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Sahaj Samadhi Bhali 17

Seventeenth Discourse from the series of 21 discourses - Sahaj Samadhi Bhali by Osho. These discourses were given during JUL 21 - AUG 10 1974, Pune.
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भगवान,
एक बार राबिया बीमार थी।
सहानुभूति में दो फकीर उसे देखने आए। एक थे हसन और दूसरे मलिक।
हसन ने कहा: ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।’
फिर मलिक बोले: ‘राबिया, फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं, वह मिले हुए दंड में भी खुशी ही मानता है।’
राबिया थोड़ी देर चुप रही।
फिर वह बोली: ‘मुझे माफ करना; लेकिन जब से मैंने खुदा को जाना है, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। तो फिर कैसी शिकायत? क्या सहना? और किसकी खुशी?’

भगवान, तीन फकीरों की इस परिचर्चा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
राबिया उन थोड़ी सी अत्यल्प, अंगुलियों पर गिनी जा सकें, ऐसी थोड़ी सी स्त्रियों में एक है--जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुई। पुरुषों में बड़ी संख्या है--बुद्धत्व को पाने वाले लोगों की। स्त्रियों में वैसी संख्या नहीं है। इसलिए राबिया का उठना-बैठना, उसका बोलना-कहना--सब मूल्यवान है। और यह छोटी सी चर्चा उसके बुद्धत्व की खबर देती है।
फकीर के तीन तल हैं; फकीरी के तीन मुकाम हैं। पहले तो हम साधारण आदमी को समझ लें, फिर इन तीन स्थितियों को समझ लेंगे। इस कहानी में ये तीन फकीर तीन स्थितियों के फकीर हैं। साधारण आदमी की स्थिति क्या है, मनोदशा क्या है?
साधारण आदमी--जब उसके जीवन में दुख आता है, तब शिकायत करता है। सुख आता है, तब धन्यवाद नहीं देता। जब दुख आता है, तब वह कहता है कि कहीं कुछ भूल हो रही है। परमात्मा नाराज है। भाग्य विपरीत है। और जब सुख आता है, तब वह कहता है कि यह मेरी विजय है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक प्रदर्शन में गया, अपने विद्यार्थियों को साथ लेकर। उस प्रदर्शन में एक जुए का खेल चल रहा था। लोग तीर चला रहे थे धनुष से और एक निशाने पर चोट मार रहे थे। निशाने पर चोट लग जाए तो जितना दांव वे लगाते थे, उससे दस गुना उन्हें मिल जाता था। निशाने पर चोट न लगे, तो जो उन्होंने दांव पर लगाया, वह खो जाता।
नसरुद्दीन अपने विद्यार्थियों के साथ पहुंचा; उसने अपनी टोपी सम्हाली; धनुषबाण उठाया; दांव लगाया। और पहला तीर छोड़ा। तीर पहुंचा ही नहीं निशान तक। लगने की तो बात दूर, वह कोई दस-पंद्रह फीट पहले ही गिर गया। लोग हंसने लगे। नसरुद्दीन ने अपने विद्यार्थियों से कहा, इन नासमझों की हंसी की फिकर मत करो। अब तुम्हें समझाता हूं कि तीर क्यों गिरा। लोग भी चौंक कर खड़े हो गए। वह जो जुआ खिलाने वाला था, वह भी चौंक कर रह गया। बात ही भूल गया। नसरुद्दीन ने कहा: देखो यह उस सिपाही का तीर है, जिसको आत्मा पर भरोसा नहीं, जिसको आत्मविश्वास नहीं। वह पहुंचता ही नहीं है लक्ष्य तक; पहले ही गिर जाता है। अब तुम दूसरा तीर देखो।
सभी लोग उत्सुक हो गए। उसने दूसरा तीर प्रत्यंचा पर रखा और तेजी से चलाया। वह तीर निशान से बहुत आगे चला गया। इस बार लोग हंसे नहीं। नसरुद्दीन ने कहा कि देखो, यह उस आदमी का तीर है, जो जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा हुआ है। और तब उसने तीसरा तीर उठाया और संयोग की बात कि वह जाकर निशान से लग गया। नसरुद्दीन ने जाकर अपना दांव उठाया और कहा: दस गुने रुपये दो। भीड़ में थोड़ी फुसफुसाहट हुई और लोगों ने पूछा: और यह किसका तीर है? नसरुद्दीन ने कहा: यह मेरा तीर है। वह पहला उस सिपाही का था, जिसको आत्मविश्वास नहीं है। दूसरा, उस सिपाही का था, जिसको ज्यादा आत्म विश्वास है। और तीसरा जो लग गया, वह मेरा तीर है।
यही साधारण मनोदशा है। जब तीर लग जाए, तो तुम्हारा; और जब चूक जाए, तो कोई और जिम्मेवार है। और जब तुम किसी को जिम्मेवार न खोज सको, तो परमात्मा जिम्मेवार है! जब तक तुम दृश्य जगत में किसी को जिम्मेवार खोज लेते हो, तब तक अपने दुख उस पर डाल देते हो। अगर दृश्य जगत में तुम्हें कोई जिम्मेवार न दिखाई पड़े, तब भी तुम जिम्मेवारी अपने कंधे पर तो नहीं ले सकते; तब परमात्मा तुम्हारे काम आता है। वह तुम्हारे बोझ को, दुख को अपने कंधे पर ढोता है।
तुमने परमात्मा को अपने दुखों से ढांक दिया है। अगर वह दिखाई नहीं पड़ता है, तो हो सकता है कि सबने मिल कर इतने दुख उस पर ढांक दिए हैं कि वह ढंक गया है; और उसे खोजना मुश्किल है।
हम शिकायत तो करते हैं साधारण जन, धन्यवाद कभी नहीं देते। सुख से अपने अहंकार को भर लेते हैं; दुख में परमात्मा से शिकायत कर देते हैं।
यह साधारण सांसारिक व्यक्ति की दशा है। इससे ऊपर उठी दशा उस फकीर की है, उस संन्यासी की है, जो दुख को स्वीकार कर लेता है; शिकायत नहीं करता। लेकिन स्वीकार में भी दुख तो दुख ही है। बे-मन से ही तुमने स्वीकार किया है; तुम किसी अहोभाव से नहीं भर गए हो। चाहते तो तुम थे कि यह न होता, लेकिन हुआ तो ठीक; जैसी परमात्मा की मर्जी। लेकिन विवशता है, मजबूरी है। तुम्हारे हृदय से कोई अहोभाव नहीं उठ रहा है, तुमने ऊपर से शिकायत नहीं की है, लेकिन भीतर शिकायत दबी पड़ी है।
तुम कितना ही कहो कि मेरी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन तुम्हारी आंखें, तुम्हारा व्यक्तित्व सब कहेगा कि शिकायत है। तुम यह कह रहे हो कि चीज तो बुरी है; न होती तो अच्छा था। अब हो गई है, तो हम स्वीकार करते हैं। लेकिन यह स्वीकार अधूरा है; ऊपर-ऊपर है। भीतर गहरे में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। और अगर तुम झांकोगे, तो तुम पाओगे कि भीतर कहीं इनकार है। उस इनकार को दबाने के लिए ही तुमने स्वीकार का उपयोग किया है। क्योंकि जब स्वीकार होता है, तो जीवन का फूल खिलता है। जब स्वीकार होता है, बिना इनकार के, तो तुम उस जगह पहुंच गए, जिसके आगे जाने को कोई जगह ही नहीं।
इसलिए फकीरों को तुम नाराज तो न देखोगे, लेकिन उदास देखोगे। मुनियों को, साधुओं को तुम नाराज तो न देखोगे, लेकिन हताश देखोगे। नाराजगी सांसारिक आदमी का लक्षण है, वह शिकायत कर रहा है। उसकी जो उदासी है, वह परमात्मा पर फेंक रहा है।
फकीर ने, संन्यासी ने यह काम बंद कर दिया। वह उदासी को परमात्मा पर नहीं फेंकता। वह राजी है कि ठीक है, लेकिन प्रसन्न नहीं है। न होता तो अच्छा था; हो गया तो राजी है। भीतर अस्वीकार है, बहुत गहरे में शिकायत है। ऊपर से आवरण है कि मेरी कोई शिकायत नहीं।
असल में जब तुम कहते हो कि मेरी कोई शिकायत नहीं तो तुमने शिकायत कर दी। अन्यथा तुम कहते क्यों? अगर सच में ही कोई शिकायत न थी, तो शिकायत नहीं है यह बात भी क्यों उठती? शिकायत हो गई। जब तुम किसी से कहते हो: मैं नाराज नहीं हूं तो तुम अगर सच में ही नाराज नहीं थे, तो यह बात ही क्यों उठती? यह तुमने कहा क्यों होता? इस कहने में तुमने नाराजगी ही जाहिर की है। लेकिन यह जाहिर करना अब सूक्ष्म है।
सांसारिक आदमी की नाराजगी स्थूल है; तुम्हारी नाराजगी सूक्ष्म है। सांसारिक आदमी इतना कुशल नहीं है, तुम ज्यादा कुशल हो। लेकिन परमात्मा की आंखों को धोखा देना तो आसान न होगा। वह तुम्हारे भीतर छीपी हुई शिकायत को भी देख रहा है। तुम उसे कितने ही वस्त्रों में ओढ़ लो और तुम कितने ही सुंदर आभूषणों में सजा लो, तो भी शिकायत, इतना हो सकता है कि नाराजगी न बने; लेकिन प्रसन्नता कभी नहीं बन सकती। और जब तक जीवन प्रसन्नता न हो, जब तक एक उत्फुल्लता का प्रवाह न हो, जब तक तुम नाच ही न उठो--तब तक कैसी फकीरी! तब तक कैसा संन्यास!
