CHARANDAS
Nahin Sanjh Nahin Bhor 10
Tenth Discourse from the series of 10 discourses - Nahin Sanjh Nahin Bhor by Osho. These discourses were given during SEP 11-20 1977, Pune.
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पहला प्रश्न:
भगवान, अभिनय में प्रमाणिकता कैसे बचेगी, जिसकी चर्चा आप हमेशा करते हैं? हम झूठे बेईमान लोग तो वैसे ही अभिनय में कुशल हैं, और यदि संत अभिनय करेंगे, तो क्या उससे भी झूठ नहीं प्रवेश करेगा? चाहे कर्ता रहें, या अकर्ता, अभिनय में झूठ तो समाहित हो ही गया। इस उलझन को सुलझाने की कृपा करें।
मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई। अभिनय का अर्थ इतना ही है कि करने वाला परमात्मा है; मैं करने वाला नहीं। यही तो सच है। इसमें झूठ कैसे समाहित हो जाएगा? करने वाला परमात्मा है।
जब तक हम समझते हैं कि मैं करने वाला हूं, तब तक हम झूठ हैं। जैसे ही उसे करने वाला जाना, वैसे ही झूठ गया।
तो अभिनय में और प्रमाणिकता में विरोध नहीं है। अभिनय ही प्रमाणिक हो सकता है।
और अभिनय का अर्थ तुमने अपना लगा लिया कि भीतर कुछ--बाहर कुछ।
अभिनय का इतना ही अर्थ है कि कृत्य मेरा नहीं है। जैसे बांसुरी समझे कि जो गीत मुझसे बह रहा है, वह मुझसे आ रहा है, यह झूठ होगा। और बांसुरी समझे कि जो गीत मुझसे आ रहा है, वह केवल मुझसे ‘आ रहा’ है; गाने वाला कोई और है; ओंठ किसी और के हैं; वाणी किसी और की है; स्वर किसी और के हैं। मैं केवल उपकरण मात्र हूं। तो बासुंरी कर्ता से हट गई, अभिनेता हो गई। यहां बाहर कुछ, भीतर कुछ--ऐसा भेद नहीं है।
तो अभिनय का अर्थ झूठ नहीं है। अभिनय इस जगत की सबसे बड़ी वास्तविकता है, सबसे बड़ी प्रमाणिकता है।
और तुमने पूछा है कि ‘कर्ता रहें या अकर्ता, अभिनय में झूठ तो समाहित हो ही गया?’
नहीं। कर्ता रहो, तो अभिनेता नहीं हो। कर्ता रहे, यह भाव रहा कि मैं करने वाला हूं, तो फिर कहां अभिनय? फिर तो झूठ समा गया। झूठ यानी अहंकार।
इस जगत में अहंकार से बड़ा कोई और झूठ नहीं है। मैं हूं--यही झूठ है। परमात्मा है--यही सत्य है। मेरा होना परमात्मा के होने से अलग है--यही झूठ है। मेरा होना उसमें समाहित है--मैं उसके ही सागर की तरंग हूं, तरंग से ज्यादा नहीं--यही प्रमाणिक है; यही सत्य है।
तो जैसे ही कर्ता बने, वैसे ही झूठ आ जाता है। अकर्ता बने कि झूठ गया। झूठ का संबंध कुछ झूठ बोलने से नहीं है। झूठ का संबंध इसी भाव से है कि मैं हूं, फिर सारे झूठ इसी से पैदा होते हैं। यह एक झूठ अहंकार का हजार-हजार झूठों के जन्म का कारण हो जाता है। इस अहंकार के वृक्ष पर ही फिर झूठ के पत्ते लगते हैं, फल लगते हैं, फूल लगते हैं।
इस अहंकार को जड़ से काट देने का नाम ही अकर्ता-भाव है। अकर्ता-भाव कहो या अभिनय कहो--एक ही बात है। लेकिन इस प्रश्न ने बहुत लोगों के मन में सवाल उठाए होंगे।
दूसरा सवाल भी इसी से संबंधित है:
भगवान, कल आपने संदेश दिया: अभिनय सीखा; पर कुशल और प्रसिद्ध अभिनेता अभिनय की कला जानते हुए भी चिंतित, दुखी और परेशान हैं। उनका अभिनय उन्हें दुख से मुक्त क्यों नहीं करता? कृपा करके समझाइए।
अभिनय की कला जानना और अकर्ता हो जाने में बड़ा फर्क है। अभिनय की कला जानना एक बात है, और जीवन को अभिनय बना देना बिलकुल दूसरी बात है।
अभिनेता अभिनय की कला जानता है, जब मंच पर होता है। जैसे ही मंच से नीचे उतरा कि सारी कला भूल जाता है। घर आया कि कर्ता हो जाता है।
वह जो राम बना है, मंच पर, सीता खो जाएगी, तो अभिनय करेगा; आंसू झूठे होंगें; वृक्षों से पूछेगा; सब असत्य होगा। रोएगा, पुकारेगा, चिल्लाएगा, खोजने निकलेगा--वह सब झूठ होगा। लेकिन घर आकर पाए कि उसकी पत्नी भाग गई। तब भूल जाएगा कि अब फिर अभिनय करे। तब रोने लगेगा। तब, असली आंसू बहेंगे। मंच पर अभिनय था, घर आते ही कर्ता का भाव हो गया!
मंच का अभिनय काम में नहीं आएगा। जीवन पूरा का पूरा मंच बन जाए।
और अक्सर ऐसा हो जाता है: दूसरे को सलाह देनी हो, तो तुम बड़े समझदार हो जाते हो। वह समझदारी किसी काम की नहीं है। उस समझदारी का दो कौड़ी भी मूल्य नहीं है। समझदारी तो तब काम की है, जब मुसीबत खुद पर हो और समझदारी काम आए।
दूसरे को समझाने के लिए तो सभी बुद्धिमान हैं, और इन बुद्धिमानों को, इनकी जीवन की समस्या को सुलझाते हुए न पाओगे। वहां इनकी उलझन इतनी की इतनी है, जैसे और की है।
दूसरे को सलाह देनी तो बहुत आसान है, क्योंकि तुम्हारा कुछ लगता ही नहीं। ‘हल्दी लगै न फिटकरी, रंग चोखा हो जाए।’ तुम्हारा कुछ खर्च होता ही नहीं। तुम्हें कुछ करना ही नहीं पड़ता। लेकिन जब अपने जीवन में उतारने चलोगे, तो मुश्किल होगी। हजार कठिनाइयां होंगी। क्योंकि हजार-हजार पुरानी आदतें तोड़नी होंगी, संस्कार मिटाने होंगे, रूपांतरण करना होगा। एक क्रांति से गुजरना होगा। वह क्रांति महंगी है--सस्ती नहीं।
धर्म महंगा है; सस्ता नहीं। प्राणों से मूल्य चुकाना होता है।
तो मंच पर अभिनय करना एक बात है। सारा जीवन--सोते-जागते--अभिनय से भर जाए, तो बिलकुल दूसरी बात है। यह तो तभी होगा, जब तुम ध्यान में पगो, यह तो तभी होगा, जब तुम परमात्मा के चरणों में अपने को पूरा छोड़ो। आधीन हो जाओ--जैसा चरणदास ने कहा: ‘मुक्तिमूल आधीनता।’
वह मुक्त हो जाएगा, जिसने अपने को बिलकुल आधीन कर दिया; जिसने कहा: अब जो तेरी मर्जी--कर; मैं तेरे हाथ में खिलौना हूं। मेरी अपनी अलग से कोई मर्जी नहीं। क्योंकि मैं ही नहीं, तो मेरी मर्जी कैसी? मैं हूं, तो फिर मेरी मर्जी पैदा होती है--छाया की तरह। मैं ही नहीं हूं, तो छाया नहीं बनती। अब तू जो कराए। अब तू ही है। कृत्य भी तेरा, अकृत्य भी तेरा। इसे समझो। प्रश्न ठीक है।
मेरे पास अभिनेता आते हैं, उनकी भी समस्याएं वही हैं, जो तुम्हारी हैं। कुछ भेद नहीं है समस्याओं में। और अभिनय की कला तो जानते हैं। लेकिन उस कला को अपने जीवन में नहीं ला पाए हैं। वह कला केवल व्यवसाय है। वह कला खुद के जीवन में नहीं है। उस कला से खुद का जीवन नहीं रंग गया है। धंधा है; कर लेते हैं; कमा लेते हैं। इतने से काफी नहीं होगा।
मैं जो कह रहा हूं, इतने ऊपर-ऊपर ओढ़ लेने से नहीं होगा। यह राम-चदरिया ओढ़ लेने से नहीं होगा। यह राम तुम्हारे प्राणों के प्राण में उठे; यह तुम्हारा बोध बने--कि मैं नहीं हूं। तुम अपने को विसर्जित कर पाओ, तो फिर जो शेष रह जाएगा, उसमें अभिनय ही है।
और अभिनय का मतलब फिर तुमसे कह दूं: तुम यह मत समझना कि तुम कुछ कर रहे हो। अगर तुम अभिनय भी ‘कर’ रहे हो, तो कर्ता हो गए। तुमने अगर यह भी भाव ले लिया कि देखो, मैं कितना कुशल अभिनेता हूं, कितने ठीक से अभिनय कर रहा हूं, तो तुम कर्ता हो गए।
यही तुम्हारे अभिनेताओं को हो जाता है। अभिनय करते हैं, लेकिन अभिनय में भी कर्ता हो जाते हैं। जब कोई अभिनेता की प्रशंसा करेगा कि तुम्हारा बड़ा कुशल अभिनय था, तो उसकी छाती फूल जाएगी। वह अभिनय का भी कर्ता है। ‘मैंने किया है; यह कुशलता मेरी है; यह यश, गौरव मेरा है।’ वह अभिनय का भी कर्ता बन गया।
कर्ता की पकड़ इतनी दूर तक गई है, अहंकार का रोग ऐसा गहरा समाया है कि अभिनय किया, उसमें भी कर्ता बन गए!
संत अपने कृत्य में भी अभिनेता होता है; और अभिनेता अपने अभिनय में भी कर्ता हो जाता है! संत कुछ ऐसा थोड़े ही कहेगा कि देखो, मैं अभिनय कर रहा हूं--परमात्मा! कैसा कुशल अभिनय कर रहा हूं। तो तो झूठ हो गई बात; तो तो बात समझ में ही नहीं आई। जड़ से चूक हो गई।
अब संत को तो कहने को भी नहीं है कि मैं क्या कर रहा हूं। मैं ही नहीं हूं, तू जो करवा रहा है, हो रहा है।
लोकोक्ति है कि उसकी बिना मर्जी पत्ता नहीं हिलता। वही हिलाता है। सब उसी पर सौंप दिया। सब--बेशर्त। कुछ बचाया नहीं। ऐसी भावदशा को मैंने कहा--अकर्ताभाव।
और यह अकर्ताभाव तुम सीख लो, तो प्रामाणिक हो जाओगे।
अभिनेता हो जाओ, तो सच्चे हो जाओगे। इसमें वक्तव्य विरोधाभासी लगता है, लेकिन वक्तव्य के भीतर झांकोगे, तो तुम्हें संगति दिखाई पड़ेगी।
तुम मिट जाओ, तो तुम हो जाओ। तुम शून्य हो जाओ, तो तुम पूर्ण हो जाओ। तुम रहे, तो चूकते रहोगे। तुम बाधा हो। तुम ही एकमात्र बाधा हो--तुम्हारे जीवन के आनंद में। तुम्हारे जीवन के उत्सव में तुम्हारे सिवाय और कोई विसंगति नहीं है।
तुम ही नरक हो अन्यथा स्वर्ग बरस रहा है। तुम्हीं दुख में लिपे-पुते खड़े हो। अन्यथा इस जगत में सब जगह अमृत बह रहा है। और तुम क्यों दूर-दूर खड़े हो? तुमने अपने को ‘मैं’ मान रखा है।
‘मुक्तिमूल आधीनता।’ तुम उसके आधीन हो जाओ, समर्पण करो।
तीसरा प्रश्न भी इसी से संबंधित है:
भगवान, आपने कहा कि संसार में सफल अभिनेता बनो। तो फिर प्रेम में अभिनय कैसे हो?
प्रेम में तो सबसे सुगम है। तुम्हारी अड़चन मैं समझ रहा हूं। तुम सोच रहे हो कि प्रेम में अभिनय किया, तो प्रेम झूठा हो जाएगा। तुम मेरी बात चूक गए। तुम समझ नहीं पाए--मैं क्या कह रहा हूं। बात थोड़ी सूक्ष्म है। चूक जाना, समझ में आता है। बहुत स्थूल नहीं है। तुमने बहुत स्थूल तरह से पकड़ा।
अब तुम पूछते हो: ‘प्रेम में अभिनय कैसे हो?’
क्योंकि अगर प्रेम में भी अभिनय किया, तो झूठा हो जाएगा। तो झूठे प्रेम का क्या मूल्य होगा?
दूसरी तरफ से देखो, मेरी तरफ से देखो। जब मैंने कहा: जीवन पूरा अभिनय हो जाए, तो यह तो प्रेम पर सबसे ज्यादा लागू होता है। क्योंकि प्रेम में कभी कोई कर्ता हो ही नहीं पाया है। इसलिए तो प्रेम परमात्मा के बहुत निकट है, प्रार्थना के बहुत निकट है।
तुमने प्रेम किया है? या प्रेम हुआ है?--इस पर सोचना। इस पर जरा ध्यान देना। तुम्हारा किसी से प्रेम का नाता बना--यह तुमने किया है या हुआ है? करना क्या है इसमें? तुमने किया क्या? तुमने कुछ चेष्टा की? अभ्यास किया? योगासन साधे? तुमने किया क्या?
कोई दिखाई पड़ा; किसी को देखा, और अचानक एक प्रेम की लहर दौड़ गई; रोआं-रोआं पुलकित हो गया। किसी से आंख मिली और बात हो गई। क्षण भर पहले तक प्रेम का खयाल ही न था। प्रेम की तुम सोच भी न रहे थे। प्रेम की कोई बात ही न थी। किसी से आंख मिली और बात हो गई। बात हुई ही नहीं और ‘बात’ हो गई--और तुम सदा के लिए बंध गए।
इसको तुम कर्तृत्व कहते हो? तुमने किया क्या? इसमें तुम्हारा कर्तापन कहां है? हुआ। प्रेम होता है--किया नहीं जाता।
इसलिए मैं कहता हूं कि प्रेम में अगर कर्ताभाव बना रहे हो, तब तो तुमने हद्द कर दी। वहां तो कर्ता है ही नहीं। इसलिए तो ज्ञानियों ने कहा: प्रेम ही परमात्मा तक ले जाता है। प्रेम को ही समझ लो तो तुम जीवन की बड़ी गहरी बात समझ गए।
प्रेम किसने किया है? कभी किसी ने नहीं किया है। सब होता है। और होता है, तो फिर कैसे कर्ता? फिर तो अकर्ता का भाव अपने आप गहरा हो जाएगा। उसी अकर्ता में अभिनय है।
तो जब मैं तुमसे कहता हूं: अभिनय समझो, तो तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि अभिनय ‘करो।’ तुमसे यह कह रहा हूं कि समझोगे, तो कर्ता विसर्जित हो जाएगा; जो रह जाएगा, वह अभिनय-मात्र है।
परमात्मा ने प्रेम करवा दिया, तो प्रेम हो गया। नहीं तो तुम्हारे वश में क्या था? तुम कोशिश करके सफल हो सकोगे? अगर मैं कहूं कि इस व्यक्ति को प्रेम करो। तुम क्या करोगे? तुम कहोगे: होता ही नहीं, तो क्या करें?
हो सकता है; इसको तुम गले लगा लो, मगर गले लगाने में तो प्रेम नहीं है। हड्डी से हड्डी लगेगी। चमड़ी से चमड़ी मिल जाएगी, मगर भीतर तुम जानोगे कि प्रेम तो है ही नहीं। कुछ उमग नहीं रहा; कोई गीत जनम नहीं रहा; कोई संगीत नहीं उठ रहा। तुम जल्दी में होओगे कि कब इससे छुटकारा हो! कि यह आदमी अब कब तक पकड़े रहेगा! कि और ज्यादा न भींच दे! हड्डी-पसली तोड़ देगा--क्या करेगा? अब यह आदमी छोड़े!
तुमसे अगर कहा जाए: प्रेम करो, तो तुम क्या करोगे? तुम कुछ भी न कर पाओगे। इसलिए तो दुनिया में प्रेम झूठा हो गया है। मतलब?
बचपन से तुम्हें समझाया गया है कि प्रेम करो, और प्रेम किया नहीं जा सकता। तो तुम ‘करना’ सीख गए हो।
मां कहती है: प्रेम करो, क्योंकि मैं तुम्हारी मां हूं। अब मां होने से क्या प्रेम का लेना-देना? पिता कहता है: मुझसे प्रेम करो, क्योंकि मैं तुम्हारा पिता हूं।
ये छोटे से बच्चे से हम जो आशाएं रख रहे हैं, ये आशाएं बड़ी भयंकर हैं। यह छोटा बच्चा क्या करे? पिता हैं आप, ठीक है। लेकिन इसे प्रेम हो तो हो; और नहीं हो रहा है, तो यह क्या करे?
यह इनकार भी नहीं कर सकता है; विरोध भी नहीं कर सकता है; बगावत भी नहीं कर सकता है। यह निर्भर भी है--मां-बाप पर। यह धीरे-धीरे प्रेम का पाखंड रचाने लगेगा। यह धीरे-धीरे, मां आएगी, तो मुस्कुराएगा। अभी और तो कुछ कर नहीं सकता। मां समझेगी कि कितना प्रेम करता है बेटा! यह मुस्कुराहट झूठी है। यह बेटा राजनीति सीख गया। यह मां खुश होती है; मां के खुश होने में लाभ है।
बाप घर आता है; बेटा भागा हुआ द्वार पर जाता है; स्वागत करता है। यह वैसे ही समझ गया राज, जैसे कुत्ता--तुम घर आते हो, तो पूंछ हिलाने लगता है। तुमसे कुछ प्रेम है कुत्ते को? कुत्ता राजनीति कर रहा है। कुत्ता राजनीतिज्ञ है। कुत्ता एक बात समझ गया कि पूंछ हिलाने से तुम ऐसे बुद्धू हो कि बड़े प्रसन्न होते हो। तो हिला दो; पूंछ हिलाने में हर्ज क्या है? पूंछ हिला देता है, तो तुम मिठाई भी देते हो। खिलौने भी लाते हो; पुचकारते भी हो।
जैसा कुत्ता सीख जाता है कि पूंछ हिला दो; ऐसा बच्चा सीख जाता है कि मुस्कुराओ; दौड़ कर पिता का हाथ पकड़ लो; मां की साड़ी पकड़ लो। मां का पल्लू पकड़ कर घूमते रहो। मां बड़ी खुश होती है। खुश होती है, तो लाभ है, सुरक्षा है।
ऐसे प्रेम शुरू से ही झूठ होने लगा। फिर एक दिन तुम्हारा विवाह हो जाएगा और तुमसे कहा जाएगा: यह तुम्हारी पत्नी है, यह तुम्हारा पति है, अब इसको प्रेम करो। पति परमात्मा है, इनको प्रेम करो। प्रेम कैसे करोगे? प्रेम को झुठला दिया गया है।
प्रेम किया ही नहीं जा सकता। हो जाए, तो हो जाए। यह आकाश से उतरता है। यह किन्हीं अनजान रास्तों से आता है और प्राणों को घेर लेता है। यह हवा के झोंके की तरह आता है।
देखते हैं: वृक्ष हिलते हैं; हवा का झोंका आ गया। नहीं आएगा, तो नहीं हिलेंगे। ऐसा ही प्रेम है। सूरज निकला, तो रोशनी फैल गई। नहीं निकला, तो अंधेरा है। ऐसा ही प्रेम है।
प्रेम तुम्हारे हाथ में नहीं; प्रेम तुम्हारे बस में नहीं; प्रेम तुम्हारी मुट्ठी में नहीं है। तुम प्रेम की मुट्ठी में हो। यह समर्पण का अर्थ होता है।
तो प्रेम तो सबसे ज्यादा निकट बात है प्रार्थना के।इसलिए प्रेम को अगर तुमने समझ लिया, तो तुम पाओगे: तुम्हारा किया कुछ भी नहीं; परमात्मा करवा रहा है। यही मेरा अर्थ है--अभिनय से।
अभिनय से मेरा अर्थ नहीं है कि तुम कुछ कर रहे हो। तुमने कुछ किया, तो झूठ हो जाएगा। तुमने यह जाना कि मैं करने वाला नहीं हूं; कराने वाला और करने वाला ‘वही’ है; मैं सिर्फ उपकरण-मात्र, उसके हाथ की कठपुतली। ‘मुक्तिमूल आधीनता।’
चौथा प्रश्न:
भगवान, आपके जाने पूर्ण क्रांति क्या है? और क्या आप जयप्रकाश नारायण की पूर्ण क्रांति के संबंध में कुछ और न कहेंगे?
‘क्रांति’ शब्द राजनीतिज्ञों ने उपयोग कर-कर के बहुत गंदा कर दिया है। शब्दों का बहुत उपयोग हो, तो गंदे हो जाते हैं। जैसे धर्मगुरुओं ने ‘ईश्वर’ शब्द को गंदा कर दिया, वैसे ही राजनीतिज्ञों ने ‘क्रांति’ शब्द को गंदा कर दिया।
कोई भी बात क्रांति हो जाती है! छोटा-मोटा परिवर्तन क्रांति कहला जाता है। छोटा-मोटा सुधार क्रांति बन जाता है।
और जयप्रकाश ने तो हद्द कर दी! वे उसको पूर्ण क्रांति कहते हैं--जो हुआ है, यह क्रांति भी नहीं है--पूर्ण तो बहुत दूर। क्रांति क्या है इसमें?
राजनीतिज्ञों का एक दल हट गया, दूसरा दल सत्ता में आ गया। और दूसरे दल में और पहले दल में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। मौसेरे-ममेरे भाई-बहिन हैं। इंदिरा बहिन हों, कि मोरार जी भाई हों--क्या फर्क है? इसमें क्रांति कहां है? सच तो यह है कि दो कदम पीछे हट गए।
इंदिरा से देश नाराज ही इसलिए हो गया कि कुछ क्रांति की कोशिश कर रही थी। क्रांति किसी को बर्दाश्त नहीं होती। कुछ क्रांति की चेष्टा चल रही थी, उसी चेष्टा में कुछ ज्यादतियां हो गईं। ज्यादतियों का कारण इंदिरा ही नहीं थी; ज्यादतियों का कारण--लोग क्रांति बर्दाश्त नहीं करते--यही था।
इस देश की संख्या बढ़ती जाती है। यह देश रोज गरीब होता चला जाता है। लेकिन किसी को कहो कि संतति-नियमन करो, तो वह नाराज होता है। क्योंकि यह देश सदा से यही मानता रहा है कि संतान तो भगवान देता है। और किसी को फिकर ही नहीं है कि इस देश की संख्या इतने जोर से बढ़ रही है; यह रोज-रोज गरीब होता जाएगा।
जब लोग गरीब होते हैं, तो चिल्लाते हैं कि गरीबी मिटाओ। यही देश चिल्लाता है कि गरीबी मिटाओ। और जब गरीबी मिटाने की कोशिश की जाती है, तो अड़चन आती है, क्योंकि इसकी धारणाओं के प्रतिकूल पड़ जाती है व्यवस्था।
गरीबी मिटाने का पहला कदम ही यही होगा कि इस देश की जनसंख्या पर पूरा नियंत्रण हो। लेकिन लोग नाराज होते हैं!
संतति-नियमन करने को कोई राजी नहीं। लोग समझते हैं: यह उनकी स्वतंत्रता पर हमला हो गया। बच्चे पैदा करने की स्वतंत्रता छिन गई?
और लोग सोचते हैं कि कम से कम यह तो हमारी आजादी होनी चाहिए कि हमें कितने बच्चे पैदा करने हैं--वह हम करें। लोग यह सोचते नहीं कि तुम्हारे बच्चे पैदा करने से गरीबी बढ़ती है।
यही लोग चिल्लाते हैं: गरीबी हटाओ। लेकिन जब गरीबी हटाने लग जाओगे, तो यही लोग बाधा बन जाएंगे। और जब ये बाधा डालेंगे...
इंदिरा ने चेष्टा की कि इनकी बाधा को तोड़ो, बाधा को तोड़ा, तो थोड़ी ज्यादती हो गई।
इंदिरा क्रांति की चेष्टा कर रही थी।
पांच महीनों में, जयप्रकाश ने जिस सत्ता को हुकूमत में बिठा दिया है, यह तो बहुत ही प्रतिक्रांतिवादी मालूम होती है।
मैंने भी इस सत्ता का स्वागत किया था, सिर्फ इस आशा से कि जयप्रकाश जैसा व्यक्ति इसके पीछे है; निष्ठावान व्यक्ति पीछे है, शायद कुछ इनसे हो सकेगा। लेकिन पांच महीनों की कथा बड़ी अदभुत है।
इन पांच महीनों में कुछ भी नहीं हुआ; देश नीचे गिरा। जो इंदिरा ने थोड़ा-बहुत काम किया था, वह भी सब खराब कर डाला।
इन पांच महीनों में इन्होंने इतना ही किया कि कोई भूल नहीं की। मगर भूल न करना कोई गुणवत्ता है? असल में भूल उससे होती है, जो कुछ करता है। जो कुछ करेगा ही नहीं, उससे भूल भी कैसे होगी?
