MEDITATION

Main Mrityu Sikhata Hun 11

Eleventh Discourse from the series of 15 discourses - Main Mrityu Sikhata Hun by Osho.
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भगवान, द्वारका शिविर में आपने कहा है कि सब साधनाएं झूठी हैं, क्योंकि परमात्मा से हम कभी बिछुड़े ही नहीं हैं। तो क्या मूर्च्छा झूठी है? शरीर व मन का विकास झूठा है? संस्कारों की निर्जरा झूठी है? स्थूल से सूक्ष्म की ओर की साधना झूठी है? प्रथम शरीर से सातवें शरीर की यात्रा का आयोजन झूठा है? क्या कुंडलिनी साधना की लंबी प्रक्रिया झूठ है? इन बातों को समझाने की कृपा करें।
पहली बात तो यह, जिसे मैं असत्य कहता हूं, झूठ कहता हूं, उसका मतलब यह नहीं होता कि वह नहीं है। असत्य भी होता तो है ही। अगर न हो तो असत्य भी नहीं हो सकता। झूठ का भी अपना अस्तित्व है, स्वप्न का भी अपना अस्तित्व है। जब हम कहते हैं, स्वप्न झूठ है, तो उसका यह मतलब नहीं होता कि स्वप्न का अस्तित्व नहीं है। उसका केवल इतना ही मतलब होता है कि स्वप्न का अस्तित्व मानसिक है, वास्तविक नहीं है। मन की तरंग है, तथ्य नहीं है। जब हम कहते हैं, जगत माया है, तो उसका मतलब यह नहीं होता कि जगत नहीं है। क्योंकि अगर नहीं है, तो किससे कह रहे हैं? कौन कह रहा है? किसलिए कह रहा है? जब कोई जगत को माया कहता है, तब इतना तो मान ही लेता है कि कहने वाला है, सुनने वाला है। इतना भी मान लेता है कि किसी को समझाना है, किसी को समझना है। इतना तो सत्य हो ही जाता है। नहीं, लेकिन जब हम जगत को माया कहते हैं तो यह मतलब नहीं होता कि जगत नहीं है। केवल इतना ही अर्थ होता है जगत को माया कहने का कि जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा नहीं है; एपीयरेंस है। जैसा है, वैसा दिखाई नहीं पड़ता; और जैसा नहीं है, वैसा दिखाई पड़ता है।
जैसे एक आदमी रास्ते से गुजर रहा है। सांझ है, अंधेरा हो गया है। और एक रस्सी पड़ी हुई दिखाई पड़ गई है और वह सांप समझकर डरकर भाग खड़ा हुआ है। कोई उससे कहता है कि सांप असत्य था, झूठ था। तुम व्यर्थ ही भागे। तब इसका क्या मतलब हुआ?
सांप झूठ था, इसका यह मतलब तो नहीं हुआ कि उसे सांप नहीं दिखाई पड़ा। अगर उसे नहीं दिखाई पड़ता तो वह भागता नहीं। उसे तो दिखाई पड़ा। जहां तक दिखाई पड़ने का संबंध है, उसे सांप था। और जब उसे दिखाई पड़ा तो रस्सी अगर न होती तो खाली जगह में दिखाई भी न पड़ता। रस्सी ने सांप के भ्रम को सहारा भी दिया। उसे भीतर कुछ दिखाई पड़ा, बाहर कुछ और था। रस्सी का टुकड़ा पड़ा था और उसे लगा कि सांप है। रस्सी रस्सी की तरह न दिखाई पड़ी जो वह थी, रस्सी सांप की तरह दिखाई पड़ी जो वह नहीं थी। जो था, वह नहीं दिखाई पड़ा; और जो नहीं था, वह दिखाई पड़ा। लेकिन जो था उसके ऊपर ही जो नहीं था वह आरोपित हुआ है।
तो जब असत्य, झूठ, भ्रम, माया, इल्यूजन, एपीयरेंस, इन शब्दों का प्रयोग होता है तो एक बात खयाल रख लेना, इसका यह मतलब नहीं कि नहीं हैं। अब समझ लो कि जो आदमी भाग खड़ा हुआ है सांप देखकर, हम उसे बहुत समझाते हैं कि वहां सांप नहीं है, लेकिन वह कहता है कि मैं कैसे मानूं! मैंने सांप देखा है। हम उससे कहते हैं, तू वापस जाकर देख। वह कहता है, एक लकड़ी मेरे हाथ में दे दो, तो मैं जा भी सकता हूं। अब मुझे पता है कि सांप वहां नहीं है, लकड़ी ले जाना बेकार है। लेकिन उसे पता है कि सांप वहां है और लकड़ी ले जाना सार्थक है। मैं उसे एक लकड़ी देता हूं। तुम मुझसे कहोगे कि जब सांप नहीं है तो आप लकड़ी क्यों दे रहे हैं? तब तो आप भी मान रहे हैं कि सांप है। फिर भी मैं तुमसे कहता हूं कि सांप नहीं है, सांप झूठा है। लेकिन तुम्हें दिखाई पड़ा है और तुम्हारे जाने की हिम्मत नहीं है। तुम्हारे लिए तो सच ही है। मैं तुम्हें एक लकड़ी देता हूं कि यह ले जाओ। अगर सांप हो तो मार डालना, अगर न हो तब तो कोई सवाल ही नहीं है।
मनुष्य को जो दिखाई पड़ रहा है जीवन में, वह जीवन का सत्य नहीं है। वह पूरी तरह जागकर देखा जाए तभी सत्य दिखाई पड़ेगा। जिस मात्रा में हम मूर्च्छित हैं, उसी मात्रा में सत्य के भीतर झूठ का मिश्रण है। जिस मात्रा में हम सोए हुए हैं, उसी मात्रा में जो हम देख रहे हैं वह विकृत है, परवर्टेड है। वह वही नहीं है, जो है--एक।
लेकिन जो सोया हुआ है, उससे हम कहते हैं कि नहीं, सब असत्य है, सब माया है। लेकिन वह कहता है, कैसे मानूं कि माया है! मेरा लड़का बीमार पड़ा है। मैं कैसे मानूं कि माया है! मैं भूखा हूं। मैं कैसे मानूं कि माया है! क्योंकि मकान चाहिए। मैं कैसे मानूं कि ये सब बातें माया हैं! क्योंकि शरीर है। पत्थर मारता हूं शरीर पर, तो खून निकल पड़ता है और दर्द भी होता है।
तब इसके लिए क्या किया जाए? इसे जगाने के लिए कोई उपाय खोजना पड़े। और जो उपाय होंगे वे लकड़ी की भांति होंगे। और जिस दिन यह जाग जाएगा उस दिन उन उपायों के साथ वही व्यवहार करेगा जो कि हमने जिस आदमी को लकड़ी दे दी है वह जब सांप के पास जाएगा, पाएगा रस्सी है, तो हंसेगा और लकड़ी फेंक देगा। और कहेगा, सांप तो झूठ था ही था, लकड़ी को ढोना भी नाहक व्यर्थ हुआ। और शायद वह मुझ पर लौटकर नाराज भी होगा कि आपने इतनी देर लकड़ी मुझे रखने के लिए दी, नाहक ढोना पड़ा वहां तक, वहां सांप नहीं था।
जिसे मैं ध्यान कह रहा हूं या जिसको कुंडलिनी कह रहा हूं या जिसे साधना की प्रक्रिया कह रहा हूं, वह असल में उसकी तलाश है, जो नहीं है। और जिस दिन तुम उसे देख लोगे ठीक से जाकर कि नहीं है, उस दिन सब प्रक्रिया बेकार हो जाएगी, सब बेमानी हो जाएगी। उस दिन तुम कहोगे कि बीमारी भी झूठ थी, इलाज भी झूठ था।
असल में झूठ बीमारी का सही इलाज नहीं हो सकता। या कि हो सकता है? अगर बीमारी झूठ है तो सही इलाज कभी भी नहीं हो सकता। झूठ बीमारी के लिए झूठ इलाज चाहिए। लेकिन झूठ बीमारी झूठ इलाज से ठीक हो सकती है। दो झूठ भी एक-दूसरे को काट देते हैं।
इसलिए जब मैं कहता हूं कि समस्त साधना की प्रक्रियाएं इस अर्थ में असत्य हैं--असत्य इस अर्थ में हैं कि जिसे हम खोज रहे हैं, उसे हमने कभी खोया नहीं। रस्सी पूरे वक्त रस्सी है। वह एक क्षण को भी सांप नहीं बनी है। रस्सी हमने खो दी है लेकिन। सामने रस्सी पड़ी है, लेकिन हमने खो दी है। वह एक क्षण को सांप नहीं बनी है, लेकिन हमारे लिए सांप है। ऐसा सांप जो एक क्षण को भी नहीं है। अब एक बड़ी जिच, एक बड़ी उलझाव की स्थिति है। है रस्सी, दिखता सांप है। सांप को मारना है, रस्सी को खोजना है। बिना सांप को मारे रस्सी को खोजना मुश्किल है, बिना रस्सी को खोजे सांप का मरना मुश्किल है।
अब कुछ करना पड़े। और जो कुछ भी हम करेंगे, वह होगा क्या उससे? इतना ही होगा न कि जो नहीं था, दिखाई पड़ जाएगा नहीं है। जो है, दिखाई पड़ जाएगा जो है। और जिस दिन हम जानेंगे उस दिन क्या हम कहेंगे कि हमने कुछ उपलब्ध किया? क्या हम उस दिन कह सकेंगे कि सांप हमने खोया और रस्सी हमने पाई? क्योंकि सांप तो था ही नहीं जिसे खोया जाए; और रस्सी सदा थी, पाने की कोई जरूरत ही न थी। वह थी ही वहां, वह मौजूद ही थी।
इसलिए बुद्ध को जब ज्ञान हुआ और पहली ही सुबह लोग उनके पास आए और उनसे पूछने लगे कि आपको क्या मिला? तो बुद्ध ने कहा, यह मत पूछो, मिला मुझे कुछ भी नहीं। तो उन लोगों ने कहा, इतने दिन की मेहनत बेकार गई? आप वर्षों से तपश्चर्या करते हैं, खोज करते हैं! बुद्ध ने कहा, अगर मिलने की भाषा में पूछते हो तो बेकार गई, क्योंकि मिला कुछ भी नहीं। लेकिन फिर भी मैं तुमसे कहता हूं कि तुम भी गुजरो उसी रास्ते से, तुम भी करो वही। पर उन लोगों ने कहा कि आप पागल तो नहीं हैं! क्योंकि जो बेकार ही गया, उसको हम क्यों करें? बुद्ध ने कहा, मिला तो कुछ नहीं, लेकिन खोया जरूर। वह जो नहीं था उसे खोया। जो था ही नहीं और जिसे मैं समझता था है, उसे खोया। और जो सदा से मिला ही हुआ था, पाया ही हुआ था, जिसे पाना ही नहीं था, लेकिन जिसे झूठ के पर्दे के बीच मैंने समझा था कि नहीं है, उसे पाया।
अब इसका क्या मतलब हुआ? जो मिला ही हुआ था, वह फिर मिला। कैसे कहें इसको! जो पाया ही हुआ था, उसको पाया! जिसे कभी पाया ही नहीं था, उसको खोया!
