QUESTION & ANSWER

Saheb Mil Saheb Bhave 05

Fifth Discourse from the series of 10 discourses - Saheb Mil Saheb Bhave by Osho. These discourses were given during JUL 11-20 1980, Pune.
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पहला प्रश्न: भगवान,
ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंच गया कहां-कहां न स्वर्ग ही कुछ बोलता, न नरक द्वार खोलता हर आंख में मैं आंख डाल तस्वीर तेरी टटोलता पहुंच गया कहां-कहां सांसों के फासले हैं या कि दूरियां ही दूरियां न तुम ही कुछ हो बोलते मुख से जुबां न खोलते चलना है कब तलक मुझे यूं सबके दिल टटोलते तुम कहां और मैं कहां ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंच गया कहां-कहां जमीं से न मिल सका न पता आसमां लगा सका ढूंढा नहीं किधर-किधर तुम्हें मगर न पा सका अब ढूंढता हुआ मैं खुद को किधर-किधर निकल गया अरे, ये क्या हुआ कि पता तुम्हारा मिल गया तस्वीर तुम्हारी मेरे दृग में जैसे कस्तूरी रहती है मृग में
पार्थ प्रीतम कुंडू! यह कबीर का प्रसिद्ध वचन है: ‘कस्तूरी कुंडल बसै।’ लेकिन इसमें भी बात पूरी समाती नहीं; इसमें भी कुछ छूट जाता है। कबीर भी कहे तो, पर कह नहीं पाए। क्योंकि कस्तूरी और मृग में फासला है। कस्तूरी को मृग से अलग किया जा सकता है--किया जाता है। ऐसे ही तो कस्तूरी मिलती है। लेकिन तुमको तुमसे अलग किया जा सकता नहीं। तुममें उतना भी फासला नहीं है अपने से, जितना कस्तूरी में और मृग में होता है। कस्तूरी मृग में होती है, लेकिन मृग ही नहीं। और तुम जिसे खोज रहे हो, वह तुम ही हो। उतनी दूरी भी नहीं है। खोजने वाला ही खोज का लक्ष्य है।
इससे मुश्किल है।
इससे बड़ी मुश्किल है। अपने को ही देखने निकल पड़े हो। कौन देखेगा? दूसरे को देखा जा सकता है। देखने के लिए फासला चाहिए। अपने को कैसे देखोगे? वहां देखने वाला और दृश्य अलग नहीं। वहां द्रष्टा और दृश्य एक है। इस मौलिक सत्य को जब तक न समझ लो तब तक भटकाव ही भटकाव है। इसीलिए तो आदमी खोजता फिरता है।
और तुम ठीक कहते हो: ‘ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंच गया कहां-कहां!’
आदमी कहां-कहां नहीं पहुंच गया! चांद पर पहुंच गया। जल्दी ही और तारों पर पहुंच जाएगा। और तलाश एक है, खोज एक है--वही शाश्वत खोज; मैं कौन हूं, आदमी जानना चाहता है। क्योंकि जब तक जान न ले कि मैं कौन हूं, जीए कैसे; किस अर्थ जीए, किस प्रयोजन जीए? और बिना स्वयं को जाने जैसे भी जीएगा, उस जीने में भूल होगी, भ्रांति होगी। जिस दिशा में भी जाएगा, गलती होगी, चूक होगी। कुछ भी करेगा, गलत होगा। स्वयं को जाने बिना शुभ हो ही नहीं सकता।
पुण्य तो आत्म-ज्ञान की सुगंध है। और पाप है: आत्म-अज्ञान की दुर्गंध। इसलिए आत्म-अज्ञानी चाहे भी कि पुण्य करूं, तो भी कर नहीं सकता। जाएगा पुण्य करने, हो जाएगा पाप। बनाएगा मंदिर, बन जाएगा कुछ और। यूं ही तो इतने मंदिर बने हैं। फिर भी परमात्मा का मंदिर कहां?
श्री जुगलकिशोर बिड़ला मुझसे मिले थे। कहने लगे: मैंने इतने मंदिर बनाए।
मैंने कहा: जरूर बनाए, मगर सब बिड़ला मंदिर हो गए। तुमने तो बनाना चाहे थे परमात्मा के मंदिर, बन गए बिड़ला के मंदिर।
कहने लगे: बात तो सच है! मगर किसी और ने मुझसे कही नहीं।
मैंने कहा: कोई और तुमसे कहेगा भी नहीं। सच में तो जो मुझे उनसे मिलाए थे, सेठ गोविंददास, जब मैंने यह कहा तो वे मेरा कुर्ता खींचने लगे। वे मिलाए ही इसलिए थे कि जुगलकिशोर बिड़ला से मेरे काम के लिए बहुत सहयोग मिल सकता है। उन्होंने देखा कि यह मैंने पहला ही मामला खराब कर दिया। वे सेतु बना रहे थे सहयोग का और यह शुरू से ही बात बिगड़ गई। मैंने जुगलकिशोर को कहा कि आपको पता है, सेठ गोविंददास मेरे बगल में बैठे हैं, वही मुझे आपसे मिलाए हैं, वे मेरा कुर्ता खींच रहे हैं! वे कह रहे हैं, मत कहो, ऐसी बात मत कहो! तो जो आपके पास आते हैं, वे भिखारी होते हैं। मैं कुछ मांगने नहीं आया। मुझे कुछ चाहिए नहीं।
और जुगलकिशोर भी आदमी इस अर्थ में सच्चे थे। उन्होंने कहा कि मेरी आपकी बनेगी भी नहीं। कहने लगे: मैं भी चौंका, क्योंकि सेठ गोविंददास ने मुझसे यही कहा था कि उनके काम को कुछ सहायता की जरूरत है।
मैंने कहा: मुझे काम की कोई सहायता की जरूरत नहीं है। मैं प्रतीक्षा करूंगा उन लोगों की जो मेरे काम में सहयोगी हो सकते हैं। तब तक राह देखूंगा। मगर किसी शर्त पर सहायता नहीं। बेशर्त जब मुझे साथ देने वाले लोग आ जाएंगे, तब।
अब जुगलकिशोर तो जा चुके। होते तो उनको कहता कि अब मेरे लोग आ गए। अब मुझसे सहायता के लिए कोई शर्त नहीं है उनकी। उनको खयाल ही नहीं कि वे मेरी सहायता कर रहे हैं। यह प्रश्न ही नहीं उठता। यह बात ही लेन-देन की नहीं है। अब जो मेरा है, उनका है; जो उनका है, मेरा है।
तो मैंने उनको कहा कि आपके पास जो आते हैं वे तो क्यों कहेंगे! वे तो कहेंगे: और मंदिर बनवाइए। आपने महापुण्य कार्य किया। बैकुंठ में आपकी प्रतीक्षा हो रही है। स्वयं प्रभु माला सजाए, माला गूंथे बैठे हैं कि कब आप आओ और आपके गले में माला पहनाएं। इतने मंदिर किसी और ने बनाए हैं?
ऐसा ही हुआ था, भारत से चौदह सौ वर्ष पहले एक अदभुत संन्यासी, बोधिधर्म, चीन गया। सम्राट वू ने उसका स्वागत किया। वू ने बहुत से बुद्ध के मंदिर बनवाए थे--अनंत! और इतनी मूर्तियां! सारे चीन को बुद्ध की मूर्तियों से भर दिया था। और बहुत विहार। और लाखों भिक्षु उसके खजाने से भोजन पाते थे। वे सब उसकी प्रशंसा और यश के गीत गाते थे। स्वभावतः यही तो षडयंत्र है न्यस्त स्वार्थों के बीच में। यही तो तथाकथित धर्म और राजनीति की सांठ-गांठ है। सम्राट प्रसन्न था, भिक्षु प्रसन्न थे, और क्या चाहिए था? भिक्षु प्रंशसा कर रहे थे, सम्राट और-और खजाने खोल रहा था।
और जब बोधिधर्म चीन पहुंचा तो उसके बहुत पहले उसकी सुगंध पहुंच गई। यह बुद्ध की कोटि का व्यक्ति था, यह कोई साधारण भिक्षु नहीं था। यह उन असाधारण लोगों में से एक था जो कभी पृथ्वी पर होते हैं। सम्राट वू स्वयं अपने मंत्रिमंडल के साथ साम्राज्य की सीमा पर लेने बोधिधर्म को आया था। और उसने पहली ही बात यही पूछी, जो जुगलकिशोर बिड़ला ने मुझसे पूछी थी, कि मैंने इतने मंदिर बनवाए, यह पुण्यकार्य आप मानते हैं या नहीं? सम्राट वू ने यही पूछा था बोधिधर्म को।
जमाना बदल जाता है, आदमी की बुद्धि नहीं बदलती। वही की वही बुद्धि। मैंने जुगलकिशोर बिड़ला को यह घटना कही थी कि मैं आपको दोहरा दूं, यह बात हो चुकी है पहले, यह कुछ नई नहीं है। सम्राट वू ने कहा: मैंने इतने मंदिर बनाए बुद्ध के, इतने आश्रम, लाखों भिक्षु राजकोष से भोजन पाते हैं, सारे चीन को मैंने बौद्ध धर्म में दीक्षित कर दिया, बुद्ध-धर्म को दुनिया का सबसे बड़ा धर्म बना दिया, इस सबका मुझे क्या पुण्य-फल मिलेगा?
बोधिधर्म ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा--वैसे ही जैसे कोई न्यायाधीश किसी चोर को देखे--और कहा कि पुण्य! पुण्य बिलकुल नहीं! महानरक में गिरोगे!
वू तो बहुत चौंका, कहा: आप मजाक तो नहीं करते हैं?
बोधिधर्म ने कहा: तुमने जो भी किया है, वह अज्ञान में किया है। ये मंदिर तुमने अपने अहंकार के बनाए हैं। इसमें जो प्रतिमाएं हैं, बुद्ध की नहीं, तुम्हारे अहंकार की हैं। तुम नरक में पड़ोगे, महानरक में पड़ोगे।
पर सम्राट वू ने कहा कि और किसी भिक्षु ने ऐसा मुझे नहीं कहा। बोधिधर्म ने कहा: वे कहेंगे भी क्यों? वे तुम्हारे भोजन पर पलते हैं। तुम्हारा नमक खाते हैं। वे तुम पर निर्भर हैं। तुम उन पर निर्भर हो। इसलिए सांठ-गांठ चलती है। वे तुम्हारी प्रशंसा करते हैं, तुम उनकी प्रशंसा करते हो। वे कहते हैं: आप महान सम्राट हो। तुम कहते हो कि आप महान भिक्षु हो। वे कहते हैं कि आपको स्वर्ग में महापुण्य मिलेगा, पुण्य के बहुत फल मिलेंगे। आप उनके चरण धोते हो, वे आपका यशोगीत गाते हैं। मुझे इस सबसे कुछ लेना-देना नहीं है। इतना मैं तुमसे कह दूं कि जो व्यक्ति स्वयं को नहीं जानता, वह कुछ भी करे तो पाप है। वह कितनी ही नेकनीयत से करे, तो भी उससे पुण्य नहीं हो सकता।
आत्म-अज्ञान की दशा में जो भी कुछ किया जाएगा, वह सभी गलत हो जाने वाला है। क्यों? क्योंकि भीतर अंधेरा है। उसी अंधेरे से तो कृत्य निकलेंगे तुम्हारे। इसलिए तो मैं नीति का बहुत पक्षधर नहीं हूं। क्योंकि मेरी मान्यता है--नीति का अर्थ होता है: भीतर अंधकार है, रहने दो, ऊपर से चूना पोत लो।
जीसस ने कहा है: तुम्हारे पंडित-पुरोहित ऐसे हैं जैसे चूने से, ताजे-ताजे चूने से पोती गई कब्रें। भीतर लाशें सड़ी पड़ी हैं और ऊपर चूने से पुती हुई सुंदर-सुंदर कब्रें। उन पर जलाओ शमाएं। उन पर चढ़ाओ फूल! उन पर उगा दो गुलाब। सब झूठा है! उड़ाओ सुगंधें, धूप-दीप बालो, सब व्यर्थ है। भीतर सिर्फ मुर्दा है।
तुम कितने ही अच्छे कृत्य करो; कितनी ही पूजा, कितने ही पाठ, यज्ञ-हवन, सब क्रियाकांड रह जाएगा, क्योंकि भीतर अंधेरा है। और तुम कहीं भी जाओ, तुम गलत जगह ही पहुंचोगे। तुम्हें यही पता नहीं मैं कौन हूं, तो तुम कदम कैसे उठाओगे, दिशा कैसे चुनोगे? तुम नींद में चल रहे हो।
पहली बात, सबसे मौलिक बात, सबसे आधारभूत बात: स्वयं को जानना है। और स्वयं को जानने की विधि साहस चाहती है, दुस्साहस चाहती है। गौरीशंकर पर चढ़ जाना कठिन नहीं है और न चांद पर पहुंच जाना कठिन है--आखिर आदमी पहुंच ही गया--सर्वाधिक कठिन यात्रा है अपने भीतर आने की, कई कारणों से।
पहली बात: वही व्यक्ति स्वयं के भीतर पहुंच सकता है, जो नितांत अकेला होने को राजी हो। और वहां हमारी छाती कंपती है। हम भीड़-भाड़ के आदी हैं। हमें संगी-साथी चाहिए। जरा अकेले छूट जाते हैं, बैचेनी होती है। अकेलापन काटता है। अखबार पढ़ने लगते हैं, रेडियो खोल कर बैठ जाते हैं, टेलीविजन देखने लगते हैं। रोटरी-क्लब चले, लायंस-क्लब चले। होटल में जाकर बैठ जाएंगे। कुछ करेंगे। कहीं उलझाएंगे अपने को। क्षण भर अपने को अकेला न छोड़ेंगे। और जो अपने को अकेला नहीं छोड़ सकता, वह कभी अपने को पहचान न सकेगा। और अपने को इतना अकेला छोड़ना होता है कि व्यक्ति तो रह ही न जाएं, विचार भी न रह जाएं, वासनाएं भी न रह जाएं, स्मृतियां भी न रह जाएं। भीतर कोई धुआं न रह जाए, कोई ऊहापोह न रह जाए। भीतर बिलकुल ही सन्नाटा छा जाए। यूं गहन सन्नाटा, ऐसी चुप्पी, कि टूटे न टूटे! तब कहीं कोई अपने में डुबकी लगा पाता है। और तब पहचान होती है। उस पहचान के बाद जीवन में क्रांति हो जाती है।
तुम ठीक कहते हो पार्थ प्रीतम:
‘ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंच गया कहां-कहां!’