इंदिरा ने कुछ करने की चेष्टा की थी, तो भूलें भी हो गई थीं। भूलें निश्चित हो गई थीं। भूलें नहीं होनी चाहिए थीं। लेकिन जब कोई कुछ करने की चेष्टा करता है, तो भूल होनी स्वाभाविक है। स्वीकार करना चाहिए कि भूल होना स्वाभाविक है।
परीक्षा में बैठोगे, तो भूल होगी। परीक्षा में ही नहीं बैठे, तो भूल कैसे होगी?
इन पांच महीनों में, इस सरकार ने कुछ भी नहीं किया, इसलिए इससे भूल का तो तुम कभी इस पर कोई दोषारोपण नहीं कर सकते। किए ही नहीं, तो भूल कैसी? चले ही नहीं, तो कांटा कैसे गड़े? बैठे हैं--अपनी जगह!
और जो किया, कुल जमा इतना किया कि किस तरह पुरानी सत्ता को बदनाम करो। यह भी कोई धंधा है? इसमें इतना समय खराब करने का कोई प्रयोजन नहीं है। जो बात गई--गई।
इस तरह की अभद्रता दुनिया के किसी देश में नहीं होती। अगर हर सरकार यही काम करे कि जब बदलाहट हो, तो नई सरकार आकर पुरानी सरकार के सारे काले-कारनामों को खोजना शुरू कर दे, तो दुनिया में सब काम ही बंद हो जाए। क्योंकि इसको पांच साल का मौका मिला, यह तो उसी में लग जाएगा। फिर दूसरी सरकार आएगी, वह इसकी खोज-बीन करेगी; और इतनी ही भूलें इसमें मिल जाएंगी। क्योंकि जिनके हाथ में सत्ता है, उनसे भूल होनी स्वाभाविक ही है। कुछ न भी करो, तो भूल हो जाएगी। कुछ न करने से भी भूल हो जाती है। कितना ही बचा कर रखो।
और सिर्फ इसलिए थोड़े ही तुम्हें वहां भेजा है कि तुम भूल न करो। और अगर भूल ही नहीं करनी थी, तो अपने घर ही अच्छे थे!
सत्ता में बैठ कर अगर इतना ही करना है कि भूल नहीं करनी है और पुरानी सत्ता की सारी खोज-बीन करनी है, तो यह तो बड़ी अजीब सी बात हो गई।
यह तो ऐसा हुआ कि शिक्षक नया, स्कूल में आए और इसके पहले शिक्षक जो पढ़ाता था बच्चों को, सारा समय उसकी भूल खोजने में लगाए। ये बच्चे हैं, इनको शिक्षा मिली नहीं है। पहला कम से कम कुछ शिक्षा तो दे रहा था; भूल भरी दे रहा होगा। ये सज्जन पिछले की भूल में ही सारा समय लगा रहे हैं!
कितने आयोग बिठा दिए हैं! सारा काम ऐसे मालूम पड़ता है कि किस तरह पुरानी सरकार की भूलें खोज ली जाएं। और मैं नहीं कहता कि भूलें नहीं थीं। भूलें निश्चित थीं, मगर उन पर इतना समय देना तो बड़ी भारी भूल हो जाएगी।
जयप्रकाश इसको पूर्ण क्रांति कहते हैं! इसमें पूर्ण क्रांति जैसा कुछ भी नहीं। क्रांति जैसा भी कुछ नहीं। इसको छोटा-मोटा सुधार भी नहीं कहा जा सकता। सचाई तो यह है यह प्रतिक्रांति हो गई। यह क्रांति से नीचे गिरना हो गया।
जो लोग सत्ता में आए हैं, ज्यादा दकियानूस हैं। जो लोग सत्ता में आए हैं, ज्यादा प्रतिक्रियावादी हैं। जो लोग सत्ता में आए हैं, ज्यादा लकीर के फकीर हैं।
इंदिरा में थोड़ी हिम्मत थी। वही हिम्मत उसे मुश्किल में डाल गई। अगर उसने भी हिम्मत न की होती, तो अभी भी देवी, दुर्गा बनी होती। उसने हिम्मत की तो तुमको नाराजगी हो गई। तुम्हें अड़चन आई। क्योंकि तुम्हारी धारणाएं, तुम्हारी परंपराएं, तुम्हारी व्यवस्थाएं, जरा टूटीं कि तुम मुश्किल में पड़े।
रोज लोग चिल्लाते हैं कि बंबई या दिल्ली या कलकत्ता से झोपड़-पट्टियां अलग होनी चाहिए। मगर जब अलग करोगे, तो अड़चन है! अलग करोगे, तो वे झोपड़-पट्टिओं में जो लाखों लोग रहते हैं, वे नाराज हो जाते हैं। वे हटने को राजी नहीं हैं। उनका मकान छीन रहे हो। उनको बेहतर मकान भी दे दो--गांव के बाहर, तो भी वे नाराज हैं। वे वहीं जम कर बैठे रहेंगे। उनको हटाना है, तो जबर्दस्ती करनी होगी। और उनको न हटाओ, तो वे गंदगी फैला रहे हैं। उनको न हटाओ, तो वे घाव की तरह हैं।
वह तो यही समझो, कि तुम्हारे पैर में घाव हो जाए, तो तुम जाकर ऑपरेशन करवा लेते हो। वह तो जो कीड़े-मकोड़े तुम्हारे घाव में बैठे हैं, अगर उनसे पूछा जाए, तो बहुत नाराज होंगे। वे कहेंगे: हमको हटाया जा रहा है। हमारा घर छीना जा रहा है।
तुम्हें टी. बी. हो जाती है, तो टी. बी. के जो कीटाणु तुम्हारे प्राणों को खाए जा रहे हैं, इलाज क्या है? उनको मार डालो। लेकिन उनसे पूछो, तो वे कहेंगे: बहुत ज्यादती हो रही है। इस एक आदमी को बचाने के लिए करोड़ों कीटाणुओं को मार रहे हो। कुछ तो सोचो! अन्याय कर रहे हो।
झोपड़-पट्टी में जो बैठा है, उसे हटाओ, तो वह नाराज होता है। और वह नाराज हो जाए, तो जिनको सत्ता में जाना है, वे उसके साथ खड़े हो जाते हैं। वे कहते हैं: यह जनता के साथ ज्यादती हो रही है।
इस जगत में कुछ भी करना हो, तो ज्यादती तभी बचाई जा सकती है, जब लोग सहज स्वागत से उसे करने को राजी हो जाएं। नहीं तो ज्यादती नहीं बचाई जा सकती। या फिर कुछ किया नहीं जा सकता। न किया जा सके, तो...
गरीबी हटानी है, देश को समृद्ध बनाना है। और लोगों की गरीबी की आदतें पड़ गई हैं। और लोगों की जो जीवन-शैली है, वह ऐसी है कि उन्हें गरीब से गरीब बनाए जाती है। उनकी जीवन-शैली तोड़नी पड़ेगी, तो क्रांति हो सकती है।
मेरे देखे जो राज्य-व्यवस्था जनता के अतीत से राजी न हो और भविष्य के लिए उन्मुख हो, वही क्रांति कर सकती है। जो राज्यसत्ता जनता के अतीत के साथ तालमेल बिठा रखना चाहे, लोगों को खुश रखना चाहे, वह राज्यसत्ता क्रांति नहीं कर सकती।
पांच महीनों की कथा बहुत अजीब है। आशा निराशा में बदल गई। और जयप्रकाश ने वही किया जो पहले गांधी कर चुके थे। वही भूल, वही नासमझी। इसे भी समझ लेना जरूरी है।
गांधी लड़े अंग्रेजों से, और जब सत्ता हाथ में आई, तो सत्ता लेने की जिम्मेवारी नहीं ली; बच गए। क्योंकि इतनी बात गांधी को भी साफ थी कि अगर सत्ता हाथ में ली, तो थोड़े ही दिन में पता चल जाएगा कि जो नारे दिए थे--लोगों को--वे पूरे नहीं किए जा सकते। जनता की समस्याएं बड़ी कठिन हैं। अंग्रेजों के कारण नहीं थीं समस्याएं, नहीं तो अंग्रेजों के जाते, सब समस्याएं समाप्त हो जातीं। समस्याएं कठिन हैं, जटिल हैं।
गांधी होशियार राजनीतिज्ञ थे। एक बात उनको साफ समझ आ गई कि सत्ता में बैठे, तो प्रतिष्ठा खो जाएगी। क्योंकि हल तो होने ही वाला नहीं है। समस्याएं ऐसी हैं कि एक हल करोगे, दस उलझ जाती हैं। इतना बड़ा देश है; इतनी बड़ी समस्याएं हैं; इतनी उलझनें हैं। और जनता को खुश रखना है, वह सबसे बड़ा उपद्रव है। वही जनता बाधा है। उसके ही हित में बाधा है।
तो गांधी कन्नी काट गए। वह कन्नी काटना भी हम को खूब अच्छा लगा। यही तो हमारा मजा है। जनता की मूढ़ता ऐसी तो है! हमने कहा: यह है संत; सत्ता हाथ में आई और नहीं ली!
मगर यह तो ऐसा हुआ कि एक मरीज को डॉक्टर टेबल पर लिटा दे और पेट खोल दे और फिर कह दे कि मैं ऑपरेशन नहीं करता। इसको संत कहोगे? यह कहे: अब ऑपरेशन हमारा असिस्टेंट कर देगा। क्योंकि यह पेट काट कर देखे कि इस आदमी की बचने की उम्मीद नहीं है। मैं झंझट क्यों लूं? मैं दूर खड़ा रह जाऊं। मैं अपने को बचा लूं। असिस्टेंट काट दे। बच गया, तो मैंने बचाया, क्योंकि मैंने ही शुरुआत की, और मेरा ही असिस्टेंट है। और मर गया, तो असिस्टेंट से भूल हो गई!
तो गांधी बच गए; सत्ता में नहीं गए। गांधी को सत्ता में जाना चाहिए था। वह उनकी बेईमानी थी। वह बड़ा कुशल काम कर गए। और जनता खूब प्रसन्न हुई। जनता ने कहा: महात्मा यह है!
यह जनता ऐसी मूढ़ है! उसने कहा: महात्मा यही है। जनता को जोर देना था कि ‘तुम’ लड़े; तुमने हमें लड़ाया, अब सत्ता हाथ में आई है, तो तुम जो कहते थे करके दिखाना, वह करके दिखा दो! अब तो स्वराज्य आ गया, अब सुराज्य भी लाकर दिखा दो। तुम राम-राज्य की बातें करते थे, अब मौका मिला, अब राम-राज्य लाकर दिखा दो।
तुम जो सारी बातें कहते रहे, पिछले पचास साल तक, अब तुम्हें अवसर मिला है, तो भागते कहां हो! अगर देश समझदार होता, तो जनता ने जोर दिया होता, कि तुम सत्ता में जाओ। उससे दो बातें साफ हो गई होतीं: या तो गांधी कुछ कर सकते, तो देश को लाभ होता। या कम से कम उनसे छुटकारा हो जाता देश का। मुझे आशा है कि उनसे छुटकारा हो जाता।क्योंकि देश देख लेता कि बात खत्म हो गई।
कल मैंने राजनारायण का वक्तव्य पढ़ा। वह वक्तव्य महत्वपूर्ण है। राजनारायण ने इस वक्तव्य में कहा है कि ‘जब मैं मिनिस्टर नहीं बना था, तब मेरी ज्यादा प्रतिष्ठा थी। अब मेरी प्रतिष्ठा कम हो गई!’
यह आदमी साफ-सुथरा है। ऐसा कोई कहता नहीं। मोरार जी भाई ऐसा न कहेंगे। यह आदमी साफ-सुथरा है, सीधा-सादा है। इसने सच्ची बात कह दी--कि जब मैं सत्ता में नहीं था, तब मेरी प्रतिष्ठा ज्यादा थी। अब मेरी प्रतिष्ठा कम हो गई।
सत्ता में जाने से प्रतिष्ठा कम होगी ही। क्योंकि सत्ता में तुम जिन समस्याओं को लेकर गए थे, वे हल तो होती नहीं। लोगों ने तुम्हें प्रतिष्ठा दी थी, क्योंकि तुम शोरगुल मचाते थे--कि ऐसा होना चाहिए और नहीं हो रहा है, और मैं करके दिखा सकता हूं।
लोगों ने तुम्हें भेजा। फिर वहां जाकर तुम बैठ गए। जो हो रहा था, वह भी नहीं हो रहा है। वह भी खत्म हो गया। तुमसे तो कुछ हो ही नहीं रहा, तो प्रतिष्ठा तो खत्म हो ही जाएगी।
गांधी अगर दो साल सत्ता में रह गए होते, तो जो काम गोडसे नहीं कर पाया, वह सत्ता ने कर दिया होता; वे सदा के लिए मर गए होते। उनसे इस देश का सदा के लिए छुटकारा हो गया होता। अब कभी छुटकारा नहीं होगा, क्योंकि यह आशा मन में लटकी ही रहेगी कि काश, गांधी की कोई मान कर चलता, तो देश में सुराज्य आ जाता, देश में राम-राज्य आ जाता। और अब? गांधी तो चूक ही गए। वह तो अब कोई उपाय ही नहीं रहा जांचने का।
वही जयप्रकाश ने फिर किया।
लोग कहते हैं: जयप्रकाश गांधी के वसीयतदार हैं। मैं भी कहता हूं। यह उन्होंने साफ कर दिया--सत्ता से बच कर!
तुम लड़े; तुमने मेहनत की; तुमने पुरानी सत्ता को उखाड़ दिया। अब यह तुम्हें मौका मिला था कि तुम बता देते कर के, कि तुम कुछ कर सकते हो। फिर बच गए!
अब जयप्रकाश की समाधि भी वहीं राजघाट में बन जाएगी, जहां गांधी की है। अभी लोग एक पर फूल चढ़ाते हैं, फिर दो पर फूल चढ़ाने लगेंगे। बस, इतनी ही क्रांति हुई, और कुछ न हुआ।
यह बेईमानी है। क्या फर्क हुआ? और फर्क भी ऐसा, जिसका कोई मूल्य नहीं आंका जा सकता। कोई मूल्य है नहीं।
सच तो यह है कि अब सारा जो नया वर्ग सत्ता में गया है, वह इतना ही कह रहा है, कि उन्होंने देश को वह जो संकटकाल की, आपातकाल स्थिति थी, उससे छुटकारा दिलवा दिया। लेकिन मजा यह था कि इनके ही उपद्रव के कारण वह आपातकाल स्थिति डाली गई थी। नहीं तो उसके डालने की कोई जरूरत ही न थी। ये ही कारण थे।
जयप्रकाश और मोरार जी ने जो उपद्रव मचाने शुरू किए थे, उसके कारण आपातकालीन स्थिति आई--इमरजेंसी आई। अब ये कहते हैं: हमने उससे छुटकारा दिलवा दिया! तुम्हीं उसके जन्मदाता थे। तुम उपद्रव न करते, तो इंदिरा कोई आपातकाल स्थिति लाने के लिए उत्सुक नहीं थी। तुमने उपद्रव किया, उसको आपातकाल स्थिति लानी पड़ी। अब तुम्हारा उपद्रव सफल हो गया; तुमने आपातकालीन स्थिति खत्म कर दी। देश जहां के तहां है! कहीं कुछ फर्क नहीं हुआ।
आपातकालीन स्थिति का सारा जिम्मा इंदिरा पर छोड़ना उचित नहीं है। नब्बे प्रतिशत जिम्मा इन पर है--जो अब सत्ता में हैं। यह मजबूरी थी; लानी पड़ी।
जयप्रकाश इस तरह की बात करने लगे कि पुलिस का सैनिक, और फौज का सिपाही भी बगावत करे। इस तरह की बातें अगर की जाएंगी तो कोई भी सत्ता, देश की सुरक्षा के लिए कुछ करेगी; करना ही पड़ेगा। वह मजबूरी थी।
अब ये सत्ता में आ गए हैं। जयप्रकाश तो बच कर निकल गए, अब उनका कभी दोष पकड़ा न जा सकेगा। और जिनके हाथ में सत्ता चली गई, वे इंदिरा से ज्यादा प्रतिक्रियावादी हैं।
मोरार जी भाई को किसी ने कभी सोचा था कि ये कोई क्रांतिकारी हैं? मुझसे तो एक सज्जन कह रहे थे: इनका असली नाम मोरार जी भाई नहीं, मगरूर जी भाई है!
इन्हें कभी किसी ने सोचा ही नहीं था कि ये क्रांतिकारी हैं, इनसे क्रांति हो सकती है!
इंदिरा के हाथ में कम से कम जवानी के हाथ में सत्ता थी। अब ये बिलकुल मुर्दों के हाथ में सत्ता चली गई।
और ये जो बातें कर रहे हैं, उससे क्रांति का क्या लेना-देना है? गौ-हत्या बंद हो जाए--इससे क्रांति होती है?
यह देश तो मूढ़ है! यह देश मूढ़तापूर्ण बातों में रस लेता है। अगर यहां गौ-हत्या बंद हो जाए, तो लोग समझेंगे: हो गई क्रांति! गौ-हत्या बंद होने से क्या होगा? भूखे का पेट भरेगा? थोड़ा और भूखा हो जाएगा। क्योंकि वह जो गौएं बच जाएंगी, उनको भी खिलाना पड़ेगा।
और मैं यह नहीं कर रहा हूं कि गौ-हत्या होनी चाहिए। मैं यह कह रहा हूं: यह कोई क्रांति नहीं होगी।
अब मोरार जी भाई दीवाने हैं कि शराबबंदी हो जाए। शराबबंदी से फर्क होगा? शराबबंदी से देश खुशहाल हो जाएगा?
असल में वह जो गरीब है, जो दुखी है, परेशान है, पीड़ित है, जो बिलकुल मरा जा रहा है--शराब ही उसका सहारा है। वह उसी के सहारे जी लेता है। किसी तरह अपने को भुला लेता है। वह भी छीन लो उससे! दिन भर की तकलीफें और दिन भर की परेशानियां, सांझ पी लेता है और भूल जाता है: चलो, कल देखा जाएगा। अब कल जब होगा, तब होगा।
शराबबंदी कर देने से लोगों के दुख न मिटेंगे। हां, लोगों के दुख मिट जाएं, तो शराबबंदी अपने से हो जाएगी।
मैं भी शराबबंदी के पक्ष में हूं, मगर शराबबंदी के सीधे पक्ष में नहीं हूं।
मैं कहता हूं: लोग दुखी हैं; लोग परेशान हैं; लोग इतने परेशान हैं कि शराब उनका सहारा है। नहीं तो कौन जहर पीता है? कोई सोच समझ कर जहर पीता है? कोई खुशहाल आदमी जहर पीता है? लोग चिंतित हैं। और तुम यह मत सोचना कि जिनके पास धन है, वे चिंतित नहीं है। वे भी चिंतित हैं।
यह देश इतना गरीब है कि इस देश में धनी होना और भी चिंता का कारण है। अगर तुम--नंगे आदमियों के बीच एक आदमी कपड़ा पहने खड़ा है, तो कितनी देर कपड़ा पहने खड़े रहोगे? कुछ पक्का है; ये जहां हजार नंगे आदमी खड़े हैं और सब तुम से छीने-झपटने को तैयार हैं कि कब तुम्हारे कपड़े चीर-फाड़ कर फेंक देंगे! कपड़ा तो छीनेंगे, तुम्हारी चमड़ी भी छोड़ेंगे कि नहीं...!
जहां हजार नंगे आदमी खड़े हैं, वहां एक आदमी कपड़ा पहने खड़ा है--इसकी चिंता का तुम्हें अंदाज नहीं है। यह नंगे आदमियों से ज्यादा परेशान है। क्योंकि इसको लग रहा है--ये कपड़े आज नहीं कल छिनने वाले हैं। कोई इधर से खींच रहा है, कोई उधर से खींच रहा है! इसको डर है कि कपड़े तो जाएंगे ही, हाथ-पैर भी बचेंगे--मुश्किल है। गर्दन भी बचेगी--मुश्किल है।
शराबबंदी से कुछ भी न होगा। यह देश को धोखा देना है। यह क्रांति इत्यादि नहीं है। यह असली सवालों को हटा कर नकली सवाल बीच में लाना है। और नकली सवालों के साथ एक मजा है कि लोग उनसे राजी होते हैं। यहां शराब पीने वाला भी, जहां तक कहने का संबंध है, वह भी कहेगा: हां, शराब बुरी चीज है। शराब बुरी चीज है ही--यह सभी मानते हैं। इसलिए कौन कहेगा कि यह शराबबंदी नहीं होनी चाहिए!
यहां जो आदमी गौ का भक्त नहीं भी है; वह भी यह नहीं कहेगा कि गौ कटनी चाहिए। मुसलमान भी नहीं कहेगा कि कटनी चाहिए, क्योंकि बात तो सीधी-साफ है--कि हिंसा अच्छी नहीं हो सकती।
तो ये बातें तो हमारी धारणा में ही बैठी हुई हैं कि गौ नहीं कटनी चाहिए; शराब नहीं पी जानी चाहिए। यह लोक-मानस के अनुकूल चलना है। हालांकि इससे कुछ हल नहीं होगा।
जरा सोच लो कि गौ कटना बंद हो गई। मान लो। और शराबबंदी हो गई। क्या फर्क पड़ेगा? कितना फर्क पड़ेगा? गरीब की गरीबी मिटेगी? अशिक्षित शिक्षित हो जाएगा? जिनके पास मकान नहीं, उनके पास मकान होंगे? क्या होगा? इससे खतरे ही बढ़ेंगे।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि गरीब आदमी के लिए, भूखे-परेशान के लिए अगर शराब न हो तो फिर दूसरा मनोरंजन का एक ही उपाय बचता है सस्ता--और वह है: संभोग। अगर वह रात शराब पीकर आ गया पति, तो चुपचाप सो जाता है। या थोड़ा शोरगुल मचाता है; इधर-उधर घूम कर, गिर-फिर कर, आकर सो जाता है। अगर वह शराब पी कर नहीं आया, तो एक ही उपाय है कि संभोग करे।
शराबबंदी इस देश की संख्या को बढ़ा देगी। और शराबबंदी इस देश में लोगों के तनाव और बेचैनियां बढ़ा देगी। और लोग जब ज्यादा तने होते हैं, ज्यादा बेचैन होते हैं, ज्यादा परेशान होते हैं, तो ज्यादा हड़तालें होंगी, ज्यादा दंगे होंगे, ज्यादा छुरेबाजी होगी, हिंदू-मुस्लिम दंगे होंगे; महाराष्ट्रियन-गुजराती लड़ेंगे; ऐसा होगा, वैसा होगा--ये सब उपद्रव होंगे।
शराब शामक है। और खयाल रखना कि मैं शराब का पक्षपाती नहीं हूं। मैं भी चाहता हूं कि शराब चली जाए, क्योंकि इससे अहित तो होता है। इससे स्वास्थ्य की हानि तो होती है। मगर शराब जाए; उसके मूल कारण हट जाएं--तो जाए। नहीं तो कोई मतलब नहीं है।
गौ-हत्या जरूर बंद होनी चाहिए। लेकिन जहां आदमी की हत्या हो रही है, वहां गौ-हत्या बंद नहीं हो सकती।
यहां मेरे पास इतने पश्चिम से आए संन्यासी हैं, वे सभी मुझे कहते हैं कि यहां की गौएं ऐसी--मरी-मराई--कि हमने कभी पश्चिम में देखी नहीं थीं। पश्चिम की गाय बड़ी शानदार होती है। तीस-चालीस सेर दूध देना गाय के लिए बिलकुल सहज बात है। रोज साठ सेर दूध देने वाली गाएं पश्चिम में आम हैं। यहां की गाय? तीन पाव दूध दे दे, तो बहुत है!
आदमी मरा जा रहा है, गौ को खिलाने के लिए कहां है! और तुम गौएं बढ़ा लोगे। पानी पिलाने को नहीं है; घास खिलाने को नहीं है और गौओं की भीड़ बढ़ाते जाओगे।
और मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि गौएं मारी जाएं। मैं किसी के भी मारे जाने के पक्ष में कैसे हो सकता हूं! इसलिए मेरी अड़चन समझना।
मैं जानता हूं कि गौएं बचनी चाहिए। लेकिन यहां आदमी मरा जा रहा है, तो पहले गाय तो नहीं बचाई जा सकती। पहले आदमी को बचाना होगा। आदमी बचेगा, तो गाय बच सकती है--किसी दिन। गाय के बचने से आदमी नहीं बचेगा। गाय क्या करेगी? जितनी संख्या गाय की हो जाएगी, उतना दूध गायों से कम मिलने लगेगा, क्योंकि भोजन उतना बंट जाएगा।
पश्चिम में गायों की संख्या ज्यादा नहीं है। गाएं कम हैं, लेकिन उनको फिर भोजन पूरा मिलता है।
पचास गाएं हों तुम्हारे घर में और भोजन उतना ही है, तो पचास में बंट जाता है। पचास गायों का मिल कर दूध पचास सेर हो पाता है।
पश्चिम में एक गाय होती है--पचास गाएं नहीं होतीं। मगर एक गाय पचास सेर दूध दे देती है। और एक गाय का खर्चा कम है। पचास गायों का उपद्रव: उनको रखने का इंतजाम, उनकी सेवा-टहल, आदमी--सबकी व्यवस्था चाहिए।
पश्चिम में दूध-दही की नदियां अभी भी बह रही हैं, जिनकी तुम पुराणों में बात करते हो। लेकिन हमारी मूढ़ता ऐसी है कि व्यर्थ की बातें हमें बड़ी क्रांतिकारी मालूम होती हैं। बिलकुल दो-कौड़ी की बातें, जिनका कोई मूल्य नहीं है; जिनमें कहीं कोई समझदारी की झलक नहीं है।
लेकिन यह जनता मूढ़ है। इस जनता के नेता तुम्हें बने रहना है, तो जो जनता मानती है, वैसा करो।
अब एक चमत्कार की घटना घटी न! यह पहला मौका था कि जनसंघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुसलमान एक साथ इंदिरा के खिलाफ हो गए। जो सदा के दुश्मन थे, वे साथ हो गए! इंदिरा को हराने में हिंदू मतवादी और मुसलमान--दोनों इकट्ठे हो गए। ये सदा के दुश्मन! इनको मामला क्या हो गया? एकदम से साथ, दोस्ती कैसे बढ़ गई? इन्होंने सदा एक-दूसरे की छाती में छुरा भोंका था। ये एक साथ कैसे हो गए?