दूसरी स्थिति है: जब शिकायत के लिए प्रसन्नता है; जब शिकायत के लिए धन्यवाद है; जब दंड भी मिलता है, तो तुम पुरस्कार समझते हो। और जब परमात्मा तुम्हें गिराता भी है गड्ढों में, तो तुम बहुत गहरे में जानते हो कि उठाने के लिए ही उसने गिराया। तुम्हारी नजर उठाने पर रहती है। उसने कुछ सिखाने के लिए ही गिराया है। उसकी अनुकंपा है कि उसने तुम्हें चुना--गिराने के लिए। तुम पर उसका ध्यान है। उसने तुम्हें दुख दिया, तो तुम्हें ध्यान दिया; उसने तुम्हारी तरफ नजर की।
उसकी तरफ से आया हुआ दुख भी सौभाग्य है। तब अभिशाप वरदान बन जाते हैं; तब जीवन में एक प्रसन्नता आती है।
पहली घड़ी है: नाराजगी की। दूसरी घड़ी है: उदासी की। तीसरी घड़ी है: प्रसन्नता की कि तुम अहोभाव से भरते हो। एक अनुग्रह है तुम्हारे भीतर कि तूने मुझे दुख दिया; मेरी तरफ नजर की। मुझे इस योग्य माना कि दुख दे। मुझे बदलने योग्य समझा--मुझे काटने, निखारने योग्य समझा। मुझे पीड़ा दी, ताकि मैं निखर के निकल सकूं; जैसे सोना निखरता है आग से। तूने आग फेंकी, ताकि कचरा जल जाए और मेरा स्वर्ण प्रकट हो जाए। एक प्रसन्नता है।
ऐसा फकीर तुम्हें नाचता हुआ मिलेगा। तुम उसे दुख में न पा सकोगे। उसे दुख देने का कोई उपाय ही नहीं है। क्योंकि वह दुख को भी सुख में बदलने की कीमिया जानता है। अनुग्रह का भाव वह कीमिया है, वह जादू है, जिससे दुख सुख बन जाता है; अभिशाप वरदान हो जाते हैं; मृत्यु जीवन जैसी मालूम पड़ती है और अंधकार रोशन हो जाता है।
यह दूसरी स्थिति है; लेकिन यह अंतिम स्थिति नहीं है। क्योंकि जब तुम शिकायत में भी प्रसन्न होते हो, तब भी तुमने शिकायत तो स्वीकार कर ली।
पहला आदमी नाराज हुआ, दूसरा आदमी उदास हुआ, तुम प्रसन्न हुए; प्रतिक्रिया हो गई। माना कि तुम्हारी प्रतिक्रिया प्रसन्नता की है और पहले आदमी की प्रतिक्रिया नाराजगी की थी और दूसरे आदमी की प्रतिक्रिया उदासी की थी। लेकिन एक बात तीनों में है कि तुम तीनों ने रिएक्ट किया, प्रतिक्रिया की; तुमने कुछ किया। तुम्हारे करने में ही भूल है। चोट तो लगी है; एक नाराज हो गया है; एक उदास हो गया है। एक ने चोट पर फूल रख लिया है; उसने चोट को ढांक लिया। लेकिन ढांक तुम क्या रहे हो! तुम्हारी प्रसन्नता के पीछे क्या छिपा है? तुम किस बात का धन्यवाद दे रहे हो? अगर शिकायत ही न उठी थी, तो धन्यवाद कैसा!
सब धन्यवाद शिकायत का ही शीर्षासन करता हुआ रूप है। जब तुम धन्यवाद देते हो, तब तुम यही कह रहे हो कि तेरी बड़ी कृपा है। लेकिन अगर अकृपा मालूम नहीं पड़ी, तो कृपा कैसे मालूम पड़ेगी। और उसकी तरफ से आती हुई चोट नहीं दिखाई पड़ी, तो तुम उसे सुख में कैसे बदलोगे? माना कि अनुग्रह का भाव दुख को सुख में बदल देता है, अभिशाप को वरदान बना देता है; लेकिन इस कीमिया का उपयोग तो तुम तभी करोगे, जब अभिशाप दिखाई पड़ जाए। फिर तुम उसे बदलोगे वरदान में। दुख पकड़ में आ जाए, फिर तुम उसे सुख में बदलोगे। लेकिन पहली चोट दुख की हो गई। माना कि तुमने उसे बदला और तुम बड़े कारीगर हो, और तुम्हारे पास एक महामंत्र है। तुम्हारे जीवन में दुख न आएगा। तुम्हें कोई दुखी न कर सकेगा। तुम प्रसन्न रहोगे, नाचते रहोगे। लेकिन तुम्हारे नाच, तुम्हारे पदों में बंधे हुए घुंघरू से भी जो अंतिम अवस्था का आदमी है, वह जानता है कि शिकायत का स्वर उठ रहा है। अन्यथा तुम नाचोगे क्यों?
जिसने शिकायत ही नहीं की, वह धन्यवाद भी नहीं दे सकता। वह चौथी दशा है--वह बुद्धत्व की दशा है। वहां बुद्ध प्रतिक्रिया ही नहीं करते। न नाराज हैं, नाराजगी का अर्थ है: आक्रमक। न उदास हैं, उदासी का अर्थ है: अनाक्रमक। न प्रसन्न हैं; क्योंकि प्रसन्न फिर आक्रमक हो गया। उदासी मध्य में है। एक तरफ--नकारात्मक उदासी है, जो नाराजगी बनती है; शिकायत बनती है। एक तरफ--विधायक स्थिति है, जिसको कि हम प्रसन्नता बना देते हैं। फिर बुद्धत्व है--जो दोनों से शून्य है।
बुद्ध को किसी ने नाचते नहीं देखा। बुद्ध को किसी ने प्रसन्न भी नहीं देखा; उदास भी नहीं देखा; न कभी दुखी, न कभी सुखी; न कभी हंसते हुए, न कभी रोते हुए। बुद्ध को लोगों ने ऐसे देखा, जैसे वे हों ही न। क्योंकि जब तुम मिट जाओगे, तो कौन प्रतिक्रिया करेगा! कौन धन्यवाद देगा?
