MAHAVIR

Mahaveer Vani 30

Thirtieth Discourse from the series of 54 discourses - Mahaveer Vani by Osho. These discourses were given in BOMBAY during AUG 18 - SEP 11 1973.
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प्रमाद-स्थान-सूत्र:

पमायं कम्ममाहंसु, अप्पमायं तहाऽवरं।
तब्भावादेसओ वावि, बालं पंडियमेव वा।।
दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो,
मोहो हओ जस्स न होई तण्हा।
तण्हा हया जस्स न होई लोहो,
लोहो हओ जस्स न किंचणाइं।।

प्रमाद को कर्म कहा है और अप्रमाद को अकर्म अर्थात जो प्रवृत्तियां प्रमादयुक्त हैं वे कर्म-बंधन करने वाली हैं और जो प्रवृत्तियां प्रमादरहित हैं, वे कर्म-बंधन नहीं करतीं। प्रमाद के होने और न होने से मनुष्य क्रमशः बालबुद्धि (मूर्ख)और पंडित कहलाता है।
जिसे मोह नहीं, उसे दुख नहीं; जिसे तृष्णा नहीं, उसे मोह नहीं; जिसे लोभ नहीं, उसे तृष्णा नहीं, और जो ममत्व से अपने पास कुछ भी नहीं रखता हो, उसका लोभ नष्ट हो जाता है।

पहले एक-दो प्रश्र्न।

एक मित्र ने पूछा है कि स्नेहयुक्त प्रेम और स्नेहमुक्त प्रेम में क्या अंतर है? साथ ही काम, प्रेम और करुणा की आंतरिक भिन्नता पर भी कुछ कहें।

जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह एक बंधन है, मुक्ति नहीं। और जो प्रेम बंधन है उसे प्रेम कहना भी व्यर्थ ही है। प्रेम का बंधन पैदा होता है अपेक्षा से। मैं किसी को प्रेम करूं तो मैं सिर्फ प्रेम करता नहीं, कुछ पाने को प्रेम करता हूं। प्रेम करना शायद साधन है, प्रेम पाना साध्य है। मैं प्रेम पाना चाहता हूं, इसलिए प्रेम करता हूं।
मेरा प्रेम करना एक इनवेस्टमेंट है। उसके बिना प्रेम पाना असंभव है। इसलिए जब मैं प्रेम करता हूं प्रेम पाने के लिए, तब प्रेम करना केवल साधन है, साध्य नहीं। नजर मेरी पाने पर लगी है। देना गौण है, देना पाने के लिए ही है। अगर बिना दिए चल जाए तो मैं बिना दिए चला लूंगा। अगर झूठा धोखा देने से चल जाए कि मैं प्रेम दे रहा हूं, तो मैं धोखे से चला लूंगा, क्योंकि मेरी आकांक्षा देने की नहीं, पाने की है। मिलना चाहिए।
जब भी हम देते हैं कुछ पाने को, तो हम सौदा करते हैं। स्वभावतः सौदे में हम कम देना चाहेंगे और ज्यादा पाना चाहेंगे। इसलिए सभी सौदे के प्रेम व्यवसाय हो जाते हैं, और सभी व्यवसाय कलह को उत्पन्न करते हैं। क्योंकि सभी व्यवसाय के गहरे में लोभ है, छीनना है, झपटना है, लेना है। इसलिए हम इस पर तो ध्यान ही नहीं देते कि हमने कितना दिया। हम सदा इस पर ध्यान देते हैं कि कितना मिला। और दोनों ही व्यक्ति इसी पर ध्यान देते हैं कि कितना मिला। दोनों ही देने में उत्सुक नहीं हैं, पाने में उत्सुक हैं।
वस्तुतः हम देना बंद ही कर देते हैं और पाने की आकांक्षा में पीड़ित होते रहते हैं। फिर प्रत्येक को यह खयाल होता है कि मैंने बहुत दिया और मिला कुछ भी नहीं।
इसलिए हर प्रेमी सोचता है कि मैंने इतना दिया और पाया क्या? मां सोचती है, मैंने बेटे को इतना प्रेम दिया और मिला क्या? पत्नी सोचती है कि मैंने पति को इतना प्रेम दिया और मिला क्या? पति सोचता है, मैंने पत्नी के लिए सब-कुछ किया, मुझे मिला क्या?
जो आदमी भी आपको कहीं कहते मिले कि मैंने इतना किया और मुझे मिला क्या, आप समझ लेना, उसने प्रेम किया नहीं, सौदा किया। दृष्टि ही जब पाने पर लगी हो, तो प्रेम जन्मता ही नहीं। यही अपेक्षा से भरा हुआ प्रेम बंधन बन जाता है। और तब इस प्रेम से सिवाय दुख के, पीड़ा के, कलह के और जहर के कुछ भी पैदा नहीं होता।
एक और प्रेम भी है जो व्यवसाय नहीं है, सौदा नहीं है। उस प्रेम में देना ही महत्वपूर्ण है, लेने का सवाल ही नहीं उठता। देने में ही बात पूरी हो जाती है, देना ही साध्य है। तब वैसा व्यक्ति प्रेम मिले, इसकी भाषा में नहीं सोचता, प्रेम दिया, इतना काफी है। मैं प्रेम दे सका, इतना काफी है। और जिसने मेरा प्रेम लिया उसका अनुग्रह है, क्योंकि लेने से भी इनकार किया जा सकता है।
फर्क को समझ लें।
मैं अगर आपको प्रेम दूं और मेरी नजर लेने पर हो तो बंधन निर्मित होगा। और अगर मैं प्रेम दूं और मेरी नजर देने पर ही हो तो प्रेम मुक्ति बन जाएगा। और जब प्रेम मुक्ति होता है, तभी उसमें सुवास होती है। क्योंकि जब आगे कुछ मांग नहीं है तो पीड़ा का कोई कारण नहीं रह जाता। और जब प्रेम देना ही होता है, मात्र देना, तो जो ले लेता है उसके अनुग्रह के प्रति, उसकी दया के प्रति, उसने स्वीकार किया, इसके प्रति भी मन गहरे आभार से भर जाता है, अहोभाव से भर जाता है। जो मांगता है, वह सदा कहेगा कि मुझे कुछ मिला नहीं। जो देता है वह कहेगा कि इतने लोगों ने मेरा प्रेम स्वीकार किया, इतना स्वीकार किया, इतना मेरे प्रेम में कुछ था भी नहीं कि कोई स्वीकार करे।
जिसका जोर देने पर है, उसका अनुग्रह भाव बढ़ता जाएगा। जिसका जोर लेने पर है उसका भिक्षा भाव बढ़ता जाएगा। और भिखारी कभी भी धन्यवाद नहीं दे सकता, क्योंकि भिखारी की आकांक्षाएं बहुत हैं और जो मिलता है, वह हमेशा थोड़ा है। सम्राट धन्यवाद दे सकता है, क्योंकि देने की बात है, लेने की कोई बात नहीं है। ऐसा प्रेम बंधन मुक्त हो जाता है।
इसमें और एक बात समझ लेनी जरूरी है जो बड़ी मजेदार है और जीवन के जो गहरे पैराडाक्से़ज, जीवन के जो गहरे विरोधाभास हैं, पहेलियां हैं, उनमें से एक है। जो मांगता है उसे मिलता नहीं और जो नहीं मांगता उसे बहुत मिल जाता है। जो देता है पाने के लिए उसके हाथ की पूंजी समाप्त हो जाती है, लौटता कुछ नहीं है। जो देता है पाने के लिए नहीं, दे देने के लिए, बहुत वर्षा हो जाती है उसके ऊपर; बहुत लौट आता है।