वह जो संतति-नियमन का प्रयोग चला--उसके कारण एक हो गए। मुसलमान बहुत नाराज हो गए। उत्तर प्रदेश में इंदिरा की हार मुसलमान
की नाराजगी है--और कुछ भी नहीं। मुसलमान बर्दाश्त नहीं कर सका--कि उसकी संतति की स्वतंत्रता पर बाधा डाली जाए।
मुसलमान अजीब सी बातों में पड़ा है। जैसे मुसलमानों का नियम है कि चार औरतों से शादी कर सकते हो! अब जो भी बाधा डालेगा इसमें, मुसलमान उस पर नाराज हो जाएगा। अब यह बात बिलकुल अनैतिक है--कि एक आदमी चार स्त्रियों से शादी करे। और अगर यह नैतिक है, तो फिर एक स्त्री चार आदमियों से शादी करे--यह अनैतिक क्यों है?
यह तो ज्यादती है। यह तो शोषण है। लेकिन अगर कोशिश करो, कि हम कानून बनाएंगे कि एक आदमी एक ही स्त्री से शादी कर सकेगा, तो मुसलमान नाराज हो जाता है। उसकी स्वतंत्रता पर बाधा पड़ रही है। स्त्रियों का वह शोषण करता रहा है--सदा से।
स्त्रियों का इस्लाम में कोई आदर नहीं है; बड़ा अनादर है। इससे बड़ा अनादर क्या होगा कि तुम चार स्त्रियों के मालिक बन जाते हो! और मुसलमान को उसमें फायदा दिखाई पड़ता है। फायदा यह है कि वह चार स्त्रियों से काम करवाने लगता है। तो उसकी आमदनी चौगुनी हो जाती है।
और इसलिए लोग बच्चे रोकने में भी बाधा डालते हैं। क्योंकि छोटे-छोटे बच्चों को काम में लगा देते हैं। स्कूल वगैरह भेजना नहीं है। अगर स्कूल भेजने की जबर्दस्ती करो, तो उनकी स्वतंत्रता में बाधा पड़ती है!
स्कूल भेजना नहीं है; छोटे-छोटे बच्चों को काम में लगा दिया। गाएं चराने जाने लगे; घास काटने लगे; गड्ढा खोदने लगे; लकड़ी फाड़ने लगे। छोटे-छोटे बच्चों को काम में लगा दिया। तो जितने ज्यादा बच्चे हों, उतना ही थोड़ा ज्यादा पैसा आने लगा।
ऐसा व्यक्ति को तो दिखाई पड़ता है, लेकिन पूरे समूह का जीवन रुग्ण होता चला जाता है। अब जो भी इनको छेड़ेगा, वही दुश्मन हो जाएगा।
इंदिरा का गिर जाना इस कारण हुआ कि इंदिरा कुछ क्रांति करने की कोशिश कर रही थी, और अगर उसे ज्यादती करनी पड़ी, तो उसका कारण इंदिरा नहीं थी। उसका कारण वे लोग थे, जिन्होंने बाधाएं डालीं।
तुम ही बाधा डालोगे, तुम्हारे ही हित में बाधा डालोगे!
ये जो सत्ता में आ गए लोग हैं, मैंने भी इनका स्वागत किया था, इस आशा से कि जयप्रकाश एक निष्ठावान आदमी हैं। मगर वह भी वैसा ही धोखा दे गए, जैसा पहले गांधी दे गए थे। उन्होंने ठीक वसीयत पा ली! अब वे बैठ गए जाकर पटना, और जिन बातों के लिए वे इंदिरा से लड़े थे, वे सबकी सब बातें वैसी की वैसी जारी हैं। कहीं कोई फर्क नहीं हुआ।
कल मैं एक गीत पढ़ रहा था। बालकवि वैरागी का गीत है। वह मुझे पसंद पड़ा। उसे समझना।
गंतव्य वही, मंतव्य वही,
आदेश वही, अधिकार वही,
रीति वही, रणनीति वही,
प्रतिशोध वही, प्रतिकार वही
जो क्रांति बताता है इसको
उस चिंतन की बलिहारी है
परिवर्तन को क्रांति बताना
संभवतः लाचारी है
जब चिंतन पर काई जम जाए
विप्लव की भांवर थम जाए
तो समझो पीढ़ी हार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
ये हिंसक और अहिंसक क्या,
ये परिभाषा क्या, भाषा क्या,
ये भाषण क्या, प्रतिभाषण क्या,
ये अभिनय और तमाशा क्या,
बस, क्रांति क्रांति ही होती है
पहले तुम इतना मानो तो
फिर बेशर्त करो मसीहाई
इस पीढ़ी को पहचानो तो
जब घाव वही, अलगाव वही
बात वही, बिखराव वही
तो आहुति क्या बेकार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
जब अग्नि-बीन का गायक ही
खो जाए मेघ मल्हारों में
तो जी करता है आग लगा दूं
अग्नि-बीन के तारों में
तुम आग जगा कर कहते हो
हे ज्वाला मां अब सो जाओ
जब तक हम गाएं दरबारी
तब तक तुम पानी हो जाओ
जब दीन वही, ईमान वही
जब मुरदे और मसान वही
तो झंझा किसे झंझकार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
वे चाट गए उस सावन को
इस फागुन को ये पी जाएं
दोनों ने कसमें खाई हैं
ये बगिया कैसे जी जाए
सप्तम में राहू बैठ गया
शायद माली और डाली के
लग्न बराबर मिले नहीं
इस लाली और हरियाली के
जब भंवरों का वक्तव्य वही
जब तितली का भवितव्य वही तो मधुऋतु किसे संवार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
मैं कल भी भैरव गाता था
मैं अब भी भैरव गाता हूं
मैं कल भी तुम्हें जगाता था
मैं अब भी तुम्हें जगाता हूं
वो अंधियारे की साजिश थी
ये साजिश का उजियारा है
इस पीढ़ी को हर सूरज ने
मावस से मिल कर मारा है
जब घात वही, प्रतिघात वही
काजल कुंकुंम की जात वही
तो ऊषा किसे निखार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
कल आग जिन्हें आवश्यक थी
वे सिर पर सावन ढोते हैं
जो कल तक सावन ढोते थे
वे आज आग को रोते हैं
ये सब मौसम के तस्कर हैं
सब मिली-जुली चतुराई है
सब सपनों के सौदागर हैं
ये सब मौसेरे भाई हैं
अंबर के नारे वे के वे
और अंधे तारे वे के वे
घूंघट में डायन मार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
गंतव्य वही, मंतव्य वही
आदेश वही, अधिकार वही,
रीति वही, रणनीति वही,
प्रतिशोध वही, प्रतिकार वही
जो क्रांति बताता है इसको
उस चिंतन की बलिहारी है
परिवर्तन को क्रांति बताना,
संभवतः लाचारी है
जब चिंतन पर काई जम जाए
विप्लव का भांवर थम जाए
तो समझो: पीढ़ी हार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
कुछ फर्क नहीं हुआ। सब वैसे का वैसा है।
और यह भी मैं तुमसे कहना चाहूंगा कि यही इस घटना में हुआ हो--ऐसा भी नहीं। आज तक जगत में कोई राजनैतिक क्रांति, क्रांति नहीं हुई।
क्रांति का शास्त्र ही व्यर्थ हो गया है। क्रांति की बात ही अब क्रांतिकारी नहीं रही। सब क्रांतियां हार गई हैं। फ्रेंच क्रांति हारी; रूसी क्रांति हारी, चीनी क्रांति हारी--सब क्रांतियां हार गईं। कोई क्रांति जीती नहीं।
इससे एक सार की बात समझ लेनी चाहिए कि सत्ता में परिवर्तन से क्रांति नहीं होती। लोगों के सत्वों में परिवर्तन होना चाहिए। राज्य से क्रांति नहीं होती; समाज से क्रांति नहीं होती; केवल व्यक्ति से क्रांति होती है। केवल व्यक्ति की चेतना में क्रांति का दीया जलता है।
इसलिए मेरी कोई उत्सुकता राज्य में, सत्ता में, समाज में नहीं है। मेरी उत्सुकता तुममें है, व्यक्ति में है। एक-एक व्यक्ति रूपांतरित हो, बड़ी संख्या लोगों की रूपांतरित हो जाए, तो समाज भी बदल जाएगा। लेकिन समाज को सीधे बदलने का कोई उपाय नहीं है। कैसे बदलोगे? क्योंकि जिस समाज को बदलना है, उसी से वोट मांगनी होगी। इस यंत्र को समझो।
जिसको बदलना है, उसी से वोट मांगनी है। वोट वह तभी देगा, जब तुम उसके अनुकूल हो। तुम प्रतिकूल हो गए, तो वह वोट नहीं देता। और तुम्हें अगर बदलना है, तो तुम्हें प्रतिकूल होना पड़ेगा। तब तो बड़ी झंझट हो गई। यह गणित तो बहुत उलझ गया।
तुमसे आज्ञा लेनी है और तुम्हारे ही खिलाफ काम करना है। तुम आज्ञा ही न दोगे पहले तो; और अगर तुमने आज्ञा भी दे दी--किसी आश्वासन में, किसी भ्रम में--तो जैसे ही बदलाहट शुरू होगी, तुम नाराज हो जाओगे। तुम कहोगे: धोखा हो गया! हमें कहा कुछ था, किया कुछ जा रहा है।
जनता की यह जो भीड़ है, यह बिलकुल अंधकार में खोई हुई है। इसे यह भी पता नहीं कि इसके हित में क्या है? इसे यही पता होता, तो हित कभी का हो गया होता। इसे यह भी पता नहीं कि अहित में क्या है? यह अपने ही अहित को किए चली जा रही है। यह अपने ही हाथ से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारे चली जाती है! इसे तुम रोको, तो यह नाराज होती है।
तो जिसको क्रांति करनी हो, वह जनता से मत न ले पाएगा। और जिसे जनता से मत लेना हो, उसे क्रांति की बातचीत करनी चाहिए, लेकिन क्रांति का काम नहीं करना चाहिए, क्रांति की झंझट में नहीं पड़ना चाहिए।
इंदिरा उसी झंझट में पड़ी। उसे धीरे-धीरे ऐसा लगा कि अब कुछ हो सकता है; कुछ किया जा सकता है।
मुझे याद आती है, काफी वर्ष हो गए, तब इंदिरा से मेरा मिलना हुआ था। तब मोरार जी इंदिरा के साथ उप-प्रधानमंत्री थे। मुझे भलीभांति याद है इंदिरा ने मुझे कहा कि आप जो कहते हैं, मैं पढ़ती हूं और आपकी बातें मुझे ठीक लगती हैं। लेकिन आप तो जानते ही हैं, मैं मोरार जी भाई जैसे आदमियों के साथ उलझी हूं। कुछ काम हो नहीं सकता। कुछ भी करना चाहो, अड़चन खड़ी हो जाती है। इन सब को बांध कर चलाना बहुत मुश्किल है। जरा भी कुछ नया करना चाहो कि वे सब ठिठक कर खड़े हो जाते हैं। वे कोई साथ देना नहीं चाहते।
तो मैंने इंदिरा को कहा था: जो इस तरह ठिठक कर खड़े होते हैं, उनको धीरे-धीरे विदा करो। उसने किया भी; धीरे-धीरे उनको विदा भी किया। मगर इतने लोगों को विदा कर दिया कि वे सब इकट्ठे हो गए। उन सब ने इकट्ठे होकर, जो क्रांति की संभावना थी, उसको फिर मार डाला।
इसलिए मैं यह तो देख ही नहीं पाता कि राज्य की सत्ता के आधार पर कोई क्रांति कभी हो सकती है।
स्टैलिन को भी कम से कम एक करोड़ आदमी मार डालने पड़े रूस में। और ये जो एक करोड़ आदमी मारे, ये कोई करोड़पति नहीं थे। इतने करोड़पति कहां पाओगे? इतने करोड़पति होते, तो फिर जरूरत ही क्या थी? ये सब गरीब लोग थे। मगर इन गरीबों ने बड़ी बाधा दी क्रांति में। बड़ी मजबूरियां खड़ी कर दीं। असल में यही असली जड़बुद्धि लोग हैं। इन्होंने इतनी बाधाएं खड़ी कर दीं, कि इनको रास्ते से हटाना पड़ा। लेकिन वह तो अधिनायकशाही थी, तो स्टैलिन कर सका।
आज रूस में जो भी थोड़ा-बहुत धन-वैभव है, वह स्टैलिन की जबर्दस्ती की वजह से है। अगर लोकतंत्र होता, तो यह भी नहीं हो सकता था।
हालांकि मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि एक करोड़ लोग मारे जाएं। यह बड़ा मूल्य हो गया। और मैं इस पक्ष में भी नहीं हूं कि लोगों की सारी स्वतंत्रता नष्ट कर दी जाए; कि उन्हें बिलकुल काराग्रह में डाल दिया जाए।
माओ भी कर सका चीन में, काफी काम कर सका, लेकिन काम कर सका बंदूक के बल पर।
जिनके हित में काम करना है, उनकी ही छाती पर संगीन लगानी पड़ती है, तब वे काम करते हैं, नहीं तो वे ही काम नहीं करते।
माओ ने जो किया, और स्टैलिन ने जो किया...
इंदिरा को धीरे-धीरे यह बात समझ में आनी शुरू हो गई थी। अगर कुछ करना है, तो थोड़ी जबर्दस्ती करनी होगी। उसी जबर्दस्ती के कारण इंदिरा को हट जाना पड़ा, क्योंकि यह लोकतंत्र है। यहां हर पांच-सात साल में तुम्हें जनता से जाकर फिर प्रमाण-पत्र लेना होगा कि जनता तुमसे राजी है। अब पांच साल में दुनिया नहीं बदलती।
हर पांच साल में जनता से जाकर आज्ञा लेनी है। अगर तुमने जरा ही जनता के खिलाफ कुछ किया, पांच साल बाद तुम सत्ता से उतार दिए जाओगे। और जनता के खिलाफ करना ही होगा, नहीं तो क्रांति नहीं होने वाली है।
इसलिए मेरे देखे सत्ता के माध्यम से तो एक ही उपाय है: या तो अधिनायकशाही हो--जो कि बड़ा मूल्य ले लेती है; लोगों का प्राण छीन लेती है। रोटी दे देती है, रोजी दे देती है, छप्पर दे देती है, लोगों की आत्माएं मर जाती हैं। रूस, चीन में वही हुआ।
और या फिर लोकतंत्र आजादी तो कायम रखता है, स्वतंत्रता तो कायम रखता है, लेकिन क्रांति नहीं हो पाती। लोकतंत्र और क्रांति में मेल नहीं बैठ पाता है।
तो उपाय क्या है? उपाय एक ही है कि हम व्यक्ति को सीधा पहुंचें। हम व्यक्ति को पकड़ें। हम व्यक्ति में ही क्रांति लानी शुरू करें। धीरे-धीरे एक-एक व्यक्ति बदलता जाए, उसकी समझ, धारणा बदलती जाए, तो जो समूह पैदा होगा, वह समूह, क्रांति को स्वीकार कर सकेगा। मैं वही कर रहा हूं।
मेरा राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है। मैं बिलकुल अराजनैतिक व्यक्ति हूं। मुझे सत्ता से कोई प्रयोजन नहीं है। लेकिन बुनियाद रखी जा रही है क्रांति की। अगर इस देश में मेरे संन्यासियों की संख्या काफी हो, तो जो भी क्रांति आएगी, उसको कोई हिंसा नहीं करनी पड़ेगी। मेरा संन्यासी उसका स्वागत करेगा। वह फूल बरसाएगा--उसके स्वागत में। उसकी धारणाएं ही तब तक बदल चुकी होंगी; वह नई चेतना और नई ज्योति से भरा होगा। नई समझ और नये विचारों की तरंगें उसके मन में होंगी। वह समझ पाएगा कि कहां अड़चनें हैं। कहां से अड़चनें तोड़नी हैं और उनको तोड़ने में सहयोगी हो सकेगा।
इंदिरा ने कोशिश की, लेकिन लोग तैयार नहीं थे। लोगों को तैयार किया जाना था।
स्टैलिन ने कोशिश की, लोग बिलकुल तैयार नहीं थे, तो लोगों कि हत्या करनी पड़ी। फिर लोगों ने भी बदला लिया। फिर स्टैलिन के मरते ही लोगों ने बदला लिया। स्टैलिन का नाम पोंछ डाला रूस से।
माओ से भी बदला ले रहे हैं। माओ की पत्नी जेल में पड़ी है। हालांकि माओ की कब्र पर फूल चढ़ाते हैं। लेकिन वे भी ज्यादा दिन नहीं चढ़ेंगे। माओ ने जो किया था--एक साल में, माओ के मरने के बाद--जिनके हाथ में सत्ता आई, उन्होंने उसको पोंछ डाला।
जीवन का जाल काफी उलझा हुआ और जटिल है। जयप्रकाश नारायण जैसा सोचते हैं, उतना सरल नहीं है--कि आदमी बदल दिए; एक की जगह दूसरे को बैठा दिया; क्रांति हो गई! यह तो सुधार भी नहीं होता ऐसे। क्रांति तो दूर की बात है।
क्रांति करनी हो, तो लोगों की आत्माओं में बीज बोने पड़ेंगे। और एक-एक आदमी को सीधा रूपांतरित करना पड़ेगा। हां, एक बड़ी संख्या रूपांतरित लोगों की हो जाए, तो वे क्रांति के अगुआ हो जाएंगे। और जो भी क्रांति आएगी, उसका स्वागत कर सकेंगे। फिर ज्यादती नहीं करनी होगी। लोक-मानस खुद ही स्वागत करने को तैयार होगा।
मेरे देखे सारी क्रांति वैयक्तिक है। सारा विकास वैयक्तिक है। भीड़ का कोई विकास नहीं होता; व्यक्ति का विकास होता है। और व्यक्ति का ही हो सकता है, क्योंकि भीड़ के पास कोई आत्मा नहीं है। व्यक्ति के पास आत्मा है, चेतना है, बोध है।
क्रांति मात्र बोध की क्रांति होती है। इसलिए असली क्रांतियां, स्टैलिन, माओ, लेनिन, टीटो--इस तरह के लोगों ने नहीं कीं। असली क्रांतियां कीं बुद्ध ने, महावीर ने, क्राइस्ट ने--असली क्रांतियां कीं। लेकिन उनकी भी मजबूरी है।
लोग इतने अंधेरे में हैं, इतने घिसटते हुए हैं कि कुछ दीये जल जाते हैं, मगर फिर भी अंधेरा थोड़े ही मिट जाता है।
मगर अब संभावना बढ़ती जाती है। बुद्ध को गए पच्चीस सौ साल हो गए। पच्चीस सौ साल में काफी रूपांतरण मनुष्य का हुआ है। काफी जड़ताओं से छुटकारा हुआ है।
अगर जड़ताओं से छुटकारा न होता, तो तुम मुझे सुनते ही नहीं; मुझे सुनते ही सूली पर लटका देते। दो हजार साल पहले तुमने मुझे तत्क्षण सूली दे दी होती। और आज भी जो लोग दो हजार साल पुरानी बुद्धि को लिए बैठे हैं, उनकी तो यही आकांक्षा है कि मुझे सूली लग जानी चाहिए। वे अब भी नाराज हैं। उनकी धारणाएं समकालीन नहीं हैं।
कोई दो हजार साल पुरानी धारणाएं लिए बैठा है, कोई तीन हजार साल पुरानी धारणाएं लिए बैठा है!
समय बदला है। आदमी ज्यादा विकसित हुआ है। जो आज घट सकता है, पहले कभी नहीं घट सकता था। यहां तुम ईसाई को पाओगे, मुसलमान को पाओगे, हिंदू को पाओगे--जैन को, बौद्ध को। यहां दुनिया के सारे धर्मों के लोग इकट्ठे हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ था। जैन के मंदिर में जैन को पाओगे। हिंदू के मंदिर में हिंदू को पाओगे। मुसलमान की मस्जिद में मुसलमान को पाओगे।
यह मंदिर परमात्मा का है--न हिंदू का, न मुसलमान का, न ईसाई का, न जैन का। यहां तुम सबको पाओगे।
यहां करीब-करीब दुनिया के सारे देशों से संन्यासी हैं। एक रूस से कमी थी, तो अभी कुछ दिन पहले एक रूसी आकर संन्यास ले गया। अब दुनिया का कोई देश नहीं है, जहां संन्यासी नहीं हैं।
जाति की, देश की, धर्म की--सारी सीमाओं को तोड़ने की आज संभावना है। आज सारे संस्कार तोड़ देने की संभावना है। मनुष्य आज इतना राजी हो सकता है कि अपने सारे छोटे-मोटे घेरों से बाहर निकल आए; खुले आकाश में आ जाए।
इन्हीं लोगों की संख्या बढ़ती जाए, तो दुनिया में क्रांति होगी।
और क्रांति कोई जल्दबाजी की बात नहीं है--कि आज हो जाए। आदमी हजारों साल में धीरे-धीरे विकसित होता है।
इसलिए मेरी समझ व्यक्ति की दिशा में है। राज्य में मुझे रस नहीं है; समाज में मुझे रस नहीं है। लेकिन व्यक्ति में मेरा रस है। व्यक्ति में पूर्ण क्रांति घट सकती है।
और तुमने पूछा है कि पूर्ण क्रांति का क्या अर्थ है? पूर्ण क्रांति का मेरी दृष्टि में अर्थ है: व्यक्ति के पास किसी तरह की धारणाएं, और पक्षपात न रह जाएं। व्यक्ति की चेतना शुद्ध दर्पण की तरह हो। पूर्ण क्रांति यानी समाधि।
समाधिस्थ व्यक्ति जो भी करेगा, वह कल्याण है, मंगल है। ध्यानस्थ व्यक्ति जो भी करेगा, उससे शुभ ही होगा, अशुभ नहीं होगा। क्योंकि ध्यान की ऊर्जा तुम्हें बोधपूर्ण बनाती है। तुम्हारे कृत्य में तुम्हारा बोध समा जाता है। ध्यानहीन व्यक्ति जो भी करेगा, गलत करेगा। तो मैं तो एक ही क्रांति जानता हूं कि किस तरह तुम्हारे जीवन में ध्यान जुड़ जाए। ध्यान का धन तुम्हें मिल जाए, तो परम धन तुमने पा लिया। और तुम्हें ध्यान मिल जाए, तो संभावना बनती है कि तुम्हारे पास-पड़ोसियों की ज्योति को भी तुम जगा सको।
ज्योति से ज्योति जले। और एक-एक से ऐसी ज्योति फैलती जाए, तो मैं सारे संसार को आग से भर दे सकता हूं। इसलिए यह गैरिक वस्त्र चुने हैं। यह आग का रंग है, ये अग्नि के प्रतीक हैं। इनमें तुम्हें भस्म हो जाना है। इनमें तुम्हें अपने अतीत को बिलकुल राख कर देना है। इनमें सिर्फ शुद्ध चेतना बचे--न हिंदू बचे, न मुसलमान बचे, न ईसाई, न जैन। इनमें न हिंदुस्तानी, न पाकिस्तानी, न चीनी... सारी धारणाएं और सारी क्षुद्रताएं जल जाएं, राख हो जाएं। और अंततः इसमें तुम्हारा अहंकार भी जल जाए। उसी को मैं पूर्ण क्रांति कहता हूं।
अहंकार भी जल जाए, तो पूर्ण क्रांति घट गई।
पूर्ण क्रांति व्यक्ति में घटती है। और अगर एक व्यक्ति में घट जाए, तो उसके आस-पास भी अपने आप चिनगारी फैलने लगती है। एक में घटे, तो दस में घट जाएगी। दस में घटे, तो सौ में घट जाएगी। ऐसे घटते-घटते एक दिन इस सारी पृथ्वी पर क्रांति के फूल खिल सकते हैं।
लेकिन यह क्रांति ऊपर से नहीं थोपी जा सकती। यह क्रांति आध्यात्मिक ही हो सकती है।
पांचवां प्रश्न:
भगवान, आप कहते हैं कि कल का कोई भरोसा नहीं है। लेकिन यही तो--ईट, ड्रिंक एंड बी मेरि--खाओ, पीओ और मौज करो, को मानने वाले भी कहते हैं। आपमें और उनमें क्या फर्क है?
