QUESTION & ANSWER

Sumiran Mera Hari Kare 11

Eleventh Discourse from the series of 11 discourses - Sumiran Mera Hari Kare by Osho. These discourses were given during MAY 21-31 1980, Pune.
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पहला प्रश्न:
भगवान, दुख क्या है? उसका बल क्या है कि कुछ बुद्धों को बाद देकर वह सबको धर दबाता है?
सहजानंद! दुख है आत्म-मूर्च्छा; अपने प्रति बेहोशी; स्वयं को न जानना। आनंद है स्वयं को जानना; आत्म-परिचय। जैसे प्रकाश जले तो अंधकार अपने से तिरोहित हो जाता है, वैसे ही आत्म-ज्ञान की ज्योति जले तो दुख विसर्जित हो जाता है।
इसलिए बुद्धों को छोड़ कर और सभी को दुख सताएगा--कभी कम, कभी ज्यादा। जिसे तुम सुख कहते हो, वह भी दुख की ही न्यून मात्रा है। तुमने सुख कभी जाना ही नहीं है। जब दुख कम होता है तो तुम उसे सुख कहते हो। जब दुख अतिशय हो जाता है, सहने के बाहर, असह्य--तब तुम उसे दुख कहते हो। तुम्हारे सुख और दुख में कोई गुणात्मक भेद नहीं है, सिर्फ मात्रा का भेद है, परिमाण का भेद है।
जिन्होंने सुख जाना है, उनके लिए दुख बचता ही नहीं--बच सकता ही नहीं! और फिर ऐसा नहीं है कि तुम्हें कभी-कभी दुख धर दबाता है। दुख तुम्हारी छाती पर ही सवार है। पुराना दुख होता है तो तुम उसके आदी हो जाते हो। पुरानी चोट होती है तो तुम धीरे-धीरे उसे भूल जाते हो, तुम उसे अंगीकार कर लेते हो, आत्मसात कर लेते हो। नई चोट होती है तो तिलमिलाती है।
दुख जब पहली बार घटता है, कोई दुख, तो तुम्हें झकझोरता है। फिर घटता ही रहे, घटता ही रहे, तो कब तक झकझोरेगा? तुम उससे न केवल परिचित हो जाते हो, बल्कि तुम्हारी उससे मैत्री भी हो जाती है। किसी दिन छोड़ कर चला जाए तो तुम दुखी होओगे।
मेरे एक मित्र रेलवे-स्टेशन पर काम करते थे। रेलवे-स्टेशन पर सोना मुश्किल है: दिन भर ट्रेनों का आना और जाना और यात्रियों का उतरना और खोंमचे वालों का शोरगुल और कुलियों की आवाजें...। मगर वे इतने आदी हो गए तीस साल की नौकरी में कि घर पर उन्हें नींद नहीं आती थी, नींद आती स्टेशन पर थी। छुट्टी के दिन भी सोने के लिए स्टेशन ही जाते थे। मैंने उनसे पूछा: पागल हो तुम?
उन्होंने कहा: पागल नहीं हूं। जब तक यह शोरगुल न मचे, तब तक ठीक वातावरण मेरी नींद का बनता नहीं है।
ऐसी घटना अमरीका में शिकागो नगर में घटी। शिकागो नगर से वर्षों से एक ट्रेन सुबह पांच बजे गुजरती थी, बीच नगर से। फिर रेलवे के अधिकारियों ने सोचा कि पांच बजे लोगों की नींद खराब होती होगी। यद्यपि कोई शिकायत न आई थी, लेकिन खुद ही सोच कर कि इस महानगरी में से पांच बजे ट्रेन को गुजारना, नाहक इतने लोगों की नींद खराब करना है। तो उन्होंने समय में रद्दोबदल कर दी। जो ट्रेन पांच बजे गुजरती थी, वह सात बजे गुजरने लगी। पहले दिन जब वह सात बजे गुजरी, तब शिकागो में बहुत से लोग पांच बजे चौंक कर जग गए। वे आदी हो गए थे पांच बजे उस ट्रेन के गुजरने के। और दूसरे दिन कई फोन आए कि ट्रेन का क्या हुआ? वह जो ट्रेन पांच बजे गुजरती थी, गुजरी नहीं! आखिर ट्रेन का हुआ क्या? हमारी नींद में बड़ी खलल पड़ी।
आदमी दुख से भी समायोजित हो जाता है। दुख को भी फिर छोड़ नहीं सकता। इसलिए तुम कहते हो कि हमें दुख से मुक्त होना है, मगर वस्तुतः तुम अगर विचार करोगे तो तुम दुख से मुक्त होना नहीं चाहते। होना चाहो तो दुख तुम्हें नहीं पकड़े हुए है, तुम दुख को पकड़े हुए हो। अभी मुक्त हो सकते हो, इसी क्षण! दुख की क्या सामर्थ्य है? लेकिन बस तुम बातें करते हो दुख से मुक्त होने की। बातचीत करनी अच्छी लगती है। लेकिन तुम अपने घावों से भी लगाव बना लेते हो।
बैस्तिले में, फ्रांस में क्रांति हुई, तो बैस्तिले का किला तोड़ दिया क्रांतिकारियों ने। वह किला फ्रांस के सबसे ज्यादा जघन्य अपराधियों को बंद रखता था--ऐसे अपराधियों को, जो या तो आजीवन सजा पाए थे, या जिन्हें फांसी की सजा होनी थी। बस दो ही तरह के कैदी वहां होते थे। इसलिए उन कैदियों को जो जंजीरें पहनाई जाती थीं, उनके खोलने का कोई उपाय नहीं होता था। उनमें ताले नहीं होते थे, चाबी नहीं होती थी। वे खुलेंगी ही नहीं। आदमी मरेगा, तभी जंजीरें हाथ तोड़ कर निकाल ली जाएंगी, पैर तोड़ कर बेड़ियां निकाल ली जाएंगी, या फांसी लगेगी। जीते-जी तो जंजीरों और बेड़ियों का टूटना होने वाला नहीं था। इसलिए ताले-चाबी की कौन झंझट में पड़े!
क्रांतिकारियों ने सोचा कि बैस्तिले को पहले मुक्त कर दें। उन्होंने जाकर किले का द्वार तोड़ दिया, कैदियों को मुक्त किया। कोई पांच हजार कैदी वहां बंद थे। पहले तो कैदियों ने इनकार किया कि हमें मुक्त होना नहीं है। हम जैसे हैं, भले हैं। हम जैसे हैं, मजे में हैं। हमें बाहर जाना नहीं। हम बाहर जाकर करेंगे क्या? यहां सब सुख-सुविधा है, उन्होंने कहा। सोने को जगह है। ठीक वक्त पर खाने को मिलता है। ठीक समय पर सोने को मिलता है। बीमार हों तो चिकित्सा मिलती है। और आदमी को चाहिए क्या? हमारे मित्र यहां हैं, हमारे प्रियजन यहां हैं। बाहर तो सब अजनबी हैं।
अब कोई आदमी बीस साल से बंद था, कोई तीस साल से बंद था। ऐसे भी व्यक्ति थे वहां जो चालीस साल और पचास साल से बंद थे। उन्होंने कहा: पचास साल के बाद हम कहां कमाएंगे? हम तो भूल ही भाल गए कमाना। अब हम कहां खोजेंगे अपने परिवार के लोगों को? वे भी हमें क्या पहचानेंगे? हम जाना नहीं चाहते। हमें क्षमा करो।
मगर क्रांतिकारी तो जिद्दी होते हैं। वे तो माने ही नहीं, उन्होंने तो जबर्दस्ती उनकी बेड़ियां और हथकड़ियां तुड़वा दीं और उनको धक्के दे कर मुक्त कर दिया। दुनिया में किसी को धक्के देकर मुक्त किया नहीं जा सकता। मुक्ति थोपी नहीं जा सकती। थोपी गई मुक्ति, मुक्ति नहीं होगी, वह नये तरह का बंधन होगा। और चकित तो क्रांतिकारी तब हुए जब सांझ होते-होते कैदी वापस लौटने लगे। उन्होंने कहा: दिन भर के भूखे हैं, कोई भोजन देता नहीं।
रात हुई तो और कैदी वापस लौटे। उन्होंने कहा: हमें नींद नहीं आती बाहर, हमें हमारी अंधेरी कोठरी की शांति चाहिए। बाहर बहुत शोरगुल है।
कुछ ने तो यह भी कहा कि जब तक हमारी जंजीरें और बेड़ियां वापस न दोगे, हम सो ही न सकेंगे। हम उनके आदी हो गए हैं। जब तक उतना वजन हमारे हाथ-पैर में न हो, हम नंगे-नंगे मालूम होते हैं, उखड़े-उखड़े मालूम होते हैं। जैसे जड़ें खो गई हों किसी वृक्ष की।
यह एक अपूर्व अनुभव था। यह बड़ा मनोवैज्ञानिक अनुभव था कि आदमी अपनी बेड़ियों को भी छोड़ने को राजी नहीं होगा। इसलिए अक्सर जो व्यक्ति एक बार कारागृह चला जाता है, वह फिर बार-बार जाता है। यह पूरी की पूरी दंड की व्यवस्था अमनोवैज्ञानिक है। सोचा तो यही जाता है, न्यायवेत्ता यही सोचते हैं कि जिनको हम दंड दे रहे हैं, उनको हम अपराधों से रोक लेंगे। वे गलती में हैं। उन्हें मनोविज्ञान का कोई बोध नहीं है। उन्हें मनुष्य की अंतर्व्यवस्था का भी कोई अंदाज नहीं है। उन्हें मनुष्य के जीवन के संबंध में कोई सूझ-बूझ नहीं है। वे सिर्फ अंधी लकीरें पीट रहे हैं।
जो आदमी एक दफा जेल चला गया, सारे कारागृहों का इतिहास यह बताता है कि वह आदमी फिर वापस लौटेगा, बार-बार वापस लौटेगा। वह कारागृह का आदी हो जाता है। उसे फिर बाहर अच्छा नहीं लगता। उसके मित्र वहां, उसके संबंध वहां, उसकी सारी दुनिया वहां। वह बाहर करे तो क्या करे!
यह न्याय की पूरी व्यवस्था मूढ़तापूर्ण है। ऐसे आदमी नहीं बदले जाते। यूं आदमी बिगाड़े जाते हैं। यूं पहले अपराधी को हम सदा के लिए अपराधी बना देते हैं। अपराधी को कारागृह में डालने की जरूरत नहीं है; उसे मनोचिकित्सा की जरूरत है। वह विक्षिप्त है। उसके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो हम बीमार के साथ करते हैं। उसका इलाज होना चाहिए। इलाज नहीं, उसको हम दंड देते हैं। दंड से क्या संबंध है? दंड से किसी को बोध आया है? वह दंड का ही आदी हो जाता है। वह दंड में ही मजा लेने लगता है।
कारागृह में कैदी एक-दूसरे से इस बात का भी अहंकारपूर्वक दावा करते हैं कि मैंने कितनी सजा काटी, तुमने कितनी काटी? तुम अभी सिक्खड़ हो, तुम्हारी हैसियत ही क्या?
कारागृह में भी दादा होते हैं! कोई तीस दफा जेल आया है; उसके सामने तुम्हारी क्या हैसियत, दो ही दफा आए जेल!