उसके कारण हैं।
जब भी हम मांगते हैं तो दूसरे आदमी को देना मुश्किल हो जाता है। जब भी हम मांगते हैं तो दूसरे आदमी को लगता है कि उससे कुछ छीना जा रहा है। जब भी हम मांगते हैं तो दूसरे आदमी को लगता है, वह परतंत्र हो रहा है। जब हमारी मांग उसे चारों तरफ से घेर लेती है तो उसे लगता है कि कारागृह हो गया है यह। अगर वह देता भी है तो मजबूरी है, प्रसन्नता खो जाती है। और बिना प्रसन्नता के जो दिया गया है वह कुम्हलाया हुआ होता है, मरा हुआ होता है। अगर वह देता भी है तो कर्तव्य हो जाता है, एक भार हो जाता है कि देना पड़ेगा। और प्रेम इतनी कोमल, इतनी डेलिकेट, इतनी नाजुक चीज है कि कर्तव्य का खयाल आते ही मर जाती है।
जहां खयाल आ गया कि यह प्रेम मुझे करना ही पड़ेगा, यह मेरा पति है, यह मेरी पत्नी है, यह मेरा मित्र है, यह तो प्रेम करना ही पड़ेगा। जहां प्रेम करना पड़ेगा बन जाता है, कर्तव्य बन जाता है, वहीं वह प्राण तिरोहित हो गए जिससे पक्षी उड़ता था। अब मरा हुआ पक्षी है, जिसके पंख सजा कर रखे जा सकते हैं, लेकिन उड़ने के काम नहीं आ सकते। वह जो उड़ता था, वह थी स्वतंत्रता। कर्तव्य में कोई स्वतंत्रता नहीं है, एक बोझ है, एक ढोने का खयाल है।
प्रेम इतना नाजुक है कि इतना सा बोझ भी नहीं सह सकता। प्रेम सूक्ष्मतम घटना है मनुष्य के मन में घटने वाली। जहां तक मन का संबंध है, प्रेम बारीक से बारीक घटना है। फिर प्रेम के बाद मन में और कोई बारीक घटना नहीं है। फिर तो जो घटता है वह मन के पार है, जिसको हम प्रार्थना कहते हैं। वह मन के भीतर नहीं है। लेकिन मन की आखिरी सीमा पर, मन का जो सूक्ष्मतम रूप घट सकता है, वह प्रेम है। शुद्धतम, मन की जो आत्यंतिक, अल्टीमेट पासिबिलिटी है, आखिरी संभावना है, वह प्रेम है। वह बहुत नाजुक है। हम उसके साथ पत्थर की तरह व्यवहार नहीं कर सकते।
तो जो मांगता है, उसे मिलता नहीं। तब एक दुष्टचक्र पैदा होता है। जितना नहीं मिलता, उतना ज्यादा आदमी मांगता है क्योंकि वह कहता है कि नहीं मांगूगा तो मिलेगा कैसे? जितना ज्यादा मांगता है, उतना नहीं मिलता। और ज्यादा मांगता है, और भी नहीं मिलता। और जब पाता है कि बिलकुल नहीं मिल रहा है तो वह सिर्फ मांगने वाला एक भिखारी हो जाता है, जो मांगता ही चला जाता है। वह मांगता चला जाता है, मिलना उतना ही मुश्किल होता चला जाता है। वह अपने हाथों अपने को तोड़ रहा है।
जो नहीं मांगता, उसे बहुत मिलता है। तब एक शुभ-चक्र पैदा हो जाता है। जैसे ही यह समझ में आ जाता है कि नहीं मांगता हूं तो मिलता है, वैसे ही मांग समाप्त होती चली जाती है। जितनी मांग समाप्त होती है उतना प्रेम मिलता चला जाता है; जिस दिन कोई मांग नहीं रह जाती, उस दिन सारे जगत का प्रेम बरस पड़ता है।
जो मांगता है, मांगने के कारण ही वंचित रह जाता है। जो नहीं मांगता, नहीं मांगने के कारण ही मालिक हो जाता है। मांगने वाला मालिक हो भी नहीं सकता, केवल देने वाला मालिक हो सकता है। इसलिए मैंने पीछे आपसे कहा, जो आप देते हैं, उसी के आप मालिक हैं। जो आप मांगते हैं, उसके आप मालिक नहीं हैं। मांगने से जो मिल जाए, उसके भी आप मालिक नहीं हैं। जो देने से चला जाए उसी के आप मालिक हैं।
ऐसे प्रेम को हम कहेंगे, बंधनमुक्त, जो सिर्फ दान है, अपेक्षारहित, बेशर्त, अनकंडीशनल। धन्यवाद की भी अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। लेकिन हम कहेंगे, यह तो बड़ा कठिन है। अगर हम धन्यवाद की भी अपेक्षा न करें, कुछ भी अपेक्षा न करें, तो हम प्रेम करेंगे ही क्यों?
हम सबको यह खयाल है कि हम प्रेम करते ही इसलिए हैं कि कुछ पाना है। तब आपको पता ही नही है। प्रेम का सारा आनंद करने में ही है। उसके बाहर कुछ भी नहीं है। करने में ही उसका सारा आनंद है, उसके पार कुछ भी नहीं है।
विनसेंट वानगॉग कोई तीन सौ चित्र छोड़ गया है। उसका एक भी चित्र बिका नहीं, जब वह जिंदा था। कोई पांच-दस रुपये में भी लेने को राजी नहीं था। आज उसके एक-एक चित्र की कीमत पांच लाख, दस लाख रुपया है। वानगॉग का भाई था, थियो उसका नाम था। वही भाई उसको कुछ पैसे देकर उसकी जिंदगी चलाता था। उसने कई बार विनसेंट वानगॉग को कहा कि बंद करो यह, इससे कुछ मिलता तो है ही नहीं। तुम चित्र बनाए चले जाते हो, मिलता तो कुछ भी नहीं। भूखे मरते हो। क्योंकि उसे जितना थियो देता था उससे सिर्फ उसकी रोटी का काम चल सकता था सात दिन। तो वह चार दिन खाना खाता था, तीन दिन उपवास करता था। ताकि तीन दिन में जो रोटी के पैसे बचें उनसे रंग और कैनवास खरीदा जा सके। उनसे वह चित्र बनाता था। इस तरह बहुत कम लोगों ने चित्र बनाए हैं, इसलिए जैसे चित्र वानगॉग ने बनाए हैं, वैसे चित्र किसी ने भी नहीं बनाए।
लेकिन वानगॉग हंसता और वह कहता कि मिलना! जब मैं चित्र बनाता हूं तब मिल जाता है। जब बना रहा होता हूं, तब सब मिल जाता है। चित्र बनने के बाद कुछ मिलेगा, यह बात ही बेहूदी है। इसका बनाने से कोई संबंध ही नहीं है। जब मैं बनाता हूं, तभी मेरे प्राण उस बनाने में खिल जाते हैं। जब वहां रंग खिलने लगते हैं, तब मेरे भीतर भी रंग खिलने लगते हैं। जब वहां रूप निर्मित होने लगता है, तब मेरे भीतर भी रूप निर्मित होने लगता है। जब वहां सौंदर्य प्रकट हो जाता है, तो मेरे भीतर भी सौंदर्य प्रकट हो जाता है। वह चित्र में हुआ सूर्योदय, मेरे भीतर हो रहा भी सूर्योदय है, साथ ही साथ। उसके पार और कुछ मिलने का सवाल ही नहीं है, यह बात ही व्यवसायी की है। व्यवसायी सोचेगा चित्र बना कर, बिकेगा या नहीं।