निश्चित ही, खाओ, पीओ और मौज करो वाले लोग भी यही कहते हैं कि कल का तो कुछ भरोसा नहीं, आज ही खा लो, पी लो, मौज कर लो। मैं भी यही कहता हूं, सारे बुद्धपुरुष भी यही कहते हैं। तर्क तो एक ही है। लेकिन लक्ष्य और गंतव्य अलग-अलग हैं।
खाओ, पीओ और मौज करने वाले दर्शनशास्त्र को मानने वाले लोग कहते हैं कि कल का भरोसा नहीं है, अभी खा लो, अभी पी लो, अभी मौज कर लो।
बुद्धपुरुष कहते हैं: कल का भरोसा नहीं है, अभी ध्यान कर लो, अभी समाधि कर लो, अभी प्रभु को पा लो। लक्ष्य अलग हैं, गंतव्य अलग हैं। कल का भरोसा नहीं है। कल पर मत टालो।
तो दोनों के तर्क तो एक ही हैं, लेकिन लक्ष्य बड़े भिन्न हैं।
शराबी कहता है: कल का क्या पता? अब कल जो होगा--होगा। तुम शराबी से कहो कि कल भूखे मरोगे; पैसे बचा लो। कल खा-पी लेना। वह कहता है: कल का क्या भरोसा। अब कल की कल देखेंगे। यह तो जीसस ने भी कहा है ना कि कल की मत सोचो, तो हम कल की क्यों सोचें? यह तो बुद्ध ने भी कहा है ना कि कल पर मत टालो। तो हम कल पर क्यों टालें? अब आज जो हाथ में मिला है, आज तो मजा-मौज कर लें; फिर कल की कल देखेंगे।
बात तो वह भी बड़े पते की कह रहा है। बात तो पते की ही है। लेकिन उससे जो नतीजा निकाल रहा है, वह बिलकुल गलत है।
बुद्ध भी कहते हैं कि पीओ--परमात्मा को पीओ; क्योंकि कल का पक्का नहीं है। यह तुम शराब ही पीने में आज गंवा दोगे...!
कल का पक्का नहीं है और आज चला जाएगा--शराब पीने में। फिर परमात्मा कब पीओगे? कल का पक्का नहीं है और आज खाने-पीने और कपड़े सजाने में ही बिताए दे रहे हो, तो फिर परमात्मा को कब निमंत्रित करोगे? आज चला जाएगा व्यर्थ में, और कल अनिश्चित है। जो निश्चित था, वह व्यर्थ में चला गया। और जो अनिश्चित है--वह तो अनिश्चित है।
और फिर कल भी तो तुम तुम ही रहोगे। अगर आज खाने-पीने में ही बिताया, तो कल भी पूरी संभावना यही है कि तुम खाने-पीने में ही बिताओगे। अगर कल मिला, तो तुम उसे भी खाने-पीने में बिताओगे, क्योंकि लोग अपनी आदतों के गुलाम हो जाते हैं।
तुमने अगर आज क्रोध किया है, तो कल भी क्रोध करने का तुमने बीज बो दिया। आज तुम अगर अहंकार से भरे हो, तो कल भी अहंकार से ही भरोगे, क्योंकि कल तुम्हारे भीतर से ही तो आएगा। आकाश से तो आने वाला नहीं है! तुम ही तो कल में बढ़ोगे। तुम्हारा जो भी कूड़ा-करकट है, उसी को लेकर बढ़ोगे।
आज अगर ध्यान में बिताया, तो कल ध्यान की संभावना और बढ़ेगी। अगर कल आया, तो फिर तुम परमात्मा को धन्यवाद दोगे, कि फिर एक दिन मिला कि प्रार्थना करूं, कि पूजा करूं, कि अर्चना करूं, कि नाचूं... धन्यवाद!
सूफी फकीर कहते हैं: हर रात सोते वक्त धन्यवाद दे दो, इस तरह जैसे आखिरी दिन आ गया, आखिरी रात आ गई, कयामत की रात आ गई। भगवान को धन्यवाद दे दो कि तेरा बड़ा धन्यवाद, एक दिन और तूने दिया था। वह भी हम जी लिए--तेरे आनंद में।
और इस तरह सो जाओ, जैसे मर रहे हो, क्योंकि कौन जाने रात मर ही जाओ, और सुबह उठ ही न पाओ! और बिना धन्यवाद दिए मर जाना तो बड़ा अशोभन होगा। परमात्मा पूछेगा: धन्यवाद भी न दिया मरते वक्त?
तो रोज रात इस तरह सो जाओ, जैसे मर रहे हो। और रोज सुबह जब आंख खुले, फिर धन्यवाद दो, जैसे पुनर्जीवन हुआ, क्योंकि तुम्हारी तरफ से तो तुम रात मर ही गए थे। फिर पुनर्जीवन हुआ। फिर प्रभु ने एक दिन दिया। फिर उसका उत्सव करेंगे। फिर उसका गीत गाएंगे। फिर राम-धुन बिठाएंगे, फिर सत्संग करेंगे, फिर ध्यान में डूबेंगे। एक दिन और दिया उसने। एक अवसर और दिया। रात फिर सो जाना धन्यवाद दे कर।
तो तर्क तो एक सा ही लगता है। लेकिन बड़े भेद हैं।
गुलशन की रविश पर मुस्कुराता हुआ चल
बदमस्त घटा है, लड़खड़ाता हुआ चल
कल खाक में मिल जाएगा यह जोरे-शबाब
‘जोश’ आज तो बांकपन दिखाता हुआ चल
एक तरफ लोग हैं, जो कहते हैं: कल तो खाक में मिल ही जाएंगे, तो आज तो अकड़ लें। अब कल तो मिट ही जाना है, तो आज तो अकड़ लें।
कल खाक में मिल जाएगा यह जोरे-शबाब
यह जवानी कल तो खाक में मिल जाएगी, तो आज तो अकड़ लें, आज तो सिर उठा कर चल लें। आज तो शान दिखा लें!
जोश, आज तो बांकपन दिखाता हुआ चल
संत भी यही कहते हैं कि कल खाक में मिल जाना है। तो क्या बांकपन दिखाना? जब खाक में ही मिल जाना है, जब खाक ही नियति है, तो आज भी अकड़ने में क्या सार है?
जब अंततः खाक ही हाथ लगनी है, तो यह व्यर्थ अकड़ने में क्यों समय गंवाते हो? आज ही समझ लो कि सब राख ही राख है।
ऐसी समझ में ही अहंकार गल जाता है। ऐसी समझ में ही तुम मिट जाते हो। और तुम्हारे मिटने में ही परमात्मा का प्रवेश है।
सागरे-बादा-ए निशात तो ला
कभी जोहराबे-गम भी पी लेंगे
वस्ल की शब है, जिक्र-ए-हिज्र न छेड़
यूं भी जीना पड़ा, तो जी लेंगे
भोगी कहता है: वस्ल की शब है, मिलन की रात है, सुहागरात है...
वस्ल की शब है, जिक्र-ए-हिज्र न छेड़
अभी मौत की बातें न उठाओ; अभी वियोग की चर्चा मत छेड़ो। अभी तो सब मजा-मौज चल रहा है। अभी तुमने कहां संन्यास का राग उठा दिया! यह संन्यास की बात मत छेड़ो अभी।
वस्ल की शब है, जिक्र-ए-हिज्र न छेड़
यूं भी जीना पड़ा, तो जी लेंगे
भोगी कहता है कि देखेंगे, जब होगा, तब होगा। अगर यूं भी जीना पड़ा, तो जी लेंगे। मगर अभी मत छेड़ो बात। अगर कल खाक में भी मिल जाना पड़ा, तो मिल जाएंगे। मगर अभी तो हैं, अभी यह बात मत छेड़ो।
ज्ञानी कहता है: जो अंततः होना है, वह हो ही गया है। उसकी बात छेड़ो या न छेड़ो, वह होने ही वाला है। और जो होने ही वाला है, बेहतर है, उसकी बात छेड़ लो, तो शायद कुछ बदलाहट हो जाए। अभी से थोड़ा समय हाथ में है।
आज पिला दो जी भर कर मधु
कल का करो न ध्यान सुनयने!
कल का करो न ध्यान!!
संभव है कल तक मिट जाए
मधु के प्रति आकर्षण मन का,
मधु पीने के लिए न हो कल
संभव है संकेत गगन का,
पीने और पिलाने को हम ही न रहें कल
संभव है यह भी,
पल-पल पर झकझोर रहा है
काल प्रबल दामन जीवन का,
कौन जानता है कब किस पल
तार तार क्षण में हो जाए,
जीवन का सांसों के कच्चे
धागों का परिधान सुनयने!
कल का करो न ध्यान!!
क्या मालूम घिरी न घिरी कल
यह मन भावन घटा गगन में,
क्या मालूम चली न चली कल यह
मृदुमंद पवन मधुवन में,
स्वर्ग-नरक को भूल आज जो
गीत गा रही लालपरी के,
क्या मालूम रही न रही कल
मस्ती वह दीवानी मन में
अनमांगे वरदान सदृश जो
छलक उठा मधु जीवन घट में,
क्या मालूम वहीं कल विषबन,
बने स्वप्न अवसान सुनयने!
कल का करो न ध्यान सुनयने!
भोगी कहता है: कल की बात ही मत उठाओ; प्रिय, कल की बात ही मत उठाओ। कल का क्या पक्का? आज भोग लें। आज जो मिला है, इसमें डूब लें, तरबोर हो लें।
मगर जिसमें तरबोर हो रहे हो, वह राख ही राख है। राख में लोट रहे हो।
तुमने देखा न, हिंदू संन्यासी राख लपेट कर बैठ जाता है। इसकी कोई जरूरत नहीं है। सभी राख में लपटे हुए हैं। राख ही राख है। अब और राख लपेट कर क्या बैठ रहे हो?
इस जगत में राख के सिवाय कुछ है नहीं। तुम भला सोचो--कि राख नहीं है, स्वर्ण-धूलि है, और लिपट कर सोने के हुए जा रहे हो। मगर जब आंख खुलेगी, तो पाओगे: सब राख ही राख है।
जितनी जल्दी आंख खुल जाए, उतना अच्छा, क्योंकि खुल जाए आंख तो कुछ किया जा सके। नहीं तो राख में ही लोटते-लोटते बिता दोगे।
वही खाना, वही पीना; वही दफ्तर, वही जीना; वही रोना, वही हंसना--इतना तो कर चुके। आज तक कुछ हाथ न लगा। हाथ खाली के खाली हैं। अब कुछ ऐसा करो कि हाथ भर जाएं, प्राण भर जाएं। कुछ ऐसा करो कि फूल खिलें। कुछ ऐसा करो कि फल लगें। कुछ ऐसा करो कि जाने के पहले तुम परमात्मा को धन्यवाद दे सको। कुछ ऐसा करो कि उत्सव मना सको जाने के पहले। मृत्यु आए, उसके पहले महोत्सव आ जाए।
नहीं तो जीवन व्यर्थ गया, फिर आना पड़ेगा। फिर फेंके जाओगे। फिर यहीं, फिर इसी गंदगी में, फिर इसी राख के ढेर में।
मैं भी कहता हूं कि कल की फिकर न करो, क्योंकि कल का कुछ पक्का नहीं है। लेकिन मैं यह नहीं कहता कि खा लो, पी लो, मौज कर लो। उतने पर आदमी समाप्त नहीं होता।
खाना, पीना, मौज कर लेना ज्यादा से ज्यादा देह को थोड़ी देर भरमा लेते हैं।
और खाने, पीने, मौज से भी मौज वस्तुतः कहां होती है! नाम मात्र को, कहने मात्र को, बहाना मात्र है। समझा लेते हो कि मौज कर रहे हो। असली मौज करो।
मैं भी कहता हूं मौज करो, लेकिन असली मौज करो। असली मौज तो परमात्मा से जुड़ कर ही होती है। उस प्यारे का हाथ हाथ में आ जाए, तो ही असली मौज होती है।
और असली तृप्ति भी परमात्मा को ही पी जाने से होती है। शराब ही पीनी है, तो उसकी पीओ। अंगूर की क्या पीनी--आत्मा की पीओ।
शराब ही पीनी है, तो ऐसी पीओ कि फिर उतरे ही न नशा। जो उतर-उतर जाए, उसमें कुछ बहुत सार नहीं है। कुछ ऐसा पीओ कि चढ़े, तो चढ़ा ही रहे।
वही है असली संपदा, जो मिल जाए, तो सदा के लिए तुम्हारी हो जाए। जब ऐसी शराब मौजूद है, तो फिर तुम क्षुद्र की शराब क्यों पीते हो, जब विराट की शराब मौजूद है!
इसलिए तो सूफी फकीरों ने तो परमात्मा का नाम ही शराब रख लिया है।
सूफियों की तुम कविताएं पढ़ो, तो भूल मत करना। उमर खय्याम को पढ़ो, तो भूल मत करना। उमर खय्याम जहां-जहां शराब की बात करता है, वह समाधि की बात कर रहा है। उमर खय्याम सूफी फकीर है। पहुंचा हुआ संत है; सिद्ध है।
जहां वह मधुशाला की बात कर रहा है, वह परमात्मा के मंदिर की बात कर रहा है। और जहां वह मधुबाला की बात कर रहा है, वह परमात्मा की बात कर रहा है। परमात्मा ढाल रहा है मधुबाला की तरह सुराही पर सुराही, और यह सारा जगत उसकी मधुशाला है।
यहां सब तरफ से शराब उंड़ेली जा रही है--फूलों से, पंक्षियों से, चांद-तारों से--सब तरफ से उसकी सुगंध, सब तरफ से उसकी सुवास, और सब तरफ से उसका रस झर रहा है। इस रस को पीओ। इस रस को पीओगे, तो सच ही तृप्त हो जाओगे।
जीसस एक कुएं पर गए--थके-मांदे। यात्रा से आ रहे हैं। धूल-धंवास से भरे हैं। और कुएं पर पानी भरती एक स्त्री से उन्होंने कहा कि ‘मुझे पानी पिला दो।’
उस स्त्री ने देखा। उसने कहा: क्षमा करें, शायद आप अजनबी हैं, और आपको पता नहीं कि मैं शूद्र हूं; मैं बहुत क्षुद्र जाति की हूं, मेरा छुआ जल कोई पीता नहीं। फिर आपकी मर्जी। जीसस हंसे और उन्होंने कहा: तू उसकी फिकर न कर। तू मुझे पिला, तो मैं भी तुझे कुछ पिलाऊं। तेरा जल तो थोड़ी देर मेरी तृप्ति रखेगा; मेरा जल तुझे सदा के लिए तृप्त कर देगा। और तुझसे जल मांगा है, इसीलिए कि इसके बहाने पहचान हो जाए, तो मैं भी कुछ लिए फिर रहा हूं अपने भीतर, वह मैं तुझ में उंड़ेल दूं।
वह स्त्री अनूठी रही होगी। अनूठी थी, शायद इसीलिए जीसस रुक भी गए थे उस कुएं पर। और भी कुएं रास्ते में पड़े थे, और भी लोग पानी भरते मिले थे।
उसने जीसस की आंख में झांका। इस तरह की बात तो किसी आदमी ने कभी कही नहीं थी--कि मैं तुझे ऐसा जल पिला सकता हूं कि तेरी प्यास सदा के लिए मिट जाए!
तो उसने जीसस को आंख में झांका, वे परम शांत आंखें; वे निर्दोष आंखें। और उसे बात जंच गई। वह भोली-भाली स्त्री; बोली: तुम रुको, मैं गांव के लोगों को भी बुला लाऊं। वे भी तुम्हारी आंखों में झांक लें। ऐसी आंख हमने कभी देखी नहीं!
गांव के लोगों से जाकर उसने कहा कि एक अपूर्व आदमी आया है। क्योंकि ऐसी बात तो कभी किसी ने कही ही न थी। वह कहता है: मैं तुझे ऐसा जल पिला सकता हूं कि तेरी प्यास सदा के लिए बुझ जाए। और मुझे पक्का भरोसा आया है कि उसके पास जल है, क्योंकि वह जल उसकी आंखों में मैंने देखा है। वह भरा है लबालब!
बुद्ध या क्राइस्ट या कृष्ण या कबीर या नानक उसी मधु को लेकर आते हैं। ये सुराहियां हैं परमात्मा की।
अगर परमात्मा मधुबाला है और अगर यह जगत उसकी मधुशाला है और अगर समाधि मधु है, तो संत मधु-कलश हैं, जिनमें भर-भर के परमात्मा उंड़ेलता है।
मैं भी कहता हूं: पीओ; और मैं भी कहता हूं: खाओ; और मैं भी कहता हूं: मौज करो। लेकिन असली मौज की बातें कर रहा हूं और मैं उस रस को पीने की बात कर रहा हूं, जिसको पीने से फिर कभी प्यास नहीं लगती। वह भोजन करो, जिसे कर लेने से आत्मा तृप्त होती है--देह ही नहीं।
जीसस जब मरने लगे, आखिरी दिन आ गया विदा का, तो तुम्हें पता है उन्होंने अपने शिष्यों से क्या कहा? उन्होंने कहा कि ‘पी लो मुझे और खा लो मुझे।’ बड़े अजीब से शब्द हैं: ‘पी लो मुझे और खा लो मुझे। पचा लो मुझे। बना लो मुझे अपनी रक्त की धार।’
और अब भी जीसस को मानने वाले वर्ष में एक उत्सव मनाते हैं। जब वे भोज देते हैं, रोटी तोड़ते हैं, और रोटी को जीसस मान कर उसका भोजन करते हैं।
मगर रोटी तो रोटी है। इस तरह धोखा न दे सकोगे। कोई जीसस खोजना पड़ेगा। कोई सदगुरु खोजना पड़ेगा।
जीसस के मानने वाले उत्सव मनाते हैं। साधारण सी शराब ढालते हैं--उस याद में, उस असली शराब की याद में, जो जीसस ने ढाली थी कभी। उसको पी लेते हैं।
लंदन में पिछले वर्ष, मेरे संन्यासियों ने मेरा जन्म-दिन मनाया, तो उन्होंने अपने चित्र भेजे। चित्र देख कर मैं हैरान हुआ। वह तो काफी भोजन तैयार किए बैठे हैं। और शराब की बोतल भी रखे हुए हैं। तो मैंने पूछवाया कि मामला क्या है? तो वे सब ईसाई हैं।
उन्होंने कहा कि हम जैसे जीसस का जन्म-दिन मनाते हैं, तो शराब पीते हैं, क्योंकि जीसस ने कहा है कि पीओ मुझे। ऐसा ही हमने आपको पीया!
मैंने कहा: पागलो, मैं अभी जिंदा हूं। अभी तुम मुझको ही पीओ। जब मैं न रहूं, तब ठीक है, फिर किसी और शराब से काम चला लेना। जब असली शराब मिलती हो, तो नकली से क्यों संबंध जोड़ते हो?
मैं भी कहता हूं: खाओ, पीओ और मौज करो। ईट, ड्रिंक एंड बी मेरि। मैं भी कहता हूं। लेकिन मेरा अर्थ समझ लेना। और मैं भी कहता हूं कि कल का भरोसा नहीं, इसलिए जो भी करना हो, वह आज कर लो। कल न कभी आया है, न आएगा। कल कभी आता ही नहीं। कल पर तो टालना ही मत। जिसने कल पर टाला, उसने सदा के लिए टाला, उसे कभी भी मिलन नहीं होगा। वह चूकता ही चला जाएगा। क्योंकि आज तुम कल पर टालोगे और कल तो आता नहीं। कल जब आएगा, तो आज की तरह आएगा। फिर जब आज की तरह आएगा, तो तुम्हारी कल पर टालने की आदत फिर कहेगी: कल कर लेंगे। ऐसे बहुत लोग हैं यहां। आज ही किसी ने प्रश्न पूछा है:
भगवान, मैं संन्यास लेना चाहता हूं, लेकिन क्या घर के लोगों की बिना आज्ञा लिए संन्यास लिया जा सकता है?
संन्यास आज्ञा किसकी लेकर ले सकोगे? जिनकी आज्ञा लेने जाओगे, वे संन्यासी हैं? अगर तुम्हारे संन्यास को वे इतनी प्रफुल्लता से आज्ञा दे सकते होते, तो खुद ही संन्यासी हो गए होते। अब तक प्रतीक्षा करते? तुम आज्ञा उनसे कैसे मांगोगे? और उनकी आज्ञा कैसे मिलेगी?
और संन्यास की भी आज्ञा घर वालों से मांग कर लोगे। तो कुछ कभी ऐसा करोगे, जो तुमने किया! या सदा दूसरों की ही आज्ञा मान कर चलते रहोगे?
कुछ तो जीवन में हो, जो तुम्हारा हो। कुछ तो हो, जो निपट तुम्हारा हो।
संन्यास को तो किसी की आज्ञा मत बनाओ। इसे तो तुम्हारे ही हृदय का भाव रहने दो। आ गई हो मौज, तो उतर जाना। और घबड़ाना मत। घर के लोग राजी हो जाते हैं। मर भी जाओगे तो भी राजी हो जाते हैं। तो संन्यास में तो क्या रखा है? अगर मर भी जाओगे तो क्या तुम समझते हो, घर के लोग सदा रोते रहेंगे तुम्हारे लिए?
फिर मेरा संन्यास तो तुम्हें घर से छीनता भी नहीं। मेरा संन्यास तो, तुम पति हो तो तुम्हें और अच्छा पति बना देगा। पत्नी हो, तो और अच्छी पत्नी बना देगा। मां हो, तो और अच्छी मां। क्योंकि मैं संसार के विरोध में नहीं हूं।
मेरा परमात्मा बड़ा है; इतना बड़ा है कि संसार को अपने में समा लेता है। मैं छोटे-छोटे परमात्माओं की बात नहीं कर रहा हूं, जो बड़े क्षुद्र हैं; जो संसार को अपने में नहीं समा पाते।
मेरा परमात्मा सबमें समाया हुआ है; सारे संसार में रमा हुआ है। इसलिए कहीं न भागना है, न किसी के विपरीत जाना है। न पत्नी को छोड़ देना है।
क्योंकि उनको मैं कायर कहता हूं, जो छोड़ कर भाग जाते हैं। जो जिम्मेवारियां छोड़ देते हैं, वे नपुंसक हैं। जो अपने छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चों को छोड़ कर जंगल भाग जाते हैं, ये संन्यासी हैं? जब परमात्मा इन्हें पकड़ेगा, तो इनको दंड मिलेगा।
संन्यास का अर्थ इतना ही है: जहां हो, वहीं परमात्मा की याद से भर कर रहो। संन्यास का इतना ही अर्थ है: जहां हो, वहीं परमात्मा को समर्पित होकर रहो। जल में कमलवत।
और आज्ञा की प्रतीक्षा मत करना। कुछ तो अपने से करो?
मस्जिद में मुल्ला नसरुद्दीन बैठा था। पुरोहित ने लंबा व्याख्यान दिया, और व्याख्यान के अंत में पूछा कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, हाथ ऊपर उठा दें। सब ने हाथ ऊपर उठा दिए। एक मुल्ला ही बैठा रहा। सामने ही बैठा था।
पुरोहित को बड़ी हैरानी हुई। उसने पूछा कि नसरुद्दीन, सारे लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, एक तुमको छोड़ कर! तुम नहीं जाना चाहते? उसने कहा: जाना तो मैं भी चाहता हूं। लेकिन जब घर से चलने लगा, तो पत्नी ने कहा, मस्जिद से सीधे घर आना।
तुम यहां आ गए; संन्यास का भाव उठा; अब तुम पूछते हो: घर के लोगों की आज्ञा? तुम स्वर्ग भी पत्नी से ही पूछ कर जाओगे? मरते वक्त किस-किस से पूछोगे? आज्ञा लोगे? आज्ञा लेने का अवसर मिलेगा?
थोड़ी तो हिम्मत और साहस होना चाहिए! इतने तो अपने को अपमानित मत करो।
और अगर पत्नी तुम्हारी तुम्हें प्रेम करती है, तो तुम्हारे संन्यास को भी प्रेम करेगी, क्योंकि तुम्हारी स्वतंत्रता और तुम्हारी आत्मा का समादर करेगी। और अगर तुम्हारा पति तुम्हें प्रेम करता है, तो तुम्हारे संन्यास का भी आदर करेगा। क्योंकि प्रेम स्वतंत्रता के विपरीत नहीं होता। और जो प्रेम स्वतंत्रता के विपरीत है, वह प्रेम ही नहीं है। वह कुछ और है, धोखाधड़ी है।
जो पत्नी कहती है: मेरी आज्ञा मान कर चलो, वह पत्नी नहीं है। वह तुम्हें गुलाम बनाने में लगी है। वह एक गुलाम चाहती है, पति नहीं चाहती है। एक मित्र नहीं चाहती है, एक गुलाम चाहती है। और जो पति कहता है: जैसा मैं कहूं, वैसे उठो, वैसे बैठो, वैसे चलो। वह तुम्हारी आत्मा का खंडन कर रहा है। वह तुम्हें प्रेम कैसे कर सकता है?