एक कारागृह में एक आदमी प्रविष्ट हुआ। जो कोठरी में आदमी पहले से बंद था, अपना कंबल ओढ़े लेटा हुआ था दोपहरी में, इस नये आगंतुक से उसने पूछा कि भाई, कितने दिन रहोगे? इसने कहा कि दस साल की सजा हुई है। तो उसने कहा कि दरवाजे पर ही बिस्तर लगाओ, क्योंकि तुम्हें जल्दी निकलना पड़ेगा। हमें बीस साल यहां रहना है! तुम दरवाजे पर ही अपना बिस्तर लगाओ। ज्यादा भीतर घुसने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी हैसियत क्या है? अरे दस साल! हमें बीस साल यहां रहना है। और यह कोई पहला मौका नहीं है हमारा।
अनुभवी होते हैं वहां भी।
संसार में इतना दुख है, इसका निन्यानबे प्रतिशत कारण तो यही है कि तुम दुख को पकड़ते हो, तुम छोड़ नहीं सकते। तुम छोड़ दो तो तुम्हें खालीपन लगेगा। तुम रिक्त हो जाओगे। तुम घबड़ाओगे, जैसे अधर में लटक गए। त्रिशंकु हो जाओगे। कांटे तो कांटे सही, मगर कुछ तो हाथों में चाहिए ही। खाली हाथ से तो कचरे से भरे हाथ को भी हम पसंद करेंगे। खाली होने से आदमी सर्वाधिक डरता है। कुछ भी हो, कंकड़-पत्थर ही हों, मगर कुछ भी हो! एक तरह का भराव हो।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जो लोग अपने जीवन में अर्थहीनता अनुभव करते हैं, वे ज्यादा भोजन करने लगते हैं। भोजन से ही भरने लगते हैं। कुछ नहीं तो भोजन से ही भरो! एक सीमा के बाद भोजन जहर हो जाता है। जब तुम्हारी जरूरत से ज्यादा तुम भोजन करोगे तो वह जहर है। वही तुम्हें मारेगा। और जो मारे वह जहर। मगर लोग भोजन से भरते चले जाते हैं। खालीपन से घबड़ाहट लगती है।
लोग घर में क्या-क्या लक्कड़-पत्थर इकट्ठे करते रहते हैं। कुछ भी! चोर-बाजार में चले जाएंगे, वहां से कुछ भी व्यर्थ की चीजें खरीद लाएंगे। घर को भरे रखेंगे। खाली घर काटता है। खाली घर में डर लगता है। तो भर रखो। बाहर घर भरा है तो यूं भ्रांति पैदा होती है कि भीतर भी हम भरे हैं। फिर किस चीज से भरा है, इसकी क्या फिकर! हीरे-जवाहरात तो सभी को मिलते नहीं, कंकड़-पत्थरों से ही भर लेते हैं।
तुमने अपने को दुख से भरा हुआ है।
सहजानंद, तुम पूछते हो: ‘दुख क्या है?’
दुख है आत्म-अज्ञान। तुम्हें इस बात का पता नहीं कि तुम्हारे भीतर कौन विराजमान है। इसलिए तुम्हें एक भ्रांति है कि तुम भीतर खाली हो। भीतर खाली हो, इसलिए किसी भी चीज से भरो। और तुम जिससे भी अपने को भरोगे, वह व्यर्थ ही है। वह दुख ही है। जिस दिन तुम अपने भीतर की ज्योति को जानोगे, किसी चीज से भरने की कोई जरूरत नहीं है।
एक सम्राट बूढ़ा हुआ। उसके तीन बेटे थे। उसे तय करना था किसको राज्य दे। तीनों साथ-साथ पैदा हुए थे, जुड़वां थे। तीनों समान योग्य थे, समान सुंदर थे, समान शिक्षित थे। एक ही उम्र के थे। नहीं तो कोई रास्ता निकाल लेता: जो बड़ा होता, उसे राज्य दे देता, जो ज्यादा बुद्धिमान होता, ज्यादा बलशाली होता...। मगर तीनों साथ-साथ पैदा हुए थे। तीनों एक जैसे थे, हर हालत में एक जैसे थे, पहचानना तक मुश्किल होता था कि कौन कौन है। उसने एक सूफी फकीर को पूछा कि मैं क्या करूं? पुराना कोई नियम काम नहीं आता। किसको राज्य दे दूं?
फकीर ने कहा: तुम एक काम करो। सबको समान राशि धन दे दो और कहना...उन सबके अपने-अपने महल हैं...कि इतने धन से तुम अपने महल को भर कर बताओ। मगर महल भरा हुआ होना चाहिए। और फलां दिन मैं देखने आऊंगा। जिसका महल सर्वाधिक भर गया होगा, जो अपने महल को पूरा भर देगा, वही मेरे साम्राज्य का मालिक होगा।
पहले लड़के ने सोचा: किस चीज से महल को भरना है? सोना-चांदी इतने से धन में आ नहीं सकता। और सोना-चांदी के बिना भरने का क्या मतलब है! मगर भरना तो पड़ेगा ही, किसी न किसी चीज से भरना होगा। कोई न कोई उपाय करना होगा। क्या करूं, क्या न करूं?
सस्ती चीजें, जो भी मिल सकता था, कूड़ा-करकट, वह खरीद लाया। घर को भर दिया। मगर कूड़ा-करकट! सम्राट देखने आया। ऐसी दुर्गंध उठ रही थी घर में से कि वह तो घबड़ा कर बाहर निकल आया। उसने कहा: यह भी कोई भरना हुआ? सूफी फकीर भी साथ आया था, उसने कहा कि यह तुम्हारा बेटा ठीक संसारी बेटा है। यही तो संसार भर के लोग कर रहे हैं। खाली जगह है, खाली जगह काटती है।
तुमने देखा न, एकाध दांत तुम्हारा गिर जाए तो दिन भर जीभ वहीं-वहीं जाती है। यूं कभी न गई थी। दांत जब था, कभी न गई थी। दांत क्या गिर गया है, वहीं-वहीं जाती है। जीभ पगला जाती है बिलकुल। वह खाली जगह एकदम चुभने लगती है।
जो तुम्हारे पास होता है, उसकी तुम्हें याद ही नहीं आती; जो खो जाता है, फिर याद आती है।
फकीर ने कहा: यह बेटा तुम्हारा सांसारिक है। यूं नाराज न होओ, यही तो दुनिया भर के लोगों ने किया है। इसलिए हर आदमी की जिंदगी में दुर्गंध उठ रही है।
वे दूसरे बेटे के द्वार पर पहुंचे। उसने क्षमा मांगी। उसने कहा कि मैंने भरने की तो कोशिश की, मगर इतने से धन से कैसे भरूं! लाया--सोना-चांदी लाया हूं; मगर वे तो एक कोने में भी नहीं भर पाए; एक कोने को भी नहीं भर पाया। हार गया। बहुत सोचा, मगर कोई रास्ता पाया नहीं। इसलिए मकान खाली है। थोड़ा-सा भरा है ।
फकीर से पूछा बादशाह ने: क्या करना?
फकीर ने कहा: यह बेटा पहले बेटे से तो ज्यादा होशियार है, लेकिन बहुत होशियार नहीं है। अभी तीसरे को हम और देख लें, फिर तय करेंगे।
तीसरे ने कुछ अदभुत ही काम किया था। जैसे ही उसके घर के पास पहुंचे, चकित हो गए। दूर से ही उसके घर से ऐसी सुगंध उठ रही थी! उसने घर को फूलों से सजाया था, धूप जलाई थी और घर में दीयों से रोशनी की थी। दीपमालिका बनाई थी। घर खाली था। फूलों के बंदनवार थे, धूप जल रही थी, दीये जले थे। मगर घर तो खाली था। सम्राट भीतर गया। उसने कहा कि घर भरा नहीं है, इस लड़के ने शर्त पूरी नहीं की।
फकीर ने कहा: जल्दी न करो। यह लड़का सच में बुद्धिमान है। जरा गौर से देखो। सम्राट ने फिर गौर से देखा। मकान खाली था। उसने कहा: मकान खाली है!
फकीर ने कहा कि तुम भी असल में सांसारिक आदमी हो। तुम इस बेटे को न समझ पाओगे। यह देखो, इसने घर को रोशनी से भर दिया है! रोशनी एक-एक कोने में पहुंच गई है। घी के दीये जलाए हैं। मगर तुम्हारी आंखें अंधी हैं। रोशनी से घर भरा है और तुम इसे खाली कहते हो। और फूलों की गंध से घर भरा है और तुम इसे खाली कहते हो! और धूप की सुवास से घर भरा है और तुम इसे खाली कहते हो!
और उसने एक बांसुरीवादक को भी बुलाया था, जो बगीचे में बैठ कर बांसुरी बजा रहा था। उसके बांसुरी के स्वर महल में गूंज रहे थे। और उस फकीर ने कहा: और देखो! बांसुरी के स्वरों से घर भरा है। इस लड़के ने चार तरह से शर्त पूरी की है, एक तरह से भी नहीं! रोशनी से घर भर दिया, उतना ही काफी था। फूलों की गंध से घर भर दिया, वह भी काफी था। धूप की सुगंध और धुएं से घर भर दिया, वह भी काफी था। फिर बांसुरी के स्वरों से घर भर दिया, संगीत से घर भर दिया, उत्सव से घर भर दिया--वह भी काफी था। तुमने तो एक ही चीज से चाहा था घर भरना; इसने चार-चार तरह से घर भर दिया। एक घर! और चमत्कार कर दिया है, जैसे चार घर हों। इसने चार घर भर दिए हैं, एक घर में! इसने चारों आयाम भर दिए। यही बेटा सम्राट होने के योग्य है। मगर यह सांसारिक नहीं है। इसके पास अंतर्दृष्टि है पार की, दूर की, परलोक की।
तुम्हारे जीवन में दुख है, उसका कारण यह है कि तुमने अपने भीतर का दीया नहीं खोजा। वहां जल रहा है दीया, कभी बुझा नहीं। बुझ जाए तो तुम जी ही नहीं सकते। तुम्हारा जीवन ही तो वह दीया है। वहां बज रही है बांसुरी, एक क्षण को बंद नहीं होती। वही तो अनाहत नाद है। उसी नाद की तो संतों ने चर्चा की है। वहां प्रतिपल सुवास उठ रही है, धूप जल रही है। उसी धूप के प्रतीक के अर्थों में तो मंदिरों में धूप जलाते हैं। मजारों पर धूप जलाते हैं। वह बाहर की धूप, भीतर की धूप के लिए सिर्फ प्रतीक है। और वहां भीतर सुगंध ही सुगंध है फूलों की। सहस्रदल कमल खिले हैं! हजारों पंखुड़ियों वाले कमल खिले हैं! तुम्हारी चेतना की झील में चमत्कारी फूल खिले हैं! मगर तुम वहां देखो तब न! वहां तुम देखते नहीं। वहां तुम पीठ किए हो। नजरें तुम्हारी बाहर अटकी हैं।
और स्वभावतः तुम बाहर देखोगे तो अंधेरे में जीओगे--अंधेरे में जीना दुख है। तुम बाहर देखोगे तो खाली अनुभव करोगे--खाली होना दुख है। तुम बाहर रहोगे तो अर्थहीन पाओगे--अर्थहीनता दुख है। फिर इस अर्थहीनता को, खालीपन को, इस रिक्तता को किसी तरह भरोगे--धन से, पद से, प्रतिष्ठा से। मगर कभी भर न पाओगे। इस तरह भरोगे तो तुम्हारे जीवन में दुर्गंध उठेगी। इसलिए राजनीतिज्ञों के जीवन में जैसी दुर्गंध उठती है, कम ही लोगों के जीवन में उठती है, क्योंकि पद की दौड़ अत्यंत निम्न दौड़ है। वह अहंकार की दौड़ है। धन के पागलों के जीवन में जैसी गंदगी हो जाती है, वैसी गंदगी और किसी के जीवन में नहीं होती। क्योंकि धन की दौड़ विक्षिप्तता है।
लेकिन जो अपने भीतर उतरेगा, उसके जीवन में एक नये लोक के द्वार खुलते हैं। नये रहस्य के द्वार खुलते हैं। वहां फिर रोशनी है। और वहां ऐसा भराव है कि फिर और कुछ मांग नहीं रह जाती। जहां मांग गई वहां दुख गया।
तुम पूछते हो सहजानंद: ‘दुख क्या है?’
