मन टटोलता है। उस टटोलने से प्रश्न ही प्रश्न उठते हैं। प्रेम के पास आंख है। वह प्रेम की आंख ही उत्तर है। ओशो कहते हैं : ‘प्रेम संसार की समझ में आता नहीं, आ सकता नहीं; आ जाए तो संसार स्वर्ग न हो जाए! संसार की समझ में घृणा आ जाती है, प्रेम नहीं आता; युद्ध आ जाता है, शांति नहीं आती; विज्ञान आ जाता है, धर्म नहीं आता। जो बाहर है, उसे तो संसार समझ लेता है; लेकिन जो भीतर है और असली है, जो प्राणों का प्राण है, वह संसार की पकड़ से छूट जाता है। दृश्य तो स्थूल है। अदृश्य ही सूक्ष्म है—और वही है आधार। संसार तो दृश्य पर अटका होता है। प्रेम की आंख अदृश्य को देखने लगती है। प्रेम तुम्हारे भीतर एक तीसरी आंख को खोल देता है’।
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\n#1: आंसू : चैतन्य के फूल
\n#2: ध्यान ही मार्ग है
\n#3: रसो वै स:
\n#4: श्रद्धा की अनिवार्य सीढ़ी : संदेह
\n#5: प्रार्थना और प्रतीक्षा
\n#6: प्रेम का मार्ग अनूठा
\n#7: मैं मधुशाला हूं
\n#8: स्वानुभव ही मुक्ति का द्वार है
\n#9: अज्ञात का वरण करो
\n#10: कस्तूरी कुंडल बसै
\n#11: समाधि के फूल
\n#12: प्रार्थना की गूंज