प्रेम सदा मुक्त करता है। जो मुक्त करे, वही प्रेम।
तो घबड़ाओ मत। किससे पूछना है? अपने हृदय से पूछ लो। अगर हृदय कहता हो, तो डुबकी लगा लो।
और कल पर मत टालो, क्योंकि आज्ञा का मतलब है, अब जाएंगे घर; पूछेंगे; विचार करेंगे; पत्नी रोएगी, बच्चे नाराज होंगे, पिता कुछ कहेंगे, भाई कुछ कहेंगे। सारा गांव-पड़ोस समझाएगा कि ‘पागल हुए जा रहे हो।’ और कल का कोई भरोसा नहीं है। कल आए न आए।
क्षण-क्षण जीना चाहिए। और क्षण-क्षण हृदय की स्फुरणा से जीना चाहिए। यही सहज-योग है। यही सब संतों की वाणी का सार है।
आज इतना ही।
भगवान, अभिनय में प्रमाणिकता कैसे बचेगी, जिसकी चर्चा आप हमेशा करते हैं? हम झूठे बेईमान लोग तो वैसे ही अभिनय में कुशल हैं, और यदि संत अभिनय करेंगे, तो क्या उससे भी झूठ नहीं प्रवेश करेगा? चाहे कर्ता रहें, या अकर्ता, अभिनय में झूठ तो समाहित हो ही गया। इस उलझन को सुलझाने की कृपा करें।
मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई। अभिनय का अर्थ इतना ही है कि करने वाला परमात्मा है; मैं करने वाला नहीं। यही तो सच है। इसमें झूठ कैसे समाहित हो जाएगा? करने वाला परमात्मा है।
जब तक हम समझते हैं कि मैं करने वाला हूं, तब तक हम झूठ हैं। जैसे ही उसे करने वाला जाना, वैसे ही झूठ गया।
तो अभिनय में और प्रमाणिकता में विरोध नहीं है। अभिनय ही प्रमाणिक हो सकता है।
और अभिनय का अर्थ तुमने अपना लगा लिया कि भीतर कुछ--बाहर कुछ।
अभिनय का इतना ही अर्थ है कि कृत्य मेरा नहीं है। जैसे बांसुरी समझे कि जो गीत मुझसे बह रहा है, वह मुझसे आ रहा है, यह झूठ होगा। और बांसुरी समझे कि जो गीत मुझसे आ रहा है, वह केवल मुझसे ‘आ रहा’ है; गाने वाला कोई और है; ओंठ किसी और के हैं; वाणी किसी और की है; स्वर किसी और के हैं। मैं केवल उपकरण मात्र हूं। तो बासुंरी कर्ता से हट गई, अभिनेता हो गई। यहां बाहर कुछ, भीतर कुछ--ऐसा भेद नहीं है।
तो अभिनय का अर्थ झूठ नहीं है। अभिनय इस जगत की सबसे बड़ी वास्तविकता है, सबसे बड़ी प्रमाणिकता है।
और तुमने पूछा है कि ‘कर्ता रहें या अकर्ता, अभिनय में झूठ तो समाहित हो ही गया?’
नहीं। कर्ता रहो, तो अभिनेता नहीं हो। कर्ता रहे, यह भाव रहा कि मैं करने वाला हूं, तो फिर कहां अभिनय? फिर तो झूठ समा गया। झूठ यानी अहंकार।
इस जगत में अहंकार से बड़ा कोई और झूठ नहीं है। मैं हूं--यही झूठ है। परमात्मा है--यही सत्य है। मेरा होना परमात्मा के होने से अलग है--यही झूठ है। मेरा होना उसमें समाहित है--मैं उसके ही सागर की तरंग हूं, तरंग से ज्यादा नहीं--यही प्रमाणिक है; यही सत्य है।
तो जैसे ही कर्ता बने, वैसे ही झूठ आ जाता है। अकर्ता बने कि झूठ गया। झूठ का संबंध कुछ झूठ बोलने से नहीं है। झूठ का संबंध इसी भाव से है कि मैं हूं, फिर सारे झूठ इसी से पैदा होते हैं। यह एक झूठ अहंकार का हजार-हजार झूठों के जन्म का कारण हो जाता है। इस अहंकार के वृक्ष पर ही फिर झूठ के पत्ते लगते हैं, फल लगते हैं, फूल लगते हैं।
इस अहंकार को जड़ से काट देने का नाम ही अकर्ता-भाव है। अकर्ता-भाव कहो या अभिनय कहो--एक ही बात है। लेकिन इस प्रश्न ने बहुत लोगों के मन में सवाल उठाए होंगे।
दूसरा सवाल भी इसी से संबंधित है:
भगवान, कल आपने संदेश दिया: अभिनय सीखा; पर कुशल और प्रसिद्ध अभिनेता अभिनय की कला जानते हुए भी चिंतित, दुखी और परेशान हैं। उनका अभिनय उन्हें दुख से मुक्त क्यों नहीं करता? कृपा करके समझाइए।
अभिनय की कला जानना और अकर्ता हो जाने में बड़ा फर्क है। अभिनय की कला जानना एक बात है, और जीवन को अभिनय बना देना बिलकुल दूसरी बात है।
अभिनेता अभिनय की कला जानता है, जब मंच पर होता है। जैसे ही मंच से नीचे उतरा कि सारी कला भूल जाता है। घर आया कि कर्ता हो जाता है।
वह जो राम बना है, मंच पर, सीता खो जाएगी, तो अभिनय करेगा; आंसू झूठे होंगें; वृक्षों से पूछेगा; सब असत्य होगा। रोएगा, पुकारेगा, चिल्लाएगा, खोजने निकलेगा--वह सब झूठ होगा। लेकिन घर आकर पाए कि उसकी पत्नी भाग गई। तब भूल जाएगा कि अब फिर अभिनय करे। तब रोने लगेगा। तब, असली आंसू बहेंगे। मंच पर अभिनय था, घर आते ही कर्ता का भाव हो गया!
मंच का अभिनय काम में नहीं आएगा। जीवन पूरा का पूरा मंच बन जाए।
और अक्सर ऐसा हो जाता है: दूसरे को सलाह देनी हो, तो तुम बड़े समझदार हो जाते हो। वह समझदारी किसी काम की नहीं है। उस समझदारी का दो कौड़ी भी मूल्य नहीं है। समझदारी तो तब काम की है, जब मुसीबत खुद पर हो और समझदारी काम आए।
दूसरे को समझाने के लिए तो सभी बुद्धिमान हैं, और इन बुद्धिमानों को, इनकी जीवन की समस्या को सुलझाते हुए न पाओगे। वहां इनकी उलझन इतनी की इतनी है, जैसे और की है।
दूसरे को सलाह देनी तो बहुत आसान है, क्योंकि तुम्हारा कुछ लगता ही नहीं। ‘हल्दी लगै न फिटकरी, रंग चोखा हो जाए।’ तुम्हारा कुछ खर्च होता ही नहीं। तुम्हें कुछ करना ही नहीं पड़ता। लेकिन जब अपने जीवन में उतारने चलोगे, तो मुश्किल होगी। हजार कठिनाइयां होंगी। क्योंकि हजार-हजार पुरानी आदतें तोड़नी होंगी, संस्कार मिटाने होंगे, रूपांतरण करना होगा। एक क्रांति से गुजरना होगा। वह क्रांति महंगी है--सस्ती नहीं।
धर्म महंगा है; सस्ता नहीं। प्राणों से मूल्य चुकाना होता है।
तो मंच पर अभिनय करना एक बात है। सारा जीवन--सोते-जागते--अभिनय से भर जाए, तो बिलकुल दूसरी बात है। यह तो तभी होगा, जब तुम ध्यान में पगो, यह तो तभी होगा, जब तुम परमात्मा के चरणों में अपने को पूरा छोड़ो। आधीन हो जाओ--जैसा चरणदास ने कहा: ‘मुक्तिमूल आधीनता।’
वह मुक्त हो जाएगा, जिसने अपने को बिलकुल आधीन कर दिया; जिसने कहा: अब जो तेरी मर्जी--कर; मैं तेरे हाथ में खिलौना हूं। मेरी अपनी अलग से कोई मर्जी नहीं। क्योंकि मैं ही नहीं, तो मेरी मर्जी कैसी? मैं हूं, तो फिर मेरी मर्जी पैदा होती है--छाया की तरह। मैं ही नहीं हूं, तो छाया नहीं बनती। अब तू जो कराए। अब तू ही है। कृत्य भी तेरा, अकृत्य भी तेरा। इसे समझो। प्रश्न ठीक है।
मेरे पास अभिनेता आते हैं, उनकी भी समस्याएं वही हैं, जो तुम्हारी हैं। कुछ भेद नहीं है समस्याओं में। और अभिनय की कला तो जानते हैं। लेकिन उस कला को अपने जीवन में नहीं ला पाए हैं। वह कला केवल व्यवसाय है। वह कला खुद के जीवन में नहीं है। उस कला से खुद का जीवन नहीं रंग गया है। धंधा है; कर लेते हैं; कमा लेते हैं। इतने से काफी नहीं होगा।
मैं जो कह रहा हूं, इतने ऊपर-ऊपर ओढ़ लेने से नहीं होगा। यह राम-चदरिया ओढ़ लेने से नहीं होगा। यह राम तुम्हारे प्राणों के प्राण में उठे; यह तुम्हारा बोध बने--कि मैं नहीं हूं। तुम अपने को विसर्जित कर पाओ, तो फिर जो शेष रह जाएगा, उसमें अभिनय ही है।
और अभिनय का मतलब फिर तुमसे कह दूं: तुम यह मत समझना कि तुम कुछ कर रहे हो। अगर तुम अभिनय भी ‘कर’ रहे हो, तो कर्ता हो गए। तुमने अगर यह भी भाव ले लिया कि देखो, मैं कितना कुशल अभिनेता हूं, कितने ठीक से अभिनय कर रहा हूं, तो तुम कर्ता हो गए।
यही तुम्हारे अभिनेताओं को हो जाता है। अभिनय करते हैं, लेकिन अभिनय में भी कर्ता हो जाते हैं। जब कोई अभिनेता की प्रशंसा करेगा कि तुम्हारा बड़ा कुशल अभिनय था, तो उसकी छाती फूल जाएगी। वह अभिनय का भी कर्ता है। ‘मैंने किया है; यह कुशलता मेरी है; यह यश, गौरव मेरा है।’ वह अभिनय का भी कर्ता बन गया।
कर्ता की पकड़ इतनी दूर तक गई है, अहंकार का रोग ऐसा गहरा समाया है कि अभिनय किया, उसमें भी कर्ता बन गए!
संत अपने कृत्य में भी अभिनेता होता है; और अभिनेता अपने अभिनय में भी कर्ता हो जाता है! संत कुछ ऐसा थोड़े ही कहेगा कि देखो, मैं अभिनय कर रहा हूं--परमात्मा! कैसा कुशल अभिनय कर रहा हूं। तो तो झूठ हो गई बात; तो तो बात समझ में ही नहीं आई। जड़ से चूक हो गई।
अब संत को तो कहने को भी नहीं है कि मैं क्या कर रहा हूं। मैं ही नहीं हूं, तू जो करवा रहा है, हो रहा है।
लोकोक्ति है कि उसकी बिना मर्जी पत्ता नहीं हिलता। वही हिलाता है। सब उसी पर सौंप दिया। सब--बेशर्त। कुछ बचाया नहीं। ऐसी भावदशा को मैंने कहा--अकर्ताभाव।
और यह अकर्ताभाव तुम सीख लो, तो प्रामाणिक हो जाओगे।
अभिनेता हो जाओ, तो सच्चे हो जाओगे। इसमें वक्तव्य विरोधाभासी लगता है, लेकिन वक्तव्य के भीतर झांकोगे, तो तुम्हें संगति दिखाई पड़ेगी।
तुम मिट जाओ, तो तुम हो जाओ। तुम शून्य हो जाओ, तो तुम पूर्ण हो जाओ। तुम रहे, तो चूकते रहोगे। तुम बाधा हो। तुम ही एकमात्र बाधा हो--तुम्हारे जीवन के आनंद में। तुम्हारे जीवन के उत्सव में तुम्हारे सिवाय और कोई विसंगति नहीं है।
तुम ही नरक हो अन्यथा स्वर्ग बरस रहा है। तुम्हीं दुख में लिपे-पुते खड़े हो। अन्यथा इस जगत में सब जगह अमृत बह रहा है। और तुम क्यों दूर-दूर खड़े हो? तुमने अपने को ‘मैं’ मान रखा है।
‘मुक्तिमूल आधीनता।’ तुम उसके आधीन हो जाओ, समर्पण करो।
तीसरा प्रश्न भी इसी से संबंधित है:
भगवान, आपने कहा कि संसार में सफल अभिनेता बनो। तो फिर प्रेम में अभिनय कैसे हो?
प्रेम में तो सबसे सुगम है। तुम्हारी अड़चन मैं समझ रहा हूं। तुम सोच रहे हो कि प्रेम में अभिनय किया, तो प्रेम झूठा हो जाएगा। तुम मेरी बात चूक गए। तुम समझ नहीं पाए--मैं क्या कह रहा हूं। बात थोड़ी सूक्ष्म है। चूक जाना, समझ में आता है। बहुत स्थूल नहीं है। तुमने बहुत स्थूल तरह से पकड़ा।
अब तुम पूछते हो: ‘प्रेम में अभिनय कैसे हो?’
क्योंकि अगर प्रेम में भी अभिनय किया, तो झूठा हो जाएगा। तो झूठे प्रेम का क्या मूल्य होगा?
दूसरी तरफ से देखो, मेरी तरफ से देखो। जब मैंने कहा: जीवन पूरा अभिनय हो जाए, तो यह तो प्रेम पर सबसे ज्यादा लागू होता है। क्योंकि प्रेम में कभी कोई कर्ता हो ही नहीं पाया है। इसलिए तो प्रेम परमात्मा के बहुत निकट है, प्रार्थना के बहुत निकट है।
तुमने प्रेम किया है? या प्रेम हुआ है?--इस पर सोचना। इस पर जरा ध्यान देना। तुम्हारा किसी से प्रेम का नाता बना--यह तुमने किया है या हुआ है? करना क्या है इसमें? तुमने किया क्या? तुमने कुछ चेष्टा की? अभ्यास किया? योगासन साधे? तुमने किया क्या?
कोई दिखाई पड़ा; किसी को देखा, और अचानक एक प्रेम की लहर दौड़ गई; रोआं-रोआं पुलकित हो गया। किसी से आंख मिली और बात हो गई। क्षण भर पहले तक प्रेम का खयाल ही न था। प्रेम की तुम सोच भी न रहे थे। प्रेम की कोई बात ही न थी। किसी से आंख मिली और बात हो गई। बात हुई ही नहीं और ‘बात’ हो गई--और तुम सदा के लिए बंध गए।
इसको तुम कर्तृत्व कहते हो? तुमने किया क्या? इसमें तुम्हारा कर्तापन कहां है? हुआ। प्रेम होता है--किया नहीं जाता।
इसलिए मैं कहता हूं कि प्रेम में अगर कर्ताभाव बना रहे हो, तब तो तुमने हद्द कर दी। वहां तो कर्ता है ही नहीं। इसलिए तो ज्ञानियों ने कहा: प्रेम ही परमात्मा तक ले जाता है। प्रेम को ही समझ लो तो तुम जीवन की बड़ी गहरी बात समझ गए।
प्रेम किसने किया है? कभी किसी ने नहीं किया है। सब होता है। और होता है, तो फिर कैसे कर्ता? फिर तो अकर्ता का भाव अपने आप गहरा हो जाएगा। उसी अकर्ता में अभिनय है।
तो जब मैं तुमसे कहता हूं: अभिनय समझो, तो तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि अभिनय ‘करो।’ तुमसे यह कह रहा हूं कि समझोगे, तो कर्ता विसर्जित हो जाएगा; जो रह जाएगा, वह अभिनय-मात्र है।
परमात्मा ने प्रेम करवा दिया, तो प्रेम हो गया। नहीं तो तुम्हारे वश में क्या था? तुम कोशिश करके सफल हो सकोगे? अगर मैं कहूं कि इस व्यक्ति को प्रेम करो। तुम क्या करोगे? तुम कहोगे: होता ही नहीं, तो क्या करें?
हो सकता है; इसको तुम गले लगा लो, मगर गले लगाने में तो प्रेम नहीं है। हड्डी से हड्डी लगेगी। चमड़ी से चमड़ी मिल जाएगी, मगर भीतर तुम जानोगे कि प्रेम तो है ही नहीं। कुछ उमग नहीं रहा; कोई गीत जनम नहीं रहा; कोई संगीत नहीं उठ रहा। तुम जल्दी में होओगे कि कब इससे छुटकारा हो! कि यह आदमी अब कब तक पकड़े रहेगा! कि और ज्यादा न भींच दे! हड्डी-पसली तोड़ देगा--क्या करेगा? अब यह आदमी छोड़े!
तुमसे अगर कहा जाए: प्रेम करो, तो तुम क्या करोगे? तुम कुछ भी न कर पाओगे। इसलिए तो दुनिया में प्रेम झूठा हो गया है। मतलब?
बचपन से तुम्हें समझाया गया है कि प्रेम करो, और प्रेम किया नहीं जा सकता। तो तुम ‘करना’ सीख गए हो।
मां कहती है: प्रेम करो, क्योंकि मैं तुम्हारी मां हूं। अब मां होने से क्या प्रेम का लेना-देना? पिता कहता है: मुझसे प्रेम करो, क्योंकि मैं तुम्हारा पिता हूं।
ये छोटे से बच्चे से हम जो आशाएं रख रहे हैं, ये आशाएं बड़ी भयंकर हैं। यह छोटा बच्चा क्या करे? पिता हैं आप, ठीक है। लेकिन इसे प्रेम हो तो हो; और नहीं हो रहा है, तो यह क्या करे?
यह इनकार भी नहीं कर सकता है; विरोध भी नहीं कर सकता है; बगावत भी नहीं कर सकता है। यह निर्भर भी है--मां-बाप पर। यह धीरे-धीरे प्रेम का पाखंड रचाने लगेगा। यह धीरे-धीरे, मां आएगी, तो मुस्कुराएगा। अभी और तो कुछ कर नहीं सकता। मां समझेगी कि कितना प्रेम करता है बेटा! यह मुस्कुराहट झूठी है। यह बेटा राजनीति सीख गया। यह मां खुश होती है; मां के खुश होने में लाभ है।
बाप घर आता है; बेटा भागा हुआ द्वार पर जाता है; स्वागत करता है। यह वैसे ही समझ गया राज, जैसे कुत्ता--तुम घर आते हो, तो पूंछ हिलाने लगता है। तुमसे कुछ प्रेम है कुत्ते को? कुत्ता राजनीति कर रहा है। कुत्ता राजनीतिज्ञ है। कुत्ता एक बात समझ गया कि पूंछ हिलाने से तुम ऐसे बुद्धू हो कि बड़े प्रसन्न होते हो। तो हिला दो; पूंछ हिलाने में हर्ज क्या है? पूंछ हिला देता है, तो तुम मिठाई भी देते हो। खिलौने भी लाते हो; पुचकारते भी हो।
जैसा कुत्ता सीख जाता है कि पूंछ हिला दो; ऐसा बच्चा सीख जाता है कि मुस्कुराओ; दौड़ कर पिता का हाथ पकड़ लो; मां की साड़ी पकड़ लो। मां का पल्लू पकड़ कर घूमते रहो। मां बड़ी खुश होती है। खुश होती है, तो लाभ है, सुरक्षा है।
ऐसे प्रेम शुरू से ही झूठ होने लगा। फिर एक दिन तुम्हारा विवाह हो जाएगा और तुमसे कहा जाएगा: यह तुम्हारी पत्नी है, यह तुम्हारा पति है, अब इसको प्रेम करो। पति परमात्मा है, इनको प्रेम करो। प्रेम कैसे करोगे? प्रेम को झुठला दिया गया है।
प्रेम किया ही नहीं जा सकता। हो जाए, तो हो जाए। यह आकाश से उतरता है। यह किन्हीं अनजान रास्तों से आता है और प्राणों को घेर लेता है। यह हवा के झोंके की तरह आता है।
देखते हैं: वृक्ष हिलते हैं; हवा का झोंका आ गया। नहीं आएगा, तो नहीं हिलेंगे। ऐसा ही प्रेम है। सूरज निकला, तो रोशनी फैल गई। नहीं निकला, तो अंधेरा है। ऐसा ही प्रेम है।
प्रेम तुम्हारे हाथ में नहीं; प्रेम तुम्हारे बस में नहीं; प्रेम तुम्हारी मुट्ठी में नहीं है। तुम प्रेम की मुट्ठी में हो। यह समर्पण का अर्थ होता है।
तो प्रेम तो सबसे ज्यादा निकट बात है प्रार्थना के।इसलिए प्रेम को अगर तुमने समझ लिया, तो तुम पाओगे: तुम्हारा किया कुछ भी नहीं; परमात्मा करवा रहा है। यही मेरा अर्थ है--अभिनय से।
अभिनय से मेरा अर्थ नहीं है कि तुम कुछ कर रहे हो। तुमने कुछ किया, तो झूठ हो जाएगा। तुमने यह जाना कि मैं करने वाला नहीं हूं; कराने वाला और करने वाला ‘वही’ है; मैं सिर्फ उपकरण-मात्र, उसके हाथ की कठपुतली। ‘मुक्तिमूल आधीनता।’
चौथा प्रश्न:
भगवान, आपके जाने पूर्ण क्रांति क्या है? और क्या आप जयप्रकाश नारायण की पूर्ण क्रांति के संबंध में कुछ और न कहेंगे?
‘क्रांति’ शब्द राजनीतिज्ञों ने उपयोग कर-कर के बहुत गंदा कर दिया है। शब्दों का बहुत उपयोग हो, तो गंदे हो जाते हैं। जैसे धर्मगुरुओं ने ‘ईश्वर’ शब्द को गंदा कर दिया, वैसे ही राजनीतिज्ञों ने ‘क्रांति’ शब्द को गंदा कर दिया।
कोई भी बात क्रांति हो जाती है! छोटा-मोटा परिवर्तन क्रांति कहला जाता है। छोटा-मोटा सुधार क्रांति बन जाता है।
और जयप्रकाश ने तो हद्द कर दी! वे उसको पूर्ण क्रांति कहते हैं--जो हुआ है, यह क्रांति भी नहीं है--पूर्ण तो बहुत दूर। क्रांति क्या है इसमें?
राजनीतिज्ञों का एक दल हट गया, दूसरा दल सत्ता में आ गया। और दूसरे दल में और पहले दल में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। मौसेरे-ममेरे भाई-बहिन हैं। इंदिरा बहिन हों, कि मोरार जी भाई हों--क्या फर्क है? इसमें क्रांति कहां है? सच तो यह है कि दो कदम पीछे हट गए।
इंदिरा से देश नाराज ही इसलिए हो गया कि कुछ क्रांति की कोशिश कर रही थी। क्रांति किसी को बर्दाश्त नहीं होती। कुछ क्रांति की चेष्टा चल रही थी, उसी चेष्टा में कुछ ज्यादतियां हो गईं। ज्यादतियों का कारण इंदिरा ही नहीं थी; ज्यादतियों का कारण--लोग क्रांति बर्दाश्त नहीं करते--यही था।
इस देश की संख्या बढ़ती जाती है। यह देश रोज गरीब होता चला जाता है। लेकिन किसी को कहो कि संतति-नियमन करो, तो वह नाराज होता है। क्योंकि यह देश सदा से यही मानता रहा है कि संतान तो भगवान देता है। और किसी को फिकर ही नहीं है कि इस देश की संख्या इतने जोर से बढ़ रही है; यह रोज-रोज गरीब होता जाएगा।
जब लोग गरीब होते हैं, तो चिल्लाते हैं कि गरीबी मिटाओ। यही देश चिल्लाता है कि गरीबी मिटाओ। और जब गरीबी मिटाने की कोशिश की जाती है, तो अड़चन आती है, क्योंकि इसकी धारणाओं के प्रतिकूल पड़ जाती है व्यवस्था।
गरीबी मिटाने का पहला कदम ही यही होगा कि इस देश की जनसंख्या पर पूरा नियंत्रण हो। लेकिन लोग नाराज होते हैं!
संतति-नियमन करने को कोई राजी नहीं। लोग समझते हैं: यह उनकी स्वतंत्रता पर हमला हो गया। बच्चे पैदा करने की स्वतंत्रता छिन गई?
और लोग सोचते हैं कि कम से कम यह तो हमारी आजादी होनी चाहिए कि हमें कितने बच्चे पैदा करने हैं--वह हम करें। लोग यह सोचते नहीं कि तुम्हारे बच्चे पैदा करने से गरीबी बढ़ती है।
यही लोग चिल्लाते हैं: गरीबी हटाओ। लेकिन जब गरीबी हटाने लग जाओगे, तो यही लोग बाधा बन जाएंगे। और जब ये बाधा डालेंगे...
इंदिरा ने चेष्टा की कि इनकी बाधा को तोड़ो, बाधा को तोड़ा, तो थोड़ी ज्यादती हो गई।
इंदिरा क्रांति की चेष्टा कर रही थी।
पांच महीनों में, जयप्रकाश ने जिस सत्ता को हुकूमत में बिठा दिया है, यह तो बहुत ही प्रतिक्रांतिवादी मालूम होती है।
मैंने भी इस सत्ता का स्वागत किया था, सिर्फ इस आशा से कि जयप्रकाश जैसा व्यक्ति इसके पीछे है; निष्ठावान व्यक्ति पीछे है, शायद कुछ इनसे हो सकेगा। लेकिन पांच महीनों की कथा बड़ी अदभुत है।
इन पांच महीनों में कुछ भी नहीं हुआ; देश नीचे गिरा। जो इंदिरा ने थोड़ा-बहुत काम किया था, वह भी सब खराब कर डाला।
इन पांच महीनों में इन्होंने इतना ही किया कि कोई भूल नहीं की। मगर भूल न करना कोई गुणवत्ता है? असल में भूल उससे होती है, जो कुछ करता है। जो कुछ करेगा ही नहीं, उससे भूल भी कैसे होगी?