वह आसान था। सभी यही कर रहे हैं। चल पड़े हैं, खोज में निकले हैं। ऐसे मन को सांत्वना भी मिलती रहती है कि हम खोजी हैं। कोई शास्त्रों में खोज रहा है, कोई सत्यों को सिद्धांतों में खोज रहा है, कोई शब्दों की जोड़-तोड़ में खोज रहा है, कोई तर्कों के जाल में खोज रहा है। कोई पूजा में, पाठ में, अंधविश्वासों में, तरह-तरह की धारणाओं में। सभी खोजी हैं इस अर्थ में। मगर शून्य में कोई भी नहीं खोज रहा है। क्योंकि जो शून्य में खोजता है, तत्क्षण पा जाता है। शून्य में खोजने का अर्थ होता है: खोजने वाला ही मिट जाए, तब खोज पूरी होती है।
यह खोज बड़ी अनूठी है। यह खोज बड़ी विरोधाभासी है। यह यूं है जैसे पानी की बूंद सागर में उतर जाए। देखा है कभी सुबह-सुबह ओस की बूंद को कमल के पत्तों पर सूरज की रोशनी में चमकते हुए? अब सरकी तब सरकी! महावीर ने तो कहा ही है: आदमी का जीवन ऐसे है जैसे ओस की बूंद, घास के तिनके पर सधी; जरा सा झोंका हवा का आया कि गई। जरा पत्ता कंपा कि झील में डूब जाएगी। यूं मृत्यु तो तुम्हें डुबा ही लेगी। मृत्यु के पहले जो डूब सकता है, वही साहसी है, वही संन्यासी है।
मृत्यु तो सभी को डुबाती है, वह डुबाने में तुम्हारा कोई गौरव नहीं है। इसलिए तुम्हें फिर लौट आना पड़ता है। डूबे भी और क्या खाक डूबे! एक देह गई, दूसरी देह मिली। इधर से डूबे, उधर से उभरे। यूं मिटे, यूं बने। क्षण भर नहीं बीतता। इधर लोग अरथी सजा रहे होते हैं, उधर तुम किसी गर्भ में प्रविष्ट हो गए होते हो। इधर अरथी उठ भी नहीं पाती और उधर गर्भाधान हो जाता है। क्षण भर की देर लगती है--क्षण भर की भी कहनी ठीक नहीं; इधर श्वास टूटी कि उधर श्वास चली। यूं छलांग लगती है। क्योंकि सब पुरानी वासनाएं वैसी की वैसी हैं, पुरानी आकांक्षाएं वैसी की वैसी हैं। वे ही आकांक्षाएं तुम्हें इस शरीर में ले आई थीं, वे ही आकांक्षाएं तुम्हें नये शरीर में ले जाएंगी। कितने शरीरों में तुम रह चुके हो! कितनी बार जन्मे, कितनी बार मरे! और वही करते हो, बार-बार वही करते हो!
मैंने सुना, एक आदमी ने रातसपना देखा कि ‘हीरा’ नाम का घोड़ा कल होने वाली घुड़दौड़ में जीतने वाला है। उसने सारे पैसे इकट्ठे किए जितने उसके पास थे, अपने मित्र को साथ लिया और कहा कि चल, आज भाग्य का निपटारा है, इधर या उधर, सब दांव पर लगा देना है! हीरा नाम का घोड़ा जीतने वाला है, यह मैंने सपना देखा है। और एक बार नहीं देखा, रात में बार-बार देखा है। पता नहीं कितनी बार देखा है, कि मैं यह मान ही नहीं सकता कि यह सपना सिर्फ सपना है। यह घटना होने ही वाली है, मुझे भरोसा आ गया है। और इसलिए सब जितना इकट्ठा कर सकता था, सब दांव पर लगा देना है। आज लखपति होकर घर लौटूंगा। और तू साथ आ, मित्र है, तू गवाह रहेगा।
उसने अपने मित्र को कहा कि जा और यह सारा रुपया लगा दे ‘हीरा’ नाम के घोड़े पर। थोड़ी देर बाद मित्र आया। पूछा उसने कि लगा दिया, भाई? उसने कहा कि मैं तो हीरा पर ही लगाने जा रहा था, लेकिन जो आदमी दांव लगा रहा है, ले रहा है पैसे खिड़की पर, उसने कहा: पागल हुए हो! यह घोड़ा कभी आया ही नहीं। और यह कभी आएगा भी नहीं। मरियल घोड़ा! यह तो सदा आखिरी नंबर पर आता है। तुम होश में हो? अरे, मैं तुमसे कहता हूं कि अब जब तुम लगाने ही चले हो, सभी दांव पर लगाने ले आए हो, तो नंबर सात के घोड़े पर लगा दो। इसकी जीत सुनिश्चित है, बहुत बार जीत चुका है। और जब भी दौड़ा है, जीता है। और इसके मुकाबले कोई घोड़ा नहीं। मैं अनुभव से कहता हूं। सो मैं तो नंबर सात पर लगा आया।
छाती पीट ली उस आदमी ने कि तूने भी क्या मूर्खता की! कितना मैंने तुझसे कहा, ‘हीरा’ पर लगाना! मगर अब जो होना था सो हो गया। और जब घुड़दौड़ का आधे घंटे में रिजल्ट आया तो ‘हीरा’ आया नंबर एक। उस आदमी ने कहा: देखा? लगवा दी फांसी! और वह नंबर सात का सात ही नंबर पर आया, सातवें नंबर पर आया। सात ही घोड़े दौड़े थे कुल जमा। उसने कहा: करवा दिया बरबाद! बस, अब यह एक रुपया बचा है, सो ले जा और जाकर कोकाकोला ले आ कि अब पी लें और घर चलें।
वह आदमी गया और फैंटा लेकर आ गया।
तुझसे मैंने कोकाकोला कहा था!
उसने कहा कि वही आदमी फिर मिल गया। कहने लगा: कोकाकोला! अरे, यह जहर है! न मालूम कितने लोगों को कैंसर हो चुका, टी. बी. हो चुकी--कोकाकोला के कारण! और तू जानता है कोकाकोला का मतलब? कोका जहर है--कोकीन! सो बात मुझे उसकी जंच गई। उसने कहा: फैंटा ले जा! यह चीज स्वास्थ्यवर्द्धक है। सो मैं फैंटा ले आया।
उसने कहा: ठीक है, अब जो ले आया सो ठीक है। फैंटा पी लिया। अब चलें घर। चलने के पहले भूख लगी है तो उसने चार आने पैसे, उसने कहा: बस अब ये आखिरी हैं। सब तो तूने बरबाद ही करवा दिया; जिस घोड़े पर कहा, दांव न लगाया; कोकाकोला कहा, कोकाकोला न लाया, यह फैंटा ले आया; अब तू मूंगफली खरीद ला कि थोड़ा पेट में वजन पड़े और घर चलें, अब सोचें आगे का, क्योंकि सब बरबाद हो गया!
वह तो फुटाने लेकर आ गया।
उसने कहा: तू कैसा आदमी है!
उसने कहा: वही आदमी फिर मिल गया। मैं भी क्या करूं? वह कहने लगा: मूंगफली! अरे, बिलकुल सड़ी बिक रही हैं। खरीदना ही मत! अब मैं तुझसे अनुभव की कहता हूं। हमारा तो काम ही यही है चौबीस घंटे। फुटाने ले जा! नये-नये हैं और अच्छे हैं। और अभी ताजे-ताजे चने आए हैं। सो मुझे उसकी बात जंच गई।
उस आदमी ने सिर पीट लिया। उसने कहा: तू कभी सीखेगा कि नहीं? वह आदमी तीन दफा धोखा दे चुका, बरबाद कर दिया उस आदमी ने, उसी की मान-मान कर चला आता है! तुझे अकल आएगी कि नहीं?
जब मैंने यह कहानी पढ़ी तो मुझे लगा कि यह कहानी तो आदमी के बाबत है। तुम क्या करते हो जिंदगी में? वही, जो कल किया था, आज; जो परसों किया था, जो पिछले जन्मों में किया है, जो बार-बार किया है। और उन्हीं लोगों की बातें मान कर। वे ही आदमी तुम्हें मिल जाते हैं। तुम ईसाई हो जाओ तो वे ही पादरी और तुम हिंदू हो जाओ तो वे ही पंडित और तुम मुसलमान हो जाओ तो वे ही इमाम और अयातुल्ला।
तुम वही करोगे तुम कहीं भी होओ। कुछ फर्क नहीं पड़ता तुम्हारे हिंदू, मुसलमान, ईसाई होने से। तुम जो भी करोगे? वह मूढ़तापूर्ण ही होगा। और उसके होने का बुनियादी कारण यह है कि तुम सदा और से पूछ कर करोगे, तुम्हारे भीतर तो कोई रोशनी की किरण नहीं। तुम्हारे भीतर तो कोई दीया नहीं जल रहा है। वहां तो अंधेरा छाया हुआ है। तो तुम पूछते फिरते हो, टटोलते फिरते हो, मांगते फिरते हो। और हाथ कभी कुछ नहीं लगता।
एक ही बात सीखने जैसी है कि बहुत खोज लिया बाहर, अब भीतर उतरो! और भीतर भी कस्तूरी पर मत रुक जाना, क्योंकि कस्तूरी भी भीतर दिखती है, है तो बाहर ही। क्योंकि कस्तूरी भी अन्य है, अनन्य नहीं है। वह तुम्हारी सत्ता नहीं है। तुम मृग हो। तो कस्तूरी का नाफा भी अगर तुम्हारे भीतर पड़ा है, तो भी तुम उससे अलग हो। नाफा तुमसे अलग है।
यह तो प्रतीक ही है जो कबीर ने कहा--‘कस्तूरी कुंडल बसै।’ यह तो समझाने के लिए कहा है। जैसे छोटे बच्चों को समझाते हैं कि आ आम का, कि ग गणेश का।... पहले हुआ करता था ग गणेश का, अब नहीं होता; क्योंकि अब भारतीय संविधान जो है, वह धर्म-निरपेक्ष है। और गणेश का ग कहो तो धर्म आ जाएगा। तो अब ग गधे का। क्या पतन हुआ--गणेश से गधे पर पहुंचे! गणेश में ऐसी कुछ बुराई न थी। देखने में जरा उलटे-सीधे लगते हैं, फिर भी गधे से तो बेहतर ही थे। मगर गधा धर्म-निरपेक्ष है, यह एक उसकी खूबी है। न हिंदू, न मुसलमान, न जैन, न बौद्ध। गणेश में थोड़ी धार्मिकता की गंध आती है।
तो गणेश नहीं चलता अब। मगर गणेश चले कि गधा चले, फर्क नहीं। बच्चों के लिए कुछ चाहिए, ग सीधा नहीं सीख सकते वे। गणेश का हो कि गधे का हो, लेकिन किसी का हो। मगर फिर जिंदगी भर पकड़े मत बैठे रहना, कि जब भी ग पढ़ो तो पहले कहो कि ग गणेश का कि ग गधे का और फिर आगे बढ़ो; फिर जो शब्द आए वह आ आम का, कि आ आदमी का और ह हौआ का। फिर पढ़ोगे कैसे? फिर ये आम, हौआ, और गणेश और गधे, इन्हीं में उलझ जाओगे। ये सिर्फ प्रतीक हैं।
कबीर यह कह रहे हैं कि मृग भटकता फिरता है जंगल में--और अक्सर मुश्किल में पड़ जाता है; क्योंकि कस्तूरी-मृग जो होता है, बारहसिंगा होता है, उसके बड़े सींग होते हैं। और जब वह भागता फिरता है तो सींग उसके झाड़ियों में उलझ जाते हैं। उसके प्राण संकट में पड़ जाते हैं। और तुम भी कितनी झाड़ियों में नहीं उलझ गए हो! तुम्हारे भी सींग कहां-कहां नहीं उलझ गए हैं! छूटना मुश्किल हो जाता है।
मैं एक प्रोफेसर को जानता हूं। वे किसी स्त्री को नहीं देखते। मेरे प्रोफेसर रह चुके हैं। वर्षा हो कि न हो, धूप हो कि न हो, वे छाता ही लगा कर चलते हैं। और छाता भी ऐसा लगाते हैं कि बिलकुल उनके सिर से ही लगा रहता है छाता, ताकि कोई दिखाई न पड़े--खासकर स्त्रियां।
मैं उनकी कक्षा में जब विद्यार्थी था तो मेरे साथ दो लड़कियां भी थीं। जब लड़कियां कक्षा में होतीं तो वे आंख ही नहीं खोलते, आंख बंद करके ही पढ़ाते। इससे मुझे तो बड़ा ही लाभ था। वे आंख बंद करके पढ़ाते, मैं आंख बंद करके सोता। कभी-कभी वे देख लेते होंगे। थोड़ा आंख खोल कर, तो वे सोचते होंगे कि मैं भी उन्हीं के सिद्धांत को मानने वाला हूं, कि मैं भी लड़कियों को नहीं देखता।
एक दिन यूं हुआ कि दोनों लड़कियां आई नहीं। मैं अकेला ही था। और मैं तो पुरानी आदत के हिसाब से, रोज के हिसाब से, सोता ही था वहां नियमानुसार, सो मैं तो अपना सो गया। मैंने खयाल ही नहीं किया कि लड़कियां आज आई नहीं हैं। और वे आंख खोल कर पढ़ाते रहे। जब उन्होंने देखा कि मैं अब भी आंख बंद किए हूं तो उन्हें थोड़ा शक हुआ। मुझे हिलाया-डुलाया, तो मैं जरा उठा; चौंक कर उठा। तो उन्होंने कहा: अरे, तुम सो रहे हो क्या? तो मैंने कहा: आप क्या समझते थे, इतने दिन से मैं कोई जाग रहा था! तो उन्होंने कहा: मैं तो यही सोचता था कि तुम भी लड़कियों को नहीं देखते, इसीलिए आंख बंद किए हो। मैंने कहा: मुझे लड़कियों और लड़कों से कुछ लेना-देना नहीं है। आप क्यों आंख बंद किए रहते हैं?