तो जब मैं कह रहा हूं कि सारी साधना की प्रक्रिया असत्य है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि मत करना। मैं सिर्फ इतना ही कह रहा हूं कि तुम इतने गहरे असत्य में घिरे हो कि सिवाय तुम्हें उसके विपरीत असत्य के और कोई काटने का उपाय नहीं है। तुम इतने झूठ की तरफ चले गए हो कि तुम लौटोगे भी तो इतना तो रास्ता तुम्हें झूठ का ही पार करना पड़ेगा, जितना तुम झूठ में चले गए हो।
समझो कि मैं इस कमरे में दस कदम अंदर चला गया। अब मुझे कमरे के बाहर जाना है। तो मुझे कम से कम दस कदम तो कमरे में वापस चलना ही पड़ेगा। दस कदम इसी कमरे में मुझे चलने पड़ेंगे। और हो सकता है कि जब मुझे कोई समझाए कि आप कमरे में चले गए हैं, अब आप बाहर लौट आइए, और मुझसे कहे कि दस कदम चलिए, तो मैं कहूं कि यह तो आप बड़ी गड़बड़ बातें कर रहे हैं। दस कदम कमरे में चलने से ही तो मैं अंदर चला गया हूं। और अगर अब और कमरे में चला, तो और बीस कदम भीतर चला जाऊंगा। अब तो मुझे कोई ऐसी तरकीब बताइए कि मैं बाहर निकल आऊं और कमरे में न चलना पड़े। लेकिन कमरे में दस कदम चलना ही पड़ेगा। हां, रुख अलग होगा, दिशा अलग होगी, चेहरा बदल गया होगा। जहां पहले मुंह था, अब वहां पीठ होगी। और जहां पहले पीठ थी, अब वहां मुंह होगा।
झूठ में हम जी रहे हैं। साधना में सिर्फ चेहरा बदलेगा। जीना तो झूठ में ही पड़ेगा, जहां पीठ थी वहां मुंह हो जाएगा, जहां मुंह था वहां पीठ हो जाएगी। लेकिन जितने हम झूठ में उतर गए हैं, उतना हमें वापस लौटना पड़ेगा। जिस दिन हम वापस लौट आएंगे, उस दिन हम पाएंगे कि बड़े मजे की बात हो गई है।
यह ऐसा ही है कि जैसे किसी आदमी को गलत दवा दे दी गई हो, तो एंटीडोट देना पड़े। अब एंटीडोट देने की कोई जरूरत न थी, लेकिन गलत दवा दे दी गई है। अगर गलत दवा न दी गई होती, तो उसे यह एंटीडोट भी न देना पड़ता। अब गलत दवा, उसका जहर उसके शरीर में चला गया है। उससे उलटा जहर उसके भीतर फेंकना पड़ेगा। फिर भी ध्यान रहे कि यह भी जहर है। क्योंकि सिर्फ जहर ही काट सकता है जहर को। अगर वह पहला जहर था तो यह भी जहर है। सिर्फ इसका रुख और पीठ अलग है। यह उलटा है उससे, लेकिन है तो जहर ही। तो अगर डाक्टर आपसे यह कहे कि तुम्हें जहर हो गया है शरीर में, अब हम तुम्हें और जहर देते हैं, तो तुम घबड़ा ही जाओगे। कहोगे कि हम वैसे ही मरे जा रहे हैं जहर से, अब आप और जहर देते हैं! तो वह कहता है कि यह एंटीडोट है। है तो जहर ही, लेकिन यह उससे उलटा जहर है।
तो मैं जब कह रहा हूं कि संसार झूठ है, तो साधना सत्य नहीं हो सकती। क्योंकि झूठे संसार को काटने के लिए सच्ची साधना से कैसे काटोगे? झूठे प्रेत को मारने के लिए सच्ची तलवार चलाओगे, तो खुद ही को चोट लग जाएगी। झूठे प्रेत को काटना हो, तो झूठी तलवार ही हाथ में रखना। स्वभावतः झूठे प्रेत को काटने के लिए अगर असली बंदूक लेकर चले गए, तो झंझट हो जाएगी। असली बंदूक नुकसान पहुंचा सकती है। क्योंकि प्रेत वहां है नहीं। इसलिए अगर झूठे प्रेत को भगाना हो, तो ताबीज बांध लेना। वह अच्छा रहेगा। क्योंकि ताबीज जो है, न बंदूक है, न तलवार है। वह झूठा इलाज है। वह एंटीडोट है। वह भी झूठ का पक्का उससे उलटा झूठ है।
समस्त साधना चूंकि संसार के बाहर निकलने की है, इसलिए संसार को चूंकि मैं भ्रम कहता हूं--भ्रम इस अर्थों में कि जैसा हम समझ रहे हैं वैसा नहीं है--तो उसे काटने के लिए हम क्या करें? जितने गहरे भ्रम में चले गए हैं उतने वापस लौटें। और यह मैं क्यों याद दिलाना चाहता हूं? यह इसलिए याद दिलाना चाहता हूं कि एक बड़ा खतरा है। साधक के सामने सदा एक खतरा है। वह खतरा यह है कि भूत से बचाने के लिए हम ताबीज बांध दें, फिर भूत से तो बच जाता है, लेकिन ताबीज को संभालकर रखता है। क्योंकि जिस भूत से बचाया ताबीज ने, वह इस ताबीज को हमेशा छाती के पास रखता है। और जितना पहले भूत के होने से डरता था, अब ताबीज के खोनेसे डरता है। स्वभावतः, क्योंकि जिस ताबीज ने बचाया, अब वह इसको खोए कैसे! तो भूत से तो छूटा, लेकिन ताबीज से जकड़ गया। तो इसलिए इसको याद दिलाना जरूरी है कि भूत भी झूठा था और ताबीज भी झूठा है। अब भूत कट गया, अब तुम कृपा करके ताबीज फेंक दो।
तो मैं साधक को निरंतर यह स्मरण रखवाना चाहता हूं कि जो साधना वह कर रहा है, वह एक गहरे झूठ में उतर जाने का एंटीडोट है। और झूठ का एंटीडोट झूठ ही होगा। जहर को जहर ही काटेगा। सिर्फ विपरीत रुख होगा। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है, नहीं तो संसार तो छूटेगा, संन्यास पकड़ जाएगा। संसार तो छूट जाएगा और संन्यास पकड़ जाएगा। और दुकान तो छूट जाएगी, मंदिर पकड़ जाएगा। धन तो छूट जाएगा, ध्यान पकड़ जाएगा। और पकड़ना कुछ भी खतरनाक है। क्योंकि जो भी पकड़ जाएगा, वह बंधन बन जाएगा। वह चाहे धन हो, और चाहे ध्यान हो। ठीक साधना उस दिन जानना जिस दिन ध्यान की जरूरत न रह जाए, जिस दिन ध्यान बेकार हो जाए।
स्वभावतः, जो आदमी छत पर पहुंच गया है उसके लिए सीढ़ी बेकार हो जानी चाहिए। और अगर वह अब भी कहता है कि मेरे लिए सीढ़ी बड़े काम की है, तो समझना कि अभी छत पर नहीं पहुंचा। अभी कहीं सीढ़ी पर ही खड़ा होगा। और हो सकता है कि सीढ़ी के आखिरी चरण पर पहुंच जाए, आखिरी सोपान पर पहुंच जाए; और फिर भी अगर सीढ़ी को पकड़े रहे, तो ध्यान रखना, छत से वह अभी भी उतना ही दूर है जितना सीढ़ी के पहले सोपान पर था। छत पर नहीं पहुंचा। दोनों हालत में छत से दूर है। तुम सीढ़ी पूरी भी चढ़ जाओ, लेकिन अगर आखिरी चरण पर रुक जाओ, तो भी तुम पहुंचे कहां! हो तो तुम वहीं। सीढ़ी पर फर्क पड़ गया। पहले तुम पहले सोपान पर थे सीढ़ी के, अब सौवें सोपान पर हो। लेकिन हो सीढ़ी पर। और जो सीढ़ी पर है, वह छत पर नहीं है। छत पर होने के लिए दो काम करने पड़ें--सीढ़ी चढ़नी पड़े और सीढ़ी छोड़नी भी पड़े।
इसलिए मैं कहता हूं, ध्यान का उपयोग भी है और साथ में कहता हूं कि ध्यान एंटीडोट से ज्यादा नहीं। इसलिए मैं कहता हूं, साधना करना भी; और कहता हूं, छोड़ना भी। और जब दोनों बातें मुझे कहनी हैं तो कठिनाई तो इसमें शुरू होगी ही, क्योंकि तुम सोचोगे ही स्वभावतः कि साधना के लिए इतनी बात करते हैं आप कि यह करो, यह करो, यह करो; और फिर कह देते हैं कि सब झूठा है। तो हमारे मन में क्या होता है कि जब झूठा है तो हम करें ही क्यों! हमारा तर्क यह है कि जब सीढ़ी से उतरना ही पड़ेगा तो हम चढ़ें ही क्यों? लेकिन ध्यान रहे, अगर सीढ़ी पर नहीं चढ़े, तब भी सीढ़ी के बाहर रहोगे; और जो सीढ़ी पर चढ़कर छत पर उतर गया है, वह भी सीढ़ी के बाहर हो गया है; लेकिन तुम दोनों के प्लेन अलग होंगे। वह छत पर होगा और तुम जमीन पर होओगे। तुम भी सीढ़ी पर नहीं हो, वह भी सीढ़ी पर नहीं है, लेकिन तुम दोनों में बुनियादी फर्क है। तुम सीढ़ी पर चढ़े नहीं, इसलिए सीढ़ी के बाहर हो; वह सीढ़ी पर चढ़ा और उतरा, इसलिए बाहर है।
और जिंदगी बड़ा राज है। उसमें कुछ चीजें चढ़नी भी पड़ती हैं और उतरनी भी पड़ती हैं। उसमें कभी कुछ पकड़ना भी पड़ता है और कभी छोड़ना भी पड़ता है। लेकिन हमारा मन कहता है कि अगर पकड़ना है तो फिर बिलकुल पकड़ो, अगर छोड़ना है तो बिलकुल छोड़ो। यह तर्क खतरनाक है। इससे जिंदगी में कभी कोई गति नहीं हो सकती।
तो चूंकि दोनों ही बातें मेरे खयाल में हैं और मैं देख रहा हूं कि ऐसी कठिनाई हो गई है, कुछ लोगों ने धन को पकड़ा है, कुछ लोगों ने धर्म को पकड़ा हुआ है, कुछ ने संसार को पकड़ा है, किन्हीं ने मोक्ष को पकड़ा है, लेकिन पकड़ नहीं छूटती। और मुक्त वही है जिसकी कोई पकड़ नहीं है। और सत्य को वही जानेगा जिसकी कोई क्लिंगिंग, कोई अटकाव, कोई रुकाव, जिसका कोई आग्रह नहीं है। सत्य को वही जानेगा जिसकी कोई शर्त नहीं है, जिसकी कोई कंडीशन नहीं है। अगर तुम्हारी इतनी भी शर्त है, इतनी भी शर्त है तुम्हारी कि मैं मंदिर में ही रहूंगा, मैं दुकान पर न जाऊंगा, तो तुम सत्य को न जान सकोगे। तुम उसी सत्य को जान सकोगे जो मंदिर के झूठ के साथ पैदा होता है। अगर तुम्हारी इतनी भी शर्त है कि मैं इस भांति से ही जीऊंगा, संन्यासी की तरह जीऊंगा, अगर यह भी तुम्हारी शर्त है, तो तुम सत्य को न जान पाओगे। तुम सीढ़ी तो चढ़े, लेकिन आखिरी सोपान पर खड़े होकर तुमने सीढ़ी पकड़ ली।
कई दफे मन में होता भी है कि जिस सीढ़ी ने इतनी दूर तक चढ़ाया, उसे एकदम छोड़ कैसे दें! उसे पकड़ लेने का मन हो जाता है। आम तौर से सभी तरफ यह होता है।
एक आदमी धन कमाना शुरू करता है। वह धन कमाता है इसलिए कि आराम से जीएंगे। फिर वर्षों लग जाते हैं धन कमाने में। और धन कमाने में सब आराम खोना पड़ता है, नहीं तो कमाएगा कैसे? सोचा था कि धन कमाएंगे, आराम से जीएंगे। लक्ष्य था आराम से जीएंगे। और आराम से जीना हो तो बिना धन के तो जी नहीं सकते, तो धन कमाने में लगा था। और जब धन कमाना हो तो आराम तो नहीं किया जा सकता। आराम छोड़ना पड़ेगा, तब धन कमाया जा सकता है। तो वर्षों तक वह आदमी, समझ लो कि बीस-पच्चीस वर्ष तक सब आराम छोड़कर धन कमा लेता है। अब वह धन तो कमा लेता है, लेकिन आराम करने की आदत छूट गई। न आराम करने की आदत पकड़ गई।
अब बड़ी मुश्किल हो गई। पच्चीस साल का अभ्यास हो गया। अब उसको आप कहो कि घर बैठो, वह कहता है, घर कैसे बैठें! उसके चपरासी पहुंचते हैं दफ्तर में नौ बजे, वह आठ बजे पहुंच जाता है। उसके क्लर्क भाग जाते हैं पांच बजे, वह सात बजे लौटता है। अब वह कहता है कि...। अब वह यह भूल ही गया कि जो सीढ़ी एक दिन चढ़ने के लिए पकड़ी थी, वह उतरने के लिए ही पकड़ी थी। किसी तल पर जाकर आराम करने उतर जाना था। किसी जगह जाकर जहां धन हो जाए, वहां फिर चुपचाप खिसक जाना था, क्योंकि वह चाहता यही था कि धन से आराम कर सके।
अब बड़ी मुश्किल हो गई। धन कमाने में आराम खोया, आराम खोने में न-आराम की आदत बन गई। अब न-आराम की आदत पकड़ गई। अब वह सोचता है कि आराम कर कैसे सकता हूं! अब वह धन कमाए जाता है। अब वह सीढ़ी पर ही चढ़े जाता है। अब वह उस सीढ़ी से उतरता ही नहीं। अब उसकी छत कभी आती ही नहीं। अब वह चढ़ता ही जाता है। सीढ़ी पर सीढ़ी बनाए चला जाता है, बनाए चला जाता है। उसको तुम कितना ही कहो कि बस अब बहुत सीढ़ी बन चुकी, अब उतर आओ। वह कहता है, यह कैसे हो सकता है! अगर आराम करना है, तो सीढ़ी बनानी ही पड़ेगी। अब वह बनाता जाता है।
लेकिन यह धन के साथ ही होता होता तो बहुत दिक्कत न थी; यह धर्म के साथ भी यही होता है। हमारा मन वही है। हमारा मन वही का वही है। अब एक आदमी धर्म की दुनिया में उतरता है, त्याग करना शुरू करता है। तो वह इसीलिए त्याग करना शुरू करता है कि एक ऐसी जगह आ जाए कि मन पर कोई पकड़ न रह जाए। क्योंकि जहां तक पकड़ है, वहां तक बंधन होगा। तो वह कहता है, सब छोड़ दो। जिस-जिस का बंधन है, उसको छोड़ दो। तो वह छोड़ना शुरू करता है। यह हुई सीढ़ी। अब वह छोड़ता जाता है। अब वह मकान छोड़ता है, दुकान छोड़ता है, परिवार छोड़ता है, धन छोड़ता है, कपड़े छोड़ता है, वह छोड़ता चला जाता है। अब बीस-पच्चीस साल में उसकी छोड़ने की आदत इतनी मजबूत हो जाती है कि अब वह इस छोड़ने की आदत को नहीं छोड़ पाता। अब यह जड़ पत्थर की तरह उसकी छाती पर बैठ जाती है। अब वह कोई न कोई तरकीब निकालता रहता है कि और क्या छोड़ें। अब वह सीढ़ी उसकी चल पड़ी। अब वह कहता है कि खाना छोड़ दें, कि पानी छोड़ दें, कि नमक छोड़ें, कि घी छोड़ें, कि शक्कर छोड़ें। अब वह इसमें तरकीबें निकालता जाता है। अब वह कहता है कि नींद छोड़ें, कि स्नान छोड़ें। अब वह छोड़ने की ही तरकीबें निकालता चला जाता है। आखिरी दम वह वहां तक भी पहुंच जाता है कि शरीर छोड़ें, हत्या करें, आत्महत्या करें, क्या करें, वह यह सब करता चला जाता है, संथारा कर लें।