चाह दुख है। मांग दुख है। वासना दुख है। तृष्णा दुख है। और जिस दिन तुम अपने को जानोगे, सब तृष्णा गिर जाएगी, सब चाह गिर जाएगी। क्योंकि मालिकों का मालिक वहां विराजमान है, सम्राटों का सम्राट वहां विराजमान है! तुम्हारे भीतर इस जगत की सबसे बड़ी संपदा है--प्रभु का राज्य है!
इसलिए सिर्फ बुद्धों पर दुख हमला नहीं कर पाता। कारण? बस एक ही है, छोटा सा कारण है, सीधा-साफ कारण है: वे अपने भीतर के आनंद से परिचित हो गए हैं। अब कैसे दुख उन पर हमला करे?
तुमने कभी अंधेरे को दीये पर हमला करते देखा? चाहो भी तो भी नहीं उपाय जुटा सकते। अंधेरे को कितना ही समझाओ कि कर दे हमला, लग छू, कितना ही समझाओ-बुझाओ, रिश्वत दो, अंधेरे से कहो कि देख मालपुआ खिलाएंगे, रबड़ी पिलाएंगे, सदा तेरी सेवा करेंगे, एक दफा कर दे हमला इस दीये पर, जरा सा तो दीया है, दे-दे पछाड़, कर दे इसको चारों खाने चित्त! मगर अंधेरा कुछ नहीं कर सकता। अंधेरा तो दीये से दूर ही दूर रहेगा। न तो तुम अंधेरे को दीये पर हमला करने के लिए राजी कर सकते हो, न अंधेरे में सामर्थ्य है कोई।
अंधेरे की कोई सत्ता ही नहीं है। ऐसे ही दुख की भी कोई सत्ता नहीं है।
बुद्ध का अर्थ होता है: जो जाग गया; जो अपने भीतर होश से भर गया; जो आत्मवान हुआ; जो ध्यानस्थ हुआ; जिसने समाधि को चखा, अनुभव किया; जिसने पहचान लिया कि मेरे भीतर परमात्मा है। बस फिर बात समाप्त हो गई। सब दुख समाप्त हो गए। फिर कभी कोई हमला नहीं होगा। फिर दुबारा संसार में आगमन नहीं होगा। तुम्हारी पकड़ ही छूट जाएगी।
तृष्णा ही तुम्हें लाती है संसार में। जब तृष्णा ही न होगी, आने का कोई कारण न रह जाएगा। तुम विराट में लीन हो जाओगे। उस लीनता को हमने मोक्ष कहा है, निर्वाण कहा है।

दूसरा प्रश्न:
भगवान, मुझे कभी कविता करनी नहीं आई, मगर आपके मिल जाने से पगला गया हूं शायद। लगा कि जिसकी तलाश थी वह मिल गया है। जो फिजा का रंग बदल सके, मुझे उस हवा की तलाश थी। जो लहू में बिजलियां भर सके, मुझे उस दवा की तलाश थी।। वो जो डाकुओं के थे हमसफर, वही कारवां के हैं रहनुमा। जिसे दिल मिला हो कबीर का, उसी रहनुमा की तलाश थी।। वो शजर न जिनमें हैं पत्तियां, जहां उल्लुओं की हैं बस्तियां। जो जड़ों से इनको उखाड़ दे, मुझे उस हवा की तलाश थी।। मेरी आंख जिसको थी ढूंढती, कभी साहिलों पे मिला नहीं। मुझे फिर भंवर में जो ले चले, उसी नाखुदा की तलाश थी।। जो रहे जमीं से परे-परे, उसे आसमां पर ही छोड़ दे। जो जमीं पे हो, जो जमीं का हो, मुझे उस खुदा की तलाश थी।। अभी आसमां की फिकर न कर, अभी आसमां का जिक्र न कर, जो जमीं की जुल्फें संवार दे, उसी बासफा की तलाश थी।। जो फिजा का रंग बदल सके, मुझे उस हवा की तलाश थी। जो लहू में बिजलियां भर सके, मुझे उस दवा की तलाश थी।।
प्रेम विक्रम! इस सत्संग में बैठो और कविता न उठे, यह असंभव है। इस सत्संग में बैठो और तुम्हारे भीतर घूंघर न बजने लगें, यह असंभव है। हां, इस सत्संग में सिर्फ शरीर की तरह बैठे रहो और आत्मा की तरह कहीं और, तो तुम यहां बैठे ही नहीं, तो तुम यहां आए ही नहीं। जो यहां आ गया, जो सच में आ गया, जिसका मुझसे तालमेल बैठा, उसके भीतर गीतों पर गीत जन्मेंगे। जन्मने ही चाहिए। और पहले-पहले ऐसा ही लगेगा कि जैसे पागल हो गया हूं। तुम्हें ही लगता है, ऐसा नहीं; खुद मोहम्मद को ऐसा लगा था।
जब पहली दफा मोहम्मद के भीतर कुरान जगी तो मोहम्मद को भी ऐसा ही लगा था कि कहीं मैं पागल तो नहीं हो गया हूं। वे वचन मोहम्मद के बड़े प्रीतिकर हैं, जो उन्होंने घर आकर अपनी पत्नी को कहे थे। पहाड़ पर थे, जब पहली दफा उनको ध्यान की अवस्था में कुरान की आयतें उतरनी शुरू हुईं। घबड़ा गए। बेपढ़े-लिखे आदमी थे। काला अक्षर भैंस बराबर था उनको। और ऐसे अदभुत गीत उतरने लगे, जाहिर था कि ये उनके तो नहीं हैं। अस्तित्व उनके भीतर से जैसे बोल रहा है। ये बोल उनके अपने तो नहीं हैं। ये कहीं और से आ रहे हैं। ये किसी और लोक से अवतरित हो रहे हैं। यह रोशनी उनकी अपनी तो नहीं है। उनके पास तो यह रोशनी कभी भी न थी। न ये शब्द थे, न ये गीत थे, न कभी गाया था, न शब्दों के वे धनी थे। यह हुआ क्या है!
वे घबड़ा गए। उन्हें लगा कि कहीं मैं पागल तो नहीं हो गया हूं? वे भागे हुए घर आए, बिस्तर पर लेट गए और पत्नी से कहा कि मेरे ऊपर जितने घर में कंबल-रजाइयां हों सब डाल दो, मुझे बड़ी ठंड लग रही है। और वे जरूर कंप रहे थे, जैसे कि कोई तेज बुखार चढ़ा हो। पत्नी ने सब उनके ऊपर रजाइयां डाल दीं। मगर कंपन है कि छूटे ही न। दांत किटकिटा रहे थे! पत्नी ने पूछा कि अचानक, घर से ठीक-ठाक गए थे, हुआ क्या? बात क्या है?
मोहम्मद ने कहा: तुझसे कैसे छिपाऊं! तुझे कह दूं तो शायद मन हलका हो। कुछ अजीब हो रहा है। अदभुत गीत मेरे भीतर उतर रहे हैं। या तो मैं पागल हो गया हूं या कवि हो गया हूं।
और जब उन्होंने पहली आयतें अपनी पत्नी को सुनाईं...उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी भी थी, उनसे उम्र में बड़ी भी थी, चौदह साल बड़ी थी। अनुभवी भी थी, सुसंस्कृत भी थी। उसने कहा: तुम भय छोड़ो। परमात्मा ने तुम्हें चुना। तुम उसके वाहन बने। तुम्हारे भीतर पैगाम आया है। तुम्हें इलहाम हुआ है। यह कोई सन्निपात नहीं है। फेंको यह कंबल, हटाओ ये दुलाइयां! तुम्हें कोई बुखार नहीं। तुम पगला नहीं गए हो। तुम्हारे भीतर तुम्हारे हृदय की वीणा को परमात्मा ने छेड़ दिया है। मैं स्पष्ट देख रही हूं। ये वचन तुम्हारे नहीं हैं और पागल ऐसे वचन नहीं बोल सकते हैं। महाकाव्य तुम्हारे भीतर पैदा हो रहा है।
कुरान के वचन अदभुत हैं। उनकी तरन्नुम! उन्हें जो गा सके तो उनकी चोट बड़ी गहरी है। उन्हें कोई गुनगुना सके प्राणों से, हृदय से, तो उसकी वीणा भी झंकृत हो जाए।
नहीं; यह बात किसी और शास्त्र की है। और शास्त्र तो शास्त्रीय हैं, लेकिन कुरान अनूठा है। और अनूठेपन का कारण है, क्योंकि मोहम्मद पढ़े-लिखे नहीं थे, नहीं तो कुछ न कुछ अपना ज्ञान कचरा उसमें मिला देते। मिलाने को उनके पास कुछ था ही नहीं। कोरे आदमी थे, सीधे-साफ आदमी थे। पंडित होते तो बात कभी सीधी-सादी बह नहीं सकती थी। उसमें व्याख्या जुड़ जाती। लेकिन अपनी तो कोई बात थी ही नहीं उनके पास। जैसे कोई कोरा कागज होता है, ऐसे आदमी थे। इसलिए जो परमात्मा ने लिखना चाहा, वही लिखा गया है। जो परमात्मा बोलना चाहा, वही बोला गया है। और इसलिए आयतें...कोई महीने में दो महीने में पूरा कुरान नहीं लिखा गया, वर्षों लगे। कभी एक आयत उतरी, कभी दस आयतें उतरीं। जब जितनी उतरीं, उतरीं। खयाल रखना शब्द--‘उतरना।’ जितनी अवतरित हुईं, उतनी अवतरित हुईं। फिर कभी महीनों के लिए सब खो जाता। लोग पूछते भी मोहम्मद से: बहुत दिन से कोई आयत नहीं कही?
वे कहते: क्या करूं? बहुत दिन से उसने नहीं कही। वह कहे तो मैं बोल दूं। वह कहेगा तो बोल दूंगा।
इसलिए कुरान बड़े लंबे समय में उतरी। कुरान गीता जैसी नहीं है कि कुछ थोड़े से समय में कृष्ण ने पूरी गीता कह डाली। कुरान को वर्षों लग गए उतरते-उतरते। इसलिए कुरान में तारतम्य नहीं है, एक व्यवस्था नहीं है। कुरान बिलकुल अव्यवस्थित है। उसमें कोई श्रृंखला नहीं है। कोई फूल आज खिला, कोई कल खिला, कोई महीनों बाद खिला, कोई वर्षों बाद खिला--तारतम्य हो तो कैसे हो; एक अराजकता है कुरान में। मगर उस अराजकता में एक सौंदर्य है। आदमी का हाथ नहीं है उसमें, बिलकुल हाथ नहीं है!