उन्होंने कहा: अब आज बात ही उठ गई और लड़कियां हैं भी नहीं,... इसीलिए तो मैं छाता लगा कर चलता हूं कि लड़कियां दिखाई न पड़ें। और लड़कियों से कभी नमस्कार भी नहीं करते थे वे। कोई लड़की कितना ही करे, मगर वे नमस्कार का जवाब भी न दें! मैंने कहा: आप जवाब भी नहीं देते। उन्होंने कहा: क्या खाक जवाब दूं! दस साल पहले एक लड़की को जवाब दिया था, सो अब तक भुगत रहा हूं। पांच बच्चे हो गए। खोपड़ी खाए जा रहे हैं। एक को नमस्कार का जवाब दिया था। उससे जो भूल हो गई, बस, वहीं ठहर गया हूं। अब आगे नहीं बढ़ सकता। न मुझे नमस्कार का जवाब देना है, न मुझे किसी स्त्री को देखना है। ये झंझट के ही काम हैं। ऋषि-मुनि ठीक ही कह गए हैं।
फिर इस तरह लोग घबड़ा जाते हैं! या तो जगह-जगह झाड़ियों में उलझ जाएंगे और या फिर उलझने से ऐसे घबड़ा जाएंगे! मगर यह घबड़ाने में उलझना हो गया। अब ये डर में उलझ गए। अगर पहले वासना में उलझे थे तो अब भय में उलझ गए। वही उलझाव रहा, झाड़ी बदली है। अब भी डरे हुए हैं, कंपे ह
ए हैं, घबड़ाए हुए हैं।
अब इस आदमी की जिंदगी तुम सोचो, कैसी मुश्किल की होगी! स्त्री को देखना नहीं है, आंख बंद रखनी है, छाता लगा कर रास्ते पर चलना है। बाजार नहीं जाते थे। सामान खरीदने किसी दुकान पर जाएं और कोई स्त्री मिल जाए तो वहां आंख बंद कर लें, जरा भद्दा मालूम पड़े। और कई दुकानों पर तो स्त्रियां सामान बेचने का काम करने लगी हैं। वहां नहीं जाते थे। किसी होटल में न जाएं, खाना नहीं खाएं। अगर उनकी पत्नी कभी मायके चली जाए तो वे खुद बेचारे पकाएं। उनसे खाना पकाते आए नहीं, तो बस दूध उबाल कर पी लें, केला इत्यादि खा लें, किसी तरह समय व्यतीत करें। इतने भयभीत हो गए!
तो कुछ तो हैं जो संसार में उलझ जाते हैं और कुछ हैं जो संसार की घबड़ाहट में त्याग-तपश्चर्या में उलझ जाते हैं। मगर उलझाव जारी रहता है। और दोनों ही बाहर हैं।
मेरा तुमसे कहना है: उलझने का प्रश्न ही नहीं है, सिर्फ जागने की बात है। कहीं खोजने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तुम जिसे खोज रहे हो वही तुम हो। ‘तत्वमसि’--उपनिषद कहते हैं कि तुम वही हो! खोजने वाले में ही खोज का गंतव्य छिपा है। जरा भीतर आंख खोलो और देखो।
अच्छा हुआ तुम यहां आ गए। क्योंकि यहां और किसी बाह्य आडंबर में उलझाने की बात नहीं है।
तुम कहते हो: ‘न स्वर्ग ही कुछ बोलता।’
हो तो बोले! स्वर्ग कहीं है थोड़े ही। सुख की तुम्हारी कामना का विस्तार है। तुम यहां भी सुख चाहते हो, परलोक में भी सुख चाहते हो। सुख की वासना का विस्तार है स्वर्ग। स्वर्ग कहीं है नहीं। इसलिए तो हर एक जाति का स्वर्ग अलग-अलग होगा; क्योंकि हर एक जाति की सुख की धारणा अलग-अलग होगी।
सुख की धारणा बहुत सी चीजों पर निर्भर होती--भूगोल पर, मौसम पर। अब तिब्बती स्वर्ग को ठंडा और शीतल नहीं मान सकता। ठंड से ही तो परेशान है। ठंड से ही तो मरा जा रहा है। और भारतीय का स्वर्ग तो शीतल ही होगा, वातानुकूलित होगा। उन दिनों वातानुकूल करने की कोई सुविधा नहीं थी जब शास्त्र लिखे गए, मगर शास्त्रों में वर्णन है कि स्वर्ग में सदा ही शीतल मंद बयार बहती रहती है। सदा! चौबीस घंटे! सूरज भी निकलता है तो भी ताप नहीं होती, आंच नहीं होती। अब भारतीय तो आंच से घबड़ाए हुए हैं, तपे जा रहे हैं, जले जा रहे हैं। पकाए दे रहा है सूरज उन्हें। तो स्वर्ग में तो शीतल मंद बयार बहेगी!--भारतीय स्वर्ग में!
तिब्बती स्वर्ग में बड़ी ऊष्मा है, गर्मी है। होना ही चाहिए, क्योंकि तिब्बती तो बर्फ से मरे जा रहे हैं। पानी छूने में प्राण निकलते हैं। तिब्बती शास्त्र कहते हैं: साल में एक बार स्नान जरूर करना चाहिए। जो साल में एक बार स्नान जरूर करने को मानते हों, उनके स्वर्ग में शीतल मंद बयार बह सकती है?--वहां तो सूरज निकलता है जगमग, ज्योतिर्मय, प्रकाश ही प्रकाश! और प्रकाश ही नहीं, ताप ही ताप!
तिब्बतियों के नरक में बर्फ जमी है! और बर्फ हमारे लिए तो अगर जमे तो स्वर्ग में जमनी चाहिए। शर्बत वगैरह बनाने के काम में आएगी। तिब्बती नरक में बर्फ जमी है। तिब्बती नरक, तुम जान कर हैरान होओगे, वहां आग की लपटें नहीं हैं। हमारे नरक में आग की लपटें हैं। चौबीस घंटे! कहां से इतना ईंधन आ रहा है! केरोसिन की कमी अगर हो रही है तो हमें लगता है कि भारतीय नरक की वजह से हो रही है। और नरक भारतीयों का नीचे है और जमीन में भरा हुआ है केरोसिन, पेट्रोल। तो वहीं से पाइप लगा कर वे नीचे-नीचे खींच लेते होंगे, ऊपर आने न दें। और नीचे उतारना सदा आसान है। सिर्फ पाइप लगा दिया कि धड़ाधड़ जलप्रपात की तरह केरोसिन और पेट्रोल टपकने लगा। ऊपर चढ़ाओ तो मशीनें लगानी पड़ती हैं चढ़ाने के लिए, पंप बिठालने पड़ते हैं, तब बामुश्किल चढ़ पाता है। चौबीस घंटे अनंतकाल से अग्नि-कुंड जल रहे हैं वहां। और आदमियों को बिलकुल पकौड़ों की तरह उबाला जा रहा है, तेल में पकाया जा रहा है। मरने भी नहीं देते, जिंदा भी नहीं रहने देते।
मगर तिब्बतियों का नरक, बिलकुल बर्फ ही बर्फ जमी है। वहां अगर मर कर पहुंचे तो बस, बर्फ में दबा दिए जाओगे। ले लेना मजा ठंडक का फिर वहां पूरा। फिर ठंडक ही ठंडक है अनंत काल तक।
तो प्रत्येक जाति का स्वर्ग और नरक उसके सुख और दुख की कल्पना हैं। तुम्हें जो दुख है, वह नरक बन जाता है। तुम्हें जो सुख है, वह स्वर्ग बन जाता है। कहीं न कोई स्वर्ग है, कहीं न कोई नरक है। नरक और स्वर्ग की धारणा धार्मिक धारणा ही नहीं है। मनोवैज्ञानिक विक्षिप्तताओं का एक रूप है।
सूफी फकीर स्त्री हुई, राबिया। एक दिन लोगों ने उसे देखा वह बाजार में भागी जाती है। एक हाथ में उसने मशाल ले रखी है और दूसरे हाथ में एक पानी से भरा हुआ घड़ा। लोगों ने पूछा राबिया: तू कहां भागी जा रही है? मस्जिद के सामने भीड़ लगी थी, वहीं राबिया रुकी, वहीं लोगों ने पूछा। उसने कहा कि मैं जा रही हूं कि चाहती हूं तुम्हारे स्वर्ग में आग लगा दूं और तुम्हारे नरक को पानी में डुबा दूं। क्योंकि जब तक तुम स्वर्ग-नरक की धारणाओं में उलझे रहोगे, तब तक तुम स्वयं को न पहचान पाओगे।
जो स्वयं को पहचान लेता है, वहां एक तीसरा आयाम शुरू होता है, जिसको हम मोक्ष कहते हैं, निर्वाण कहते हैं। यह शब्द दुनिया की और किसी भाषा में नहीं है, क्योंकि दुनिया के किसी भी कोने में धर्म की इतनी गहन खोज नहीं हुई, जितनी गहन खोज हमने की है। जितने गहरे हम पैठे हैं, जैसी हमने डुबकी मारी है, वैसा दुनिया में किसी ने भी नहीं डुबकी मारी। धर्म के मर्म को समझने में हमने जो राज खोले हैं, हमने जो रहस्य पाए हैं, वे किसी ने भी नहीं पाए। जैसे पश्चिम ने विज्ञान के राज और रहस्य पाए, ऐसे हमने धर्म के रहस्य और राज पाए।
ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी धर्म, तीन धर्म भारत के बाहर पैदा हुए। तीनों धर्मों में स्वर्ग और नरक के पार कोई बात नहीं है। तीनों धर्म मनोवैज्ञानिक तल पर ही समाप्त हो जाते हैं। भौतिकवादी वह है जो शरीर पर समाप्त हो जाता है। और ये तीनों धर्म मन पर समाप्त हो जाते हैं।
भारत ने भी तीन बड़े धर्मों को जन्म दिया है--हिंदू, जैन और बौद्ध। तीनों के पास धारणा है मोक्ष की। स्वर्ग और नरक की बात की है--उनके लिए, जो नासमझ हैं और अभी जो समझ न सकेंगे; जिन्हें अभी आ आम का और ग गधे का बताना जरूरी है; जिन्हें अभी बारहखड़ी पढ़ानी है। लेकिन जो जानते हैं उनके लिए स्वर्ग और नरकनहीं; उनके लिए--मोक्ष, निर्वाण।
मोक्ष और निर्वाण बाहर नहीं है, तुम्हारे अंतर्तम का नाम है, तुम्हारी आंतरिकता का नाम है। जिस दिन तुम मन से मुक्त हो जाओगे, उसी दिन तुम मोक्ष को पा लिए। उसी क्षण! यहीं और अभी भी पा सकते हो।
तुम कहते हो:
‘न स्वर्ग ही कुछ बोलता न नरक द्वार खोलता
हर आंख में आंख डाल तस्वीर तेरी टटोलता’
वह तुम टटोलते रहो। आंख में कितनी ही टटोलो, तुम्हें अपनी ही तस्वीर दिखाई पड़ेगी। आंख तो दर्पण है, उसमें तुम्हारा ही चेहरा दिखाई पड़ेगा--जितने गौर से देखोगे, तुम्हारा ही चेहरा दिखाई पड़ेगा। और तुम्हारा चेहरा तुम नहीं हो। सच तो यह है कि तुम्हारा असली चेहरा भी तुम भूल गए हो, मुखौटे लगा रखे हैं। एक से एक मुखौटे लोगों ने पहन रखे हैं, चेहरों पर चेहरे पहन रखे हैं। और असली चेहरा भी तुम्हें दिखाई पड़ जाए, तो भी चेहरा तुम नहीं हो, तुम चेहरे के भीतर छिपे हो। जिसको दिखाई पड़ रहा है, वह तुम हो। द्रष्टा तुम हो, दृश्य तुम नहीं हो।
इस सूत्र को गांठ बांध लो: द्रष्टा हो तुम, दृश्य तुम नहीं हो। इसलिए जो भी दृश्य हो जाए, समझ लेना कि यह मैं नहीं हूं। नेति-नेति! यह मैं नहीं हूं, यह मैं नहीं हूं--कहते जाना, निषेध करते जाना, इनकार करते जाना। यूं निषेध करते-करते जब वही शेष रह जाए केवल द्रष्टा, दर्शन कुछ भी न बचे, दृश्य कुछ भी न बचे, सिर्फ ज्ञाता मात्र रह जाए, साक्षीभाव मात्र रह जाए, तब जानना, आ गए मोक्ष के द्वार पर, आ गए स्वयं के द्वार पर। और उस एक को जानते ही सब जान लिया जाता है। उस एक को जानने की कला ही ध्यान है। और उस जानने के लिए जो संकल्प है, उस जानने के लिए जो समर्पण है, उसका नाम संन्यास है।
पार्थ, अब ध्यान में डूबो! अब संन्यास में रंगो! यहां से खाली हाथ मत लौट जाना। यहां से झोली भर कर लौटो।
कहते हो तुम:
‘सांसों के फासले हैं या कि दूरियां ही दूरियां
न तुम ही कुछ हो बोलते मुख से जुबां न खोलते
चलना है कब तलक मुझे यूं सबके दिल टटोलते’
जब तक तुम्हारी मर्जी हो। यह तुम्हारा निर्णय है। यह कोई दूसरा निर्णय नहीं कर सकता। मैं कहूं भी तो क्या होगा? मैं तो कहूं: अभी मुक्त हो जाओ, इसी क्षण! मगर तुम कहोगे कि जरा पत्नी से तो पूछ लूं। कि घर से पूछ कर नहीं आया। कि घर से जब चला था तो पत्नी ने कह दिया कि एक बात का ध्यान रखना कि संन्यासी होकर मत आ जाना। कि घर से जब चला था, तो मां एकदम रोने लगी थी और उसने कहा: और सब करना, मगर गैरिक वस्त्र पहन कर घर मत आ जाना। कि जब घर से चलने लगा था तो बच्चों ने कहा था: पापा, होश सम्हाल कर रहना वहां; क्योंकि कई दूसरों के पापा हैं, वे पागल होकर आ गए हैं। अपने को बचा कर आ जाना, जा तो रहे हो!
