Edited By National Desk, Updated: 30 Jul, 2026 07:02 PM
नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। ओशो धाम में भी इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पर्व ध्यान, संगीत, गहरे मौन और कलात्मक अभिव्यक्ति के अद्भुत संगम के साथ मनाया गया। देश-विदेश से आए साधकों, ध्यानकर्ताओं और ओशो संन्यासी ने जागृत गुरुओं की शाश्वत विरासत को नमन किया। ओशो की अनूठी दृष्टि पर आधारित यह आयोजन केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान न रहकर, आंतरिक रूपांतरण और सामूहिक उत्सव का एक जीवंत माध्यम बन गया। इस मौके पर गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वामी चैतन्य कीर्ति ने कहा, "गुरु पूर्णिमा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के बीच होने वाले आंतरिक रूपांतरण का उत्सव है। ओशो ने शिष्य की आंतरिक यात्रा को तीन सरल चरणों में समझाया है-पहला, शांत मन से सुनना; दूसरा, उस सुनने को हृदय की गहराइयों में उतरने देना; और तीसरा, उसे अपने जीवन के जीवंत अनुभव में ढालना। यह उत्सव इसी दर्शन का एक साक्षात प्रतिबिंब है।"
कीर्तन से शुरुआत, कुंडलिनी ध्यान पर समापन
उत्सव की शुरुआत बेहद भावपूर्ण और मधुर लाइव कीर्तन के साथ हुई, जिसने पूरे परिसर को ध्यानमय ऊर्जा से भर दिया। इसके बाद सामूहिक भोज का आयोजन हुआ, जिसमें सभी ने आत्मीयता के साथ सहभागिता की। दिनभर चले इस उत्सव का समापन ओशो के अमृत प्रवचन और सामूहिक कुंडलिनी ध्यान के साथ हुआ, जिसने साधकों को मौन और आत्म-जागरूकता के गहरे अनुभव में डुबो दिया।
'ध्यान से उपजी' कला प्रदर्शनी का उद्घाटन
इस उत्सव का मुख्य आकर्षण मा आनंद भक्ति की मौलिक कला प्रदर्शनी का उद्घाटन रहा। इसका शुभारंभ ओशो की वरिष्ठ संन्यासिनी मा धर्म ज्योति और वरिष्ठ संन्यासी स्वामी चैतन्य कीर्ति ने किया। प्रदर्शनी में 18 मौलिक कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। इसमें सूक्ष्म मंडल (मंडला आर्ट) और अमूर्त (Abstract) चित्रों को शामिल किया गया है। ये कलाकृतियाँ किसी पूर्व योजना या सोच का परिणाम नहीं हैं, बल्कि गहरे ध्यान और समर्पण की अवस्था में सहज रूप से कैनवास पर उभरी हैं। प्रदर्शनी में रखे गए 'मंडल' जहाँ शांति, धैर्य और आंतरिक संतुलन के प्रतीक हैं, वहीं उनके अमूर्त चित्र सहजता, स्वतंत्रता और अंतर्ज्ञान को दर्शाते हैं। उत्सव में आए दर्शकों और साधकों ने इन चित्रों को वहाँ बने ध्यानमय वातावरण का ही एक सुंदर विस्तार बताया।