इंदिरा ने कुछ करने की चेष्टा की थी, तो भूलें भी हो गई थीं। भूलें निश्चित हो गई थीं। भूलें नहीं होनी चाहिए थीं। लेकिन जब कोई कुछ करने की चेष्टा करता है, तो भूल होनी स्वाभाविक है। स्वीकार करना चाहिए कि भूल होना स्वाभाविक है।
परीक्षा में बैठोगे, तो भूल होगी। परीक्षा में ही नहीं बैठे, तो भूल कैसे होगी?
इन पांच महीनों में, इस सरकार ने कुछ भी नहीं किया, इसलिए इससे भूल का तो तुम कभी इस पर कोई दोषारोपण नहीं कर सकते। किए ही नहीं, तो भूल कैसी? चले ही नहीं, तो कांटा कैसे गड़े? बैठे हैं--अपनी जगह!
और जो किया, कुल जमा इतना किया कि किस तरह पुरानी सत्ता को बदनाम करो। यह भी कोई धंधा है? इसमें इतना समय खराब करने का कोई प्रयोजन नहीं है। जो बात गई--गई।
इस तरह की अभद्रता दुनिया के किसी देश में नहीं होती। अगर हर सरकार यही काम करे कि जब बदलाहट हो, तो नई सरकार आकर पुरानी सरकार के सारे काले-कारनामों को खोजना शुरू कर दे, तो दुनिया में सब काम ही बंद हो जाए। क्योंकि इसको पांच साल का मौका मिला, यह तो उसी में लग जाएगा। फिर दूसरी सरकार आएगी, वह इसकी खोज-बीन करेगी; और इतनी ही भूलें इसमें मिल जाएंगी। क्योंकि जिनके हाथ में सत्ता है, उनसे भूल होनी स्वाभाविक ही है। कुछ न भी करो, तो भूल हो जाएगी। कुछ न करने से भी भूल हो जाती है। कितना ही बचा कर रखो।
और सिर्फ इसलिए थोड़े ही तुम्हें वहां भेजा है कि तुम भूल न करो। और अगर भूल ही नहीं करनी थी, तो अपने घर ही अच्छे थे!
सत्ता में बैठ कर अगर इतना ही करना है कि भूल नहीं करनी है और पुरानी सत्ता की सारी खोज-बीन करनी है, तो यह तो बड़ी अजीब सी बात हो गई।
यह तो ऐसा हुआ कि शिक्षक नया, स्कूल में आए और इसके पहले शिक्षक जो पढ़ाता था बच्चों को, सारा समय उसकी भूल खोजने में लगाए। ये बच्चे हैं, इनको शिक्षा मिली नहीं है। पहला कम से कम कुछ शिक्षा तो दे रहा था; भूल भरी दे रहा होगा। ये सज्जन पिछले की भूल में ही सारा समय लगा रहे हैं!
कितने आयोग बिठा दिए हैं! सारा काम ऐसे मालूम पड़ता है कि किस तरह पुरानी सरकार की भूलें खोज ली जाएं। और मैं नहीं कहता कि भूलें नहीं थीं। भूलें निश्चित थीं, मगर उन पर इतना समय देना तो बड़ी भारी भूल हो जाएगी।
जयप्रकाश इसको पूर्ण क्रांति कहते हैं! इसमें पूर्ण क्रांति जैसा कुछ भी नहीं। क्रांति जैसा भी कुछ नहीं। इसको छोटा-मोटा सुधार भी नहीं कहा जा सकता। सचाई तो यह है यह प्रतिक्रांति हो गई। यह क्रांति से नीचे गिरना हो गया।
जो लोग सत्ता में आए हैं, ज्यादा दकियानूस हैं। जो लोग सत्ता में आए हैं, ज्यादा प्रतिक्रियावादी हैं। जो लोग सत्ता में आए हैं, ज्यादा लकीर के फकीर हैं।
इंदिरा में थोड़ी हिम्मत थी। वही हिम्मत उसे मुश्किल में डाल गई। अगर उसने भी हिम्मत न की होती, तो अभी भी देवी, दुर्गा बनी होती। उसने हिम्मत की तो तुमको नाराजगी हो गई। तुम्हें अड़चन आई। क्योंकि तुम्हारी धारणाएं, तुम्हारी परंपराएं, तुम्हारी व्यवस्थाएं, जरा टूटीं कि तुम मुश्किल में पड़े।
रोज लोग चिल्लाते हैं कि बंबई या दिल्ली या कलकत्ता से झोपड़-पट्टियां अलग होनी चाहिए। मगर जब अलग करोगे, तो अड़चन है! अलग करोगे, तो वे झोपड़-पट्टिओं में जो लाखों लोग रहते हैं, वे नाराज हो जाते हैं। वे हटने को राजी नहीं हैं। उनका मकान छीन रहे हो। उनको बेहतर मकान भी दे दो--गांव के बाहर, तो भी वे नाराज हैं। वे वहीं जम कर बैठे रहेंगे। उनको हटाना है, तो जबर्दस्ती करनी होगी। और उनको न हटाओ, तो वे गंदगी फैला रहे हैं। उनको न हटाओ, तो वे घाव की तरह हैं।
वह तो यही समझो, कि तुम्हारे पैर में घाव हो जाए, तो तुम जाकर ऑपरेशन करवा लेते हो। वह तो जो कीड़े-मकोड़े तुम्हारे घाव में बैठे हैं, अगर उनसे पूछा जाए, तो बहुत नाराज होंगे। वे कहेंगे: हमको हटाया जा रहा है। हमारा घर छीना जा रहा है।
तुम्हें टी. बी. हो जाती है, तो टी. बी. के जो कीटाणु तुम्हारे प्राणों को खाए जा रहे हैं, इलाज क्या है? उनको मार डालो। लेकिन उनसे पूछो, तो वे कहेंगे: बहुत ज्यादती हो रही है। इस एक आदमी को बचाने के लिए करोड़ों कीटाणुओं को मार रहे हो। कुछ तो सोचो! अन्याय कर रहे हो।
झोपड़-पट्टी में जो बैठा है, उसे हटाओ, तो वह नाराज होता है। और वह नाराज हो जाए, तो जिनको सत्ता में जाना है, वे उसके साथ खड़े हो जाते हैं। वे कहते हैं: यह जनता के साथ ज्यादती हो रही है।
इस जगत में कुछ भी करना हो, तो ज्यादती तभी बचाई जा सकती है, जब लोग सहज स्वागत से उसे करने को राजी हो जाएं। नहीं तो ज्यादती नहीं बचाई जा सकती। या फिर कुछ किया नहीं जा सकता। न किया जा सके, तो...
गरीबी हटानी है, देश को समृद्ध बनाना है। और लोगों की गरीबी की आदतें पड़ गई हैं। और लोगों की जो जीवन-शैली है, वह ऐसी है कि उन्हें गरीब से गरीब बनाए जाती है। उनकी जीवन-शैली तोड़नी पड़ेगी, तो क्रांति हो सकती है।
मेरे देखे जो राज्य-व्यवस्था जनता के अतीत से राजी न हो और भविष्य के लिए उन्मुख हो, वही क्रांति कर सकती है। जो राज्यसत्ता जनता के अतीत के साथ तालमेल बिठा रखना चाहे, लोगों को खुश रखना चाहे, वह राज्यसत्ता क्रांति नहीं कर सकती।
पांच महीनों की कथा बहुत अजीब है। आशा निराशा में बदल गई। और जयप्रकाश ने वही किया जो पहले गांधी कर चुके थे। वही भूल, वही नासमझी। इसे भी समझ लेना जरूरी है।
गांधी लड़े अंग्रेजों से, और जब सत्ता हाथ में आई, तो सत्ता लेने की जिम्मेवारी नहीं ली; बच गए। क्योंकि इतनी बात गांधी को भी साफ थी कि अगर सत्ता हाथ में ली, तो थोड़े ही दिन में पता चल जाएगा कि जो नारे दिए थे--लोगों को--वे पूरे नहीं किए जा सकते। जनता की समस्याएं बड़ी कठिन हैं। अंग्रेजों के कारण नहीं थीं समस्याएं, नहीं तो अंग्रेजों के जाते, सब समस्याएं समाप्त हो जातीं। समस्याएं कठिन हैं, जटिल हैं।
गांधी होशियार राजनीतिज्ञ थे। एक बात उनको साफ समझ आ गई कि सत्ता में बैठे, तो प्रतिष्ठा खो जाएगी। क्योंकि हल तो होने ही वाला नहीं है। समस्याएं ऐसी हैं कि एक हल करोगे, दस उलझ जाती हैं। इतना बड़ा देश है; इतनी बड़ी समस्याएं हैं; इतनी उलझनें हैं। और जनता को खुश रखना है, वह सबसे बड़ा उपद्रव है। वही जनता बाधा है। उसके ही हित में बाधा है।
तो गांधी कन्नी काट गए। वह कन्नी काटना भी हम को खूब अच्छा लगा। यही तो हमारा मजा है। जनता की मूढ़ता ऐसी तो है! हमने कहा: यह है संत; सत्ता हाथ में आई और नहीं ली!
मगर यह तो ऐसा हुआ कि एक मरीज को डॉक्टर टेबल पर लिटा दे और पेट खोल दे और फिर कह दे कि मैं ऑपरेशन नहीं करता। इसको संत कहोगे? यह कहे: अब ऑपरेशन हमारा असिस्टेंट कर देगा। क्योंकि यह पेट काट कर देखे कि इस आदमी की बचने की उम्मीद नहीं है। मैं झंझट क्यों लूं? मैं दूर खड़ा रह जाऊं। मैं अपने को बचा लूं। असिस्टेंट काट दे। बच गया, तो मैंने बचाया, क्योंकि मैंने ही शुरुआत की, और मेरा ही असिस्टेंट है। और मर गया, तो असिस्टेंट से भूल हो गई!
तो गांधी बच गए; सत्ता में नहीं गए। गांधी को सत्ता में जाना चाहिए था। वह उनकी बेईमानी थी। वह बड़ा कुशल काम कर गए। और जनता खूब प्रसन्न हुई। जनता ने कहा: महात्मा यह है!
यह जनता ऐसी मूढ़ है! उसने कहा: महात्मा यही है। जनता को जोर देना था कि ‘तुम’ लड़े; तुमने हमें लड़ाया, अब सत्ता हाथ में आई है, तो तुम जो कहते थे करके दिखाना, वह करके दिखा दो! अब तो स्वराज्य आ गया, अब सुराज्य भी लाकर दिखा दो। तुम राम-राज्य की बातें करते थे, अब मौका मिला, अब राम-राज्य लाकर दिखा दो।
तुम जो सारी बातें कहते रहे, पिछले पचास साल तक, अब तुम्हें अवसर मिला है, तो भागते कहां हो! अगर देश समझदार होता, तो जनता ने जोर दिया होता, कि तुम सत्ता में जाओ। उससे दो बातें साफ हो गई होतीं: या तो गांधी कुछ कर सकते, तो देश को लाभ होता। या कम से कम उनसे छुटकारा हो जाता देश का। मुझे आशा है कि उनसे छुटकारा हो जाता।क्योंकि देश देख लेता कि बात खत्म हो गई।
कल मैंने राजनारायण का वक्तव्य पढ़ा। वह वक्तव्य महत्वपूर्ण है। राजनारायण ने इस वक्तव्य में कहा है कि ‘जब मैं मिनिस्टर नहीं बना था, तब मेरी ज्यादा प्रतिष्ठा थी। अब मेरी प्रतिष्ठा कम हो गई!’
यह आदमी साफ-सुथरा है। ऐसा कोई कहता नहीं। मोरार जी भाई ऐसा न कहेंगे। यह आदमी साफ-सुथरा है, सीधा-सादा है। इसने सच्ची बात कह दी--कि जब मैं सत्ता में नहीं था, तब मेरी प्रतिष्ठा ज्यादा थी। अब मेरी प्रतिष्ठा कम हो गई।
सत्ता में जाने से प्रतिष्ठा कम होगी ही। क्योंकि सत्ता में तुम जिन समस्याओं को लेकर गए थे, वे हल तो होती नहीं। लोगों ने तुम्हें प्रतिष्ठा दी थी, क्योंकि तुम शोरगुल मचाते थे--कि ऐसा होना चाहिए और नहीं हो रहा है, और मैं करके दिखा सकता हूं।
लोगों ने तुम्हें भेजा। फिर वहां जाकर तुम बैठ गए। जो हो रहा था, वह भी नहीं हो रहा है। वह भी खत्म हो गया। तुमसे तो कुछ हो ही नहीं रहा, तो प्रतिष्ठा तो खत्म हो ही जाएगी।
गांधी अगर दो साल सत्ता में रह गए होते, तो जो काम गोडसे नहीं कर पाया, वह सत्ता ने कर दिया होता; वे सदा के लिए मर गए होते। उनसे इस देश का सदा के लिए छुटकारा हो गया होता। अब कभी छुटकारा नहीं होगा, क्योंकि यह आशा मन में लटकी ही रहेगी कि काश, गांधी की कोई मान कर चलता, तो देश में सुराज्य आ जाता, देश में राम-राज्य आ जाता। और अब? गांधी तो चूक ही गए। वह तो अब कोई उपाय ही नहीं रहा जांचने का।
वही जयप्रकाश ने फिर किया।
लोग कहते हैं: जयप्रकाश गांधी के वसीयतदार हैं। मैं भी कहता हूं। यह उन्होंने साफ कर दिया--सत्ता से बच कर!
तुम लड़े; तुमने मेहनत की; तुमने पुरानी सत्ता को उखाड़ दिया। अब यह तुम्हें मौका मिला था कि तुम बता देते कर के, कि तुम कुछ कर सकते हो। फिर बच गए!
अब जयप्रकाश की समाधि भी वहीं राजघाट में बन जाएगी, जहां गांधी की है। अभी लोग एक पर फूल चढ़ाते हैं, फिर दो पर फूल चढ़ाने लगेंगे। बस, इतनी ही क्रांति हुई, और कुछ न हुआ।
यह बेईमानी है। क्या फर्क हुआ? और फर्क भी ऐसा, जिसका कोई मूल्य नहीं आंका जा सकता। कोई मूल्य है नहीं।
सच तो यह है कि अब सारा जो नया वर्ग सत्ता में गया है, वह इतना ही कह रहा है, कि उन्होंने देश को वह जो संकटकाल की, आपातकाल स्थिति थी, उससे छुटकारा दिलवा दिया। लेकिन मजा यह था कि इनके ही उपद्रव के कारण वह आपातकाल स्थिति डाली गई थी। नहीं तो उसके डालने की कोई जरूरत ही न थी। ये ही कारण थे।
जयप्रकाश और मोरार जी ने जो उपद्रव मचाने शुरू किए थे, उसके कारण आपातकालीन स्थिति आई--इमरजेंसी आई। अब ये कहते हैं: हमने उससे छुटकारा दिलवा दिया! तुम्हीं उसके जन्मदाता थे। तुम उपद्रव न करते, तो इंदिरा कोई आपातकाल स्थिति लाने के लिए उत्सुक नहीं थी। तुमने उपद्रव किया, उसको आपातकाल स्थिति लानी पड़ी। अब तुम्हारा उपद्रव सफल हो गया; तुमने आपातकालीन स्थिति खत्म कर दी। देश जहां के तहां है! कहीं कुछ फर्क नहीं हुआ।
आपातकालीन स्थिति का सारा जिम्मा इंदिरा पर छोड़ना उचित नहीं है। नब्बे प्रतिशत जिम्मा इन पर है--जो अब सत्ता में हैं। यह मजबूरी थी; लानी पड़ी।
जयप्रकाश इस तरह की बात करने लगे कि पुलिस का सैनिक, और फौज का सिपाही भी बगावत करे। इस तरह की बातें अगर की जाएंगी तो कोई भी सत्ता, देश की सुरक्षा के लिए कुछ करेगी; करना ही पड़ेगा। वह मजबूरी थी।
अब ये सत्ता में आ गए हैं। जयप्रकाश तो बच कर निकल गए, अब उनका कभी दोष पकड़ा न जा सकेगा। और जिनके हाथ में सत्ता चली गई, वे इंदिरा से ज्यादा प्रतिक्रियावादी हैं।
मोरार जी भाई को किसी ने कभी सोचा था कि ये कोई क्रांतिकारी हैं? मुझसे तो एक सज्जन कह रहे थे: इनका असली नाम मोरार जी भाई नहीं, मगरूर जी भाई है!
इन्हें कभी किसी ने सोचा ही नहीं था कि ये क्रांतिकारी हैं, इनसे क्रांति हो सकती है!
इंदिरा के हाथ में कम से कम जवानी के हाथ में सत्ता थी। अब ये बिलकुल मुर्दों के हाथ में सत्ता चली गई।
और ये जो बातें कर रहे हैं, उससे क्रांति का क्या लेना-देना है? गौ-हत्या बंद हो जाए--इससे क्रांति होती है?
यह देश तो मूढ़ है! यह देश मूढ़तापूर्ण बातों में रस लेता है। अगर यहां गौ-हत्या बंद हो जाए, तो लोग समझेंगे: हो गई क्रांति! गौ-हत्या बंद होने से क्या होगा? भूखे का पेट भरेगा? थोड़ा और भूखा हो जाएगा। क्योंकि वह जो गौएं बच जाएंगी, उनको भी खिलाना पड़ेगा।
और मैं यह नहीं कर रहा हूं कि गौ-हत्या होनी चाहिए। मैं यह कह रहा हूं: यह कोई क्रांति नहीं होगी।
अब मोरार जी भाई दीवाने हैं कि शराबबंदी हो जाए। शराबबंदी से फर्क होगा? शराबबंदी से देश खुशहाल हो जाएगा?
असल में वह जो गरीब है, जो दुखी है, परेशान है, पीड़ित है, जो बिलकुल मरा जा रहा है--शराब ही उसका सहारा है। वह उसी के सहारे जी लेता है। किसी तरह अपने को भुला लेता है। वह भी छीन लो उससे! दिन भर की तकलीफें और दिन भर की परेशानियां, सांझ पी लेता है और भूल जाता है: चलो, कल देखा जाएगा। अब कल जब होगा, तब होगा।
शराबबंदी कर देने से लोगों के दुख न मिटेंगे। हां, लोगों के दुख मिट जाएं, तो शराबबंदी अपने से हो जाएगी।
मैं भी शराबबंदी के पक्ष में हूं, मगर शराबबंदी के सीधे पक्ष में नहीं हूं।
मैं कहता हूं: लोग दुखी हैं; लोग परेशान हैं; लोग इतने परेशान हैं कि शराब उनका सहारा है। नहीं तो कौन जहर पीता है? कोई सोच समझ कर जहर पीता है? कोई खुशहाल आदमी जहर पीता है? लोग चिंतित हैं। और तुम यह मत सोचना कि जिनके पास धन है, वे चिंतित नहीं है। वे भी चिंतित हैं।
यह देश इतना गरीब है कि इस देश में धनी होना और भी चिंता का कारण है। अगर तुम--नंगे आदमियों के बीच एक आदमी कपड़ा पहने खड़ा है, तो कितनी देर कपड़ा पहने खड़े रहोगे? कुछ पक्का है; ये जहां हजार नंगे आदमी खड़े हैं और सब तुम से छीने-झपटने को तैयार हैं कि कब तुम्हारे कपड़े चीर-फाड़ कर फेंक देंगे! कपड़ा तो छीनेंगे, तुम्हारी चमड़ी भी छोड़ेंगे कि नहीं...!
जहां हजार नंगे आदमी खड़े हैं, वहां एक आदमी कपड़ा पहने खड़ा है--इसकी चिंता का तुम्हें अंदाज नहीं है। यह नंगे आदमियों से ज्यादा परेशान है। क्योंकि इसको लग रहा है--ये कपड़े आज नहीं कल छिनने वाले हैं। कोई इधर से खींच रहा है, कोई उधर से खींच रहा है! इसको डर है कि कपड़े तो जाएंगे ही, हाथ-पैर भी बचेंगे--मुश्किल है। गर्दन भी बचेगी--मुश्किल है।
शराबबंदी से कुछ भी न होगा। यह देश को धोखा देना है। यह क्रांति इत्यादि नहीं है। यह असली सवालों को हटा कर नकली सवाल बीच में लाना है। और नकली सवालों के साथ एक मजा है कि लोग उनसे राजी होते हैं। यहां शराब पीने वाला भी, जहां तक कहने का संबंध है, वह भी कहेगा: हां, शराब बुरी चीज है। शराब बुरी चीज है ही--यह सभी मानते हैं। इसलिए कौन कहेगा कि यह शराबबंदी नहीं होनी चाहिए!
यहां जो आदमी गौ का भक्त नहीं भी है; वह भी यह नहीं कहेगा कि गौ कटनी चाहिए। मुसलमान भी नहीं कहेगा कि कटनी चाहिए, क्योंकि बात तो सीधी-साफ है--कि हिंसा अच्छी नहीं हो सकती।
तो ये बातें तो हमारी धारणा में ही बैठी हुई हैं कि गौ नहीं कटनी चाहिए; शराब नहीं पी जानी चाहिए। यह लोक-मानस के अनुकूल चलना है। हालांकि इससे कुछ हल नहीं होगा।
जरा सोच लो कि गौ कटना बंद हो गई। मान लो। और शराबबंदी हो गई। क्या फर्क पड़ेगा? कितना फर्क पड़ेगा? गरीब की गरीबी मिटेगी? अशिक्षित शिक्षित हो जाएगा? जिनके पास मकान नहीं, उनके पास मकान होंगे? क्या होगा? इससे खतरे ही बढ़ेंगे।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि गरीब आदमी के लिए, भूखे-परेशान के लिए अगर शराब न हो तो फिर दूसरा मनोरंजन का एक ही उपाय बचता है सस्ता--और वह है: संभोग। अगर वह रात शराब पीकर आ गया पति, तो चुपचाप सो जाता है। या थोड़ा शोरगुल मचाता है; इधर-उधर घूम कर, गिर-फिर कर, आकर सो जाता है। अगर वह शराब पी कर नहीं आया, तो एक ही उपाय है कि संभोग करे।
शराबबंदी इस देश की संख्या को बढ़ा देगी। और शराबबंदी इस देश में लोगों के तनाव और बेचैनियां बढ़ा देगी। और लोग जब ज्यादा तने होते हैं, ज्यादा बेचैन होते हैं, ज्यादा परेशान होते हैं, तो ज्यादा हड़तालें होंगी, ज्यादा दंगे होंगे, ज्यादा छुरेबाजी होगी, हिंदू-मुस्लिम दंगे होंगे; महाराष्ट्रियन-गुजराती लड़ेंगे; ऐसा होगा, वैसा होगा--ये सब उपद्रव होंगे।
शराब शामक है। और खयाल रखना कि मैं शराब का पक्षपाती नहीं हूं। मैं भी चाहता हूं कि शराब चली जाए, क्योंकि इससे अहित तो होता है। इससे स्वास्थ्य की हानि तो होती है। मगर शराब जाए; उसके मूल कारण हट जाएं--तो जाए। नहीं तो कोई मतलब नहीं है।
गौ-हत्या जरूर बंद होनी चाहिए। लेकिन जहां आदमी की हत्या हो रही है, वहां गौ-हत्या बंद नहीं हो सकती।
यहां मेरे पास इतने पश्चिम से आए संन्यासी हैं, वे सभी मुझे कहते हैं कि यहां की गौएं ऐसी--मरी-मराई--कि हमने कभी पश्चिम में देखी नहीं थीं। पश्चिम की गाय बड़ी शानदार होती है। तीस-चालीस सेर दूध देना गाय के लिए बिलकुल सहज बात है। रोज साठ सेर दूध देने वाली गाएं पश्चिम में आम हैं। यहां की गाय? तीन पाव दूध दे दे, तो बहुत है!
आदमी मरा जा रहा है, गौ को खिलाने के लिए कहां है! और तुम गौएं बढ़ा लोगे। पानी पिलाने को नहीं है; घास खिलाने को नहीं है और गौओं की भीड़ बढ़ाते जाओगे।
और मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि गौएं मारी जाएं। मैं किसी के भी मारे जाने के पक्ष में कैसे हो सकता हूं! इसलिए मेरी अड़चन समझना।
मैं जानता हूं कि गौएं बचनी चाहिए। लेकिन यहां आदमी मरा जा रहा है, तो पहले गाय तो नहीं बचाई जा सकती। पहले आदमी को बचाना होगा। आदमी बचेगा, तो गाय बच सकती है--किसी दिन। गाय के बचने से आदमी नहीं बचेगा। गाय क्या करेगी? जितनी संख्या गाय की हो जाएगी, उतना दूध गायों से कम मिलने लगेगा, क्योंकि भोजन उतना बंट जाएगा।
पश्चिम में गायों की संख्या ज्यादा नहीं है। गाएं कम हैं, लेकिन उनको फिर भोजन पूरा मिलता है।
पचास गाएं हों तुम्हारे घर में और भोजन उतना ही है, तो पचास में बंट जाता है। पचास गायों का मिल कर दूध पचास सेर हो पाता है।
पश्चिम में एक गाय होती है--पचास गाएं नहीं होतीं। मगर एक गाय पचास सेर दूध दे देती है। और एक गाय का खर्चा कम है। पचास गायों का उपद्रव: उनको रखने का इंतजाम, उनकी सेवा-टहल, आदमी--सबकी व्यवस्था चाहिए।
पश्चिम में दूध-दही की नदियां अभी भी बह रही हैं, जिनकी तुम पुराणों में बात करते हो। लेकिन हमारी मूढ़ता ऐसी है कि व्यर्थ की बातें हमें बड़ी क्रांतिकारी मालूम होती हैं। बिलकुल दो-कौड़ी की बातें, जिनका कोई मूल्य नहीं है; जिनमें कहीं कोई समझदारी की झलक नहीं है।
लेकिन यह जनता मूढ़ है। इस जनता के नेता तुम्हें बने रहना है, तो जो जनता मानती है, वैसा करो।
अब एक चमत्कार की घटना घटी न! यह पहला मौका था कि जनसंघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुसलमान एक साथ इंदिरा के खिलाफ हो गए। जो सदा के दुश्मन थे, वे साथ हो गए! इंदिरा को हराने में हिंदू मतवादी और मुसलमान--दोनों इकट्ठे हो गए। ये सदा के दुश्मन! इनको मामला क्या हो गया? एकदम से साथ, दोस्ती कैसे बढ़ गई? इन्होंने सदा एक-दूसरे की छाती में छुरा भोंका था। ये एक साथ कैसे हो गए?
