एक आग चाहिए जो बदल दे नारी के पुराने सारे ढांचे को ...नारी के जीवन में जो प्रफुल्लता, शान्ति और आनंद होना चाहिए, वह उसे उपलब्ध नहीं हो पाता है और नारी का आनंद बहुत अर्थपूर्ण है, क्योंकि वह घर का केंद्र है। अगर घर का केंद्र उदास, दीन - हीन, थका हुआ, हारा हुआ है, तो सारा घर, सारा परिवार, जो उसकी परिधि पर घूमता है, वह सब दीन - हीन, उदास और हारा हुआ हो जाएगा। ...नारी बहुत अर्थों में सहयोगी हो सकती है। ...नारी को अपनी आत्मा और अपने अस्तित्व की घोषणा करनी है। नारी को सम्पत्ति होने से इनकार करना है। नारी को पुरुष द्वारा बनाए गए विधानों को वर्गीय घोषित करना है और उसे निर्मित करना है कि वह क्या विधान अपने लिए खड़ा करे। नारी को प्रेम के अतिरिक्त जीवन की सारी व्यवस्था को अनैतिक स्वीकार करना है। प्रेम ही नैतिकता का मूल मंत्र है। अगर यह इतना हो सके, तो एक नई नारी का जन्म हो सकता है।