MEDITATION

Main Mrityu Sikhata Hun 04

Fourth Discourse from the series of 15 discourses - Main Mrityu Sikhata Hun by Osho.
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मेरे प्रिय आत्मन्‌!
कल रात की चर्चा के संबंध में कुछ प्रश्न पूछे गए हैं।

एक मित्र ने पूछा है, भगवान, होश से मरा तो जा सकता है, लेकिन होश से जन्मा कैसे जा सकता है?
असल में मृत्यु और जन्म दो घटनाएं नहीं हैं, एक ही घटना के दो छोर हैं। जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। और अगर सिक्के का एक पहलू हाथ में आ जाए, तो दूसरा पहलू अपने आप हाथ में आ जाएगा। ऐसा नहीं होता कि सिक्के का एक पहलू मेरे हाथ में हो, तो दूसरे को कैसे हाथ में लूं। वह दूसरा अपने आप हाथ में आ जाता है। मृत्यु और जन्म एक ही घटना के दो छोर हैं। मृत्यु अगर होशपूर्ण हो जाए, तो जन्म अनिवार्य रूप से होशपूर्ण हो जाता है। मृत्यु यदि बेहोश हो, तो जन्म भी बेहोश होता है। अगर कोई मरते क्षण में होश से भरा रहे, तो अपने नए जन्म के क्षण में भी पूरे होश से भरा रहता है। मरते क्षण में बेहोश हो, तो नये जन्म के क्षण में भी बेहोश होता है।
हम सब बेहोश ही मरते हैं और बेहोश ही जन्मते हैं, इसलिए हमें पिछले जन्मों का कोई स्मरण नहीं रह जाता। लेकिन पिछले जन्मों की पूरी स्मृति हमारे मन के किसी कोने में सदा उपस्थित रहती है। और यदि हम चाहें, तो इस स्मृति को जगाया जा सकता है।
दूसरी बात, जन्म के संबंध में सीधा कुछ भी नहीं किया जा सकता। जो कुछ भी किया जा सकता है, वह मृत्यु के संबंध में ही किया जा सकता है। क्योंकि मर जाने के बाद कुछ भी करना संभव नहीं है। मरने के पहले ही कुछ भी किया जा सकता है। अब एक व्यक्ति बेहोश मर गया, तो यह बेहोश व्यक्ति अब जन्मने के पहले तो कुछ भी नहीं कर सकता है। कोई उपाय नहीं है। यह बेहोश ही रहेगा।
इसलिए जन्म तो अगर आप बेहोश मरे हैं, तो बेहोशी में ही लेना पड़ेगा। जो कुछ भी किया जा सकता है, वह मृत्यु के संबंध में किया जा सकता है। क्योंकि मृत्यु के पहले हमें बहुत मौका है, एक पूरे जीवन का अवसर है। और इस जीवन के पूरे अवसर में जागने का प्रयास हो सकता है।
फिर अगर कोई मृत्यु की प्रतीक्षा करता रहे कि मरते वक्त जाग जाएंगे, तो वह बड़ी भूल में है। मरते वक्त नहीं जाग सकते हैं। जागने की साधना तो मरने के बहुत पहले शुरू कर देनी पड़ेगी। उसकी तो तैयारी करनी पड़ेगी। क्योंकि अगर तैयारी नहीं है, तो बेहोशी आ ही जाएगी। बेहोशी हितकर है, अगर तैयारी न हो तो।
काशी नरेश का एक आपरेशन हुआ पेट का उन्नीस सौ पंद्रह के करीब। वह पहला आपरेशन था पूरी पृथ्वी पर, जो बिना बेहोशी की दवा के किया गया। पहले तो डाक्टरों ने इनकार कर दिया। तीन अंग्रेज डाक्टर थे। उन्होंने इनकार कर दिया कि यह संभव नहीं है। क्योंकि किसी आदमी के पेट का आपरेशन हो, और दो घंटे, डेढ़ घंटे तक उसका पेट खुला रहे, बड़ा आपरेशन हो और उसे बेहोश न किया जाए, तो पूरा खतरा है। खतरा यह है कि इतनी पीड़ा हो कि वह आदमी चिल्लाने लगे, उछलने लगे, कूदने लगे, गिर पड़े। कुछ भी हो सकता है। तो राजी नहीं थे वे।
लेकिन काशी नरेश का कहना यह था कि मैं जितनी देर ध्यान में रहूं, उतनी देर कोई चिंता नहीं है; और मैं डेढ़ घंटे, दो घंटे ध्यान में रह सकूंगा। काशी नरेश दवा लेने को राजी नहीं थे बेहोशी की। वे कहते थे, मैं होश में ही आपरेशन कराना चाहता हूं। और डाक्टर होश में करने को राजी नहीं थे। क्योंकि होश में उतनी पीड़ा से गुजरना खतरनाक हो सकता है।
लेकिन और कोई रास्ता न देखकर फिर उन्होंने पहले तो प्रयोगात्मक नरेश को ध्यान में जाने को कहा और कुछ हाथ पर छुरी चलाई, ताकि वे पता लगा सकें कि जरा कंपन भी तो हाथ में नहीं होता है! लेकिन कंपन भी नहीं हुआ और दो घंटे के बाद ही नरेश कह सका कि मेरे हाथ में दर्द हो रहा है। दो घंटे तक तो कुछ पता नहीं चला। तब फिर आपरेशन किया गया।
वह पहला आपरेशन था पृथ्वी पर, जिसमें पेट पर डेढ़ घंटे तक डाक्टर काम करते रहे पेट खोलकर और किसी तरह की बेहोशी की दवा नहीं दी गई थी। नरेश पूरे होश में था।
लेकिन इतने होश में होने के लिए गहरे ध्यान की जरूरत है। इतने ध्यान की जरूरत है, जहां कि यह पूरा पता हो कि शरीर अलग है और मैं अलग हूं। इसमें रत्ती भर भी संदेह न हो। इसमें रत्ती भर भी संदेह रहा कि मैं शरीर हूं, ऐसा जरा भी खयाल रहा, तो खतरा हो सकता है।
तो मृत्यु तो बहुत बड़ा आपरेशन है, बहुत बड़ा सर्जिकल आपरेशन है। इतना बड़ा आपरेशन किसी डाक्टर ने कभी नहीं किया है जितना बड़ा मृत्यु है। क्योंकि मृत्यु में प्राणों को एक शरीर से पूरा का पूरा निकालकर दूसरे शरीर में प्रवेश करवाने का उपाय है। इतना बड़ा कोई आपरेशन नहीं हुआ है, न हो सकता है अभी। एकाध अंग हम काटते हैं, एकाध हिस्से को हम बदलते हैं। यहां तो पूरे प्राण की शक्ति को, पूरी ऊर्जा को एक शरीर से हटाकर दूसरे शरीर में प्रवेश कराना है।
तो प्रकृति ने पहले से इंतजाम कर रखा है कि आप बेहोश हो जाएं। यह हितकर है। क्योंकि उतनी पीड़ा को शायद झेला ही न जा सके। और यह भी हो सकता है कि चूंकि उतनी पीड़ा नहीं झेली जा सकती, इसलिए ही हम बेहोश हो जाते हैं।
लेकिन हितकर तो है, एक गहरे अर्थों में अहितकर भी है। क्योंकि फिर हमें स्मरण नहीं रह जाता कि पीछे क्या हुआ। और करीब-करीब हर जन्म में हम वही नासमझी दोहराए चले जाते हैं जो हमने पिछले जन्म में दोहराई होगी। यदि याद आ जाए कि पिछले जन्म में हमने क्या किया, तो शायद हम उन्हीं गड्ढों में दुबारा नहीं उतरेंगे जिनमें हम पिछले जन्म में उतरे। और अगर याद आ जाए कि हमने पिछले सारे जन्मों में क्या किया है, तो हम यही आदमी नहीं हो सकेंगे, जो हम हैं।
यह असंभव है कि हम यही आदमी हो सकें। क्योंकि हमने बहुत बार धन इकट्ठा किया है और हर बार मृत्यु ने सारे इकट्ठे धन को व्यर्थ कर दिया है, तो शायद आज धन इकट्ठे करने की उतनी पागल दौड़ हमारे भीतर न रह जाए। हमने हजार बार प्रेम किया है और सब प्रेम व्यर्थ हो गया है, तो शायद प्रेम करने और प्रेम पाने की पागल दौड़ विलीन हो जाए। हमने हजार-हजार बार महत्वाकांक्षा की है, अहंकार किया है, यश पाया है, पद पाए हैं और सब व्यर्थ हो गए हैं, सब धूल में मिल गए हैं। अगर यह स्मरण आ जाए, तो शायद आज हमारी महत्वाकांक्षा एकदम क्षीण हो जाए। हम वही आदमी नहीं हो सकते जो हम हैं। अहित यह हो जाता है कि हमें पिछले का कोई स्मरण नहीं रह जाता, इसलिए करीब-करीब एक चक्कर में आदमी घूमता रहता है। उसे पता ही नहीं कि इस चक्कर से मैं बहुत बार गुजर चुका हूं। और इस बार भी वह उसी आशा से गुजरता है, जिस आशा से पहले भी बहुत बार गुजरा है। और फिर मौत आकर सब आशाएं व्यर्थ कर देती है। फिर चक्कर शुरू हो जाएगा। कोल्हू के बैल की तरह आदमी घूमता रहता है। अहित यह है।
यह अहित से बचा जा सकता है, लेकिन उसके लिए काफी जागरूक प्रयोग चाहिए। और एकदम से मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती है, क्योंकि उतने बड़े आघात में, उतने बड़े आपरेशन में, एकदम से नहीं जागा जा सकता है। हमें धीरे-धीरे प्रयोग करने पड़ेंगे, धीरे-धीरे छोटे दुखों पर प्रयोग करने पड़ेंगे कि हम छोटे दुखों में जाग सकें। सिर में दर्द है, तभी जागरण मिट जाता है और ऐसा लगता है कि मुझे दर्द हो रहा है। ऐसा नहीं लगता कि सिर को दर्द हो रहा है। तो सिर के छोटे दर्द में प्रयोग करके सीखना पड़ेगा कि दर्द हो रहा है सिर को, मैं जान रहा हूं।
स्वामी राम अमरीका गए तो वहां के लोग उनकी बात समझने में बड़ी कठिनाई में पड़े शुरू-शुरू में। अमरीका का प्रेसिडेंट उनसे मिलने आया था तो वह भी बड़ी मुश्किल में पड़ा और उसने कहा, आप कैसी भाषा बोलते हैं? क्योंकि राम थर्ड पर्सन में बोलते थे। वे ऐसा नहीं कहते थे कि मुझे भूख लगी है। वे कहते थे कि राम को बड़ी भूख लगी है। वे ऐसा नहीं कहते थे कि मेरे सिर में दर्द हो रहा है। वे कहते थे कि राम के सिर में बड़ा दर्द हो रहा है। तो पहले तो लोग बड़ी मुश्किल में पड़े कि वे कह क्या रहे हैं। वे कहते कि रात राम को बड़ी सर्दी लगती रही। तो कोई उनसे पूछता कि किसकी आप बात कर रहे हैं? किसके संबंध में कह रहे हैं? तो वे कहते, राम के संबंध में। वे कहते, कौन राम? तो वे कहते, यह राम। इसको रात बड़ी सर्दी लगती रही और हम बड़े हंसते रहे कि देखो राम, कैसी सर्दी झेल रहे हो! और वे कहते कि रास्ते पर राम जा रहे थे, कुछ लोग गालियां देने लगे, तो हम खूब हंसने लगे कि देखो राम, कैसी गालियां पड़ीं! मान खोजने निकलोगे तो अपमान होगा ही। तो लोग कहते, लेकिन आप बात किसकी कर रहे हैं? किसके संबंध में कह रहे हैं? कौन राम? तो वे कहते, यह राम।
छोटे-छोटे जीवन के दुखों से प्रयोग शुरू करना पड़ेगा। जीवन में रोज छोटे दुख आते हैं, रोज प्रतिपल वे खड़े हैं। और दुख ही क्यों, सुख से भी प्रयोग करना पड़ेगा। क्योंकि दुख में जागना उतना कठिन नहीं है, जितना सुख में जागना कठिन है। यह अनुभव करना बहुत कठिन नहीं है कि सिर अलग है और उसमें दर्द हो रहा है। लेकिन यह अनुभव करना और भी कठिन है कि शरीर अलग है और स्वास्थ्य का जो रस आ रहा है, वह भी अलग है, वह भी मैं नहीं हूं। सुख में दूर होना और भी कठिन है, क्योंकि सुख में हम पास होना चाहते हैं, और पास होना चाहते हैं। दुख में तो हम दूर होना ही चाहते हैं। यानी दुख में तो यह पक्का पता चल जाए कि दुख दूर है, तो यह हमारी इच्छा भी है कि दुख दूर हो। तो यह हम को पता चल जाए तो दुख से हमारा छुटकारा हो जाए।
तो दुख में भी जागने के प्रयोग करने पड़ेंगे, सुख में भी जागने के प्रयोग करने पड़ेंगे। और इन प्रयोगों में जो उतरता है, वह कई बार स्वेच्छा से दुख वरण करके भी प्रयोग कर सकता है। सारी तपश्चर्या का मूल रहस्य इतना ही है। वह स्वेच्छा से दुख को वरण करके किया गया प्रयोग है।
जैसे एक आदमी उपवास कर रहा है, भूखा खड़ा है। वह यह जानने की कोशिश कर रहा है भूख के उस प्रयोग में...।