थियो ने एक बार सोचा कि बेचारा वानगॉग! जिंदगी भर बनाता हो गया, क्योंकि थियो सोच ही नहीं सकता, वह एक दुकानदार है। वह भी काम करता है चित्रों के बेचने का। वह एक दुकानदार है, वह चित्र बेचने का काम करता है। उसकी कल्पना के ही बाहर है, समझ के ही बाहर है कि चित्र बनाने में ही कोई बात हो सकती है, जब तक चित्र बिके न, तब तक बेमानी है। तब तक व्यर्थ गया श्रम।
उसने सोचा कि यह वानगॉग जीवन भर हो गया बनाते-बनाते, इसका एक चित्र न बिका। कितना दुखी न होता होगा मन में! स्वभावतः व्यवसायी को लगेगा कि कितना दुखी न होता होगा मन में, कभी कुछ मिला नहीं। सारा जीवन व्यर्थ गया। तो उसने एक मित्र को कुछ पैसे दिए और कहा कि जाकर वानगॉग का एक चित्र खरीद लो, कम से कम एक चित्र तो उसका बिके। उसको लगे कि कुछ मेरा चित्र भी बिका।
वह मित्र गया। उसे तो खरीदना था, यह कर्तव्य था। उसे कोई चित्र से लेना-देना तो था नहीं। वानगॉग चित्र दिखा रहा है, वह चित्र वगैरह देखने में उतना उत्सुक नहीं है, वह एक चित्र देख कर कहता है कि यह मैं खरीदना चाहता हूं। देखने में उसने कोई रस न लिया, डूबा भी नहीं, चित्रों में उतरा भी नहीं, चित्रों से उसका कोई स्पर्श भी नहीं हुआ। वानगॉग खड़ा हो गया, उसकी आंख से आंसू गिरने लगे। उसने कहा कि मालूम होता है, मेरे भाई ने तुम्हें पैसे देकर भेजा। तुम बाहर निकल जाओ और कभी दुबारा लौट कर यहां मत आना। चित्र बेचा नहीं जा सकता।
वह आदमी तो हैरान हुआ। वानगॉग का भाई भी हैरान हुआ कि यह पता कैसे चला! जब उसने वानगॉग से पूछा तो वानगॉग ने कहा, इसमें भी कुछ पता चलने की बात थी! उस आदमी को मतलब ही न था चित्रों से। उसे खरीदना था। खरीदने में उसका कोई भाव नहीं था। मैं समझ गया कि तुमने ही भेजा होगा। जीवन भर जिसके चित्र नहीं बिके, हमें भी लगेगा, कितनी पीड़ा रही होगी, लेकिन वानगॉग पीड़ित नहीं था। आनंदित था। आनंदित था इसलिए कि वह बना पाया।
प्रेम भी ऐसा ही है। वह चित्र बनाना वानगॉग का प्रेम था। जब आप किसी को प्रेम करते हैं तो पीछे कुछ मिलेगा, ऐसा नहीं, जब आप प्रेम करते हैं तभी आपके प्राण फैलते हैं, विस्तृत होते हैं। जब आप प्रेम के क्षण में होते हैं तभी आपकी चेतना छलांग लगा कर ऊंचाइयों पर पहुंच जाती है। जब आप प्रेम के क्षण में होते हैं, जब आप प्रेम दे रहे होते हैं, तभी वह घटना घट जाती है जिसे आनंद कहते हैं। अगर आपको वह घटना नहीं घटी है तो आप समझना कि आप व्यवसायी हैं, प्रेम के काव्य को आपने जाना नहीं है।
अगर आप पूछते हैं कि मिलेगा क्या, तब फिर बहुत फर्क नहीं रह जाता, तब बहुत फर्क नहीं रह जाता। एक वेश्या भी प्रेम करती है, वह भी मिलने के लिए, क्या मिलेगा? इसमें उत्सुक है, प्रेम में उत्सुक नहीं है। एक पत्नी भी प्रेम करती है, वह भी क्या मिलेगा, इसमें उत्सुक है। प्रेम में उत्सुक नहीं है। मिलना सिक्कों में हो सकता है, साड़ियों में हो सकता है, मिलना गहनों में हो सकता है, मकान में हो सकता है, सुरक्षा में हो सकता है, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। यह सब इकोनॉमिकली हैं, सभी आर्थिक मामले हैं, चाहे नगद रुपये हों, चाहे नगद साड़ियां हों, चाहे नगद गहने हों, चाहे नगद मकान हो, चाहे भविष्य की सुरक्षा हो, बुढ़ापे में सेवा की व्यवस्था हो, कुछ भी हो, यह सब पैसे का ही मामला है।
तो वेश्या में और फिर प्रेयसी में फर्क कहां है? इतना ही फर्क है कि वेश्या तत्काल इंतजाम कर रही है, प्रेयसी लंबा इंतजाम कर रही है, लांग टर्म प्लानिंग है। लेकिन फर्क कहां है? अगर मिलने पर ध्यान है तो कोई फर्क नहीं है। प्रेम वहां नहीं है, व्यवसाय है। फिर व्यवसाय कई ढंग के होते हैं--पत्नी के ढंग का भी होता है, वेश्या के ढंग का भी होता है।
यह वेश्या और पत्नी में कोई बुनियादी अंतर तब तक नहीं हो सकता, जब तक ध्यान मिलने पर लगा हुआ है। बुनियादी अंतर उस दिन पैदा होता है जिस दिन प्रेम अपने में पूरा है, उसके पार कुछ भी नहीं। इसका यह मतलब नहीं कि उसके पार कुछ घटित नहीं होगा, बहुत घटित होगा, लेकिन मन से उसका कोई लेना-देना नहीं है। उसकी कोई अपेक्षा नहीं है, उसकी कोई आयोजना नहीं है। क्षण काफी है, क्षण अनंत है। जो मौजूद है वह बहुत है।
इसलिए प्रेम में एक गहन संतृप्ति है, एक गहन संतोष है। एक इतनी गहन तृप्ति का भाव है, फुलफिलमेंट का, सब आप्तकाम मन हो जाता है। लेकिन हम प्रेमियों को देखें, वहां कोई फुलफिलमेंट नहीं है। वहां सिवाय दुख, छीना-झपटी, कलह, और ज्यादा, और ज्यादा मिलना चाहिए, उसकी दौड़, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या--ऐसी हजार तरह की बीमारियां हैं, तृप्ति का कोई भी भाव नहीं है।
जिस प्रेम में मांग है, वह बंधनयुक्त है। और जिस प्रेम में दान है, वह बंधनमुक्त है। यह जो मुक्त दान है प्रेम का, इसमें अगर काम की घटना घटती हो; यह जो दान है मुक्त प्रेम का... इसे ठीक से समझ लें।
जिसमें मांग है उसमें तो काम घटेगा ही। घटेगा नहीं, काम के लिए ही प्रेम होगा। सेक्स ही आधार होगा सारे प्रेम का जिसमें व्यवसाय है। वहां प्रेम तो बहाना होगा। वैज्ञानिक कहते हैं, वह जस्ट ए फोर प्ले--वह कामवासना में उतरने के पहले की थोड़ी क्रीड़ा।
इसलिए जब नया-नया संबंध होता है दो व्यक्तियों का, तो काफी काम-क्रीड़ा चलती है। पति-पत्नी की काम-क्रीड़ा बंद हो जाती है। सीधा काम ही हो जाता है। फोर प्ले, वह जो पहले का खेल है, वह सब बंद हो जाता है। उसकी कोई जरूरत नहीं रह जाती, लोग आश्र्वस्त हो जाते हैं।