वह जो संतति-नियमन का प्रयोग चला--उसके कारण एक हो गए। मुसलमान बहुत नाराज हो गए। उत्तर प्रदेश में इंदिरा की हार मुसलमान
की नाराजगी है--और कुछ भी नहीं। मुसलमान बर्दाश्त नहीं कर सका--कि उसकी संतति की स्वतंत्रता पर बाधा डाली जाए।
मुसलमान अजीब सी बातों में पड़ा है। जैसे मुसलमानों का नियम है कि चार औरतों से शादी कर सकते हो! अब जो भी बाधा डालेगा इसमें, मुसलमान उस पर नाराज हो जाएगा। अब यह बात बिलकुल अनैतिक है--कि एक आदमी चार स्त्रियों से शादी करे। और अगर यह नैतिक है, तो फिर एक स्त्री चार आदमियों से शादी करे--यह अनैतिक क्यों है?
यह तो ज्यादती है। यह तो शोषण है। लेकिन अगर कोशिश करो, कि हम कानून बनाएंगे कि एक आदमी एक ही स्त्री से शादी कर सकेगा, तो मुसलमान नाराज हो जाता है। उसकी स्वतंत्रता पर बाधा पड़ रही है। स्त्रियों का वह शोषण करता रहा है--सदा से।
स्त्रियों का इस्लाम में कोई आदर नहीं है; बड़ा अनादर है। इससे बड़ा अनादर क्या होगा कि तुम चार स्त्रियों के मालिक बन जाते हो! और मुसलमान को उसमें फायदा दिखाई पड़ता है। फायदा यह है कि वह चार स्त्रियों से काम करवाने लगता है। तो उसकी आमदनी चौगुनी हो जाती है।
और इसलिए लोग बच्चे रोकने में भी बाधा डालते हैं। क्योंकि छोटे-छोटे बच्चों को काम में लगा देते हैं। स्कूल वगैरह भेजना नहीं है। अगर स्कूल भेजने की जबर्दस्ती करो, तो उनकी स्वतंत्रता में बाधा पड़ती है!
स्कूल भेजना नहीं है; छोटे-छोटे बच्चों को काम में लगा दिया। गाएं चराने जाने लगे; घास काटने लगे; गड्ढा खोदने लगे; लकड़ी फाड़ने लगे। छोटे-छोटे बच्चों को काम में लगा दिया। तो जितने ज्यादा बच्चे हों, उतना ही थोड़ा ज्यादा पैसा आने लगा।
ऐसा व्यक्ति को तो दिखाई पड़ता है, लेकिन पूरे समूह का जीवन रुग्ण होता चला जाता है। अब जो भी इनको छेड़ेगा, वही दुश्मन हो जाएगा।
इंदिरा का गिर जाना इस कारण हुआ कि इंदिरा कुछ क्रांति करने की कोशिश कर रही थी, और अगर उसे ज्यादती करनी पड़ी, तो उसका कारण इंदिरा नहीं थी। उसका कारण वे लोग थे, जिन्होंने बाधाएं डालीं।
तुम ही बाधा डालोगे, तुम्हारे ही हित में बाधा डालोगे!
ये जो सत्ता में आ गए लोग हैं, मैंने भी इनका स्वागत किया था, इस आशा से कि जयप्रकाश एक निष्ठावान आदमी हैं। मगर वह भी वैसा ही धोखा दे गए, जैसा पहले गांधी दे गए थे। उन्होंने ठीक वसीयत पा ली! अब वे बैठ गए जाकर पटना, और जिन बातों के लिए वे इंदिरा से लड़े थे, वे सबकी सब बातें वैसी की वैसी जारी हैं। कहीं कोई फर्क नहीं हुआ।
कल मैं एक गीत पढ़ रहा था। बालकवि वैरागी का गीत है। वह मुझे पसंद पड़ा। उसे समझना।
गंतव्य वही, मंतव्य वही,
आदेश वही, अधिकार वही,
रीति वही, रणनीति वही,
प्रतिशोध वही, प्रतिकार वही
जो क्रांति बताता है इसको
उस चिंतन की बलिहारी है
परिवर्तन को क्रांति बताना
संभवतः लाचारी है
जब चिंतन पर काई जम जाए
विप्लव की भांवर थम जाए
तो समझो पीढ़ी हार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
ये हिंसक और अहिंसक क्या,
ये परिभाषा क्या, भाषा क्या,
ये भाषण क्या, प्रतिभाषण क्या,
ये अभिनय और तमाशा क्या,
बस, क्रांति क्रांति ही होती है
पहले तुम इतना मानो तो
फिर बेशर्त करो मसीहाई
इस पीढ़ी को पहचानो तो
जब घाव वही, अलगाव वही
बात वही, बिखराव वही
तो आहुति क्या बेकार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
जब अग्नि-बीन का गायक ही
खो जाए मेघ मल्हारों में
तो जी करता है आग लगा दूं
अग्नि-बीन के तारों में
तुम आग जगा कर कहते हो
हे ज्वाला मां अब सो जाओ
जब तक हम गाएं दरबारी
तब तक तुम पानी हो जाओ
जब दीन वही, ईमान वही
जब मुरदे और मसान वही
तो झंझा किसे झंझकार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
वे चाट गए उस सावन को
इस फागुन को ये पी जाएं
दोनों ने कसमें खाई हैं
ये बगिया कैसे जी जाए
सप्तम में राहू बैठ गया
शायद माली और डाली के
लग्न बराबर मिले नहीं
इस लाली और हरियाली के
जब भंवरों का वक्तव्य वही
जब तितली का भवितव्य वही तो मधुऋतु किसे संवार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
मैं कल भी भैरव गाता था
मैं अब भी भैरव गाता हूं
मैं कल भी तुम्हें जगाता था
मैं अब भी तुम्हें जगाता हूं
वो अंधियारे की साजिश थी
ये साजिश का उजियारा है
इस पीढ़ी को हर सूरज ने
मावस से मिल कर मारा है
जब घात वही, प्रतिघात वही
काजल कुंकुंम की जात वही
तो ऊषा किसे निखार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
कल आग जिन्हें आवश्यक थी
वे सिर पर सावन ढोते हैं
जो कल तक सावन ढोते थे
वे आज आग को रोते हैं
ये सब मौसम के तस्कर हैं
सब मिली-जुली चतुराई है
सब सपनों के सौदागर हैं
ये सब मौसेरे भाई हैं
अंबर के नारे वे के वे
और अंधे तारे वे के वे
घूंघट में डायन मार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
गंतव्य वही, मंतव्य वही
आदेश वही, अधिकार वही,
रीति वही, रणनीति वही,
प्रतिशोध वही, प्रतिकार वही
जो क्रांति बताता है इसको
उस चिंतन की बलिहारी है
परिवर्तन को क्रांति बताना,
संभवतः लाचारी है
जब चिंतन पर काई जम जाए
विप्लव का भांवर थम जाए
तो समझो: पीढ़ी हार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।
कुछ फर्क नहीं हुआ। सब वैसे का वैसा है।
और यह भी मैं तुमसे कहना चाहूंगा कि यही इस घटना में हुआ हो--ऐसा भी नहीं। आज तक जगत में कोई राजनैतिक क्रांति, क्रांति नहीं हुई।
क्रांति का शास्त्र ही व्यर्थ हो गया है। क्रांति की बात ही अब क्रांतिकारी नहीं रही। सब क्रांतियां हार गई हैं। फ्रेंच क्रांति हारी; रूसी क्रांति हारी, चीनी क्रांति हारी--सब क्रांतियां हार गईं। कोई क्रांति जीती नहीं।
इससे एक सार की बात समझ लेनी चाहिए कि सत्ता में परिवर्तन से क्रांति नहीं होती। लोगों के सत्वों में परिवर्तन होना चाहिए। राज्य से क्रांति नहीं होती; समाज से क्रांति नहीं होती; केवल व्यक्ति से क्रांति होती है। केवल व्यक्ति की चेतना में क्रांति का दीया जलता है।
इसलिए मेरी कोई उत्सुकता राज्य में, सत्ता में, समाज में नहीं है। मेरी उत्सुकता तुममें है, व्यक्ति में है। एक-एक व्यक्ति रूपांतरित हो, बड़ी संख्या लोगों की रूपांतरित हो जाए, तो समाज भी बदल जाएगा। लेकिन समाज को सीधे बदलने का कोई उपाय नहीं है। कैसे बदलोगे? क्योंकि जिस समाज को बदलना है, उसी से वोट मांगनी होगी। इस यंत्र को समझो।
जिसको बदलना है, उसी से वोट मांगनी है। वोट वह तभी देगा, जब तुम उसके अनुकूल हो। तुम प्रतिकूल हो गए, तो वह वोट नहीं देता। और तुम्हें अगर बदलना है, तो तुम्हें प्रतिकूल होना पड़ेगा। तब तो बड़ी झंझट हो गई। यह गणित तो बहुत उलझ गया।
तुमसे आज्ञा लेनी है और तुम्हारे ही खिलाफ काम करना है। तुम आज्ञा ही न दोगे पहले तो; और अगर तुमने आज्ञा भी दे दी--किसी आश्वासन में, किसी भ्रम में--तो जैसे ही बदलाहट शुरू होगी, तुम नाराज हो जाओगे। तुम कहोगे: धोखा हो गया! हमें कहा कुछ था, किया कुछ जा रहा है।
जनता की यह जो भीड़ है, यह बिलकुल अंधकार में खोई हुई है। इसे यह भी पता नहीं कि इसके हित में क्या है? इसे यही पता होता, तो हित कभी का हो गया होता। इसे यह भी पता नहीं कि अहित में क्या है? यह अपने ही अहित को किए चली जा रही है। यह अपने ही हाथ से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारे चली जाती है! इसे तुम रोको, तो यह नाराज होती है।
तो जिसको क्रांति करनी हो, वह जनता से मत न ले पाएगा। और जिसे जनता से मत लेना हो, उसे क्रांति की बातचीत करनी चाहिए, लेकिन क्रांति का काम नहीं करना चाहिए, क्रांति की झंझट में नहीं पड़ना चाहिए।
इंदिरा उसी झंझट में पड़ी। उसे धीरे-धीरे ऐसा लगा कि अब कुछ हो सकता है; कुछ किया जा सकता है।
मुझे याद आती है, काफी वर्ष हो गए, तब इंदिरा से मेरा मिलना हुआ था। तब मोरार जी इंदिरा के साथ उप-प्रधानमंत्री थे। मुझे भलीभांति याद है इंदिरा ने मुझे कहा कि आप जो कहते हैं, मैं पढ़ती हूं और आपकी बातें मुझे ठीक लगती हैं। लेकिन आप तो जानते ही हैं, मैं मोरार जी भाई जैसे आदमियों के साथ उलझी हूं। कुछ काम हो नहीं सकता। कुछ भी करना चाहो, अड़चन खड़ी हो जाती है। इन सब को बांध कर चलाना बहुत मुश्किल है। जरा भी कुछ नया करना चाहो कि वे सब ठिठक कर खड़े हो जाते हैं। वे कोई साथ देना नहीं चाहते।
तो मैंने इंदिरा को कहा था: जो इस तरह ठिठक कर खड़े होते हैं, उनको धीरे-धीरे विदा करो। उसने किया भी; धीरे-धीरे उनको विदा भी किया। मगर इतने लोगों को विदा कर दिया कि वे सब इकट्ठे हो गए। उन सब ने इकट्ठे होकर, जो क्रांति की संभावना थी, उसको फिर मार डाला।
इसलिए मैं यह तो देख ही नहीं पाता कि राज्य की सत्ता के आधार पर कोई क्रांति कभी हो सकती है।
स्टैलिन को भी कम से कम एक करोड़ आदमी मार डालने पड़े रूस में। और ये जो एक करोड़ आदमी मारे, ये कोई करोड़पति नहीं थे। इतने करोड़पति कहां पाओगे? इतने करोड़पति होते, तो फिर जरूरत ही क्या थी? ये सब गरीब लोग थे। मगर इन गरीबों ने बड़ी बाधा दी क्रांति में। बड़ी मजबूरियां खड़ी कर दीं। असल में यही असली जड़बुद्धि लोग हैं। इन्होंने इतनी बाधाएं खड़ी कर दीं, कि इनको रास्ते से हटाना पड़ा। लेकिन वह तो अधिनायकशाही थी, तो स्टैलिन कर सका।
आज रूस में जो भी थोड़ा-बहुत धन-वैभव है, वह स्टैलिन की जबर्दस्ती की वजह से है। अगर लोकतंत्र होता, तो यह भी नहीं हो सकता था।
हालांकि मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि एक करोड़ लोग मारे जाएं। यह बड़ा मूल्य हो गया। और मैं इस पक्ष में भी नहीं हूं कि लोगों की सारी स्वतंत्रता नष्ट कर दी जाए; कि उन्हें बिलकुल काराग्रह में डाल दिया जाए।
माओ भी कर सका चीन में, काफी काम कर सका, लेकिन काम कर सका बंदूक के बल पर।
जिनके हित में काम करना है, उनकी ही छाती पर संगीन लगानी पड़ती है, तब वे काम करते हैं, नहीं तो वे ही काम नहीं करते।
माओ ने जो किया, और स्टैलिन ने जो किया...
इंदिरा को धीरे-धीरे यह बात समझ में आनी शुरू हो गई थी। अगर कुछ करना है, तो थोड़ी जबर्दस्ती करनी होगी। उसी जबर्दस्ती के कारण इंदिरा को हट जाना पड़ा, क्योंकि यह लोकतंत्र है। यहां हर पांच-सात साल में तुम्हें जनता से जाकर फिर प्रमाण-पत्र लेना होगा कि जनता तुमसे राजी है। अब पांच साल में दुनिया नहीं बदलती।
हर पांच साल में जनता से जाकर आज्ञा लेनी है। अगर तुमने जरा ही जनता के खिलाफ कुछ किया, पांच साल बाद तुम सत्ता से उतार दिए जाओगे। और जनता के खिलाफ करना ही होगा, नहीं तो क्रांति नहीं होने वाली है।
इसलिए मेरे देखे सत्ता के माध्यम से तो एक ही उपाय है: या तो अधिनायकशाही हो--जो कि बड़ा मूल्य ले लेती है; लोगों का प्राण छीन लेती है। रोटी दे देती है, रोजी दे देती है, छप्पर दे देती है, लोगों की आत्माएं मर जाती हैं। रूस, चीन में वही हुआ।
और या फिर लोकतंत्र आजादी तो कायम रखता है, स्वतंत्रता तो कायम रखता है, लेकिन क्रांति नहीं हो पाती। लोकतंत्र और क्रांति में मेल नहीं बैठ पाता है।
तो उपाय क्या है? उपाय एक ही है कि हम व्यक्ति को सीधा पहुंचें। हम व्यक्ति को पकड़ें। हम व्यक्ति में ही क्रांति लानी शुरू करें। धीरे-धीरे एक-एक व्यक्ति बदलता जाए, उसकी समझ, धारणा बदलती जाए, तो जो समूह पैदा होगा, वह समूह, क्रांति को स्वीकार कर सकेगा। मैं वही कर रहा हूं।
मेरा राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है। मैं बिलकुल अराजनैतिक व्यक्ति हूं। मुझे सत्ता से कोई प्रयोजन नहीं है। लेकिन बुनियाद रखी जा रही है क्रांति की। अगर इस देश में मेरे संन्यासियों की संख्या काफी हो, तो जो भी क्रांति आएगी, उसको कोई हिंसा नहीं करनी पड़ेगी। मेरा संन्यासी उसका स्वागत करेगा। वह फूल बरसाएगा--उसके स्वागत में। उसकी धारणाएं ही तब तक बदल चुकी होंगी; वह नई चेतना और नई ज्योति से भरा होगा। नई समझ और नये विचारों की तरंगें उसके मन में होंगी। वह समझ पाएगा कि कहां अड़चनें हैं। कहां से अड़चनें तोड़नी हैं और उनको तोड़ने में सहयोगी हो सकेगा।
इंदिरा ने कोशिश की, लेकिन लोग तैयार नहीं थे। लोगों को तैयार किया जाना था।
स्टैलिन ने कोशिश की, लोग बिलकुल तैयार नहीं थे, तो लोगों कि हत्या करनी पड़ी। फिर लोगों ने भी बदला लिया। फिर स्टैलिन के मरते ही लोगों ने बदला लिया। स्टैलिन का नाम पोंछ डाला रूस से।
माओ से भी बदला ले रहे हैं। माओ की पत्नी जेल में पड़ी है। हालांकि माओ की कब्र पर फूल चढ़ाते हैं। लेकिन वे भी ज्यादा दिन नहीं चढ़ेंगे। माओ ने जो किया था--एक साल में, माओ के मरने के बाद--जिनके हाथ में सत्ता आई, उन्होंने उसको पोंछ डाला।
जीवन का जाल काफी उलझा हुआ और जटिल है। जयप्रकाश नारायण जैसा सोचते हैं, उतना सरल नहीं है--कि आदमी बदल दिए; एक की जगह दूसरे को बैठा दिया; क्रांति हो गई! यह तो सुधार भी नहीं होता ऐसे। क्रांति तो दूर की बात है।
क्रांति करनी हो, तो लोगों की आत्माओं में बीज बोने पड़ेंगे। और एक-एक आदमी को सीधा रूपांतरित करना पड़ेगा। हां, एक बड़ी संख्या रूपांतरित लोगों की हो जाए, तो वे क्रांति के अगुआ हो जाएंगे। और जो भी क्रांति आएगी, उसका स्वागत कर सकेंगे। फिर ज्यादती नहीं करनी होगी। लोक-मानस खुद ही स्वागत करने को तैयार होगा।
मेरे देखे सारी क्रांति वैयक्तिक है। सारा विकास वैयक्तिक है। भीड़ का कोई विकास नहीं होता; व्यक्ति का विकास होता है। और व्यक्ति का ही हो सकता है, क्योंकि भीड़ के पास कोई आत्मा नहीं है। व्यक्ति के पास आत्मा है, चेतना है, बोध है।
क्रांति मात्र बोध की क्रांति होती है। इसलिए असली क्रांतियां, स्टैलिन, माओ, लेनिन, टीटो--इस तरह के लोगों ने नहीं कीं। असली क्रांतियां कीं बुद्ध ने, महावीर ने, क्राइस्ट ने--असली क्रांतियां कीं। लेकिन उनकी भी मजबूरी है।
लोग इतने अंधेरे में हैं, इतने घिसटते हुए हैं कि कुछ दीये जल जाते हैं, मगर फिर भी अंधेरा थोड़े ही मिट जाता है।
मगर अब संभावना बढ़ती जाती है। बुद्ध को गए पच्चीस सौ साल हो गए। पच्चीस सौ साल में काफी रूपांतरण मनुष्य का हुआ है। काफी जड़ताओं से छुटकारा हुआ है।
अगर जड़ताओं से छुटकारा न होता, तो तुम मुझे सुनते ही नहीं; मुझे सुनते ही सूली पर लटका देते। दो हजार साल पहले तुमने मुझे तत्क्षण सूली दे दी होती। और आज भी जो लोग दो हजार साल पुरानी बुद्धि को लिए बैठे हैं, उनकी तो यही आकांक्षा है कि मुझे सूली लग जानी चाहिए। वे अब भी नाराज हैं। उनकी धारणाएं समकालीन नहीं हैं।
कोई दो हजार साल पुरानी धारणाएं लिए बैठा है, कोई तीन हजार साल पुरानी धारणाएं लिए बैठा है!
समय बदला है। आदमी ज्यादा विकसित हुआ है। जो आज घट सकता है, पहले कभी नहीं घट सकता था। यहां तुम ईसाई को पाओगे, मुसलमान को पाओगे, हिंदू को पाओगे--जैन को, बौद्ध को। यहां दुनिया के सारे धर्मों के लोग इकट्ठे हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ था। जैन के मंदिर में जैन को पाओगे। हिंदू के मंदिर में हिंदू को पाओगे। मुसलमान की मस्जिद में मुसलमान को पाओगे।
यह मंदिर परमात्मा का है--न हिंदू का, न मुसलमान का, न ईसाई का, न जैन का। यहां तुम सबको पाओगे।
यहां करीब-करीब दुनिया के सारे देशों से संन्यासी हैं। एक रूस से कमी थी, तो अभी कुछ दिन पहले एक रूसी आकर संन्यास ले गया। अब दुनिया का कोई देश नहीं है, जहां संन्यासी नहीं हैं।
जाति की, देश की, धर्म की--सारी सीमाओं को तोड़ने की आज संभावना है। आज सारे संस्कार तोड़ देने की संभावना है। मनुष्य आज इतना राजी हो सकता है कि अपने सारे छोटे-मोटे घेरों से बाहर निकल आए; खुले आकाश में आ जाए।
इन्हीं लोगों की संख्या बढ़ती जाए, तो दुनिया में क्रांति होगी।
और क्रांति कोई जल्दबाजी की बात नहीं है--कि आज हो जाए। आदमी हजारों साल में धीरे-धीरे विकसित होता है।
इसलिए मेरी समझ व्यक्ति की दिशा में है। राज्य में मुझे रस नहीं है; समाज में मुझे रस नहीं है। लेकिन व्यक्ति में मेरा रस है। व्यक्ति में पूर्ण क्रांति घट सकती है।
और तुमने पूछा है कि पूर्ण क्रांति का क्या अर्थ है? पूर्ण क्रांति का मेरी दृष्टि में अर्थ है: व्यक्ति के पास किसी तरह की धारणाएं, और पक्षपात न रह जाएं। व्यक्ति की चेतना शुद्ध दर्पण की तरह हो। पूर्ण क्रांति यानी समाधि।
समाधिस्थ व्यक्ति जो भी करेगा, वह कल्याण है, मंगल है। ध्यानस्थ व्यक्ति जो भी करेगा, उससे शुभ ही होगा, अशुभ नहीं होगा। क्योंकि ध्यान की ऊर्जा तुम्हें बोधपूर्ण बनाती है। तुम्हारे कृत्य में तुम्हारा बोध समा जाता है। ध्यानहीन व्यक्ति जो भी करेगा, गलत करेगा। तो मैं तो एक ही क्रांति जानता हूं कि किस तरह तुम्हारे जीवन में ध्यान जुड़ जाए। ध्यान का धन तुम्हें मिल जाए, तो परम धन तुमने पा लिया। और तुम्हें ध्यान मिल जाए, तो संभावना बनती है कि तुम्हारे पास-पड़ोसियों की ज्योति को भी तुम जगा सको।
ज्योति से ज्योति जले। और एक-एक से ऐसी ज्योति फैलती जाए, तो मैं सारे संसार को आग से भर दे सकता हूं। इसलिए यह गैरिक वस्त्र चुने हैं। यह आग का रंग है, ये अग्नि के प्रतीक हैं। इनमें तुम्हें भस्म हो जाना है। इनमें तुम्हें अपने अतीत को बिलकुल राख कर देना है। इनमें सिर्फ शुद्ध चेतना बचे--न हिंदू बचे, न मुसलमान बचे, न ईसाई, न जैन। इनमें न हिंदुस्तानी, न पाकिस्तानी, न चीनी... सारी धारणाएं और सारी क्षुद्रताएं जल जाएं, राख हो जाएं। और अंततः इसमें तुम्हारा अहंकार भी जल जाए। उसी को मैं पूर्ण क्रांति कहता हूं।
अहंकार भी जल जाए, तो पूर्ण क्रांति घट गई।
पूर्ण क्रांति व्यक्ति में घटती है। और अगर एक व्यक्ति में घट जाए, तो उसके आस-पास भी अपने आप चिनगारी फैलने लगती है। एक में घटे, तो दस में घट जाएगी। दस में घटे, तो सौ में घट जाएगी। ऐसे घटते-घटते एक दिन इस सारी पृथ्वी पर क्रांति के फूल खिल सकते हैं।
लेकिन यह क्रांति ऊपर से नहीं थोपी जा सकती। यह क्रांति आध्यात्मिक ही हो सकती है।
पांचवां प्रश्न:
भगवान, आप कहते हैं कि कल का कोई भरोसा नहीं है। लेकिन यही तो--ईट, ड्रिंक एंड बी मेरि--खाओ, पीओ और मौज करो, को मानने वाले भी कहते हैं। आपमें और उनमें क्या फर्क है?