इन तीनों स्थितियों में एक बात समान है--वह है प्रतिक्रिया--रिएक्शन। और तब तीनों के पीछे अहंकार मौजूद है। क्योंकि प्रतिक्रिया कौन करेगा? तुम मौजूद हो, अभी तुम मिटे नहीं। कभी तुम नाराज थे, तब भी तुम थे। कभी तुम उदास थे, तब भी तुम थे। कभी तुम प्रसन्न हो, तब भी तुम हो; अहंकार मौजूद है।
ये अहंकार की ही तीन दशाएं हैं। अभी निर-अहंकार फलित नहीं हुआ, अन्यथा कौन कहेगा! राबिया उस चौथी दशा की सूचक है।
अब हम इस कहानी को पढ़ें।
‘एक बार राबिया बीमार थी।’
‘सहानुभूति में दो फकीर उसे देखने आए। एक थे हसन और दूसरे मलिक।’
दोनों प्रसिद्ध सूफी फकीर हैं।
हसन ने कहा: ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को उससे कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।’
ये शब्द समझने जैसे हैं। क्योंकि हसन ने समझा होगा कि राबिया की बीमारी परमात्मा के द्वारा दिया गया कोई दंड है। तो राबिया को सांत्वना देने के लिए उसने कहा कि ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे...।’ लेकिन बीमारी हसन को सजा जैसी मालूम पड़ती है! यह हसन पहली दशा में है। यह सांसारिक तो नहीं रहा है, संन्यासी हो गया है। लेकिन अभी संन्यासी पूरा नहीं हो पाया है; रास्ते पर है। अभी मंजिल नहीं आई है; अभी उसने पहला कदम ही उठाया है। और इसे पता भी नहीं है कि जिससे यह बात कर रहा है, वह मंजिल पर पहुंच गई है।
इसी हसन और राबिया के संबंध में एक घटना और है कि हसन एक बार राबिया के घर मेहमान हुआ तो उसने सुबह ही कहा कि कुरान कहां है? सुबह की प्रार्थना के बाद मैं सदा कुरान से कुछ पढ़ता हूं। तो राबिया ने कहा कि तुम ढूंढो। कहीं न कहीं घर में होगा! हसन को हैरानी हुई, उसने कहा: कुरान! और क्या इस तरह व्यवहार किया जाता है, कि कहीं न कहीं होगा! और क्या तुम रोज कुरान नहीं पढ़ती हो, जो तुम्हें पता हो कि कुरान कहां रखा है? राबिया ने कहा: पढ़ लिया एक बार। समझ लिया एक बार। फिर दुबारा पढ़ने का तो अर्थ यह होता है कि पहली दफा समझ में नहीं आया। फिर बात हो गई; फिर तब से कुरान...। तुम्हीं ने पूछा है, इसलिए कहा, होगा जरूर--था इस घर में। अगर कोई ले न गया हो, तो जरूर कहीं न कहीं पड़ा होगा।
हसन को बड़ी पीड़ा हुई। उसने कहा: पड़ा होगा! कुरान के लिए ऐसे शब्द। और जब हसन ने ढूंढा, तो निश्चित ही कुरान एक कोने में पड़ा था, उसमें बहुत दिन की धूल जम गई थी; किसी ने उसे छुआ भी नहीं था। उसने धूल झाड़ी और उसने कहा: राबिया, यह तो उचित नहीं है। फिर उसने कुरान पढ़ा, तो और हैरान हुआ; क्योंकि कई जगह कुरान में राबिया ने कुछ पंक्तियां काट दी थीं। इससे बड़ा कुफ्र नहीं, यह बड़े से बड़ा पाप है। कुरान में तरमीम--संशोधन? जैसे मोहम्मद से कुछ भूलें हो गई हों! उसने कहा: यह किस नासमझ ने कुरान में सुधार किए हैं? लकीरें कटी हैं! राबिया ने कहा: वे मैंने ही किए हैं। क्योंकि जब मुझे कुरान समझ में आया, तो लगा कि ये वचन ठीक नहीं हैं। जब तक समझ में नहीं आया था, तब तक सब ठीक था। क्योंकि इसमें लिखा है--इस वचन में कि शैतान को घृणा करो। लेकिन जब मैंने परमात्मा को जाना, तो घृणा असंभव हो गई। अब शैतान भी मेरे सामने खड़ा हो, तो घृणा करने का कोई उपाय नहीं है। अब तो शैतान खड़ा हो कि परमात्मा खड़ा हो, मैं प्रार्थना ही और प्रेम ही कर सकती हूं। इसलिए लकीर काट दी।
हसन, कहते हैं, छोड़ कर चला गया--उस कुरान को। उसने कहा: यह कुरान अपवित्र हो गया। सुधारा हुआ कुरान किसी ने सुना है! और राबिया, तू भ्रष्ट हो गई है।
पहली सीढ़ी पर खड़े हुए संन्यासी को, फकीर को अंतिम अवस्था का संन्यासी भ्रष्ट मालूम पड़ सकता है। क्योंकि जिसको वह बड़ी मुश्किल से साध रहा है, उसको यह आखिरी अवस्था का आदमी साधता ही नहीं। जिसके लिए वह बड़ी चेष्टा कर रहा है, यह उसकी चेष्टा ही नहीं करता।
जो नाच रहा है, वह अगर बुद्ध के पास जाएगा, तो वह यही साचेगा कि शायद यह आदमी उदास बैठा है, इसलिए नाचता नहीं है। वह शायद बुद्ध से कहेगा: उठो भी, नाचो भी, परमात्मा को धन्यवाद दो! उसे पता नहीं है कि आखिरी अवस्था में धन्यवाद खो जाते हैं, नाच खो जाते हैं।
एक बात समझ लें; उदासी के साथ ही प्रसन्नता जुड़ी है। जब उदासी खो जाती है, तब प्रसन्नता भी खो जाती है। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो आदमी उदास नहीं हो सकता, वह प्रसन्न कैसे होगा? और जिसकी आंखों से आंसू नहीं गिर सकते, वह हंसेगा कैसे? कठिन है? ये दोनों जुड़े हैं।
तुम रोते हो, तुम हंस सकते हो। तुम्हारी हर हंसी के पीछे आंसुओं का हाथ है। तुम्हारी हर हंसी में आंसुओं का स्वाद है। और अगर तुम गौर से देखोगे, तो तुम आंसुओं को भीतर छुपा पाओगे।
गांव में ग्रामीण स्त्रियां बच्चों को ज्यादा नहीं हंसने देतीं; क्योंकि वे कहती हैं: ज्यादा मत हंसो, नहीं तो रोओगे। क्योंकि बच्चा अगर ज्यादा हंस ले, तो फिर रोता है। क्योंकि जब एक चीज खत्म हो गई, तो दूसरा पहलू प्रकट हो जाता है। तुम भी अगर ज्यादा हंस लोगे, तो आंख से आंसू आने लगेंगे। कभी हंस के देखो तो तुम धीरे से पाओगे कि जब हंसी चुक जाती है, तो तुम उदास हो जाओगे। शायद इसलिए हम हंसने में कंजूसी करते हैं, हम उसे रोक-रोक कर खर्च करते हैं। क्योंकि डर है कि पीछे जो छिपा है, वह प्रकट न हो जाए।
नीत्शे का वचन है कि मैं हंसता रहता हूं, तो लोग समझते हैं: मैं बहुत प्रसन्न हूं, लेकिन जहां तक मैं जानता हूं, अपने बाबत, बात बिलकूल उलटी है। मैं इसलिए हंसता हूं कि कहीं रोने न लगूं। तो हंसी में रोने को छिपाए हूं। तुम्हारे सब नाच बहुत गहरे में शिकायत को छिपाए हुए हैं।
कहा हसन ने: ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे...।’
आखिरी अवस्था के आदमी को न तो कोई सजा है, न कोई पुरस्कार है। सजा और पुरस्कार तो तभी तक हैं, जब तक पुरस्कार की आकांक्षा है। दुख तो तभी तक दुख मालूम पड़ता है, जब तक सुख की वासना है। जब तक तुम फूल की मांग करते हो, तब तक कांटा कांटा जैसा लगता है। जब फूल की मांग ही छूट गई, तो कांटे की चुभन भी चली गई। कांटे की चुभन फूल की आकांक्षा में छिपी है।
तुम जो मांगते हो, उससे विपरीत मिल जाए, तो सजा मालूम पड़ती है। यह हसन मांगता तो होगा स्वास्थ्य, इसलिए बीमारी सजा मालूम पड़ती है। यह हसन मांगता तो होगा धन, इसलिए गरीबी सजा मालूम पड़ती है। यह हसन मांगता तो होगा शाश्वत जीवन, इसलिए मृत्यु सजा मालूम पड़ती है। इसका क्या अर्थ हुआ?