आ गए हो यहां, तो कविता करते-करते ही मत लौट जाना--कविता तो तुम वहीं कर ले सकते थे! और कविता प्यारी कर लेनी तो बहुत आसान है। मैं तो तुम्हें वह कला देना चाहता हूं कि तुम काव्य बन जाओ। कविता कब तक करते रहोगे? काव्य बनो! यह तुमने जो कहा है, यह तुम्हारा साक्षात्कार हो, यह तुम्हारी अनुभूति हो। जब आ ही गए हो, तो अब यूं ही मत चले जाना, अब बहाने मत खोज लेना।
मन बहाने खोजने में बहुत कुशल है। बहुत अदभुत उसकी क्षमता है। एक से एक बहाने खोज लेता है--और ऐसे बहाने कि लगें, बड़े प्रामाणिक, बड़े सार्थक। पहले तो मन यही कहेगा कि यह संन्यास और हमारी संन्यास की प्राचीन धारणा में बड़ा भेद है।
निश्चित ही भेद है!
प्राचीन संन्यास की धारणा व्यापक नहीं हो सकी। आंखें हैं, थोड़ा खोल कर आंखें देखो। प्राचीन संन्यास की धारणा व्यापक नहीं हो सकी--क्योंकि व्यापक नहीं हो सकती थी! आखिर कितने लोग संसार को छोड़ कर भागेंगे? और भागेंगे तो कहां जाएंगे? अगर सारे लोग भाग कर हिमालय पहुंच जाएंगे तो हिमालय पर भीड़ लग जाएगी जैसी यहां है। तब जिनको वहां भीड़-भाड़ से भागना है, उनको यहां भाग कर आना पड़ेगा।
अमरीका में यह घटना रोज घट रही है। अमरीका में छुट्टी के दिन सारे लोग भागते हैं एकांत की तलाश में। कोई पहाड़ चला, कोई समुद्र-तट पर चला। और समुद्र-तट पर तुम देखो! तस्वीरें तुमने देखी होंगी समुद्र-तट की। अमरीकी समुद्र-तट की तस्वीर देख कर ऐसा लगता है कि हे प्रभु, यह क्या हो रहा है? चलने-फिरने की भी जगह नहीं है। इतने लोग भरे हुए हैं--इससे तो घर में ही थोड़ा एकांत था। घर में भी थोड़ी जगह थी। अपनी छत पर ही धूप-स्नान ले लेते तो भी एकांत होता; यहां उतना भी एकांत नहीं है। स्त्रियां और पुरुष अपने-अपने छाते लगाए हुए पड़े हैं। सारा समुद्र-तट यूं भरा है कि क्या कोई बाजार भरा होगा! और आए थे एकांत की तलाश में!--मगर सभी चले आए। अब जब सभी चले आएंगे एकांत की तलाश में, तो बस्ती खाली।
जो समझदार हैं, वे रविवार की प्रतीक्षा करते हैं, कि जब सब चले जाएं तो मजे से अपने घर में बैठें। एकदम एकांत ही एकांत है। बाजार में बैठ जाओ बीच, तो एकांत है। क्योंकि सब मूरख तो गए समुद्र-तट। और समुद्र-तट पर जाने में लगी हैं कारें एक-दूसरे के पीछे, बंपर से बंपर। छह घंटे, आठ घंटे पहुंचने में लगेंगे, बजाते रहो हार्न, सुनते रहो हार्न! और आठ-दस घंटे लौटने में लगेंगे, और दो-तीन घंटे वहां भीड़-भाड़ में पड़े रहना, उलटे-सीधे थोड़े से रेत में हो लेना, जितनी जगह मिल जाए उतनी करवट बदल लेना--अगर मिल जाए जगह करवट बदलने की तो! नहीं
तो एक ही करवट पड़े रहना--और वही आइस्क्रीम जो गांव में मिलती थी, वहां खा लेना, और वही कोकाकोला जो गांव में मिलता था, वहां पी लेना, और वही अखबार जो गांव में पढ़ते थे, वहां खरीद कर पढ़ लेना, और वही मूरख जो यहां तुम्हें मिलते थे, उनके ही दर्शन वहां कर लेना, और फिर चले घर!
जितनी दुर्घटनाएं अमरीका में छुट्टी के दिन होती हैं उतनी किसी और दिन नहीं होतीं, चार गुनी ज्यादा। क्योंकि अनेक कारें टकराएंगी, अनेक लोग मरेंगे--यह अलग!
सारे लोग भाग कर अगर हिमालय जाएंगे, या सारे लोग अगर आश्रमों में रहेंगे, तो वहां भीड़ हो जाएगी!
पुराने ढंग का संन्यास सार्थक नहीं हो सकता। और फिर इन सारे संन्यासियों को पालेगा-पोसेगा कौन?
थाईलैंड की सरकार को नियम बनाना पड़ा है कि अब कोई भी सरकारी आज्ञा के बिना बौद्ध भिक्षु नहीं हो सकता। क्योंकि चार करोड़ की आबादी में अस्सी लाख बौद्ध भिक्षु हैं--करीब-करीब एक करोड़। मतलब चार आदमी में एक आदमी बौद्ध भिक्षु हो गया। उसका मतलब यह हुआ कि बाकी तीन आदमियों पर उसके भोजन, कपड़े, रहने के इंतजाम का नाहक जुम्मा आ गया। जिससे कुछ लेना-देना नहीं था, वह तुम्हारी छाती पर बैठा है। और अगर एकाध आदमी और हो जाए तो दो आदमी दो आदमियों की छाती पर सवार हैं। मतलब हर आदमी की छाती पर एक आदमी सवार है।
इनको कौन खिलाए, कौन पिलाए? इनकी हालत बुरी हो गई है! इनकी हालत दीन-हीन हो गई है! जो भिक्षु का गौरव था, गरिमा थी, वह कहां रही, खाक रही! इनकी भिखमंगों से बदतर हालत है। इनको लोग देख कर एकदम दूसरी तरफ मुंह कर लेते हैं। और जब किसी देश में सरकार से आज्ञा लेनी पड़े पहले, उस देश में संन्यास का क्या अर्थ रह जाएगा।
चीन में तो कानूनी रोक है कि कोई बौद्ध भिक्षु नहीं हो सकता अब। जो थे, उनको जबर्दस्ती काम में लगा दिया गया है। मुल्क भूखा मर रहा है! रूस में कानूनी रोक है। अब कोई ईसाई भिक्षु नहीं हो सकता कि चले आश्रम में। सब आश्रम बंद कर दिए गए हैं। यह सारी दुनिया में होगा। हिंदुस्तान में कोई पचपन लाख हिंदू संन्यासी हैं। इनके भोजन, इनके वस्त्र, इनके रहने-सहने का खर्च कौन उठाता है? और क्यों कोई उठाए? अगर तुम्हें मोक्ष जाना है तो तुम्हारे लिए दूसरे लोग मेहनत करके नरक जाएं, चोरी करें, चपाटी करें, तस्करी करें, ब्लैक मार्केट करें--और तुम्हें मोक्ष भेजें! ऐसा तुमने उन पर कौन सा उपकार किया है? और बड़े मजे की बात यह है कि तस्करी कोई करेगा और तुम मोक्ष चले जाओगे उसका माल खा कर! वह नरक में पड़ेगा और तुम मोक्ष जाओगे! अगर वह नंबर एक के नरक पड़ेगा, तो तुम नंबर दो के नरक में पड़ोगे, क्योंकि तुम उससे भी गए-बीते हो। तुम तस्कर का भी खून पी गए। और दूसरे का खून पीने में जरा खयाल रखना।
मैंने सुना है, एक आदमी को एक मारवाड़ी का खून दिया गया। बीमार था, मर रहा था बिलकुल; जब उसको खून दिया गया तो पुनरुज्जीवित हो उठा आदमी। उसने खुशी में उस मारवाड़ी को सौ रुपये का नोट दिया। मगर पंद्रह दिन बाद उसकी हालत फिर बिगड़ गई। वह मारवाड़ी फिर आया। उसको सौ रुपये का लोभ लग गया था। उसने फिर उसे खून दिया। जब उस आदमी को होश आया, तो उसने सिर्फ पच्चीस ही रुपये दिए। मारवाड़ी बड़ा हैरान हुआ। मगर उसने कहा: पच्चीस भी कुछ बुरे नहीं हैं, जितने दिए ठीक हैं। पच्चीस भी बहुत हैं।
पंद्रह दिन के बाद उस आदमी की हालत फिर खराब हुई, वह मारवाड़ी फिर आया। फिर उसने खून दिया। उसने पच्चीस भी नहीं दिए! उसने सिर्फ शुक्रिया कहा। मारवाड़ी ने कहा कि भई, कुछ दोगे नहीं? उसने कहा: अब क्या लेना-देना? अब तो मेरा भी खून मारवाड़ी का ही है। वह पहली दफा मैं मारवाड़ी नहीं था जब सौ रुपये दे दिए। दुबारा तुम्हारा खून दौड़ रहा था, पचास से ज्यादा मेरी हिम्मत न पड़ी। किसी तरह खींच-तान कर, सोच-विचार कर मैंने पच्चीस दिए। अब तो सिर्फ धन्यवाद। और चौथी दफे जरा सोच कर खून देना।
जाहिर है कि चौथी दफे अगर खून दोगे तो तुम्हारी जेब ही काट लेगा--जब तक तुम खून दोगे, तब तक वह जेब काट लेगा। अब वह खुद ही मारवाड़ी हो गया, अब वह क्यों तुम्हें...? जिसका तुम खून पीओगे, उसी जैसे हो जाओगे। यह बिलकुल स्वाभाविक है।
पुराने संन्यास की धारणा तो सार्थक नहीं हुई। और पुराने संन्यास ने काहिल, सुस्तों, आलसियों को, बेईमानों को आकर्षित किया। मुफ्तखोरों को, कामचोरों को आकर्षित किया। असृजनात्मक लोगों को, जो किसी भी तरह से दूसरों की छाती पर बैठ कर जी लेना चाहते थे, ऐसे लोगों को आकर्षित किया। उसने सृजनात्मक और प्रतिभाशील लोगों को आकर्षित नहीं किया। इसलिए पचपन लाख हिंदू संन्यासी हैं। मगर कितने इन पचपन लाख हिंदू संन्यासियों के जीवन में तुम्हें ध्यान की ज्योति जलती हुई दिखाई देती है? इनमें से कितने के जीवन में तुम्हें ईश्वर के साक्षात्कार का बोध होता है? इनमें से कितनों के जीवन में तुम्हें क्रांति का अनुभव होता है? कहां है वह अंगार? सब राख मालूम होते हैं। होंगे ही। ये हारे-पराजित लोग हैं। ये जिंदगी में नहीं जीत सके, तो अंगूर खट्टे हैं कह कर भाग गए हैं।
मेरे संन्यास की धारणा बिलकुल भिन्न है, बिलकुल नई है, नूतन है। आने वाले मनुष्य के लिए है, भविष्य के लिए है। मैं चाहता हूं ऐसा संन्यासी जो सृजनात्मक हो, सक्रिय हो, निर्माण करता हो, अपने पैरों पर खड़ा हो। भिखमंगा न हो, भिखारी न हो। सच में ही मालिक हो, स्वामी हो, सिर्फ कहने का स्वामी न हो। और दूसरों का स्वामी होने की चेष्टा में न लगा हो, अपना स्वामी हो। और जगत को कुछ दे जाए, कुछ दान कर जाए, जगत के सौंदर्य में कुछ जोड़ जाए।
और स्वभावतः तुम्हारे मन तो पुरानी धारणाओं से भरे होते हैं। तो तुम जब आते हो यहां, नये-नये आते हो--और तुम्हारा नाम तो मैं पहली दफा देख रहा हूं पार्थ, पहली दफा आए हो, नये ही मालूम होते हो, तो तुम्हारे मन में तो सवाल उठेंगे हजार, कि यह संन्यास तो हमारा पुराना संन्यास नहीं। और पुराने के हम बड़े मोही हैं। जो-जो पुराना है, सो-सो खरा है! जो-जो पुराना है, सो-सो सोना है! जैसे सत्य कोई शराब है कि जितनी पुरानी हो उतनी अच्छी।
सत्य तो नित-नूतन होता है, ताजा होता है। सत्य कोई शराब नहीं है, सत्य तो जागरण है। जैसे सुबह-सुबह आंख खुली! वह जो नई-नई ज्योति जागने की। जैसे सुबह-सुबह फूल खिला। जैसे सुबह-सुबह की ओस और उसकी ताजगी। जैसे नये-नये बच्चे का बोध।
यह संन्यास तो बिलकुल नया है। यह जीवन-विरोधी नहीं है। यह जीवन के प्रति अपार प्रेम से भरा है। मैं तो जीवन को ही परमात्मा कहता हूं। और कहीं खोजना नहीं है--न काबा में, न काशी में, न गिरनार में, न जेरुसलम में। खोजना है अपने में, क्योंकि जीवन तुम्हारे भीतर बह रहा है। कहां खोजने जाते हो? अपने में तलाश लो! और जब मिल जाए अपने भीतर तो बांटो, लुटाओ।
मेरे संन्यासी को बांटना है, लुटाना है। आनंद लुटाना है, आशीष लुटाने हैं।
कविता ही न रह जाए बात कहीं, यह मुझे डर है। इसलिए तुम्हें चेताता हूं, पार्थ। कविता वगैरह करने में तो हमारा देश बहुत कुशल है। हम सदियों से यही काम कर रहे हैं, यही गोरखधंधा कर रहे हैं। सुंदर से सुंदर गीत हम रच लेते हैं और जीवन हमारे असुंदर और कुरूप हैं। बात करानी हो हमसे तो हम आकाश की बातें करते हैं और सरकना हमें जमीन पर भी नहीं आता। हम तारों पर आंखें अटकाए रखते हैं और जमीन के गड्ढों में गिर जाते हैं। जमीन के गड्ढे हमें दिखाई नहीं पड़ते।