आमतौर से जो लोग उपवास करते हैं, उनको खयाल भी नहीं है कि क्या कर रहे हैं वे। वे सिर्फ भूखे हैं; और कल खाना खाना है, उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन उपवास का जो मौलिक प्रयोग है, वह यह है कि भूख है और भूख मुझसे दूर है, इसका अनुभव करना है, मैं भूखा नहीं हूं। तो भूख को अपने हाथ से पैदा करके यह जानने की भीतर चेष्टा चल रही है कि भूख वहां है, राम को भूख लगी है। मैं भूखा नहीं हूं; मैं जान रहा हूं कि भूख लगी है। और इसे जानना है, जानना है, जानना है...और उस घड़ी पर पहुंच जाना है, जहां भूख और मेरे बीच एक फासला हो, मैं भूखा न रह जाऊं। भूख में भी मैं भूखा न रह जाऊं। शरीर भूखा रहे और मैं जानूं। मैं सिर्फ जानने वाला रह जाऊं। तब तो उपवास का बड़ा गहरा अर्थ हो जाता है। उसका अर्थ सिर्फ भूखा रहना नहीं है।
और आमतौर से जो आदमी उपवास करते हैं, वे चौबीस घंटे यह दोहराते रहते हैं कि मैं भूखा हूं, आज खाना नहीं खाया है। और कल खाना खाने की योजना में चित्त रमा रहता है। और कल क्या खाना है, उसकी भी योजना बनती रहती है। तब उपवास व्यर्थ हो गया, तब वह सिर्फ अनशन रहा। अनशन और उपवास का यही फर्क है। अनशन का मतलब है, न खाना। उपवास का मतलब है, और निकट, और निकट निवास करना। किसके? उपवास का मतलब है: और निकट, और निकट निवास करना। किसके निकट निवास करना? अपने! शरीर से फासले पर, स्वयं के करीब आना। उपवास का मतलब भी यही है। उपवास के मतलब से...उपवास में कहीं भी भूखा रहने का सवाल ही नहीं है। उपवास शब्द में भी भूखा रहने का कोई प्रश्न नहीं है। उपवास का मतलब है: आवास--निकट, और निकट। किसके? किसके पास? अपने पास। अपने पास रहना और शरीर से दूर। तब फिर यह भी हो सकता है कि एक आदमी भोजन किए हुए भी उपवासा हो। क्योंकि अगर भोजन करते हुए भी वह जानता हो कि भोजन दूर हो रहा है और मैं कहीं और हूं, तो उपवास है; और यह भी हो सकता है कि एक आदमी भोजन न किए हुए भी उपवासा न हो, क्योंकि वह जानता हो कि मैं भूखा हूं, मैं भूखा मरा जा रहा हूं। उपवास तो एक मनोवैज्ञानिक बोध है, भूख से भिन्नता का।
तो ऐसे और दुख भी पैदा किए जा सकते हैं स्वेच्छा से भी। लेकिन स्वेच्छा से पैदा किए गए दुख बहुत गहरा प्रयोग हैं। एक आदमी कांटे पर भी लेट सकता है और सिर्फ यह जानने के लिए कि कांटे मुझे नहीं चुभ रहे हैं, कांटे कहीं और छिदे हुए हैं और मैं कहीं और हूं। मैं कहीं और हूं, यह अनुभव करने के लिए दुख आमंत्रित भी किया जा सकता है। लेकिन अभी तो अन-आमंत्रित दुख ही काफी हैं। उन्हें और आमंत्रित करने जाने की कोई जरूरत नहीं है। दुख हमेशा ही बहुत हैं। अभी उनसे ही प्रयोग शुरू करना चाहिए। दुख ऐसे ही चले आते हैं। आए हुए दुख में भी अगर यह बोध रखा जा सके कि मैं भिन्न हूं, मैं दूर हूं, तो दुख साधना बन जाता है।
आए हुए सुख में भी साधना करनी पड़ेगी। क्योंकि दुख में तो हो सकता है हम अपने को धोखा भी दे दें। क्योंकि मन मानने का करता है कि दुख मैं नहीं हूं। लेकिन सुख को तो मानने का करता है कि मैं सुख हूं। इसलिए सुख में साधना और मुश्किल हो जाती है। असल में सुख से दूर अनुभव करना सबसे बड़ा दुख है। सुख से अपने को दूर अनुभव करना बहुत दुख है। क्योंकि वहां तो मन होता है कि डूब जाओ पूरे और भूल जाओ यह कि मैं अलग हूं। सुख डुबाता है, दुख तो वैसे ही तोड़ता है और अलग करता है। दुख को तो हम मजबूरी में ही साथ है, ऐसा मान पाते हैं, लेकिन सुख को तो हम पूरे प्राणों से अंगीकार कर लेना चाहते हैं।
आए हुए दुख में जागें, आए हुए सुख में जागें, और कभी-कभी प्रयोग के लिए आमंत्रित दुख में भी जागें। क्योंकि आमंत्रित दुख में थोड़ा फर्क है। क्योंकि जिसे हम बुलाते हैं, जिसे हम न्योता देते हैं, उसके साथ हम पूरे कभी नहीं डूब सकते। क्योंकि वह बुलाया हुआ है, निमंत्रित है, यह बोध भी फासला पैदा करता है। अतिथि कभी भी हम नहीं हो सकते। घर में आया हुआ अतिथि हमसे अलग ही है। तो जब हम दुख को अतिथि की तरह बुला लेते हैं कभी, तब वह अलग ही होता है, क्योंकि हमने उसे बुलाया है।
रास्ते पर चलते वक्त पैर में कांटा लग गया है, यह एक दुर्घटना है और दुख डुबा लेगा। लेकिन आप कांटा लाए हैं और पैर में चुभाया है और जाना है प्रतिपल कि मैं कांटा चुभा रहा हूं और देख रहा हूं कि दुख कहां है। इस घटना में थोड़ा फर्क है। लेकिन नहीं कहता हूं कि आप अभी दुख आमंत्रित करने जाएं, दुख वैसे ही बहुत हैं। उनको जीएं और उनके बीच जागें। और फिर सुख के लिए जीएं और उसके बीच जागें। तब कभी आपको लग सकता है कि कभी किसी दुख को बुलाकर भी देखें कि कितनी दूर हम खड़े रह सकते हैं।
और ध्यान रहे, दुख को बुलाना एक बहुत महत्वपूर्ण प्रयोग है। क्योंकि सुख को सब बुलाना चाहते हैं, दुख को कोई भी बुलाना नहीं चाहता। और मजे की बात यह है कि जिस दुख को हम नहीं बुलाना चाहते हैं, वह आता है; और जिस दुख को हम बुलाते हैं, वह आ ही नहीं पाता है। आ भी जाता है, तो द्वार के बाहर ही खड़ा रह जाता है। जिस सुख को हम बुलाते हैं, वह कभी नहीं आता; और जिस सुख को हम नहीं बुलाते हैं, वह आ जाता है। तो दुख को जब बुलाने की क्षमता कोई जुटा लेता है, तब उसका मतलब यह है कि वह इतना सुखी हो गया है कि अब दुख बुला सकता है। वह इतने आनंद में जी रहा है कि अब दुख बुलाने में कोई भी कठिनाई नहीं है। अब दुखों को कहा जा सकता है कि आओ और ठहर जाओ।
पर वह गहरे प्रयोग की बात है। उसके पहले तो जो दुख आ रहे हैं, उनमें ही जागने का प्रयोग करना चाहिए। और अगर दुखों के प्रति हम जागते चले जाएं, तो वह क्षमता आ जाएगी मृत्यु के क्षण तक कि हम मृत्यु में भी जाग सकेंगे और प्रकृति भी हमें छूट दे देगी कि जागे रहो। क्योंकि प्रकृति ने भी अनुभव कर लिया है कि यह व्यक्ति दुखों में जाग सकता है, तो मृत्यु में भी जाग सकता है। लेकिन अनायास मृत्यु में कोई भी नहीं जाग सकता है।
अभी एक आदमी मरा, पी.डी.आसपेंस्की, रूस का एक बड़ा गणितज्ञ था। और मृत्यु के संबंध में इस सदी में सबसे ज्यादा प्रयोग उसी आदमी ने किए। मरने के समय, जब कि वह बुरी तरह बीमार है और चिकित्सकों ने कहा है कि वह बिस्तर से न उठे, तब वह तीन महीने तक इतना श्रम उसने किया है कि जो अकल्पनीय है। रात-रात भर सोता नहीं है, सफर करता है, चलता रहता है, दौड़ता रहता है, भागता रहता है। और चिकित्सक हैरान हैं। वे कहते हैं, उसे पूर्ण आराम करना चाहिए। उसने अपने सारे निकट मित्रों को बुला लिया है और उसने सब बातचीत बंद कर दी है, लेकिन वह श्रम में लगा हुआ है। और जो मित्र उसके साथ मरते समय तीन महीने रहे हैं, उनका कहना यह है कि हमने अपनी आंख के सामने पहली दफे मृत्यु को जागे हुए किसी आदमी को लेते हुए देखा। और जब उससे उन्होंने कहा कि चिकित्सक कहते हैं आराम करो, तुम आराम क्यों नहीं कर रहे हो? तो उसने कहा कि मैं सारे दुख देख लेना चाहता हूं। कहीं ऐसा न हो जाए कि मरते वक्त दुख इतना बड़ा हो कि मैं सो जाऊं, बेहोश हो जाऊं। तो मैं उसके पहले वे सब दुख देख लेना चाहता हूं जो कि वह क्षमता पैदा कर दें, वह स्टेमिना दे दें, वह ऊर्जा दे दें कि मृत्यु के वक्त मैं बेहोश न मर जाऊं।
तो वह सब तरह के दुख उसने तीन महीने तक झेलने की कोशिश की है। उसके मित्रों ने लिखा है कि हम जो पूर्ण स्वस्थ थे, हम उसके साथ थक जाते थे, लेकिन उसे हमने थकते नहीं देखा। और चिकित्सक कह रहे हैं कि उसको बिलकुल ही विश्राम करना चाहिए, नहीं तो बहुत नुकसान हो जाएगा। जिस रात वह मरा है, पूरी रात टहलता रहा है। एक पैर उठाने की ताकत नहीं है। डाक्टर उसकी जांच करके कहते हैं कि एक पैर उठाने की ताकत तुममें नहीं है, लेकिन वह रात भर चलता रहा है। वह कहता है कि मैं चलते-चलते ही मरना चाहता हूं। कहीं बैठे हुए मरूं और बेहोश न हो जाऊं, कहीं सोया हुआ मरूं और बेहोश न हो जाऊं। और वह चलते-चलते-चलते उसने खबर दी है अपने मित्रों को कि बस इतनी देर और। ये दस कदम मैं और उठा पाऊंगा, बस। डूबा जा रहा है सब। लेकिन आखिरी कदम भी मैं उठाऊंगा, क्योंकि मैं आखिरी क्षण तक कुछ करते ही रहना चाहता हूं ताकि मैं पूरा जागा रहूं। ऐसा न हो कि मैं विश्राम में सो जाऊं।
वह आखिरी कदम चलते हुए मरा है। कम ही लोग चलते हुए मरे हैं जमीन पर। वह चलता हुआ ही गिरा है। यानी वह गिरा ही तब है, जब मौत आ गई। और आखिरी कदम के पहले उसने कहा है कि बस अब यह आखिरी कदम है और मैं अब गिर जाऊंगा। लेकिन मैं तुम्हें कहे जाता हूं कि शरीर छूट गया है बहुत पहले। अब तुम देखोगे कि शरीर छूट रहा है, लेकिन मैं बहुत देर से देख रहा हूं कि शरीर छूट गया है और मैं हूं। संबंध टूट गए हैं और मैं भीतर हूं। इसलिए अब शरीर ही गिरेगा, मेरे गिरने का कोई उपाय नहीं है। और मरते क्षण में उसकी आंखों में जो चमक, उसमें जो शांति, उसमें जो आनंद, उसमें जो दूसरी दुनिया के द्वार पर खड़े हो जाने का प्रकाश है, वह उसके मित्रों ने अनुभव किया है।
लेकिन इसकी तैयारी करनी पड़ेगी। और इसकी निरंतर तैयारी करनी पड़ेगी। और अगर यह तैयारी पूरी हो जाती है, तो मृत्यु की घटना अदभुत घटना है। उससे कीमती कोई घटना नहीं है। क्योंकि उसमें जो हम जान सकते हैं, वह हम कभी और नहीं जान सकते। तब मृत्यु मित्र मालूम होने लगती है। क्योंकि मृत्यु की घटना में ही, हम जीवन हैं, इसका अनुभव हो सकता है, उसके पहले अनुभव नहीं हो सकता। ध्यान रहे, जितनी घनी अंधेरी रात हो, तारे उतने ही चमककर दिखाई पड़ते हैं। और जितने काले बादल हों, बिजली की चमक चांदी बन जाती है। जब मृत्यु पूरी तरह चारों तरफ खड़ी हो जाती है, तो वह जो जीवन का बिंदु है, वह पूरी चमक में प्रकट होता है, उसके पहले कभी प्रकट नहीं होता। मृत्यु अंधेरा बन जाती है चारों तरफ और बीच में वह जो जीवन का बिंदु है, जिसे हम आत्मा कहें, वह पूरे प्रकाश में चमक उठता है। चारों तरफ घिरा अंधेरा उसे चमकाने का काम करता है। लेकिन हम उस वक्त बेहोश हो जाते हैं। आत्मा को जानने का जो क्षण हो सकता था मृत्यु, उस वक्त हम बेहोश हो जाते हैं।