ये दोनों एक ही तरह के आदमी हैं। एक छोड़ने की तरफ सीढ़ियां पकड़ लिया है, एक पकड़ने की तरफ सीढ़ियां पकड़ लिया है। लेकिन सीढ़ियों पर से कोई भी उतरने को राजी नहीं है। और मेरी दृष्टि में सत्य वहां है, जहां सीढ़ियां समाप्त हो जाती हैं और तुम समतल पर आ जाते हो; न जहां चढ़ना है, न जहां उतरना है। सत्य वहां है, जहां तुम्हारी पकड़ छूट जाती है, तुम्हारी शर्त छूट जाती है। सत्य वहां है, जहां तुम अभ्यासित चित्त से चीजों को नहीं देखते, अभ्यास-शून्य चित्त से चीजों को देखने लग जाते हो।
शायद जीसस का यही मतलब है। जीसस से कोई पूछता है कि सत्य किसको मिलेगा। तो वे कहते हैं, उनको जो बच्चों की भांति हैं। अब इसका क्या मतलब हो सकता है--बच्चे की भांति! मतलब, जिसकी कोई शर्त नहीं है, जो ऐसे ही देख रहा है। अगर तुमने बच्चों को चीजों को देखते देखा है, तो तुम हैरान होओगे। हमारे और उनके देखने में फर्क है। हमारा जो देखना है, वह सदा किसी चीज का देखना है। हम कुछ खोज रहे हैं। बच्चा बस देख रहा है। उसको किसी चीज की कोई खोज नहीं है। जो है, जो दिखाई पड़ जाए, सो उसकी आंख घूम रही है, वह देख रहा है। उसकी कोई पकड़ नहीं है कि फलानी चीज देखनी है। उसकी यह भी पकड़ नहीं है कि वह दिखाई पड़े तो इस भांति दिखाई पड़े। जो है सो वह देख रहा है। अगर ठीक से कहें तो उसका देखना प्रयोजन-रहित है। उसका कोई परपज नहीं है। वह किसी प्रयोजन से नहीं देख रहा है।
इसलिए बच्चे की आंख में जो भोलापन है, वह बड़े की आंख में खो जाता है। क्योंकि बड़े की आंख में प्रयोजन आ जाता है। वह पूरे वक्त प्रयोजन से देख रहा है। अगर आपकी जेब भरी है तो वह और तरह से देखता है, जेब खाली है तो और तरह से देखता है। अगर आदमी आप सुंदर हो तो और तरह से देखता है, आदमी अगर आप सुंदर नहीं हो तो और तरह से देखता है। अगर आपसे उसे कोई मतलब है तो और तरह से देखता है, अगर कोई मतलब नहीं है तो और तरह से देखता है या देखता ही नहीं है। उसका प्रयोजन है, परपजिव है। वह अगर देखेगा भी, तो देखने तक में प्रयोजन घुस गया है।
और जब देखने में प्रयोजन घुस जाता है तो रस्सी सांप दिखाई पड़ने लगती है--फिर रस्सी दिखाई नहीं पड़ती। असल में जिसको रस्सी में सांप दिखाई पड़ रहा है, अगर तुम खयाल करोगे कि उसे क्यों दिखाई पड़ रहा है सांप रस्सी में। उसका प्रोजेक्शन है। वह आदमी भयभीत है। उसके देखने में भय है। यानी वह जब भी चीजों को देखता है तो भय से देखता है कि खतरा कहां है। अंधेरा रास्ता है। अब वह भय को खोज रहा है। रास्ते पर कोई चीज सरकती दिख गई है, लेटी हुई दिख गई है। फौरन उसने माना कि सांप है, क्योंकि वह भय को खोज रहा है। उसका एक प्रयोजन है भीतर। उसके अनकांशस में वह खोज रहा है कि कहीं अंधेरे में सांप तो नहीं है! तो रस्सी में सांप दिख गया।
एक बच्चे को नहीं दिख सकता रस्सी में सांप। अक्सर तो यह हो सकता है कि अगर सांप हिल-डुल न रहा हो, तो बच्चे को रस्सी दिखाई पड़ सकती है। वह जाकर उसको उठा ले। समझे न! बजाय रस्सी में सांप देखने के, यह भी हो सकता है कि एक सांप अगर हिल-डुल न रहा हो तो वह जाकर उसको उठा ले और समझ ले कि रस्सी है।
हम जो देख रहे हैं, अगर उसमें कहीं भी कोई प्रयोजन है, कहीं भी कोई आकांक्षा है, कहीं भी कोई भय है--ठीक से समझें, अगर हमारे देखने में कहीं भी मन है, तो हम विकृत कर देंगे। तो बिना मन के देख सकते हैं? बिना मन के देखना ही परम स्थिति है। सीइंग विदाउट दि माइंड। और दि माइंड, वह जो मन है हमारा, वह संगृहीत है। सब प्रयोजन, सब भय, सब इच्छाएं, सब वासनाएं उसमें इकट्ठी हैं।
चेखव की एक छोटी-सी कहानी है। दो पुलिस के सिपाही एक रास्ते से गुजर रहे हैं। एक छोटी-सी होटल है। वहां बड़ी भीड़ है। एक आदमी ने एक कुत्ते की टांग पकड़ रखी है। और उसको कह रहा है, इसको मार ही डालेंगे। इसने मुझे काटा है, यह औरों को भी काट चुका है। और भीड़ में सब मजा ले रहे हैं, वे कह रहे हैं, मार ही डालो। वे पुलिसवाले भी दोनों जाकर खड़े हो गए हैं। और पुलिसवालों को भी कुत्ते सताते हैं। पुलिसवालों पर कुत्ते विशेष ध्यान रखते हैं। तो उन कुत्तों से वे पुलिसवाले भी परेशान थे। उन्होंने कहा कि बहुत ही अच्छा कर रहे हो, यह काम करने योग्य ही था। इस कुत्ते को मार ही डालो, यह हमें भी रात में हैरान करता है।
तभी बगल वाले पुलिसवाले ने कहा कि जरा खयाल रखना, यह तो मुझे ऐसा लगता है कि अपने बड़े साहब का कुत्ता है। तो वह पहला सिपाही जो कह रहा था कि मार ही डालो, उसने फौरन उस आदमी की गर्दन पकड़ ली जो कुत्ते को पकड़े था। उसने कहा, बदमाश! ट्रैफिक में भीड़ इकट्ठी की है तूने? और यहां यह उपद्रव मचा रहा है? थाने चल! और दूसरे पुलिसवाले ने जल्दी से उस कुत्ते को उठाया और कंधे पर ले लिया और पुचकारने लगा।
जब उसने उसको पुचकारा और जब उस आदमी को पकड़ लिया, सारी भीड़ हैरान हो गई कि क्या हो गया! अभी यह कह रहा था, मार डालो! जब उसने उसे गौर से देखा तब उस दूसरे साथी ने कहा, नहीं, यह तो साहब वाला कुत्ता नहीं मालूम पड़ता। फिर उसने जल्दी से कुत्ते को पटका और उस आदमी को कहा, पकड़ इस कुत्ते को, मार डाल इसको। यह कुत्ता बड़ा खतरनाक है। लेकिन जब तक उस आदमी ने उस कुत्ते को पकड़ा, उस पहले सिपाही ने फिर उससे कहा कि भई, कुछ पक्का नहीं कहा जा सकता। यह दिखता तो बिलकुल मालिक का ही कुत्ता है।
ऐसी वह कहानी चलती है और उस कुत्ते के बाबत कई दफे रुख बदलता है, क्योंकि कई दफे प्रयोजन बदल जाता है। कुत्ता वही है, आदमी वही है, सिपाही वही है, सब वही हैं। चीजें जैसी हैं वे बिलकुल वैसी हैं, लेकिन कहानी दो-चार दफे रुख बदल लेती है, क्योंकि हर बार प्रयोजन बदल जाता है। कभी वह मालिक का कुत्ता हो जाता है, कभी नहीं रह जाता है। जब वह नहीं रह जाता, तो व्यवहार एकदम बदलना पड़ता है। जब वह मालिक का हो जाता है, तब एकदम उसको पुचकारना पड़ता है और व्यवहार बदलना पड़ता है।
हम सब ऐसे जी रहे हैं। मन है, तो हम ऐसे ही जीएंगे। तो जो मैं कह रहा हूं कि साधना... साधना है क्या? साधना है इस मन से छुटकारा। लेकिन जब छुटकारा हो जाएगा, तो फिर साधना का क्या करोगे? इसी मन के साथ उसको भी दफना देना पड़ेगा। यह मन जाएगा उसी के साथ। उससे कहना पड़ेगा, इस साधना को भी लेते जाओ, यह तुम्हारी वजह से है। तुम्हारे कारण ही यह साधना पकड़नी पड़ी थी, अब तुम्हीं जा रहे हो तो कृपा करके इसको ले जाओ।
और जब कोई आदमी मन और साधना दोनों से मुक्त हो जाता है, बीमारी और औषधि दोनों से, ध्यान रहे! अगर सिर्फ बीमारी से मुक्त होता है और औषधि जारी रहती है, तो अभी मुक्ति मत समझना। और कई दफे बीमारी उतनी खतरनाक सिद्ध नहीं होती जितना औषधि का पकड़ जाना खतरनाक सिद्ध होता है। क्योंकि बीमारी दुखद है, उसे छोड़ना आसान पड़ता है। औषधि सुखद है, उसे छोड़ने का मन ही नहीं होता। पर औषधि क्या कुछ बड़ी वांछनीय चीज है? बीमार के लिए है। स्वस्थ के लिए औषधि का कोई अर्थ होता है? स्वस्थ के लिए कोई भी अर्थ नहीं होता। चूंकि तुमने बीमार होने की जिद की है, इसलिए औषधि भी लेने की मजबूरी झेलनी पड़ती है। लेकिन अगर बीमार होने की जिद नहीं कर रहे हो, तो औषधि बेमानी है।
और बीमारी और औषधि दोनों एक ही तल की चीजें हैं। दोनों में भेद नहीं है। हो भी नहीं सकता, नहीं तो काम नहीं करेंगी। जिस तल पर बीमारी जीती है, उसी तल पर औषधि जीती है। जो कीटाणु बीमारी के होते हैं, उनसे विपरीत कीटाणु औषधि के होते हैं। जो तल बीमारी का होता है, वही तल औषधि का होता है। औषधि और बीमारी एक-दूसरे की तरफ पीठ किए खड़ी होती हैं, यह सच है, लेकिन उनका तल एक ही होता है।
तो मैं न केवल बीमारी के खिलाफ कह रहा हूं, मैं औषधि के भी खिलाफ कह रहा हूं। क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि इधर हजारों साल में बीमारी के खिलाफ तो बहुत बातें कही गईं और तब बीमारी तो छूट गई और औषधि पकड़ गई। और जिन लोगों ने औषधि को पकड़ा, वे बीमारों से भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध हुए।
इसलिए दोनों ही बातें खयाल में रखनी जरूरी हैं। बीमारी छोड़नी है; औषधि भी छोड़नी है। मन छोड़ना है; ध्यान भी छोड़ना है। संसार छोड़ना है; धर्म भी छोड़ना है। और एक ऐसी जगह आ जाना है, जहां न कुछ छोड़ने को बचता है, न कुछ पकड़ने को बचता है। तब वही रह जाता है, जो है। और इसलिए ये सारी की सारी जिन प्रक्रियाओं की मैं बात करता हूं--चाहे कुंडलिनी की, चाहे चक्रों की, सप्त शरीरों की--यह सारा का सारा स्वप्न का ही हिस्सा है। लेकिन स्वप्न में तुम हो और जब तक तुम स्वप्न को ठीक से न समझ लो, तुम स्वप्न के बाहर नहीं आ सकते हो।
स्वप्न के बाहर आने के लिए भी स्वप्न को ठीक से समझ लेना जरूरी है। और स्वप्न का भी अपना अस्तित्व है--अपना! झूठ का भी अपना अस्तित्व है। वह है जगत में। और उससे छूटने के लिए भी उपाय हैं। मगर दोनों ही अंततः छोड़ने योग्य हैं, इसलिए मैं कहता हूं कि दोनों ही असत्य हैं। अगर मैं इनमें से एक को सत्य कहूंगा, तो तुम फिर उसे छोड़ोगे कैसे? फिर तुम उसे छोड़ोगे नहीं। सत्य कहीं छोड़ा जाता है? सत्य तो सदा पकड़ा जाता है। इसलिए तुम कुछ भी न पकड़ पाओ, तुम्हारी कोई भी क्लिंगिंग न हो पाए, तुम कहीं भी किसी ग्रंथि में और किसी बंधन में न पड़ पाओ, इसलिए मैं कहता हूं कि न तो संसार सत्य है और न साधना सत्य है। संसार के असत्य को काटने के लिए साधना का असत्य है। जब दोनों असत्य समतुल होकर कट जाते हैं तब जो शेष रह जाता है वह सत्य है। वह न संसार का है, न साधना का। वह दोनों के बाहर, या दोनों के पीछे, या दोनों के पार, या दोनों को अतिक्रमण करता हुआ है। जब दोनों नहीं रह जाएंगे।
इसलिए मैं एक तीसरे तरह के आदमी की तुमसे बात कर रहा हूं, जो न संसारी है, न संन्यासी है। जब मुझे कोई पूछता है कि क्या आप संन्यासी हैं, तो मैं बड़ी मुश्किल में पड़ जाता हूं। क्योंकि अगर मैं अपने को संन्यासी कहूं, तो मैं उसी द्वंद्व के भीतर अपने को बांधता हूं जो संसारी और संन्यासी के बीच है। कोई मुझे पूछता है कि क्या आप संसारी हैं, तब भी मैं मुश्किल में पड़ जाता हूं। क्योंकि अगर मैं अपने को संसारी कहूं तो मैं फिर उसी द्वंद्व में खड़ा हो जाता हूं जो संन्यासी और संसारी के बीच है। तो या तो मैं कहूं कि मैं दोनों हूं एक साथ, जो कि बिलकुल बेमानी हो जाता है, मीनिंगलेस हो जाता है। क्योंकि अगर संसारी और संन्यासी दोनों हैं एक साथ, तो मतलब ही खो गया, क्योंकि मतलब द्वंद्व में था, मतलब विरोध में था। संसार छोड़ने का अर्थ संन्यास था, संन्यास न ग्रहण करने का अर्थ संसार था। तो जब अगर मैं कहूं कि दोनों ही हूं, तो शब्द अर्थ खो देते हैं। या कहूं, दोनों नहीं हूं, तब भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है, क्योंकि दो के बाहर तीसरे का हमें कोई खयाल ही नहीं होता कि कोई तीसरा भी हो सकता है। वे कहते हैं, आप या यहां या वहां। या तो कहिए कि जिंदा हैं, या कहिए मर गए हैं। बाकी दोनों नहीं हैं, ऐसा कैसे चलेगा! ऐसा नहीं चल सकता।