जिसमें लक्ष्य कुछ और है, कुछ पाना है, वहां यौन केंद्र होगा। जहां लक्ष्य कोई और नहीं है, प्रेम देना है, वहां भी यौन घटित हो सकता है, लेकिन गौण होगा। छाया की तरह होगा। यौन के लिए वहां प्रेम नहीं होगा, प्रेम की घटना में यौन भी घट सकता है। लेकिन तब वह यौन सेक्सुअल नहीं रह जाएगा। उसमें दृष्टि ही पूरी बदल जाएगी। वह प्रेम की विराट घटना के बीच घटती हुई एक घटना होगी। प्रेम यौन के लिए नहीं होगा, प्रेम में कहीं यौन समाविष्ट हो जाएगा।
यह दूसरी स्थिति है, लेकिन यौन संभव है। इसकी शुद्धतम तीसरी स्थिति है जहां यौन तिरोहित हो जाता है। उसी को हम करुणा कहते हैं। जहां प्रेम बस प्रेम रह जाता है। न तो यौन लक्ष्य रहता, और न यौन, प्रेम के बीच में घटने वाली कोई चीज रहती है। सिर्फ प्रेम रह जाता है।
जैसे हम दीया जलाएं, तो थोड़ा सा धुआं उठे। जैसे हम धुआं करें, तो थोड़ी सी लपट जले। एक आदमी धुआं करे तो थोड़ी सी लपट जल जाए। ऐसा है पहले ढंग का प्रेम। यौन, धुआं असली चीज है। अगर उस धुएं के करने में कहीं लपट जल जाती है प्रेम की, तो गौण है, बात अलग है। जल जाए तो ठीक, न जले तो ठीक। और जले भी तो उसके जलाने का मजा इतना ही है कि धुआं ठीक से दिखाई पड़ जाए। बाकी और कोई प्रयोजन नहीं है।
दूसरी स्थिति, जहां हम दीये की ज्योति जलाते हैं। लक्ष्य ज्योति का जलाना है। थोड़ा धुआं भी पैदा हो जाता है। धुएं के लिए ज्योति नहीं जलाई है। ज्योति जलाते हैं तो थोड़ा धुआं पैदा हो जाता है। प्रेम जलाते हैं तो थोड़ा सा यौन सरक आता है।
तीसरी अवस्था है, जहां सिर्फ शुद्ध ज्योति रह जाती है, कोई धुआं नहीं रहता--स्मोकलेस फ्लेम, धूम्ररहित ज्योति। उसका नाम करुणा है।
हम पहले प्रेम में जीते हैं। कभी-कभी कोई कवि, कोई चित्रकार, कोई संगीतज्ञ, कोई कलात्मक, एस्थेटिक बुद्धि की प्रज्ञा, दूसरे प्रेम को उपलब्ध होती है। लाखों में एक और कभी करोड़ों में एक व्यक्ति तीसरे प्रेम को उपलब्ध होता है--बुद्ध, महावीर, क्राइस्ट, कृष्ण, यह है शुद्ध प्रेम। यहां अब लेने का तो कोई सवाल ही नहीं है, यहां अब देने का भी भाव नहीं है।
इसको ठीक से समझ लें।
यहां लेने का तो कोई सवाल ही नहीं है, यहां देने का भी कोई भाव नहीं है। यहां तो करुणा ऐसे ही बहती है जैसे फूल से गंध बहती है। राह निर्जन हो तो भी बहती है। कोई न निकले तो भी बहती है। जैसे दीये से रोशनी बहती है। कोई न हो देखने वाला तो भी बहती है।
पहले तरह के प्रेम में कोई देने वाला हो, तो बहता है। दूसरे तरह के प्रेम में कोई लेने वाला हो, तो बहता है। तीसरे तरह के प्रेम में जिसको हमने करुणा कहा है, कोई भी न हो, न लेने वाला, न देने वाला, तो भी बहता है; स्वभाव है।
बुद्ध अकेले बैठे हैं तो भी करुणापूर्ण हैं। कोई आ गया तो भी करुणापूर्ण हैं। कोई चला गया तो भी करुणापूर्ण हैं।
पहला प्रेम मांग करता है कि मेरे अनुकूल जो है वह दो, तो मेरे प्रेम को मैं दूंगा। दूसरा प्रेम अनुकूल की मांग नहीं करता, लेकिन जहां प्रतिकूल होगा वहां से हट जाएगा। तीसरा प्रेम, प्रतिकूल हो, तो भी नहीं हटेगा।
मैं दूं पहले प्रेम में आप भी लौटाएं तो ही टिकेगा। दूसरे प्रेम में आप न लौटाएं, सिर्फ लेने को राजी हों तो भी टिकेगा। तीसरे प्रेम में आप द्वार भी बंद कर लें, लेने को भी राजी न हों, नाराज भी हो जाते हों, क्रोधित भी होते हों, तो भी बहेगा।
तीसरा प्रेम अबाध है, उसे कोई बाधा नहीं रोक सकती। उसे लेने वाला भी नहीं रोक सकता। वह बहता ही रहेगा। वह अपने को लेने से रोक सकता है, लेकिन प्रेम की धारा को नहीं रोक सकता। उसको हमने करुणा कहा है।
करुणा प्रेम का परम रूप है।
पहला प्रेम, शरीर से बंधा होता है। दूसरा प्रेम, मन के घेरे में होता है। तीसरा प्रेम, आत्मा के जीवन में प्रवेश कर जाता है। ये हमारे तीन घेरे हैं--शरीर का, मन का, आत्मा का।
शरीर से बंधा हुआ प्रेम यौन होता है मूलतः। प्रेम सिर्फ आस-पास चिपकाए हुए कागज के फूल होते हैं। दूसरा प्रेम मूलतः प्रेम होता है। उसके आस-पास शरीर की घटनाएं भी घटती हैं, क्योंकि मन शरीर के करीब है। तीसरे प्रेम में शरीर बहुत दूर हो जाता है, बीच में मन का विस्तार हो जाता है, शरीर से कोई संबंध नहीं रह जाता। तीसरा प्रेम शुद्ध आत्मिक है।
एक प्रेम है शारीरिक, बंधन वाला। दूसरा प्रेम है शुद्ध मानसिक, निर्बंध। तीसरा प्रेम है शुद्ध आत्मिक। न बंधन है, न अबंधन है। न लेने का भाव है, न देने का भाव है। तीसरा प्रेम है स्वभाव।
बुद्ध से कोई पूछे, महावीर से कोई पूछे कि क्या आप हमें प्रेम करते हैं, तो वे कहेंगे कि नहीं। वे कहेंगे, हम प्रेम हैं, करते नहीं हैं। करते तो वे लोग हैं जो प्रेम नहीं हैं। उन्हें करना पड़ता है, बीच-बीच में करना पड़ता है। लेकिन जो प्रेम ही है, उसे करना नहीं पड़ता, करने का खयाल ही नहीं उठता। करना तो हमें उन्हीं चीजों को पड़ता है--जो हम नहीं हैं। ‘करना’ अभिनय है--‘होना’--तो डूइंग और बीइंग का, करने और होने का फर्क है। करते हम वह हैं, जो हम हैं नहीं। मां कहती है, मैं बेटे को प्रेम करती हूं, क्योंकि वह प्रेम है नहीं। पति कहता है, मैं पत्नी को प्रेम करता हूं, क्योंकि वह प्रेम है नहीं। बुद्ध नहीं कहते कि मैं प्रेम करता हूं, महावीर नहीं कहते हैं कि मैं प्रेम करता हूं, क्योंकि वे प्रेम हैं। प्रेम उनसे हो ही रहा है। करने के लिए कोई चेष्टा, कोई आयोजन, कोई विचार भी आवश्यक नहीं है।

अब सूत्र:
‘प्रमाद को कर्म कहा है, अप्रमाद को अकर्म। जो प्रवृत्तियां प्रमादयुक्त हैं, वे कर्म-बंधन वाली हैं। जो प्रवृत्तियां प्रमादरहित हैं, वे कर्म-बंधन नहीं करतीं। प्रमाद के होने न होने से मनुष्य क्रमशः मूढ़ और प्रज्ञावान कहलाता है।’
