संत नहीं होंगे।
एक और मित्र ने पूछा है कि
भगवान, आपका अंतिम ध्येय या लक्ष्यांत क्या है? मुझसे पूछा है कि मेरा क्या लक्ष्य है?
मेरा कोई लक्ष्य नहीं है। इसलिए कोई लक्ष्य नहीं है...। इसे थोड़ा समझना जरूरी है। जीवन में दो तरह की क्रियाएं होती हैं। एक क्रिया होती है, जो वासना से उदभूत होती है। एक क्रिया होती है, जो वासना से उदभूत होती है; उसमें लक्ष्य होता है। और एक क्रिया होती है, जो प्रेम से या करुणा से उदभूत होती है; उसमें कोई लक्ष्य नहीं होता। अगर किसी मां से कोई पूछे कि तुम अपने बच्चे को प्रेम करती हो, इसमें लक्ष्य क्या है? तो मां क्या कहेगी? मां कहेगी, लक्ष्य का कोई पता नहीं। बस हम प्रेम करते हैं और प्रेम करना आनंद है। यूं भी नहीं कि आज प्रेम करेंगे, तो कल आनंद मिलेगा। प्रेम किया, वह आनंद था।
तो एक तो क्रिया होती है, जो वासना से उदभूत होती है। मैं यहां बोल रहा हूं। मैं इसलिए बोल सकता हूं कि इस बोलने से मुझे कुछ मिलेगा। फिर चाहे वह मिलना रुपये के सिक्कों में हो, यश के सिक्कों में हो, आदर के सिक्कों में हो, प्रतिष्ठा के रूप में हो--वह मिलना किसी रूप में हो--मैं इस कारण से बोल सकता हूं कि मुझे कुछ मिलेगा। तो वह लक्ष्य होगा।
मैं केवल इस कारण से बोल सकता हूं कि मैं बिना बोले नहीं रह सकता, कुछ हुआ है भीतर और वह बंटने को उत्सुक है। मैं इसलिए बोल सकता हूं, जैसे कि फूल खिल जाते हैं और अपनी गंध फेंक देते हैं। उनसे कोई पूछे, लक्ष्य क्या है? कोई भी लक्ष्य नहीं है।
वासना से कुछ क्रियाएं उदभूत होती हैं, तब उनमें लक्ष्य होता है। करुणा से भी कुछ क्रियाएं उदभूत होती हैं, तब उनमें कोई लक्ष्य नहीं होता। और इसीलिए वासना से जो क्रियाएं उदभूत होती हैं, उनसे कर्म-बंध होता है। और करुणा से जो क्रियाएं उदभूत होती हैं, उनसे कर्म-बंध नहीं होता। जिस क्रिया में लक्ष्य होगा, उसमें बंध होगा; और जिस क्रिया में कोई लक्ष्य नहीं होगा, उसमें बंध नहीं होगा।
और यह जान कर आप हैरान होंगे, आप बुरा काम बिना लक्ष्य के नहीं कर सकते हैं। यह एक अदभुत बात है। पाप में हमेशा लक्ष्य होगा, पुण्य में कोई लक्ष्य नहीं होता है। और जिस पुण्य में भी लक्ष्य हो, वह पाप का ही रूप है। पाप में हमेशा लक्ष्य होता है, बिना लक्ष्य के कोई पाप नहीं कर सकता। लक्ष्य के रहते भी करने में मुश्किल पड़ती है, बिना लक्ष्य के तो कर ही नहीं सकता। मैं आपकी बिना लक्ष्य के हत्या नहीं कर सकता हूं। क्यों करूंगा? पाप बिना लक्ष्य का कभी नहीं हो सकता। क्योंकि पाप करुणा से कभी नहीं हो सकता। पाप हमेशा वासना से होगा। वासना में हमेशा लक्ष्य होगा; कुछ पाने की आकांक्षा होगी।