हम द्वंद्व में बांटकर, काटकर जीते हैं सारी चीजों को कि या यह कहिए या यह कहिए। कहिए अंधेरा है, कहिए प्रकाश है। संध्या के रंग का हमारे पास कोई स्थान नहीं है, जो दोनों नहीं होता। ‘ग्रे’ की हमारी जिंदगी में कोई जगह नहीं है। या तो हम सफेद में तोड़ देते हैं या काले में तोड़ देते हैं। बल्कि सचाई ग्रे की ही ज्यादा है। ग्रे ही जरा सघन हो जाता है तो काला हो जाता है और जरा विरल हो जाता है तो सफेद हो जाता है। मगर उसकी कोई जगह नहीं है। या तो कहिए मित्र हैं, या कहिए शत्रु हैं, दोनों के बीच तीसरी कोई जगह नहीं है। असल में तीसरी ही असली जगह है। लेकिन उसका कोई स्थान नहीं है हमारी भाषा में, हमारे सोचने में, हमारे ढंग में।
आप मुझसे पूछते हैं कि मेरे मित्र हैं या कि शत्रु हैं? अगर मैं कहूं दोनों हूं, तो मुश्किल हो जाता है। क्योंकि फिर समझ मुश्किल हो जाती है कि दोनों कैसे हो सकते हैं। या मैं कहूं दोनों नहीं हूं, तो भी बेमानी हो जाता हूं। क्योंकि फिर कोई मतलब नहीं रहा। और सचाई यह है कि जब आदमी पूरी तरह स्वस्थ होगा, तो या तो दोनों होगा या दोनों नहीं होगा। ये दोनों एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। तब न तो वह शत्रु होगा, न मित्र होगा। और मेरा खयाल यह है कि तभी वह ठीक अर्थों में मनुष्य होगा। उसकी कोई शत्रुता नहीं, उसकी कोई मित्रता नहीं। उसका कोई संन्यास नहीं, उसका कोई संसार नहीं। तीसरे आदमी के लिए ही मेरी तलाश है। और जो सारी बातें कह रहा हूं, वे सिर्फ स्वप्न को तोड़ने के लिए हैं। और अगर स्वप्न टूट ही गया है, तो उन बातों का कोई भी अर्थ नहीं है।
एक कहानी तुमसे कहूं। एक झेन फकीर हुआ। सुबह उठा। और उस फकीर का स्वप्नों के विश्लेषण पर बड़ा भरोसा था। हैं भी स्वप्न बड़े काम के। आदमी के संबंध में बड़ी खबरें लाते हैं। और चूंकि आदमी झूठा है, इसलिए सपनों से खबर मिल सकती है, झूठी चीजों से खबर मिल सकती है। आदमी के चेहरे को दोपहर में जब तुम भरे बाजार में देखते हो, तब वह उतना सच्चा नहीं होता, जितना रात के सपने में सच्चा होता है--सपना जो कि बिलकुल झूठा है। अगर तुमने दोपहर को उसे अपनी पत्नी को हाथ जोड़ते और कहते देखा है कि तुझसे सुंदर कोई भी नहीं है, तो उसके सपने में पता लगाओ। उसकी पत्नी शायद ही उसके सपने में आती हो। और दूसरी स्त्रियां जरूर आती हैं। उसका सपना ज्यादा ठीक खबर देगा उसके बाबत--सपना जो कि झूठ है।
लेकिन आदमी झूठ है, इसलिए झूठ से ही पता लगाना पड़ेगा। अगर आदमी सच्चा होता, तो उसकी जिंदगी सामने ही बता देती। सपने में जाने की कोई जरूरत न थी, उसका चेहरा बता देता। वह अपनी पत्नी से कह देता कि तू बहुत ज्यादा सुंदर नहीं, पड़ोस की स्त्री बहुत सुंदर मालूम पड़ती है। वह दूसरी बात है, वैसा आदमी नहीं है। वैसा आदमी अगर हो, तो उसके सपने बंद हो जाएंगे। जो पति अपनी पत्नी से कह सकता है कि आज तो तेरे प्रति मेरे मन में कोई प्रेम नहीं उठता, वह सड़क से जो औरत जा रही है, वह मेरे प्रेम को खींचे लेती है। इतनी सरलता से जो कह सकता है, उसके सपने बंद हो जाएंगे; क्योंकि उसके सपने में उस औरत को आने की कोई जरूरत नहीं है, उसने दिन में ही बात समाप्त कर ली है। बात रफा-दफा हो गई, सपना बचा नहीं।
सपना जो है, वह लिंगरिंग है। जो चीज नहीं हो पाई दिन में, जो नहीं कह पाया, नहीं जी पाया, वह भीतर बैठा है, वह रात में जीने की कोशिश करेगा। दिन भर झूठा रहा, इसलिए रात सपने में झूठ सचाइयां बनकर प्रकट होने लगेगा।
इसलिए पूरा मनोविज्ञान आज का, चाहे फ्रायड हो, चाहे जुंग हो, चाहे एडलर हो, सारा का सारा मनोविज्ञान सपने का विश्लेषण है। यह बड़ी हैरानी की बात है, आदमी को जानने के लिए सपने का विश्लेषण करना पड़ रहा है! ड्रीम एनालिसिस आदमी को जानने का रास्ता है! तुम सोचो, इसका क्या मतलब होता है? आज अगर तुम एक मनोविश्लेषक के पास जाते हो, मनोवैज्ञानिक के पास जाते हो, मनोचिकित्सक के पास जाते हो, तो तुम्हारी फिक्र नहीं करता; वह कहता है, तुम्हारे सपने बताओ। क्योंकि तुम तो आदमी झूठे हो, तुम्हारे बाबत कुछ पूछना बेकार है, जरा तुम्हारे सपनों से पूछ लें। क्योंकि तुम झूठे आदमी हो, उन झूठे सपनों में बिलकुल साफ-साफ प्रकट हो जाते हो। वहां तुम्हारा रिफ्लेक्शन है, वहां तुम्हारी असली तस्वीर बनती है। हम तुम्हारे सपनों में झांकना चाहते हैं। सारा मनोविज्ञान सपने के विश्लेषण पर खड़ा हुआ है।
उस फकीर का भी सपने में बड़ा रस था। और वह अपने शिष्यों से, साधकों से सपने पूछा करता था। क्योंकि हो सकता है, एक साधक आकर तो यह कहे कि मुझे भगवान खोजना है, और रात सपना देखे हीरे की खदान खोजने का। इसका भगवान से कोई मतलब नहीं है। हो सकता है, यह भगवान को भी इसीलिए खोज रहा हो कि अगर भगवान मिल जाएं, तो जरा हीरे की खदान का पता पूछ लें। क्योंकि इसका सपना इसकी खबर दे रहा है कि इसकी असली खोज क्या है।
तो वह फकीर अपने साधकों के सपनों की डायरी रखवाता था कि डायरी लिखो। और सच में ही अगर लोग अपनी आत्मकथाओं में, जागने का समय छोड़ दें और सिर्फ नींद के समय की आत्मकथाएं लिखें, तो दुनिया ज्यादा अच्छी हो सकेगी। और हम आदमियों के बाबत ज्यादा सच्ची बातें जान सकेंगे। दिन तो बड़ी झूठी दुनिया है। क्योंकि झूठा आदमी उसे बिलकुल आयोजित करता है। सपने में फिर भी एक सचाई है, क्योंकि वह अनआयोजित है, अनप्लांड है, अपने आप होते हैं। इसलिए उनकी एक सचाई है। अगर हम सारी दुनिया के महात्माओं के सपनों को पकड़ लें, तो इतने महात्मा हमें दुनिया में दिखाई न पड़ें, जितने दिखाई पड़ते हैं। इनमें से अधिक हिस्सा अपराधियों का मिले। हां, ऐसे अपराधियों का, जो बाजार में जाकर अपराध नहीं करते, मन में कर लेते हैं।
तो वह फकीर अपने साधकों को पूछता रहता था। एक दिन सुबह वह उठा, उठकर बैठा ही था अपने बिस्तर पर कि उसका एक फकीर साधक वहां से निकल रहा था। तो उसने कहा, रुक! रात मैंने एक सपना देखा, जरा व्याख्या कर। करेगा व्याख्या? उसने कहा, जरा रुकें, मैं व्याख्या ले आऊं। उसने कहा कि व्याख्या ले आऊं! फिर भी वह रुका।
वह फकीर भीतर गया और वहां से पानी का एक जग लेकर आ गया। उसने कहा, जरा हाथ-मुंह धो डालें। जब टूट ही गया है, तो अब क्या व्याख्या! उसने कहा कि जरा हाथ-मुंह धो डालें, जब टूट ही गया है, तो अब क्या व्याख्या! हाथ-मुंह धो डालें, जिससे कि यह जो भ्रम भी रह गया है थोड़ा-सा सपने का, सपने का अभी जो थोड़ा-सा स्वर रह गया है, साफ हो जाए।
तो उस फकीर ने कहा, बैठ जा! तेरी व्याख्या जंचती है। फिर एक दूसरा फकीर गुजर रहा था। उसने उसको बुलाया कि सुन, रात मैंने एक सपना देखा है। इसने कुछ थोड़ी व्याख्या की है, यह पानी का जग रखा। तू व्याख्या करेगा? उसने कहा कि अभी आया, दो क्षण रुकें। वह भागा हुआ गया और एक चाय का कप ले आया। उसने कहा कि आप जरा एक कप चाय पी लें और बात खतम। क्योंकि जब नींद ही खुल गई, हाथ-मुंह ही धो डाला गया, तो अब मुझे क्यों फंसाते हैं?
उस फकीर ने कहा कि बैठ, तेरी बात जंचती है। लेकिन अगर आज तुमने व्याख्या की होती, तो आश्रम के बाहर कर देता। तुम बच गए, बाल-बाल बच गए, अगर आज तुमने व्याख्या की होती तो आश्रम के बाहर कर देता; क्योंकि जब सपना टूट ही चुका तो क्या व्याख्या करनी है!
जब तक सपना चल रहा है लेकिन, तब तक व्याख्या करनी है। मेरी सब व्याख्याएं सपने की व्याख्याएं हैं। और सपने की व्याख्याएं सच नहीं हो सकतीं। मेरा मतलब समझ रहे हो न तुम! सपने की व्याख्या क्या खाक सच होगी, जब सपना ही सच नहीं होता तो! लेकिन सपने की व्याख्या सपने के तोड़ने में सहयोगी हो सकती है। और वही टूट जाए तो तुम जाग जाओगे। जिस दिन तुम जागोगे, उस दिन तुम नहीं कहोगे कि सपना सच था, नहीं कहोगे कि व्याख्या सच थी। तुम कहोगे, एक खेल था जो समाप्त हुआ। और उस खेल के दो पहलू थे। सपने में रमने का एक पहलू था, सपने को तोड़ने का एक पहलू था। सपने में रमने का नाम संसार है, सपने को तोड़ने वाली व्याख्याओं का नाम संन्यास है--बाकी हैं सब दोनों सपने के भीतर की बातें। सपने में रमने का नाम संसार है, सपने को तोड़ने की चेष्टा संन्यास है, लेकिन हैं दोनों सपने की बातें। और जब सपना टूट जाएगा, तो न संसार होगा, न संन्यास होगा। तब जो होगा, वह सत्य है।

भगवान, साधना प्राकृतिक विकास है अथवा प्रकृति के विकास-क्रम से बाहर छलांग व उसका अतिक्रमण है? यदि साधना सहज विकास का अतिक्रमण व छलांग नहीं है, तो क्या सृष्टि के विकास-क्रम में सारी मनुष्य-जाति आप ही आप आध्यात्मिक ऊंचाइयों को पहुंच सकती है? यदि विकास-क्रम आगे ही आगे बढ़ता है, तो प्राचीन श्रेष्ठतम आध्यात्मिक संस्कृतियां क्यों विकास-क्रम से पीछे हट गईं?
इसमें बहुत-सी बातें हैं। पहली बात तो यह कि जैसे ही हम मनुष्य को जगत से तोड़कर देखते हैं अलग, वैसे ही ये सवाल उठने शुरू हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, हम पानी को सौ डिग्री तक गरम करें, तो सौ डिग्री पर पानी छलांग लगाकर भाप बन जाता है। पानी का भाप बनना एक प्राकृतिक घटना है। पानी का गरम होना भी एक प्राकृतिक घटना है, अप्राकृतिक घटना नहीं है। पानी का गरम होना भी प्राकृतिक घटना है, पानी का छलांग लगाकर भाप बनना भी प्राकृतिक घटना है। अगर प्रकृति में यह नियम न होता कि सौ डिग्री पर पानी छलांग लगाकर भाप बन सकता है, तो पानी के पास कोई उपाय न था कि वह भाप बन जाए। अगर प्रकृति में यह उपाय न होता कि सौ डिग्री तक गरम हो सके, तो भी पानी की कोई सामर्थ्य न थी कि वह सौ डिग्री तक गरम हो जाए। फिर भी पानी के पास अगर चेतना है, तो पानी अपने को आग से बचा सकता है। और पानी के पास अगर चेतना है, तो वह अपने को आग पर चढ़ा सकता है। और यह भी प्राकृतिक घटना है कि वह अपने को बचाना चाहे या चढ़ाना चाहे--दोनों। यानी मेरा मतलब यह हुआ कि इस जगत में अप्राकृतिक कुछ भी नहीं घट सकता। असल में जो नहीं घट सकता, उसी का नाम अप्राकृतिक है।
इस जगत में जो भी घटता है वह प्राकृतिक ही होता है। अप्राकृतिक के होने का कोई उपाय ही नहीं है। जो भी होता है वह प्राकृतिक होता है। और मनुष्य अगर आध्यात्मिक विकास कर रहा है, तो वह उसकी प्रकृति की संभावना है। अगर छलांग लगा रहा है, तो प्रकृति की संभावना है। लेकिन चुनाव भी प्रकृति की संभावना है कि वह छलांग लगाने की दिशा में चले कि छलांग न लगाने की दिशा में चले। वह भी प्राकृतिक संभावना है। इसका मतलब यह हुआ कि प्रकृति में अनंत संभावनाएं हैं, मल्टी पोटेंशियलिटीज हैं। असल में जब हम प्रकृति शब्द का उपयोग करते हैं, तो हमें लगता है कि एक संभावना। उससे भूल हो जाती है।
प्रकृति है अनंत संभावनाओं का संघट। इसमें सौ डिग्री पर पानी गरम होता है, यह भी प्राकृतिक घटना है। और शून्य डिग्री के नीचे बर्फ बनता है, यह भी प्राकृतिक घटना है। इसमें सौ डिग्री पर गरम होकर भाप बनने वाली प्राकृतिक घटना का खंडन नहीं होता शून्य डिग्री पर बर्फ बनने वाली घटना से। एक प्राकृतिक, एक अप्राकृतिक, ऐसा नहीं है; दोनों प्राकृतिक हैं। इसमें अंधेरा भी प्राकृतिक है, इसमें प्रकाश भी प्राकृतिक है। इसमें नीचे उतरना भी प्राकृतिक है, इसमें ऊपर जाना भी प्राकृतिक है। इसमें अनंत संभावनाएं हैं। हम सदा एक चौराहे पर खड़े हैं, जिसके अनंत मार्ग हैं। और मजा यह है कि हम जो चुनाव करेंगे, हमारी चुनाव की क्षमता भी प्रकृति की ही दी हुई क्षमता है। लेकिन हम अगर गलत रास्ता चुनें तो प्रकृति हमें उस गलत रास्ते की पूर्णता तक पहुंचा देगी।