यूनान का एक बहुत प्रसिद्ध ज्योतिषी रात आकाश के तारों का अध्ययन कर रहा था और एक कुएं में गिर गया। कुएं पर पाट नहीं थी। गांव का छोटा सा कुआं था! चिल्लाया बहुत जोर से। पास में एक बुढ़िया का झोपड़ा था, वह आई। बामुश्किल उस बुढ़िया ने उसे निकाला। ज्योतिषी ने बहुत धन्यवाद दिया बुढ़िया को और कहा कि तुझे शायद पता नहीं कि मैं कौन हूं। मैं राज-ज्योतिषी हूं। बड़े-बड़े सम्राट दूर-दूर से मुझे बुलाते हैं। हजारों रुपये मेरी फीस है लोगों का भाग्य बताने की। मगर तेरा भाग्य मैं मुफ्त बता दूंगा। तू कल मेरे घर आ जाना। यह मेरा पता रहा।
उस बुढ़िया ने कहा: बेटा, पता तू अपने पास रख! मुझे तेरे घर नहीं आना और न मुझे तुझसे अपना भाग्य दिखाना है। अरे, जिसे अपने सामने का गड्ढा नहीं दिखाई पड़ता, वह क्या खाक मेरा भविष्य बताएगा! तुझे यह पता नहीं कि यह कुआं है, तुझे यह पता नहीं कि आज तुझे कुएं में गिरना है, तू क्या मेरा कल बताएगा! और तुझे इतनी भी अकल नहीं कि चांद-तारों पर आंखें टिकाए हुए चलेगा और गड्ढों में गिरेगा, कुओं में गिरेगा, स्वाभाविक है।
इस देश में यह घटना घटी है। हमारी आंखें आकाश पर टिकी हुई हैं, तारों पर टिकी हुई हैं। बातें तो बड़ी ऊंची। यूं हमसे उपनिषद बुलवा लो, यूं हमसे वेद की ऋचाएं दोहरवा लो, यूं हमसे गीता गवा लो, मगर हमें जीवन जीना नहीं आता। हम जीवन की कला भूल गए हैं। हमें पृथ्वी पर रहना नहीं आता। हम प्रेम का शास्त्र भूल गए हैं। हम ईश्वर को खोजते हैं स्वर्गों में और नरकों में, आकाशों में, पातालों में, अपने में झांक नहीं पाते। अपने से इतने दूर हो गए हैं।
इसलिए अच्छी-अच्छी बातों में मत खो जाना, पार्थ! अच्छी-अच्छी बातें खूब भटका लेती हैं, भरमा लेती हैं। अच्छी बातों में बड़ा जहर है। अमृत के लेबिल लगे हैं, जहर भरा है बोतलों में। जरा सोच-समझ कर पीना।
और चूंकि मैं बात सीधी-सीधी कह देता हूं, खरी-खरी कह देता हूं, इसलिए लोगों को बहुत चोट पड़ जाती है, लोग बड़े तिलमिला जाते हैं। मुझसे लोग नाराज हैं। उनका नाराज होना स्वाभाविक है, क्योंकि मैं उनकी व्यर्थ की बकवास से राजी नहीं हूं।
मैं तुम्हें भूमि पर खड़ा करना चाहता हूं, चांद-तारों की फिकर बाद में कर लेंगे। कविताएं बाद में हो लेंगी। पहले जीवन के शास्त्र को तो हम समझ लें। बांसुरी बाद में बजेगी, पहले भीतर तो हम अपने गीत को जगा लें। फिर तो बिना पैंरों में बांधे घूंघर और बजने लगते हैं। फिर तो तुम चौंक कर पाओगे कि पैरों में मैंने घूंघर तो बांधे नहीं, फिर यह झनन-झनन, यह आवाज कहां से आ रही है! कि बांसुरी तो मैंने उठाई नहीं और ये प्यारे स्वर कैसे गूंजने लगे! कि कंठ तो मैंने खोला नहीं और ये गीत कैसे झर आए!
तुम शांत हो जाओ, शून्य हो जाओ, ध्यान में डूब जाओ, तो परमात्मा तुमसे गाए। और तब कविता का अर्थ ही और होता है। तब ही उसमें अर्थ होता है। नहीं तो बस शब्दों का श्रृंगार है। जैसे कोई मुर्दा लाश को श्रृंगार कर दे, गहने पहना दे, फूल की मालाएं लगा दे, इत्र छिड़क दे। मर जाता है आदमी तो हम खूब इत्र छिड़कते, धूप-दीप जलाते, फूल बरसाते। मगर तो भी आदमी जी नहीं सकता, मर गया है। ऐसी ही हमारी कविताएं हैं--मुर्दा।
आ गए हो तुम यहां, जीवित होने की संभावना है। यहां एक रासायनिक प्रयोग चल रहा है जीवन-क्रांति का। उसमें भागीदार बनो। तुम्हारे भीतर जो बीज छिपा है, अंकुरित हो सकता है। आश्वासन है उसके अंकुरित होने का। मगर साहस तो तुम्हें करना पड़ेगा।
तुम पूछते हो: ‘कब तक भटकना होगा?’
जब तक तुम निर्णय न करोगे, संकल्प न लोगे। जब तक तुम अपने को दांव पर नहीं लगाओगे, तब तक भटकना होगा। आज लगाओ दांव पर, आज भटकाव बंद हो जाए।

दूसरा प्रश्न: भगवान,
जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने सुनी पर बात कुछ बन ही गई!
धर्म ज्योति! बात जब बनती है, तो ऐसे ही बनती है। न तो कुछ कहने से बनती है, न कुछ सुनने से बनती है। शिष्य और गुरु के बीच कहना और सुनना तो गौण है, असली बात तो न कही जाती और न सुनी जाती। जैसे एक दीये से ज्योति दूसरे दीये में सरक जाती है, बस ऐसे ही एक दीये से ज्योति दूसरे दीये में सरक जाती है। जिस दीये से ज्योति सरकती है, उसका कुछ खोता नहीं और जिस दीये को मिल जाती है, उसे सब-कुछ मिल जाता है। गुरु का कुछ खोता नहीं, शिष्य को सब मिल जाता है।
तू ठीक कहती है धर्म ज्योति--
‘जाने क्या तूने कही
जाने क्या मैंने सुनी
पर बात कुछ बन ही गई!’
मैं भी देख रहा हूं कि बात बन रही है। तुझे देखता हूं तो प्रसन्न होता हूं, आनंदित होता हूं। यह बड़े सौभाग्य से बनती है, बड़ी मुश्किल से बनती है। बनाए बनाए नहीं बनती। लोग लाख उपाय करते हैं तो नहीं बनती। लेकिन अगर कोई समर्पण कर दे अपना, सब छोड़ दे, तो बन जाती है। बन रही है तेरी बात। और बनेगी, और-और बनेगी। इस यात्रा का प्रारंभ तो है, अंत नहीं है। यह कली खुलती तो है, लेकिन खुलती ही चली जाती है। यह फूल फिर खुलता ही चला जाता है। फिर इसमें कोई अवरोध नहीं है, फिर यह अनंत है। फिर यह विस्तार इतना लेता है जितना आकाश का है। यह फिर परमात्मा जैसा ही विराट हो जाता है। इसमें से ही उदघोषणा उठती है--अहं ब्रह्मास्मि की, अनलहक की। उठेगी वह गंध भी, उठेगा वह गीत भी, जागेगी वह ऋचा भी।
तू चल पड़ी ठीक दिशा में! अब पीछे मुड़ कर मत देखना।

तीसरा प्रश्न:
भगवान, आप हर बार दर्शन के समय मुझे कहते हो: ‘अब तुम आ ही जाओ।’ मेरा यहां आने को मन भी बहुत है। फिर भी मैं हमेशा कि लिए क्यों नहीं यहां आ पाती? क्या मैं असुविधा से या नये से घबड़ाती हूं? क्या मुझमें साहस की कमी है? क्या है जो मैं चाहते हुए भी सदा के लिए आश्रमवासी नहीं हो जाती? भगवान, मुझे मेरी कमी बताओ।
नीलम! कोई कमी हो तो मैं बताऊं! कमी कुछ भी नहीं है। रही मेरे तुझसे यह बार-बार कहने की बात कि ‘अब तू आ ही जा’, उसका राज अलग है।
स्वेट मार्डन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं एक चित्र-प्रदर्शनी को देखने गया। वहां मैंने एक अदभुत चित्र देखा, जो मेरी समझ में आए भी और न भी आए। सो मैं टकटकी लगाए उसे देखता ही रहा, देखता ही रहा। उसका चित्रकार भी पास ही था। उसने मुझे बहुत देर तक चित्र के पास खड़ा देखा तो मेरे पास आया और पूछा: आपको कुछ पूछना तो नहीं है? यह चित्र मैंने ही बनाया है। आप बड़ी देर से टकटकी लगाए देख रहे हैं।
स्वेट मार्डन ने कहा: जरूर पूछना है। यह कुछ समझ में आता सा लगता है, कुछ समझ में नहीं भी आता। इस चित्र का राज जानना चाहता हूं। इस चित्र को तुमने शीर्षक क्या दिया है? इस पर शीर्षक लिखा हुआ नहीं है। चित्रकार ने कहा: शीर्षक मैंने जान कर इसको दिया नहीं। लेकिन अगर तुम पूछो तो इसका शीर्षक है: समय।
स्वेट मार्डन और चौंका--यह कैसा समय का चित्र है! क्योंकि चित्र में था एक आदमी, जिसका सिर बड़ा अजीब था, पीछे से बिलकुल गंजा, खोपड़ी बिलकुल सपाट, सिर्फ आगे बालों की एक कतार--वह भी आगे मुंह को ढांके हुए लटकी। मुंह दिखाई ही न पड़े, बस बाल ही बाल। और पीछे सिर बिलकुल सपाट। यह कैसे समय का चित्र है!
स्वेट मार्डन ने कहा: तुमने और उलझन में डाल दिया।
उस चित्रकार ने कहा: यह समय का चित्र इसलिए है कि समय को अगर पकड़ना हो तो आगे से ही पकड़ सकते हो, पीछे से नहीं। एक बार क्षण तुम्हारे सामने से गुजर गया, फिर पीछे से कितना ही पकड़ना चाहो, पकड़ने को चोटी भी हाथ नहीं लगेगी। खोपड़ी सपाट है। फिर हाथ फेरते ही रह जाओगे; हाथ मलते ही रह जाओगे। समय को पकड़ना हो तो अवसर आता उसके पहले पकड़ लेना होता है। समय के सिर पर बाल आगे की तरफ हैं, पीछे की तरफ नहीं।
यह बात मुझे भी प्रीतिकर लगी। समय को आगे से ही पकड़ना होता है।
नीलम, मुझे पता है कि तेरे आने की घड़ी करीब आ रही, आ रही, आ रही। और मैं समय को पहचानता हूं। सो मैं पहले से ही पकड़ लेना चाहता हूं। इसलिए तुझसे कहता हूं: अब तू आ ही जा! मैं पहले से ही कह रहा हूं कि अब तू आ ही जा, क्योंकि अब आने की घड़ी बिलकुल करीब आ रही है, अब ज्यादा देर नहीं है। तुझमें साहस की कमी नहीं है। साहस की कमी होती तो तू संन्यासिनी बन न सकती थी। असुविधा से भी तुझे डर नहीं है। मैं तुझे भलीभांति पहचानता हूं। जिन लोगों पर मुझे भरोसा है, उन थोड़े से लोगों में से तू एक है। मेरे चुने हुए थोड़े से लोगों में तेरी गिनती है। कोई कमी भी नहीं है। लेकिन फिर भी हर चीज का एक समय होता। जैसे वसंत आता और फूल खिलते।
समय करीब आ रहा है तेरा। किसी भी दिन आना हो जाएगा। मेरी तरफ से मैं तुझे निमंत्रण दिए जा रहा हूं, कि तुझे ऐसा न लगे कि मैंने तुझे अभी बुलाया नहीं है। तो जब समय आए, तो मेरी तरफ से तुझे पूरा आश्वासन रहे कि मैं तो तुझे बहुत बुला चुका हूं, इसलिए मेरी तरफ से कोई बाधा नहीं, मेरी तरफ से तेरा स्वागत है।
एक बहुत बड़े अरबपति, मार्गन से किसी ने पूछा कि तुम गरीब घर में पैदा हुए और तुमने इतनी अरबों की संपत्ति इकट्ठी कैसे की? तो मार्गन ने कहा: मुझे अवसर पहचानने की कला आती है। और जब अवसर आता है तो मैं तत्क्षण उस पर सवार हो जाता हूं। पूछने वाले ने कहा: अवसर तो मैं भी पहचानता हूं, मगर जब तक मैं पहचान पाता हूं तब तक अवसर निकल जाता है। फिर कितनी ही छलांग लगाते रहो, घोड़ा तो निकल ही गया। फिर कूदते रहो वहीं के वहीं। सवाल यह है कि पहले से कैसे पता चले कि अवसर आ रहा है? कि ऐसा न हो... क्योंकि अवसर ठहरता तो नहीं। वह तो भागा जा रहा है, जैसे तेज घोड़ा रफ्तार में तुम्हारे पास से गुजर रहा हो। तुम्हें दिखाई पड़े, दिखाई पड़े, तुम तैयारी करो, धोती इत्यादि खोंसो अपनी, लंगोट इत्यादि बांधो, साफा वगैरह कसो, श्रृंगार वगैरह करो, तब तक तो घोड़ा गया!
