Vyast Jeevan Mein Ishwar ki Khoj
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विज्ञान, धर्म और कला के अंतर-संबंध को समझाते हुए ओशो कहते हैं: ‘ये तीन बातें मैंने कहीं। विज्ञान प्रथम चरण है। वह तर्क का पहला कदम है। तर्क जब हार जाता है तो धर्म दूसरा…
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विज्ञान, धर्म और कला के अंतर-संबंध को समझाते हुए ओशो कहते हैं: ‘ये तीन बातें मैंने कहीं। विज्ञान प्रथम चरण है। वह तर्क का पहला कदम है। तर्क जब हार जाता है तो धर्म दूसरा चरण है, वह अनुभूति है।

अनुक्रम

#1: व्यस्त जीवन में ईश्वर की खोज
#2: असंग-भाव की साधना
#3: आनंद का सृजन
#4: साक्षी हो जाना ध्यान है
#5: धर्म, सम्राट बनाने की कला है
#6: संन्यास: परम मु‍क्त जीवन

उद्धरण:
जीवन जितना दिखाई पड़ता है, उतना ही नहीं है; बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं पड़ता। सच तो यह है कि जो दिखाई पड़ता है, वह उसके समक्ष कुछ भी नहीं है जो दिखाई नहीं पड़ता है। एक वृक्ष को हम देखें। आकाश में फैली हुई शाखाएं दिखाई पड़ती हैं, हवाओं में नाचते हुए पत्ते दिखाई पड़ते हैं, सूरज की किरणों में मुस्कुराते हुए फूल दिखाई पड़ते हैं। लेकिन वे जड़ें नहीं दिखाई पड़ती हैं जिनके बिना यह वृक्ष बिलकुल नहीं हो सकेगा। वे जड़ें पृथ्वी के नीचे छिपी हुई हैं। और अगर कोई उन जड़ों को भूल जाए, तो वृक्ष के प्राण उसी क्षण क्षीण होने शुरू हो जाएंगे। जो दिखाई पड़ता है वृक्ष, वह उस वृक्ष के ऊपर निर्भर है जो जमीन के नीचे छिपा है और दिखाई नहीं पड़ता है। मनुष्य का जीवन भी जो दिखाई पड़ता है वह आकाश में फैले हुए पत्तों की तरह है, लेकिन जो नहीं दिखाई पड़ता परमात्मा, वह जड़ की तरह भीतर छिपा हुआ है। लेकिन उस परमात्मा से अगर हमारे संबंध छूटने शुरू हो जाएं, तो हमारे जीवन के पत्ते, फूल, शाखाएं सब कुम्हलानी शुरू हो जाती हैं। जड़ दिखाई नहीं पड़ती है। परमात्मा भी दिखाई नहीं पड़ता है। जहां से जीवन फूटता है और विकसित होता है वही दिखाई नहीं पड़ता है। शायद उसका छिपा होना भी जरूरी है। जितना महत्वपूर्ण काम है, वह छिप कर ही संभव हो पाता है। वह अंधेरे में, मौन में, शांति में, एकांत में संभव हो पाता है। जड़ों को हम सूरज की रोशनी में निकाल लें, फिर वे काम करना बंद कर देंगी। वे छिप कर काम करती हैं। ऐसे ही परमात्मा भी जीवन के सारे प्रकट के भीतर अप्रकट होकर काम करता है। लेकिन जो है वह हमें दिखाई पड़ता है आंखों से और जो नहीं दिखाई पड़ता है, हम सोचते हैं वह नहीं है। हम बहुत ज्यादा पार्थिव ढंग से सोचते हैं। अगर एक फूल के पास एक कवि को ले जाएं, एक प्रेमी को ले जाएं, एक चित्रकार को ले जाएं, तो उसे फूल में बहुत कुछ दिखाई पड़ता है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ता। और अगर वह फूल के सौंदर्य की बातें करे, तो हम कहेंगे: कहां है सौंदर्य? रंग है, आकार है, फूल में कुछ खनिज हैं, कुछ केमिकल्स हैं, कुछ पदार्थ है–सौंदर्य कहां है? शायद फूल को प्रेम करने वाला सौंदर्य को निकाल कर अलग दिखा भी नहीं सकता। शायद वह कुछ भी नहीं कह सकता, हार जाएगा। ऐसे ही, कुछ जीवन में जो महत्वपूर्ण है, वह भी उनको ही दिखाई पड़ता है जो देखने के लिए एक रिसेप्टिविटी, एक ग्राहकता अपने भीतर पैदा कर लेते हैं, अन्यथा दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन हमें तो अपने ही भीतर जो है वही दिखाई नहीं पड़ता। हम बाहर भटकते हुए लोग हैं, हमारी आंखें बाहर-बाहर घूमती हैं और जीवन समाप्त हो जाता है। और जो भीतर था उससे हमारी कोई पहचान भी नहीं हो पाती है। —ओशो