प्रकृति बड़ी सहयोगी है। अगर हम नरक का रास्ता चुनें, तो वह उसी को साफ करने लगेगी कि आओ। वह इनकार न करेगी। अगर हमें पानी का बर्फ बनाना है, तो प्रकृति क्यों इनकार करे कि तुम भाप बनाओ! वह बर्फ बनाएगी। अगर आपको नरक जाना है, तो वह नरक का रास्ता साफ करने लगेगी। अगर आपको स्वर्ग जाना है, तो वह स्वर्ग का रास्ता साफ करने लगेगी। अगर आपको जीना है, तो जीने का रास्ता साफ करेगी; अगर आपको मरना है, तो मरने का रास्ता साफ करेगी। और जीना भी प्राकृतिक घटना है और मरना भी प्राकृतिक घटना है और आपकी क्षमता चुनाव की भी प्राकृतिक है। इसको अगर मल्टी डायमेंशनल, प्रकृति का बहुआयामी होना समझ में आ जाए, तो कठिनाई नहीं रह जाएगी।
दुख भी प्राकृतिक है, सुख भी प्राकृतिक है। अंधे की तरह जीना भी प्राकृतिक है, आंख खोलकर जीना भी प्राकृतिक है। जागना भी प्राकृतिक है, सोना भी प्राकृतिक है। प्रकृति में अनंत संभावनाएं हैं। और मजा यह है कि हम कोई प्रकृति से बाहर नहीं हैं, हम प्रकृति के हिस्से हैं। और चुनाव भी प्रकृति की क्षमता है। पर जितना चेतन होता जाता है व्यक्ति, उतनी चुनाव की क्षमता प्रगाढ़ होती जाती है। जितना अचेतन होता है, उतनी चुनाव की क्षमता प्रगाढ़ नहीं होती। जैसे पानी अगर धूप में रखा है और उसको भाप नहीं बनना है, ऐसा उपाय नहीं है उसके पास। वह कठिनाई में पड़ेगा। उसे बनना है कि नहीं बनना है, इसका निर्णय वह नहीं कर सकता। अगर धूप में पड़ा है तो भाप बनेगा और अगर सर्दी में पड़ा है तो बर्फ बनेगा। यह उसे भोगना पड़ेगा। भोगने का भी उसे पता नहीं चलेगा, क्योंकि चेतना क्षीण है, या नहीं है, सोई हुई है।
एक वृक्ष है। अफ्रीका का वृक्ष सैकड़ों फीट ऊपर चला जाएगा। धूप की तलाश कर रहा है। अफ्रीका का वृक्ष लंबा हो जाएगा। हिंदुस्तान का वृक्ष उतना लंबा नहीं होगा, क्योंकि उतने घने जंगल नहीं हैं। जब घना जंगल होता है तो वृक्ष को अपनी जिंदगी बचाने के लिए ऊंचाई-ऊंचाई-ऊंचाई खोजनी पड़ती है, ताकि दूसरे वृक्षों के पार जाकर वह सूरज की रोशनी ले सके। अगर वह नहीं खोजता ऊंचाई, तो मर जाएगा। वह उसकी जिंदगी का सवाल है। तो वृक्ष थोड़ा-सा चुनाव कर रहा है। घना जंगल होगा, तो वृक्ष चौड़े कम होने लगेंगे, लंबे ज्यादा होने लगेंगे, कोनिकल हो जाएंगे। क्योंकि चौड़ा होना खतरनाक है, चौड़े में मर जाएंगे, इधर-उधर के वृक्षों में उलझ जाएंगी शाखाएं और सूरज तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। अब सूरज तक पहुंचना है तो शाखाएं मत निकालो, अब तो एक ही पीड़ को लंबा करो। यह भी चुनाव है। यह भी वृक्ष चुन रहा है। इसी वृक्ष को अगर तुम ऐसे मुल्क में ले आओ जहां घने जंगल नहीं हैं, उसकी लंबाई कम हो जाएगी।
कुछ वृक्ष थोड़ा-बहुत सरकते भी हैं। साल में दस-पांच फीट सरक जाते हैं। उसका मतलब है कि वे कुछ जड़ों को चलाते हैं पैरों की तरह। जिस तरफ उनको जाना है उस तरफ की जड़ों को मजबूत करके पकड़ लेते हैं, और जहां से छोड़ना है वहां की जड़ों को ढीला करके छोड़ देते हैं, तो थोड़ा-सा सरक जाते हैं। दलदली जमीन हो तो उनको आसानी मिल जाती है। वे थोड़ा-सा सरकने लगते हैं।
कुछ वृक्ष और तरह की भी तैयारियां करते हैं, पक्षियों को लुभाते हैं, क्योंकि कुछ वृक्ष मांसाहारी हैं। तो पक्षियों को लुभाते हैं, फंसाते हैं; और पक्षी आ जाएं, तो फौरन पत्ते बंद कर लेते हैं। तो पक्षियों को लुभाने के उन्होंने बड़े इंतजाम किए हुए हैं। उनके ऊपर थालियों जैसे पत्ते होंगे। थालियों में बड़ा सुगंधित रस होगा। वह रस अपनी थालियों में भरे रहेंगे। स्वभावतः उनका रस दूर-दूर से सुगंध की वजह से पक्षियों को खींचेगा। पक्षी उस रस को पीने आकर बैठे नहीं कि चारों तरफ के पत्ते उस थाली पर बंद होकर पक्षी को दबा लेंगे। उसका खून पी जाएगा वृक्ष। अब नहीं कहा जा सकता कि यह चुनाव नहीं कर रहा है। यह चुनाव कर रहा है। यह अपनी तरफ से कुछ इंतजाम भी कर रहा है। यह अपनी तरफ से कुछ खोज भी कर रहा है। पशु और भी ज्यादा चुनाव कर रहे हैं, भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं। लेकिन इन सबके चुनाव मनुष्य के चुनाव की दृष्टि से बहुत साधारण हैं। मनुष्य के सामने और बड़े चुनाव हैं, क्योंकि उसकी चेतना और भी विकसित हो गई है। अब वह शरीर से ही नहीं चुनता, अब वह मन से भी चुनता है। और अब वह जगत में पृथ्वी की यात्रा ही नहीं चुनता, पृथ्वी के ऊपर वर्टिकल यात्रा भी चुनता है। वह भी उसका चुनाव है। लेकिन है हाथ में सदा।
अब इस संबंध में अभी खोज-बीन होनी बाकी है, लेकिन मुझे लगता है कि जिस दिन भी खोज-बीन होगी, यह बात पाई जा सकेगी। कुछ वृक्ष हो सकते हैं, जो सुसाइडल हों, जो जीना न चुनें और जहां घना जंगल है, वहां भी छोटे रह जाएं और मर जाएं। अब यह खोज-बीन होनी बाकी है।
आदमी में तो हमें साफ दिखाई पड़ता है कि कुछ लोग सुसाइडल हैं। वे जीने को नहीं चुनते, मरने को चुनते रहते हैं। उनको जहां भी कांटा दिखाई पड़े, वह बिलकुल दीवाने की तरह कांटे की तरफ जाते हैं। फूल दिखाई पड़े, तो उन्हें जंचता ही नहीं। उन्हें जहां हार दिखाई पड़े, वहां वे बिलकुल हिप्नोटाइज होकर सरकते हैं। जहां जीत दिखाई पड़े, वहां वे पच्चीस बहाने बनाते हैं। जहां विकास की संभावना हो, उसके खिलाफ वे हजार तर्क इकट्ठे कर लेते हैं। जहां पतन का सुनिश्चित विश्वास हो उनको, वहां वे बिलकुल बेधड़क बढ़े चले जाते हैं। यह सब चुनाव है। और यह चुनाव जितना मनुष्य जागरूक होता चला जाएगा, उतने ही ये चुनाव आनंद की ओर अग्रसर होने लगेंगे; जितना मूर्च्छित होगा, उतने दुख की तरफ अग्रसर होते रहेंगे।
तो जब मैं कहता हूं कि चुनना ही पड़ेगा। भाप बनने के उपाय हैं, लेकिन भाप की जगह तुम्हें पहुंचना पड़ेगा। बर्फ बनने के उपाय हैं, बर्फ की जगह तुम्हें पहुंचना पड़ेगा। जिंदा रहने के उपाय हैं, लेकिन जिंदगी की व्यवस्था खोजनी पड़ेगी। मरने के उपाय हैं, मरने की व्यवस्था खोजनी पड़ेगी। चुनाव तुम्हारा है। और तुम और प्रकृति दो नहीं हैं। तुम ही प्रकृति हो।
अब इसका मतलब हुआ कि प्रकृति की जो मल्टी डायमेंशनलिटी है, वह दो तरह की है। महावीर ने एक शब्द का प्रयोग किया है, वह समझने जैसा है। महावीर का एक शब्द है, अनंत अनंत, अनंत अनंत--इनफिनिट इनफिनिटीज। यानी एक तो अनंत शब्द है हमारे पास। अनंत का मतलब होता है, एक दिशा में अनंत। अनंत अनंत का अर्थ होता है अनंत दिशाओं में अनंत। यानी ऐसा नहीं है कि दो दिशाओं पर ही अनंतता है, सभी दिशाओं में अनंतता है। सभी अनंतताओं में अनंतताएं हैं। तो यह जगत जो है इनफिनिट नहीं है, कहना चाहिए इनफिनिट इनफिनिटीज है।
तो यहां मैंने कहा कि एक तो अनंत दिशाएं हैं और प्रकृति सबका मौका देती है। अनंत चुनाव हैं, उनका भी मौका देती है। और अनंत व्यक्ति हैं, जो प्रकृति के ही अनंत हिस्से हैं। और सबको अपना-अपना स्वतंत्र मौका है कि वह चुने या न चुने। और इस सबका नियोजन ऊपर से नहीं हो रहा है, इस सबका नियोजन भीतर से हो रहा है। यानी यह जो अनंतता है--कहना चाहिए, अनंत अनंतता है--यह भी इस तरह नहीं है जैसे कि एक बैल को कोई आदमी उसके गले में रस्सी बांधकर आगे से खींच रहा हो। इस तरह नहीं है। या कोई उस बैल को पीछे से कोड़े मारकर किसी रास्ते पर धका रहा हो, इस तरह नहीं है। यह अनंत अनंतता इस तरह है, जैसे कोई झरना अपनी भीतरी ताकत से फूट पड़ा है और बह रहा है। न उसे कोई आगे से खींच रहा है, न कोई उसको कोड़े मार रहा है, न कोई उसे पुकार रहा है, न कोई उससे कह रहा है कि तुम जाओ। लेकिन उसमें शक्ति है, ऊर्जा है। और ऊर्जा क्या करे? ऊर्जा फूट रही है, ऊर्जा बह रही है। यह इनर एक्सपैंशन है।
तो अनंत आयाम, अनंत चुनाव, अनंत चुनाव करने वाले अंश और इन सबके ऊपर से ऊपर कोई नियोजन नहीं है, कोई ऊपर नियंता जैसा परमात्मा नहीं है। कोई ऊपर बैठकर मार्गदर्शन देने वाला प्रभु नहीं, कोई इंजीनियर नहीं, बल्कि भीतर की अनंत ऊर्जा ही एकमात्र आधार है, जिसके आधार पर सब फैलता जाता है। इसमें तीन तल हैं। एक तल, जहां मूर्च्छा है। मूर्च्छा के कारण जो होता है, होता है। चुनाव नहीं के बराबर है। दूसरा तल, जहां चुनाव है--मनुष्य का तल, चेतना का तल। जहां जो भी होता है, वह हमारे चुनाव से होता है। हम किसी दूसरे को रिस्पांसिबल नहीं ठहरा सकते। अगर मैं चोर हूं तो भी मेरा चुनाव है, अगर मैं ईमानदार हूं तो भी मेरा चुनाव है। मैं जो भी हूं, वह अंततः मेरा चुनाव है। यह मनुष्य का तल, जहां जो भी होता है, वहां चुनाव है। क्योंकि अर्द्ध मूर्च्छा है, अर्द्ध जागृति है। और इसलिए कभी-कभी हम ऐसी बातें भी चुन लेते हैं जो हम नहीं चुनना चाहते।
अब यह बड़ी मजेदार घटना है न! अब यह वाक्य बड़ा उलटा है। ऐसा कहना कि कभी-कभी हम ऐसी बातें चुन लेते हैं जो हम नहीं चुनना चाहते। लेकिन हम रोज चुनते हैं। तुम क्रोध नहीं करना चाहते, और क्रोध करते हो। इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब हुआ कि क्रोध तुम्हारे मूर्च्छित हिस्से से आ रहा है। और क्रोध के संबंध में जो विचार हैं, वे तुम्हारे जाग्रत हिस्से से आ रहे हैं। तो जाग्रत हिस्सा तुम्हारा कहता है, क्रोध नहीं करना है। मूर्च्छित हिस्सा क्रोध करता ही चला जा रहा है। तुम दो हिस्से में बंटे हुए हो। आधा हिस्सा नीचे की दुनिया से जुड़ा है, जहां पत्थर-पहाड़ों की दुनिया है, जहां सब मूर्च्छा है। आधा हिस्सा जागरूक हो गया है, होश से भर गया है और आगे की दुनिया से जुड़ा है--पूर्णता की, परमात्मा की दुनिया से--जहां कि सब जागा हुआ है। और आदमी बीच में है। और इसलिए आदमी एक तनाव में है। कहना चाहिए, आदमी एक तनाव है। तनाव ही है आदमी, खिंचाव--इधर आधा, उधर आधा।
इसलिए आदमी कोई--ठीक से हम कहें--तो प्राणी नहीं है, अर्द्ध प्राणी है। या कहें कि ठीक से कोई उसका व्यक्तित्व नहीं है, क्योंकि उसमें दोहरे व्यक्तित्व हैं। रात वह सो जाता है और प्रकृति का हिस्सा हो जाता है, दिन जग जाता है और परमात्मा की यात्रा करने लगता है। क्रोध में होता है तो अंधा हो जाता है, गणित करता है तो बड़े होश में करता है। गणित में कभी कोई आदमी यह कहता हुआ नहीं दिखाई पड़ता कि मैं दो और दो चार जोड़ना चाहता था, फिर भी मैंने पांच जोड़े हैं। ऐसा कोई आदमी गणित में कहता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। क्या मामला है? लेकिन क्रोध में वह कहता है, मैं क्रोध नहीं करना चाहता था, फिर भी मैंने क्रोध किया। जरूर क्रोध और गणित के फासले हैं। गणित शायद उस हिस्से का हिस्सा है जहां जागरण है; और क्रोध वहां का हिस्सा है जहां निद्रा है। इसलिए आदमी निरंतर एंग्जायटी में है--एक चिंता, तनाव, एंग्विश--वह पूरे वक्त संतापग्रस्त है। वह जो कर रहा है, वह नहीं करना चाहता, वह भी कर रहा है। जो करना चाहता है, वह कर नहीं पा रहा है। वह पूरे वक्त खिंचा हुआ है। वह डोल रहा है पूरे वक्त घड़ी के पेंडुलम की तरह--कभी बाएं, कभी दाएं। उसका भरोसा करने योग्य नहीं है कि तुम उसे बाएं देख गए थे, तो घड़ी भर बाद आओ तो तुम उसे बाएं पाओ। यह कोई पक्का नहीं है, क्योंकि वह घड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहा है।