जो मैं कह रहा था, उससे जुड़ा हुआ सूत्र है। महावीर करने को कर्म नहीं कहते हैं, न करने को अकर्म नहीं कहते हैं। हम करते हैं तो कहते हैं कर्म, और नहीं करते हैं तो कहते हैं अकर्म। हमारा जानना बहुत ऊपरी है। आपने क्रोध नहीं किया तो आप कहते हैं कि मैंने क्रोध नहीं किया। आपने क्रोध किया तो आप कहते हैं मैंने क्रोध किया। जब आप कुछ करते हैं तो उसको कर्म कहते हैं, और कुछ नहीं करते हैं तो उसे अकर्म कहते हैं।
महावीर प्रमाद को कर्म कहते हैं, करने को नहीं। महावीर कहते हैं, मूर्च्छा से किया हुआ हो तो कर्म, होशपूर्वक किया हो तो अकर्म। जरा जटिल है और थोड़ा गहन उतरना पड़ेगा।
अगर आपने कोई भी काम बेहोशीपूर्वक किया हो, आपको करना पड़ा हो, आप अचेतन हो गए हों करते वक्त, आप अपने मालिक न रहे हों करते वक्त, आपको ऐसा लगा हो कि जैसे आप पजेस्ड हो गए हैं, किसी ने आपसे करवा लिया है, आप मुक्त नियंता न रहे हों, तो कर्म है।
अगर आप अपने कर्म के मालिक हों, नियंता हों, किसी ने करवा न लिया हो, आपने ही किया हो पूरी सचेतनता से, पूरे होश से, अप्रमाद से, तो महावीर कहते हैं; अकर्म।
इसे हम उदाहरण लेकर समझें।
आपने क्रोध किया। क्या आप कह सकते हैं कि आपने क्रोध किया? या आपसे क्रोध करवा लिया गया? एक आदमी ने गाली दी, एक आदमी ने आपको धक्का मार दिया, एक आदमी ने आपके पैर पर पैर रख दिया, एक आदमी ने आपको इस ढंग से देखा, इस ढंग का व्यवहार किया कि क्रोध आप में हुआ, क्रोध आप में किसी से पैदा हुआ। यह आदमी गाली न देता, यह आदमी पैर पर पैर न रख देता, यह आदमी इस भद्दे ढंग से देखता नहीं तो क्रोध नहीं होता। क्रोध आपने नहीं किया, किसी और ने आपसे करवा लिया--पहली बात। मालिक कोई और है, मालिक आप नहीं हैं। इसको कर्म कहना ही फिजूल है, करने वाले ही जब आप नहीं हैं, तो इसे कर्म कहना फिजूल है। बटन हमने दबाई और पंखा चल पड़ा। पंखा नहीं कह सकता कि यह मेरा कर्म है। या कि कह सकता है? बटन बंद कर दी, पंखा चलना बंद हो गया। यह पंखे से करवाया गया। पंखा मालिक नहीं है, पंखा अपने वश में नहीं है। पंखा किसी और के वश में है।
और के वश में होने का मतलब होता है, बेहोश होना। जब आप क्रोध करते हैं तब आप होश में करते हैं? कभी आपने होश में क्रोध किया है? करके देखना चाहिए। पूरा होश सम्हाल कर कि मैं क्रोध कर रहा हूं, और तब आप अचानक पाएंगे कि पैर के नीचे से जमीन खिसक गई, क्रोध तिरोहित हो गया।
होशपूर्वक आज तक क्रोध नहीं हो सका। और जब भी होगा तब बेहोशी में होगा। जब आप क्रोध करते हैं तब आप मौजूद नहीं होते, आप यंत्रवत हो जाते हैं। कोई बटन दबाता है, क्रोध हो जाता है। कोई बटन दबाता है, प्रेम हो जाता है। कोई बटन दबाता है, ईर्ष्या हो जाती है। कोई बटन दबाता है, यह हो जाता है, वह हो जाता है। आप हैं कि सिर्फ बटनों का एक जोड़ हैं, एक मशीन हैं जिसमें कई बटनें लगी हैं। यहां से दबाओ, ऐसा हो जाता है; वहां से दबाओ, वैसा हो जाता है।
एक आदमी मुस्कुराते हुए आकर कह देता है कुछ दो शब्द प्रशंसा के, भीतर कैसे गीत लहराने लगते हैं, वीणा बजने लगती है। और एक आदमी जरा तिरछी आंख से देख लेता है और एक तिरस्कार का भाव आंख से झलक जाता है। भीतर सब फूल मुरझा जाते हैं, सब धारा रुक जाती है गीत की। आग जलने लगती है, धुआं फैलने लगता है। आप हैं या सिर्फ चारों तरफ से आने वाली संवेदनाओं का आघात आपको चलायमान करता रहता है?
महावीर कहते हैं, मैं उसे ही कर्म कहता हूं, जो प्रमाद में किया गया हो। उसी से बंधन निर्मित होता है, इसलिए कर्म कहता हूं। जिसको आपने मूर्च्छा में किया है, उससे आप बंध जाएंगे। करने में ही बंध गए हैं, करने के पहले भी बंधे थे, इसीलिए किया है। वह बंधन है।
अगर हम अपने कर्मों की जांच-पड़ताल करें तो हम पाएंगे, वे सभी ऐसे हैं। वे सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। उसमें हम कहीं भी मालिक नहीं हैं। हम केवल तंतुओं का एक जोड़ हैं और जगह-जगह से तंतु खींचे जाते हैं, और हमारे भीतर कुछ होता है। इसे महावीर कहते हैं, प्रमाद, मूर्च्छा, बेहोशी, अचेतना।
एक आदमी ने गाली दी, क्रोध हो गया। दोनों के बीच में जरा भी अंतराल नहीं है, जहां आप सजग हुए हों। और जहां आपने होशपूर्वक सुना हो कि गाली दी गई, और जहां आपने होशपूर्वक भीतर देखा हो कि कहां क्रोध पैदा हो रहा है, आप अगर दूर खड़े हो गए हों, गाली दी गई है, गाली सुनी गई है, गाली देने वाले के भीतर क्या हो रहा है, गाली सुनने वाले के भीतर क्या हो रहा है, अगर इन दोनों के पार खड़े होकर आपने देखा हो क्षण भर, तो उसका नाम होश है।
कहां लगी गाली, कहां घाव किया उसने, कहां छू दिया कोई पुराना छिपा हुआ घाव, कहां हरा हो गया कोई दबा हुआ घाव, कहां पड़ी चोट, क्यों पड़ी चोट, कहां भीतर मवाद बहने लगी। इसको अगर आपने खड़े होकर निष्पक्ष भाव से देखा हो जैसे यह गाली किसी और को दी गई हो, और ने तो दी है, किसी और को दी गई हो, अगर यह भी आपने देखा हो तो आप होश के क्षण में हैं। तो अप्रमाद है। और फिर आपने निर्णय किया हो कि क्या करना, और यह निर्णय शुद्ध रूप से आपका हो। यह निर्णय आपसे करवा न लिया गया हो, यह निर्णय आपका हो।
बुद्ध को कोई गाली दे, महावीर को कोई पत्थर मारे, जीसस को कोई सूली लगाए, तो भी वे साक्षी बने रहते हैं। यह जो साक्षीभाव है, तो भी वे देखते रहते हैं। जीसस मरते वक्त भी प्रार्थना करते हैं: हे प्रभु, इन सबको माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं!
यह वही आदमी कह सकता है जो अपने शरीर से भी दूर खड़ा हो। नहीं तो यह कैसे कह सकते हैं आप? आपको कोई सूली दे रहा हो, और आप यह कह सकते हैं कि इनको माफ कर देना?