कोई चीज न तो सजा है और न पुरस्कार। तुम्हारी व्याख्या, तुम्हारी वासना पर निर्भर है कि वह कैसी दिखाई पड़ेगी। ‘राबिया सिर्फ बीमार है।’ हसन को दिखाई पड़ता है, यह सजा है। तथ्य तो इतना ही है कि राबिया बीमार है। इसमें सजा और पुरस्कार का क्या सवाल है!
तथ्य को हम सीधा क्यों नहीं देख पाते? हम क्यों अपने मंतव्य उसमें जोड़ते हैं?
यह हसन बीमार नहीं होना चाहता। यह हसन बीमारी से डरता है। यह हसन सदा स्वस्थ रहना चाहता है। और जो यह राबिया से कह रहा है, असल में वह अपने से ही कह रहा है। राबिया तो एक निमित्त है। वह अपना मन प्रकट कर रहा है। वह कह रहा है: ‘अल्लाह जो भी सजा दे, राबिया, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती।’ शिकायत हो गई। और क्या शिकायत होगी? सजा दी है अल्लाह ने--यह शिकायत हो गई। ‘शिकायत नहीं होती’, यह कहा कि शिकायत हो गई। बात ही समाप्त हो गई। वह उसे चुपचाप सह लेता है।
‘सह लेने’ का अर्थ क्या होता है? सह लेने का अर्थ होता है: तुम विरोध में हो। तुम खुशी को तो नहीं सहते! तुम सदा दुख को ही सहते हो। कोई नहीं कहता है कि मैं खुशी को चुपचाप सह लेता हूं। तुम कभी नहीं कहते कि मैं सौभाग्य को चुपचाप सह लेता हूं! तुम सदा दुर्भाग्य को ही चुपचाप सहते हो।
‘सहने’ का शब्द ही फकीर के ओंठों पर शोभा नहीं देता। सहिष्णुता--सह लेना--असहिष्णुता का एक रूप है। उसके पीछे विपरीत छिपा हुआ है। और फिर--‘चुपचाप...।’
चुपचाप का मतलब है: तुम दूसरे से न कहो, लेकिन अपने तईं तो तुम जानते ही हो। चुपचाप में दूसरे को पता न चलेगा; लेकिन तुमको भी पता नहीं चल रहा है? यह तो बात सही नहीं है।
चुपचाप सहने का अर्थ होता है कि मैं तो जानता हूं कि दुख है, लेकिन किसी को कहता नहीं हूं। क्योंकि क्या शिकायत करनी; फकीर का वह लक्षण नहीं। फकीरी सहज नहीं है--इस अवस्था में। जिसको कबीर कहते हैं: ‘साधो सहज समाधि भली’--वह यह समाधि नहीं है। हसन उस समाधि से परिचित नहीं है। हसन चेष्टा कर रहा है; और चेष्टा से जीवन की जो परम धन्यता है, वह कभी नहीं खिलती। चेष्टा से यही होने वाला है।
शिकायत करते थे, तो तुम उलटा साध लोगे कि शिकायत नहीं करते। दुख दुख जैसा मालूम पड़ता था, तुम कहते फिरते थे...। साधारण आदमी अपने दुख का रोना रोता रहता है। अगर तुम लोगों की बातचीत सुनो, तो नब्बे प्रतिशत दुख का रोना होती है। वे अपना दुख बताते फिरते हैं; बढ़ा-बढ़ा कर अपने दुखों की चर्चा करते रहते हैं। जैसे अपने घाव को उघाड़ने में कुछ बड़ा मजा आता है! या जैसे कि दूसरा तुम्हारे घाव को देख लेगा, तो कुछ राहत मिलती है! शायद सहानुभूति की आकांक्षा है कि कोई सहानुभूति दे। कोई कहे कि बहुत बुरा हुआ है, तो तुम्हारे मन पर मल्हम-पट्टी हो जाती है। इसलिए हम अपने दुख का रोना रोते हैं। लेकिन फकीर इससे उलटा करता है; वह अपने दुख को छिपाता है; वह रोता नहीं। वह किसी से कहता नहीं; चुपचाप सहता है।
लेकिन ‘चुपचाप’ का क्या मतलब है? तुम तो जानते हो, शायद दूसरे को पता न चले। लेकिन दूसरे को पता चलने का अर्थ भी क्या है? तुम्हें पता चल गया, बात खत्म हो गई। जहां तुमने जान लिया कि दुख है, सजा है, वहीं तुम छिपे अर्थों में संसारी हो गए।
फिर मलिक बोले: ‘राबिया, फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं। बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी ही मानता है।’ मलिक दूसरी अवस्था का फकीर है। हसन से थोड़ी दूर तक उसकी आंखें देखती हैं। हसन से थोड़ी दूर तक उसका हृदय धड़कता है। हसन से थोड़ी दूर तक उसकी समझ जाती है; पूरी नहीं जाती; लेकिन हसन से थोड़ी दूर जाती है। उसे थोड़ा सा साफ दिखाई पड़ा कि हसन थोड़ी गलत बात कह रहा है।
फकीर शिकायत मानता ही नहीं; वह उसका लक्षण ही नहीं है। मिले हुए दंड में भी खुशी मानता है--धन्यवाद देता है। वह कहता है: ‘तेरी कृपा है।’ मरता है, तो भी कहता है: ‘तेरी कृपा है।’ दुख आता है, तो भी कहता है: ‘तेरी कृपा है।’ जो कुछ भी घटता है, सभी को परमात्मा की कृपा मानता है। लेकिन जब सुख आता है तब, और जब दुख आता है तब, दोनों हालत में अंतर होता है या नहीं?
जब सुख आता है, तब वह कहता है: ‘तेरी कृपा है।’ और जब दुख आता है, तब भी कहता है: ‘तेरी कृपा है।’ शब्द बिलकुल एक जैसे हैं। लेकिन दोनों के पीछे छिपा हुआ मनोभाव भिन्न होगा या नहीं?