कुछ क्रियाएं हैं, जिनमें पाने की कोई आकांक्षा नहीं होती है। महावीर को कैवल्य उत्पन्न हुआ, उसके बाद वे चालीस-पैंतालीस वर्षों तक सक्रिय थे। पूछा जा सकता है, उतने दिनों उन्होंने क्रिया की, उसका बंध क्यों नहीं हुआ? उतने दिन तक वे काम तो कर ही रहे थे--भोजन भी करते थे, जाते भी थे, आते भी थे, बोलते भी थे, बताते भी थे--चालीस-पैंतालीस वर्षों तक निरंतर सक्रिय थे, तो उस क्रिया का उन पर फल क्यों नहीं हुआ? बुद्ध को निर्वाण उपलब्ध हुआ, उसके बाद वे भी चालीस वर्षों तक सक्रिय थे। उसका बंध क्यों नहीं हुआ? क्योंकि उस सक्रियता में कोई लक्ष्य नहीं था। लक्ष्य-शून्य क्रियाएं थीं वे और मात्र करुणा थीं।
मैं कई दफा सोचता हूं कि मैं आपसे क्यों बोल रहा हूं? इसमें क्या प्रयोजन हो सकता है? मुझे कोई प्रयोजन खोजे नहीं मिलता, सिवाय इसके कि मुझे कुछ दिखायी पड़ रहा है और यह एक मजबूरी है कि उसे बिना कहे नहीं रहा जा सकता है। क्योंकि उसे बिना कहे केवल वही रह सकता है, जिसमें हिंसा शेष रह गयी हो। वह हिंसा होगी।
मैंने सुबह आपको एक कहानी कही। अगर आपके हाथ में एक सांप को लिए हुए मैं देखूं और आपसे बिना कुछ कहे अपने रास्ते चला जाऊं कि मेरा लक्ष्य क्या है! तो यह तभी संभव है, जब मेरे भीतर अति हिंसा हो, अति क्रूरता हो। अन्यथा मैं कहूंगा कि ‘यह सांप है, इसे छोड़ दें।’ और कोई अगर मुझसे पूछे कि ‘आप क्यों कह रहे हैं कि यह सांप है, इसे छोड़ दें? आपका क्या लक्ष्य है?’ तो मैं कहूंगा, ‘कोई भी लक्ष्य नहीं है, सिवाय इसके कि मेरी अंतरात्मा को संभव नहीं है कि इस स्थिति में बिना कहे रह जाए।’ यानी उत्प्रेरणा बाहर नहीं है कि कोई लक्ष्य हो, प्रेरणा आंतरिक है, जिसका कोई लक्ष्य नहीं होता।
हैरान होंगे आप, जब भी लक्ष्य होता है, तो प्रेरणा कहीं बाहर होती है। और जब कोई लक्ष्य नहीं होता, तो प्रेरणा कहीं भीतर होती है। यानी कुछ चीजें होती हैं, जो हमें खींचती हैं, तब लक्ष्य होता है। और कुछ चीजें होती हैं, जो हमें भीतर से धकाती हैं, तब कोई लक्ष्य नहीं होता।
करुणा और प्रेम हमेशा लक्ष्य-शून्य हैं और वासना और इच्छा हमेशा लक्ष्यपूर्ण हैं। इसलिए ज्यादा ठीक होता है कहना कि वासना खींचती है, खींचती है बाहर से, जैसे मैं रस्सी बांध कर आपको खींचूं। यह खींचना है। वासना खींचती है, जैसे रस्सी की तरह कोई बांध ले और खींचे।
इसलिए वासना जिसके भीतर है, उसे हमारे ग्रंथ ‘पशु’ कहते हैं। पशु का अर्थ है, जो पाश से बंधा है; जो किसी चीज से बंधा है और खींचा जा रहा है। पशु का मतलब जानवर, एनीमल नहीं है। पशु का मतलब है, जो किसी पाश से बंधा है और खींचा जा रहा है।