जीसस के शिष्य नहीं सोच रहे थे ऐसा। जीसस के शिष्य सोच रहे थे, इस वक्त होगा चमत्कार। पृथ्वी फटेगी, आग बरसेगी आकाश से, महाप्रलय हो जाएगी। जीसस का एक इशारा और भगवान से यह कहना कि नष्ट कर दो इन सबको, अभी चमत्कार हो जाएगा।
लेकिन जीसस ने जो कहा वह असली चमत्कार है। अगर जीसस ने यह कहा होता कि नष्ट कर दो इन सबको, आग लगा दो, राख कर दो इस पूरी भूमि को, जिन्होंने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया। मैं जो ईश्र्वर का इकलौता बेटा हूं। हे पिता, नष्ट कर दे इन सबको, तो शिष्य समझते कि चमत्कार हुआ।
लेकिन यह चमत्कार नहीं था, यह तो आप भी करते। यह तो कोई भी कर सकता था। यह चमत्कार था ही नहीं, क्योंकि यह तो जिसको सूली लगती है वह करता ही है, हो या न हो यह दूसरी बात है। सूली तो बहुत दूर है, कांटा गड़ता है तो सारी दुनिया में आग लगवा देने की इच्छा होती है। जरा सा दांत में दर्द होता है तो लगता है, कोई ईश्र्वर वगैरह नहीं है। सब नरक है।
यह तो सभी करते। आप थोड़ा सोचें, आप सूली पर लटके होते, क्या भाव उठता आपके भीतर? न तो पृथ्वी फटती आपके कहने से, क्योंकि ऐसे फटने लगे तो एक दिन भी बिना फटे नहीं रह सकती। एक क्षण नहीं रह सकती। न कोई सूरज आग बरसाता, न और कुछ होता। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपका मन तो यही होता कि हो जाए ऐसा।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है जो जिंदगी में दस-पांच बार हत्याएं करने का विचार न करता हो। दस-पांच बार अपनी हत्या करने का विचार न करता हो। दस-पांच बार सारी दुनिया को नष्ट कर देने का जिसे खयाल न आ जाता हो, ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है।
जीसस ने यह जो कहा कि इनको माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं, इसमें कई बातें निहित हैं।
पहली बात, ये जीसस के साथ कर रहे हैं, ऐसा जीसस को अगर लगता हो तो यह बात पैदा नहीं हो सकती। जिसके साथ ये कर रहे हैं वह जीसस से उतना ही दूर है जितना कि ये करने वाले लोग दूर हैं। यह चेतना भीतर अलग खड़ी है। एक तीसरा कोण मौजूद हो गया है।
साधारण आदमी की जिंदगी में दो कोण होते हैं--करने वाला, जिस पर किया जा रहा है, वह।
होश वाले आदमी की जिंदगी में तीन कोण होते हैं--जो कर रहा है वह, जिस पर किया जा रहा है वह, और जो दोनों को देख रहा है वह।
यह जो थर्ड, यह जो तीसरा है, यह जो तीसरी आंख है, यह जो देखने का तीसरा स्थान है, इसे महावीर कहते हैं, अप्रमाद।
बड़ा मुश्किल है, सूली पर चढ़े हों, हाथ में कीलें ठोके जा रहे हों, होश बचाए रखना मुश्किल है। जरा सा एक आदमी धक्का देता है, होश खो जाता है। हमारा होश है ही कितना? किसी आदमी का होश मिटाना हो, जरा सी, कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। जरा सा कुछ और सारा होश खो जाता है। होश जैसे है ही नहीं। एक झीनी पर्त है, झूठी पर्त है ऊपर-ऊपर। जरा सा कंपन, सब टूट जाता है।
किसी भी आदमी को पागल करने में कितनी देर लगती है। आप जरूर दूसरों के बाबत सोच रहे होंगे, जिन-जिन को आपने पागल किया है। अपने बाबत सोचिए। पत्नी एक शब्द बोल देती है, और आप पागल हो जाते हैं। पत्नी को भी तब तक राहत नहीं मिलती, जब तक आप पागल हो न जाएं। अगर न हों तो उसको लगता है, वश के बाहर हो गए।
एक मित्र मेरे पास आते हैं। पत्नी कर्कशा है, उपद्रवी है। वे मुझसे बार-बार कहते हैं, क्या करूं! सब सम्हाल कर घर जाता हूं, लेकिन उसका एक शब्द, और आग में घी का काम हो जाता है। बस उपद्रव शुरू हो जाता है।
मैंने उनसे कहा कि एक दिन सम्हाल कर मत जाओ, क्योंकि सम्हाल कर तुम जो जाते हो वही तुम्हारे भीतर इकट्ठा हो जाता है। फिर पत्नी जरा सा घी छिड़क देती है तो आग तो तुम सम्हाल कर ला रहे हो। एक दिन तुम सम्हाल कर जाओ ही मत। गीत गुनगुनाते जाओ, नाचते जाओ, सम्हाल कर मत जाओ, कोई फिकर ही मत करो, जो होगा देखा जाएगा। और जब पत्नी कुछ करे, क्योंकि तुमने आज तक बहुत क्रोध पत्नी पर कर लिया, कोई परिणाम तो होता नहीं, कोई हल तो होता नहीं। एक नई तरकीब का उपयोग करो। जब पत्नी कुछ करे तो तुम मुस्कुराते रहना। कुछ नहीं करना है, ऐसा नहीं, कुछ नहीं करोगे तो मुश्किल पड़ेगी। तुम मुस्कुराते रहना। यह कुछ करना रहेगा, एक बहाना रहेगा। हंसते रहना।
पांच-सात दिन बाद उनकी पत्नी ने आकर कहा कि मेरे पति को क्या हो गया है। बिलकुल हाथ के बाहर जाते हुए मालूम पड़ते हैं। उनका दिमाग तो ठीक है? पहले मैं कुछ कहती थी तो क्रोधित होते थे, वह समझ में आता था। अब मैं कुछ कहती हूं तो वे हंसते हैं। इसका मतलब क्या है? उनका दिमाग तो ठीक है! जब उनका दिमाग बिगड़ जाता था तब पत्नी मानती थी कि ठीक है, क्योंकि वह नार्मल था। अब ठीक हो रहा है तो पत्नी समझती है कि दिमाग कुछ खराब हो रहा है।
स्वभावतः जब कोई गाली दे तो हंसना। तो अगर जीसस को सूली देने वाले लोगों को लगा हो कि यह आदमी पागल है, तो आश्र्चर्य नहीं है। क्योंकि यह एबनार्मल था, असाधारण थी यह बात। जो सूली दे रहे हैं उनके लिए प्रार्थना करनी कि हे प्रभु, इन्हें माफ कर देना।
हम सब जीते हैं प्रमाद में, इसलिए प्रमाद में होना हमारी साधारण, नार्मल अवस्था हो गई है। हमारे बीच कोई जरा होश से जीए तो हमें अड़चन मालूम होती है। क्योंकि होश से जीने वाला हमारे बंधन के बाहर होने लगता है। होश से जीने वाला हमारे हाथ के बाहर खिसकने लगता है। क्योंकि होश से जीने वाले का अर्थ है कि हम बटन दबाते हैं, उसके भीतर क्रोध नहीं होता। हम बटन दबाते हैं, उसके भीतर आनंद नहीं होता, वह अपना मालिक होता जा रहा है। अब जब वह आनंदित होता है, होता है।
एक और ध्यान रखने की बात है कि आनंदित आप अकेले हो सकते हैं, लेकिन क्रोधित आप अकेले नहीं हो सकते। आनंद के लिए किसी की आपको अपेक्षा नहीं है कि कोई आपकी बटन दबाए। इसलिए हमने कहा है कि जब कोई व्यक्ति अपना परम मालिक हो जाता है तो परम आनंद को उपलब्ध हो जाता है।
कुछ चीजें हैं जो दूसरों पर निर्भर हैं। जो दूसरों पर निर्भर हैं वे प्रमाद में ही हो सकती हैं। कुछ चीजें हैं जो किसी पर निर्भर नहीं--स्वतंत्र हैं--वे अप्रमाद में हो सकती हैं।
इसलिए महावीर कहते हैं प्रमाद को कर्म, कर्म-बंधन के कारण। जब भी हम बेहोशी में कुछ कर रहे हैं, हम बंध रहे हैं। और यह कर्म-बंधन हमें लंबी यात्राओं में उलझा देगा, लंबे जाल में डाल देगा।
अप्रमाद को अकर्म, होश को अकर्म कहा है महावीर ने। अगर आप होशपूर्वक क्रोध कर सकते हैं तो महावीर कहते हैं कि आपको क्रोध का कोई बंधन नहीं होगा। लेकिन होशपूर्वक क्रोध होता ही नहीं। अगर आप होशपूर्वक चोरी कर सकते हैं, तो महावीर कहते हैं चोरी अकर्म है। इसमें फिर कोई कर्म-बंधन नहीं है। लेकिन होशपूर्वक चोरी होती ही नहीं। अगर आप होशपूर्वक हत्या कर सकते हैं, तो महावीर हिम्मतवर हैं, वे कहते हैं, इसमें कोई कर्म का बंधन नहीं है। आप होशपूर्वक हत्या करें। लेकिन होशपूर्वक हत्या होती ही नहीं। हत्या होती ही है अनिवार्य रूप से बेहोशी में।
तो महावीर कहते हैं कि एक ही है नियम, होशपूर्वक। एक ही है पुण्य, होशपूर्वक। एक ही है धर्म, होशपूर्वक। फिर सारी छूट है। होशपूर्वक जो भी करना हो करो। धर्म को इतना एसेंशियल, इतना सारभूत कम ही लोगों ने समझा और कहा है। इसलिए महावीर की सारी उपदेशना, उनकी सारी धर्मदेशना इस एक ही शब्द के आस-पास घूमती है--होश, विवेक, जागरूकता, अप्रमाद। इतना मूल्य दिया है उन्होंने तो सोचने जैसा है। नीति की दूसरी कोई आधारशिला नहीं रखी। यह करना बुरा है, यह करना अच्छा है, इस पर महावीर का जोर नहीं है, लेकिन तब बड़ी हैरानी होती है। महावीर को जिन्होंने पच्चीस सौ साल अनुगमन किया है, उनको होश की कोई फिकर नहीं है! उनको कर्मों की फिकर है। वे कहते हैं--यह कर्म ठीक, वह कर्म गलत।
इस फर्क को समझ लें।
जब मैं कहता हूं, यह कर्म ठीक, यह कर्म गलत, तो होश का कोई सवाल नहीं है। जब मैं कहता हूं, होश
ठीक, बेहोशी गलत, तो कर्म का कोई सवाल नहीं है। जिस कर्म के साथ भी मैं होश जोड़ लेता हूं वह ठीक हो जाता है। वह अकर्म हो जाता है, उसका कोई बंधन नहीं रह जाता। और जिस कर्म के साथ मैं होश नहीं जोड़ पाता हूं वह पाप है, वह बंधन है, वह अधर्म है, वह कर्म है।
रहस्य यह है कि जो भी गलत है, उसके साथ होश नहीं जोड़ा जा सकता। गलत होने का मतलब ही यह है कि वह केवल बेहोशी में ही संभव है। गलत होने का एक ही गहरा मतलब है कि जो बेहोशी में ही संभव है। सही होने का एक ही मतलब है कि जो केवल होश में ही होता है, बेहोशी में कभी नहीं होता।
इसका क्या मतलब हुआ?