तुम कहते हो प्रेम विक्रम कि ‘मुझे कभी कविता करनी नहीं आई, मगर आपके मिल जाने से मैं पगला गया हूं शायद।’
शुभ हुआ। काव्य जन्मेगा।
मेरा संन्यास कोई त्यागवादी संन्यास नहीं है, कोई जीवन से पलायन नहीं है। मैं तो ईश्वर की एक ही परिभाषा मानता हूं: रसो वै सः। परमात्मा रस है, रस-रूप है। और जब रस तुम्हारे भीतर झरेगा, जब रस तुम्हारे भीतर लहरें लेगा, तो गीत उठेंगे, नाच उठेगा।
शुभ हुआ है। रोकना मत। दुनिया शायद पागल ही कहे, चिंता न लेना। मेरे तुम्हारे लिए आशीर्वाद हैं। और जरूरी नहीं है कि कविता शब्दों का ही रूप ले। जीवन बन सकती है कविता। तुम्हारा उठना-बैठना कविता हो सकती है। तुम्हारा चलना, तुम्हारा व्यवहार महाकाव्य हो सकता है। कविता कितने ही रूप ले सकती है!
और संन्यासी का पूरा व्यक्तित्व काव्यमय हो जाना चाहिए। चेष्टा से नहीं, आरोपित नहीं, अभ्यास से नहीं--स्वस्फूर्त।
इस संदर्भ में ही, रंजन ने भी पूछा है:

भगवान, जब यह अनुभव होता है कि संसार में कुछ मिलने को नहीं, फिर एक प्रकार की विरक्ति उठती है। कोई संबंध बनाने का मन नहीं होता। और फिर भी दिन ढलते-ढलते नाच कर उत्सव मना लेती हूं। बस यह अनुभूति प्रगाढ़ होती जाती है आपके साथ रोज बैठते-बैठते।
संसार में तो कुछ मिलने को नहीं है, मगर संसार ही सब-कुछ थोड़े ही है। संसार से भी बड़ा संसार, संसार में छिपा है। संसार तो केवल आवरण है, पर्दा है। इस पर्दे के पीछे असली राज छिपा है। जो पर्दे में ही उलझ गए, जो पर्दे की ही चिंता में लगे रहे और जिन्होंने पर्दा उठा कर ही न देखा, वे पागल हैं, वे निपट पागल हैं। वे ऐसे पागल हैं जैसे गए थे चित्रों को देखने और देखते रहे चित्रों में लगी चौखट को। फ्रेम कितनी ही सुंदर हो, चौखट कितनी ही सुंदर हो, उससे क्या लेना-देना है! असली सवाल तो चित्र का है। लेकिन बहुत ऐसे पागल हैं जो चौखटों में उलझ गए हैं; जो गए थे सत्य को खोजने, उलझ गए शब्दों में, शास्त्रों में।
संसार में तो कुछ भी नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कहीं भी कुछ नहीं है। संसार तो केवल परिधि है। लेकिन परिधि में अगर कुछ नहीं है तो इसका यह मत समझ लेना अर्थ कि केंद्र में कुछ नहीं है। परिधि के भीतर छिपा है केंद्र। जरा खुदाई करनी पड़ती है रंजन, और तब रस के झरने फूट पड़ते हैं।
दोनों अनुभूतियां तेरी ठीक हो रही हैं। तू कहती है: जब यह अनुभव होता है कि संसार में कुछ मिलने को नहीं है तो फिर एक प्रकार की विरक्ति उठती है। कोई संबंध बनाने का मन नहीं होता। फिर भी दिन ढलते-ढलते नाच कर उत्सव मना लेती हूं।
शुरू-शुरू में ये दोनों बातें होंगी। एक तरफ जो व्यर्थ है उससे विरक्ति उठेगी और जो सार्थक है उसका उत्सव जगेगा। फिर धीरे-धीरे व्यर्थ दिखाई पड़ना ही बंद हो जाएगा; तब एक नई दृष्टि आएगी कि व्यर्थ भी सार्थक की सुरक्षा है। जैसे बागुड़ लगा देते हैं हम बगीचे को बचाने के लिए। बागुड़ में फूल नहीं लगते, सो सच है। कांटों की बागुड़ बनाते हैं। बागुड़ में क्या फूल लगेंगे! लेकिन बागुड़ की भी जरूरत तो है ही। बागुड़ ही बगीचा नहीं है, लेकिन बागुड़ के बिना भी बगीचा नहीं हो सकता है।
इसलिए यह विरक्ति जो अभी उठ रही है, प्राथमिक है। यह विरक्ति भी चली जाएगी। धीरे से तुझे दिखाई पड़ेगा कि वह जो नृत्य है, जो उत्सव है, उसको बचाने के लिए, उसकी सुरक्षा के लिए चारों तरफ एक बागुड़ है। वह बागुड़ ही संसार है।
संसार परमात्मा का घर है। घर में ही मत उलझ जाना। मालिक को पहचानना। और मालिक को पहचान लोगे तो घर से विरक्ति की क्या जरूरत है? न तो घर से आसक्ति की कोई जरूरत है, न विरक्ति की कोई जरूरत है।
दुनिया में दो तरह की मूढ़ताएं हैं। एक--जो घर में आसक्त हो गए हैं; जो दीवालों से प्रेम कर रहे हैं; जो ईंटों को छाती से लगाए बैठे हैं। और दूसरे--जो दीवालों से विरक्त हो गए हैं, जो दीवालों से डर कर भाग गए हैं; जो ईंटों से अपने को मुक्त करने में लगे हैं। दोनों एक से पागल हैं, कुछ फर्क नहीं है। दोनों का उलझाव ईंटों से है। मालिक को न पहले ने देखा है, न दूसरे ने देखा है। जो मालिक को देख लेगा, वह तो फिर इन ईंटों को भी स्वीकार कर लेगा। आखिर यह उस मालिक का ही भवन है! फिर तो इस भवन की ईंट-ईंट भी प्यारी लगेगी। आसक्ति तो नहीं, न विरक्ति; क्योंकि मालिक ने जिसे रहने को चुना है वह जगह भी तो पवित्र हो गई!
मूसा के जीवन में यह उल्लेख है कि मूसा जब पर्वत पर परमात्मा के दर्शन करने को गए, तो उन्होंने अदभुत दृश्य देखा। एक हरी झाड़ी--रही होगी गुलाब की झाड़ी, गुलाब की ही होनी चाहिए--जिसमें फूल खिले थे। और हरी थी, लेकिन उसके भीतर से लपट उठ रही थी आग की। लेकिन लपट अदभुत थी! आग बड़ी रहस्यपूर्ण थी! झाड़ी जल नहीं रही थी। जलना तो दूर, पत्ते कुम्हला भी नहीं रहे थे। फूल ताजे के ताजे थे, नाच रहे थे लपटों में। आग की लपटों ने फूलों को और रंग दे दिया था; पत्तों की हरियाली को और चमक दे दी थी, एक आभा दे दी थी। मूसा तो थोड़े घबड़ाए भी, थोड़े डरे भी, लेकिन एक अदम्य आकर्षण से खिंचे हुए उस झाड़ी की तरफ बढ़े। झाड़ी से एक आवाज आई, जैसे लपट बोली, जैसे आग बोली: मूसा, जूते उतार दो क्योंकि तुम पवित्र भूमि पर हो! जहां भी मैं हूं, वह भूमि पवित्र है।
तत्क्षण मूसा ने जूते उतार दिए और जब वे पास गए झाड़ी के तो उन्होंने देखा, वह आग की लपट परमात्मा थी, परमात्मा का स्वरूप थी। आग तो थी, मगर ठंडी थी, शीतल थी।
परमात्मा शीतल आग है। उसमें फूल और खिल जाते हैं, जलते नहीं। लेकिन जो वचन उन्होंने सुने उस आग से--मूसा, जूते उतार दो, क्योंकि तुम पवित्र भूमि पर हो। जहां भी मैं हूं, वह भूमि पवित्र है। लेकिन परमात्मा कहां नहीं है? परमात्मा सब जगह है। सब झाड़ियों में वही है। तुम्हें दिखाई पड़े, न दिखाई पड़े--यह और बात है; यह तुम्हारी आंख की बात है। मैंने तो उसे हर झाड़ी में देखा है। मैंने तुम में उसे देखा है। मैं तुममें उसे देख रहा हूं। मैं झाड़ी-झाड़ी में उसे देख रहा हूं। हर फूल में उसकी लपट है। जीवन उसकी लपट है। और कैसी ठंडी लपट है--आग है, और जलाती नहीं! आग है और जिलाती है, जलाना तो दूर। यह सारी पृथ्वी, यह सारा जीवन पवित्र है, तीर्थ है। न जाओ काबा, न जाओ काशी, न जाओ कैलाश। तुम जहां हो वहीं इस परमात्मा की उपस्थिति को अनुभव करो। वही काबा है, वही काशी है, वही कैलाश है। जहां भी कोई व्यक्ति शांत, मौन, आनंदमग्न हो, रंजन, उत्सव में लीन हो जाता है--वहीं तीर्थ निर्मित हो जाते हैं।
नाचना मेरे पास होने के उपायों में एक है, उत्सव मेरे निकट आने की विधि है। यह तो मधुशाला है, मयखाना है, मयकदा है।
पहली घटना घट रही है अभी तेरे जीवन में। संसार व्यर्थ मालूम पड़ता है। यह स्वाभाविक है। पहली दफा जब सार्थक दिखाई पड़ेगा तो व्यर्थ दिखाई पड़ेगा। पर जल्दी ही यह भी दिखाई पड़ेगा, दूसरे कदम में, कि वह जो सार्थक है, वह व्यर्थ को ही तो अपने चारों तरफ बसाए हुए है। उसमें भी कारण है, राज है। व्यर्थ के बिना सार्थक नहीं हो सकता। तब संसार भी सम्मान के योग्य हो जाता है। तब न आसक्ति, न विरक्ति। जहां परमात्मा का वास है, वह प्रत्येक वस्तु पवित्र है।
फिर, अभी तू कहती है: ‘संबंध बनाने का मन नहीं होता।’
स्वभावतः, संबंध यानी संसार--मित्रता बनाओ, प्रीति बनाओ, प्रेम करो। यह सब संसार का निर्माण होता है। स्वभावतः देख कर की संसार में कुछ मिलने को नहीं है, क्या प्रीति बनाओ, क्या संबंध बनाओ! रंजन सब संबंध, प्रीति, परिवार छोड़ कर यहां आ गई है। पति तो अमरीका में हैं। प्रतिष्ठित हैं, ठीक, अच्छे व्यवसाय में हैं। रंजन यहां आई सो आई, गई नहीं फिर लौट कर। जैसे फिर उसे याद ही नहीं आई परिवार की। पति ने बहुत प्रतीक्षा की कि क्या हुआ पत्नी को! साल भर प्रतीक्षा करने के बाद बेचारे स्वयं आए--देखने कि मामला क्या है। और यहां आए तो, भले आदमी हैं, आए तो डूब गए, आए तो संन्यस्त हो गए। आए तो अब गए हैं वहां सब काम निबटा कर समाप्त करके चले आने को। प्यारे आदमी हैं।
लेकिन रंजन को दिखाई पड़ गया कि कुछ सार नहीं है। बने-बनाए संबंध थे जब उनमें सार नहीं दिखाई पड़ा, तो अब नये संबंध बनाने में क्या सार दिखाई पड़ेगा! लेकिन जब उत्सव पैदा होगा जीवन में, आनंद पैदा होगा, तो एक नये तरह के संबंध बनने शुरू होते हैं। वे बिलकुल ही गुणात्मक रूप से भिन्न होते हैं। उनको संबंध कहना ठीक नहीं है, क्योंकि संबंध से भ्रांति हो सकती है। वे संबंध नहीं होते। तब आदमी प्रेम को बांटता है। तब प्रेम बंधन नहीं बनता। तब प्रेम मुक्तिदायी होता है। तब आदमी बांटता है: इतना है भीतर कि करेगा क्या! इतना उठता है भीतर कि करेगा क्या! फूल खिलेंगे ही, गीत जगेंगे ही। उनको बांटना ही पड़ेगा। और जो भी अपनी झोली फैला कर उनको प्रीति से ले लेगा, उसका धन्यवाद भी मानना पड़ेगा।