मुल्ला नसरुद्दीन से मैंने एक दिन पूछा: बड़े मियां बिलकुल तैयार बैठे हो, कहां जा रहे हो? कहा कि बंबई जा रहा हूं। मगर बड़े गुस्से में कहा। मैंने कहा: बात क्या है? बड़े नाराज हो! हवाई जहाज से जा रहे हो, ट्रेन से जा रहो हो, कार से जा रहे हो, काहे से जा रहे हो? कहा: हेलिकाप्टर से जा रहे हैं। मैंने कहा कि हेलिकाप्टर तो अभी यात्रियों के लिए चलते भी नहीं। मुल्ला ने कहा: चलने लगेंगे। जब तक मेरी पत्नी श्रृंगार करके तैयार होगी, चलने लगेंगे। तुम देख लेना, चलने लगेंगे। उसी लिए तो मैं भन्नाया हुआ बैठा हूं। अभी तो साड़ी ही तय नहीं हुई कि कौन सी पहननी है। फिर पहन कर भी बदल लेती है। फिर घंटों दर्पण के सामने खड़ी रहती है।
तुम अगर यूं श्रृंगार करोगे तो समय और समय के साथ आया अवसर तो तेजी से भागा जा रहा है, वह तो एक पल ठहरता नहीं! समय तुम्हारे लिए नहीं रुकेगा।
तो मार्गन ने कहा: समय तुम्हारे लिए रुकेगा नहीं। वह तो समय आया कि तुम छलांग लगा कर सवार हो जाना। और उसने कहा: यह आप भी खूब बात करते हैं! अरे, जब तक मैं पहचानूंगा कि आ गया, छलांग लगाऊंगा, तब तक तो वह जा चुका!
हमारे पास अच्छा शब्द है--‘आ गया।’ इसको दो ढंग से तुम लिख सकते हो। इसको अगर इकट्ठा लिखो--आगया, तो इसका मतलब होता है: आ गया। और इसको दो टुकड़ों में तोड़ दो--आ, गया--मामला खत्म! आ, गया! यह शब्द बड़ा प्यारा है। इसमें बड़ा राज है। दुनिया की किसी भाषा में ऐसा शब्द नहीं है कि जो इतने जल्दी अर्थ बदल ले। बस जरा सा तोड़ देना है ‘आ’ को ‘गया’ से। ‘वसंत आ गया,’ एक; और ‘वसंत आ, गया!’ यूं हवा की तरह चला जाता है।
तो मार्गन ने कहा: उसका राज है। और मार्गन ने जो कहा उसे तू समझ लेगी, नीलम, तो क्यों मैं तुझसे बार-बार कहता हूं; जब भी तू दर्शन करने आती है, तभी मैं तुझसे कहता हूं। अभी तू यहां है भी महीने-डेढ़ महीने से, आई भी नहीं, शायद इसी डर से नहीं आ रही है दर्शन को, क्योंकि तू आई और मैंने कहा। और तू लाख पूछे, तू आएगी, मैं कहूंगा, फिर भी कहूंगा कि अब तू आ ही जा!
तो मार्गन ने जो उत्तर दिया था, वह तुझे समझ लेना चाहिए। मार्गन ने कहा कि इसका राज एक है--उछलते ही रहो, कूदते ही रहो। तुम इसकी फिकर ही मत करो कि अभी घोड़ा आया है कि नहीं, तुम तो कूदते ही रहो! जब आया तब चढ़ जाना; नहीं आया तो कूदते रहना। यूं कवायद भी होगी। आ गया तो चढ़ गये और नहीं आया तो व्यायाम कर रहे हैं।
ऐसे जब भी तू आती है, तो मैं कहता हूं: अब तू आ ही जा! तू सिर्फ इतना ही समझना कि मेरी आदत कूदना है। जब आ जाएगी, तभी सवार हो जाएंगे। यूं तो सवार हो ही गए हैं, थोड़ी देर-अबेर है। वह मुझे भी पता है। क्योंकि जिस दिन मुझे लगेगा कि अब समय आ गया, उस दिन यह नहीं कहूंगा कि अब तू आ ही जा--तेरे को चेताए देता हूं--उस दिन कहूंगा: अब जाना मत! मामला खत्म! फिर दरवाजे के बाहर संत निकलने भी नहीं देगा। और तू ही पंजाबी नहीं है, संत भी पंजाबी है।
और संत कृपाण चलाने में बड़ा कुशल है।
जब पहले-पहले संत आया था, तो ध्यान वगैरह करता ही नहीं था, एकदम कृपाण चलाता था। ध्यान क्या करता था, आस-पास बिलकुल मैदान साफ हो जाता था, खाली कर देता था, ऐसी कृपाण चलाता था, चारों तरफ! मुझसे लोग आकर कहते भी थे कि भई, यह किस तरह का ध्यान करता है?
मैं कहता: यह पंजाबी है। यह ध्यान कर रहा है, यही क्या कम है! करने दो। कृपाण चलाता है, चलाने दो। फिर इसका कृपाण का बेचना पुश्तैनी धंधा है। इसके बाप, बाप के बाप यही काम करते रहे हैं--कृपाण बनाना और बेचना। तभी तो उसको पहरे पर मैंने रखा है। वह हाथ से ही कृपाण चला दे, कृपाण की भी जरूरत नहीं है।
तो वह नीलम, तेरे को निकलने ही नहीं देगा। जिस दिन मैंने कहा कि बस, अब जाना मत, संत को खबर मिल जाएगी; कि फिर तू लाख उपाय कर, वह बाहर नहीं निकलने देगा। वह दोहरे काम करता है। जिसको कह देता हूं, भीतर मत आने देना, उसको भीतर नहीं आने देता; जिसको कह देता हूं, बाहर मत निकलने देना, बाहर नहीं निकलने देता। वह मुझको ही नहीं बाहर निकलने देता और किसी को क्या निकलने देगा!
कुछ कमी नहीं है तुझमें, सिर्फ समय का... थोड़ी देर और। और ज्यादा देर भी नहीं है। जल्दी ही तू पाएगी कि मैं कहूंगा कि बस, अब खत्म; अब जाना-करना नहीं। और वह मैं जानता हूं कि जिस दिन मैं कहूंगा, सब खत्म, अब जाना नहीं, उस दिन संत को रोकने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, तू जा नहीं सकेगी, तू इंच भर नहीं हिल सकेगी। उतना भरोसा मुझे मेरे संन्यासियों पर है!
अभी जर्मनी के प्रोटेस्टेंट चर्च ने मेरे खिलाफ एक किताब लिखी है। उसमें और खिलाफत में खोजने की बहुत कोशिश की है। लेकिन जिस आदमी ने लिखा है, उसको मेरी सारी किताबें पढ़नी पड़ी होंगी। पढ़ते-पढ़ते दिखता है वह प्रभावित हो गया। पढ़ते-पढ़ते कई बातें उसको जंच गईं। लेकिन वह है तो प्रोटेस्टेंट चर्च की सेवा में नियुक्त। पैसे तो उसको उसके मिलने वाले थे।
तो उसने लिखी तो है किताब, मगर किताब जाहिर करती है कि वह आदमी प्रभावित हो गया है। खूब प्रभावित हो गया है! इसलिए उसने कुछ बातें जो नहीं लिखनी चाहिए थीं, वे भी लिख दी हैं--जो कि वस्तुतः मेरी निंदा नहीं करतीं, खंडन नहीं करतीं, बल्कि अनजाने रूप से प्रशंसा ही करती हैं। उसमें एक बात उसने यह भी लिखी है कि और चाहे कुछ भी हो, एक बात तो हमें इस व्यक्ति और इस व्यक्ति के साथ चलने वाले संन्यासियों से सीखनी पड़ेगी कि आज पृथ्वी पर इसके संन्यासी इस व्यक्ति को जितना प्रेम करते हैं, उतना है कोई ईसाई जीसस को प्रेम करने वाला? तो हमें यह राज खोजना पड़ेगा कि बात क्या है? आखिर क्यों इतने लोग इस व्यक्ति को प्रेम करते हैं?
उस व्यक्ति ने यह अंगीकार किया है कि ये व्यक्ति अगर जरूरत पड़े तो मर सकते हैं, जीवन अपना गंवा सकते हैं। आज कौन है जो जीसस के लिए जीवन गंवाने को तैयार हो? उसने खुद ही अंगीकार किया है और कहा है कि इस संबंध में भी हमें शोध करनी चाहिए, कि क्या बात खो गई है?
आज महावीर को मानने वाले हैं, लेकिन कितने लोग महावीर के लिए जीवन गंवाने को राजी होंगे? और बुद्ध को मानने वाले हैं, कितने लोग बुद्ध के लिए जीवन गंवाने को राजी होंगे? लेकिन उसका कारण नहीं है कि बुद्ध और महावीर या जीसस में कोई कमी है। उसका कुल कारण इतना है कि जो लोग आज बुद्ध को मानते हैं, उन्होंने खुद तो माना नहीं बेचारों ने, उनके बापदादों ने मनवा दिया है। जो लोग जीसस को मानते हैं, उनको तो जीसस का कुछ पता नहीं, मां-बाप ने संस्कार डाल दिए हैं। मजबूरी है तो मानते हैं। औपचारिक मानना है।
तुम जो मुझे मान रहे हो, तुमने जो मुझे प्रेम दिया है, वह किसी मजबूरी में तो नहीं। सारी असुविधाओं के बावजूद दिया है। सारी मजबूरियां तुम्हें मुझसे तोड़ने के लिए हैं, मुझसे जोड़ने के लिए तो कोई मजबूरी नहीं है। मुझसे तोड़ने के लिए तो हजार कारण हैं--कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई ईसाई है, कोई जैन है, कोई बौद्ध है। मुझसे जोड़ने का तो क्या कारण है, सिवाय प्रेम के?
तो मैं जिस दिन कह दूंगा, नीलम, तुझे कि अब जाना नहीं, तू खुद ही नहीं जाएगी। तू भी उस दिन की प्रतीक्षा कर रही है, वह भी मुझे मालूम है। लेकिन अभी मैं तुझसे कह रहा हूं, अब तू आ ही जा। यह तब तक कह रहा हूं जब तक मुझे लगेगा कि अभी तेरी वहां जरूरत है। जिस दिन मुझे लगेगा वहां का काम पूरा हो गया, उस दिन कह दूंगा अब जाना नहीं, अब कहीं जाना नहीं। उस दिन तेरे लिए यह संसार ही, यह गैरिक संसार ही सब-कुछ होगा, तेरा संसार होगा।
और तू सौभाग्यशाली है, क्योंकि तेरे पति कुछ तुझसे कम मुझे प्रेम नहीं करते। तेरी एक ही बेटी है, वह तुझसे कुछ कम मुझे प्रेम नहीं करती।
सत्यप्रिया ने मुझसे पूछा है,... ठीक तेरे ही जैसा एक परिवार सत्यप्रिया का है। सत्यप्रिया के पिता, अद्वैत बोधिसत्व मेरे संन्यासी हैं। उसकी मां, कृष्णा मेरी संन्यासी है। उनको जब मैंने कह दिया कि बस आ जाओ, वे आ गए! न्यायाधीश के बड़े पद पर थे, लात मार दी!... उसने आज एक प्रश्न पूछा है कि ‘मैं आपको प्रेम करती हूं, मेरे पापा आपको प्रेम करते हैं, मेरी मम्मी आपको प्रेम करती हैं, आप साफ-साफ कहें कि हम तीनों में से कौन आपको ज्यादा प्रेम करता है?’
उसने मुझे मुश्किल में डाल दिया!
सत्यप्रिया, तुम तीनों मुझे एक-दूसरे से बढ़-चढ़ कर प्रेम करते हो!
और वही अवस्था नीलम के परिवार की है। वहां भी वही मुश्किल होगी अगर कोई मुझसे पूछ बैठे। अगर नीलम की बेटी प्रिया मुझसे पूछ बैठे कि कौन हम तीनों में से आपको ज्यादा प्रेम करता है, तो वही मेरी मुश्किल हो जाएगी खड़ी। एक-दूसरे से बढ़-चढ़ कर!
तो तू जिस दिन आ जाएगी, उस दिन तेरे पति यहां होंगे, तेरी बेटी यहां होगी। ठीक समय की राह देख रहा हूं। उस दिन कह दूंगा, बस, अब जाना मत!