इसका मतलब हुआ कि आप अगर बेहोशी से दान करते हैं तो वह बंधन है।
एक आदमी रास्ते पर भीख मांगता हुआ खड़ा है। आप अकेले जा रहे हैं तो आप भीख मांगने वाले की फिकर नहीं करते। चार लोग आपके साथ हैं और भीख मांगने वाला हाथ फैला देता है तो आपको कुछ देना पड़ता है। यह भीख मांगने वाले को आप नहीं देते, अपनी इज्जत को, जो चार लोगों के सामने दांव पर लगी है। इसलिए भिखारी भी जानता है कि अकेले आदमी से उलझना ठीक नहीं। चार आदमियों के सामने हाथ फैला देता है, पैर पकड़ लेता है। उस वक्त सवाल यह नहीं है कि भिखारी को देना है, उस वक्त सवाल यह है कि लोग क्या कहेंगे कि दो पैसे न दे सके। आपका हाथ खीसे में जाता है। यह लोगों के लिए जा रहा है, जो मौजूद हैं। यह दान नहीं है, यह मूर्च्छा है। आप भिखारी को दे रहे हैं, लेकिन कहीं कोई दया-भाव नहीं है। यह मूर्च्छा है।
आप दान करते हैं कि मंदिर पर मेरे नाम का पत्थर लग जाए। यह मूर्च्छा है। आप ही न बचे, मंदिर का पत्थर कितने दिन बचेगा? और जरा जाकर देखें पुराने मंदिरों पर जो पत्थर लगे हैं कौन उनको पढ़ रहा है। वह भी आप ही जैसे लोग लगवा गए हैं। आप भी लगवा जाएंगे।
अगर दान मूर्च्छा है तो कर्म-बंधन है। लेकिन दान मूर्च्छा से हो ही नहीं सकता। अगर हो रहा है तो उसका मतलब वह दान नहीं है। आप धोखे में हैं, वह कुछ और है। चार लोगों में प्रशंसा मिलेगी, यह दान नहीं है। हजारों साल तक नाम रहेगा, यह दान नहीं है। यह तो सौदा है, यह तो सीधा सौदा है। अगर अकेले भी हैं आप, कोई देखने वाला नहीं है और भिखारी हाथ फैलाता है, तब भी जरूरी नहीं है कि दान ही हो।
कई बार ऐसा होता है कि इनकार करना ज्यादा मंहगा और दे देना सस्ता होता है। एक-दो पैसे दे देने में ज्यादा सस्ता मालूम पड़ता है मामला, बजाय यह कहने में कि नहीं देंगे। यह नहीं देना ज्यादा मंहगा मालूम पड़ता है। आप दो पैसे दे देते हैं।
भिखारियों को लोग अक्सर दान नहीं देते, सिर्फ टालने की रिश्र्वत देते हैं कि जाओ, आगे बढ़ो। वह रिश्र्वत है, और भिखारी भी अच्छी तरह जानते हैं कि ज्यादा शोरगुल मचाओ, डटे रहो।
आप देखेंगे कि भिखारी डटा ही रहता है। वह भी जानता है कि एक सीमा है, वहां तक रुको। एक सीमा है, जहां यह आदमी रिश्र्वत देगा कि अब जाओ। भिखारी भी जानते हैं कि दान कोई नहीं देता, इसलिए भिखारी भी आप यह मत सोचना कि अनुगृहीत होते हैं। भिखारी भी जानते हैं, अच्छा बुद्धू बनाया। जब वे लेकर आपसे चले जाते हैं तो आप यह मत सोचना कि वे समझते हैं कि बड़ा दानी आदमी मिल गया था।
आप रिश्र्वत देते हैं। भिखारी भी जानता है कि यह रिश्र्वत है। इसलिए जानता है कि आपकी सहनशीलता की सीमा को तोड़ना जरूरी है, तब आपका हाथ खीसे में जाता है। कितनी सहनशीलता है, इस पर निर्भर करता है।
अकेले में भी अगर आप देते हैं तो टालने के लिए, हटाने के लिए। तो फिर दान नहीं है, मूर्च्छा है। दान मूर्च्छा से हो ही नहीं सकता। अगर मूर्च्छा है, दान नहीं हो सकता।
चोरी बिना मूर्च्छा के नहीं हो सकती। अगर आप होशपूर्वक चोरी करने जाएं, तो जा ही न सकेंगे। अगर आप होशपूर्वक किसी की चीज उठाना चाहें, उठा ही न सकेंगे। और अगर उठा लें तो जरा भीतर गौर करके देखना। जिस क्षण उठाएंगे, उस क्षण होश खो जाएगा, मोह पकड़ लेगा, लोभ पकड़ लेगा, तृष्णा पकड़ लेगी, होश खो जाएगा।
एक बारीक संतुलन है भीतर होश और बेहोशी का। जो आदमी होशपूर्वक जी रहा है, उससे पाप नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं है कि महावीर चलेंगे तो कोई चींटी कभी मरेगी ही नहीं, महावीर चलेंगे तो चींटी मर सकती है, मरेगी। फिर भी महावीर कहते हैं, उसमें पाप नहीं है, क्योंकि महावीर अपने तईं पूरे होशपूर्वक चल रहे हैं। अपने होश में कोई कमी नहीं है। अब अगर चींटी मरती है तो यह केवल प्रकृति की व्यवस्था है, महावीर का कोई हाथ नहीं है।
और आप, आप भी चल रहे हैं उसी रास्ते पर, और चींटी मरती है तो आपको पाप लगेगा। यह जरा अजीब सा गणित मालूम पड़ता है। महावीर चलते हैं, पाप नहीं लगता। आप चलते हैं, पाप लगता है, चींटी वही मरती है। क्या फर्क है?