प्रेम की दो स्थितियां हैं: एक तो संबंध, संबंध से संसार बनता है; और फिर एक प्रेम की और भी स्थिति है, वह है आत्म-दशा, संबंध नहीं। व्यक्ति प्रेमपूर्ण हो जाता है। फिर जिससे भी जुड़ता है, बैठता है, जिसके पास भी, वृक्ष के पास कि चट्टान के पास, उसके प्रति भी उसके भीतर से प्रेम विकीर्णित होता रहता है। जैसे फूल से गंध उड़ती रहती है और दीये से किरणें झरती रहती हैं, ऐसे प्रेमपूर्ण व्यक्ति से प्रेम बहता रहता है; संबंध नहीं बनते।
मेरे तुमसे क्या संबंध हैं? लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि मेरा तुमसे कोई प्रेम नहीं है। मेरा ही तुमसे प्रेम है। बुद्धों ने ही प्रेम किया है, और दूसरे तो प्रेम क्या करेंगे! और दूसरों के पास तो प्रेम है ही क्या देने को! वे तो भिखारी हैं; खुद ही मांगने बैठे हैं, देंगे क्या? वे तो झोली फैलाए बैठे हैं कि कोई दे दो। और जहां झोली फैलाते हैं, वहीं कहा जाता है: आगे बढ़ो! क्योंकि जिनके सामने झोली फैलाते हैं, वे खुद भी भिखमंगे हैं। सारी दुनिया भिखमंगों से भरी है।
रंजन, जल्दी ही सम्राट पैदा होगा। ये पहली-पहली किरणें हैं। यह सुबह का पहला-पहला आगमन है। अभी लगेगी विरक्ति सी संबंधों में। ठीक लग रहा है। मगर उत्सव पैदा हो रहा है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण बात है। उत्सव पैदा हुआ तो संबंध तो विदा हो जाएंगे और प्रेम रह जाएगा। संबंध-मुक्त प्रेम। संबंध को अतिक्रमण करने वाला प्रेम। तेरी एक आत्म-दशा। तेरे भीतर अहर्निश बजने वाला एक नाद। फिर जो तेरे पास बैठेगा, सुनेगा; जैसे कि नदी का कलकल नाद! नदी कोई बैठे पास तो भी नाचती रहती है, गाती रहती है; कोई न बैठे पास, तो भी नाचती रहती है, गाती रहती है। इसको ही मैं कहता हूं: जीवन को कविता की तरह जीना। मेरा संदेश यही है।

तीसरा प्रश्न:
भगवान, जब मैंने चिन्मय से स्त्रियों के प्रति आपके आदर और प्रेम की चर्चा की, तो उसने कहा कि स्त्रियों को आदर और प्रेम और सम्मान देने के लिए केवल कोई बुद्धपुरुष ही चाहिए।
शीला! चिन्मय भी बेचारा ठीक ही कहता है। स्त्रियों को ही सम्मान देने के लिए और प्रेम देने के लिए बुद्धपुरुष नहीं चाहिए; वह आधी बात है। चिन्मय को दूसरी बात भी कह देना। पुरुषों को भी प्रेम देने के लिए और सम्मान देने के लिए कोई बुद्धपुरुष ही चाहिए। प्रेम ही कोई बुद्धपुरुष दे सकता है, या कोई बुद्धत्व को उपलब्ध स्त्री। प्रेम होगा तो ही तो दे सकोगे न!
वायदे तो सब करते हैं, मगर वायदे पूरे कहां होते हैं, कैसे हो सकते हैं? स्वर्ग कौन नहीं बनाना चाहता! सभी आशा से भरे हुए चलते हैं कि स्वर्ग बनाएंगे, मगर बनता नरक है। असली सवाल यह नहीं है कि तुमने क्या चाहा था: असली सवाल यह है कि अंततः परिणाम क्या हुआ? फलों से वृक्ष जाने जाते हैं। तुम्हारे जीवन का अंतिम परिणाम क्या होता है? उससे ही तो पता चलता है, तुम किस आशा से चले थे। तुम्हारी आशाओं का क्या मूल्य है? आशाएं तो सभी सुंदर करते हैं।
कहावत है कि नरक का रास्ता शुभाकांक्षाओं से भरा पड़ा है, पटा पड़ा है। नरक का रास्ता बना ही शुभाकांक्षाओं से है। जैसे पत्थरों से रास्ता बनाया जाता है, ऐसे ही शुभाकांक्षाओं से नरक का रास्ता बना है। उन्हीं पर चल-चल कर लोग नरक तक पहुंच जाते हैं।
एक टैक्सी वाले ने टैक्सी रोक कर राहगीर से पूछा: कहां चलिएगा?
राहगीर कुछ भन्नाया हुआ था। घर से झगड़ कर आ रहा था। पत्नी से झड़प हो गई थी। अभी किसी से कुछ बात भी करने की इच्छा नहीं थी। और यह दुष्ट टैक्सी रोक कर पूछता है, कहां चलिएगा! तो राहगीर ने गुस्से में कहा: जहन्नुम!
टैक्सी वाला बोला: तो फिर ऐसा करो भैया, शादी कर लो! टैक्सी वहां तक नहीं जाती। टैक्सी की एक सीमा है। अगर जहन्नुम जाना है तो शादी ही ले जा सकती है।
चिन्मय भी बेचारा ठीक कहता है कि स्त्रियों को प्रेम और सम्मान देने के लिए कोई बुद्धपुरुष ही चाहिए। मगर शीला, तू भी चिन्मय को कहना कि पुरुषों को सम्मान देने के लिए भी कोई बुद्ध स्त्री चाहिए। नहीं तो पुरुषों को कैसे सम्मान दो? मैं तो किसी स्त्री में अपने पति के प्रति सम्मान का भाव नहीं देखता। हो भी तो कैसे हो? और न मैं किन्हीं पतियों में उनकी पत्नियों के प्रति सम्मान का भाव देखता हूं। हां, दिखावा करते हैं। हर तरह से दिखावा करते हैं।
एक मित्र ने पत्र लिखा है, साथ में प्रार्थना की है कि उनका नाम न बताऊं। लिखा है: भगवान, विगत कुछ दिवसों से प्रतिदिन प्रातः प्रवचन में निरंतर आपके द्वारा विवाह जैसे पवित्र, धार्मिक तथा सुखदायी संबंध पर की जाने वाली विषैले व्यंग्य बाणों की घनघोर वर्षा से मुझ विवाहित का हृदय छलनी होकर आक्रोश व प्रतिशोध की ज्वालाओं में जल-भुन रहा है। यदि आपने शीघ्रातिशीघ्र शादी का मजाक उड़ना बंद नहीं किया तो आपको चेतावनी दिए देता हूं कि इसका परिणाम ठीक नहीं होगा। यह धमकी नहीं, सौ प्रतिशत सत्य एक पूर्व-घोषणा है कि अगर आपने आगे से अब पति-पत्नी का कोई भी लतीफा सुना कर मेरी सामाजिक व दांपत्य भावनाओं पर प्रहार किया...वह दुष्ट अभी-अभी बाहर चली गई है...तो मैं सह न सकूंगा और भावावेश में आकर अपनी बीवी को तलाक दे बैठूंगा और फिर जो होना हो सो हो। फिर फिकर नहीं है। आपका आशीर्वाद तो सदा साथ है ही! प्रवचन में मेरा नाम न ले देना भगवान, इतनी कृपा रखना। थोड़ा लिखा ज्यादा समझना। वह फिर वापस आ रही है। अतः अब बंद करता हूं।

चौथा प्रश्न:
भगवान, लगता है आप बचपन में बहुत उपद्रवी रहे होंगे। इतने उपद्रव, तौबा!
रंजन भारती! तू सोचती है मैं अभी भी बदल गया हूं? मुझे तो कुछ भेद दिखाई पड़ता नहीं।
वह झेन-कथा तो मैंने बहुत बार तुमसे कही है, आज फिर कहता हूं कि एक आदमी झेन सदगुरु रिंझाई से मिलने गया था। उसने रिंझाई से पूछा कि आप जब ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुए थे, बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हुए थे, तो क्या करते थे?
रिंझाई ने कहा: कुएं से पानी भर कर लाता था, लकड़ियां जंगल से काटता था। भूख लगती थी तब खाना खाता था। नींद आती थी तब सो जाता था।
उस आदमी ने कहा कि ठीक, फिर जब आप बुद्धत्व को उपलब्ध हुए, उसके बाद आप क्या करते हैं?
उसने कहा: कुएं से पानी भर कर लाता हूं, जंगल से लकड़ी काटता हूं। जब भूख लगती है, खाना खाता हूं। जब नींद आती है तब सो जाता हूं।
उस आदमी ने कहा: यह तो बड़ी हैरानी की बात हुई? इन दोनों में भेद क्या?
रिंझाई ने कहा: वही तो मैं सोचता हूं कि भेद क्या! इतना ही भेद है कि तब जो हो रहा था, सब नींद में था; अब सब जाग कर है।
यूं बाहर से तो सब वही का वही है। बचपन में भी जो उपद्रव मैं कर रहा था, वे उपद्रव नहीं थे; आज जो कर रहा हूं, उसकी पूर्व-भूमिका थी। नींद में टटोलना था। अब जो कर रहा हूं, वह रोशनी में कर रहा हूं, मगर वही कर रहा हूं। स्वभावतः अब विस्तार बड़ा हुआ है। जो भी कर रहा हूं, परिपूर्ण रूप से सजग हूं। लेकिन आज जब लौट कर देखता हूं तो ऐसा मुझे नहीं लगता कि बचपन में भी मैंने कोई उपद्रव किए। आज तो लौट कर देखता हूं तो मुझे उनमें भी एक अंधेरे में टटोलती हुई अन्वेषक की दृष्टि ही मालूम पड़ती है। आज लौट कर देखता हूं तो जरूर अस्त-व्यस्त था उपक्रम, अराजक था; लेकिन तलाश ठीक दिशा में ही चल रही थी।
जैसे उदाहरण के लिए तुझे कहूं: हाई स्कूल के दिनों में मुझे सबसे बड़ी तकलीफ टोपी से रही। टोपी लगाना मुझे कभी रास न आया। यूं टोपी से मुझे कुछ दुश्मनी न थी। ऐसे तरह-तरह की टोपियों से मुझे लगाव है। मेरे पास करीब-करीब दुनिया भर से टोपियां आती हैं, मित्र ले आते हैं, क्योंकि उनको पता है कि मुझे टोपियां पसंद हैं। तब भी पसंद थीं। मगर एक कारण से मुझे अड़चन थी कि स्कूल में टोपी जबर्दस्ती लगवाई जाती थी। टोपी लगानी ही पड़ेगी, बस वहां मेरा विरोध था। स्वभावतः मेरे अध्यापक, मेरे प्रधान अध्यापक, मेरे परिवार के लोग, मेरे गांव के लोग समझते: यह उपद्रव है। और कोई भी कहेगा उपद्रव है। मैंने लेकिन बहुत सहा उसके लिए, मगर टोपी नहीं लगाई तो नहीं लगाई। कितने दिनों कक्षाओं के बाहर ही खड़ा रखा गया। कितनी बार कहा कि जाओ स्कूल के सात चक्कर लगा आओ। मैं सात चक्कर की जगह सत्रह चक्कर लगा आया। शिक्षक सिर पीट लेते कि हमने तुम से सात कहे, तुमने सत्रह क्यों लगाए?