दुख आता है, तब चेष्टा से कहना पड़ता है कि तेरी कृपा है। सुख आता है, तब निश्चेष्ट भाव उठता है कि तेरी कृपा है। सुख आता है, तो कहने की कोई बात ही नहीं। बात जाहिर है कि तेरी कृपा है। दुख आता है, तो साधना करनी पड़ती है कहने की कि तेरी कृपा है।
दुख में अनुग्रह का भाव साधा हुआ है; वह सहज नहीं है; जैसा सुख में सहज है। अभी भी दुख मौजूद है। तुमने चेष्टा करके उसे छिपा लिया है। तुमने चेष्टा करके उसे छिपा ही नहीं लिया, तुमने चेष्टा करके उसको विपरीत में बदल दिया है।
पहला फकीर छिपाता है, दूसरा विपरीत में बदलता है। विपरीत में बदलना छिपाने की गहरी से गहरी तरकीब है। पहले फकीर में तुम देख लोगे थोड़ी उदासी तो पकड़ में आ जाएगी। दुखी नहीं होगा वह; छाती नहीं पीटेगा, रोएगा नहीं। लेकिन उसकी आंखें बता देंगी कि वह हताश है, उदास है। कहेगा नहीं। लेकिन बिना कहे भी तो कहने के बहुत उपाय हैं! कहना कोई जरूरी तो नहीं है।
और जब तुम चुपचाप होते हो, तब भी तो तुम बहुत कुछ कहते हो। कई बार तो ऐसा होता है कि जब तुम चुपचाप होते हो तभी कुछ कहते हो। कुछ बातें ऐसी हैं--बड़े सुख, बड़े दुख--जो बोल कर कहे ही नहीं जा सकते; तुम चुप हो जाते हो। घर में कोई मर जाए, तो कोई छाती पीट कर रोता है, कोई चुपचाप उदास बैठा है। और ध्यान रखना--जो छाती पीट कर रो रहा है, इसका दुख जल्दी विसर्जित हो जाएगा। यह दो-चार दिन में फिर ताजा हो जाएगा। इसने छाती पीट कर मामला हल कर लिया। लेकिन वह जो चुपचाप बैठा है, शायद जिंदगी भर चुपचाप बैठा रहे। उसका दुख स्थायी-भाव हो जाएगा। वह निकल ही नहीं पाएगा। वह उसमें भरा-भरा रह जाएगा। वह उसके रोएं-रोएं में समा जाएगा।
यह जो छाती पीट रहा है--तुम सोचते हो कि दुख के कारण पीट रहा है? यह दुख को उलीच रहा है। इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जब कोई मित्र दुख में हो, तो उसे पूरी तरह दुखी हो जाने दो। जितना वह दुखी हो जाएगा, उतने जल्दी दुख विसर्जित हो जाएगा। आंसू बह जाएंगे, हृदय हलका हो जाएगा। चीख-पुकार मचा लेगा, फिर जिंदगी में वापस लौट आएगा। कोई जिंदगी भर तो चीख-पुकार नहीं मचा सकता। और जिंदगी भर छाती भी नहीं पीट सकता। जिंदगी भर चिल्ला-चिल्ला कर रोना तो संभव नहीं है; लेकिन आदमी जिंदगी भर उदास रह सकता है।
तो जो दुख को जोर से शिकायत नहीं बनाते, जो दुख का रेचन नहीं करते, उनका दुख उदासी बन जाता है। इसे छिपाया नहीं जा सकता। दिखाई पड़ती है उदासी। और उदासी से बड़ी शिकायत क्या है? तुम्हारा होने का ढंग कहता है कि सब गलत है। तुम बोलते नहीं, तुम सब सह लेते हो। लेकिन तुम्हारा सहना कहता है कि सब व्यर्थ है।
उसे अगर ठीक से ही छिपाना हो, तो तुम्हें उलटा रूप लेना चाहिए: जहां रोने की जरूरत हो, वहां हंसना चाहिए; जहां लोग उदास बैठ जाते हैं, वहां तुम्हें पुलकित हो जाना चाहिए; जहां लोग छाती पीटते हैं, वहां तुम्हें नाचना चाहिए। ठीक उलटे में छिपाया जा सकता है।
लेकिन तब भी तुम बुद्धत्व की आंखों से न छिपा सकोगे। तब भी तुम साधारणजन की आंखों से छिप जाओगे। उनको लगेगा कि आश्चर्य है कि तुम प्रसन्न हो, आनंदित हो। तुम बड़ी ऊंची अवस्था में पहुंच गए हो! लेकिन बुद्ध की आंखें तुम्हें आर-पार देख लेंगी। और वे जानती हैं कि विपरीत भीतर छिपा है। उसी को छिपाने की चेष्टा में तुम नाच रहे हो। और तुम डरते हो अगर नाच रोका, तो उदासी जाहिर हो जाएगी।
उदासी एक में तो नाराजगी बनती है, वह भी प्रकट करने का एक ढंग है और मुक्त होने का। एक में नाच बन जाती है, वह भी मुक्त होने का एक ढंग है। क्योंकि दोनों ही स्थितियों में रेचन होता है, शक्ति बाहर निकल जाती है। एक रोकर निकालता है, एक गीत गाकर निकालता है। लेकिन दोनों हालत में शक्ति बाहर चली जाती है; तुम भीतर हल्के हो जाते हो। चोट दोनों को पड़ी। दोनों के ढंग अलग-अलग हैं।
मलिक ने कहा: ‘राबिया, फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं।’ मानो या न मानो, जानते हो या नहीं, सवाल वह है। मानने का कहां सवाल है? फकीर शिकायत मानता नहीं, लेकिन जानता तो है; जानता है, फिर भी मानता नहीं। लेकिन जान ली तो बात खतम हो गई। तुम्हारे मानने का सवाल कहां है? यह कोई विश्वास और आस्था की बात तो नहीं कि तुम मानोगे, तब सवाल है। तुमने जान लिया भीतर--पहले क्षण में--शिकायत हो गई। फिर तुम कुछ भी करो, शिकायत के कांटे को कितने ही आभूषण--हीरे-जवाहरातों में ढांक दो, लेकिन वह कांटा तुम्हारे हृदय में लगा हुआ है। हां, जो नासमझ हैं, वे शायद समझें कि कांटा नहीं है--हीरे-जवाहरात हैं। लेकिन जो समझदार हैं, वे समझेंगे कि हीरे-जवाहरात हैं ही वहां इसलिए--कि कहीं कांटा छिपा है। तुम कुछ छिपाना चाह रहे हो। तुम कुछ बचाना चाह रहे हो। तुम चुपचाप सह रहे हो, लेकिन तुम्हारी चुप्पी भी कहेगी। और तुम्हारा सहना काफी शिकायत है।
‘फकीर शिकायत मानता ही नहीं है, बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी ही मानता है।’ पर यह मानना ही मानना है। शिकायत मानता ही नहीं; मिले दंड में भी खुशी मानता है। कोशिश करता है मानने की--कि खुशी है। लेकिन कौन मान सकता है खुशी! जब तुम्हें दुख दिखाई पड़ता हो, तब तुम कैसे मानोगे कि यह खुशी है? झूठ होगा सब। तुम अपने को ही धोखा दोगे। तुम तरकीबें करोगे, जिससे कि खुशी मालूम पड़े। डेल कारनेगी जैसे लोग इस तरह की सलाहें देते हैं।
डेल कारनेगी ने लिखा है कि एक आदमी लंगड़ा है और उसकी परमात्मा के प्रति बड़ी शिकायत है, वह बहुत नाराज है, बहुत दुखी है। फिर एक दिन वह एक आदमी को देखता है, जिसके दोनों पैर कटे हैं और वह जो दोनों पैर कटा हुआ आदमी है, एक पहिए से चलने वाली कुर्सी में बैठा हुआ प्रसन्न है। तो वह एक पैर का लंगडा आदमी सोचता है कि इस आदमी के दोनों पैर नहीं हैं! परमात्मा की मुझ पर कितनी कृपा है।
जो लोग कहते हैं कि तुम्हें दुख में भी सुख मानना हो, वे कहते हैं: अपने से ज्यादा दुखी लोगों की तरफ देखना, तो तुलना से सुख मानने में आसानी हो जाएगी। यह जरा समझ लेने जैसा है।
अगर दुखी होना हो, तो अपने से ज्यादा सुखी लोगों की तरफ देखना; तुलना से दुख आ जाएगा। तुम्हारे पास झोपड़ा है, तो महल की तरफ देखना; महल से तुलना करना; तुम दुखी हो जाओगे। लेकिन तुमसे भी छोटे झोपड़े हैं; झोपड़-पट्टियां हैं; तुम अपने झोपड़े के साथ उनकी तुलना करना: सुखी हो जाओगे। लेकिन दोनों आदमी एक जैसे हैं, क्योंकि दोनों तुलना करते हैं। और पहले के दुख में और दूसरे के सुख में भेद क्या है? प्रक्रिया तो एक ही है। पहले में दुख पैदा हुआ, क्योंकि उसके पास महल है, मेरे पास झोपड़ा है। दूसरे में सुख पैदा हुआ, क्योंकि मेरे पास महल है और उसके पास झोपड़ा है। लेकिन गणित में कहां फर्क है? गणित तो एक ही है।
और तुम आंखों को कैसे बचाओगे? तुम कब तक झोपड़ों की तरफ देखते रहोगे? महल भी हैं। और वे दिखाई पड़ेंगे। और जब तुम खुश होते हो--झोपड़े को देख कर कि मेरे पास कम से कम इस झोपड़े से बेहतर मकान है, तो तुम कैसे अपने को दुखी होने से बचाओगे--जब तुम महल देखोगे! और महलों से आंखें चुरा कर जाओगे कहां? तुम्हारे मन का गणित तो एक है।
जहां तुलना है, वहां सुख-दुख दोनों मौजूद रहेंगे। सुख-दुख तो तभी तिरोहित होते हैं, जब तुलना गिर जाती है। लेकिन तुलना कब गिरती है, जब वासना अशेष हो जाती है। जब तक वासना है, तुलना नहीं गिर सकती। जब तक तुम चाहते हो कुछ, तब तक जिनके पास है, उन्हें देख कर तुम पीड़ित होओगे। जब तक तुम चाहते हो कुछ, तब तक जो तुम्हारे पास है, उसे देख कर और जो वही दूसरों के पास नहीं है, उन्हें देख कर तुम प्रसन्न होओगे। तुम्हारे सुख-दुख दूसरों पर निर्भर हैं। और फकीर वह है, जिसने भीतर देखना शुरू किया; जो तुलना नहीं करता।
मलिक ने कहा: ‘राबिया, फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं; बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी ही मानता है।’ लेकिन ‘मानता’ का अर्थ ही होता है झूठ। सत्य को मानना नहीं पड़ता है।
लोग मेरे पास आते हैं; वे कहते हैं: हम ईश्वर में मानते हैं। मैं उनसे पूछता हूं: तुम सूरज में मानते हो? चांद-तारों में मानते हो? वे कहते हैं कि नहीं; क्या जरूरत मानने की! वे हैं। ईश्वर में मानते हैं। ईश्वर पर तुम्हें शक है, इसीलिए मानते हो। शक न होता, तो मानते क्यों!
