Pad Ghunghru Bandh
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अहं अज्ञान है--प्रेम ज्ञान है

कवि शब्दों में सौंदर्य डालते हैं। चित्रकार रंगों को सजीव करते हैं। मूर्तिकार पत्थरों में प्राण को प्रतिष्ठा देते हैं। पर जो स्वयं को सौंदर्य और जीवन देने में सफल हो जाता है, उससे बड़ा सर्जक और कोई भी नहीं है। जीवन से बड़ी और कोई कला नहीं है।
ओशो

हृदय जब तक प्रेम से झंकृत न हो, तब तक एक रिक्तता और अभाव का अनुभव होता है। प्रेम के अतिरिक्त आत्मा की पूर्णता की अनुभूति और किसी द्वार से नहीं होती है। प्रेम के अभाव में आत्मा में क्या है? अहं और केवल अहं ‘मैं’ और केवल ‘मैं।’ यह ‘मैं’ एकदम मिथ्या है। छाया की भी वह छाया है। उसकी उपस्थिति ही रिक्तता है। वह है, यही अभाव है। अहं की छाया प्रेम के प्रकाश में तिरोहित हो जाती है। और तब जो शेष रह जाता है, वही ब्रह्म है। प्रेम साधना है; ब्रह्म सिद्धि है।
मैं कहता हूं: प्रेम ज्ञान है। और अज्ञान क्या है? अहं अज्ञान है। और जब अहं ही ज्ञान की खोज करने लगता है तो वैसा ज्ञान महा अज्ञान बन जाता है। अहं की खोज से पांडित्य आता है। पांडित्य सूक्ष्मतम परिग्रह है। प्रज्ञा का जन्म अहं से नहीं, प्रेम से होता है। इसलिए ही अहंकार प्रेम से सदा भयभीत रहता है। वह राग कर सकता है, विराग कर सकता है। लेकिन, प्रेम? नहीं। प्रेम तो उसकी मृत्यु है।
प्रेम न राग है, न विराग। प्रेम परम वीतरागता है।
प्रेम संबंध नहीं है। प्रेम है स्वयं की स्थिति। राग किसी से होता है। विराग भी किसी से होता है। प्रेम स्वयं में होता है। वह है सहज स्फुरणा--अकारण और अप्रेरित। और इसीलिए राग भी बांधता है, विराग भी बांधता है। प्रेम मुक्त करता है। प्रेम मुक्ति है।


पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:

• मौन कैसे हों?
• हमारे दुखों का कारण क्या है?
• जीवन को किस भांति जीना चाहिए?
• विचार का क्या अर्थ है?

Description: काम-ऊर्जा का रूपांतरण--संभोग में साक्षीत्व से कामवासना स्वाभाविक है।

उससे लड़ना नहीं; अन्यथा उसके विकृत-रूप चित्त को घेर लेंगे।
काम (Sex) को समझो और काम-कृत्य (Sex-Act) को भी ध्यान का विषय बनाओ।
काम में, संभोग में भी साक्षी (Witness) बनो।
संभोग में साक्षीभाव के जुड़ते ही काम-ऊर्जा (Sex-Energy) का रूपांतरण प्रारंभ हो जाता है।
वह रूपांतरण ही ब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य काम का विरोध नहीं--काम-ऊर्जा का ही ऊर्ध्वगमन है।
जीवन में जो भी है उसे मित्रता से और अनुग्रह से स्वीकार करो।
शत्रुता का भाव अधार्मिक है।
स्वीकार से परिवर्तन का मार्ग सहज ही खुलता है।
शक्ति तो सदा ही तटस्थ है।
वह न बुरी है, न अच्छी।
शुभ या अशुभ उससे सीधे नहीं--वरन उसके उपयोग से ही जुड़े हैं।
ओशो