Udio Pankh Pasar
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श्रद्धा के पंख पृथ्वी को हमने नरक ही तो बना लिया है, नरक से बदतर बना लिया है। और सब इस पूरी विकृति का कारण--सुबह हो गई और हम जागते नहीं। ‘भोर भये परभात, अबहिं तुम करो पयानी।’ अब वक्त आ गया कि तुम चल पड़ो। उठो, यात्रा करो! कौन सी यात्रा? अंतर्यात्रा! मनुष्य होने की यात्रा। अभी तुम मनुष्य केवल नाममात्र को हो। बीज-मात्र हो मनुष्य के। इसे वृक्ष बनाना है। वसंत आ गया और तुम बीज की तरह ही पड़े रहोगे? फूटोगे नहीं? अंकुरित नहीं होओगे? पल्लवित नहीं होओगे? फिर फूल कैसे लगेंगे? फिर गंध कैसे आकाश में उड़ेगी? ओशो
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  #1: श्रद्धा के पंख

  #2: क्रांति का आह्वान

  #3: संन्यास : जीवन का महारास

  #4: तुम बहते जाना भाई

  #5: सत्य की अग्नि-परिक्षा

  #6: श्रद्धा यानी अंतर्यात्रा

  #7: व्यक्ति होना धर्म है

  #8: विद्रोह और ध्यान

  #9: सत्य का नियंत्रण

  #10: कोई ताजा हवा चली है अभी