कमी कुछ भी नहीं है। कमी किसी में भी कुछ भी नहीं है। आदमी पूर्ण ही पैदा होता है। उपनिषद कहते है: हम पूर्ण से आते हैं। और जो पूर्ण से आता है, वह पूर्ण है। और यही तो राज है कि पूर्ण से इतने पूर्ण पैदा होते हैं, फिर भी पीछे पूर्ण शेष रहता है। पूर्ण में कुछ कमी नहीं होती। पूर्ण का अर्थ ही यही होता है कि जिसमें से कितना ही निकाल लो, तो भी कुछ न निकले। और कितना ही डाल दो, तो भी कुछ न जुड़े। पूर्ण उतना ही रहता है, चाहे निकालो, चाहे जोड़ो।
हम सभी पूर्ण हैं, सिर्फ हमें होश नहीं। होश दिलाने का काम मेरा है। तुम्हें मैं पूर्ण नहीं बनाता, तुममें कोई कमी नहीं है जिसको पूरा करना है, पूरे तुम हो, सिर्फ तुम्हें पता नहीं--अपनी ही पूर्णता का तुम्हें पता नहीं।
विवेकानंद अक्सर एक कहानी कहा करते थे, वह कहानी प्रीतिकर है।
एक गर्भिणी सिंहनी ने छलांग लगाई एक चट्टान से दूसरी चट्टान पर। और छलांग में कुछ ऐसा हुआ कि उसका गर्भ गिर गया। ठीक समय होगा शायद बच्चे के पैदा होने का। बच्चा पैदा हो गया। वह तो छलांग लगा कर चली भी गई। नीचे से भेड़ों का एक झुंड गुजर रहा था, वह बच्चा भेड़ों के झुंड में गिर गया और भेड़ों ने उस बच्चे को पाल लिया। वे उसे दूध पिलाती रहीं। वह बच्चा भेड़ों में ही बड़ा हुआ। तो वह अपने को भेड़ ही समझता था, स्वभावतः, भेड़ों में बड़ा हुआ, भेड़ समझा। जैसे हिंदुओं में बड़े हुए तो हिंदू और मुसलमानों में बड़े हुए तो मुसलमान और ईसाइयों में बड़े हुए तो ईसाई। ऐसा ही वह सिंह भेड़ों में बड़ा हुआ, तो अपने को भेड़ समझता था।
बड़ा हो गया, सिंह था, मगर शाकाहारी था, घास-पात चबाता। और जैसे भेड़ों के मेमने घसर-पसर बीच-बीच में चलते हैं भेड़ियों के डर के मारे, बड़े बुजर्गों को आस-पास करके अंदर-अंदर घुसे रहते हैं, ऐसे ही वह भी घुसा रहता। लगता सबसे ऊंचा, अलग दिखाई पड़ता, दूर से दिखाई पड़ता! मगर उसे क्या पता? उसे क्या होश! और न भेड़ों को कुछ दिक्कत थी, क्योंकि उन्होंने उसे धीरे-धीरे बढ़ते देखा था, इसलिए पता ही नहीं चला था।
मैं एक आदमी को जानता हूं जिसके घर में भैंस का बच्चा पैदा हुआ, वह उसको रोज उठा कर टहलता। मैंने उससे पूछा: तू यह क्या करता है? उसने कहा कि तुम देखो; मैं बड़ी भैंस को उठा कर टहलना चाहता हूं, उसका अभ्यास कर रहा हूं। और उसने अभ्यास कर लिया। अब भैंस का बच्चा रोज-रोज बड़ा होता चला गया और वह रोज-रोज उसको लेकर टहलता गया। अभ्यास बढ़ता चला गया। उसको कभी पता चला नहीं कि बच्चा बड़ा हो रहा है। आखिर में जब बच्चा बिलकुल भैंस हो गया, तब भी वह उठा कर घूम सकता था उसको। ऐसे तुम भैंस को न उठा सकोगे। ऐसे उसको भी भरोसा नहीं आता था कि यह सफल हो जाएगा, मगर हो गया सफल। क्रमशः जो बात घटती है, उसका पता नहीं चलता।
तो न भेड़ों को पता चला, न सिंह को पता चला। सिंह समझता मैं भेड़ हूं, भेड़ें भी समझतीं अपना बच्चा है। है जरा कुछ अजीब सा, कुछ भिन्न सा लगता है, मगर कभी-कभी भिन्नता भी हो जाती है।
एक दिन एक सिंह ने उस भेड़ों के झुंड पर हमला किया। वह सिंह तो देख कर चौंक ही गया। उस सिंह को तो भरोसा ही नहीं आया। बूढ़ा सिंह था, जिंदगी गुजर गई, अपने को अनुभवी समझता था, आज पता चला कि क्या खाक अनुभवी हूं, यह क्या हो रहा है! भेड़ें भाग रही हैं, उनके बीच में एक सिंह भी घसर-पसर भागा जा रहा है! और मेमनों की तरह आवाज कर रहा है! वह सिंह तो भूल ही गया भेड़ों को पकड़ने की बात। वह तो इस सिंह को पकड़ने दौड़ा। मगर इसको पकड़ना भी बड़ा मुश्किल हुआ, क्योंकि वह सिंह भी भागा। था तो सिंह, भागा तेजी से! और जवान था! और यह बूढ़ा था। बामुश्किल पकड़ पाया। हांफ गया बूढ़ा, तब पकड़ पाया। और जब पकड़ लिया तो वह बिलकुल मेमने की तरह रोने-गिड़गिड़ाने लगा, मिमियाने लगा, कि मुझे छोड़ दो, कि मुझे मत मारो, कि देखो मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा!
उसने कहा: तेरे को कौन मार रहा है, कौन तेरे को कुछ कर रहा है? थोड़ा सुन भी तो!
वह कहे: मुझे कुछ सुनना नहीं, मुझे जाने दो। मेरे सारे संगी-साथी जा रहे हैं। मगर उस बूढ़े सिंह ने न सुना। उसे घसीट कर ले गया पास में ही एक पोखरे के पास, एक छोटी सी तलैया के किनारे और कहा कि मूरख, मेरे साथ आ! मगर वह घसिटता पीछे।
किसी तरह खींच कर उसको ले गया तलैया के पास और कहा कि देख झांक कर, हम दोनों के चेहरे झांक कर देख पानी में, यह पानी के दर्पण में देख! मजबूरी में देखा उसने। देखा तो दंग रह गया! एक जैसे चेहरे थे! और कई बार पानी में से गुजरते वक्त उसे भी शक-शुबहा तो उठा था कि उसका चेहरा भेड़ों के चेहरों से भिन्न मालूम पड़ता है, रंग-ढंग भी भिन्न मालूम पड़ता है, मगर सोचता था कि होगा, क्या करोगे, प्रकृति की भूल-चूक हो गई होगी। समझा लेता था मन को, संदेह को दबा देता था। आज बात बिलकुल साफ हो गई। और एक सिंहनाद उठा उसके भीतर से, प्राणों के प्राणों की गहरी से गहरी कोर से उठी आवाज, सारा जंगल दहल गया! उस बूढ़े सिंह ने कहा: अब तू समझा कि तू कौन है? उसने कहा कि मैं समझा। धन्यवाद! कितना अनुग्रह मानूं थोड़ा। न तुम मुझे घसीट कर लाते, न तुम इतना श्रम उठाते, न मैं समझ पाता। मैं भेड़ ही रहता और भेड़ ही मर जाता।
नीलम, कमी तो तुझमें भी कुछ नहीं, किसी में कुछ नहीं। तुम सब सिंह हो, मगर भेड़ों के बीच पैदा हुए हो, भेड़ों के साथ बड़े हुए हो, अपने को भेड़ ही मान कर बैठ गए हो। मेरा कुल काम इतना है कि किसी तरह घसीट कर तुम्हें दर्पणों के पास ले आऊं। तुम्हें पहचान करा दूं कि तुम कौन हो। एक बार तुम्हें होश आ जाए तुम कौन हो--और सिंहनाद उठेगा। और तत्क्षण जीवन बदल जाएगा। फिर कुछ ऐसा नहीं कि अभ्यास करना पड़ेगा कि अब भेड़ से हम सिंह कैसे हो जाएं। कुछ अभ्यास नहीं करना होता।
धर्म क्रांति है, अभ्यास नहीं। धर्म नया जन्म है, अभ्यास नहीं। जो अभ्यास करते हैं उनको धर्म का कभी पता ही नहीं चलता है।
इसलिए धर्म केवल सदगुरु के पास घटित होता है।
बुद्ध के पास जो थे, उनको घटित हुआ। उनको बुद्ध से ऐसा प्रेम था जैसे तुम्हारा मुझसे प्रेम है। वे बुद्ध के लिए मरते। जो जीसस के साथ थे, वे जीसस के लिए मरने के लिए तैयार थे। मगर जो ईसाई हैं आज, उनकी तो कोई जीसस से पहचान नहीं। और जो बौद्ध हैं आज, उनकी बुद्ध से कोई पहचान नहीं। जबर्दस्ती के बौद्ध हैं, जबर्दस्ती के ईसाई हैं, जबर्दस्ती के जैन हैं। औपचारिक हैं, पैदाइशी हैं, संस्कारगत हैं। उनका खुद का कोई चुनाव नहीं है।
तुमने मुझे चुना है! और तुमने चुना है सारी अड़चनों के बावजूद। समाज विरोध करेगा, तुम्हें मुश्किलें उठानी पड़ेंगी, तुम्हें हजार बाधाएं झेलनी पड़ेंगी। तुम्हारा अपमान होगा, अनादर होगा, लोग हंसेंगे, निंदा उड़ाएंगे; लोग तुम्हें जितनी तकलीफ दे सकते हैं, देंगे--और जैसे-जैसे मेरा काम फैलेगा, जैसे-जैसे मेरे संन्यासी फैलेंगे, वैसे-वैसे लोगों की तुम्हारे प्रति यातना देने की प्रक्रिया गहन होती चली जाएगी--लेकिन सारी अड़चनों के बावजूद भी तुमने निर्णय लिया है कि मेरे साथ रहना है। तुममें साहस है। दुस्साहस है! तभी यह प्रेम संभव हुआ है।
और कमी तो कुछ भी किसी में नहीं है। यही तो मेरी मौलिक उदघोषणा है कि तुम पूर्ण से आए हो और पूर्ण हो। वेद कहते हैं: अमृतस्य पुत्रः, कि तुम सब अमृत के पुत्र हो! वही मैं तुमसे कहता हूं, पुनः-पुनः--कोई कमी नहीं है। इसलिए कुछ भराव नहीं करना है। न कोई साधना करनी है, न कोई अभ्यास करना है; सिर्फ पहचान, प्रत्यभिज्ञा, एक बार अपने से मुलाकात करनी है।

आखिरी प्रश्न:
भगवान, क्या आप सच ही मारवाड़ियों की बुद्धि के कायल हैं? क्या मारवाड़ी होना सच ही में गौरव और गर्व की बात है? और क्या मैं भी मारवाड़ी हो सकता हूं?
कृष्णतीर्थ भारती! पहली तो बात यह कि जैसे कवि जन्म से कवि होते हैं, कोई कवि हो नहीं सकता, वैसे मारवाड़ी जन्म से मारवाड़ी होते हैं, कोई मारवाड़ी हो नहीं सकता। लाख उपाय करो, कच्चे रह जाओगे। किसी असली मारवाड़ी के हाथ में पड़ गए, धोखा खा जाओगे।
मारवाड़ियों को तो गैर-मारवाड़ी बनाया जा सकता है, मैंने अनेक को बना लिया है, यहां मौजूद हैं। जब मिले थे तो मारवाड़ी थे, अब बिलकुल मारवाड़ी नहीं हैं। मगर कोई कीमिया नहीं है दुनिया में, जो गैर-मारवाड़ी को मारवाड़ी बना दे। असंभव! यह बात बड़ी मुश्किल है, जो तुम पूछ रहे हो कि क्या मैं भी मारवाड़ी हो सकता हूं। हो भी गए तो नकली रहोगे। और कोई असली तुम्हें झटका दे जाएगा।
और मारवाड़ी हैं तो खूबी के लोग! बुद्धि की तो उनकी प्रशंसा करनी ही होगी! उसमें तो कोई शक ही नहीं है। कायल तो मैं हूं। बात गौरव और गर्व की ही है।
एक मारवाड़ी के संबंध में कुछ कहूंगा, ज्यादा की कहने की बात भी नहीं। कहावत है न कि हंडिया का केवल एक चावल देख लेना पड़ता है, पक गया तो सब पक गये! तो एक मारवाड़ी को पहचान लिया तो सब मारवाड़ी पहचान लिए। क्योंकि मारवाड़ी का गणित एक, उसका हिसाब एक, उसकी किताब एक।
चंदूलाल मारवाड़ी को तुम जानते हो, उसी को एक चावल की तरह चुन लें।
चंदूलाल मारवाड़ी मुल्ला नसरुद्दीन से बोला: बड़े मियां, पांच रुपये उधार दीजिए।
नसरुद्दीन ने कहा: परंतु मैं तो तुम्हें पहचानता भी नहीं हूं।
चंदूलाल ने कहा इसलिए तो आपसे मांग रहा हूं, क्योंकि पहचान के लोग मुझे उधार देते ही नहीं!
सेठ चंदूलाल की प्रेमिका उनसे पूछ रही थी कि इसका क्या सबूत है कि तुम मुझे प्रेम करते हो? चंदूलाल ने कहा: इसका सबसे बड़ा सबूत तो यही है, और इससे बड़ा क्या सबूत हो सकता है, कि जब कोई तुम्हें मूर्ख, चुड़ैल, कुतिया आदि कहता है तो मुझे एकदम क्रोध आने लगता है। और कल ही मुझे पता चला है कि बैंक में तुम्हारे दो लाख रुपये जमा हैं। अरे, अब और इससे ज्यादा क्या सबूत हो सकता है कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है!