संदेह मानता है; संदेह विश्वास करता है, ताकि संदेह छिप जाए। अनुभव मानता ही नहीं; अनुभव जानता है।
जैसे सूरज को मानने की कोई जरूरत नहीं। और दुनिया में कोई संप्रदाय नहीं कि सूरज को मानने वाले लोगों का संप्रदाय, सूरज को न मानने वाले लोगों का संप्रदाय! कोई संप्रदाय नहीं है। क्योंकि तथ्य का क्या संप्रदाय होगा। ईश्वर के पीछे संप्रदाय हैं क्योंकि तुम्हें दिखाई तो कुछ पड़ता नहीं। कोई मानता है कि उसके चार हाथ हैं--न चार हाथ दिखाई पड़ते हैं। कोई मानता है कि उसके दो हाथ हैं--न दो हाथ दिखाई पड़ते हैं। विवाद का कोई निर्णय कभी हो नहीं सकता। उसकी शक्ल कैसी है?--कोई शक्ल नहीं दिखाई पड़ती। फिर कुछ मानते हैं कि वह है। आधी दुनिया मानती है कि वह है ही नहीं। इस विवाद का भी निर्णय नहीं हो सकता।
ईश्वर के संबंध में इतना विवाद है, क्योंकि अंधेरे मे टटोल रहे हो। सूरज के संबंध में इस तरह का विवाद नहीं है। क्योंकि अंधेरे में टटोलने का सवाल नहीं है। सूरज को अंधे भी इनकार नहीं करते हैं--जिनको दिखाई भी नहीं पड़ता। और ईश्वर को आंख वाले भी इनकार करते हैं। जरूर अंधेरा बड़ा गहरा है। टटोल-टटोल कर कोई बात कही जा रही है, जिसका कोई पक्का भरोसा नहीं है। जो मानता है, उसको भी पक्का भरोसा नहीं है।
और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जब तुम अपनी मान्यता की बहुत घोषणा करते हो, तो तुम सिर्फ अपने भीतर के संदेह की खबर देते हो। जब तुम जोर से टेबल पीट कर चिल्लाते हो कि मैं ईश्वर को मानता हूं, वह टेबल का पीटना बता रहा है कि तुम किसी और के लिए टेबल नहीं पीट रहे हो; अपने को ही भरोसा दिलाने के लिए टेबल पीट रहे हो।
जिस चीज में तुम्हें जितना शक होता है, उतना ही तुम उस संबंध में विचार करने से भयभीत होते हो। अगर कोई ईश्वर की चर्चा करने लगे और तर्क करने लगे कि है या नहीं तो तुम नाराज हो जाते हो। नाराजगी इस बात की खबर है कि भीतर संदेह है; मान्यता ऊपर-ऊपर है। पतली सतह है उसकी। जरा सा तर्क उसे तोड़ दे सकता है।
सच्चा आस्तिक कभी भी भयभीत न होगा--तुम्हारे तर्कों से; आनंदित होगा। लेकिन तुम्हारी आस्तिकता झूठी है।
यह जो हसन कह रहा है कि ‘फकीर दंड में भी खुशी मानता है।’ दंड तो दिखाई पडता है, लेकिन खुशी मानता है! भीतर क्या है? भीतर दंड का बोध है; ऊपर-ऊपर--सतह पर खुशी की धारणा है।
राबिया थोड़ी देर चुप रही। क्यों थोड़ी देर चुप रही? क्या कारण था--चुप रहने का? राबिया को जो कहना था, वह भी सीधा कह देती, जैसा हसन ने कहा, मलिक ने कहा। लेकिन राबिया थोड़ी देर चुप रही। क्योंकि राबिया को जो कहना था, वह कहने में आता नहीं, कठिन है। मलिक ने, हसन ने, जो भी कहा, वह सीधा-सीधा है। वह कहा जा सकता है। वह द्वंद्व के भीतर है। राबिया को जो कहना है, वह निर्द्वंद्व की खबर है। वह अखंड, अद्वैत की बात है। वह कही नहीं जा सकती। इसलिए राबिया थोड़ी देर चुप रही।
इसलिए भी राबिया थोड़ी देर चुप रही कि कहे या न कहे। क्योंकि ये समझेंगे नहीं। यह हसन बिलकुल न समझ पाएगा। क्योंकि यह मानता है कि शिकायत न करना, बस, काफी है। यह इसको मंजिल मालूम पड़ रही है। और न केवल यह खुद मानता है, इस मंजिल से इतना अभिभूत हो गया है कि मुझे भी वही सिखाना चाहता है।
और यह हसन अंधा है; नहीं तो राबिया को इसने अगर गौर से देखा होता, तो इसकी वाणी वहीं चुप हो गई होती। क्योंकि राबिया का शरीर होगा बीमार; राबिया जैसी स्वस्थ स्त्री खोजनी मुश्किल है। इसने अगर राबिया की आंख में जरा झांका होता, तो इसे परम स्वास्थ्य की किरण दिखाई पड़ती। इसने राबिया की गंध को जरा अपने नासापुटों में लिया होता; तो यह जानता कि यहां परमात्मा घट रहा है।
राबिया को सिखाने की बात ही यह बताती है कि आदमी अंधा है। फिर अंधे से प्रकाश की चर्चा करनी या नहीं करनी?
हसन बोला भी नहीं था कि मलिक ने फौरन उत्तर दिया। यह मलिक विवादी है। इसने सोचा भी नहीं, झिझका भी नहीं। इसने तत्क्षण, जो हसन ने कहा था, उसको खंडित किया। और कहा: ‘फकीर की कोई शिकायत ही नहीं होती। सहने का कोई सवाल नहीं है। फकीर तो दंड को खुशी मानता है।’ इसने तत्क्षण विवाद मौजूद कर दिया। राबिया चुप रही। क्योंकि राबिया किसी का खंडन नहीं कर रही है। कोई विवाद नहीं कर रही है।
विवादी एक क्षण चुप नहीं रह सकता। क्योंकि तुमने कुछ कहा, तत्क्षण विवादी खंडित करेगा। सिर्फ ‘जानने वाला’ थोड़ी देर चुप रहेगा। क्योंकि वह स्थिति को पूरा का पूरा देखना चाहेगा। और जानने वाले की बड़ी कठिनाई यह है कि जो वह जानता है, उसे शब्द में रखते से वह भी विवाद जैसा मालूम पड़ता है। इसलिए राबिया झिझकी।
तुम ध्यान रखना कि सिर्फ ज्ञानी झिझकते हैं। एक-एक शब्द कीमती है। और एक-एक शब्द चुनना है। और हर शब्द अधूरा है। इसलिए जो कहना चाहते हैं, वह पूरा कहा नहीं जाता है। और फिर कहीं शब्द विवाद न बन जाए! तुमने कहा था--कुछ बताने को। और कहीं विचार की उलझन खड़ी न हो जाए! शब्द कहीं सिद्धांत न बन जाए, इसलिए ज्ञानी झिझकते हैं।
राबिया चुप रही, फिर वह बोली: ‘मुझे माफ करना।’ ज्ञानी का हर वक्तव्य--चाहे वह कहे या न कहे--इसी से शुरू होता है कि मुझे माफ करना। वह माफी किस बात की मांग रहा है?