तो जब तक हमें कोई लक्ष्य खींच रहा है कोई वासना का, तब तक हम पाश से बंधे हैं और पशु हैं और मुक्त नहीं हैं। मुक्ति जो है, पशु का विरोधी शब्द है। मोक्ष जो है, पशुता का विरोधी शब्द है। क्योंकि पशु का अर्थ है, बंधन में बंधे हुए खिंचे जाना। और मुक्त का अर्थ है, किसी बंधन से न खिंचना, अपने भीतर से गति को उत्पन्न कर लेना।
मुझे कोई लक्ष्य नहीं है। इसलिए अगर इसी वक्त मेरा प्राण निकल जाए, तो मुझे एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगेगा कि कोई काम अधूरा रह गया है। अगर इसी वक्त मर जाऊं यहीं बैठे-बैठे, तो एक क्षण को भी यह खयाल नहीं आएगा कि जो बात मैं कह रहा था, वह अधूरी रह गयी। क्योंकि कोई काम तो था ही नहीं उसमें; कुछ पूरा करने का कोई प्रश्न नहीं था। जब तक श्वास थी, वह काम पूरा हुआ। नहीं श्वास रही, तो वह काम वहीं रह गया। उसमें कोई प्रयोजन नहीं था, कुछ अधूरा नहीं रहा।
तो कोई लक्ष्य नहीं है, सिवाय इसके कि एक अंतःप्रेरणा है, एक आंतरिक मजबूरी है, एक आंतरिक विवशता है। और उससे जो कुछ होगा, वह होगा। ऐसी स्थिति को हम अपने मुल्क में यह कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति ने अपने को ईश्वर के हाथ में सौंप दिया। अब ईश्वर की जो मर्जी हो, उससे करा ले। उसका अपना कोई लक्ष्य नहीं है। यह कहने का ढंग भर है कि ईश्वर की मर्जी जो हो, उससे करा ले। इसका मतलब केवल इतना ही है कि उसका अपना कोई लक्ष्य नहीं रहा। उसने अनंत सत्ता के हाथ में अपने जीवन को छोड़ दिया है। अब जो होगा, वह होगा। वह अनंत सत्ता की जिम्मेवारी है, उसकी अपनी कोई जिम्मेवारी नहीं है।
यह जो आपने पूछा, यह अच्छा ही पूछा। इस माध्यम से मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि जीवन को वासना से करुणा में परिणत करें। एक ऐसा जीवन बनाएं, जिसमें लक्ष्य तो न रह जाए, एक अंतःप्रेरणा प्रविष्ट हो जाए। एक ऐसा जीवन बनाएं, जिसमें कुछ पाने की तो आकांक्षा न रह जाए, कुछ देने की आकांक्षा प्रबल हो जाए। जिसको मैंने प्रेम कहा--पाना नहीं, देना। और प्रेम में कोई लक्ष्य नहीं होता, सिवाय इसके कि हम देते हैं। जिसको मैंने प्रेम कहा, उसको ही मैंने दूसरे शब्दों में करुणा कहा। तो आप कह सकते हैं--कह सकते हैं कि कोई लक्ष्य नहीं है, सिवाय इसके कि प्रेम है। और प्रेम का कोई लक्ष्य नहीं होता, क्योंकि प्रेम स्वयं अपना लक्ष्य है।
एक अंतिम प्रश्न क्रोध के संबंध में है कि
भगवान, क्रोध आने पर मन में विपरीत परिणाम होता है और उसका पूरे शरीर पर प्रभाव पड़ता है। इस स्थिति में शरीर में किस ग्रंथि का निर्माण होता है?