इसकी तैयारी करनी पड़ेगी। ध्यान इसकी तैयारी है। ध्यान, धीरे-धीरे कैसे मरा जाता है स्वेच्छा से, उसका प्रयोग है। कैसे हम भीतर सरकते हैं और कैसे शरीर को छोड़ते चले जाते हैं, उसका प्रयोग है। और ध्यान की तैयारी चले, चलती रहे, तो मृत्यु के क्षण में पूर्ण ध्यान उपलब्ध हो जाएगा। और यह जो मृत्यु होगी जागे हुए, ऐसे व्यक्ति की आत्मा फिर जागी हुई ही जन्म लेती है। और तब उसका पहला दिन जन्म के बाद का, अज्ञान का नहीं होता, तब ज्ञान का ही होता है। तब प्रतिपल, गर्भ में भी, वह पूरे होश से भरा हुआ है। और एक बार जो जागकर मरा है, उसका फिर एक ही जन्म हो सकता है। उसके फिर ज्यादा जन्म नहीं हो सकते। जागकर मरे हुए व्यक्ति का एक ही जन्म और होता है, फिर दुबारा कोई जन्म नहीं हो सकता। क्योंकि जिसे इतना अनुभव हो गया कि मृत्यु क्या है, जन्म क्या है और जीवन क्या है, उसके लिए परम मुक्ति उपलब्ध हो जाती है।
यह जो एक जन्म है जागे हुए व्यक्ति का, ऐसे ही व्यक्तियों को हम अवतार, तीर्थंकर, बुद्ध, जीसस और कृष्ण कहते रहे हैं, ऐसे ही लोगों को। ऐसे लोगों को हम आदमी से अलग गिनते रहे हैं। उसका कोई और कारण नहीं है। उसका कुल इतना ही कारण है कि वे निश्चित हमसे बहुत अलग हैं। फर्क इतना ही है कि हम सोए हुए हैं, वे जागे हुए हैं। और यह उनकी अंतिम यात्रा है इस पृथ्वी पर। और इसलिए कुछ उनमें है, जो हममें नहीं है; और कुछ उनमें है, जो हम तक पहुंचाने की वे अथक चेष्टा करते रहेंगे। फर्क उनमें और हममें इतना ही है कि उनकी पिछली मृत्यु और यह जन्म जाग्रत हुआ है, इसलिए यह पूरा जीवन जागा हुआ है।
तिब्बत में बारदो करके एक छोटा-सा ध्यान का प्रयोग है। कीमती प्रयोग है। वह मरते क्षण ही करवाया जाता है। जब कोई मर रहा होता है, तब उसके चारों तरफ, जो जानते हैं, वे इकट्ठे होकर बारदो करवाते हैं। लेकिन बारदो भी उसको ही करवाया जा सकता है, जिसने जीवन में ध्यान किया हो। जिसने ध्यान न किया हो, उसे बारदो नहीं करवाया जा सकता। जैसे ही कोई व्यक्ति मरता है, तो बारदो के प्रयोग में उसे पूरा जागने के लिए बाहर से सूचनाएं दी जाती हैं कि वह जागा रहे। और उसे यह सब बताया जाता है कि अब क्या-क्या होगा, वह देखता रहे। क्योंकि बहुत बार ऐसी घटनाएं घटती हैं कि जिन्हें वह समझ ही नहीं सकता। नई घटनाओं को एकदम से समझा भी नहीं जा सकता।
मरने के बाद अगर कोई आदमी जागा रहे, तो पहले तो बहुत देर तक उसे पता ही नहीं चलेगा कि मैं मर गया हूं। उसे तो पता ही तब चलेगा जब उसकी लाश लोग उठाने लगेंगे और उसको मरघट पर जलाने लगेंगे, तब उसे पक्का पता चलेगा कि मैं मर गया हूं। क्योंकि भीतर तो कुछ मरता ही नहीं, सिर्फ एक फासला हो जाता है। लेकिन फासले का जिंदगी में कभी अनुभव नहीं किया। वह अनुभव इतना नया है कि उसको समझने की कोई पुरानी परिभाषा नहीं है उसके पास। तो उसे सिर्फ इतना ही लगता है कि कुछ अलग-अलग हो गया है। लेकिन कुछ मर गया है, यह उसकी समझ में तभी आता है, जब चारों तरफ लोग रोने-चिल्लाने लगते हैं और उसकी लाश के आस-पास गिरने लगते हैं और उसको उठाकर ले जाने लगते हैं। लाश को जल्दी से मरघट पहुंचा देने का कारण है। लाश को जितनी जल्दी हो सके दफना देने का, आग लगा देने का कारण है। उतनी ही जल्दी उस आत्मा को पक्का पता चल जाए कि शरीर गया,
जल गया। लेकिन अगर आदमी मूर्च्छित है, तो यह भी उसे पता नहीं चल पाता है। यह भी होश में जाए तो ही पता चल पाता है। अपने शरीर को जलता हुआ देखना--इसके लिए वे बारदो में सुझाव देते हैं कि अपने शरीर को ठीक से जलते हुए देख लेना, भाग मत जाना, जल्दी हट मत जाना। मरघट पर और लोग ही तुम्हें पहुंचाने न जाएं, तुम भी वहां मौजूद रहना। अपने शरीर को ठीक से जलते हुए देख लेना, ताकि अगली बार यह शरीर का मोह पकड़े न। क्योंकि जो जलता हुआ देख लिया गया हो, उसका मोह विलीन हो जाता है।
लेकिन दूसरे लोग तो देख ही लेंगे जलते हुए; वह आदमी नहीं देख पाएगा। आमतौर से हजार में नौ सौ निन्यानबे मौके पर वह बेहोश होता है, उसे पता ही नहीं होता है। और अगर कभी एक मौके पर वह होश में भी होता है तो अपने जलते हुए शरीर को देखकर भाग जाता है, हट जाता है वहां से, मरघट पर नहीं पहुंचता है, जहां सब जाते हैं। तो बारदो में वे उससे कहते हैं कि देख, इस मौके को मत छोड़ देना। अपने शरीर को जलते हुए देखना। उसे जलते हुए देख ही लेना, जो तू समझता था कि मैं हूं। उसे मिटते हुए पूरी तरह देख ही लेना। उसको भस्मीभूत होते हुए, राख में विलीन होते हुए देख ही लेना, ताकि अगले जन्म में तुझे खयाल रहे कि तू कौन है।
जैसे ही व्यक्ति मरता है, वैसे ही एक नए लोक में उसका पदार्पण होता है, जिसका हमें कोई अनुभव नहीं होता। वह लोक हमें इतना घबड़ा भी सकता है, डरा भी सकता है, भयभीत भी कर सकता है। वह लोक हमारी किसी भी अनुभूति के अनुकूल-प्रतिकूल नहीं है। उससे हमारा कोई संबंध ही नहीं है। जैसे कि हम एक व्यक्ति को बिलकुल ही अनजान देश में प्रवेश करवा दें, जहां की वह भाषा नहीं जानता है, जहां लोगों के चेहरे नहीं जानता है, जहां लोगों के ढंग नहीं जानता है, तो जैसा घबड़ा जाए, उससे भी बड़ी घबड़ाहट है। क्योंकि चाहे कैसा भी मनुष्य हो, कैसी भी भाषा बोलता हो, कैसे भी ढंग हों उसके जीने के, फिर भी वह मनुष्य है और हमारे और उसके बीच एक संबंध है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, वह शरीर की दुनिया है। उसके छूटते ही अशरीर की दुनिया शुरू होती है। और अशरीरी प्राणों का अनुभव हमें बिलकुल नहीं है। उस अशरीरी जीवन के, अशरीरी-योनि में प्रवेश करते ही हम इतने भयभीत और डरे हुए हो जा सकते हैं कि जिसका कोई हिसाब न रहे।
तो आमतौर से तो हम बेहोश गुजरते हैं, इसलिए पता नहीं होता। लेकिन होश में जो जाता है, वह बहुत मुश्किल में पड़ जाता है। तो बारदो में उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि क्या-क्या होगा, कैसा जगत होगा, कैसे व्यक्तित्व होंगे, तुम कहां प्रवेश कर गए हो। लेकिन यह प्रयोग उनको ही करवाया जा सकता है जो ध्यान के गहरे प्रयोग से गुजरते रहे हों, अन्यथा नहीं करवाया जा सकता है।
इधर मैं निरंतर सोचता हूं कि जो मित्र ध्यान के प्रयोग से गुजर रहे हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में बारदो का प्रयोग करवाया जा सके। लेकिन वह तभी करवाया जा सकता है जब वे पहले ध्यान में गहरे गुजर जाएं, अन्यथा वे सुन भी न पाएंगे। मरते क्षण में उन्हें सुनाई भी नहीं पड़ेगा कि क्या कहा जा रहा है। उन्हें कौन-सी बात बताई जा रही है, उनके खयाल में भी नहीं आएगी। उसके लिए अत्यंत शांत और शून्य चित्त होना जरूरी है, तभी वे बातें खयाल में आ सकती हैं। और जब चेतना डूबती चली जाती है, डूबती चली जाती है, विलीन होती चली जाती है, इस जगत से संबंध टूटने लगते हैं, तो इस जगत से दिए गए कोई भी संदेश अत्यंत शांत मन में ही सुने जा सकते हैं, अन्यथा नहीं सुने जा सकते।
और यह ध्यान रहे कि मृत्यु के साथ हम कुछ कर सकते हैं, जन्म के साथ कुछ भी नहीं कर सकते। लेकिन मृत्यु के साथ जो हमने किया, वह हमारे जन्म के साथ भी हो जा सकता है। हो ही जाता है। जैसे हम मरते हैं, वैसे ही हम जन्मते हैं। जागा हुआ व्यक्ति अपने गर्भ के चुनाव में भी मुक्त हो जाता है। यानी वह अंधे की तरह कुछ भी नहीं चुन लेता है, बेहोश की तरह कुछ भी नहीं चुन लेता है। जागा हुआ व्यक्ति अपने मां और पिता का वैसे ही चुनाव करता है, जैसे कि कोई समृद्ध व्यक्ति अपने रहने के मकान का चुनाव करे। लेकिन गरीब आदमी अपने रहने के मकान का चुनाव नहीं कर पाता है। चुनाव करने के लिए सामर्थ्य चाहिए। मकान खरीदने की सामर्थ्य चाहिए। गरीब आदमी अपने मकान का चुनाव नहीं करता। कहना चाहिए कि मकान ही गरीब आदमी को चुनता है। गरीब मकान गरीब आदमी को चुन लेता है। अमीर आदमी अपने मकान का निर्णय करता है कि मैं कहां रहूं, कैसा बगीचा हो, द्वार कहां हो, दरवाजा कहां हो, सूरज पूरब से आए कि पश्चिम से, हवाएं कैसी आएं, कितना खुला हो--वह सब चुनाव करता है।
जाग्रत व्यक्ति अपने गर्भ का चुनाव करता है। वह उसकी च्वाइस है। महावीर या बुद्ध जैसे व्यक्ति हर कहीं पैदा नहीं हो जाते। वे सारी संभावनाओं को देखकर ही पैदा होते हैं। कैसा शरीर मिलेगा, किस मां-बाप से, कैसी शक्ति मिलेगी, कैसी सामर्थ्य मिलेगी, कैसी सुविधा मिलेगी, क्या मिलेगा, वे वह सब देखकर पैदा होते हैं। उनके सामने चुनाव है स्पष्ट कि वे किसको चुनें, कहां जाएं। और इसलिए उनका जीवन पहले दिन से ही अपना चुना हुआ जीवन होता है। अपने चुने हुए जीवन का आनंद ही दूसरा है, क्योंकि वहां से स्वतंत्रता का प्रारंभ है। और मिले हुए जीवन का वह आनंद कभी भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक परतंत्रता है। हम ढकेल दिए गए हैं, एक धक्का दे दिया गया है; और जो भी हो गया है, वह हो गया है। उसमें हमारा कोई हाथ नहीं है।
यह जो जागरण संभव हो सके तो चुनाव बिलकुल ही किया जा सकता है। और अगर जन्म ही हमारा चुनाव हो, तो पूरा जीवन हमारा चुनाव हो जाता है। तब हम एक जीवन-मुक्त की तरह जीते हैं। जिस व्यक्ति की मृत्यु जागे हुए होती है, उसका जन्म जागा हुआ होता है, और उसका फिर जीवन मुक्त होता है। जीवन-मुक्त शब्द को हम सुनते हैं बार-बार, लेकिन हमें खयाल में नहीं होगा कि जीवन-मुक्त का क्या अर्थ है। जीवन-मुक्त का अर्थ है कि जिसका जन्म जागा हुआ हुआ हो। वही जीवन-मुक्त हो सकता है। अन्यथा मुक्ति की चेष्टा कर सकता है, अगला जीवन उसका मुक्त हो सकता है, लेकिन यह जीवन मुक्त नहीं हो पाएगा। इस जीवन के मुक्त होने के लिए पहले दिन से ही अपनी स्वतंत्रता का चुनाव होना चाहिए। और वह हम तभी कर सकते हैं, जब हमने पिछली मृत्यु के जागरण का उपाय किया हो।
अब वह तो सवाल न रहा। यह जीवन हमारे पास है। अभी मृत्यु नहीं आई है। आएगी, आना सुनिश्चित है। मृत्यु से ज्यादा सुनिश्चित कुछ भी नहीं है। सब संबंध में संदेह हो सकता है, मृत्यु के संबंध में कोई संदेह नहीं है। परमात्मा के संबंध में संदेह करने वाले लोग हैं, आत्मा के संबंध में संदेह करने वाले लोग हैं, लेकिन ऐसा आदमी आपने नहीं सुना होगा जो मृत्यु के संबंध में संदेह करता हो। वह असंदिग्ध है। वह आएगी ही। आ ही रही है। उसका आना हो ही रहा है, प्रतिपल निकट होती चली जा रही है। ये जो क्षण हमारे और उसके बीच में बचे हैं, इनका हम जागने के लिए उपयोग कर सकते हैं। ध्यान उसकी ही प्रक्रिया है। वह इन तीन दिनों में मैं आपको कोशिश करूंगा कि खयाल में आ जाए कि ध्यान उसकी ही प्रक्रिया है।

एक और मित्र ने पूछा है कि भगवान, ध्यान की विधि और जाति-स्मरण में क्या संबंध है?