मैंने उनसे कहा कि व्यायाम करने में कोई हर्ज नहीं है। और बाहर रहना मुझे ऐसे भी पसंद है। शुद्ध हवा भी मिलती है, पशु-पक्षियों, पौधों से भी दोस्ती बनती है और भीतर तुम जो हजार तरह की व्यर्थ की बकवास करते हो, उससे भी बचना हो जाता है।
सो अंततः उन्होंने मुझे भीतर बिठालना शुरू कर लिया--ऐसे आदमी को बाहर बिठालने से क्या फायदा! मुझे सजा में डंड-बैठक लगाने को कहते थे, तो मैं लगाए ही चला जाऊं। वे कहें: अब रुको भी!
मैंने कहा कि जरा और लगा लेने दें, आज सुबह मैंने व्यायाम किया ही नहीं है।
वे कहते कि तुम आदमी कैसे हो! तुम्हें इस बात की भी समझ नहीं है कि हम दंड दे रहे हैं!
तुम दे रहे होओगे दंड, मगर हम दंड लें तब! हम तो हर चीज से जो भी लाभ ले सकते हैं, लेते हैं। टोपी नहीं लगाएंगे--जब तक कि सिद्ध न कर दो कि टोपी लगाने की वैज्ञानिकता क्या है। इससे बुद्धि बढ़ेगी? अगर बुद्धि बढ़ती हो तो टोपी क्यों लगाएं, फिर सरदारों जैसा साफा क्यों न बांधें? अगर बुद्धि ही बढ़ती हो तो फिर साफे से तो और भी बढ़नी चाहिए। तो फिर सरदारों के पास जैसी बुद्धि होनी चाहिए, किसी के पास होनी ही नहीं चाहिए। तो टोपी क्यों, साफा बांध कर आएंगे।
मेरे प्रधान अध्यापक अपने सिर से हाथ लगा कर बैठ जाते थे। कहते: कौन तुमसे बकवास करे! या तो साफा बांधोगे या टोपी भी न लगाओगे!
मैंने कहा कि मैं सीधा-सीधा विचारपूर्वक उत्तर चाहता हूं। अगर बुद्धि बढ़ती हो तो फिर साफे से ज्यादा बढ़ेगी और जितना लंबा साफा होगा, उतनी ज्यादा बढ़ेगी। तो सरदार तो गजब कर देते। फिर तो सरदारों के संबंध में सब जो मजाक हैं, वे गलत हैं।
स्कूल में सिर्फ बंगालियों को आज्ञा थी कि वे टोपी चाहें तो लगाएं, चाहें न लगाएं; क्योंकि बंगाली टोपी लगाना पसंद नहीं करते। और मैं उनसे कहता कि तुम देखते हो कि इस देश में बंगालियों के पास जितनी बुद्धि होती है, उतनी सरदारों के पास तो नहीं होती। जरूर टोपी न लगाने से बुद्धि को कुछ खुलापन मिलता है, खिड़कियां खुलती हैं।
वे कहते: क्या बकवास लगा रखी है?
मैंने कहा: फिर आखिर बंगालियों के पास बुद्धि कैसे है? और सरदार जो कस कर बांध हुए हैं साफा, उसका परिणाम स्वभावतः यह होता है कि लड़ने-झगड़ने को तत्पर...। साफा इतना बंधा हुआ है कि वे तैयार ही बैठे हुए हैं कि आ जा, हो जाएं दो हाथ, कि कुछ तो राहत मिले। वाहे गुरुजी की फतह, वाहे गुरुजी का खालसा! हो जाने दो। साफा बंधवाया ही इसीलिए था कि उनका तत्क्षण हाथ कृपाण पर चला जाए।
मैंने कहा: मुझे कोई कृपाण चलानी नहीं है, टोपी मैं लगाऊं क्यों? कोई कारण मेरे सामने साफ कर दो।
कारण वे मुझको समझा नहीं पाए, सजा मुझको जितनी दे सकते थे, दिए। मैंने कहा: सजा मैं झेलूंगा, लेकिन कारण जब तक नहीं बताओगे, तब तक तुमको भी सजा देने की अंतःकरण में पीड़ा रहेगी।
और उन सबको पीड़ा थी, क्योंकि वे अकारण सजा दे रहे हैं। फिजूल की बात है--टोपी। मगर यह भी जिद्दी है। और एक को अगर आज्ञा दें कि टोपी मत लगाओ तो सब गड़बड़ खड़ी हो जाए। और जो टोपी के संबंध में मेरा हिसाब था, वही मेरा हर चीज के संबंध में हिसाब था। कवायद करना--क्यों घूमें बाएं, क्यों घूमें दाएं? क्या फायदा बाएं-दाएं घूमने से?
मुझे रोज करीब प्रधान अध्यापक के कमरे में जाना पड़ता था--बेंत खाने के लिए। मैं अभ्यस्त हो गया था। वे भी अभ्यस्त हो गए थे। पहले-पहले तो पूछते थे कि क्या किया इसने, फिर आज क्या किया? फिर धीरे-धीरे उन्होंने सोचा पूछने से सार क्या, यह कुछ न कुछ रोज करता ही है। तो मैं पहुंचूं, मैं हाथ आगे करूं, वे बेंत मारें, मैं विदा। एक दिन यूं हुआ, संयोग से हुआ कि जो विद्यार्थी कक्षा में सबसे ज्यादा तगड़ा था, जिस पर कक्षा के शिक्षक को भरोसा था कि मुझे ले जा सकेगा प्रधान अध्यापक के कमरे तक, जो मुझे हमेशा ले जाता था, उसने कुछ गड़बड़ की। और शिक्षक ने कहा कि अच्छा, आज अच्छा मौका है! मुझसे कहा कि आज तुम इसे ले जाओ। यह रोज तुम्हें ले जाता है, तुम इसे आज ले जाओ।
मैं भी बड़ा खुश। उसको लेकर पहुंचा। मैं अंदर पहुंचा कि उन्होंने उठाया बेंत और बस मेरे हाथ पर बेंत जड़ दिया। मैंने उनसे कहा कि आज आपको माफी मांगनी पड़ेगी। उन्होंने कहा: क्यों?
मैंने कहा कि आज मैं इसको लाया हुआ हूं, मैं नहीं आया हुआ हूं। बेंत मुझे दो आप। आज बेंत मैं आपको मारूंगा। कम से कम पूछा तो होता, इतना शिष्टाचार तो होना ही चाहिए कि कौन किसको लाया है!
मैंने कहा: मैं यहां से हटूंगा नहीं, वह बेंत आप मुझे दे दो। धीरे से मारूंगा, हालांकि तुमने मेरे साथ कभी कोई रियायत नहीं की है।
वे प्रिंसिपल मुझे बाद में भी मिल जाते थे तो वे कहते थे: याद है कि तूने मुझे बेंत मारा था? किसी ने मेरी जिंदगी में मुझे बेंत नहीं मारा। विद्यार्थी और अध्यापक को बेंत मारे! मगर मुझे भी बात तो जंची कि तू ठीक तो कह रहा है कि मुझे कम से कम पूछ तो लेना चाहिए। मैंने पूछना ही बंद कर दिया था। यह बात इतनी तय हो गई थी कि तुझे रोज आना है, मुझे रोज मारना है; फायदा क्या है पूछने से कि कसूर क्या है, होगा ही कुछ न कुछ कसूर।
टोपी लेकिन मैंने नहीं लगाई। ऐसे कभी-कभी स्कूल के बाहर मैं टोपी लगा कर निकलता था। एक दिन हेड मास्टर मुझे रास्ते पर मिल गए। टोपी लगाए चला जा रहा था। उन्होंने कहा: सुनो! यह टोपी क्यों लगाए हुए हो?
मैंने कहा: मैं अपना मालिक हूं। जहां लगाना है, वहां लगाएंगे और जहां नहीं लगाना है, वहां नहीं लगाऐंगे। इधर कोई हमसे लगवा नहीं रहा, खुद लगाए हुए हैं।
आज लगता है कि उपद्रव था, लेकिन मैं जानता हूं कि उपद्रव नहीं था। मैं अपनी निजता की तलाश में था। वही खोज बढ़ती रही। उस खोज में कोई फर्क नहीं आया। किसी को परेशान करने के लिए भी मैं नहीं कर रहा था। मैं सिर्फ यह देखना चाहता था कि जिस समाज में पैदा होना पड़ा है, वह समाज कितनी स्वतंत्रता देता है, कितनी बुद्धिमत्ता देता है, कितने बुद्धि को विकास के अवसर देता है? मगर नहीं, यह समाज मारता है बुद्धि को, मिटाता है बुद्धि को, नष्ट करता है बुद्धि को।
जब मैं स्नातक हुआ और एम. ए. में प्रथम श्रेणी में प्रथम आया, तो मेरे अध्यापक, मेरे प्रोफेसर, मेरे विभागाध्यक्ष, मेरे वाइस चांसलर सब बड़े गौरवान्वित थे। फिर जब दीक्षांत समारोह हुआ तो स्वभावतः मैं प्रथम खड़ा किया गया था। वह मौका मैंने नहीं छोड़ा। मैंने खड़े होकर कहा कि मैं कुछ बातें पूछना चाहता हूं--इसके पहले कि आप आशीर्वाद दें, क्योंकि अब मैं विदा हो रहा हूं, यह आखिरी दिन है मेरा इस विश्वविद्यालय में--यह काला चोगा मुझे क्यों पहनाया गया है? और ये आप सब डीन और चांसलर और वाइस चांसलर और मेहमान जो बुला गए हैं और जिनको डी. लिट्‌. दी जाने वाली है, ये सब काले चोगे क्यों पहने हुए हैं? क्योंकि यह काला रंग तो मातम का रंग है। क्या आप समझ रहे हैं हम लोग मर गए?
वे बहुत चौंके। एक क्षण को सन्नाटा छा गया पूरे दीक्षांत भवन में, कि उपद्रव इसने कुछ किया। उनको लगा ही होगा कि यह उपद्रव है। लेकिन मैं कोई उपद्रव नहीं कर रहा, मैं सिर्फ यह पूछ रहा था कि काला रंग तो हमेशा लोग मातम के समय पहनते हैं। यह उत्सव मनाया जा रहा है कि मातम मनाया जा रहा है, यह मैं जानना चाहता हूं। ये काले कपड़े, यह काला रंग, यह तो मौत का लक्षण है। आज के दिन तो कम से कम हमारे साथ शिष्टता का व्यवहार किया होता। और ये सब भूत-प्रेत बन कर तुम खड़े हुए हो, शर्म नहीं आती? क्या तुम आशीर्वाद दोगे! तुम मर गए, अब तुम घोषणा हमारी कर रहे हो कि हम भी मर गए! मैं जिंदा हूं!