सुबह मैंने बात की है। मैं आपको यह कहा हूं--क्रोध तो केवल एक उदाहरण के लिए लिया था--सारे भावावेग शक्तियां हैं। और अगर उन शक्तियों का कोई सृजनात्मक उपयोग न हो, तो वे शरीर के किसी अंग को, चित्त की किसी स्थिति को विकृत करके अपनी शक्ति को व्यय कर लेते हैं। शक्ति का व्यय होना जरूरी है। जो शक्ति बिना व्यय की हुई भीतर रह जाएगी, वह ग्रंथि बन जाएगी। ग्रंथि का मतलब, वह गांठ बन जाएगी, वह बीमारी बन जाएगी।
समझें। क्रोध की ही बात नहीं है। अगर मेरे भीतर प्रेम देना हो और मैं प्रेम न दे पाऊं किसी को, तो प्रेम गांठ बन जाएगा। अगर मेरे भीतर क्रोध हो और मैं क्रोध न कर पाऊं, तो क्रोध गांठ बन जाएगा। अगर मेरे भीतर भय पैदा हो और मैं भय प्रकट न कर पाऊं, तो भय गांठ बन जाएगा। सारे भावावेश भीतर एक शक्ति को उत्पन्न करते हैं। उस शक्ति का निष्कासन चाहिए।
निष्कासन दो तरह से हो सकता है। एक निगेटिव रास्ता है, एक नकारात्मक रास्ता है। जैसे एक आदमी को क्रोध आया, नकारात्मक रास्ता यह है कि वह गया और उसने पत्थर चलाए, लकड़ी मारी, गालियां बकीं। यह नकारात्मक इसलिए है कि इसकी शक्ति तो व्यय हुई, लेकिन फल इसे कुछ भी नहीं मिला। फल यह मिलेगा कि जिसको यह गाली देगा, वह दुगुनी वजन की गाली इसको लौटाएगा। जिसको यह पत्थर मारेगा, उसके भीतर भी क्रोध पैदा होगा। और वह भी सामान्य आदमी है, उसका भी नकारात्मक ढंग होगा क्रोध को प्रकट करने का। वह भी लकड़ी उठाएगा। अगर आपने किसी को पत्थर मारा है, तो वह बड़ा पत्थर आपको मारेगा।
क्रोध का नकारात्मक उपयोग और क्रोध को पैदा करेगा। शक्ति व्यय होगी। फिर से क्रोध पैदा होगा और नकारात्मक आदत फिर क्रोध करवाएगी। फिर शक्ति व्यय होगी, फिर विपरीत उत्तर में फिर क्रोध पैदा होगा। क्रोध की श्रृंखला अनंत होगी, उसमें केवल शक्ति ही व्यय होती जाएगी, परिणाम कुछ भी नहीं होगा।
क्रोध की श्रृंखला को तभी आप तोड़ सकते हैं, जब आप क्रोध का कोई सक्रिय उपयोग कर लें, कोई सृजनात्मक उपयोग कर लें। इसलिए महावीर ने कहा है, जो घृणा करता है, वह घृणा उत्तर में पाता है। जो क्रोध करता है, वह क्रोध को पैदा करता है। जो वैर करता है, वह वैर को जन्म देता है। और इस श्रृंखला का कोई अंत नहीं है। और इसमें केवल शक्ति ही व्यय हो सकती है। परिणाम क्या हो सकता है? समझ लें, मैं क्रोध करूं, आप उत्तर में मुझे क्रोध दें, मैं फिर पुनः क्रोध करूं, आप फिर उत्तर में मुझे क्रोध दें--परिणाम क्या होगा? हर क्रोध मुझे क्षीण करेगा और मेरी शक्ति को व्यय कर जाएगा। इस वजह से सभ्यता ने नियम बनाया है कि क्रोध मत करो। इस वजह से सभ्यता ने नियम बनाया कि किसी पर क्रोध जाहिर मत करो।
यह नियम तो अच्छा है। इससे क्रोध जाहिर तो नहीं होगा, श्रृंखला तो नहीं बनेगी, लेकिन वह शक्ति, मेरे भीतर वह शक्ति का वेग घूमेगा। वह कहां जाएगा? वह कहां जाएगा?
