Tao Upanishad, Vol.2
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लाओत्से ने चुंगी की कीमत चुकाने के लिए अपने देश को जो खज़ाना दिया उसका नाम ‍है ‘ताओ तेह किंग’, जिसका प्रारंभ कुछ ऐसे होता है : ‘सत्य कहा नहीं जा सकता और जो कहा जा सकता है वह सत्य नहीं है।’ उसी सत्य को ‘जनाने’ का प्रयास है ताओ उपनिषद। इस उपनिषद पर ओशो के 127 प्रवचन हैं। प्रारंभ में ओशो कहते हैं : ‘जो भी सत्य को कहने चलेगा, उसे पहले ही कदम पर जो बड़ी से बड़ी कठिनाई खड़ी हो जाती है वह यह कि शब्द में डालते ही सत्य असत्य हो जाता है।’ ताओ का अर्थ है—पथ, मार्ग। और लाओत्सु कहते हैं कि ‘जिस पथ पर विचरण किया जा सके वह सनातन और अविकारी पथ नहीं है।’ इस पथ पर जलवत होना, स्त्रैण-चित्त होना, घाटी-सदृश होना—127 प्रवचनों की यह प्रवचन शृंखला एक ही बात की ओर इंगित करती है कि अस्तित्व के साथ लड़ने में नहीं, उसके साथ बहने में ही हमारा कल्याण है। अत: जलालुद्दीन रूमी के हमसफर हंसों की भांति ओशो हमें नि:शब्द शब्दों के जरिए आकाश के राजमार्ग की उड़ान दे देते हैं जहां पीछे कोई पगचिन्ह नहीं, बस वही अंतहीन पथ है, वही गंतव्य है।
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#23: सफलता के खतरे, अहंकार की पीडा और स्वर्ग का द्वार
#24: शरीर व आत्मा की एकता, ताओ की प्राण-साधना व अविकारी स्थिति
#25: उद्देश्य-मुक्त जीवन, आमंत्रण भरा भाव व नमनीय मेधा
#26: ताओ की अनुपस्थित उपस्थिति
#27: अनस्तित्व और खालीपन है आधार सबका
#28: ऐंद्रिक भूख की नहीं—नाभी केंद्र की आध्यात्मिक भूख की फिक्र
#29: ताओ की साधना—योग के संदर्भ में
#30: एक ही सिक्के के दो पहलू: सम्मान व अपमान, लोभ व भय
#31: अहंकार-शून्य व्यक्ति ही शासक होने योग्य
#32: अदृश्य, अश्राव्य व अस्पर्शनीय ताओ
#33: अक्षय व निराकार, सनातन व शून्यता की प्रतिमूर्ति
#34: संत की पहचान: सजग व अनिर्णीत, अहंशून्य व लीलामय
#35: विश्रांति से समता व मध्य मार्ग से मुक्ति
#36: तटस्थ प्रतीक्षा, अस्मिता-विसर्जन व अनेकता में एकता
#37: निष्क्रियता, नियति व शाश्वत नियम में वापसी
#38: ताओ का द्वार—सहिष्णुता व निष्पक्षता
#39: श्रेष्ठ शासक कौन?—जो परमात्मा जैसा हो
#40: ताओ के पतन पर सिद्धांतों का जन्म
#41: सिद्धांत व आचरण में नहीं, सरल-सहज स्वभाव में जीना
#42: आध्यात्मिक वासना का त्याग व सरल-सहज स्व का उदघाटन
#43: धर्म है—स्वयं जैसा हो जाना

जीवन एक गणित नहीं है; गणित से ज्यादा एक पहेली है। और न ही जीवन एक तर्क-व्यवस्था है; तर्क-व्यवस्था से ज्यादा एक रहस्य है। गणित का मार्ग सीधा-साफ है। पहेली सीधी-साफ नहीं होती। और सीधी-साफ हो, तो पहेली नहीं हो पाती। और तर्क की निष्पत्तियां बीज में ही छिपी रहती हैं। तर्क किसी नई चीज को कभी उपलब्ध नहीं होता। रहस्य सदा ही अपने पार चला जाता है। लाओत्से इन सूत्रों में जीवन के इस रहस्य की विवेचना कर रहा है। इसे हम दो तरह से समझें। एक तो हम कल्पना करें कि एक व्यक्ति एक सीधी रेखा पर ही चलता चला जाए, तो अपनी जगह कभी वापस नहीं लौटेगा। जिस जगह से यात्रा शुरू होगी, वहां कभी वापस नहीं आएगा, अगर रेखा उसकी यात्रा की सीधी है। लेकिन अगर वर्तुलाकार है, तो वह जहां से चला है, वहीं वापस लौट आएगा। अगर हम यात्रा सीधी कर रहे हैं, तो हम जिस जगह से चले हैं, वहां हम कभी भी नहीं आएंगे। लेकिन अगर यात्रा का पथ वर्तुल है, सरकुलर है, तो हम जहां से चले हैं, वहीं वापस लौट आएंगे। तर्क मानता है कि जीवन सीधी रेखा की भांति है। और रहस्य मानता है कि जीवन वर्तुलाकार है, सरकुलर है। इसलिए पश्चिम, जहां कि तर्क ने मनुष्य की चेतना को गहरे से गहरा प्रभावित किया है, जीवन को वर्तुल के आकार में नहीं देखता। और पूरब, जहां जीवन के रहस्य को समझने की कोशिश की गई है–चाहे लाओत्से, चाहे कृष्ण, चाहे बुद्ध–वहां हमने जीवन को एक वर्तुल में देखा है। वर्तुल का अर्थ है कि हम जहां से चलेंगे, वहीं वापस पहुंच जाएंगे। इसलिए संसार को हमने एक चक्र कहा है, दि व्हील। संसार का अर्थ ही चक्र होता है। यहां कोई भी चीज सीधी नहीं चलती, चाहे मौसम हों, चाहे आदमी का जीवन हो। जहां से बच्चा यात्रा शुरू करता है जीवन की, वहीं जीवन का अंत होता है। बच्चा पैदा होता है, तो पहला जीवन का जो चरण है, वह है श्वास। बच्चा श्वास लेता पैदा नहीं होता, पैदा होने के बाद श्वास लेता है। कोई आदमी श्वास लेता हुआ नहीं मरता, श्वास छोड़ कर मरता है।