और मैंने वह चोगा निकाल कर फेंक दिया और वह टोपी निकाल कर फेंक दी। मुझे जल्दी से भवन के बाहर ले जाया गया कि आओ, बाहर चलो! तुम बाहर आओ, फिर पीछे बात करेंगे। उत्तर तुम्हें बाद में दिया जाएगा।
मैं बाद में रोज वाइस चांसलर के घर पहुंचता था कि उत्तर? वे कहते: क्या उतर दें तुम्हें! यूं तुम बात ठीक भी कह रहे हो। मानते हैं भई कि तुम बात ठीक कर रहे हो। मगर ऐसे वक्त पर तो उपद्रव खड़ा नहीं करना था। सबके सामने फजीहत करवा दी। हमारे पास कोई उत्तर नहीं है; बात तो ठीक है कि काला रंग मातमी रंग है। सारी दुनिया में मातमी रंग है।
काला रंग भूत-प्रेतों का रंग है, यमदूतों का रंग है। यमदूत भी बिलकुल काले और काले भैंसे पर बैठ कर आते हैं। तो ये तुम क्या रंग बना रखे हो, मैंने कहा। मगर मैं समझता हूं इसका अर्थ। इसके भीतर, चाहे तुम्हें पता हो या न हो, इस बात की सूचना है कि विश्वविद्यालय इतने लोगों को मारने में, हत्या करने में सफल हो गया, इनकी जिंदगी खराब करने में सफल हो गया, इनकी बुद्धि मटियामेट कर डाली गई। मैं घोषणा करना चाहता हूं कि मैं मरा नहीं हूं, मैं अभी जिंदा हूं और मैं जिंदा रहूंगा! और मैं यह तुम्हारा काला चोगा डाले जाता हूं इस घोषणा की तरह।
वह तो यह उपद्रव ही समझा जाएगा, स्वभावतः। लेकिन उपद्रव यह था नहीं। यह सब नकलपट्टी है। चूंकि पश्चिम में चलता है काला चोगा, भारत में भी चलता है काला चोगा। न पश्चिम के पास कोई दलील है, न भारत के पास कोई दलील है। यह काला चोगा किसलिए? अगर दीक्षांत समारोह में कोई रंग ही पहनाने का हो तो शुभ्र सफेद होना चाहिए, क्योंकि सफेद सारे रंगों का प्रतीक है। सफेद रंग का अर्थ होता है: सारे रंगों का जोड़, इंद्रधनुष। अगर सारे रंगों को हम इकट्ठा मिलाएं तो सफेद रंग बनता है।
सफेद रंग जीवन का प्रतीक है और सफेद रंग निर्दोषता का भी प्रतीक है, बुद्धिमत्ता का भी प्रतीक है। सफेद रंग सरलता का भी प्रतीक है, स्वच्छता का भी प्रतीक है। काला रंग तो गंदगी का प्रतीक है--मौत का, मातम का। इसको क्यों लादे हुए हो सिर पर?
मैं सिर्फ जवाब चाहता था, लेकिन स्वभावतः समझा गया कि यह उपद्रव है। यह उपद्रव नहीं था। आज भी मैं कहता हूं कि यह उपद्रव नहीं था; कहीं किसी को परेशान करने की कोई आकांक्षा नहीं थी। कभी जीवन में वैसी आकांक्षा नहीं रही। लेकिन स्वभावतः मैं उनकी भी स्थिति समझ सकता हूं, जो पदों पर बैठे हैं, प्रतिष्ठित हैं। उनको लगेगा कि मैं परेशान कर रहा हूं, मैं हैरान कर रहा हूं।
रंजन, तू पूछती है कि ‘आप बचपन में बहुत उपद्रवी रहे होंगे।’
हां, औरों की तरफ से उपद्रव कहा जा सकता है; मेरी तरफ से कभी उपद्रव मैंने किया नहीं। और जो मैं तब करता था, वही मैं अब भी कर रहा हूं। सिर्फ उसका आयाम गहरा हुआ है, उसका विस्तार हुआ है। उस बात में और बल आया है। वही बगावत आज भी सिखा रहूं। वही जीवन आज भी सिखा रहा हूं। वही अन्वेषण सत्य का, वही खोज आज भी हजारों लोगों के हृदय में जलाने की चेष्टा में संलग्न हूं।
संन्यास मेरे लिए विद्रोह है, बगावत है। संन्यास मेरे लिए अन्वेषण है, आज्ञाकारिता नहीं। संन्यास सबसे बड़ी क्रांति है इस पृथ्वी पर। मगर क्रांति तो उपद्रव मालूम होगी न्यस्त स्वार्थों को।
मैं जो बचपन से करता रहा हूं, वह भी क्रांति ही थी, यद्यपि एक बच्चे के द्वारा की गई क्रांति थी। तो इतना तो मानना ही होगा कि वह अंधेरे में टटोलने जैसी क्रांति थी। वे कदम स्पष्ट नहीं थे। स्पष्ट हो नहीं सकते थे। मगर धीरे-धीरे स्पष्ट होते चले गए।
मुझे न मालूम कितने विश्वविद्यालय, कालेजों से निकाला गया--सिर्फ इसीलिए कि मैं अध्यापकों में बेचैनी पैदा कर रहा था। मैं किसी को बेचैन नहीं करना चाहता था। मैं सिर्फ चैन की तलाश में था। मैं चाहता था कि जीवन के जो प्रश्न हैं, उनके उत्तर मिलने चाहिए। आखिर विश्वविद्यालय किसलिए हैं? तुम्हारी बुद्धिमत्ता पर जंग मार देने को? तुम्हारी बुद्धिमत्ता की धार को खत्म करने को, बोथला कर देने को या तुम्हारी बुद्धिमत्ता को धार देने को? अगर धार देने को हैं तो मैं जो कर रहा था, वह उपद्रव नहीं था। वही होना चाहिए। और अगर तुम्हारी तलवार की धार को मारने को यह सब उपाय चल रहा है, तो स्वभावतः उपद्रव था। लेकिन तब मैं मानता हूं कि वह उपद्रव आदरणीय है, सम्मान-योग्य है।
मैंने कभी भी एक क्षण को भी ऐसा कोई काम नहीं किया जीवन में, जिसके लिए मैं पछताया होऊं। आज भी कोई पछतावा नहीं मुझे किसी बात का। जो मैंने किया, जैसा मैंने किया, वह मैंने, उस समय जितनी मुझमें सूझ-बूझ थी, उसके अनुसार ही किया है। उसमें जरा भी मुझे पछतावा नहीं है। उससे ज्यादा सूझ-बूझ उस समय थी भी नहीं, इसलिए उससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकता था। मगर कभी अपनी सूझ-बुझ के विपरीत नहीं गया। कभी अंधानुकरण नहीं किया। और उस सबका ही यह फल है कि आज जो मैं हूं, हूं; जैसा हूं, वैसा हूं। उस सबने मेरे जीवन को एक बल दिया है, एक केंद्र दिया है, जड़ें दी हैं।
मेरी आस्तिकता थोथी नहीं है। मेरी आस्तिकता, नास्तिकता की आग से गुजरी है। मेरे उत्तर किताबी नहीं हैं, शास्त्रीय नहीं हैं। मैंने खुद पूछे हैं वर्षों तक। मैंने खुद खोजा है, सब तरफ से परखा और जांचा है। और उस परख और जांचने में जो भी मुझे सहना पड़ा है, उसे सहने में मैंने कभी कोई किसी तरह का समझौता नहीं किया, सदा सहने को राजी रहा हूं। किसी विश्वविद्यालय से मुझे निकाल दिया गया तो मैंने कोई समझौता नहीं किया। मैं चुपचाप निकल गया हूं। शान से निकल गया हूं। गौरव से निकल गया हूं। जिन्होंने मुझे निकाला है, उनके भीतर अपराध भाव रहा । उन्होंने मुझसे कहा कि हमें दुख है कि हमें तुम्हें विश्वविद्यालय से अलग करना पड़ रहा है, क्योंकि इतनी शिकायतें हैं कि हम क्या करें! और हम जानते हैं कि शायद तुम जो कहते हो ठीक ही कहते हो, कि विश्वविद्यालय में तो प्रतिभा पर निखार रखने की चेष्टा होनी चाहिए। मगर हम क्या करें, संस्था चलानी है।
मैंने कहा: तुम संस्था चलाओ। मुझे समझौता नहीं करना है। मैं शान से विदा हो रहा हूं। मैं गौरवान्वित हूं कि तुमने मुझे निकाला।
जब मेरी बात लाखों-हजारों लोगों को प्रीतिकर लगने लगीं और जब लाखों लोग उत्सुक होकर मेरी बात सुनने लगे और मेरे अध्यापक, मेरे वाइस चांसलर, पुराने मेरे शिक्षक मुझे मिल जाते थे कभी तो वे कहते थे: हमने कभी सोचा भी न था। हम कभी मान भी न सकते थे कि तुम जैसा व्यक्ति धार्मिक हो सकता है!
मैंने कहा: मैं उस दिन भी धार्मिक था। वह बीज था, आज फूल खिले हैं। न तुम उस दिन धार्मिक थे, न आज तुम धार्मिक हो। तुममें बल ही नहीं है। तुम निर्वीर्य हो।
मैं अध्यापक हुआ एक विश्वविद्यालय में। वहां के कुलपति थे: पंडित कुंजीलाल दूबे। न तो बुद्धिमत्ता थी कुलपति होने की, न शिक्षण था ऐसा उनका। राजनीतिज्ञ थे--होशियार राजनीतिज्ञ थे। सारा प्रदेश उनको पंडित चाबीलाल दूबे कहता था। कुंजीलाल दूबे तो उनका नाम था, मगर लोग कहते थे चाबीलाल दूबे। क्योंकि उनके हाथ में बड़े-बड़े नेताओं की चाबी थी। वे खुशामद में बड़े कुशल थे। वे किसी का भी ताला खोल लेते थे। और खुशामद के बल वे चढ़ते-चढ़ते...वकालत उनकी चली नहीं। वकील की भी योग्यता नहीं थी उनमें, वकालत चली नहीं, कभी कोई मुकदमा जीते नहीं। धीरे-धीरे कोई उनके पास आता भी नहीं था मुकदमा लड़ने के लिए, लड़वाने के लिए। फिर वे राजनीति में घुस गए और वहां उन्होंने अच्छी सफलता पाई। वे मध्यप्रदेश में विधानसभा के अध्यक्ष हो गए। फिर उपकुलपति हो गए विश्वविद्यालय के। न उनकी योग्यता थी, न कोई क्षमता थी।
एक सभा में मैं उनके साथ बोल रहा था। वे मुझसे पहले बोले, मैं उनके पीछे बोला। मैंने कहा कि अभी आपने पंडित चाबीलाल दूबे को सुना। एकदम सन्नाटा फैल गया, लोग घबड़ा गए। मैंने कहा: घबड़ाएं मत, भूल से सच्ची बात मेरे मुंह से निकल गई है। चाबीलाल तो बहुत नाराज हो गए। वे उठ कर जाने लगे। मैंने कहा बैठिए! उठ कर कहीं जाना नहीं। मैं जो कह रहा हूं, इस प्रदेश का एक-एक आदमी कहता है, सिर्फ आपके सामने नहीं कहते ये लोग। इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। यही आपका नाम है और यही आपका काम है। आप भी भलीभांति जानते हो। जाते कहां हो? बैठ जाओ!
वे वहां तो घबड़ा कर बैठ गए, क्योंकि एकदम से जाएं भी कहां! और जनता ने एकदम तालियां पीटीं और लोगों ने कहा कि बात तो सच्ची है। मैंने कहा: इतने लोग हैं। मैं पूछता हूं लोगों से कि लोग हाथ उठा दें कि मैंने भूल से सच्ची बात कही है या नहीं? तो लोगों ने हाथ उठा दिए कि बात तो सच्ची है। सब इनको चाबीलाल ही कहते हैं। इनको कोई कुंजीलाल तो कहता ही नहीं।
उन्होंने मुझे घर बुलवाया और कहा कि मुझसे कुछ नाराज हो, क्या बात है? क्यों ऐसा उपद्रव किया?