पशुओं की आंख आपने देखी है! खूंखार से खूंखार पशु की आंख आपसे ज्यादा निर्मल होती है। एक हिंसक पशु की आंख भी मनुष्य की आंख से ज्यादा निर्मल होती है। क्या बात है? वहां दमित वेग कुछ भी नहीं है। क्रोध आता है, तो उसे प्रकट करता है। चिल्लाता है, आवाज करता है, हमला करता है, निकाल देता है। वह सभ्य नहीं है। उसको जो होता है, निकाल देता है।
बच्चों की आंखों में जो निर्मलता होती है, उसका क्या कारण है? उनको जो होता है, उसे वे निकाल देते हैं। उनकी कोई ग्रंथियां पैदा नहीं होतीं। अगर उन्हें क्रोध आता है, तो क्रोध निकाल देते हैं। अगर ईर्ष्या होती है, तो ईर्ष्या निकाल देते हैं। अगर किसी बच्चे का खिलौना छीनना है, तो उसको छीन लेते हैं। दमन नहीं है बच्चे के जीवन में, इसलिए सरलता मालूम होती है। और आपके जीवन में दमन है, इसलिए जटिलता शुरू हो जाती है।
ग्रंथि का अर्थ है, कांप्लेक्सिटी। कुछ भीतर होता है, कुछ आप बाहर दिखाते हैं। वह जो शक्ति नहीं निकल पाती है, वह कहां जाएगी? वह ग्रंथि बन जाती है। ग्रंथि का मेरा मतलब है, वह गांठ की तरह आपके चित्त में या आपके शरीर में अवरुद्ध हो जाती है। जैसे नदी में कोई पानी का हिस्सा बर्फ के टुकड़े बन कर बहने लगे, तो जितने बड़े-बड़े टुकड़े होते जाएंगे, नदी की धार उतनी कुंठित होती जाएगी। अगर सब बर्फ हो जाए, तो नदी जम कर वहीं समाप्त हो जाएगी।
तो हम उन नदियों की तरह हैं, जिनके भीतर बड़े-बड़े बर्फ के टुकड़े बह रहे हैं। उनको पिघलाना जरूरी है। वह ग्रंथियों से मेरा मतलब है कि वे जो बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े हमारे जीवन में बह रहे हैं। हमारे घृणा के, हमारे क्रोध के, हमारे सेक्स के जो दमित वेग थे, उन्होंने हमारे भीतर बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े पैदा कर दिए हैं। अब वे हमारी धार को बहने नहीं देते हैं। कुछ की तो धारें ऐसी हैं कि सब बर्फ ही बर्फ हो गया है, वहां कोई धार ही नहीं है।
उसको पिघलाने की जरूरत है। और उसको पिघलाने के लिए मैंने कहा, सृजनात्मक उपयोग करना चाहिए। और सृजनात्मक उपयोग के लिए मैंने दो रास्ते बताए, एक तो पिछले वेग को कैसे विसर्जित करें और नये वेग का कैसे सृजनात्मक उपयोग करें।
अब ये देखिए आप, छोटे बच्चे हैं, उनमें बड़ा वेग होता है, बड़ी शक्ति होती है। अगर उनको आप घर में छोड़ते हैं, तो वे इस चीज को उठाते हैं, उसको पटकते हैं; यह चीज तोड़ते हैं, वह चीज फोड़ते हैं। आप उनको कहते हैं, यह मत करो, यह मत करो। आप उनसे यह तो कहते हैं कि यह मत करो, लेकिन आप यह कभी नहीं कहते कि फिर क्या करो। और आपको यह पता नहीं है कि जब एक बच्चा एक गिलास को उठा कर पटक रहा है, तो क्यों पटक रहा है! उसके भीतर शक्ति है और शक्ति निकास मांगती है। अब कुछ नहीं मिलता, तो एक गिलास को पटक रहा है। उस गिलास को पटकने से उसकी शक्ति निकसित होती है, निकलती है।