जाति-स्मरण का अर्थ है, पिछले जन्मों के स्मरण की विधि। पहले जो हमारा होना हुआ है, उसके स्मरण की विधि। ध्यान का ही एक रूप है जाति-स्मरण। ध्यान का ही एक प्रयोग है। स्पेसिफिक, एक खास प्रयोग है ध्यान का। जैसे नदी है, और कोई पूछे कि नहर क्या है? तो हम कहेंगे कि नदी का ही एक विशेष प्रयोग है--सुनियोजित; नदी का ही, पर नियंत्रित, व्यवस्थित। नदी है अव्यवस्थित, अनियंत्रित। नदी भी पहुंचेगी कहीं, लेकिन पहुंचने की कोई मंजिल का पक्का नहीं है। लेकिन नहर सुनिश्चित है कि कहां पहुंचानी है।
तो ध्यान तो बड़ी नदी है। पहुंचेगी सागर तक। पहुंच ही जाएगी। परमात्मा तक पहुंचा ही देगा ध्यान। लेकिन ध्यान के और अवांतर प्रयोग भी हैं। ध्यान की छोटी-छोटी शाखाओं को नियोजित करके नहर की तरह भी बहाया जा सकता है। जाति-स्मरण उनमें एक है। ध्यान की शक्ति को हम अपने पिछले जन्मों की तरफ भी प्रवाहित कर सकते हैं। ध्यान का तो मतलब है सिर्फ अटेंशन। ध्यान का मतलब है, ‘ध्यान’। किस चीज पर ध्यान देना है, उसके बहुत प्रयोग हो सकते हैं। उसका एक प्रयोग जाति-स्मरण है, कि मेरे पिछले जन्मों की स्मृति कहीं पड़ी है।
स्मृतियां मिटतीं नहीं, ध्यान रहे। कोई स्मृति कभी नहीं मिटती है, सिर्फ स्मृति दबती है या उभरती है। दबी हुई स्मृति मिटी हुई मालूम पड़ती है। अगर मैं आपसे पूछूं कि उन्नीस सौ पचास में एक जनवरी को आपने क्या किया? तो ऐसा तो नहीं है कि आपने कुछ भी न किया होगा, लेकिन बता आप कुछ भी न पाएंगे कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या किया। एकदम खाली हो गया है एक जनवरी उन्नीस सौ पचास का दिन। खाली न रहा होगा जिस दिन बीता होगा, उस दिन भरा हुआ था। लेकिन आज खाली हो गया है। आज का दिन भी कल इसी तरह खाली हो जाएगा। दस साल बाद आज के दिन का भी कोई पता नहीं चलेगा। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास नहीं था। न इसका यह मतलब है कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को आप नहीं थे। न इसका यह मतलब है कि चूंकि आप स्मरण नहीं कर पाते हैं, इसलिए उस दिन को हम कैसे मानें। वह था और उसे जानने का भी उपाय है। ध्यान को उसकी तरफ भी ले जाया जा सकता है।
और जैसे ही ध्यान का प्रकाश उस पर पड़ेगा, आप हैरान हो जाएंगे, वह उतना ही जीवंत वापस दिखाई पड़ने लगेगा, जितना जीवंत उस दिन भी न रहा होगा। जैसे कि कोई टार्च को लेकर एक अंधेरे कमरे में आए और घुमाए। तो वह बाईं तरफ देखे, तो दाईं तरफ अंधेरा हो जाए, लेकिन दाईं तरफ मिट नहीं जाती है। वह टार्च को घुमाए और दाईं तरफ ले आए, तो दाईं तरफ फिर जीवित हो जाती है, लेकिन बाईं तरफ छिप जाती है।
ध्यान का एक फोकस है। और अगर विशेष दिशा में प्रवाहित करना हो तो टार्च की तरह प्रयोग करना पड़ता है ध्यान का। और अगर परमात्मा की तरफ ले जाना हो, तो दीये की तरह प्रयोग करना पड़ता है ध्यान का। इसको ठीक से समझ लें। दीये का कोई फोकस नहीं होता; दीया अनफोकस्ड है। दीया सिर्फ जलता है। चारों तरफ रोशनी उसकी फैल जाती है। रोशनी किसी दिशा में नहीं बहती है, बस बहती है, चारों तरफ एक-सी। दीये का कोई मोह नहीं कि यहां बहे, वहां बहे; यहां जाए, वहां जाए। इसलिए जो भी है वह दीये की रोशनी में प्रकट हो जाता है। लेकिन टार्च दीये का फोकस के रूप में प्रयोग है। उसे हम एक तरफ--सारी रोशनी को बांधकर एक तरफ बहाते हैं। इसलिए यह हो सकता है कि दीये के कमरे में जलने पर चीजें साफ दिखाई न पड़ें; दिखाई पड़ें, लेकिन साफ दिखाई न पड़ें। साफ दिखाई पड़ने के लिए दीये की रोशनी को हम एक ही जगह बांधकर डालते हैं, वह टार्च बन जाती है। तब फिर एक चीज पूरी तरह साफ दिखाई पड़ती है। लेकिन एक चीज पूरी साफ दिखाई पड़ती है, तो शेष सब चीजें दिखाई पड़नी बंद हो जाती हैं। असल में एक चीज को अगर साफ देखना हो, तो सारे ध्यान को एक ही दिशा में बहाना पड़ेगा, शेष सब तरफ अंधेरा कर लेना पड़ेगा।
तो जिसे सीधे जीवन के सत्य को ही जानना है, वह तो दीये की तरह ध्यान को विकसित करेगा। अन्य कोई प्रयोजन नहीं है उसे। और सच तो यह है कि दीये का प्रयोजन इतना ही है कि दीया अपने को ही देख ले, बस इतना ही प्रकाशित हो जाए तो काफी है। बात खतम हो गई। लेकिन अगर कोई विशेष प्रयोग करने हों, जैसे पिछले जन्मों के स्मरण का, तो फिर ध्यान को एक दिशा में प्रवाहित करना होगा। और उस दिशा में प्रवाहित करने के दो-तीन सूत्र आपसे कहता हूं। पूरे सूत्र नहीं कहता हूं, क्योंकि शायद ही किसी को प्रवाहित करने का खयाल हो। जिनको हो, वे मुझसे अलग से मिल ले सकते हैं। लेकिन दो-तीन सूत्र कहता हूं। समझ में भर बात आ जाए। उतने से आप प्रयोग न कर सकेंगे, लेकिन बात भर समझ सकेंगे। और सबके लिए प्रयोग करना शायद उचित भी नहीं है, इसलिए पूरी बात नहीं कहूंगा। क्योंकि कई बार प्रयोग आपको खतरे में उतार दे सकता है।
एक घटना मैं आपको कहूं। उससे खयाल आ जाए। एक प्रोफेसर महिला मुझसे कोई दो-तीन वर्ष तक ध्यान के संबंध में निकट में रही। उसका अति आग्रह था कि जाति-स्मरण करना है, पिछला जन्म जानना है। तो उसे मैंने जाति-स्मरण के प्रयोग करवाए। मैंने उससे बहुत कहा भी कि यह प्रयोग अभी न करो तो अच्छा है। क्योंकि ध्यान पूरा विकसित हो जाए, तब तो जाति-स्मरण के प्रयोग से कोई खतरा नहीं होता है। लेकिन पूरा विकसित न हो, तो खतरे हो सकते हैं। क्योंकि एक ही जीवन की स्मृतियों को झेलना भी बहुत बोझिल है। दो-चार जीवन की स्मृतियां एकदम से द्वार तोड़कर भीतर आ जाएं, तो आदमी पागल भी हो सकता है। और इसीलिए प्रकृति ने व्यवस्था की है कि आप भूलते चले जाएं। जानने से ज्यादा भूलने की व्यवस्था की है। जितना आप स्मरण करते हैं, उससे ज्यादा विस्मरण करवा दिया जाता है, ताकि आपके चित्त के ऊपर ज्यादा बोझ कभी भी न हो जाए। चित्त की सामर्थ्य बढ़ जाए, तो ज्यादा बोझ झेला जा सकता है। लेकिन सामर्थ्य न बढ़े और बोझ आ जाए, तो कठिनाई शुरू हो जाती है। पर उनका आग्रह था, वह नहीं मानीं और उन्होंने प्रयोग किए।
जिस दिन उनको पहले दिन पिछले जन्म की स्मृति की धारा टूटी, उस दिन रात के कोई दो बजे वह भागी हुई मेरे पास आईं। एकदम हालत उनकी खराब है। बहुत ही मुश्किल और कठिनाई में पड़ गई हैं वह। उन्होंने कहा कि अब किसी तरह इसको बिलकुल बंद हो जाना चाहिए, मैं उस तरफ अब कुछ देखना ही नहीं चाहती।
लेकिन इतना आसान नहीं है कुछ। नहर को बुला लेना और फिर एकदम से बंद कर देना इतना आसान नहीं है। द्वार टूट जाए तो उसे एकदम से बंद करना बहुत मुश्किल है। क्योंकि द्वार खुलता नहीं, टूटता है। वक्त लगा कोई पंद्रह दिन, तभी वह स्मृति की धारा बंद हो सकी। कठिनाई क्या आ गई? उन देवी को अत्यंत पवित्र, चरित्रवान होने का खयाल था। और पिछले जन्म की स्मृति आई कि वह वेश्या थी। और जब वेश्या होने के सारे चित्र उभरने शुरू हुए, तो उनके प्राण कंप गए। और इस जीवन की सारी नैतिकता और सब डांवाडोल हो गया। और वह स्मृति ऐसी नहीं आती कि कोई और वेश्या थी। ऐसी नहीं है वह स्मृति। यही जो अब चरित्रवान है! और अक्सर ऐसा होता है कि पिछले जन्म में जो वेश्या हो, इस जन्म में बहुत सती हो जाए। वह पिछले जन्म की प्रतिक्रिया है, पिछले जन्म का दुख भाव है, वह पिछले जन्म की पीड़ादायक स्मृति है, जो उसे सती बना देती है।
इसलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि पिछले जन्म के गुंडे इस जन्म में महात्मा हो जाते हैं; इस जन्म के महात्मा अगले जन्म में गुंडे हो जाते हैं। इसलिए महात्माओं और गुंडों में बड़ा गहरा संबंध है। अक्सर यह प्रतिक्रिया हो जाती है। उसका कारण यह है कि जो हम जान लेते हैं, उससे हम पीड़ित हो जाते हैं, उससे विपरीत चले जाते हैं। चित्त का जो पेंडुलम है, वह बिलकुल विपरीत घूमता रहता है। बाएं को छू लेता है, फिर दाएं की तरफ जाना शुरू हो जाता है। दाएं को छू नहीं पाता है कि फिर बाएं की तरफ जाना शुरू हो जाता है। जब घड़ी के पेंडुलम को आप बाईं तरफ जाते देखें, तो आप समझ लेना कि वह दाईं तरफ जाने की तैयारी कर रहा है। बाईं तरफ जब वह जा रहा है, तब वह दाईं तरफ जाने की शक्ति जुटा रहा है। और जितनी दूर तक बाएं जाएगा, उतनी ही दूर तक दाएं जाएगा। और इसलिए जीवन में अक्सर ऐसा होता रहता है, बुरा अच्छा बन जाता है, अच्छा बुरा बन जाता है। निरंतर यह होता रहता है। प्रत्येक जीवन में यह डांवाडोलपन होता रहता है।
इसलिए आमतौर से ऐसा मत सोचना कि जो आदमी इस जन्म में महात्मा बन गया है, वह पिछले जन्म में भी महात्मा रहा हो। ऐसा जरूरी नहीं है। जरूरी इससे उलटा कहीं ज्यादा है। पिछले जन्म में जो उसने जाना है, उसकी पीड़ा ने उसे भर दिया है।
मैंने सुना है कि एक पड़ोस में एक साधु है और सामने एक वेश्या है। वे दोनों मरे हैं एक ही दिन। वेश्या स्वर्ग की तरफ जा रही है और साधु नर्क की तरफ जा रहा है। और वे जो उसे लेने आए हैं यमदूत, वे बड़े हैरान हैं। और यमदूत आपस में पूछते हैं कि यह क्या गड़बड़ हो गई है, कुछ भूल तो नहीं हो गई? क्योंकि इस साधु को नर्क हम क्यों ले जा रहे हैं? साधु साधु था।
तो उनमें जो जानता है, वह कहता है कि वह साधु जरूर था, लेकिन वेश्या के प्रति निरंतर ईर्ष्या से भरा था। और निरंतर यह सोचता था: पता नहीं कौन-सा राग-रंग वहां चल रहा है! कौन-सा सुख वहां मिल रहा है! वेश्या के घर से आते हुए वीणा के स्वर उसके प्राणों को बहुत कंपा देते थे, और वेश्या के घर से बजते हुए घूंघर की आवाज उसे इतना आंदोलित कर देती थी जितना वेश्या के सामने बैठे हुए लोग आंदोलित नहीं होते थे। और उसका चित्त वहीं लगा रहता था। वह भगवान की पूजा भी करता था, तो भी हाथ वेश्या की तरफ जुड़े रहते थे। और वह वेश्या निरंतर-निरंतर सोचती थी कि साधु न मालूम किस आंतरिक आनंद में जी रहा है, मैं कैसे गर्त में पड़ गई हूं। मैं न मालूम कैसे दुख में पड़ गई हूं। और जब वह साधु को सुबह पूजा के फूल लिए जाते देखती थी, तो सोचती थी: कब ऐसा संभव होगा कि मैं भी प्रभु के मंदिर में पूजा के फूल ले जाने के योग्य हो जाऊं! लेकिन मैं तो इतनी अपवित्र हूं कि मंदिर में जाने का साहस भी नहीं जुटा सकती हूं। और जब साधु के घर में पूजा का धुआं उठता था और पूजा के दीप जलते थे और पूजा की घंटियां बजती थीं, तो वेश्या किसी ध्यान में खो जाती थी, जिसमें कि साधु नहीं खो पाता था। और ऐसा उलटा होता रहा। और वेश्या ने निरंतर अर्जन कर लिया था साधु होने का और साधु ने अर्जन कर लिया था वेश्या होने का। उनकी यात्राएं, जो बिलकुल विपरीत थीं, बिलकुल विपरीत हो गई थीं। जो बिलकुल उलटी मालूम होती थीं, वे बिलकुल बदल गई थीं।
अक्सर ऐसा होता है। इसके होने के नियम हैं।
तो उन देवी को जब स्मरण आया, तो उन्हें बहुत पीड़ा हुई। पीड़ा यह हुई कि उनका सारा अहंकार गल गया और टूट गया। जो उन्होंने जाना, वह कंपा देने वाला सिद्ध हुआ। अब उसे भुलाना चाहती हैं। मैंने उनको कहा था कि इसे याद करना, करने की तैयारी रखनी चाहिए। अगर तैयारी न हो तो याद नहीं करना चाहिए।