मैंने कहा: मैंने कोई उपद्रव नहीं किया। मैं नाराज नहीं हूं। और आप खयाल रखना, आपकी चाबी मुझ पर काम नहीं करेगी। वह आप राजनेताओं को मनाते रहें।
तो उन्होंने कहा: फिर यह विश्वविद्यालय तुम्हें छोड़ना पड़ेगा।
मैंने कहा: मैं गौरव से छोड़ सकता हूं। यह दो कौड़ी की नौकरी है, इसका कोई मूल्य नहीं है। नौकरी की कीमत पर जो सच है उसको मैं छिपा नहीं सकता। और जो मैंने वहां कहा है, उसको मैं वापस नहीं ले सकता। आप ही चाबीलाल नहीं हो, इस देश के सारे राजनीतिज्ञ चमचे हैं। उनका सबका धंधा यही है। सच तो यह है कि आपमें अगर थोड़ी भी अकल हो तो आपको उपकुलपति से इस्तीफा दे देना चाहिए।
इन सज्जन ने एक दफा टूर्नामेंट का उदघाटन किया, तो उनके बाबत कहानी प्रचलित थी पूरे गांव में कि उन्होंने टूर्नामेंट का उदघाटन करते वक्त कहा कि आप सब जानते ही होंगे कि तीन तरह के खेल होते हैं--फुटबॉल, वॉलीबॉल और टूर्नामेंट।
ये उपकुलपति हैं विश्वविद्यालय के। उनकी हिम्मत तो पड़ी नहीं कि मुझे निकाल सकें विश्वविद्यालय से, क्योंकि उनको पता था कि मैं शोरगुल मचाऊंगा, कुछ और उपद्रव हो जाएगा। और आए दिन यह हो जाता कि सभाओं के मंच पर संयोगवशात वे मुझे मिल जाते--धार्मिक सभाओं के मंच पर--जहां मैं भी बोल रहा, वे भी बोल रहे। वे मेरी खुशामद के लिए मुझको पंडित जी कहने लगे--आइए पंडित जी!
मैंने कहा कि देखिए, पंडित शब्द मेरे लिए गाली है। भूल कर आप मुझसे पंडित जी मत कहना। अरे--उन्होंने कहा--आप आदमी कैसे हैं! यह तो मैं आदर में कह रहा हूं।
मैंने कहा: यह मेरे लिए आदर नहीं है।
इस देश में लोग पंडित जी तो आदर में ही कहते हैं।
मैंने कहा: मैं पंडित हूं ही नहीं और मैं इसको अनादर मानता हूं। आप मुझको और कुछ भी कहें, पंडित भूल कर मत कहना। आप सोचते होंगे ऐसे मेरी खुशामद करेंगे कि आइए पंडित जी!
एक बार तो वे इतने क्रुद्ध हो गए कि माइक पर वे बैठे थे, बोल रहे थे और तभी बीच में मैं पहुंचा। बस उन्होंने मुझे देखा, होश-हवास खो दिया। अब वे भूल ही गए कि माइक मुंह के सामने है। कहा कि हम दो में से कोई एक ही इस सभा में हो सकता है। या तो मैं बोलूंगा या ये बोलेंगे। बाद में उनको समझ में आया कि माइक था, सारी जनता ने सुन लिया। मैंने कहा कि मुझे अकेले में मिलते हो तो कहते हो पंडित जी! मुझे अकेले में मिल कर खुशामद करते हो और यहां भूल से सत्य निकल गया, जो तुम्हारे हृदय में छिपा हुआ है। खयाल तुम्हें न रहा कि माइक है।
वे असल में कह रहे थे संयोजक से कि अगर ये सज्जन बोलेंगे तो मैं नहीं बोलूंगा, हम दोनों साथ नहीं बोल सकते, हमारा मेल बैठता नहीं। मगर यह सारी बात माइक से पूरी सभा में विस्तीर्ण हो गई। मैंने कहा: जो सच्ची बात है, कहो।
वे मुझे देखते से ही एकदम थर्राने लगते थे, एकदम कंपने लगते थे। एकदम उनको ज्वर-ताप चढ़ आता था। बड़े नेता थे। मैंने उनसे कहा कि आप जैसे लोग इस देश को नेतृत्व दे रहे हैं, कहां किस गड्ढे में गिराएंगे! सो गिराया इस तरह के लोगों ने। घसिट रहा है यह मुल्क गड्ढों में। चार कौड़ी के लोग छाती पर सवार हैं--जिनकी कोई न योग्यता है, न क्षमता है।
लेकिन हमारी आदतें गलत हैं। हमारे सोचने-समझने के ढंग गलत हैं।
मेरी बात उपद्रव लग सकती है। मगर मैं सीधा-साफ आदमी हूं। मुझे जो कहना है, जैसा कहना है, ठीक वैसा ही कह देता हूं । शिष्टाचार के कारण झूठ नहीं बोल सकता। सभ्यता और औपचारिकता के नाम पर झूठ नहीं बोल सकता। शिष्टाचार अगर सत्य के साथ मेल खाता हो तो ठीक, अगर नहीं मेल खाता हो तो शिष्टाचार जाए भाड़ में। सत्य अपनी जगह रहेगा और अपनी बात कहेगा।
और हमें जरूरत है, ऐसे लोग पृथ्वी पर अधिक संख्या में हों तो ही हम इस पाखंडी समाज को बदलने में सफल हो सकेंगे, अन्यथा बदलने में सफल न हो सकेंगे।
रंजन, दूसरों की दृष्टि में तो वह भी उपद्रव था; आज भी जो मैं कर रहा हूं, वह भी उपद्रव है। पुरी के शंकराचार्य से पूछो तो वे यही कहेंगे कि जो मैं कर रहा हूं, वह उपद्रव है। मेरा संन्यास उनके लिए उपद्रव है। उनको लगता है मैं संन्यास देकर संन्यास की सारी परंपरा को भ्रष्ट कर रहा हूं। उनको लगता है कि मैं भारतीय संस्कृति को नष्ट कर रहा हूं। वे भारतीय संस्कृति के पोषक, रक्षक--और मैं भा
रतीय संस्कृति को नष्ट करने वाला! उनको लगता है कि मैं लोगों को नास्तिक बना रहा हूं। मैं लोगों को भौतिकवादी बना रहा हूं। मैं लोगों को भोगवादी बना रहा हूं। स्वभावतः वे मुझे पर नाराज हैं।
कुछ आश्चर्य नहीं कि कोई धर्मांध आकर यहां छुरा फेंक कर मुझे मार डालने की कोशिश करे। यह बिलकुल स्वाभाविक है। उनको कुछ नहीं सूझ रहा है। जवाब उनके पास नहीं है। जवाब मैं बचपन से नहीं पा रहा हूं किसी के पास। अब तो बहुत मुश्किल है उनके पास जवाब होना। जब मैं छोटा था, तब भी मैंने जवाब नहीं पाए, तब भी मैं चकित हुआ, हैरान हुआ कि किस तरह के लोग छाती पर सवार हैं--जिनके पास कोई जवाब नहीं हैं! मगर लोगों को उन्होंने ऐसी गुलामी का पाठ पिलाया है, ऐसा जहर पिलाया है कि आज अगर स्वतंत्रता की बात करो तो उपद्रव मालूम होती है; अगर सत्य की बात करो तो बगावत मालूम होती है।
मगर मुझे विद्रोह से प्रेम है। मैं तो विद्रोह को ही धर्म मानता हूं।

अंतिम प्रश्न:
भगवान, मुल्ला नसरुद्दीन की लड़की का नाम क्या है?
रश्मि भारती! सवाल तो जरूर महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुल्ला नसरुद्दीन के लड़के फजलू के संबंध में तो काफी चर्चा हो चुकी। और तेरी बात भी ठीक है कि लड़की भी होगी मुल्ला नसरुद्दीन की तो गजब की ही होगी। गजब की ही है!
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन फरीदा से पूछ रहा था...फरीदा उसका नाम है। तुकबंदी रखनी पड़ती है न बच्चों के नामों में--फजलू, फरीदा।...फरीदा से पूछ रहा था कि अच्छा बताओ, ढब्बू जी ने चोरी की, इसका भविष्यकाल क्या होगा?
फरीदा बोली: इसका भविष्यकाल होगा कि ढब्बू जी जेल जाएंगे।
रमजान ने अपनी प्रेमिका फरीदा से कहा: फरीदा, माफ करना। कल मैंने तुमसे मिलने का वायदा किया था, परंतु मैं यह बिलकुल भूल गया कि कहां मिलने का वायदा किया था।
कोई बात नहीं। मैं भी भूल गई थी। मुझे इतना तो याद था कि किसी ने मिलने का वायदा किया है, परंतु यह भूल गई थी कि किसने मिलने का वायदा किया है। फरीदा ने जवाब दिया।
फरीदा ने अपने पति से तलाक लेने के लिए अदालत में बयान देते हुए यह दलील दी: मुझे विश्वास है कि मेरे पति मेरे प्रति वफादार नहीं हैं। मेरे एक बच्चे की शक्ल भी उनसे नहीं मिलती।
रमजान अपनी प्रेमिका फरीदा से पूछ रहा था कि क्या मैं ही वह पुरुष हूं, जिसका चुंबन तुमने सबसे पहले लिया है?
फरीदा बोली: हां-हां, तुम्हारा ही चुंबन मैंने सबसे पहले लिया है और तुम ही वह पुरुष हो जिसने मेरा चुंबन सबसे पहले लिया है। और यह भी मैं तुम्हें बता दूं कि यही चुंबन मुझे सबसे ज्यादा मधुर भी लगा।
रमजान का फरीदा से गाढ़ा प्रेम हो गया था। वह फरीदा को नई-नई वस्तुएं भेंट करता था--जैसे, मूल्यवान कपड़े, कीमती साड़ियां, इत्र, शैम्पू, रिस्ट-वॉच इत्यादि-इत्यादि। आखिर उसने फरीदा को शादी करने का वचन दिया। तिथि भी निश्चित कर ली। दुर्दैववशात्‌ फरीदा अचानक बीमार हो गई और उसको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। बीमारी की जांच-पड़ताल शुरू हो गई। डॉक्टरों ने कहा कि उसको रक्त देना जरूरी होगा, तब वह जल्दी सुधर जाएगी। उसका प्रेमी रमजान रक्त देने को तैयार हो गया। रक्त दे दिया गया और आहिस्ता-आहिस्ता उसको आराम पड़ने लगा। इसके पश्चात क्या हुआ, पता नहीं। लेकिन दोनों का प्रेम घटता चलता गया। झगड़े-झांसे शुरू हो गए। एक दिन रमजान इतना बिगड़ गया कि उसने फरीदा से कहा: कैसी बेईमान लड़की है तू! मैंने इतना तुझसे प्यार किया, कीमती वस्तुएं दीं! वे सब वस्तुएं मुझको वापस कर दो।
बेचारी ने सारी चीजें लौटा दीं। फिर भी रमजान बोला: मैंने तुमको मेरा रक्त भी दिया है, उसको भी वापस कर दो।
फरीदा जरा मुश्किल में पड़ी। फिर थोड़ी देर बाद सोच कर बोली: हर महीना थोड़ा-थोड़ा रक्त चुका दूंगी।

आज इतना ही।

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