लेकिन आपने कहा, ‘गिलास मत तोड़ देना।’ और वह गिलास तोड़ने से रुक गया। वह बाहर गया, उसने फूल तोड़ना चाहा। आपने कहा, ‘देखो, फूल मत छू देना।’ वह फूल भी नहीं छू पाया। वह अंदर गया, उसने किताब उठायी। आप बोले, ‘देखो, किताब खराब मत कर देना।’ तो आपने उसे यह तो बताया कि क्या मत करना, आपने यह उसे नहीं बताया कि अब क्या करो। यह बच्चे में ग्रंथियां शुरू हो गयीं, कांप्लेक्सेस पैदा होने शुरू हो गए। अब इसमें गांठें पड़ती चली जाएंगी। यह एक दिन गांठ ही गांठ रह जाएगा। इसके भीतर यह न करो, वह न करो, यह सब रहेगा। क्या करो, इसे कुछ समझ में नहीं आएगा।
मेरा कहना यह है सृजनात्मक उपयोग का कि इसे यह बताओ कि क्या करो। अगर यह गिलास उठा कर पटक रहा है, तो इसका मतलब है कि इसके पास शक्ति है और कुछ करना चाहता है। आपने कह दिया, यह मत करो। इससे बेहतर था, आप इसे मिट्टी देते और कहते, एक गिलास बनाओ। इसी गिलास की तरह एक गिलास बनाओ। तो यह सृजनात्मक उपयोग होता। मेरी आप बात समझे? यह फूल तोड़ने गया था। इसे आप कागज पकड़ा देते और कहते कि इसी तरह का फूल बनाओ, तो यह सृजनात्मक उपयोग होता। यह किताब फाड़ रहा था या किताब उठाया था, इसे आपको कुछ देना चाहिए था कि उस शक्ति का उपयोग करता।
अभी शिक्षा बिलकुल ही असृजनात्मक है, क्रिएटिव नहीं है, इसलिए बच्चों का जीवन बचपन से खराब हो जाता है। और हम सब बिगड़े हुए बच्चे हैं। हम सब बिगड़े हुए बच्चे हैं। हम बड़े हो गए हैं, बस इतनी भूल है। बाकी हम बिगड़े हुए बच्चे हैं, जिनका बचपन से सब बिगड़ा हुआ है। और फिर हम जीवन भर वही बिगड़ा हुआ सब करते चले जाते हैं।
तो मैंने जो कहा, क्रिएटिविटी, सृजनात्मकता, उससे मेरा मतलब यह है कि जब भी शक्ति का उदय हो, उसका कोई सृजनात्मक उपयोग करिए, जिससे कुछ बन जाए, कुछ निर्मित हो जाए। कुछ विनष्ट न हो।
अब एक आदमी जो निरंतर निंदा करता है किसी की, हो सकता था, वह कोई गीत लिखता। और आप जानते हैं, जो गीत नहीं लिख पाते, कविता नहीं लिख पाते, वे आलोचक हो जाते हैं। वह वही शक्ति है। वे जो क्रिटिक्स हैं, वे जो आलोचक हैं; वह वही शक्ति है, जो गीत लिख सकती थी, कविता बना सकती थी। लेकिन उन्होंने उसका सृजनात्मक उपयोग नहीं किया। वे केवल यह कर रहे हैं कि वे दूसरों की आलोचना कर रहे हैं कि कौन गलत लिख रहा है, कौन क्या कर रहा है!