तो इसलिए मैं आपको दो-तीन सूत्र कहता हूं, जिनसे आप जाति-स्मरण का अर्थ पूछा है वह समझ सकें। लेकिन उससे प्रयोग आपसे नहीं हो सकेगा। जिन्हें करना हो उन्हें अलग से ही सोचना पड़ेगा। पहली तो बात यह है कि अगर जाति-स्मरण में उतरना हो, अतीत जन्म को जानना हो, तो पहली जो जरूरत है चित्त की, वह भविष्य की तरफ से चित्त को मोड़ना पड़ता है।
हमारा चित्त भविष्यगामी है। हमारा चित्त जो है वह फ्यूचर सेंटर्ड है आमतौर से, अतीतगामी नहीं है। चित्त्ा आमतौर से भविष्य की तरफ गति करता है। चित्त की जो धारा है, वह भविष्य की तरफ उन्मुख है। और जीवन के हित में यही है कि भविष्य की तरफ चित्त उन्मुख हो, अतीत की तरफ उन्मुख न हो। क्योंकि अतीत से अब क्या लेना-देना है! वह गया, वह जा चुका। अभी जो आने को है, उसकी तरफ हम उत्सुक हैं। इसीलिए तो हम ज्योतिषियों के पास पूछते फिरते हैं कि कल क्या होने वाला है? भविष्य में क्या होने वाला है? भविष्य के प्रति हम उत्सुक हैं कि क्या होने वाला है।
अब जिस व्यक्ति को अतीत स्मरण करना हो, उसे भविष्य की उत्सुकता बिलकुल छोड़ देनी पड़ती है। क्योंकि चित्त का जो फोकस है, उसकी जो धारा है, अगर भविष्य की तरफ बह रही है उसकी टार्च की धारा, तो अतीत की तरफ नहीं बह सकती है।
तो पहला तो काम यह करना पड़ता है कि भविष्य-उन्मुखता बिलकुल तोड़ देनी पड़ती है। कुछ महीनों के लिए, एक निश्चित समय के लिए, छह महीने के लिए भविष्य को नहीं सोचूंगा, भविष्य का खयाल आ जाएगा, तो उसको नमस्कार कर लूंगा। भविष्य का भाव आएगा, तो मैं उस तरफ नहीं बहूंगा। भविष्य है ही नहीं, ऐसा छह महीने मानकर चलूंगा। अतीत ही है और पीछे की तरफ बहूंगा। पहली बात। और जैसे ही भविष्य टूटता है, चित्त की धारा पीछे की तरफ होनी शुरू हो जाती है।
फिर पीछे की तरफ पहले तो इसी जन्म में पीछे की तरफ लौटना पड़ेगा। एकदम पिछले जन्म में नहीं लौटा जा सकता। इसी जन्म में पीछे की तरफ लौटना पड़ेगा। तो उसके प्रयोग हैं कि इस जन्म में हम पीछे की तरफ कैसे लौटें। जैसे कि मैंने कहा एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को आपने क्या किया, इसका आपको कोई पता नहीं है। तो इसका प्रयोग है कि इसे जाना जा सकता है। जैसे मैं ध्यान के लिए कहता हूं, ऐसा ध्यान करें और दस मिनट के बाद जब ध्यान में चित्त चला जाए, शरीर शिथिल हो जाए, श्वास शिथिल हो जाए, मन शांत हो जाए, तब एक ही बात चित्त में रह जाए कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या हुआ? बस यह एक ही बात चित्त में रह जाए, सारा चित्त इस पर घूमने लगे--एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या हुआ? एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या हुआ? बस एक ही चित्त के चारों तरफ गूंजता हुआ यह एक ही स्वर रह जाए।
तो आप दो-चार दिन में पाएंगे कि अचानक एक दिन जैसे पर्दा उठ गया और एक जनवरी आ गई और सुबह से सांझ तक एक-एक चीज दोहर गई। और आपने इस तरह एक जनवरी देखी, जैसी आपने उस दिन भी न देखी होगी, क्योंकि इतना होश आपने उस दिन भी न रखा होगा। जिस दिन एक जनवरी गुजरी थी, इतना होश उस दिन भी न रहा होगा।
तो पहले इसी जन्म में पीछे लौटकर प्रयोग करने पड़ेंगे। फिर पांच वर्ष तक प्रयोगों को ले जाना बहुत सरल है। पांच वर्ष की उम्र तक पीछे लौटना बहुत सरल है, बहुत कठिन नहीं है। लेकिन पांच वर्ष के बाद बड़ी बाधा पड़ती है। इसलिए आमतौर से हमारी स्मृति पांच वर्ष की उम्र के पहले की नहीं होती। पीछे से पीछे की स्मृति करीब पांच वर्ष के करीब की होती है। हां, कुछ लोगों को तीन वर्ष तक हो सकती है, लेकिन तीन वर्ष से पहले तो बहुत ही मुश्किल बात हो जाती है। तो वहां एकदम द्वार अटक जाता है, जैसे सब बंद हो गया है वहां तक।
लेकिन जो व्यक्ति इसमें समर्थ हो जाएगा, पांच वर्ष की उम्र तक की किसी भी दिन की स्मृति को पूरा जगाने लगेगा...और वह पूरी जगने लगती है। और फिर उसको इस तरह जांच कर लेनी चाहिए। जैसे आज का दिन गुजर रहा है, तो आज के दिन की कुछ बातें नोट करके ताले में बंद कर दें। दो साल बाद आज के दिन को याद करें। वह सब खो जाएगा आज का दिन। और तब स्मरण करें, और स्मरण करके फिर ताला तोड़ें, और फिर मेल करें कि वह बात मेल खा गई कि नहीं। और आप हैरान होंगे--आप हैरान होंगे कि जितनी आपने लिखी थीं, उससे बहुत ज्यादा बातें और भी याद आई हैं जो कि आप उस दिन भी नोट नहीं कर पाए थे। वे तो सब बातें याद आ ही जाएंगी।
इसको बुद्ध ने नाम दिया है, आलय-विज्ञान। मनुष्य के मन का एक कोना है, जिसको उन्होंने आलय-विज्ञान कहा है। आलय-विज्ञान का मतलब होता है, स्टोर हाउस आफ कांशसनेस। जैसे घर में एक कबाड़खाना होता है, जहां हम सब बेकार हो गई चीजों को डालते चले जाते हैं। ऐसा चित्त की स्मृतियों को संग्रह करने वाला एक स्टोर हाउस है, जहां सब चीजें संगृहीत होती चली जाती हैं जन्मों-जन्मों की। वे कभी वहां से हटती नहीं हैं, क्योंकि कब जरूरत पड़ जाए उनकी, इसलिए वे वहां संगृहीत होती हैं। शरीर बदल जाता है, लेकिन वह स्टोर हाउस हमारे साथ चलता है। वह कब जरूरत पड़ जाएगी, उसके लिए कुछ कहा नहीं जा सकता है। और जिंदगी में जो-जो हमने किया है, जो-जो हमने जीया है, जो-जो भोगा है, जो-जो जाना है, जो-जो जीया है, वह सब वहां संगृहीत है।
तो फिर जिस व्यक्ति को यह पांच वर्ष तक स्मरण आने लगे, वह पांच वर्ष के पीछे उतर सकता है। कठिनाई नहीं है बहुत। प्रयोग यही रहेगा पांच वर्ष के पीछे उतरने का। पांच वर्ष के पीछे फिर एक दरवाजा है, जो वहां तक ले जाएगा जहां तक जन्म हुआ, पृथ्वी पर आना हुआ। फिर एक कठिनाई मालूम होती है, क्योंकि मां के पेट की स्मृतियां भी हैं, वे भी मिटती नहीं हैं। उसमें भी प्रवेश किया जा सकता है। और तब उस क्षण तक पहुंचा जा सकता है, जिस क्षण कंसेप्शन होता है, जिस क्षण मां और पिता के अणु मिलते हैं और आत्मा प्रवेश करती है। और वहां तक पहुंच जाने के बाद ही फिर पिछले जन्म में उतरा जा सकता है; सीधा नहीं उतरा जा सकता। इतनी यात्रा पीछे करनी पड़े, तब पिछले जन्म में भी सरका जा सकता है।
पिछले जन्म में सरकने पर पहला स्मरण जो आएगा, वह अंतिम घटना का आएगा। ध्यान रहे, जैसे कि हम किसी फिल्म को उलटा चलाएं, तो समझ में नहीं आएगी एकदम से। अगर किसी फिल्म की रील को उलटा चलाएं तो समझ में नहीं आएगी। या कोई आदमी किसी उपन्यास को उलटा पढ़े तो समझ में बिलकुल नहीं आएगा, बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा। इसलिए पहली दफा पीछे की तरफ लौटने में कुछ भी समझ में नहीं आएगा, क्योंकि यह बिलकुल उलटा है। घटना के घटने का जो क्रम था, इससे यह बिलकुल उलटा क्रम है। अगर आप पीछे लौटेंगे, तो जन्म पहले आएगा इस जन्म का, और मृत्यु बाद में आएगी पिछले जन्म की। मृत्यु पहले आएगी, बुढ़ापा पहले आएगा, फिर जवानी आएगी, फिर बचपन आएगा, फिर जन्म आएगा। तो उलटा क्रम होगा और उलटे क्रम में पहचानना बहुत मुश्किल होगा। इसलिए पहली दफा स्मरण आ जाने पर बड़ी बेचैनी और तकलीफ शुरू होती है, क्योंकि पहचानना मुश्किल होता है कि यह क्या हो रहा है। जैसे कि कोई आदमी तय कर ले कि मैं उपन्यास को उलटा पढूंगा या फिल्म को उलटा देखूंगा, तो बहुत कठिनाई में पड़ जाएगा। दस-पच्चीस दफे देखकर शायद वह ठीक जमा पाए कि यह इस तरह घटना घटी होगी।
इसलिए पिछले जन्म की स्मृति का जो सबसे बड़ा कठिन श्रम है, वह है उलटे में देखना पड़ेगा उसको जो सीधे में घटा था। और सीधा-उलटा क्या है, हमारे आने-जाने का सवाल है। हमारे आने-जाने का सवाल है। बीज को हम बोते हैं, आखिर में फूल आता है। अगर उलटा लौटना पड़े तो पहले फूल आ जाएगा, फिर कली आएगी, फिर पौधा आएगा, फिर पत्ते आएंगे, फिर सिकुड़कर छोटा अंकुर रह जाएगा, फिर बीज आएगा। और इस उलटे क्रम का हमें कोई बोध नहीं होता। इसलिए पिछले जन्म की स्मृति को आ जाने पर भी व्यवस्थित करने में बहुत समय लग जाता है--साफ-साफ व्यवस्थित करने में कि कैसी घटना घटी होगी, उसका क्या तारतम्य रहा होगा। अब यह बहुत अजीब बात है न कि मृत्यु पहले आएगी, फिर बुढ़ापा आएगा, फिर बीमारी आएगी, फिर जवानी आएगी, चीजें उलटी घटेंगी। यानी किसी से अगर हमने शादी की होगी और तलाक दिया होगा, तो तलाक पहले आएगा, फिर प्रेम होगा, फिर शादी होगी। तो इस उलटे क्रम में उसको समझ पाना एकदम मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि हमारे चित्त के समझने का क्रम इस तरफ है, इस दिशा में है, वन डायमेंशनल है। चित्त का जो समझने का आयाम है, वह एक दिशा में है। और उलटा देखना बहुत ही कठिन मामला है। और कभी हमें उलटे का कोई अनुभव नहीं होता, सीधे ही हम जीते हैं। लेकिन प्रयास किया जाए, तो उलटे देखकर भी समझा जा सकता है। लेकिन बहुत अदभुत होगा अनुभव।
और अगर हम उलटा देख सकें, तो हम बहुत हैरान होंगे। क्योंकि तलाक अगर पहले घट जाए, फिर प्रेम हो, फिर विवाह हो, तो हमको चीजें पहली दफा दिखाई पड़ेंगी कि यह तो बहुत हैरानी की बात है। तब हमें दिखाई पड़ेगा कि तलाक घटना तो बिलकुल अनिवार्य था। जिस तरह का प्रेम हुआ था, उसमें तलाक होने ही वाला था। और जिस तरह का विवाह हुआ था, उसकी तलाक ही परिणति थी। लेकिन जब हमने विवाह किया था, तब हमने सोचा भी न था कि इसमें तलाक घट सकता है। लेकिन तलाक उसी विवाह का फूल था। और जब हम इस बात को पूरी तरह देख लेंगे, तो आज प्रेम करना बहुत और हो जाएगी बात, क्योंकि उसमें तलाक हमें पहले से दिखाई पड़ सकता है। उसमें मित्रता करने के पहले शत्रुता का आगमन दिखाई पड़ सकता है।
जो मैं कह रहा हूं कि पिछले जन्म की स्मृति इस जन्म को अस्तव्यस्त कर देगी एकदम से, क्योंकि आप फिर उसी तरह से नहीं जी सकेंगे जैसा आप पिछले जन्म में जीए थे। उस बार ऐसा लगा था--और अभी भी ऐसा लग रहा है--अभी भी ऐसा लग रहा है कि धन इकट्ठा करते जा रहे हैं, धन इकट्ठा करते जा रहे हैं, धन इकट्ठा करते जा रहे हैं, तो बड़ी सफलता मिल जाएगी, बड़ा आनंद मिल जाएगा। उसमें उलटा दिखाई पड़ेगा। उसमें दिखाई पड़ेगा: दुख मिला और फिर धन इकट्ठा कर रहे हैं, और धन इकट्ठा कर रहे हैं। दुख मिलना पहले दिखाई पड़ जाएगा और धन इकट्ठा करना पीछे दिखाई पड़ेगा। और तब यह साफ दिखाई पड़ जाएगा कि वह धन इकट्ठा करना सुख में ले जाने का आधार नहीं था, वह ले गया दुख में। मित्र बनाना शत्रु बनाने में ले गया। जिसे हम प्रेम करना कहते थे, वह घृणा में ले गया। जिसे हम मेल कहते थे, वह विरह में ले गया। तब चीजें अपने पूरे अर्थ में प्रकट होंगी और वह अर्थ हमारे इस जीवन के जीने को एकदम बदल देगा। एकदम बदल देगा, क्योंकि तब बड़ी अन्यथा बात हो जाएगी।
एक फकीर के संबंध में मैंने सुना है। कोई आदमी उसके पास गया है और उससे उसने कहा है कि बड़ी कृपा होगी, मैं आपका अनुयायी बनना चाहता हूं। तो उस फकीर ने कहा, अब अनुयायी न बनाऊंगा। उस आदमी ने पूछा, क्यों न बनाएंगे? उसने कहा, पिछले जन्म में बनाए थे, लेकिन जिनको अनुयायी बनाया था, वे ही पीछे दुश्मन बन गए। अब मैं देख चुका घटना को और अब मैं जानता हूं कि अनुयायी बनाना यानी दुश्मन बनाना। मित्र तय करना यानी शत्रुता के बीज बोना। तो उसने कहा, अब मैं शत्रु किसी को नहीं बनाना चाहता, इसलिए मित्र भी नहीं बनाता हूं। और अब किसी को दुश्मन नहीं बनाना है, इसलिए मैत्री भी नहीं करता हूं। अब मैंने जान लिया है कि अकेला होना ही काफी है। दूसरे को पास लाना, दूसरे को दूर ले जाने का उपाय है।
