ओशो कहते हैं : ‘पृथ्वी में दो तरह के लोग हैं : सयाने, प्रौढ़, जागे हुए; और सोए हुए, अप्रौढ़, बचकाने। सयाने और बचकाने, ऐसी दो जातियां हैं दुनिया में। ‘बचकानों की हजारों जातियां हैं—पंथ, संप्रदाय, मत, शास्त्र। सयानों का एक ही मत है, एक ही जाति है। क्योंकि एक ही वक्तव्य है उनका—कि तुम मिटो तो परमात्मा हो जाए। तुम्हारा होना—प्रपंच, पाखंड। तुम्हारा मिटना—परमात्मा के आगमन के लिए द्वार। तुम खोओ ताकि परमात्मा मिल जाए। बूंद सागर में डूब जाती है तो सागर हो जाती है।’ ऐसे ही एक ‘सयाने’ संत दादू दयाल के भक्ति-सिक्त वचनों पर ओशो के दस प्रवचनों के इस संकलन में ओशो ने भाव-जगत से संबंधित गूढ़ प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं।
#1: तुम बिन कहिं न समाहिं
#2: प्रार्थना क्या है?
#3: मेरे आगे मैं खड़ा
#4: मृत्यु श्रेष्ठतम है
#5: समरथ सब बिधि साइयां
#6: तथागत जीता है तथाता में
#7: इसक अलह का अंग
#8: प्रेम जीवन है
#9: भीतर के मल धोई
#10: नीति : कागज का फूल
आंखें हैं, पर दिखाई नहीं पड़ता। आंखें खुली भी हैं, फिर भी दिखाई नहीं पड़ता। कोई गहरा अंधेरा भीतर छिपा है। होश है, समझ में आता हुआ मालूम पड़ता है, फिर भी जीवन में कोई क्रांति नहीं होती। बीमारी गहरी है; समझ उतनी गहरी नहीं। प्रयास भी करते हैं, दो कदम भी उठा कर चलते हैं परमात्मा के मंदिर की तरफ, लेकिन मंदिर पास आता मालूम नहीं पड़ता। पैर गलत दिशा में जाते हैं। उठते भी हैं तो भी कहीं पहुंचते नहीं। शायद स्वयं किए कुछ हो भी न सकेगा। अगर अंधेरा गहरा हो, अगर भीतर बेहोशी हो, तो हम जहां भी चलेंगे, जहां भी जाएंगे, वहीं हम अंधेरे को पाएंगे, वहीं हम बेहोशी को पाएंगे। हमारे प्रयास से मंदिर परमात्मा का पास आ भी न सकेगा। संसार में दो तरह के धर्म हैं। एक धर्म की प्रणाली है जो मानती है कि व्यक्ति के संकल्प से परमात्मा निकट आता है। दूसरी प्रणाली है जो मानती है कि स्वयं के समर्पण से ही वह निकट आता है। क्योंकि संकल्प तो अज्ञान से भरा हुआ व्यक्ति ही करेगा। संकल्प भी अज्ञान से ही निकलेगा। ज्ञान तक पहुंचना कैसे होगा? तुम्हारी चेष्टा भी तो अंधेरी रात से ही शुरू होगी। उस चेष्टा का जन्म ही अंधकार में है, तो उसका अंत प्रकाशपूर्ण कैसे होगा? तुम जो करोगे, तुम ही करोगे। अहंकार की छाया पड़ेगी उस पर। तुम्हारी छाया से तुम्हारा कृत्य मुक्त न हो सकेगा। इसलिए दूसरी प्रणाली कहती है, हम केवल अपने को छोड़ सकते हैं उसके हाथों में। करना हमारा सवाल नहीं है, वही करे। हम समर्पण कर सकते हैं।
संकल्प हमारे वश के बाहर है। संकल्प सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है। हम सोए हुए हैं, उसके चरणों में अपने को छोड़ दें, इतना ही काफी है। और चरणों में छोड़ने के लिए उसके चरण खोजने की जरूरत नहीं है, सिर्फ चरणों में छोड़ने का भाव काफी है। यह भाव असहाय से असहाय व्यक्ति भी कर सकता है। यह भाव अज्ञानी से अज्ञानी चित्त भी कर सकता है। कितनी ही गहन बेहोशी हो, चलना न हो सके, गिरना तो हो ही सकता है। यात्रा न हो सके, असहाय प्रार्थना और पुकार तो हो ही सकती है। उठने का बल न हो, चलने का बल न हो, तो भी आंखों में आंसू तो भर ही सकते हैं। तो एक मार्ग है, जो मान कर चलता है कि तुम्हारी शक्ति से तुम पहुंचोगे। उस मार्ग से कभी करोड़ में कोई एकाध व्यक्ति पहुंचता हो, उसे अपवाद समझ लें। वह नियम नहीं है। उस मार्ग पर लाखों चलते हैं, कभी कोई एकाध पहुंचता है। वह भी शायद भूले-भटके ही पहुंच जाता है। वह भी शायद टटोलते-टटोलते ही पहुंच जाता है। शायद वह भी अपने श्रम से नहीं पहुंचता, उसके श्रम की आत्यंतिकता देख कर ही परमात्मा की करुणा उस पर हो जाती है। वह भी शायद अपने संकल्प से नहीं पहुंचता, लेकिन उसके संकल्प का बल देख कर, उसका उठना और गिरना देख कर, हर चेष्टा में उसके चलने की चेष्टा देख कर, खोज देख कर अनंत की करुणा उस पर बरस जाती है, इसलिए वह भी पहुंच जाता है। —ओशो