यह विनाशात्मक उपयोग है। दुनिया बहुत बेहतर दुनिया हो जाए, अगर हम अपनी शक्तियों का सृजनात्मक उपयोग करें, और हर शक्ति का। और शक्ति बुरी और भली नहीं होती, स्मरण रखिए। क्रोध की शक्ति भी बुरी और भली नहीं है। उसके उपयोग की बात है। आप यह मत सोचिए कि क्रोध की शक्ति बुरी है। शक्ति कोई बुरी-भली नहीं होती।
अब एटामिक एनर्जी है; न बुरी है, न भली है। उससे विनाश हो सकता है सारे जगत का, उससे सारे जगत का निर्माण हो सकता है। सब शक्तियां न्यूट्रल होती हैं। कोई शक्ति बुरी और भली नहीं होती। विनाशात्मक उपयोग हो, तो बुरी हो जाती है; और सृजनात्मक उपयोग हो, तो भली हो जाती है।
अपने क्रोध को, अपने काम को, अपने सेक्स को, अपनी घृणा को, सबको बदलिए और सृजनात्मक उपयोग करिए। जैसे कोई खाद को लाता है, तो उसमें गंध और बास उठती है, दुर्गंध उठती है। उस खाद को माली बगीचे में डालता है, पानी सींचता है और बीज डालता है। फिर उन बीजों से होकर वही खाद पौधा बन जाती है। और उन पौधों की नसों में से पार होकर वही खाद की गंदगी फूलों की सुगंध बन जाती है। वही गंदगी, वही खाद, जो दुर्गंध फेंकती थी, फूल में आकर सुगंध फेंकती है। यह ट्रांसफार्मेशन आफ एनर्जी है। यह शक्ति का उदात्तीकरण है।
जो-जो आपमें दुर्गंध दे रहा है, वही-वही आपमें सुगंध देने का कारण बन सकता है--वही। क्योंकि जो दुर्गंध देता है, केवल वही सुगंध दे सकता है। इसलिए कभी बुरा मत मानिए कि आप क्रोधी हैं। यह शक्ति है और आपका सौभाग्य है। और कभी बुरा मत मानिए कि आप सेक्सुअल हैं कि आप कामुक हैं। यह शक्ति है और आपका सौभाग्य है। दुर्भाग्य यह होता कि आप सेक्सुअल न होते। दुर्भाग्य यह होता कि आपमें क्रोध ही न होता, तो आप इम्पोटेंट होते; तो आप पुंसत्वहीन होते, तो आप किसी मतलब के न होते। क्योंकि आपमें कोई शक्ति न होती, जिससे कुछ किया जा सके। तो शक्ति के लिए सौभाग्य मानिए। और आपके भीतर जो भी शक्तियां हों, सबका धन्यवाद मानिए, क्योंकि वे शक्तियां हैं। अब यह आपके हाथ में है कि आप उनका क्या उपयोग करते हैं!
दुनिया के जितने महापुरुष हुए हैं, सब एक्सट्रीम सेक्सुअलिस्ट थे। जितने दुनिया के महापुरुष हुए हैं, सब अति कामुक थे। यह असंभव है, अगर न रहे हों। अगर अति कामुक न होते, महापुरुष नहीं हो सकते थे।
गांधी जी को आप जानते हैं, अति कामुक थे। और जिस दिन उनके पिता की मृत्यु हुई, डाक्टरों ने कह दिया कि पिता मरने को हैं, वे उस रात भी अपने पिता के पास नहीं बैठ सके। जब उनके पिता मरे, तो वे अपनी पत्नी के पास सोए हुए थे। और डाक्टर कहे कि पिता मरने को हैं और उस रात भी वे पिता के पास नहीं बैठ सके। वे मरने को थे रात में, यह जाहिर ही था। गांधी जी को बहुत धक्का लगा इस बात से कि मैं कैसा आदमी हूं! मैं आदमी कैसा हूं!
लेकिन धन्यभाग था उनका कि वे इतने कामुक थे। वही कामुकता उनका ब्रह्मचर्य बन गयी--वही कामुकता। अगर वे उस रात पिता के पास बैठे रहते, तो पक्का मानिए, गांधी पैदा नहीं होता दुनिया में। हममें से अधिक बैठे ही रहते। रात क्या, दो रात बैठे रहते, पर गांधी पैदा नहीं होता। वह जो उस दिन दुर्गंध मालूम हुई होगी उनके चित्त्ा को, वही बाद में उनके जीवन की सारी सुगंध बन गयी।
तो किसी शक्ति का अनादर मत करिए। अपने भीतर उठी किसी भी शक्ति का अनादर मत करिए। सौभाग्य मानिए और उसको परिवर्तित करने में लगिए। हर शक्ति बदल जाती है और हर शक्ति समपरिवर्तित हो जाती है। और जो आपमें बुरा दिखता है, वही सुगंध में और फूलों में परिणत हो जाता है।
ये थोड़े से प्रश्नों की मैंने चर्चा की। दो-चार छूट गए हैं, उनको कल विचार कर लेंगे।