बुद्ध ने कहा है, प्रिय के मिलने से खुशी होती है, अप्रिय के बिछुड़ने से खुशी होती है। प्रिय के बिछुड़ने से दुख होता है, अप्रिय के मिलने से दुख होता है। ऐसा देखा था, ऐसा समझा था। लेकिन यह बहुत बाद में समझ में आया है कि जिसे हम प्रिय कहते हैं, वही अप्रिय बन जाता है; और जिसे हम अप्रिय कहते हैं, वही प्रिय भी बन सकता है।
लेकिन अगर पिछले स्मरण आ जाएं, तो ये स्थितियां बहुत बदल जाएंगी, बहुत भिन्न हो जाएंगी। यह स्मरण संभव है, आवश्यक नहीं। संभव है, अनिवार्य नहीं। और कभी-कभी तो ध्यान करते-करते आकस्मिक रूप से भी टूट पड़ता है, कोई प्रयोग बिना किए भी। और अगर ध्यान करते-करते आकस्मिक रूप से प्रकट भी हो जाए, तो भी उसमें बहुत रस मत लेना, देख लेना और साक्षी-भाव ही रखना। क्योंकि साधारणतः चित्त की इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि इतने उपद्रव को, इतने अनंत उपद्रव को एक साथ झेल सके। उस झेलने में विक्षिप्त हो जाने की पूरी संभावना है।
एक लड़की को मेरे पास लाया गया था, जिसकी उम्र कोई बारह वर्ष थी। उसे तीन जन्मों का स्मरण था, आकस्मिक रूप से ही। कोई प्रयोग नहीं किया है उसने। कई बार आकस्मिक रूप से, कुछ कारणों से यह भूल हो जाती है। यह भूल ही है प्रकृति की, यह कोई कृपा नहीं है उसके ऊपर। इसमें प्राकृतिक रूप से कुछ गलती हो गई है। जैसे किसी व्यक्ति को तीन आंखें आ जाएं या चार हाथ आ जाएं, वह भूल है। और चार हाथ दो हाथ से कम ताकतवर होते हैं। और चार हाथ उतना काम नहीं कर पाते जितना दो कर पाते हैं। चार हाथ कमजोर कर जाते हैं शरीर को, शक्तिशाली नहीं कर जाते। और अगर खोपड़ी पर चारों तरफ आंखें आ जाएं तो चलना मुश्किल हो जाएगा, आसान नहीं। हालांकि ऐसा लगेगा कि बड़ी कृपा है कि सिर में पीछे भी दो आंखें हैं, लेकिन उससे चलने में बहुत कठिनाई पड़ जाएगी। चलने में सुविधा नहीं होगी।
तो उस बच्ची को वे मेरे पास लाए। उसकी बारह वर्ष उम्र होगी। उसको तीन जन्मों का स्मरण है। फिर तो उस संबंध में बहुत खोज-बीन चली। पिछले जन्म में वह, जहां मैं रहता हूं वहां से कोई अस्सी मील दूर जिस घर में थी, उस घर में वह चालीस वर्ष की होकर मरी। उस घर के लोग अब मेरे ही गांव में रहते हैं। तो वह उन सबको पहचान सकी। अपने भाई को, अपनी लड़कियों को, अपनी लड़कियों के बच्चों को, अपने दामादों को, उन सबको हजारों लोगों की भीड़ में खड़ा करके उससे पहचनवाया जा सका। वह दूर-दूर के रिश्तेदारों को भी पहचान सकी और ऐसी बहुत-सी बातें वह उनसे कह सकी जो कि वे भी भूल गए थे। उसका बड़ा भाई अभी जिंदा है। उसके सिर पर थोड़ी-सी चोट का निशान है। तो मैंने उस लड़की से पूछा कि इस चोट के संबंध में तुम्हें कुछ पता है? तो वह लड़की हंसी, उसने कहा कि भाई को भी पता न होगा। भाई ही बता दें कि यह चोट कब लगी और कैसे लगी। तो वह खुद ही याद नहीं कर पाए कि यह चोट कब लगी। उसने कहा कि जब से मुझे खयाल है, यह तो है ही; मुझे कुछ खयाल में नहीं है। तो उस लड़की ने कहा कि जब मेरे भाई की शादी हुई और घोड़े पर ये बैठते थे तो घोड़े से गिर पड़े थे। लेकिन तब इनकी उम्र केवल दस साल थी। और यह घोड़े से गिरने से शादी के वक्त चोट लग गई थी। और इसको गांव के बड़े-बूढ़ों ने भी कन्फर्म किया कि यह बात ठीक है, यह लड़का घोड़े से गिरा था। लेकिन वह लड़का खुद ही भूल चुका है। फिर तो उसने घर में गड़ा हुआ खजाना भी बताया जो वह गड़ा गई थी। वह भी उसने खोदकर बताया। ठीक जगह पर उसने वह जगह भी खोदकर बता दी।
पिछले जन्म में वह चालीस वर्ष की होकर मरी थी। और उसके पहले वह आसाम के किसी गांव में पैदा हुई थी, जहां वह सात वर्ष की होकर मरी थी। उस गांव का वह पता नहीं बता पाई, न नाम बता पाई। लेकिन सात वर्ष की लड़की जितनी आसामी भाषा बोलती है, उतना वह बोल सकती है। और सात वर्ष की लड़कियां जिस तरह नाच सकती हैं, गाना गा सकती हैं आसामी का, उतना भी वह कर सकती है। वहां भी खोज-बीन की, लेकिन उस परिवार का कोई पता नहीं चल सका।
अब उसको सैंतालीस वर्ष का तो यह अनुभव है और बारह वर्ष का यह। तो उसकी आंखों में आप बराबर पैंसठ-सत्तर साल की स्त्री की झलक देख सकते हैं, और है वह बारह साल की। उसके चेहरे पर पैंसठ-सत्तर साल की स्त्री का भाव है। न तो वह खेल खेल सकती है किसी बच्चे के साथ, क्योंकि वह बूढ़ी है। उसकी स्मृति तो सत्तर साल पुरानी है, तो उसको सत्तर साल के होने का खयाल है। उसकी उम्र तो बारह साल है। वह स्कूल में पढ़ नहीं सकती, क्योंकि वह अपने शिक्षक को बेटा कह सकती है। उसकी जो स्मृति है वह सत्तर साल लंबी है, उसका व्यक्तित्व सत्तर साल का है। उसका शरीर बारह साल का है। वह खेल नहीं सकती, वह कोई रस नहीं ले सकती। वह गंभीर बातों में जैसा कि बूढ़ी स्त्रियां बातें करती हैं, उनमें ही रस ले सकती है और किसी बात में रस नहीं ले सकती। और उसमें इतना तनाव है, इतनी परेशानी है, क्योंकि शरीर उसका बारह साल का है और स्मृति सत्तर साल की है। इनमें कोई तालमेल नहीं बैठता है। एकदम उदास और पीली और परेशान है।
तो मैंने उसके मां और पिता को कहा कि इसे मेरे पास ले आएं, मैं इसकी स्मृति को भुला दूं। क्योंकि जो स्मृति को याद करने का रास्ता है, उससे उलटा जाने से स्मृतियां भूल भी जाती हैं। इसकी स्मृतियां भुला दें...।
लेकिन वे तो रस में थे, उनको तो आनंद आ रहा था, भीड़-भाड़ होती थी, लाखों लोग आते थे घर। लड़की की पूजा शुरू हो गई थी। तो उन्होंने कहा, नहीं; भुलवाएंगे क्यों! मैंने उनको कहा, यह लड़की पागल हो जाएगी। लेकिन वे नहीं माने और आज लड़की की हालत करीब-करीब पागल की हो गई है। वह उतनी स्मृतियों को झेल नहीं सकती। और उसकी कठिनाई यह हो गई है कि अब उसका विवाह कैसे हो! यानी ऐसा ही सोचें जैसे सत्तर साल की बूढ़ी औरत अब विवाह करने का सोचे। तो उसके मन का कहीं तालमेल ही नहीं है उस बात में। शरीर उसका जवान है और मन बूढ़ा है, तो बहुत कठिनाई हो गई है। उसको जीने में कठिनाई हो गई है।
पर यह आकस्मिक है। आप प्रयोग से भी यह धारा तोड़ सकते हैं। लेकिन इस धारा को तोड़ने की दिशा में जाना कोई बहुत आवश्यक नहीं है। किन्हीं को उसमें रस, उत्सुकता हो, वे प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन उन प्रयोगों के पहले ध्यान के काफी गहरे प्रयोग जरूरी हैं, ताकि मन इतना शांत और शक्तिशाली हो जाए कि कोई भी चीज टूट पड़े, तो आप उसको साक्षी-भाव से देख सकें। और अगर कोई व्यक्ति साक्षी-भाव में विकसित हो जाता है, तब पुराने जन्म देखे गए सपनों से ज्यादा नहीं मालूम पड़ते। तब उनसे कोई पीड़ा नहीं होती। तब ऐसा ही लगता है, जैसे ये सपने हमने देखे थे। सपनों से ज्यादा उनका अर्थ नहीं रह जाता फिर। और जब हमें पुराने दो-चार जन्म याद आ जाते हैं और सपनों की तरह मालूम पड़ते हैं, तो यह जन्म भी तत्काल सपनों की तरह मालूम पड़ने लगता है।
वह जिन लोगों ने इस जगत को माया कहा है, उसके माया कहने का और कोई बुनियादी कारण नहीं है, फिलासफिक कुछ भी बात नहीं है। उसका बुनियादी कारण जाति-स्मरण ही है। जिन्होंने भी पीछे स्मरण किए, यह सब मामला माया हो गया। एकदम इल्यूजन, सपना हो गया। क्योंकि कहां हैं वे मित्र जो पिछले जन्म में थे? कहां है वह मकान? कहां है वह पत्नी? कहां हैं वे बेटे? कहां है वह दुनिया जो पिछले जन्म में थी? कहां गया वह सब जिसको हमने इतना सत्य मान रखा था कि वह है? कहां गईं वे चिंताएं जिनके लिए हम रात भर नहीं सोए थे? कहां गए वे दुख, वे पीड़ाएं जिनको हमने पहाड़ समझ रखा था और ढोया था? कहां गए वे सुख जिनके लिए हमने आकांक्षा की थी? कहां गया वह सब जिसके लिए हम दुखी, पीड़ित, परेशान हुए थे? अगर पिछला जन्म याद आए और सत्तर वर्ष आप जीए हों, तो उन सत्तर वर्षों में देखा गया एक सपना मालूम पड़ेगा या एक सत्य? एक सपना मालूम पड़ेगा, जो आया और गया। और तब यह जीवन जो हम अभी जी रहे हैं...।
मैंने सुना है, एक सम्राट अपने बेटे के पास बैठा है। उसका बेटा मरने के करीब है। और एक ही बेटा है। और आठ रातें हो गई हैं, और वह न तो बचाया जा सक रहा है, न मृत्यु आ रही है, बहुत मुश्किल हो गई है। अब तो वह यह भी सोचने लगा है कि इतनी पीड़ा से तो वह मर ही जाए। मन करता है कि बच जाए, और एक मन यह भी करता है कि इतना दुख है कि वह मर ही जाए तो भी ठीक है। आठ रात से सम्राट सोया नहीं है।
कोई चार बजे होंगे रात के, उसकी झपकी लग गई है। झपकी लगी और वह एक सपने में चला गया। और सपने अक्सर हम वही देखते हैं, जो जिंदगी में कमियां रह जाती हैं। एक ही बेटा था, एक ही बेटा भी मरने के करीब पहुंच रहा है। तो उसने सपना देखा है कि उसके बारह बेटे हैं। और बड़े सुंदर हैं, उनकी स्वर्ण जैसी काया है, बड़े-बड़े महल हैं, बड़ा साम्राज्य है, सारी पृथ्वी का वह मालिक है और बड़े आनंद में है। और वह यह सपना देख ही रहा है...क्योंकि सपना देखने में बहुत देर नहीं लगती है। सपने का टाइमिंग जो है वह हमारी जिंदगी के समय की धारा से भिन्न होता है। तो आप एक क्षण में वर्षों का सपना देख सकते हैं। एक क्षण झपकी लगे, इतना बड़ा सपना देख सकते हैं जो वर्षों पर फैल जाए और जागकर आपको मुश्किल मालूम पड़े कि इतने एक क्षण में वर्षों लंबा सपना कैसे देखा! असल में समय की गति सपने में बहुत तीव्र है। यानी एक क्षण में वर्षों पार किए जा सकते हैं। और इसमें मैं थोड़ी बात करूंगा पीछे। वह एक क्षण में उसने यह सपना देख लिया है, बारह लड़के हैं, उनकी सुंदर स्त्रियां हैं, बड़े सुंदर भवन हैं, बड़ा राज्य है। और तभी यह जो बाहर का लड़का है, यह मर गया। पत्नी चीख मारकर चिल्लाई है तो सम्राट की नींद टूट गई।
नींद टूटी तो वह एकदम चौंका हुआ रह गया। पत्नी ने उसको एक क्षण देखा, समझा कि शायद वह घबरा गया है। उसने उससे पूछा, इतने घबरा गए हैं, आंसू भी नहीं हैं! कुछ बोलते भी नहीं हैं! हिलाया। उसने कहा, नहीं, मैं घबरा इस वजह से नहीं गया हूं, मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। मैं यह सोचता हूं, मैं किसके लिए रोऊं? अभी बारह लड़के थे, वे खो गए, उनके लिए रोऊं? या एक लड़का यह खो गया है, इसके लिए? मैं इस चिंता में पड़ गया हूं कि कौन मरा है। अभी बारह थे, बड़ा राज्य था। वह सब एकदम खो गया। तूने चीख क्या मारी, सब गिर गया। इधर देखता हूं, यह खो गया। और मजा यह है कि जब मैं उन बारह लड़कों के बीच में था, तो इस लड़के का मुझे कोई पता न रहा था, यह था ही नहीं तब। यह खो गया था, तू खो गई थी, यह महल खो गया था। अब यह महल है, तू है, यह लड़का है; लेकिन वह महल खो गया, वे लड़के खो गए। कौन सच था, मैं यह सोचता हूं। और मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं।