तो आगे मनुष्य के पूर्ण जागृति का जगत है, तीसरा तल। वहां भी कोई चुनाव नहीं है। मगर वहां के न चुनाव में और पहले तल के न चुनाव में फर्क है। पहले तल पर मूर्च्छा है, इसलिए चुनने वाला मौजूद नहीं है, चुनने का सवाल नहीं है। एक सोया हुआ आदमी क्या चुनेगा? सोया रहेगा। घर में आग लग जाए, तो भी वह नहीं चुन सकेगा कि बाहर जाऊं कि भीतर रहूं, जब तक जाग न जाए। मूर्च्छित जगत जो है, वहां चुनाव नहीं है, क्योंकि चुनाव करने वाला सोया हुआ है।
अमूर्च्छित, जाग्रत जो जगत है, जिसको मैं परमात्मा कह रहा हूं, प्रकृति का जागा हुआ रूप, पूर्ण जागा हुआ जहां जगत है, उसमें जैसे ही कोई व्यक्ति प्रवेश करता है, वहां भी चुनाव नहीं है। वहां इसलिए चुनाव नहीं है कि व्यक्ति पूरी तरह जागा हुआ है। तो जो ठीक है, वह उसे दिखाई ही पड़ता है। इसलिए चुनने का मौका नहीं होता। चुनने का मौका तभी होता है, जब धुंधला दिखाई पड़ता हो। यानी मुझे ऐसा लगता हो कि यह करूं कि यह करूं, जब कि ईदर आर मालूम पड़ता हो। जब मुझे लगता हो कि यह करूं कि यह करूं, इसका मतलब यह है कि मुझे साफ नहीं दिखाई पड़ रहा है, धुंधला दिखाई पड़ रहा है। दोनों करने योग्य भी लग रहे हैं, दोनों नहीं करने योग्य भी लग रहे हैं। इसलिए चुनाव है, इसलिए च्वाइस है।
अगर मुझे बिलकुल ठीक दिख रहा है कि यह करने योग्य है और यह न करने योग्य है, तो चुनाव कहां है फिर! चुनाव खतम हो गया। फिर जो करने योग्य है वह करता हूं, जो नहीं करने योग्य है वह नहीं करता हूं। इसलिए उस तल पर कोई यह नहीं कह सकता कि मैं जो नहीं करना चाहता था, वह मैंने कर लिया। वह कोई सवाल उठता नहीं। वह यह भी नहीं कह सकता कि मैंने जो किया, उसके लिए मैं पश्चात्ताप करता हूं। क्योंकि वह भी सवाल उठता नहीं। वह यह भी नहीं कह सकता कि मैंने भूल की, नहीं करनी थी। यह भी सवाल उठता नहीं। पूरा जागा हुआ आदमी जो करता है, उसमें चुनाव नहीं होता। वह वही करता है, जो उसे दिखाई पड़ता है, करने योग्य है। वहां करना चाहिए, ऐसा कोई भाव नहीं होता। वहां जो करने योग्य है, वह होता है।
तो न तो पूर्ण जाग्रत तल पर कोई चुनाव है, न पूर्ण मूर्च्छित तल पर कोई चुनाव है। चुनाव है मनुष्य के तल पर, जहां आधी मूर्च्छा है और आधा जागरण है। अब यहां तुम्हारे हाथ में निर्भर है कि तुम दोनों तरफ जा सकते हो। बीच ब्रिज पर खड़े हो; सेतु पर बीच में खड़े हो--वापस लौट सकते हो, आगे बढ़ सकते हो। वापस लौटना सदा आसान मालूम पड़ता है। क्यों? क्योंकि जहां हम लौट रहे हैं, वह परिचित भूमि है। वहां से हम आए हैं, वहां डर नहीं है ज्यादा। हमें पता है कि वहां क्या है, क्या नहीं है। आगे बढ़ना हमेशा खतरनाक मालूम पड़ता है, क्योंकि जहां हम जा रहे हैं, वहां का हमें कोई भी पता नहीं है। इसलिए आदमी शराब पीकर पीछे लौट जाता है। नशा कर लेता है, पीछे लौट जाता है। इन सबमें वह मनुष्य होना छोड़ रहा है। असल में वह कह रहा है कि हम यह झंझट चुनाव की छोड़ते हैं; हम तो वहां जाते हैं, जहां कोई चुनाव करना ही नहीं पड़ता। पड़े रहते हैं--नाली में पड़े हैं तो पड़े हैं, सड़क पर पड़े हैं तो पड़े हैं, गाली बक रहे हैं तो बक रहे हैं, नहीं बक रहे हैं तो नहीं बक रहे हैं। जो हो रहा है सो हो रहा है। जहां हमें नहीं चुनना पड़ता। यह चुनाव का तनाव और बोझ हमारे सिर पर जहां नहीं रह जाता, हम वहां जाते हैं। इसलिए सब नशे आदमी को सेतु से वापस लौटा लेते हैं कि आ जाओ वापस, वहीं ठीक थे।
अगर आगे जाना है तो जागृति बढ़ानी पड़ेगी। क्योंकि जैसे-जैसे आगे बढ़ते हो सेतु पर, वैसे-वैसे ज्यादा जाग्रत होओगे तो ही आगे बढ़ सकते हो। आगे बढ़ने का एक ही मतलब है--और जागो, और जागो, और जागो। यह भी चुनाव है और तुम्हारे हाथ में है और प्रत्येक के हाथ में है कि क्या चुनते हो। और किसी को जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते; क्योंकि कोई ऊपर बैठा नहीं है जिससे तुम कह सको कि तुमने गलत चुनाव करवा दिया। वहां कोई है नहीं। आकाश खाली है। वहां कोई देवी-देवता और कोई ईश्वर बैठा हुआ नहीं है, जिसको तुम किसी दिन अदालत में खड़ा कर सको कि हम तो ठीक रास्ते पर जा रहे थे, तुमने जरा भटका दिया; कि उससे तुम कह सको कि अगर तुम्हीं कृपा कर देते तो सब ठीक हो जाता। वहां ऐसा कोई मिलेगा नहीं कभी।
इसलिए उसका कोई उपाय ही नहीं है। व्यक्ति अल्टीमेटली रिस्पांसिबल है। अंततः हम ही जिम्मेवार हैं--बुरा होगा तो जिम्मेवार, भला होगा तो जिम्मेवार। कोई नहीं है जो उत्तरदायी ठहराया जा सके कि तुम उत्तर दो, ऐसा क्यों हुआ? ऐसा कोई है नहीं। जो आगे चले गए हैं वे जरूर चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि घबड़ाकर लौट मत जाना, क्योंकि बहुत आनंद है। डरकर लौट मत जाना, क्योंकि बहुत आनंद है। सब चिंताएं समाप्त हो जाती हैं, सब अशांति समाप्त हो जाती है, सब दुख समाप्त हो जाता है। वे चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं। लेकिन उनकी आवाज भी हमें बड़ी अपरिचित मालूम पड़ती है। क्योंकि जिस जगह से वे बोलते हैं, वह जगह हमें अपरिचित है। हम कहते हैं कि आनंद हो ही कैसे सकेगा! जब यहां तक बढ़े, तो इतना दुख हो गया; और आगे बढ़ें, कहीं और दुख न हो जाए। इससे तो पीछे लौट चलें, वहां दुख नहीं था।
हर आदमी कहता है, बचपन में दुख नहीं था। अगर लौट सकता हो आदमी, फौरन लौट जाए। वह तो लौट नहीं सकता, इसलिए रुका रह जाता है। कहता है बचपन में दुख नहीं था। अगर उसका वश चले तो वह कहे कि मां के गर्भ में बिलकुल दुख नहीं था। अगर लौट सके तो लौट जाए, लेकिन लौट नहीं सकता। इसलिए आगे बढ़ता जाता है। लेकिन जीवन के चुनाव में हम पीछे लौट सकते हैं। हम मूर्च्छा में लौट सकते हैं। हम तरकीबें खोज सकते हैं कि हम मूर्च्छित हो जाएं।
और वह जो दूर से आवाजें आती हैं, उन आवाजों के शब्द भी हमारी समझ में नहीं आते। क्योंकि आनंद हम जानते नहीं कि किस चीज का नाम है! कौन-सी चिड़िया है जिसको आनंद कहें! दुख हम जानते हैं, अच्छी तरह जानते हैं। और हम यह भी जानते हैं कि जितना सुख पाने की कोशिश की, उतना दुख पाया। अब यह भी डर लगता है कि आनंद पाने की कोशिश में कहीं और झंझट में न पड़ जाएं। जितना सुख पाने की कोशिश की उतना दुख पाया, तो यह आनंद हमें सुख का निकटतम मालूम पड़ता है कि कुछ सुख की ही गहन अनुभूति होगी। मगर झंझट से भी डरते हैं, क्योंकि सुख पाने की जितनी कोशिश की उतना दुख पाया, कहीं यह आनंद पाने की कोशिश में और भी मुसीबत न हो जाए, कहीं कोई महा दुख न मिल जाए। इसलिए सुन लेते हैं, हाथ जोड़ नमस्कार कर लेते हैं उस पार के लोगों को। कहते हैं, तुम भगवान हो, तुम अवतार हो, तीर्थंकर हो, बड़े अच्छे हो। हम तुम्हारी पूजा करेंगे, लेकिन हमें पीछे लौटने दो।
अज्ञात का भय मालूम पड़ता है। जो थोड़े-बहुत सुख हमने जमा रखे हैं, कहीं वे भी न छूट जाएं। वे सब छूटते मालूम पड़ते हैं आगे बढ़ो तो। क्योंकि हमने उसी सेतु पर, जो कि सिर्फ पार होने के लिए है, घर बना लिया है, वहीं रहने लगे हैं। वहीं हमने सब इंतजाम कर लिया है। अपना बैठकखाना जमा लिया है उसी सेतु पर। अब कोई हमसे कहता है, आगे आ जाओ, तो हमें डर लगता है कि इस सब का क्या होगा! यह सब छोड़कर जाना पड़ेगा आगे! तो हम कहते हैं कि जरा वक्त आने दो, बूढ़े होने दो, मौत करीब आने दो। जब यह सब छूटने लगेगा, तब हम एकदम से आ जाएंगे, क्योंकि फिर कोई डर नहीं रहेगा।
लेकिन जितनी मौत करीब आती है, उतनी पकड़ गहरी होती है। क्योंकि जितनी मौत करीब आती है उतना डर लगता है कि छूट न जाए, तो मुट्ठी जोर से कसते हैं। इसलिए बूढ़ा आदमी निपट कृपण हो जाता है, जवान आदमी उतना कृपण नहीं होता। उसकी कृपणता बढ़ जाती है बूढ़े की सब तरफ से। वह एकदम जोर से पकड़ता है। वह कहता है कि अब जाने का वक्त हुआ, कहीं सब छूट न जाए। अगर ढीला पकड़ा, कहीं हाथ न छूट जाए, इसलिए जोर से पकड़ लेता है। उसकी जोर से पकड़ ही बूढ़े आदमी को कुरूप कर जाती है, अन्यथा बूढ़े आदमी के सौंदर्य का कोई मुकाबला न हो। हम सुंदर बच्चे जानते हैं, फिर उनसे कम सुंदर जवान जानते हैं, और सुंदर बूढ़े तो बहुत कम, कभी-कभी घटना घटती है। क्योंकि जैसे-जैसे कृपणता बढ़ती है और पकड़ बढ़ती है, वैसे-वैसे सब कुरूप होता जाता है। खुला हाथ सुंदर है, बंधी हुई मुट्ठी कुरूप हो जाती है। मुक्ति सौंदर्य है और बंधन गुलामी। सोचता तो है कि छोड़ देंगे कल, जब मौका छोड़ने का ही आ जाएगा तब छोड़ देंगे। लेकिन जो आदमी उस मौके की प्रतीक्षा करता है कि जब उससे छीना जाएगा तब छोड़ेगा, वह आदमी छोड़ना ही नहीं चाहता। और जब छीना जाता है तो पीड़ा आती है; और जब छोड़ा जाता है तो पीड़ा नहीं आती।
अब यह जो आगे बढ़ने का मामला है, यह चुनाव ही है हमारा। और इस चुनाव के लिए गति दी जा सकती है। इसके भी नियम हैं। सेतु तैयार है। वह कहता है वह भी प्राकृतिक है। मेरी बात खयाल में आ रही है न? आगे जाने के लिए भी सेतु तैयार है, वह कहता है, आओ। यह भी प्रकृति है। पीछे जाने के लिए भी तैयार है। वह कहता है, आओ। यह भी प्रकृति है। प्रकृति तुम्हें हर हालत में स्वागत करने को तैयार है। उसके सब दरवाजों पर वेलकम लिखा हुआ है। यही खतरा भी है। यानी किसी दरवाजे
पर यह नहीं लिखा हुआ है कि मत आओ। सब दरवाजे पर, द्वार-द्वार पर स्वागतम है। इसलिए चुनाव तुम्हारे हाथ में है। और यह प्रकृति की अनुकंपा भी है कि किसी भी द्वार पर तुम्हें इनकार नहीं है, तुम जहां आना चाहो, आ जाओ। मगर नरक के द्वार पर भी लगा हुआ है, स्वर्ग के द्वार पर भी लगा हुआ है। चुनाव अंततः हमारा होगा कि हमने कौन-सा स्वागतम चुना। इसमें हम प्रकृति को जिम्मेवार न ठहरा सकेंगे कि तुमने स्वागतम क्यों लगाया था? उसने सभी जगह लगा दिया था, उसमें कोई सवाल ही नहीं था, कहीं भी रुकावट न डाली थी।
स्वतंत्रता इसका अर्थ है, स्वागतम का। यानी प्रकृति जो है, वह परम स्वतंत्र है भीतर से। और हम उसके हिस्से हैं, हम परम स्वतंत्र हैं। हम जो करना चाहते हैं, कर रहे हैं। इस करने में सब चीजों में उसका सहारा है। लेकिन चुनाव हमारा ही है। और जब मैं कहता हूं, हमारा ही, तो भ्रांति में मत पड़ जाना। क्योंकि हम भी प्रकृति के हिस्से ही हैं। अगर इसे परम शब्दों में कहा जाए तो मतलब यह होगा कि प्रकृति की ही अनंत संभावनाएं हैं, प्रकृति के ही अनंत द्वार हैं, प्रकृति ही अपने अनंत द्वारों पर अपने ही अनंत अंशों से खोजती है, चुनती है, भटकती है, पहुंचती है। पर यह बहुत गोल हो जाता है। यह बात जो है बहुत गोल हो जाती है, इसमें कोने नहीं रह जाते।
और कठिनाई यह है कि प्रकृति के सब रास्ते गोल हैं, सरकुलर हैं। उसका कोई रास्ता भी कोने वाला नहीं है। चौखटा कोई रास्ता नहीं है उसका। उसके सब तारे, चांद, ग्रह, उपग्रह गोल हैं। उन चांद-तारों की परिक्रमाएं गोल हैं। प्रकृति की सारी नियम-व्यवस्था वर्तुलाकार है। इसलिए बहुत-से धार्मिक प्रतीकों में वर्तुल का प्रयोग हुआ है, सर्किल का प्रयोग हुआ है। वह गोल है। और तुम कहीं से भी चलो, कहीं से भी चलकर कहीं भी पहुंच सकते हो। चुनाव सदा तुम्हारा है।
