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ओशो की चर्चाओं में से संगृहीत 225 अंश शुरुआती दिनों में विभिन्न लोग ओशो से मिलने आते और कई विषयों पर चर्चा करते। इन चर्चाओं की ऑडियो-रिकॉर्डिंग तो नहीं हो पाई, परंतु जो लोग वहां…
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ओशो की चर्चाओं में से संगृहीत 225 अंश
शुरुआती दिनों में विभिन्न लोग ओशो से मिलने आते और कई विषयों पर चर्चा करते। इन चर्चाओं की ऑडियो-रिकॉर्डिंग तो नहीं हो पाई, परंतु जो लोग वहां मौजूद थे उन्होंने ओशो के विचारों को संकलित किया। उन पुष्पों को एकत्रित कर यहां पर एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

जीवन है सदा वर्तमान–सदा अभी और यहीं
व्यक्ति उलझा हुआ है, इसलिए समाज उलझा हुआ है। व्यक्ति की समस्या ही विश्व की समस्या है। और व्यक्ति क्यों समस्या में है? व्यक्ति समस्या में नहीं, अपितु व्यक्ति ही समस्या है। उसकी व्यक्ति-चेतना ही समस्या है। उसकी अहं-चेतना ही समस्या है। ‘मैं हूं’–इसमें से ‘मैं’ नहीं हो जाए और मात्र ‘हूं’ की अनुभूति हो सके, तो समस्या विलीन हो जाती है और समाधान द्वार आ जाता है।
वस्तुतः जीवन होना मात्र है। वह तो सहज प्रवाह है। उस प्रवाह पर ‘मैं’ आरोपण है। ‘मैं’ उस सजग प्रवाह पर असहज बांध है।
स्वयं में ‘मैं’ को खोजो। वह कहां है? ‘मैं’ कहां है? कहीं भी तो नहीं। जीवन है, होना है, पर ‘मैं’ कहां है? किंतु हम तो सारा जीवन ही ‘मैं’ पर खड़ा करते हैं, तब कौन सा आश्चर्य है यदि इस जीवन में कहीं भी शांति के दर्शन न होते हों? हमारा धर्म, हमारी सभ्यता सभी तो ‘मैं’ पर खड़े हैं, तब क्या यह स्वाभाविक ही नहीं है कि उन सबसे चिंता, तनाव, उन्माद और विक्षिप्तता पैदा होती हो? ‘मैं’ की भूमि पर जो भी निर्मित है, वह सब अस्वस्थ है और अस्वस्थ ही हो सकता है। ‘मैं’ के केंद्र पर बनाया गया जीवन ही जन्म और मृत्यु की यात्रा करता है। ‘मैं’ का ही जन्म है। ‘मैं’ की ही मृत्यु है। स्वप्न ही पैदा होते हैं और स्वप्न ही विलीन हो जाते हैं। जो है, उसका न तो जन्म है और न मृत्यु है। वह तो बस है–है–है।

मैं क्या बोल रहा हूं? शब्द? नहीं। नहीं। शब्दों को ही जो सुनेंगे वे उसे नहीं समझ सकेंगे जो कि मैं बोल रहा हूं। क्या किन्हीं विचारों पर हम विचार कर रहे हैं? नहीं। नहीं। विचारों पर विचार नहीं कर रहे हैं। वस्तुतः विचार ही नहीं कर रहे हैं। वरन जीवन की एक अवस्था को, अस्तित्व की एक स्थिति को खोज रहे हैं। सत्ता में–शुद्ध सत्ता में प्रवेश खोज रहे हैं। लेकिन, तब निश्चय ही समझने का अर्थ मात्र समझना नहीं है, वरन प्रवेश है। जीवन में प्रवेश करके ही जीवन को समझा जा सकता है। प्रेम में होकर ही प्रेम को जाना जा सकता है।
विचार में यात्रा नहीं करनी है, अपितु अस्तित्व में छलांग लगानी है।
क्या मैं अपनी बात समझा पा रहा हूं? उसे समझने की चिंता न करें। वैसी चिंता उलटे समझने ही न देगी। विचार न करें। देखें। वृक्षों पर फूल खिले हैं। बाहर देखें। गुलमोहर पर कैसे फूल छाए हैं? क्या उन्हें सोचते हैं या कि देखते हैं? यह कोयल बोले जा रही है। उसे सोचते हैं या कि सुनते हैं? ऐसे ही जो मैं कह रहा हूं, उसे सुनें और देखें। विचार नहीं, गहरी और पैनी दृष्टि ही उसके अर्थ में ले जा सकती है। विचार शब्द पर ठिठक जाता है, दृष्टि निःशब्द को भेद देती है। विचार अर्थ विचारने लगता है, दृष्टि अर्थ को उघाड़ देती है। और दृष्टि उतनी ही गहरी होती है, जितनी विचारों से मुक्त होती है। विचार में समय लगता है। वह क्रिया है। ज्ञान में, अंतर्दृष्टि में समय नहीं है। वह तो बोध की अत्यंत प्रगाढ़ दशा है।
क्या सौंदर्यानुभूति के किसी क्षण में, प्रेम या आनंद की किसी अनुभूति में इसे नहीं जाना है? क्या उस समय प्रगाढ़ चेतना ही शेष नहीं रह जाती है और विचार विदा नहीं हो जाते हैं?
जीवन में जो भी सत्य है, सुंदर है, शिव है, वह विचारों की तरंगों में नहीं, वरन निर्विचार की निस्तरंग शांति में ही जाना जाता है।

ओशो