मारवाड़ी की अपनी भाषा है, अपना ढंग है।
चंदूलाल गंजे हैं। नाई से बोले: मेरे सिर पर बाल तो बहुत कम हैं, तुम्हें मुझसे कम पैसे लेने चाहिए। पर नाई भी तो था मारवाड़ी, बोला: जी, मैं आपसे बाल काटने के पैसे तो लेता ही नहीं, बाल ढूंढने के पैसे ले रहा हूं।
एक दिन चंदूलाल ने मारवाड़ियों के कंजूस होने की बात सुनी तो उसे बहुत जोश आ गया। उसने तुरंत घर जाकर तिजोड़ी खोली और एक चमचमाता हुआ रुपया निकाला। मन में सोचा कि गर्मी के दिन हैं, आज इस रुपये का जूस पीता हूं। जूस की दुकान दूर थी, गर्मी बहुत थी, पर वह पैदल ही गया। भयंकर गर्मी के कारण उसके सारे शरीर से पसीना निकल रहा था। रुपये को उसने मुट्ठी में कस कर पकड़ रखा था। रुपया पसीने से भीग रहा था। जब जूस की दुकान पर जाकर उसने मुट्ठी खोली, तो रुपये पर आए पसीने को देख कर उसका हृदय पिघल गया। सारा जोश ठंडा पड़ गया। वहीं पर रोने लग गया। रुपये से बोला: तू मुझसे बिछुड़ना नहीं चाहता। अरे मेरे प्यारे, इसी कारण तो तेरे आंसू आ गए! भगवान लाख कहें, मैं इतना निर्दयी नहीं हो सकता।
वह तुरंत घर लौट आया और रुपये को वापस तिजोड़ी में बंद करके जो शांति उसे अनुभव हुई वह क्या लाख जूस पीने से अनुभव हो सकती थी! अमृत पीने से भी अनुभव नहीं हो सकती थी।
राखी के दिन एक ब्राह्मण ने चंदूलाल के हाथ पर राखी बांधी। चंदूलाल ने उसे एक पाई पकड़ा दी। ब्राह्मण ने सोचा चवन्नी दी होगी, परंतु हाथ पर घिस कर देखा तो बहुत बुरा लगा। उसने पाई वापस देते हुए कहा: पाई, पाई न पाई।
चंदूलाल किसी से कम तो नहीं। उन्होंने राखी लौटाते हुए कहा: राखी, राखी न राखी।
चंदूलाल मारवाड़ी एक दिन बड़े तैश में आकर पोस्ट मास्टर के पास पहुंचा और बोला कि जनाब, कुछ दिनों से मेरे पास बहुत धमकी से भरे हुए पत्र आ रहे हैं। मैं इस विषय में कुछ करना चाहता हूं।
पोस्ट मास्टर बोला: जरूर करिए चंदूलाल जी! डाक के द्वारा किसी को भी धमकी देना गैर-कानूनी है। लेकिन क्या आप धमकी भरे पत्र भेजने वालों का पता बता सकते हैं?
क्यों नहीं, क्यों नहीं! अरे, यही हरामजादे इनकम टैक्स वाले हैं! चंदूलाल मारवाड़ी ने जवाब दिया।
चंदूलाल और उनकी पत्नी रेल से उतरे और स्टेशन के बाहर जाकर अपनी पत्नी से बोले: देखो, तुम आखिर भुलक्कड़ की भुलक्कड़ ही रही। ये अपना छाता तो तुम वहीं डिब्बे में ही छोड़ आई थी। वह तो भला हो मेरा जो मुझे याद रहा, तो मैं अपने छाते के साथ-साथ तुम्हारा छाता भी उठा लाया।
चंदूलाल की पत्नी बोली: हाय राम! पर हम दोनों तो घर से छाता लाए ही नहीं थे।
चंदूलाल क्षण भर को चौंके, फिर बोले: भला हो रामजी का, जब देते हैं तो छप्पर फाड़ कर देते हैं।
चंदूलाल का पुत्र झुम्मन खुशी-खुशी घर में प्रवेश हुआ और चंदूलाल से बोला कि पापा, पापा, आज मैंने बस के पीछे भाग कर घर तक का सफर पूरा किया और पूरे पचास पैसे बचाए। अब तो मान गए न आप, कि हूं मैं भी आपका ही बेटा!
चंदूलाल ने उसे एक चपत रसीद की और कहा: अरे नालायक, तू एक न एक दिन मुझे तबाह करके छोड़ेगा। अरे मूर्ख, आखिर टैक्सी के पीछे भाग कर जब तीन रुपये बचाए जा सकते थे तो तूने बस के पीछे भाग कर केवल पचास पैसे बचाए! तुझे कब अकल आएगी? मारवाड़ी बच्चा होकर शर्म नहीं आती? चुल्लू भर पानी में डूब मर!
पांच साल बाद जब जेल से चंदूलाल का पुत्र बाहर आया तो देखा कि उसके पिताजी, जो उसे लेने आए हैं, उनकी दाढ़ी बहुत बढ़ गई है। उसने चंदूलाल से पूछा कि क्या बात है पिताजी, यह आपने दाढ़ी क्यों बढ़ा रखी है? चंदूलाल बोले: अबे नालायक, दाढ़ी न बढ़ाता तो और क्या करता? अरे, उस्तरा तो तू साथ ही ले गया था। भला बगैर उस्तरे के क्या कोई दाढ़ी बना सकता है?
मारवाड़ी के देखने, सोचने, परखने का अपना ढंग है। इसे तुम ऊपर से नहीं सीख सकते। इसे तुम अभ्यास नहीं कर सकते। कोई विश्वविद्यालय भी नहीं है, जो तुम्हें मारवाड़ी बना दे। छोटी-मोटी कंजूसी तुम सीख भी जाओ, मगर जो गहरी पहुंच मारवाड़ी की होती है, उसकी कंजूसी बिलकुल आत्मा तक पहुंची हुई होती है! यह कोई शारीरिक घटना नहीं है, आध्यात्मिक घटना है।
इसलिए, कृष्णतीर्थ भारती, तुम यह तो खयाल छोड़ ही दो मारवाड़ी होने का। और यूं भी यह खयाल कुछ अच्छा नहीं, खतरनाक है। क्योंकि अगर यह खयाल मन में रहा और मर गए, तो मारवाड़ी होओगे। ऐसे खतरनाक खयाल मन में रखना नहीं। क्योंकि कब मर जाओ, क्या पता! जीवन का कोई भरोसा है? आज है, कल नहीं। और मरते वक्त जो विचार रहता है, वही फलीभूत होता है। तो इस विचार को तो बिलकुल ही उखाड़ कर फेंक दो। इसको तो कभी भीतर घुसने ही मत देना। इसको तो बिलकुल ही बाहर रखो। इससे तो बच कर चलना।
मैं मारवाड़ियों की इसीलिए तो इतनी प्रशंसा करता हूं कि तुम्हारे भीतर मारवाड़ी होने का भाव ही न रह जाए। और तुम भी क्या समझ रहे हो! तुम समझ रहे हो कि तुम्हें भी मारवाड़ी होना है! तुम तो उलटा ही पाठ पढ़ गए! मैं क्या समझा रहा हूं और तुम क्या समझ गए। यह मारवाड़ी की जो मैं प्रशंसा कर रहा हूं, यह तो इसलिए, कि मारवाड़ी नाराज न हों, अन्यथा समझने वाले समझ ही लेंगे! जो समझदार हैं वे मारवाड़ी होना छोड़ देंगे।
और तुमने भी गजब कर दिया! तुम्हारे भीतर आकांक्षा जग रही है कि मारवाड़ी हो जाऊं! बचो इस खतरनाक विचार से।
कृपणता इस जगत में कितनी ही होशियारी की चीज हो, लेकिन गहरे में तो मूढ़तापूर्ण है। यूं दिखाई पड़ती हो बाहर-बाहर बड़ी होशियारी, लेकिन आदमी अपने को गंवा देता है और धन को इकट्ठा कर लेता है। ठीकरे इकट्ठा कर लेता है और खुद को खो बैठता है, खुद को लुटा बैठता है। तिजोड़ी भर लेता है और आत्मा खाली हो जाती है। मरता है, तब खाली हाथ, खाली आत्मा। और तिजोड़ी यहां भरी रह जाती है! तिजोड़ी को कौन साथ ले जाता है!
और मारवाड़ी तो बेचारा अभागा है! वह तो भोग भी नहीं पाता, ले जाना तो बहुत दूर। वह तो यहां भी नहीं भोग पाता, वह तो सिर्फ इकट्ठा ही करना जानता है। वह तो इकट्ठा ही करता रहता है।
मेरा मारवाड़ियों से बहुत संबंध रहा है। राजस्थान में बहुत मैंने यात्राएं कीं। और भारत में भी अलग अलग कोनों में बसे हुए मारवाड़ियों से मेरे संबंध रहे हैं। देख कर मैं चकित हुआ हूं जिनके पास करोड़ों हैं, वे यूं जी रहे हैं जैसे भिखमंगे हों। क्या सार तुम्हारे पास करोड़ों का? किसलिए इकट्ठे किए हो? सारी बुद्धिमानी इकट्ठी करने में ही निकल गई, भोगने के लिए कुछ बची ही नहीं।
और मैं तो कहता हूं: जीवन भोगने के लिए है। सच में वे ही लोग प्रतिभाशाली हैं जो यहां भी भोगते हैं और वहां भी भोगते हैं। और दोनों तरफ भोगा जा सकता है, क्योंकि परमात्मा परम भोग है। जीवन को सब अंगों में भोगो--देह में भी, मन में भी, हृदय में भी, आत्मा में भी। जीवन को उसके सब रूपों में भोगो। तभी तो सब रूपों में पहचानोगे। और तभी तो तुम्हारे जीवन में इंद्रधनुष के रंग आएंगे। तभी तो तुम्हारे जीवन में समृद्धि आएगी। समृद्धि धन के इकट्ठा करने से नहीं होती; समृद्धि होती है, जीवन को जो जितनी गहराई से भोगता है। हर चीज को भोगो! प्रत्येक क्षण को यूं भोगो कि कुछ उसमें बच न रहे; उसको पूरा-पूरा भोग लो, ताकि पीछे लौट कर देखने की जरूरत भी न रह जाए। उसे बिलकुल निचोड़ कर ही फेंक दो! क्योंकि समय जो हाथ से गया, गया, फिर लौट कर नहीं आएगा।
मैं तुम्हें भोगने की कला सिखाता हूं। और मेरे हिसाब में जो भोगने की कला जानता है, उसके ही जीवन में त्याग का फूल भी खिलता है। यह बड़ी अनूठी और बेबूझ बात है। मगर जीवन बड़ा अनूठा और बेबूझ है। जो भोगने की कला जानता है, वही त्यागने की कला जानता है।
मारवाड़ी तो इकट्ठा करने की कला जानता है, भोग नहीं सकता, इसलिए त्याग भी नहीं सकता। भोगा ही नहीं तो त्यागेगा क्या खाक! असल में भोगने में भी तो त्यागना पड़ता है। नहीं तो तुम भोगोगे कैसे? अगर तुम एक रुपया बचाना चाहते हो, तो फिर एक रुपये को भोग नहीं सकते। अगर जूस पीना है तो जूस पी लो और रुपया बचाना है तो रुपया बचा लो।
वह चंदूलाल ले आए लौटा कर अपना रुपया घर--देख कर उसके आंसू कि बेचारा कितना दुखी हो रहा है मुझे छोड़ने में! अरे, भाड़ में जाए ऐसा जूस! दो मील पैदल चल कर गए तो और जो जूस था, वह भी निकल गया; दो मील पैदल चल कर आया, कुछ और बचा था, वह भी निकल गया। और रुपया वापस तिजोड़ी में!
राह से चले जा रहे थे चंदूलाल, अपनी पत्नी के साथ, एकदम झपट्टा मार कर कोई चीज उठाई जमीन से और फिर एकदम जोर से फेंकी और कहा: यह अगर हरामजादा मिल जाए तो इसकी गर्दन काट लूं!
पत्नी ने कहा: मामला क्या है! कौन हरामजादा? किसकी गर्दन काट रहे हो? क्या उठाया, क्या फेंका? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया। इतनी जल्दी तुम करते हो धंधा, सौदा इशारों में हो जाता है!
उन्होंने कहा: अरे, कोई हरामजादा इस तरह खखारता है जैसे अठन्नी! अगर मिल जाए मुझे, गर्दन उतार लूं इसकी!
कृष्णतीर्थ, मारवाड़ी होने की कोई जरूरत नहीं है। अगर थोड़ा-बहुत कुछ हिस्सा तुममें मारवाड़ी हो--और जरूर होगा--वही तो फिर से पूरा मारवाड़ी हो जाना चाहता है। बीज है, पूरा वृक्ष बनना चाहता है। उसे अभी खाक कर दो। बीज को जला डालो। यह वासना रखना ही मत! इससे तो नरक में चले जाना बेहतर है, मारवाड़ी मत हो जाना! नरक में जिनको जगह नहीं मिलती, उनको मारवाड़ भेजते हैं। म्हारो देश मारवाड़! फिर वे एकदम मारवाड़ की तरफ आते हैं।
सावधान! अभी से सावधान! ऐसे खतरनाक विचार कभी मन में लेना मत, क्योंकि कभी-कभी ऐसे विचार जड़ जमा जाएं तो अनंत काल तक भटकोगे! मनुष्य ही भटकता रहता है, फिर मारवाड़ी का तो कहना ही क्या! मनुष्य होने में आदमी को चौरासी करोड़ योनियों में से गुजरना पड़ता है। अब तुम सोच लो कि मारवाड़ियों को कितनी करोड़ योनियों में नहीं गुजरना पड़ता होगा! चौरासी करोड़ तो साधारण आदमी! मारवाड़ी की योग्यता पाने के लिए तो समझ लो चार सौ अस्सी करोड़--कम से कम।

आज इतना ही।

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