यह अगर खयाल में आ जाए कि चुनाव सदा मेरा है, तो फिर प्रकृति के नियमों का ठीक उपयोग किया जा सकता है। जैसे कि जब मैं रास्ते पर चलता हूं तब भी मैं ग्रेविटेशन के नियम का ही उपयोग करता हूं। अगर जमीन में कशिश न हो, आकर्षण न हो, गुरुत्वाकर्षण न हो, तो तुम चल न सकोगे जमीन पर। क्योंकि जब तक तुम दूसरा पैर उठाते हो, अगर पहला पैर जमीन पर न रह जाए और अपने आप उठ जाए, तो तुम कहां टिकोगे? कहां खड़े रहोगे? जब तुम बायां पैर उठाते हो, तब दायां पैर जमीन पकड़े रखती है। इसीलिए तुम बायां उठा पाते हो। तुम्हारे बाएं के उठाने में जमीन की दाएं की पकड़ है। अगर दायां भी उसी वक्त उठ जाए, तो तुम गए। वह दाएं को पकड़े रखती है, तब तक तुम बायां उठा लेते हो। जब तुम बाएं को रखते हो, प्रकृति उसे संभाल लेती है, तब तुम दायां उठा लेते हो। ग्रेविटेशन काम करता है।
लेकिन एक आदमी अपनी छत पर से कूद पड़ता है, उस वक्त भी ग्रेविटेशन काम कर रहा है। उस वक्त भी जमीन इसको खींच लेती है कि आ जाओ। जैसे वह बाएं पैर, दाएं पैर को खींचती थी, इसको भी खींच लेती है। अब हड्डी पड़ जाती है उसके ऊपर। हड्डी टूट जाती है। हम कहते हैं, ऐसी कैसी है प्रकृति, हमारी हड्डी तोड़ दी! प्रकृति अपना जैसा काम कर रही है। वह कहती है, स्वागत है, आओ, हड्डी तुड़वाओ।
वह नियम काम कर रहा है। वही ग्रेविटेशन हड्डी तोड़ देगा। जो ग्रेविटेशन जमीन पर चलाता था, वही लंगड़ा बना देगा। लेकिन तुम फिर भी उसको जिम्मेवार न ठहरा सकोगे, उसने सिर्फ अपना काम किया। उसका काम बिलकुल ही परफेक्ट है। उसमें कहीं कोई कमी नहीं है। उसमें भूल-चूक नहीं होती। चाहे तुम पैर चलाओ, चाहे तुम गर्दन तोड़ो। तुम जो भी करना चाहो, उसका नियम अपनी तरह काम करता रहता है। उस नियम को देखकर तुम्हें चुनाव करना है कि तुम हड्डी तोड़ना चाहते हो तो छत पर से कूदो और जमीन पर चलना चाहते हो तो पैर ढंग से उठाओ। तुम्हें ध्यान रखना है कि प्रकृति के नियम के प्रतिकूल तुम न पड़ जाओ।
विज्ञान का मेरी दृष्टि में एक ही अर्थ है। विज्ञान का यह अर्थ नहीं है कि हमने प्रकृति को जीत लिया। प्रकृति को जीतने का कोई उपाय नहीं है। विज्ञान का एक ही अर्थ है कि हमने प्रकृति के अनुकूल चलने की कुछ तरकीबें खोज लीं। और कुछ मतलब नहीं है। जीत तो क्या सकेंगे! जीतेगा कौन किसको? प्रकृति के अनुकूल चलने की हमने तरकीबें खोज ली हैं।
यह प्रकृति तो बहुत दिन पहले से पंखा चलाने को तैयार थी। हम अपने पंखे को ठीक जगह पर न लगा पाए थे। मेरा मतलब समझे न तुम? हवाएं तो बाहर की हमेशा से बहने को तैयार थीं, लेकिन हमने दीवाल बना रखी थी। हमने कोई खिड़की न बनाई थी। जब हम खिड़की बना लेते हैं, तब क्या तुम कहोगे कि हमने हवाओं पर विजय पा ली? हमने सिर्फ हवाओं के रास्ते खुले छोड़ दिए। हवाएं तो बहने को सदा तैयार थीं। अगर हम बिजली से पंखा चला रहे हैं और प्रकाश जला रहे हैं तो हमने कोई प्रकृति पर विजय नहीं पा ली। हमने सिर्फ प्रकृति के अनुकूल होने का ढंग पा लिया। अब हम अपने बल्ब को इस अनुकूलता से लगाते हैं, अपनी बटन को इस अनुकूलता से लगाते हैं, अपने तार को इस अनुकूलता से फैलाते हैं कि बिजली उनमें से बह सकती है। वह तो सदा से बहने को तैयार थी। हम सिर्फ खिड़की खोल रहे हैं।
विज्ञान है प्रकृति की, बाह्य प्रकृति की अनुकूलता के नियमों की खोज। और धर्म है प्रकृति के अंतस नियमों की अनुकूलता की खोज। जैसे बाहर के जगत में प्रकृति के नियम हैं और उनके अनुकूल अगर हम चलें तो प्रकृति सहयोगी हो जाती है, प्रतिकूल चलें तो असहयोगी हो जाती है। प्रकृति सहयोगी होती है या असहयोगी होती है, यह कहना एक अर्थ में गलत है। हम प्रकृति से सहयोग ले पाते हैं कि नहीं ले पाते हैं, यही कहना उचित है। यानी इसे ऐसा ही कहना चाहिए कि हम इस ढंग से अगर खड़े हों कि प्रकृति सहयोगी हो सके, तो हम प्रकृति से फायदा उठा लेते हैं। हम अगर इस ढंग से खड़े हों कि प्रकृति सहयोगी न हो सके, तो हम नुकसान उठा लेते हैं।
अगर तुम छाता लेकर चलते हो और हवा तुम्हारी तरफ बह रही हो और छाता तुम आगे झुका लेते हो तो ठीक है, और तुम छाता पीछे की तरफ कंधे पर कर लेते हो तो हवा उसको उलटा डालती है। इसमें प्रकृति को तुम कहीं दोष देने न जा सकोगे। तुमने छाता अनुकूल नहीं रखा; बस इतना ही जिम्मा तुम्हारा ही होगा। प्रकृति दोनों वक्त वही काम कर रही है। जब तुम छाता आगे रखते हो, तब भी छाते को दबा रही है, लेकिन तुम्हारी तरफ दबा रही है। जब तुम छाते को कंधे पर रख लेते हो, तब भी दबा रही है, तब वह तुमसे उलटा दब जा रहा है। इसमें तुम्हारे छाता रखने की बात है।
ऐसे ही प्रकृति के आंतरिक नियम भी हैं। अब जो आदमी क्रोध के ढंग से जीता है, वह छाते को कंधे पर रख रहा है। अब वह झंझट में पड़ेगा। उसके भीतरी छाते सब टूट जाएंगे। और जो आदमी प्रेम को फैला रहा है, वह छाते को आगे की तरफ रख रहा है। वह प्रकृति के अनुकूल हो रहा है।
तो जो आदमी प्रेम करना सीख लेता है, असल में उसने भीतरी विज्ञान का एक नियम सीखा। उसने यह सीखा कि प्रेम जो है, वह भीतरी जीवन को अनुकूलता ला देता है; और क्रोध जो है, वह भीतरी जीवन के लिए प्रतिकूलताएं पैदा कर देता है। यह भी ग्रेविटेशन जैसा ही मामला है। क्रोध में टांग टूट जाती है, प्रेम में जुड़ जाती है। प्रकृति दोनों वक्त काम करने को तैयार है कि तुम क्या कर रहे हो। क्रोध में आदमी छत से कूद रहा है।
जो अंतस जीवन की अंतिम अनुकूलता है, वह ध्यान है। अंतिम अनुकूलता, जिसे कहें गहरी से गहरी अनुकूलता। ध्यान का मतलब यह है कि भीतर से आदमी अब जीवन के परम नियम के अनुकूल खड़ा हो गया। इसीलिए लाओत्से ने उसे जो शब्द दिया है ताओ, वह प्रीतिकर है। ताओ का मतलब होता है, नियम। या वेद के ऋषियों ने जो नाम दिया है, वह ठीक है। वह है ऋत। ऋत का अर्थ होता है, दि लॉ। ऐसे ही धर्म का मतलब भी यही होता है, नियम। धर्म का मतलब होता है, स्वभाव, दि लॉ। धर्म का मतलब है कि जैसा तुम करोगे...ऐसा नियम कि अगर वैसा तुम करोगे तो तुम सुख को उपलब्ध हो जाओगे। अधर्म का मतलब है कि ऐसा करना जो नियम के प्रतिकूल पड़ेगा तो तुम दुख को उपलब्ध हो जाओगे।
यह आंतरिक विज्ञान की बात है। और ध्यान अंतिम अर्थों में, भीतरी अर्थों में अनुकूल होना है। अनुकूलन कहना चाहिए। सब भांति जो अनुकूल है। जो जीवन से कहीं भी लड़ता नहीं, जो जीवन से कहीं भी विभाजित नहीं होता। जो सब भांति से जीवन के समस्त नियमों के अनुकूल हो गया है, वह परम सत्य को उपलब्ध हो जाता है--परम जीवन को, परम आनंद को, परम मुक्ति को।
और हम भी उसी नियम के नीचे खड़े हैं, लेकिन हम उसी नियम के विपरीत लड़-लड़ कर परम बंधन को उपलब्ध हो जाते हैं। उसी नियम के विपरीत लड़-लड़ कर। यानी मामला कुछ ऐसा है कि कुछ लोग हैं जो सोने को समझ जाते हैं, तो आभूषण गढ़ लेते हैं। कुछ लोग हैं जो सोने को नहीं समझ पाते, वे जंजीरें गढ़ लेते हैं। सोने का नियम एक है। गढ़ने का नियम एक है। ढालने का नियम एक है। अब तुम आभूषण गढ़ते हो कि जंजीर गढ़ते हो, यह बिलकुल तुम पर निर्भर है।
प्रकृति के नियम के साथ जो पूरी तरह अपना अनुकूलन साध लेता है आंतरिक, वह धर्म को उपलब्ध हो जाता है। जो बाहर साध लेता है अनुकूलन पूरी तरह, वह विज्ञान को उपलब्ध हो जाता है। ये शब्द भी बड़े अच्छे हैं, समझने जैसे हैं।
धर्म से जो मिलता है, उसे हम ज्ञान कहते हैं। साइंस से जो मिलता है, उसे हम विज्ञान कहते हैं। ये दोनों शब्द बड़े अर्थपूर्ण हैं। ज्ञान में हम कोई विशेष प्रत्यय नहीं लगा रहे हैं, कोई विशेषण नहीं लगा रहे हैं। विज्ञान का मतलब है, विशेष ज्ञान। और ज्ञान का मतलब है, बस सहज ज्ञान, कोई विशेष नहीं। तो धर्म का अर्थ है, जो जीवन की आंतरिक प्रकृति है, उसके साथ सहज एक हो जाने की समझ। इसलिए सिर्फ ज्ञान है वह। जस्ट नोइंग, स्पेशलाइज्ड नालेज नहीं। विज्ञान जो है, वह स्पेशलाइज्ड नालेज है--विज्ञान है, विशेष ज्ञान है। क्योंकि एक-एक दिशा में हमें खोजना पड़ता है कि इसके नियम का क्या अनुकूलन होगा, इसके नियम का क्या अनुकूलन होगा, इसके नियम का क्या अनुकूलन होगा। करोड़ों नियम हैं बाहर।
स्वभावतः, जितने भीतर जाएंगे, उतना एक नियम रह जाएगा। जितने बाहर जाएंगे, उतने ज्यादा नियम होते चले जाएंगे। ऐसे ही जैसे हम एक बिंदु के चारों तरफ एक बिंदु से रेखाएं खींचना शुरू करें बाहर की तरफ जाती हुई। तो बिंदु पर तो सब रेखाएं एक होंगी, बिंदु से दूर होते-होते ज्यादा होने लगेंगी। जितनी दूर होती जाएंगी, उतनी ज्यादा और उतने फासले पर होती जाएंगी। जैसे सूरज की किरणें फैल जाती हैं चारों तरफ। सूरज पर तो वे एक होती हैं, सूरज से दूर हटते दो होने लगती हैं, चार होने लगती हैं, हजार, करोड़, अरब होने लगती हैं, फैलती चली जाती हैं। फिर उनका फासला बड़ा होता चला जाता है।
विज्ञान जो है, वह विशेष ज्ञान है। एक-एक किरण का ज्ञान है, इसलिए स्पेशलाइज्ड है। कोई एक किरण को पकड़ लेगा विज्ञान की तो फिर उसी किरण को जान लेगा। जैसा मैं कल कह रहा था: टु नो मोर अबाउट लेस एंड लेस। तो थोड़े, और थोड़े, और थोड़े के संबंध में, ज्यादा-ज्यादा जानता चला जाएगा। लेकिन किरण और बारीक होती जाएगी, जितना दूर जाएगा और बारीक होती जाएगी, और बारीक होती जाएगी। इसलिए विज्ञान बारीक होता जाएगा, नैरो होता जाएगा, संकीर्ण होता जाएगा। धर्म विस्तीर्ण होता जाएगा, विराट होता जाएगा, निराकार होता जाएगा। अंत में अद्वैत रह जाएगा; वहां कोई दो नहीं रह जाएंगे। इसलिए मैं कहता हूं, विज्ञान बहुत हो सकते हैं, धर्म बहुत नहीं हो सकते। धर्म एक ही हो सकता है; क्योंकि वह ज्ञान है, विशेष ज्ञान नहीं है।
यह जो खयाल में आ जाए तो इसका मतलब यह हुआ कि नियम मौजूद हैं, हम मौजूद हैं, अब हम उन नियमों के साथ और अपने साथ क्या करते हैं, इसकी चुनाव की क्षमता भी मौजूद है। जो हम करेंगे उसको भोगने की क्षमता भी मौजूद है। यह स्थिति है। इसमें जो बुद्धिमान है, वह आनंद की दिशा को क्रमशः बढ़ाता चला जाता है। जिसने बुद्धिहीनता के चुनाव लेने का तय कर रखा है, वह आनंद की क्षमता को निरंतर कम करता चला जाता है। और ऊपर कोई जिम्मेवार नहीं है। सारा दायित्व मनुष्य का है।
इसलिए साधना पर मेरा जोर है। और इसलिए तुमसे कहता हूं निरंतर कि लगो, छलांग लो, नियम पक्के हो गए हैं। तुम बिलकुल जंपिंग बोर्ड पर खड़े हो, लेकिन वहीं खड़े हो। नीचे सागर लहरा रहा है। छलांग तुम लगा सकते हो। भारी धूप है, सूरज तप रहा है, पसीना चू रहा है, नीचे शीतल सागर लहरा रहा है। तुम छलांग लगा सकते हो। अभी तुम शीतलता में पहुंच जाओगे। जंपिंग बोर्ड पर खड़े हो। तुम जरा छलांग लो कि बोर्ड भी तुमको छलांग देने में सहयोग देगा। उसमें स्प्रिंग जड़े हैं। वे तुमको फेंक देंगे उछालकर।
लेकिन तुम खड़े हो। तो धूप में पसीना बह रहा है। जंपिंग बोर्ड नीचे रो रहा है। उसके स्प्रिंग रो रहे हैं कि तुम जल्दी छलांग लो, तो वे तुम्हें साथ दें। लेकिन तुम नहीं ले रहे हो, तो जंपिंग बोर्ड शांत है। नीचे शीतल सागर है। वह देख रहा है कि पसीना चू रहा है तुम्हारा।
यह सब स्थिति है। इसमें तुम्हें निर्णायक रूप से चुनाव करना पड़े। तुम्हें तय करना पड़े। और मैं मानता हूं कि तुम्हें रुकना है तो रुको, हर्जा नहीं है। लेकिन यह भी चुनाव करके रुको! यह भी तुम चुनाव करके रुको कि मैं रुकता हूं। नहीं शीतलता में मैं आना चाहता हूं। मुझे धूप चाहिए, मुझे पसीना चाहिए। मैं नहीं कूदना चाहता हूं, मैं यहीं रुकूंगा। यह तुम चुनाव करके रुको। तो मैं मानता हूं कि तो भी तुम्हारा विकास हुआ। तुमने एक निर्णय तो लिया।