जब हसन ने कुछ कहा, तो मलिक ने माफी नहीं मांगी। तत्क्षण खंडन किया।
विवाद दूसरे को तोड़ने में रस लेता है। विवाद को सत्य की कोई अभीप्सा नहीं है। दूसरा असत्य है, यह सिद्ध करने में मजा है; मैं सत्य हूं, तुम गलत हो। इससे सवाल नहीं है कि सत्य क्या है। मैं जो कहता हूं, वह सत्य है। तुम गलत हो, मैं सत्य हूं। मेरा अहंकार सत्य है। इसलिए विवादी माफी नहीं मांगता। माफी का कोई सवाल ही नहीं है, दूसरे को तोड़ देना, गिरा देना है। दूसरे को चारों खाने चित कर देना है।
विवाद एक तरह का युद्ध है। और आदमी ने लड़ना बंद कर दिया हाथों से--मल्लयुद्ध बंद कर दिया, लेकिन युद्ध बंद नहीं होता। युद्ध की आदत बंद नहीं होती; तो शब्दों से लड़ता है। नासमझ लट्ठ लेकर लड़ते हैं; समझदार शब्दों से लड़ते हैं; लेकिन शब्दों का उपयोग लट्ठ की भांति ही करते हैं। दूसरे का सिर खोल देना है, वहां माफी क्या मांगनी है! दूसरे को झुकाना है।
लेकिन राबिया जैसे लोग जब बोलते हैं तो चाहे वे कहें या न कहें, लेकिन उनका हर वक्तव्य ‘मुझे माफ करना’--उससे ही शुरू हो रहा है। क्योंकि वे विवाद के हिस्से नहीं बनना चाहते हैं। वे किसी को गलत सिद्ध करने को उत्सुक नहीं हैं। सत्य को प्रकट करने की तो उत्सुकता है--किसी को असत्य सिद्ध करने की उत्सुकता नहीं है। इसलिए ज्ञानी बहुत बार तो चुप ही रह जाएगा।
जहां अज्ञानी बहुत मुखर होंगे, वहां वह चुपचाप हट आएगा। वह उस शब्दों के जाल का हिस्सा न बनना चाहेगा।
राबिया थोड़ी देर चुप रही। उसने तौला होगा: ‘कहूं, न कहूं। कहने पर ये समझ पाएंगे, न समझ पाएंगे? कहा हुआ--किसी उपद्रव, विवाद, तर्क में ले जाएगा या सत्य की झलक लाएगा?’ लेकिन फिर उसने तय किया कि वह कहे। यह तय करना भी बताता है कि उसने हसन और मलिक की काफी इज्जत की।
अगर तुम होते--हसन और मलिक की जगह, तो शायद वह बोलती ही नहीं, चुप ही रह जाती। अगर पहले नंबर का आदमी होता, जिसको मैंने सांसारिक कहा है, तो राबिया बोलती ही नहीं। लेकिन ये दोनों खोजी थे। गलत रास्ते पर हों, लेकिन खोजी थे, जिज्ञासु थे। इनकी धारणा भ्रांत हो, लेकिन चेष्टा थी, आकांक्षा थी--खोज की। ये उलटे चल रहे हों, लेकिन चल तो रहे थे। इनके चलने को देखने के कारण बोली।
उसने चुप्पी में इनमें झांका होगा। ये भले लोग थे। इनकी धारणा भ्रांत थी, पर लोग बुरे न थे। और किसी दिन उपलब्ध हो सकते हैं। तो इनमें बीज डालने जैसे थे। इस चुप्पी में उसने ‘भूमि’ की परीक्षा की और फिर उसने कहा: ‘मुझे माफ करना।’
माफी किस बात की मांग रही है वह! माफी इस बात की मांग रही है कि मैं जो कहूं, उसे तुम मेरे अहंकार की घोषणा मत समझना। माफी वह इस बात की मांग रही है कि मैं जो कहूं, उससे तुम चोट मत ले लेना। तुम यह मत समझना कि मैंने तुम्हें गलत कहा। तुम यह मत समझना कि तुमने जो मुझे सलाह दी, वह मैंने स्वीकार नहीं की। तुम यह मत समझना कि तुम्हें मैं अज्ञानी कह रही हूं, नासमझ कह रही हूं। मुझे माफ करना। लेकिन जब से मैंने खुदा को जाना है--माफी तुमसे मांगती हूं--लेकिन मेरी अड़चन है कि जब से मैंने खुदा को जाना है, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। मुश्किल है: मुझे कहना ही पड़ेगा। राबिया झिझकती है, न कहना पड़ता, तो अच्छा था। लेकिन सत्य को बिना कहे छोड़ना भी कठिन है। यही सत्य की दुविधा है।
जब तुम उसे जानते हो, तब तुम बड़ी मुश्किल में पड़ते हो। उसे कहना कठिन। उसे बिना कहे छोड़ना कठिन! तुम उसे कहो, तो भूल होती है। तुम उसे न कहो, तो भूल होती है; तुम उसे कहो, तो डर है कि वह गलत समझा जाए; निन्यानबे मौकों पर गलत ही समझा जाएगा। और तुम उसे न कहो, तो डर है कि जो एक आदमी समझ लेता, उसका लाभ हो जाता, उसका मंगल होता, वह वंचित रह गया। उसका पाप तुम्हारे सिर है। सौ से बोलने पर कोई यह तो आशा कोई भी नहीं करता कि सौ समझ लेंगे। एक भी समझ ले तो बहुत है। लेकिन उस एक के लिए भी बोलना तो पड़ेगा।
‘जब से मैंने खुदा को जाना, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती।’ जब से मैंने खुदा को जाना है, तब से मैंने दुख को नहीं जाना है। तो शिकायत का तो सवाल नहीं; उदास होने की कोई बात नहीं; प्रसन्नता भी किस बात की? और धन्यवाद किसको देना है?
वस्तुतः ईश्वर को जानना और दुख से अनजान हो जाना, एक ही घटना के दो हिस्से हैं। जिसने ईश्वर को जान लिया है, वह दुख को नहीं जान सकता है। जो दुख को जान रहा है, वह ईश्वर को नहीं जान सकता। दुख संसार है। जब तक तुम दुख को जानते हो, तब तक तुम कैसे परमात्मा को जानोगे?