अगर एक बार याद आ जाए पिछले जन्मों का स्मरण, तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि जो अभी देख रहे हैं, वह सच है? क्योंकि ऐसा तो बहुत बार देखा है, और सब बेसच हो गया। सब मिट गया है, सब खो गया है। तो एक सवाल उठ जाएगा कि जो हम देख रहे हैं वह, वह भी उतना ही सच है जितना वह था। वह भी एक सपने की तरह दोहर जाएगा और मिट जाएगा। और जैसे सब सपने अंत पर पहुंच गए, ऐसे ही यह सपना भी अंत पर पहुंच जाएगा।
लेकिन हम तो फिल्म में बैठते हैं, देखते हैं, तो फिल्म भी सच मालूम होने लगती है। जब पर्दा उठता है, अंधेरा मिट जाता है, सब हाल के बाहर जाने लगते हैं, तब भी दो-चार-दस क्षण लग जाते हैं वापस लौटने में। आंख मीड़ते-मीड़ते हाल के बाहर आते हैं फिल्म के, तब जरा होश आता है कि वह सिर्फ एक सपना था। एक नाटक था, जो देखा। लेकिन वहां रो भी लिए थे, हंस भी लिए थे, आंसू भी पोंछ लिए थे। सच तो यह है कि चौबीस घंटे जो लोग नहीं रो पाते, वे अपना रोना वहां जाकर निकाल लेते हैं; फिल्म देख लेते हैं, वहां रो लेते हैं। और बड़ा अच्छा हुआ है; बड़ा ही अच्छा हुआ है। रोते तो ही वे, कोई और दूसरा बहाना खोजना पड़ता, यह बहाना बहुत मुफ्त और सस्ता है। वहां रो लेते हैं, हंस लेते हैं। न दिन में हंसते हैं, न रोते हैं। वहां उपाय मिल जाता है।
पर बाहर आकर एकदम चौंककर उनको जो पहला खयाल आता है वह यह आता है कि बड़े धोखे में पड़ गए। लेकिन रोज-रोज कोई ऐसा सिनेमा देखता रहे, तो फिर धीरे-धीरे धोखा साफ होने लगता है। लेकिन अगर पिछले सिनेमा की स्मृति भूल जाती है बार-बार। जब फिर दुबारा देखने जाते हैं, तब फिर वह सच मालूम होने लगता है।
अगर पिछले जन्मों की स्मृति आ जाए, तो जो जन्म अभी चल रहा है, जो जीवन चल रहा है, वह एकदम सपना हो जाएगा। वह एकदम खो जाएगा। ये हवाएं कितनी दफे नहीं चलीं! लेकिन अब वे हवाएं कहां हैं जो चली थीं? और ये आकाश में बादल कितने दफे नहीं घिरे! लेकिन अब वे बादल कहां हैं जो घिरे थे? वह सब खो गया, यह सब भी खो जाएगा। यह सब भी खोने के क्रम में ही विदा हो रहा है।
यह अगर बोध हो जाए, तो माया का अनुभव होगा कि चीजें बड़ी असत्य हैं। लेकिन इसके साथ ही दूसरा बोध यह होगा कि चीजें बड़ी असत्य हैं, घटनाएं बड़ी असत्य हैं, आती हैं और खो जाती हैं, लेकिन एक चीज बिलकुल नहीं खोती--मैं। मैं बिलकुल नहीं खोता हूं। एक सपना आता है, चला जाता है; दूसरा सपना आता है, चला जाता है; तीसरा सपना आता है। लेकिन मैं, जिसको सपने आते हैं, बना ही रहता हूं। वह यात्री जो एक फिल्म-गृह से निकलता है, दूसरे फिल्म-गृह में चला जाता है। एक फिल्म मिट जाती है, दूसरी मिट जाती है, तीसरी खो जाती है, लेकिन वह यात्री चलता चला जाता है।
तो एक ही साथ दो अनुभव होते हैं--एक अनुभव कि जगत माया है और द्रष्टा सत्य है; दृश्य असत्य है और द्रष्टा सत्य है; ये एक ही साथ दो अनुभव होते हैं। दृश्य तो रोज बदल जाते हैं, हर बार बदल गए हैं, लेकिन द्रष्टा, वह देखने वाला, निरंतर वही, वही, वही। वह बना ही रहा है...वह बना ही रहा है...। और ध्यान रहे, जब तक दृश्य सत्य मालूम होते हैं, तब तक द्रष्टा पर ध्यान नहीं जाता। जब दृश्य एकदम असत्य हो जाते हैं, तब द्रष्टा पर ध्यान जाता है।
तो इसलिए मैं कहता हूं, उपयोगी तो है, लेकिन उपयोगी उनके ही लिए है जो थोड़ा ध्यान में गहरे उतरें। ध्यान में गहरे उतरें, तो फिर जीवन को सपने की तरह देखने की क्षमता आ जाए। तो फिर महात्मा होना उतना ही सपना है, जितना चोर होना सपना है। और सपने अच्छे भी देखे जा सकते हैं, बुरे भी देखे जा सकते हैं। और मजे की बात यह है कि चोर होने का सपना जल्दी भी टूट सकता है, महात्मा होने का सपना जरा देर से टूटता है, क्योंकि बड़ा सुखद मालूम पड़ता है। इसलिए जो महात्मा होने के सपने में है, वह चोर होने के सपने वालों से ज्यादा खतरे में है, क्योंकि वहां बड़ा सुख मालूम पड़ता है। ऐसा लगता है, सपना चलता ही रहे। सुखद सपने होते हैं न और दुखद सपने भी होते हैं। सुखद सपने में यह खराबी होती है कि उसको चलाए रखने का मन होता है। दुखद सपने में--जहां छाती पर कोई चढ़ गया है और प्राण संकट में पड़े हैं और पहाड़ से गिर गए हैं--अपने आप ही टूटने का मन होने लगता है कि टूट जाए, घबड़ाहट में टूट ही जाता है।
इसलिए बहुत बार यह होता है कि पापी पहुंच जाते हैं परमात्मा के पास और महात्मा नहीं पहुंच पाते। क्योंकि पापी का सपना बड़ा दुखद है, नाइटमेयर जिसको कहते हैं, दुखस्वप्न है। महात्मा का सपना बड़ा सुखद है। गेरुए वस्त्रों में लपटे हुए सपनों को बचाने का बड़ा मन होता है। वे बड़े प्रीतिकर मालूम होते हैं।
यह जाति-स्मरण के संबंध में थोड़ी-सी बात मैंने कही, उसके प्रयोग करने की जरूरत में मत पड़ जाना आप। लेकिन किसी को अगर खयाल हो कि मन शांत हुआ है और देखना चाहता है पीछे, तो बराबर ले जाया जा सकता है, पीछे उतरा जा सकता है। लेकिन अभी आज ही हम भीतर उतरें, तभी पीछे भी उतर सकते हैं। भीतर ही कोई न उतर पाए। जैसे कि कोई बड़ा मकान है और उसके घर के नीचे तलघरे हैं। और वह आदमी मकान के बाहर खड़ा है और वह कहता है कि मुझे मेरे तलघरों में जाना है। तो हम उससे कहेंगे, पहले अपने मकान के भीतर तो चलो। क्योंकि तलघरों में उतरने का रास्ता मकान के भीतर से जाता है, मकान के बाहर से नहीं जाता। और वह आदमी कहता है, मैं तो मकान के बाहर खड़ा हूं और मुझे तलघरों तक जाना है। तो फिर वह आदमी तलघरों तक नहीं जा सकता। तलघरों में जाया जा सकता है, लेकिन पहले मकान के भीतर चलो।
जिंदगी जो बीत गई है वह हमारा तलघरा बन गई है। वे जीवन, जो हो चुके हैं, वे हमारे तलघरे हैं। उन खंडों में कभी हम जीए थे, फिर उन खंडों को हमने छोड़ दिया है। हम दूसरे खंडों में जी रहे हैं। लेकिन हम खंडों में भी नहीं जी रहे हैं, हम मकान के बाहर खड़े हैं, हम अपने बाहर खड़े हैं। और हम पीछे नहीं उतर सकते जब तक हम भीतर न चले जाएं। पीछे उतरने की पहली शर्त है: भीतर उतर जाना। और जो भीतर उतर जाए, उसे पीछे जाने में न कोई कठिनाई है, न कोई खतरा है, न कोई उपद्रव है। वह पीछे भी जा सकता है।
एक और मित्र ने एक बात पूछी है उसको कर लें और फिर हम ध्यान के लिए बैठें।

एक मित्र ने पूछा है कि उनके कोई मित्र हैं, वे योगी हैं और वे कहते हैं कि वे पिछले जन्म में चिड़िया थे। तो क्या आदमी पशु भी हो सकता है?
कोई कठिनाई नहीं है। आदमी कभी पशु हो सकता है, लेकिन दुबारा पशु नहीं हो सकता है। पीछे लौटना नहीं होता है, पीछे लौटना असंभव है। तो यह तो हो सकता है कि पीछे की योनियों से आगे आना हो, लेकिन यह नहीं हो सकता कि आगे की योनियों से पीछे लौटना हो जाए। इस जगत में पीछे लौटना होता ही नहीं, पीछे लौटने का उपाय ही नहीं है। दो ही उपाय हैं--या तो आगे बढ़ें, या जहां हैं वहीं रुके रह जाएं। पीछे नहीं लौट सकते। जैसे कि एक स्कूल में एक बच्चा पहली कक्षा में पढ़ता हो। वह उत्तीर्ण हो जाए तो दूसरी कक्षा में चला जाए और अनुत्तीर्ण हो जाए तो पहली कक्षा में ही रह जाए, लेकिन पहली कक्षा से निकालने का कोई उपाय नहीं है। या दूसरी कक्षा में कोई असफल हो जाए, तो उसे पहली कक्षा में उतारने का भी कोई उपाय नहीं है। तो जिस योनि पर हम होते हैं, हम या तो उसमें ही टिक सकते हैं बहुत लंबे समय तक या हम आगे जा सकते हैं, लेकिन पीछे नहीं लौट सकते।
तो इसकी कोई कठिनाई नहीं है कि कोई पीछे दूसरी योनियों में रहा हो। रहा ही है। कितने जन्मों पीछे रहा है, यह दूसरी बात है। इसमें बहुत कठिनाई नहीं है। और अगर हम अपने पिछले जन्मों में उतरेंगे, तो हमें याद आएंगे वे सब जन्म, जब हम चिड़िया भी रहे होंगे, पशु भी रहे होंगे, कीड़े भी रहे होंगे, पत्थर भी रहे होंगे। और-और नीचे, और-और नीचे, इतनी जड़ता रही होगी जहां कि चेतना का कोई सूत्र ही खोजना मुश्किल है।
पहाड़ भी जीवन है। वहां भी जीवन है, लेकिन चेतना न के बराबर है। निन्यानबे प्रतिशत जड़ता है, एक प्रतिशत चेतना है। निरंतर चेतना बढ़ती चली जाती है और जड़ता कम होती चली जाती है। परमात्मा है, वह सौ प्रतिशत चेतन है। पदार्थ और परमात्मा में प्रतिशत का अंतर है। पदार्थ और परमात्मा में कोई क्वालिटी का अंतर नहीं है, क्वांटिटी का अंतर है। कोई गुण का अंतर नहीं है, मात्रा का अंतर है। इसलिए पदार्थ परमात्मा हो सकता है। वह निरंतर विकास...निरंतर विकास...जड़ता छूटती चली जाए।
तो यह तो बहुत हैरानी की, कठिनाई की बात नहीं है कि कोई आदमी पिछले जन्म में पशु रहा हो। बड़ी कठिनाई तो तब होती है कि कुछ लोग आदमी होते हुए भी पशु ही होते हैं। यह तो बहुत आश्चर्यजनक नहीं है, पिछले जन्मों में कभी न कभी हम सभी पशु रहे होंगे। लेकिन आदमी होते हुए भी हमारी चेतना इतनी क्षीण हो सकती है कि सिर्फ देह के तल पर हम आदमी मालूम पड़ते हों, वैसे हम पशु हों। अगर हम अपनी वृत्तियों को खोजने जाएं, तो ऐसा ही लगेगा, ऐसा ही लगेगा कि हम पशु तो नहीं रहे हैं, लेकिन आदमी भी नहीं हो गए हैं। कहीं बीच में अटक गए हैं। और इसलिए जब भी मौका आता है, तो हम फिर से पशु हो जाने में देर नहीं लगाते।
जैसे कि कोई आदमी आकर आपको एक धक्का मार दे। आप बड़े भले आदमी की तरह चले जा रहे थे और एक आदमी ने आकर एक घूंसा मार दिया और एक गाली दे दी। और आप अचानक पाते हैं कि वह जो आपका भला आदमी था एकदम तिरोहित हो गया है और आप वहां खड़े हो गए हैं, जहां आप किसी पिछले जन्म में रहे होंगे। आप पशु हो गए। हमारी आदमियत जो है बहुत स्किन डीप है। जरा चमड़ी खरोंच दें तो भीतर से पशु निकल आता है। और वह निकल इसीलिए आता है कि हम वह रहे हैं। यानी यह जो ग्रोथ है हमारी, यह जो आदमी होना है, यह ऊपर से तो आ गया, लेकिन भीतर अभी भी पशु मौजूद है। और इसलिए उसको खोदने में देर नहीं लगती।
हिंदुओं को कह दें कि हिंदू धर्म खतरे में है, खुद जाता है। मुसलमान को कह दें, मुसलमान धर्म खतरे में है, खुद जाता है। एकदम जानवर हो जाए आदमी! गुजराती आदमी भी हो सकता है, जो बिलकुल भला दिखाई पड़े, सफेद कपड़े पहने हुए दिखाई पड़े, खादी पहने हुए दिखाई पड़े, वह भी हो सकता है। वह भी सब स्किन डीप है। जरा-सा खरोंच दें, और भीतर से पशु निकल आए। और जब पशु निकलेगा, तो वह इतने जोर से, इतने जोर से प्रकट होता है कि ऐसा लगता है कि यह आदमी कभी आदमी रहा होगा, यह भी संदिग्ध हो जाता है।
यह जो हमारी स्थिति है, उसमें हमारा वह सब मौजूद है, जो हम कभी रहे हैं। हां, उसकी परतें हैं भीतर, और अगर जरा खोदा जाए तो हम सब भीतर की परतों पर पहुंच सकते हैं। हम पत्थर की परत पर भी पहुंच जा सकते हैं, वह भी हमारी परत है। किसी बहुत गहरे अंतःकरण में हम अब भी पत्थर हैं। और इसलिए अगर वहां तक हमें खरोंचा जाए, तो हम पत्थर की तरह भी व्यवहार करते हैं, कर सकते हैं। पशु की तरह भी व्यवहार करते हैं, कर सकते हैं। और आगे की हमारी सिर्फ संभावनाएं हैं, वे हमारी परतें नहीं हैं। इसलिए कभी-कभी छलांग लगाकर छूते हैं, लेकिन फिर जमीन पर वापस लौट आते हैं। वे हमारी संभावनाएं हैं। देवता भी हम हो सकते हैं, लेकिन हम कभी रहे नहीं हैं। परमात्मा हम कभी हो सकते हैं, लेकिन जो हम रहे हैं, वह हमारी स्थिति है।