लेकिन हमारी अजीब हालत है। हम कहते हैं, नहीं, कूदना तो है सागर में, जाना तो है शीतलता में। लेकिन क्या करें, पसीना बह रहा है, धूप में खड़े हैं, कूद नहीं सकते अभी। कूदना तो चाहते हैं, छलांग तो लेनी है। लेकिन जरा रुकें, इतनी जल्दी कैसे कर सकते हैं! कल करेंगे, परसों करेंगे। तब तुम्हारा विकास नहीं होता, धीरे-धीरे तुम जड़ हो जाते हो इसी जगह में। इस पसीने के भी आदी हो जाते हो, इस धूप के भी आदी हो जाते हो और इस बकवास के भी आदी हो जाते हो कि कूदना तो जरूर है, लेकिन कल कूदेंगे। कल भी तुम यही कहोगे कि कूदना तो जरूर है, कल कूदेंगे। फिर तुम इसके आदी हो जाओगे। फिर तुम यही कहते रहोगे और प्रकृति के सब नियम प्रतीक्षा करेंगे। सूरज धूप देता रहेगा। कहता है, स्वागत है तुम्हारा। धूप लेनी है मजे से लो। हम पसीना गिराते रहेंगे। सागर बुलाता रहेगा कि मौज तुम्हारी, आना हो तो आ जाओ, शीतलता तैयार है। जंपिंग बोर्ड कहता रहेगा, हम उछलने को तैयार हैं, लेकिन तुम चुनाव तो करो, उछलो। बस ऐसी स्थिति है।
मैं मानता हूं कि नुकसान इससे ज्यादा नहीं है कि तुम दुख झेल रहे हो। नुकसान इससे ज्यादा है कि तुम दुख भी निर्णयपूर्वक नहीं झेल रहे हो। निर्णयपूर्वक झेलो--डिसीसिवली--यह भी तुम्हारा डिसीजन होना चाहिए। अगर मुझे चोरी करनी है तो मैं डिसीसिवली चोर होकर करूंगा। मैं कहूंगा कि मुझे चोर ही होना है। और मैं सब साधुओं को कह दूंगा कि अपनी बकवास बंद रखो। तुम्हारी बात मेरे किसी काम की नहीं है। मेरे किसी मतलब की नहीं है तुम्हारी बातचीत। तुम्हें साधु होना है, तुम साधु होओ। मैं चोर होने का निर्णय किया हूं।
तो ध्यान रहे, जो साधु बिना निर्णय के साधु हो गया है, उसके मुकाबले जो चोर निर्णयपूर्वक चोर है, वह श्रेष्ठतर जीवन-स्थिति को उपलब्ध हो जाएगा। क्योंकि निर्णय उसकी कांशसनेस को बढ़ाता है, डिसीजन उसके व्यक्तित्व को वजन देता है, डिसीजन उसकी रिस्पांसिबिलिटी बढ़ाता है। जब वह निर्णय लेता है तो दायित्व बनता है। जब वह निर्णय लेता है तो वह स्वयं निर्णायक होने की वजह से, स्वयं का निर्णय और चुनाव होने की वजह से, संकल्प पैदा होता है। और जब संकल्प पैदा होता है तो चेतना जगती है, सोई हुई नहीं रह सकती। जब तुम निर्णय लोगे तो मूर्च्छा टूटेगी। क्योंकि निर्णय मूर्च्छित के साथ जुड़ नहीं सकता। जब तुम निर्णय न लोगे, ड्रिफ्ट होते रहोगे, ऐसे ही बहते रहोगे इधर-उधर कि जहां ले जाएं धक्के समाज के--बाप एक स्कूल में भेज दे, तो वहां पढ़ना है; मां एक दफ्तर में नौकरी करवा दे, तो वहां नौकरी करनी है; पत्नी शीर्षासन लगाने को कह दे, तो शीर्षासन करना है। बस, फिर बच्चे तुमको घेर लेंगे, और तुम घिरते चले जाओगे। पूरी तरह चारों तरफ के धक्के हैं, वह तुम खाते रहना और इनडिसीसिव...तो तुम्हारी जिंदगी में मूर्च्छा ही मूर्च्छा घनी हो जाएगी।
निर्णय लेना! गलत के लिए ही सही, तो कोई हर्जा नहीं है। मेरी दृष्टि में एक ही गलती है, निर्णय न लेना। और मेरी दृष्टि में एक ही शुभ है, निर्णायक होना। तो तुम निर्णय लेना। चोर होने का लेना हो, तो भी हर्जा नहीं है, मगर लेना पूरे मन से। तो तुम बहुत जल्दी चोर न रह जाओगे। क्योंकि जो पूरे मन से निर्णय ले सकता है, वह इतनी चेतना को उपलब्ध हो जाता है कि चोरी नहीं कर सकता। वह इतनी समझ को उपलब्ध हो जाता है कि चोरी उसे नासमझी मालूम होने लगती है।
लेकिन हम अगर साधु भी होते हैं तो वह भी धक्का ही है। किसी की पत्नी मर गई है, वह साधु हो गया, यह भी धक्का है। किसी का पति गुजर गया, वह साध्वी हो गई है, यह भी धक्का है। किसी का दिवाला निकल गया, कोई साधु हो गया है। किसी का बाप साधु हो रहा है और अब बेटे के लिए कोई उपाय नहीं था, उसने उसको भी दीक्षा दे दी।
इसका कोई अर्थ नहीं है, इसमें कोई प्रयोजन नहीं है। निर्णय होना चाहिए। और जो आदमी प्रतिपल निर्णय लेकर जी रहा है, चेतना उसकी प्रतिपल बढ़ती रहेगी। और छोटी-छोटी चीजों में निर्णय लेना और अपने निर्णय पर रुकना सीखना। बहुत छोटे निर्णय में...।
एक छोटी-सी बात, फिर आखिरी बात करें। गुरजिएफ एक छोटी-सी प्रक्रिया करवाता था। बड़ी छोटी-सी प्रक्रिया थी। लेकिन चेतना को बढ़ाने में बड़ी अदभुत सिद्ध होती थी। उस प्रक्रिया का नाम था स्टाप एक्सरसाइज। जैसे हम यहां इतने लोग बैठे हैं, और गुरजिएफ यहां बोलता रहेगा और बीच में एकदम से कहेगा, स्टाप! उसका मतलब यह कि अब जो जहां जैसा है, वैसा ही रुक जाए। अगर तुम्हारी आंख ऐसी थी, तो ऐसी ही रुक जाए। अगर तुम्हारा हाथ ऐसा था, तो ऐसा ही रुक जाए। अगर किसी की गर्दन ऐसी थी, तो वह ऐसी ही रह जाए। आप यहां सब मूर्तियां हो जाएं। और वह देखता रहेगा। कोई जरा भी हिला, तो वह कहेगा, तुम्हारा संकल्प बड़ा कमजोर है। इतना-सा भी तुम संकल्प नहीं साध पाते कि इतनी देर ऐसे ही रह जाओ।
एक दिन ऐसा हुआ कि वह तिफलिस में कुछ साधकों को लेकर प्रयोग कर रहा था। गांव के बाहर एक तंबू में ठहरा हुआ था। और तंबू के पास से एक नहर बहती थी। नहर अभी सूखी थी, उसमें पानी अभी चला नहीं था। तीन साधक नहर पार कर रहे थे। अचानक वह तंबू के भीतर से चिल्लाया, स्टाप! तो वे तीनों नहर में खड़े हो गए। फिर किसी ने नहर का पानी खोल दिया। अब नहर में पानी आया। गुरजिएफ तंबू के भीतर है; साधक नहर में हैं। जब तक पानी कमर तक था, तब तक साधकों ने हिम्मत बांधी। जब कमर के ऊपर बढ़ने लगा, तो साधकों ने कहा, यह तो मौत हो गई। बोल भी सकते नहीं, क्योंकि चुप हैं, स्टाप रहना है। उसमें बोल सकते नहीं; बोले तो स्टाप टूट जाए। गुरजिएफ तंबू के भीतर है, उसको कुछ पता नहीं कि नहर खुल गई है। उसे शायद यह भी पता नहीं कि कोई नहर में भी है। अब क्या करना! फिर भी गले तक उन्होंने हिम्मत रखी। फिर जब गले के ऊपर पानी बढ़ने लगा, तो एक ने कहा कि यह तो नासमझी है। वह छलांग लगाकर बाहर हो गया। दूसरे ने अभी भी हिम्मत रखी। उसने सोचा कि शायद वह छोड़ दे स्टाप एक्सरसाइज कि खतम करो। तो उसने मुंह तक, नाक तक प्रतीक्षा की; फिर उसने सोचा कि अब खतरा हुआ जाता है। वह भी छलांग लगाकर बाहर हो गया। तीसरा युवक खड़ा ही रहा। पानी उसके सिर पर से बह गया।
गुरजिएफ तंबू से भागा हुआ बाहर आया, कूदा, उस आदमी को बाहर निकाला। और उस आदमी से पूछा, तेरे भीतर क्या हुआ? उसने कहा, जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी वह हो गया। लेकिन हुआ तब जब मैं निर्णय पर अटल रहा। जब ऊपर मेरे सिर पर से पानी बहा, उस वक्त मैंने जिस चेतना को उपलब्ध कर लिया, बस वह परम है। अब मुझे कुछ और सीखना नहीं है। क्योंकि निर्णय डिसीसिव हो गया। आखिरी क्षण मौत के भी मुकाबले उसने निर्णय को कायम रखा।
तो गुरजिएफ ने कहा, यह सब आयोजित था। नहर मैंने खुलवाई थी और देखता था कि हाथ-पैर में ही स्टाप सीखे हो करना कि कुछ और भी कर सकते हो। उन दो को फौरन भगा दिया उसने कि तुम भाग जाओ। यहां लौटकर मत देखना, लौटकर देखना ही मत। तुम्हारा यहां क्या काम है?
संकल्प की जितनी गहरी चोट, निर्णय का जितना गहरा भाव, उतनी चेतना पूर्ण हो जाती है। अगर तुम पूर्ण संकल्प कर सको एक क्षण के लिए भी, तो तुम उसी क्षण पूर्ण चेतना को उपलब्ध हो जाओगे। सब तैयारी उस पूर्ण चेतना की है और उस पूर्ण संकल्प की तैयारी है।
और इसलिए मैं मानता हूं कि चुनाव है, यह अच्छा है। अगर परमात्मा लोगों को गुड्डे-गुड्डियों की तरह नचा रहा है--कि किसी को पापी बना रहा है, किसी को पुण्यात्मा बना रहा है--तो सब फिजूल हो जाता है मामला, एकदम फिजूल हो जाता है। और मामला तो फिजूल होता ही होता है, वह परमात्मा भी बहुत नासमझ सिद्ध होता है कि यह क्या पागलपन कर रहा है? अगर वही सब निर्णायक है और वही किसी को अच्छा बनाता है, किसी को बुरा, किसी को राम, किसी को रावण, तो इसमें अर्थ ही क्या है? सेंस क्या है? फिर तो सब नान-सेंस हो गया। सारी बात नासमझी की हो गई। इसमें कोई अर्थ ही नहीं रहा।
नहीं, निर्णायक व्यक्ति है। कोई ऊपर से तुम पर थोप नहीं रहा है। भीतर से तुम्हारे निर्णय के जागने के क्षण हैं। इसलिए जो आदमी साधक है, वह चौबीस घंटे इस खोज में रहेगा कि कब मैं छोटे-मोटे भी निर्णय ले सकूं। छोटे-मोटे सही, इससे कोई सवाल नहीं है। छोटे-मोटे निर्णय, बहुत छोटे-से निर्णय की तलाश में रहना चाहिए। चौबीस घंटे सुबह से उठकर इस फिक्र में रहो कि कब मैं कोई निर्णय कर सकूं। और जब भी तुम्हें कोई छोटा-सा भी...दिन भर मौके हैं, हर बात के मौके हैं, हर क्षण मौके हैं तुम्हें, अगर तुम प्रतिपल निर्णय का उपयोग करते रहो, तो तुम कुछ ही दिन में पाओगे कि तुम्हारे भीतर तीर की तरह एक चेतना बढ़नी शुरू हो गई है। वह रोज बढ़ती जा रही है, वह रोज स्पीड पकड़ती जा रही है, उसमें गति आती जा रही है।
और यह बहुत छोटी-छोटी चीजों से। जिनको हम त्याग, और-और न मालूम कहां-कहां के नासमझी के शब्द दिए हैं, वे सब नासमझी के हैं। उनकी सार्थकता अगर कहीं थी कभी और किसी ने उनको सार्थक रूप से प्रयोगा था, तो उनकी सार्थकता संकल्प में थी। एक आदमी ने तय किया कि आज खाना नहीं खाएंगे। इसका जो मूल्य है, वह खाना नहीं खाने में उतना नहीं है, जितना इसके संकल्प में है। लेकिन अगर इसने मन में भी एक दफा खाना खा लिया, तो बात खतम हो गई, बेकार हो गया सब मामला। खाना नहीं खाएंगे, उसका मतलब ही यह है कि खाना नहीं ही खाएंगे, मन में भी नहीं। अगर दिन भर एक आदमी बारह घंटे भी मनपूर्वक बिना खाना खाए रह गया, तो उसने एक बड़ा संकल्प पार किया। इस खाना नहीं खाने का कोई मूल्य नहीं है, यह
तो सिर्फ खूंटी है जिस पर इसने संकल्प को टांगा। लेकिन बारह घंटे बाद इस आदमी की क्वालिटी बदल जाएगी।
और जब मैं देखता हूं कि एक आदमी वर्षों से उपवास कर रहा है, उसकी कोई क्वालिटी नहीं बदली, तो मैं जानता हूं कि वह मन में खाता रहा होगा। नहीं तो क्वालिटी तो बदलनी चाहिए थी। जिंदगी हो गई इसको खाना नहीं खाते, यह उपवास करता है, वह उपवास करता है, लेकिन इसके गुण में कहीं भी कोई अंतर नहीं पड़ा है, यह आदमी वही का वही है। ताला लगाकर जाता है और फिर लौटकर ताला हिलाकर देखता है कि बंद है या नहीं है।
एक आदमी को मैं जानता हूं। मेरे घर के सामने ही वे रहते हैं। वे उपवास करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन संकल्प के ऐसे कमजोर हैं कि मैंने उन्हें कई दफे देखा कि वे ताला लगाकर गए, दस कदम से वापस लौटे, फिर उन्होंने उसको हिलाया। तो मैंने उनसे पूछा कि यह आप क्या करते हैं! आप ही ताला लगाकर गए। उन्होंने कहा, मुझे कभी-कभी शक हो जाता है कि पता नहीं, मैंने देखा कि नहीं, जरा देख लें। तो एक दफा देखने में हर्ज क्या है! उन्होंने कहा, एक दफे लौटकर देख लेने में हर्ज क्या है! मैंने कहा, और दूसरी दफे खयाल नहीं आता कि पता नहीं मैंने एक दफा लौटकर देखा कि नहीं। उन्होंने कहा, आपको यह कैसे पता चला? आता तो है मुझे, लेकिन मैं संकोच के वश लौटता नहीं हूं। आता तो मुझे दूसरी क्या, तीसरी दफे भी खयाल आता है कि मैंने देखा कि नहीं।
अब यह एक आदमी है। अब यह उपवास कर रहा है, यह सब कर रहा है, लेकिन इसे पता ही नहीं कि उपवास का मतलब क्या था। उसका मतलब इतना ही था कि एक डिसीसिवनेस आ जाए, एक निर्णायक शक्ति आ जाए। आदमी निर्णय ले सके और लौटे न। और जो आदमी भी ऐसा निर्णय ले सकता है जो प्वाइंट आफ नो रिटर्न सिद्ध हो, जिससे लौटना नहीं होता, उस आदमी की जिंदगी में कुछ भी नहीं बचता जो सोया हुआ रह जाए, जाग ही जाता है।

शेष कल!

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