दुखी चित्त परमात्मा को नहीं जान सकता। दुखी चित्त इतना व्याकुल है, इतना विक्षुब्ध है... दुखी चित्त ऐसा है, जैसे आंधी-तूफान में झील होती है। चांद का प्रतिबिंब बनता नहीं, टूट-टूट जाता है, बिखर-बिखर जाता है।
अदुखी चित्त ऐसा है, जैसे झील शांत होती है, जब कोई तूफान-आंधी नहीं होता, कोई लहर नहीं होती, और झील दर्पण बन जाती है, तब चांद झलकता है, तब चांद का प्रतिबिंब बनता है।
कहा राबिया ने: ‘जब से मैंने खुदा को जाना, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। तो कैसी शिकायत!’ क्योंकि दंड की, दुख की प्रतीति हो, तो फिर हम प्रतिक्रिया कर सकते हैं। प्रतिक्रिया तो नंबर दो है, पहले प्रतीति है।
प्रतीति हो, तो फिर प्रतिक्रियाएं तीन तरह की हो सकती हैं। एक साधारण आदमी की प्रतिक्रिया--कि वह नाराज हो रहा है, शिकायत कर रहा है। फिर ‘नंबर एक’ फकीर की प्रतिक्रिया कि वह शिकायत नहीं कर रहा है, सह रहा है। फिर ‘नंबर दो’ फकीर की प्रतिक्रिया कि वह शिकायत नहीं कर रहा है, दंड को सौभाग्य मान रहा है कि तूने मेरी तरफ कृपा की।
लेकिन राबिया बड़ी गहरी बात कहती है। वह कहती है: जब दंड की प्रतीति ही न हो तो प्रतिक्रिया कैसी? जब बीज ही नहीं है, तो फिर वृक्ष ऐसा हो कि वैसा हो--यह बात ही फिजूल है। तो कैसी शिकायत? क्या सह लेना? और किसकी खुशी? तब नाराजगी खो जाती है, उदासी खो जाती है, प्रसन्नता खो जाती है। वे तीनों मन के ही हिस्से हैं। प्रसन्नता भी मन का ही खेल है। उदासी भी मन का ही खेल है। शिकायत, नाराजगी भी मन का ही खेल है, इसे तुम ठीक से समझ लेना।
सभी प्रतिक्रियाएं मन का हिस्सा हैं। प्रतिक्रिया मन है। तुम बुद्ध के पास गए और तुमने उन्हें गाली दी। बुद्ध के भीतर क्या होता है? अगर कुछ भी होता है, तो वहां बुद्ध हैं ही नहीं। कुछ भी नहीं होता। जैसे सूने मकान से गाली गूंजी--एक कोने से प्रवेश की और दूसरे कोने से निकल गई; उस गाली से न तो उस कमरे की दीवालों पर कुछ छाप पड़ी, न उस गाली का कोई स्मरण कमरे के भीतर छूटा; न कमरा कंपित हुआ, न कमरे ने कोई रुख लिया, न कमरे ने अपने को बचाना चाहा; न धन्यवाद दिया, न शिकायत की। कमरा खाली था। गाली गूंजी और निकल गई। प्रतीति नहीं होती, इसलिए प्रतिक्रिया नहीं होती है।
कैसी शिकायत? क्या सह लेना? किसकी खुशी! और यह कब होगा?--जब प्रतिक्रिया न होगी। यह कब होगा?--जब प्रतीति न होगी।
जब तक तुम हो, तब तक तो प्रतीति होगी। कोई गाली देगा, तो तुम कैसे बचोगे? और तुम बचने के लिए जो भी करोगे, वही तो प्रतिक्रिया है; वही तो वे दो फकीर कह रहे हैं। वे कह रहे हैं: कोई गाली दे, सह लेना। वे कहते हैं: कोई गाली दे, धन्यवाद दे देना। लेकिन करना जरूर कुछ! करने वाले को दोनों स्वीकार कर रहे हैं कि तुम वहां हो।
राबिया यह कह रही है कि जब परमात्मा होता है, तो तुम कहां बचोगे? तब वही है गाली देने वाला; वही होगा गाली सहने वाला। सब खेल उसका है, हम बीच में आते नहीं। हम हैं नहीं; नाव खाली है। इसलिए सारे धर्म अहंकार-विसर्जन पर जोर देते हैं। वही एकमात्र साधना है।
अहंकार को मौजूद रख कर तुम जो भी साध लोगे, वह ऊपरी होगा। भीतर तुम मौजूद हो और तुम्हारी ऊपरी प्रतिक्रियाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम शिकायत करो, कि धन्यवाद दो। तुम नाराज होओ कि खुश होओ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम हो, इससे फर्क पड़ता है। तुम नहीं हो, इससे फर्क पड़ता है।
सारी साधना अहंकार-घात है। खुद को मिटाना है। और जब तुम नहीं रह जाते हो, तो अचानक तुम पाते हो, परमात्मा सदा से विराजमान रहा है। तुम जिस सिंहासन पर बैठे थे, वह उसका ही सिंहासन है। तुम्हारी वजह से वह दिखाई नहीं पड़ता था।
तुम्हारे अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं, और कोई परदा नहीं। तुम पर परदा नहीं पड़ा है, तुम ही परदा हो। इसलिए परदे हटाने से कुछ भी न होगा; तुम्हीं को हटना पड़ेगा। जिस क्षण भी तुम पाते हो कि भीतर तुम नहीं हो, कमरा खाली है, शून्य हो गया--तब तुम राबिया को समझ पाओगे।
पता नहीं हसन और मलिक समझ पाए कि नहीं! लेकिन राबिया जैसा व्यक्तित्व हमेशा अनसमझा रह जाता है।
राबिया को लोग नास्तिक कहते हैं। क्योंकि परमात्मा का धन्यवाद नहीं। राबिया कभी मस्जिद न जाती। राबिया कभी कुरान न पढ़ती, कभी प्रार्थना न करती। राबिया को किसी ने कभी नाचते, गीत गाते नहीं देखा। यह राबिया किस तरह का व्यक्तित्व है?
अगर तुम समझ पाओ, तो राबिया एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसमें कोई केंद्र नहीं रहा; जिसका कोई मैं-भाव नहीं। कौन जाए मस्जिद; कौन करे प्रार्थना; कौन पढ़े कुरान?
इसी को कबीर ‘सहज समाधि’ कहते हैं। कौन... किसकी पूजा? कौन करे पूजा? तो कबीर कहते हैं: उठना-बैठना, खाना-पीना--यही मेरी पूजा है। किसको लगाऊं भोग? कौन लगाए भोग? किस मंदिर की परिक्रमा करूं? चलना, फिरना, डोलना--यही मेरी परिक्रमा है।
लेकिन कबीर या राबिया हमारे लिए बड़े दूर मालूम पड़ते हैं। इतनी दूर मालूम पड़ते हैं--कि हमारी पकड़ के बाहर।
तुम हसन को भी समझ सकते हो; तुम मलिक को भी समझ सकते हो। क्योंकि वे भला फकीर हों, संसार के बाहर नहीं हैं। उनकी भाषा तुम्हारी ही भाषा है।
कोई कहता है: शिकायत करो। कोई कहता है: शिकायत मत करो। कोई कहता है: शिकायत में प्रसन्नता रखो। यह सब समझ में आता है। राबिया पकड़ के बाहर छूट जाती है। और राबिया ही समझने जैसी है। क्योंकि जो तुम्हारी पकड़ के बाहर छूट जाता है, वही तुम्हें तुम्हारी पकड़ के बाहर ले जाएगा।
सदगुरु की सदा यही चेष्टा होती है कि धीरे-धीरे तुम्हें उस तरफ ले जाने लगे, जो तुम्हारी पकड़ के बाहर छूटता है। नहीं तो तुम्हारी खुद पर पकड़ कैसे छूटेगी! वह तुम्हें धीरे-धीरे ज्ञात से अज्ञात--और अज्ञात से अज्ञेय की तरफ ले जाता है। वह धीरे-धीरे तुम्हारे पैर के नीचे की भूमि को सरकाता जाता है और एक दिन सूने आकाश में छोड़ देता है--असहाय--एक महाखड्ड में जिसका अंत ही नहीं आता। तुम गिरते ही जाते हो, गिरते ही जाते हो। कोई सतह नहीं आती, जहां तुम खड़े हो सको। क्योंकि तुम खड़े हुए कि अहंकार वापस आ जाएगा। तुम गिरते ही जाओगे, गिरते ही जाओगे। तभी तुम एक ऐसी घड़ी में आओगे, जब तुम खड़े होने की फिकर छोड़ दोगे; उसी क्षण अहंकार तिरोहित हो जाएगा। इस कहान
ी को ठीक से समझना। हसन और मलिक समझ में आ जाएंगे; वे कचरा हैं--जो तुम्हारी समझ में आ जाए, वह कचरा है। जो समझ में न आए, उस पर थोड़ा श्रम करना। आंख खोलना, ज्यादा सजग होना, ज्यादा ध्यानपूर्वक समझने की कोशिश करना।
जो तुम्हारी समझ में न आए, वही तुम्हारे लिए सीढ़ी बनेगी; उससे ही धीरे-धीरे तुम अपने से दूर जाओगे। और अपने से दूर जाने का अर्थ है: परमात्मा के निकट जाना। जितने तुम अपने से दूर हो जाओगे--उतने ही परमात्मा के पास। और जितने तुम अपने पास हो--उतने ही परमात्मा से दूर। परमात्मा और तुम्हारे बीच यही फासला है।

आज इतना ही।

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