निश्चित ही, खाओ, पीओ और मौज करो वाले लोग भी यही कहते हैं कि कल का तो कुछ भरोसा नहीं, आज ही खा लो, पी लो, मौज कर लो। मैं भी यही कहता हूं, सारे बुद्धपुरुष भी यही कहते हैं। तर्क तो एक ही है। लेकिन लक्ष्य और गंतव्य अलग-अलग हैं।
खाओ, पीओ और मौज करने वाले दर्शनशास्त्र को मानने वाले लोग कहते हैं कि कल का भरोसा नहीं है, अभी खा लो, अभी पी लो, अभी मौज कर लो।
बुद्धपुरुष कहते हैं: कल का भरोसा नहीं है, अभी ध्यान कर लो, अभी समाधि कर लो, अभी प्रभु को पा लो। लक्ष्य अलग हैं, गंतव्य अलग हैं। कल का भरोसा नहीं है। कल पर मत टालो।
तो दोनों के तर्क तो एक ही हैं, लेकिन लक्ष्य बड़े भिन्न हैं।
शराबी कहता है: कल का क्या पता? अब कल जो होगा--होगा। तुम शराबी से कहो कि कल भूखे मरोगे; पैसे बचा लो। कल खा-पी लेना। वह कहता है: कल का क्या भरोसा। अब कल की कल देखेंगे। यह तो जीसस ने भी कहा है ना कि कल की मत सोचो, तो हम कल की क्यों सोचें? यह तो बुद्ध ने भी कहा है ना कि कल पर मत टालो। तो हम कल पर क्यों टालें? अब आज जो हाथ में मिला है, आज तो मजा-मौज कर लें; फिर कल की कल देखेंगे।
बात तो वह भी बड़े पते की कह रहा है। बात तो पते की ही है। लेकिन उससे जो नतीजा निकाल रहा है, वह बिलकुल गलत है।
बुद्ध भी कहते हैं कि पीओ--परमात्मा को पीओ; क्योंकि कल का पक्का नहीं है। यह तुम शराब ही पीने में आज गंवा दोगे...!
कल का पक्का नहीं है और आज चला जाएगा--शराब पीने में। फिर परमात्मा कब पीओगे? कल का पक्का नहीं है और आज खाने-पीने और कपड़े सजाने में ही बिताए दे रहे हो, तो फिर परमात्मा को कब निमंत्रित करोगे? आज चला जाएगा व्यर्थ में, और कल अनिश्चित है। जो निश्चित था, वह व्यर्थ में चला गया। और जो अनिश्चित है--वह तो अनिश्चित है।
और फिर कल भी तो तुम तुम ही रहोगे। अगर आज खाने-पीने में ही बिताया, तो कल भी पूरी संभावना यही है कि तुम खाने-पीने में ही बिताओगे। अगर कल मिला, तो तुम उसे भी खाने-पीने में बिताओगे, क्योंकि लोग अपनी आदतों के गुलाम हो जाते हैं।
तुमने अगर आज क्रोध किया है, तो कल भी क्रोध करने का तुमने बीज बो दिया। आज तुम अगर अहंकार से भरे हो, तो कल भी अहंकार से ही भरोगे, क्योंकि कल तुम्हारे भीतर से ही तो आएगा। आकाश से तो आने वाला नहीं है! तुम ही तो कल में बढ़ोगे। तुम्हारा जो भी कूड़ा-करकट है, उसी को लेकर बढ़ोगे।
आज अगर ध्यान में बिताया, तो कल ध्यान की संभावना और बढ़ेगी। अगर कल आया, तो फिर तुम परमात्मा को धन्यवाद दोगे, कि फिर एक दिन मिला कि प्रार्थना करूं, कि पूजा करूं, कि अर्चना करूं, कि नाचूं... धन्यवाद!
सूफी फकीर कहते हैं: हर रात सोते वक्त धन्यवाद दे दो, इस तरह जैसे आखिरी दिन आ गया, आखिरी रात आ गई, कयामत की रात आ गई। भगवान को धन्यवाद दे दो कि तेरा बड़ा धन्यवाद, एक दिन और तूने दिया था। वह भी हम जी लिए--तेरे आनंद में।
और इस तरह सो जाओ, जैसे मर रहे हो, क्योंकि कौन जाने रात मर ही जाओ, और सुबह उठ ही न पाओ! और बिना धन्यवाद दिए मर जाना तो बड़ा अशोभन होगा। परमात्मा पूछेगा: धन्यवाद भी न दिया मरते वक्त?
तो रोज रात इस तरह सो जाओ, जैसे मर रहे हो। और रोज सुबह जब आंख खुले, फिर धन्यवाद दो, जैसे पुनर्जीवन हुआ, क्योंकि तुम्हारी तरफ से तो तुम रात मर ही गए थे। फिर पुनर्जीवन हुआ। फिर प्रभु ने एक दिन दिया। फिर उसका उत्सव करेंगे। फिर उसका गीत गाएंगे। फिर राम-धुन बिठाएंगे, फिर सत्संग करेंगे, फिर ध्यान में डूबेंगे। एक दिन और दिया उसने। एक अवसर और दिया। रात फिर सो जाना धन्यवाद दे कर।
तो तर्क तो एक सा ही लगता है। लेकिन बड़े भेद हैं।
गुलशन की रविश पर मुस्कुराता हुआ चल
बदमस्त घटा है, लड़खड़ाता हुआ चल
कल खाक में मिल जाएगा यह जोरे-शबाब
‘जोश’ आज तो बांकपन दिखाता हुआ चल
एक तरफ लोग हैं, जो कहते हैं: कल तो खाक में मिल ही जाएंगे, तो आज तो अकड़ लें। अब कल तो मिट ही जाना है, तो आज तो अकड़ लें।
कल खाक में मिल जाएगा यह जोरे-शबाब
यह जवानी कल तो खाक में मिल जाएगी, तो आज तो अकड़ लें, आज तो सिर उठा कर चल लें। आज तो शान दिखा लें!
जोश, आज तो बांकपन दिखाता हुआ चल
संत भी यही कहते हैं कि कल खाक में मिल जाना है। तो क्या बांकपन दिखाना? जब खाक में ही मिल जाना है, जब खाक ही नियति है, तो आज भी अकड़ने में क्या सार है?
जब अंततः खाक ही हाथ लगनी है, तो यह व्यर्थ अकड़ने में क्यों समय गंवाते हो? आज ही समझ लो कि सब राख ही राख है।
ऐसी समझ में ही अहंकार गल जाता है। ऐसी समझ में ही तुम मिट जाते हो। और तुम्हारे मिटने में ही परमात्मा का प्रवेश है।
सागरे-बादा-ए निशात तो ला
कभी जोहराबे-गम भी पी लेंगे
वस्ल की शब है, जिक्र-ए-हिज्र न छेड़
यूं भी जीना पड़ा, तो जी लेंगे
भोगी कहता है: वस्ल की शब है, मिलन की रात है, सुहागरात है...
वस्ल की शब है, जिक्र-ए-हिज्र न छेड़
अभी मौत की बातें न उठाओ; अभी वियोग की चर्चा मत छेड़ो। अभी तो सब मजा-मौज चल रहा है। अभी तुमने कहां संन्यास का राग उठा दिया! यह संन्यास की बात मत छेड़ो अभी।
वस्ल की शब है, जिक्र-ए-हिज्र न छेड़
यूं भी जीना पड़ा, तो जी लेंगे
भोगी कहता है कि देखेंगे, जब होगा, तब होगा। अगर यूं भी जीना पड़ा, तो जी लेंगे। मगर अभी मत छेड़ो बात। अगर कल खाक में भी मिल जाना पड़ा, तो मिल जाएंगे। मगर अभी तो हैं, अभी यह बात मत छेड़ो।
ज्ञानी कहता है: जो अंततः होना है, वह हो ही गया है। उसकी बात छेड़ो या न छेड़ो, वह होने ही वाला है। और जो होने ही वाला है, बेहतर है, उसकी बात छेड़ लो, तो शायद कुछ बदलाहट हो जाए। अभी से थोड़ा समय हाथ में है।
आज पिला दो जी भर कर मधु
कल का करो न ध्यान सुनयने!
कल का करो न ध्यान!!
संभव है कल तक मिट जाए
मधु के प्रति आकर्षण मन का,
मधु पीने के लिए न हो कल
संभव है संकेत गगन का,
पीने और पिलाने को हम ही न रहें कल
संभव है यह भी,
पल-पल पर झकझोर रहा है
काल प्रबल दामन जीवन का,
कौन जानता है कब किस पल
तार तार क्षण में हो जाए,
जीवन का सांसों के कच्चे
धागों का परिधान सुनयने!
कल का करो न ध्यान!!
क्या मालूम घिरी न घिरी कल
यह मन भावन घटा गगन में,
क्या मालूम चली न चली कल यह
मृदुमंद पवन मधुवन में,
स्वर्ग-नरक को भूल आज जो
गीत गा रही लालपरी के,
क्या मालूम रही न रही कल
मस्ती वह दीवानी मन में
अनमांगे वरदान सदृश जो
छलक उठा मधु जीवन घट में,
क्या मालूम वहीं कल विषबन,
बने स्वप्न अवसान सुनयने!
कल का करो न ध्यान सुनयने!
भोगी कहता है: कल की बात ही मत उठाओ; प्रिय, कल की बात ही मत उठाओ। कल का क्या पक्का? आज भोग लें। आज जो मिला है, इसमें डूब लें, तरबोर हो लें।
मगर जिसमें तरबोर हो रहे हो, वह राख ही राख है। राख में लोट रहे हो।
तुमने देखा न, हिंदू संन्यासी राख लपेट कर बैठ जाता है। इसकी कोई जरूरत नहीं है। सभी राख में लपटे हुए हैं। राख ही राख है। अब और राख लपेट कर क्या बैठ रहे हो?
इस जगत में राख के सिवाय कुछ है नहीं। तुम भला सोचो--कि राख नहीं है, स्वर्ण-धूलि है, और लिपट कर सोने के हुए जा रहे हो। मगर जब आंख खुलेगी, तो पाओगे: सब राख ही राख है।
जितनी जल्दी आंख खुल जाए, उतना अच्छा, क्योंकि खुल जाए आंख तो कुछ किया जा सके। नहीं तो राख में ही लोटते-लोटते बिता दोगे।
वही खाना, वही पीना; वही दफ्तर, वही जीना; वही रोना, वही हंसना--इतना तो कर चुके। आज तक कुछ हाथ न लगा। हाथ खाली के खाली हैं। अब कुछ ऐसा करो कि हाथ भर जाएं, प्राण भर जाएं। कुछ ऐसा करो कि फूल खिलें। कुछ ऐसा करो कि फल लगें। कुछ ऐसा करो कि जाने के पहले तुम परमात्मा को धन्यवाद दे सको। कुछ ऐसा करो कि उत्सव मना सको जाने के पहले। मृत्यु आए, उसके पहले महोत्सव आ जाए।
नहीं तो जीवन व्यर्थ गया, फिर आना पड़ेगा। फिर फेंके जाओगे। फिर यहीं, फिर इसी गंदगी में, फिर इसी राख के ढेर में।
मैं भी कहता हूं कि कल की फिकर न करो, क्योंकि कल का कुछ पक्का नहीं है। लेकिन मैं यह नहीं कहता कि खा लो, पी लो, मौज कर लो। उतने पर आदमी समाप्त नहीं होता।
खाना, पीना, मौज कर लेना ज्यादा से ज्यादा देह को थोड़ी देर भरमा लेते हैं।
और खाने, पीने, मौज से भी मौज वस्तुतः कहां होती है! नाम मात्र को, कहने मात्र को, बहाना मात्र है। समझा लेते हो कि मौज कर रहे हो। असली मौज करो।
मैं भी कहता हूं मौज करो, लेकिन असली मौज करो। असली मौज तो परमात्मा से जुड़ कर ही होती है। उस प्यारे का हाथ हाथ में आ जाए, तो ही असली मौज होती है।
और असली तृप्ति भी परमात्मा को ही पी जाने से होती है। शराब ही पीनी है, तो उसकी पीओ। अंगूर की क्या पीनी--आत्मा की पीओ।
शराब ही पीनी है, तो ऐसी पीओ कि फिर उतरे ही न नशा। जो उतर-उतर जाए, उसमें कुछ बहुत सार नहीं है। कुछ ऐसा पीओ कि चढ़े, तो चढ़ा ही रहे।
वही है असली संपदा, जो मिल जाए, तो सदा के लिए तुम्हारी हो जाए। जब ऐसी शराब मौजूद है, तो फिर तुम क्षुद्र की शराब क्यों पीते हो, जब विराट की शराब मौजूद है!
इसलिए तो सूफी फकीरों ने तो परमात्मा का नाम ही शराब रख लिया है।
सूफियों की तुम कविताएं पढ़ो, तो भूल मत करना। उमर खय्याम को पढ़ो, तो भूल मत करना। उमर खय्याम जहां-जहां शराब की बात करता है, वह समाधि की बात कर रहा है। उमर खय्याम सूफी फकीर है। पहुंचा हुआ संत है; सिद्ध है।
जहां वह मधुशाला की बात कर रहा है, वह परमात्मा के मंदिर की बात कर रहा है। और जहां वह मधुबाला की बात कर रहा है, वह परमात्मा की बात कर रहा है। परमात्मा ढाल रहा है मधुबाला की तरह सुराही पर सुराही, और यह सारा जगत उसकी मधुशाला है।
यहां सब तरफ से शराब उंड़ेली जा रही है--फूलों से, पंक्षियों से, चांद-तारों से--सब तरफ से उसकी सुगंध, सब तरफ से उसकी सुवास, और सब तरफ से उसका रस झर रहा है। इस रस को पीओ। इस रस को पीओगे, तो सच ही तृप्त हो जाओगे।
जीसस एक कुएं पर गए--थके-मांदे। यात्रा से आ रहे हैं। धूल-धंवास से भरे हैं। और कुएं पर पानी भरती एक स्त्री से उन्होंने कहा कि ‘मुझे पानी पिला दो।’
उस स्त्री ने देखा। उसने कहा: क्षमा करें, शायद आप अजनबी हैं, और आपको पता नहीं कि मैं शूद्र हूं; मैं बहुत क्षुद्र जाति की हूं, मेरा छुआ जल कोई पीता नहीं। फिर आपकी मर्जी। जीसस हंसे और उन्होंने कहा: तू उसकी फिकर न कर। तू मुझे पिला, तो मैं भी तुझे कुछ पिलाऊं। तेरा जल तो थोड़ी देर मेरी तृप्ति रखेगा; मेरा जल तुझे सदा के लिए तृप्त कर देगा। और तुझसे जल मांगा है, इसीलिए कि इसके बहाने पहचान हो जाए, तो मैं भी कुछ लिए फिर रहा हूं अपने भीतर, वह मैं तुझ में उंड़ेल दूं।
वह स्त्री अनूठी रही होगी। अनूठी थी, शायद इसीलिए जीसस रुक भी गए थे उस कुएं पर। और भी कुएं रास्ते में पड़े थे, और भी लोग पानी भरते मिले थे।
उसने जीसस की आंख में झांका। इस तरह की बात तो किसी आदमी ने कभी कही नहीं थी--कि मैं तुझे ऐसा जल पिला सकता हूं कि तेरी प्यास सदा के लिए मिट जाए!
तो उसने जीसस को आंख में झांका, वे परम शांत आंखें; वे निर्दोष आंखें। और उसे बात जंच गई। वह भोली-भाली स्त्री; बोली: तुम रुको, मैं गांव के लोगों को भी बुला लाऊं। वे भी तुम्हारी आंखों में झांक लें। ऐसी आंख हमने कभी देखी नहीं!
गांव के लोगों से जाकर उसने कहा कि एक अपूर्व आदमी आया है। क्योंकि ऐसी बात तो कभी किसी ने कही ही न थी। वह कहता है: मैं तुझे ऐसा जल पिला सकता हूं कि तेरी प्यास सदा के लिए बुझ जाए। और मुझे पक्का भरोसा आया है कि उसके पास जल है, क्योंकि वह जल उसकी आंखों में मैंने देखा है। वह भरा है लबालब!
बुद्ध या क्राइस्ट या कृष्ण या कबीर या नानक उसी मधु को लेकर आते हैं। ये सुराहियां हैं परमात्मा की।
अगर परमात्मा मधुबाला है और अगर यह जगत उसकी मधुशाला है और अगर समाधि मधु है, तो संत मधु-कलश हैं, जिनमें भर-भर के परमात्मा उंड़ेलता है।
मैं भी कहता हूं: पीओ; और मैं भी कहता हूं: खाओ; और मैं भी कहता हूं: मौज करो। लेकिन असली मौज की बातें कर रहा हूं और मैं उस रस को पीने की बात कर रहा हूं, जिसको पीने से फिर कभी प्यास नहीं लगती। वह भोजन करो, जिसे कर लेने से आत्मा तृप्त होती है--देह ही नहीं।
जीसस जब मरने लगे, आखिरी दिन आ गया विदा का, तो तुम्हें पता है उन्होंने अपने शिष्यों से क्या कहा? उन्होंने कहा कि ‘पी लो मुझे और खा लो मुझे।’ बड़े अजीब से शब्द हैं: ‘पी लो मुझे और खा लो मुझे। पचा लो मुझे। बना लो मुझे अपनी रक्त की धार।’
और अब भी जीसस को मानने वाले वर्ष में एक उत्सव मनाते हैं। जब वे भोज देते हैं, रोटी तोड़ते हैं, और रोटी को जीसस मान कर उसका भोजन करते हैं।
मगर रोटी तो रोटी है। इस तरह धोखा न दे सकोगे। कोई जीसस खोजना पड़ेगा। कोई सदगुरु खोजना पड़ेगा।
जीसस के मानने वाले उत्सव मनाते हैं। साधारण सी शराब ढालते हैं--उस याद में, उस असली शराब की याद में, जो जीसस ने ढाली थी कभी। उसको पी लेते हैं।
लंदन में पिछले वर्ष, मेरे संन्यासियों ने मेरा जन्म-दिन मनाया, तो उन्होंने अपने चित्र भेजे। चित्र देख कर मैं हैरान हुआ। वह तो काफी भोजन तैयार किए बैठे हैं। और शराब की बोतल भी रखे हुए हैं। तो मैंने पूछवाया कि मामला क्या है? तो वे सब ईसाई हैं।
उन्होंने कहा कि हम जैसे जीसस का जन्म-दिन मनाते हैं, तो शराब पीते हैं, क्योंकि जीसस ने कहा है कि पीओ मुझे। ऐसा ही हमने आपको पीया!
मैंने कहा: पागलो, मैं अभी जिंदा हूं। अभी तुम मुझको ही पीओ। जब मैं न रहूं, तब ठीक है, फिर किसी और शराब से काम चला लेना। जब असली शराब मिलती हो, तो नकली से क्यों संबंध जोड़ते हो?
मैं भी कहता हूं: खाओ, पीओ और मौज करो। ईट, ड्रिंक एंड बी मेरि। मैं भी कहता हूं। लेकिन मेरा अर्थ समझ लेना। और मैं भी कहता हूं कि कल का भरोसा नहीं, इसलिए जो भी करना हो, वह आज कर लो। कल न कभी आया है, न आएगा। कल कभी आता ही नहीं। कल पर तो टालना ही मत। जिसने कल पर टाला, उसने सदा के लिए टाला, उसे कभी भी मिलन नहीं होगा। वह चूकता ही चला जाएगा। क्योंकि आज तुम कल पर टालोगे और कल तो आता नहीं। कल जब आएगा, तो आज की तरह आएगा। फिर जब आज की तरह आएगा, तो तुम्हारी कल पर टालने की आदत फिर कहेगी: कल कर लेंगे। ऐसे बहुत लोग हैं यहां। आज ही किसी ने प्रश्न पूछा है:
भगवान, मैं संन्यास लेना चाहता हूं, लेकिन क्या घर के लोगों की बिना आज्ञा लिए संन्यास लिया जा सकता है?
संन्यास आज्ञा किसकी लेकर ले सकोगे? जिनकी आज्ञा लेने जाओगे, वे संन्यासी हैं? अगर तुम्हारे संन्यास को वे इतनी प्रफुल्लता से आज्ञा दे सकते होते, तो खुद ही संन्यासी हो गए होते। अब तक प्रतीक्षा करते? तुम आज्ञा उनसे कैसे मांगोगे? और उनकी आज्ञा कैसे मिलेगी?
और संन्यास की भी आज्ञा घर वालों से मांग कर लोगे। तो कुछ कभी ऐसा करोगे, जो तुमने किया! या सदा दूसरों की ही आज्ञा मान कर चलते रहोगे?
कुछ तो जीवन में हो, जो तुम्हारा हो। कुछ तो हो, जो निपट तुम्हारा हो।
संन्यास को तो किसी की आज्ञा मत बनाओ। इसे तो तुम्हारे ही हृदय का भाव रहने दो। आ गई हो मौज, तो उतर जाना। और घबड़ाना मत। घर के लोग राजी हो जाते हैं। मर भी जाओगे तो भी राजी हो जाते हैं। तो संन्यास में तो क्या रखा है? अगर मर भी जाओगे तो क्या तुम समझते हो, घर के लोग सदा रोते रहेंगे तुम्हारे लिए?
फिर मेरा संन्यास तो तुम्हें घर से छीनता भी नहीं। मेरा संन्यास तो, तुम पति हो तो तुम्हें और अच्छा पति बना देगा। पत्नी हो, तो और अच्छी पत्नी बना देगा। मां हो, तो और अच्छी मां। क्योंकि मैं संसार के विरोध में नहीं हूं।
मेरा परमात्मा बड़ा है; इतना बड़ा है कि संसार को अपने में समा लेता है। मैं छोटे-छोटे परमात्माओं की बात नहीं कर रहा हूं, जो बड़े क्षुद्र हैं; जो संसार को अपने में नहीं समा पाते।
मेरा परमात्मा सबमें समाया हुआ है; सारे संसार में रमा हुआ है। इसलिए कहीं न भागना है, न किसी के विपरीत जाना है। न पत्नी को छोड़ देना है।
क्योंकि उनको मैं कायर कहता हूं, जो छोड़ कर भाग जाते हैं। जो जिम्मेवारियां छोड़ देते हैं, वे नपुंसक हैं। जो अपने छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चों को छोड़ कर जंगल भाग जाते हैं, ये संन्यासी हैं? जब परमात्मा इन्हें पकड़ेगा, तो इनको दंड मिलेगा।
संन्यास का अर्थ इतना ही है: जहां हो, वहीं परमात्मा की याद से भर कर रहो। संन्यास का इतना ही अर्थ है: जहां हो, वहीं परमात्मा को समर्पित होकर रहो। जल में कमलवत।
और आज्ञा की प्रतीक्षा मत करना। कुछ तो अपने से करो?
मस्जिद में मुल्ला नसरुद्दीन बैठा था। पुरोहित ने लंबा व्याख्यान दिया, और व्याख्यान के अंत में पूछा कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, हाथ ऊपर उठा दें। सब ने हाथ ऊपर उठा दिए। एक मुल्ला ही बैठा रहा। सामने ही बैठा था।
पुरोहित को बड़ी हैरानी हुई। उसने पूछा कि नसरुद्दीन, सारे लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, एक तुमको छोड़ कर! तुम नहीं जाना चाहते? उसने कहा: जाना तो मैं भी चाहता हूं। लेकिन जब घर से चलने लगा, तो पत्नी ने कहा, मस्जिद से सीधे घर आना।
तुम यहां आ गए; संन्यास का भाव उठा; अब तुम पूछते हो: घर के लोगों की आज्ञा? तुम स्वर्ग भी पत्नी से ही पूछ कर जाओगे? मरते वक्त किस-किस से पूछोगे? आज्ञा लोगे? आज्ञा लेने का अवसर मिलेगा?
थोड़ी तो हिम्मत और साहस होना चाहिए! इतने तो अपने को अपमानित मत करो।
और अगर पत्नी तुम्हारी तुम्हें प्रेम करती है, तो तुम्हारे संन्यास को भी प्रेम करेगी, क्योंकि तुम्हारी स्वतंत्रता और तुम्हारी आत्मा का समादर करेगी। और अगर तुम्हारा पति तुम्हें प्रेम करता है, तो तुम्हारे संन्यास का भी आदर करेगा। क्योंकि प्रेम स्वतंत्रता के विपरीत नहीं होता। और जो प्रेम स्वतंत्रता के विपरीत है, वह प्रेम ही नहीं है। वह कुछ और है, धोखाधड़ी है।
जो पत्नी कहती है: मेरी आज्ञा मान कर चलो, वह पत्नी नहीं है। वह तुम्हें गुलाम बनाने में लगी है। वह एक गुलाम चाहती है, पति नहीं चाहती है। एक मित्र नहीं चाहती है, एक गुलाम चाहती है। और जो पति कहता है: जैसा मैं कहूं, वैसे उठो, वैसे बैठो, वैसे चलो। वह तुम्हारी आत्मा का खंडन कर रहा है। वह तुम्हें प्रेम कैसे कर सकता है?
प्रेम सदा मुक्त करता है। जो मुक्त करे, वही प्रेम।
तो घबड़ाओ मत। किससे पूछना है? अपने हृदय से पूछ लो। अगर हृदय कहता हो, तो डुबकी लगा लो।
और कल पर मत टालो, क्योंकि आज्ञा का मतलब है, अब जाएंगे घर; पूछेंगे; विचार करेंगे; पत्नी रोएगी, बच्चे नाराज होंगे, पिता कुछ कहेंगे, भाई कुछ कहेंगे। सारा गांव-पड़ोस समझाएगा कि ‘पागल हुए जा रहे हो।’ और कल का कोई भरोसा नहीं है। कल आए न आए।
क्षण-क्षण जीना चाहिए। और क्षण-क्षण हृदय की स्फुरणा से जीना चाहिए। यही सहज-योग है। यही सब संतों की वाणी का सार है।
आज इतना ही।