प्रकाशक : OSHO Media International
भाषा : हिंदी
साधो! सहज समाधि भली। उसका अर्थ है, उसका अर्थ है कि जो बिलकुल सहज होकर देखेगा, उसे समाधि उत्पन्न हो जाएगी। विकार विलीन हो जाएंगे और भीतर से उसका जन्म होगा जो सत्य है। लेकिन यह किसी के पीछे जाने से नहीं होगा, अपने ही भीतर आने से होगा।
#1: चित्त की स्वतंत्रता
#2: चित्त की सरलता
#3: समाधि सत्य का द्वार है
#4: चित्त की शून्यता
मनुष्य-मनुष्य के बीच जो दीवाल है, वह शास्त्रों की है। और क्या कभी यह खयाल पैदा नहीं होता कि जो शास्त्र मनुष्य को मनुष्य से अलग करते हों, वे मनुष्य को परमात्मा से कैसे जोड़ सकेंगे? जो मनुष्य को मनुष्य से ही तोड़ देता हो, वह मनुष्य को परमात्मा से जोड़ने की सीढ़ी कैसे बन सकता है? लेकिन हम सोचते हैं कि शायद वहां कुछ मिले। जरूर कुछ मिलता है। शब्द मिल जाते हैं। सत्य को दिए गए शब्द मिल जाते हैं और शब्द स्मरण हो जाते हैं। वे हमारी स्मृति में प्रविष्ट हो जाते हैं और स्मृति को हम ज्ञान समझ लेते हैं। स्मृति ज्ञान नहीं है। मेमोरी ज्ञान नहीं है। कुछ चीजें सीख लेना, स्मरण कर लेना, ज्ञान नहीं है। ज्ञान का जन्म बहुत दूसरी बात है। स्मृति का प्रशिक्षण बहुत दूसरी बात है। स्मृति के प्रशिक्षण से कोई पंडित हो सकता है, लेकिन प्रज्ञा जाग्रत नहीं होती। और ज्ञान तो सारे जीवन को क्रांति कर देता है। तो मैं आपको कोई उपदेश देने का किंचित भी पाप करने को तैयार नहीं हूं। जो भी उपदेश देते हैं, हिंसा करते हैं और पाप करते हैं। मैं कोई उपदेश देने को नहीं हूं। मैं कुछ थोड़ी सी बातें आपसे कहने को हूं। इसलिए नहीं कि आप उन्हें मान लें। क्योंकि जो भी कहता है मान लो, वह आपका दुश्मन है।
जो भी कहता है श्रद्धा कर लो, जो भी कहता है विश्वास करो, वह घातक है। वह आपके जीवन को विकसित होने से रोकेगा। जो भी कहता है विश्वास करो, वह विवेक के जागने में बाधा बन जाएगा। और हमने बहुत दिन विश्वास किया है और विश्वास का यह परिणाम है जो हमारी दुनिया है! इससे रद्दी दुनिया और हो सकती है? इससे ज्यादा करप्टेड? लेकिन हम विश्वासी लोग हैं और हमने बहुत दिन विश्वास किया है। और इससे ज्यादा बुरा मनुष्य हो सकता है, जो आज है? इससे सड़े हुए मस्तिष्क हो सकते हैं और ज्यादा, जैसे आज हैं? इससे ज्यादा पीड़ा और दुख और अशांति हो सकती है? लेकिन हमने बहुत दिन विश्वास किया है और सारी दुनिया विश्वास करती है--कोई इस मंदिर में, कोई उस मस्जिद में, कोई उस चर्च में; कोई इस किताब में, कोई उस किताब में; कोई इस मसीहा में, कोई उस मसीहा में। सारी दुनिया विश्वास करती है। लेकिन विश्वास के बावजूद यह परिणाम है। शायद लोग कहेंगे कि विश्वास कम है इसलिए यह परिणाम है। —ओशो