तो ये दो बातें हैं: अगर हमें खोदा जाए थोड़ा, तो हमारे भीतर की स्थितियां मिल जाएंगी; और अगर हमें और आगे खींचा जाए, तो हमारी आगे की स्थितियों का अनुभव होता है। लेकिन जैसे कोई आदमी जमीन से छलांग लगाए, तो एक सेकेंड को जमीन के बाहर हो जाता है, आकाश में हो जाता है, लेकिन फिर क्षण भर बाद जमीन पर खड़ा हो जाता है। ऐसे ही हम छलांग लगा-लगाकर आदमी होते रहते हैं। कभी-कभी आदमी होते हैं, बाकी हम पीछे खड़े हो जाते हैं। अगर हम बहुत गौर से देखेंगे, तो चौबीस घंटे में कभी-कभी किसी क्षण में हम ठीक आदमी होते हैं। हम सब जानते भी हैं।
भिखमंगे आपने देखे होंगे, सुबह भीख मांगने आते हैं, शाम नहीं आते। क्योंकि शाम तक आदमी होने की संभावना कम हो जाती है। सुबह-सुबह ताजा आदमी उठता है, रात भर का विश्राम किया हुआ। न कोई झगड़ा, न कोई कलह, न गाली, न गलौज, न धन, न उपद्रव, न राजनीति, न हिंदू, न मुसलमान। सुबह उठता है, ताजा-ताजा होता है। भिखारी सामने आ जाता है, तो आशा होती है कि वह थोड़ी आदमियत का व्यवहार करेगा। लेकिन सांझ! सांझ आशा नहीं होती। इसलिए सांझ भिखारी नहीं आता। वह जानता है कि सांझ दिन भर की खरोंच ने आदमी के भीतर की परतों को जगा दिया होगा--दफ्तर ने, दुकान ने, बाजार ने, दंगा-फसाद ने, अखबार ने, नेताओं ने गड़बड़ कर दिया होगा। वे भीतर की जो परतें हैं, वे जग गई होंगी। सांझ को कोई भिखमंगा नहीं मांगने आता, क्योंकि सांझ को आदमी थक गया होता है, जानवर हो गया होता है।
इसलिए रात को जो क्लब पैदा होते हैं, उनमें जानवरियत दिखाई पड़ती है। उसका और कोई कारण नहीं है। रात के क्लब, नाइट क्लब जो हैं, वे पशुओं की प्रवृत्तियों के हो जाते हैं। वह दिन भर का थका हुआ आदमी आदमियत से थक जाता है। वह कहता है, हमें पशु चाहिए, शराब चाहिए, जुआ चाहिए, नाच चाहिए, नंगापन चाहिए, हो-हुल्लड़ चाहिए। तो रात के जो क्लब हैं, वे आदमी की पशुता के इर्द-गिर्द निर्मित होते हैं। इसलिए प्रार्थना करनी हो, तो सुबह ही अच्छा है। सांझ जरा शक है कि प्रार्थना संभव हो पाए। इसीलिए मंदिर सुबह घंटियां बजा देते हैं। रात को क्लबों के द्वार खुल जाते हैं, जुआघर खुल जाते हैं, शराबखाने खुल जाते हैं। वेश्या सुबह-सुबह नहीं आमंत्रण दे पाती, रात ही आमंत्रण दे सकती है।
दिन भर का थका हुआ आदमी जानवर हो जाता है। इसलिए रात के अलग धंधे हैं; सुबह की अलग दुनिया है। तो चर्च सुबह, मस्जिद सुबह अजान दे देती है, मंदिर सुबह घंटी बजा देता है। थोड़ी-सी आशा है कि सुबह का जागा हुआ आदमी शायद परमात्मा की तरफ थोड़ी आंख उठा ले। सांझ को थके हुए आदमी से कम आशा रह जाती है। और इसीलिए बच्चों से ज्यादा आशा होती है कि वे परमात्मा की तरफ झुक जाएं। बूढ़ों से कम आशा हो जाती है; वह सांझ है जिंदगी की। वह जिंदगी भर ने उनका सब उघाड़ दिया होगा, सब उखाड़ दिया होगा।
इसलिए जितनी जल्दी हो सके, जितनी सुबह हो सके, उतनी जल्दी यात्रा पर निकल जाना चाहिए। सांझ आ ही जाएगी। इसके पहले कि सांझ आए अगर हम सुबह यात्रा पर निकल गए हों, तो यह भी हो सकता है कि सांझ भी हमें मंदिर में पाए।
तो वह मित्र ठीक पूछते हैं। यह संभव है कि कोई आदमी पशु रहा हो, पक्षी रहा हो। ध्यान यह रखना चाहिए कि अब भी तो पशु और पक्षी नहीं हैं। उसका स्मरण रखना जरूरी है।
कुछ एक-दो प्रश्न और हैं, वह रात या कल सुबह बात कर लेंगे। अब सुबह के ध्यान के लिए हम बैठें। दो-तीन बातें समझ लें। एक तो पूरी तरह छोड़ देना है अपने को। अगर हमने थोड़ा भी अपने को पकड़े रखा तो वह पकड़ ही ध्यान में बाधा बन जाती है। और इस भांति छोड़ देना है, जैसे हम मर ही रहे हों, मर ही गए हों; इस भांति छोड़ देना है। मृत्यु को स्वीकार ही कर लेना है कि आ गई मौत, सब मर गया और हम पीछे डूबते चले जा रहे हैं। अब तो वही बचेगा, जो बच ही जाएगा; बाकी हम सभी छोड़ देंगे, जो मर सकता है।
इसलिए मैंने कहा कि मृत्यु का ही प्रयोग है। इसलिए इस प्रयोग के तीन हिस्से हैं। पहला, शरीर की शिथिलता। दूसरा, श्वास की शिथिलता। और फिर तीसरा, विचार की शिथिलता। तीनों को छोड़ते चले जाना है। तो थोड़ा-थोड़ा फासले पर बैठ जाएं। और हो सकता है कोई गिर जाए। इसलिए थोड़ा फासला कर लें। कुछ पीछे हट जाएं, कुछ आगे हट आएं।
हां, थोड़े फासले पर हो जाएं। कोई किसी को छूता हुआ न हो, नहीं तो फिर पूरे वक्त संभालकर बैठना पड़ता है कि अब किसी पर गिर न जाएं। या किसी पर गिर जाएं, तो उसकी मुसीबत हो जाती है। और शरीर जब ढीला छूटता है, तो कोई भरोसा नहीं, आगे गिर सकता है, पीछे गिर सकता है। जब तक आप संभाले हुए हैं, तभी तक भरोसा है। जब आप संभालना छोड़ देते हैं, तो शरीर गिर ही जाएगा। आपकी जब पकड़ छूटेगी भीतर से, तो शरीर को कौन संभालेगा? वह गिर ही सकता है। और अगर उसको संभालने के लिए समय लगाना पड़ा, शक्ति लगानी पड़ी, तो वहीं अटक जाएंगे, पीछे न जा सकेंगे। इसलिए जब शरीर गिरता हो, तो इसको सौभाग्य समझना। उसे एकदम छोड़ देना, उसे रोकना मत। क्योंकि उसे रोकने पर वहीं रुकना हो जाएगा, उससे फिर भीतर जाना नहीं होगा। और अगर कोई आपके ऊपर भी गिर जाए, तो परेशान मत होना। गिर गया तो गिर गया। थोड़ी देर आपकी गोद में उसका सिर पड़ा रहेगा तो कुछ परेशानी की बात नहीं है, उसे पड़े रहने देना।
पहली बात, आंख बंद कर लें...आंख आहिस्ता से बंद कर लें। आंख बंद कर लें। किसी से बात नहीं करनी है। आंख बंद कर लें...शरीर को ढीला छोड़ें...शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें जैसे उसमें कोई प्राण ही नहीं है। अपनी सारी शक्ति भीतर ले जाएं...शरीर के तल से अपनी सारी शक्ति भीतर ले जाएं। शक्ति भीतर जा रही है...शरीर शिथिल होता जाएगा।
अब मैं सुझाव देता हूं। शरीर शिथिल हो रहा है, ऐसा अनुभव करें। और जैसे-जैसे अनुभव करेंगे, शरीर शिथिल होगा...शिथिल होगा...शिथिल होगा...फिर बिलकुल लाश की तरह पड़ा रह जाएगा--रुक जाए, गिर जाए--जो हो, हो। आप छोड़ दें।
शरीर शिथिल हो रहा है, अनुभव करें...अनुभव करें, शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है। छोड़ दें। बिलकुल भीतर हट जाएं। जैसे कोई व्यक्ति अपने घर के भीतर चला जाए, ऐसे अपने भीतर हट जाएं। हटें, सरकें, भीतर हट जाएं। शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...छोड़ दें, बिलकुल छोड़ दें, निर्जीव, जैसे कोई प्राण न रह गए। शरीर शिथिल हो गया है...शरीर शिथिल हो गया है...शरीर शिथिल हो गया है...शरीर शिथिल हो गया है.. .शरीर शिथिल हो गया है...शरीर शिथिल हो गया है...शरीर शिथिल हो गया है...शरीर बिलकुल शिथिल हो गया है...।
अब मैं मान लूं, आपने छोड़ दिया है--सारी पकड़ छोड़ दी। फिर गिरता हो, गिर जाए; आगे झुके, झुक जाए; जो होना हो, हो; आप छोड़ दें। आपकी कहीं पकड़ न रह जाए। भीतर देख लें कि मेरी कोई पकड़ शरीर पर नहीं है, अब मैं पकड़े हुए नहीं हूं, मैंने छोड़ दिया है।
शरीर शिथिल हो गया है...शरीर शिथिल हो गया है। श्वास शांत हो रही है। अनुभव करें, श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है। श्वास शांत होती जा रही है...श्वास शांत हो रही है। बिलकुल छोड़ दें। श्वास को भी छोड़ दें। अपनी पकड़ ही छोड़ दें। श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास शांत हो रही है...श्वास भी शांत हो गई...श्वास शांत हो गई...। श्वास शांत हो गई है...श्वास शांत हो गई है।
विचार भी शांत होते जा रहे हैं। अनुभव करें, विचार शांत हो रहे हैं...विचार शांत हो रहे हैं...विचार शांत हो रहे हैं...विचार शांत हो रहे हैं...विचार शांत हो रहे हैं...विचार शांत होते जा रहे हैं। छोड़ दें, शरीर छोड़ दिया, श्वास छोड़ दी, विचार भी छोड़ दें। हट जाएं, बिलकुल भीतर हट जाएं, विचार से भी पीछे हट जाएं।
सब शांत हो गया है...सब शांत हो गया है...जैसे मर ही गए। बाहर सब मर गया। सब मर गया...सब मर गया। बिलकुल सब शांत हो गया...भीतर सिर्फ चेतना रह गई...एक दीया जलता रह गया चेतना का, बाकी सब मर गया। छोड़ दें, छोड़ दें, बिलकुल छोड़ दें--जैसे हैं ही नहीं। बिलकुल छोड़ दें...शरीर जैसे मर गया...शरीर है ही नहीं...श्वास गई...विचार गए...मृत्यु जैसे आ गई। और हट जाएं, बिलकुल भीतर हट जाएं। छोड़ दें। सब छोड़ दें। बिलकुल छोड़ दें, कोई पकड़ न रखें। मर ही गए।
अनुभव करें, जैसे सब मर गया...सब मर गया...सिर्फ भीतर एक ज्योति जली रह गई, और सब मर गया...सब मिट गया...सब मिट गया। अब दस मिनट के लिए शून्य में खो जाएं। साक्षी बने रहें...इस मृत्यु को देखते रहें। सब चारों तरफ मिट गया। शरीर भी छूट गया है दूर...दूर रह गया है...हम हट गए हैं। अब देखते रहें, द्रष्टा बने रहें। दस मिनट के लिए सिर्फ भीतर देखते रहें...।
(मौन सन्नाटा, सागर का गर्जन, पक्षियों की आवाजें, हवा की सरसराहट, हृदय की धड़कनें...। सब मौन, सब स्थिर हो गया है।)
(ओशो कुछ मिनट मौन रहकर फिर सुझाव देना शुरू करते हैं।)
भीतर देखते रहें...भीतर देखते रहें...बाहर सब मृत हो जाने दें। छोड़ दें...बिलकुल मृत...देखते हुए रह जाएं...द्रष्टा मात्र रह जाएं...सब छोड़ दें...जैसे मर ही गए...जैसे बाहर सब मर गया--शरीर भी...विचार भी...सिर्फ भीतर एक ज्योति रह गई देखती हुई। द्रष्टा भर रह गए हैं, साक्षी भर रह गए हैं। छोड़ दें...छोड़ दें...बिलकुल छोड़ दें...।
(मौन, निर्जन, सन्नाटा...)
जो होता हो, होने दें...बिलकुल छोड़ दें...सिर्फ भीतर देखते रहें और बिलकुल छोड़ दें...सारी पकड़ छोड़ दें...।
(मौन, निर्जन, सन्नाटा...)
मन शांत और शून्य हो गया है...मन बिलकुल शून्य हो गया है...मन शांत और शून्य हो गया है...मन बिलकुल शून्य हो गया है...मन बिलकुल शून्य हो गया है...। थोड़ी सी पकड़ रखी हो तो उसे भी छोड़ दें...बिलकुल छोड़ दें...मिट जाएं...जैसे हैं ही नहीं।
मन शून्य हो गया है...मन शांत और शून्य हो गया है...मन बिलकुल शून्य हो गया है...। भीतर देखें, भीतर होश से देखें--सब शांत हो गया है...शरीर दूर रह गया है...मन दूर रह गया है...सिर्फ एक ज्योति जलती रह गई है। चेतना का एक दीया रह गया है, प्रकाश रह गया है...।
(मौन, निर्जन, सन्नाटा...)
अब धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें। श्वास को भी देखते रहें। धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें। प्रत्येक श्वास के साथ शांति और गहरी होगी...धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें। और भीतर देखते रहें, श्वास के भी द्रष्टा रहें। मन और भी शांत हो जाएगा...दो-चार गहरी श्वास लें...फिर धीरे-धीरे आंख खोलें। कोई गिर गया हो तो पहले गहरी श्वास ले, फिर धीरे-धीरे उठे, उठते न बने तो जल्दी न करे। आंख खोलने में भी किसी को कठिनाई हो, तो जल्दी न करे, पहले गहरी श्वास ले, फिर धीरे-धीरे आंख खोले। बहुत आहिस्ता से, झटके से कुछ भी न करें--न तो उठें, न आंख खोलें...धीरे-धीरे।

हमारी सुबह की ध्यान की बैठक समाप्त हुई।

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