आप बेहोशी से चल रहे हैं। इसलिए प्रकृतिदत्त मरना नहीं है चींटी का, आपका हाथ है। आप अपनी तरफ से होश से चले होते, आपने मारने के लिए न जाने, न अनजाने कोई चेष्टा की होती, आपने सब भांति अपने होश को सम्हाल कर कदम उठाया होता, फिर चींटी मर जाती, वह चींटी जाने, प्रकृति जाने, आप जिम्मेवार नहीं थे। आप जो कर सकते थे, वह किया था।
लेकिन आप बेहोशी से चल रहे हैं। आपको पता ही नहीं कि आप चल रहे हैं। आपको यह पता ही नहीं कि पैर आपका कहां पड़ रहा है, क्यों पड़ रहा है? आपका सिर कहीं आसमान में घूम रहा है, पैर जमीन पर चल रहे हैं। आप मौजूद यहां हैं शरीर से, मन कहीं और है।
यह जो बेहोश चलना है, इसमें जो चींटी मर रही है, उसमें आप जिम्मेवार हैं। वह जिम्मेवारी बेहोशी की जिम्मेवारी है, चींटी के मरने की नहीं। चींटी तो आपके होश में भी मर सकती है, लेकिन तब जिम्मेवारी आपकी नहीं है।
महावीर चालीस साल जीए, और यह बड़ी गहन चिंतना का विषय रहा है, तत्व-दार्शनिकों को, तत्वज्ञों को, कि महावीर को ज्ञान हुआ, उसके बाद वह चालीस साल जिंदा थे। तो कर्म तो कुछ किया ही होगा। इन चालीस सालों में जो कर्म किया, उसका बंधन महावीर पर हुआ या नहीं? कितना ही कम किया हो, कुछ तो किया ही होगा, उठे होंगे, बैठे होंगे, नहीं उठे, नहीं बैठे, श्वास तो ली होगी। श्वास लेने में भी तो जीवाणु मर रहे हैं, लाखों मर रहे हैं। एक श्र्वास में कोई एक लाख जीवाणु मर जाते हैं। बहुत छोटे हैं, सूक्ष्म हैं।
और जब महावीर ने पहली दफे इनकी बात कही थी तो लोगों को भरोसा नहीं आया कि श्वास में कहां के जीवाणु। लेकिन अब तो विज्ञान कहता है कि वे हैं, और महावीर ने जितनी संख्या बताई थी, उससे ज्यादा संख्या है।
आपके खयाल में नहीं है, आप एक चुंबन लेते हैं तो एक लाख जीवाणु मर जाते हैं। दो ओंठों के संस्पर्श के दबाव में एक लाख जीवाणु मर जाते हैं। यह वैज्ञानिक कहते हैं। महावीर ने तो बहुत पहले इशारा किया था कि श्र्वास लेते हैं तो भी जीवाणु मर जाते हैं।
इसलिए आप जान कर हैरान होंगे कि महावीर ने प्राणायम जैसी क्रियाओं को जरा भी जगह नहीं दी। यह हैरानी की बात है। क्योंकि योग प्राणायाम पर इतना जोर देता हो, उसके कारण बिलकुल दूसरे हैं। लेकिन महावीर ने बिलकुल जोर नहीं दिया। क्योंकि इतने जोर से श्र्वास का लेना, छोड़ना, महावीर को लगा, अकारण हिंसा को बढ़ा देना हो जाएगा।
इसलिए महावीर उतनी ही श्र्वास लेते हैं जितने के बिना नहीं चल सकता, जितने के बिना नहीं चल सकता। श्र्वास लेने में भी महावीर होश में हैं, जिसके बिना नहीं चल सकता है। अनिवार्य है जो होने के लिए, बस उतनी ही श्र्वास, वह भी होश में हैं वह, इसलिए दौड़ते नहीं कि श्र्वास तेज न हो जाए। चिल्लाते नहीं कि श्र्वास तेज न हो जाए। उतना ही बोलते हैं जितना अपरिहार्य है। चुप रह जाते हैं। क्योंकि जब कुछ भी हम कर रहे हैं उसमें अगर बेहोशी है, तो हिंसा हो रही है।
पर फिर भी महावीर बोले, फिर भी महावीर चले। नहीं कुछ किया तो श्र्वास तो ली। रात जमीन पर लेटे तो, शरीर का वजन पड़ा होगा। जब एक चुंबन में एक लाख कीटाणु मर जाते हैं, तो जब आदमी जमीन पर लेटेगा, कितना ही साफ-सुथरा करके लेटे, करोड़ों कीटाणु मर जाएंगे, करोड़ों जीवाणु मर जाएंगे।
महावीर रात करवट नहीं लेते हैं, फिर भी एक करवट तो लेनी ही पड़ेगी, सोते वक्त। एक बार तो पृथ्वी छूनी ही पड़ेगी।
महावीर रात में करवट नहीं बदलते कि बार-बार बहुत सी हिंसा अकारण है। एक करवट से काम चल जाता है तो बस एक करवट काफी है। एक ही करवट सोए रहते हैं। फिर भी एक करवट तो सोते ही हैं।
आप ज्यादा हिंसा करते होंगे, वे कम करते हैं, लेकिन नहीं करते हैं ऐसा तो दिखाई नहीं पड़ता। तो सवाल है कि महावीर ने चालीस साल में इतनी हिंसा की, उसका कर्म-बंधन अगर हुआ हो तो फिर वह मोक्ष कैसे जा सकते हैं? उनका पुनर्जन्म होगा। उतना बंधन, उतना संस्कार फिर जीवन में ले आएगा। लेकिन नहीं कोई कर्म-बंधन नहीं होता क्योंकि महावीर की कर्म की परिभाषा हम समझ लें।
जो हम मूर्च्छापूर्वक करते हैं, तभी कर्म-बंधन होता है। जो हम होशपूर्वक करते हैं, कोई कर्म-बंधन नहीं होता। तो महावीर यह नहीं कहते, आप क्या करते हैं। महावीर यह कहते हैं कि आप कैसे करते हैं। क्या महत्वपूर्ण नहीं है, भीतर का होश महत्वपूर्ण है।
‘प्रमाद को कर्म, अप्रमाद को अकर्म कहा है, अर्थात जो प्रवृत्तियां प्रमादयुक्त हैं वे कर्म-बंधन करने वाली हैं और जो प्रवृत्तियां प्रमादरहित हैं, वे कर्म-बंधन नहीं करती हैं।’
इसलिए उन प्रवृत्तियों की खोज कर लेना जो मूर्च्छा के बिना नहीं हो सकतीं। उनको छोड़ना। उन प्रवृत्तियों की भी खोज कर लेना जो बेहोशी में हो ही नहीं सकतीं, सिर्फ होश में होती हैं, उनकी खोज करना, उनका अभ्यास करना। लेकिन यह अभ्यास बहिर्मुखी न हो, भीतरी हो, और होश से प्रारंभ होता हो। होश को बढ़ाना, ताकि वे प्रवृत्तियां बढ़ जाएं जीवन में, जो होश में ही होती हैं।
जैसे मैंने कहा, प्रेम। अगर आप बेहोश हैं तो पहले तरह का प्रेम होगा। अगर थोड़े से होश में हैं और थोड़े से बेहोश में हैं तो दूसरे तरह का प्रेम होगा। अगर बिलकुल होश में हैं तो तीसरे तरह का प्रेम होगा। प्रेम करुणा बन जाएगी। अगर बेहोश हैं तो करुणा कामवासना बन जाती है। अगर दोनों के मध्य में हैं तो काम और करुणा के बीच में वह जो कवियों का प्रेम है, वह होता है।
प्रमाद के होने और न होने से; ज्ञान के होने या न होने से नहीं, प्रमाद के होने या न होने से, महावीर कहते हैं, मैं किसी को मूढ़ और किसी को ज्ञानी कहता हूं। वह कितना जानता है, इससे नहीं; कितना होशपूर्वक जीता है, इससे। उसकी जानकारी कितनी है, इससे मैं उसे ज्ञानी नहीं कहता हूं, और उसकी जानकारी बिलकुल नहीं है, इससे अज्ञानी भी नहीं कहता हूं। जानकारी का ढेर लगा हो और आदमी बेहोश जी रहा हो।
मैंने सुना है एडिसन के बाबत। शायद इस सदी का बड़े से बड़ा जानकार आदमी था। एक हजार आविष्कार एडिसन ने किए हैं, कोई दूसरे आदमी ने किए नहीं। आपकी जिंदगी अधिकतर एडिसन से घिरी है। चाहे आप कहते कितने ही हों कि हम भारतीय हैं और हम महावीर और बुद्ध से घिरे हैं। भूल में मत रहना, महावीर और बुद्ध से आपके फासले अनंत हैं। घिरे आप किसी और से हैं। एडिसन से ज्यादा घिरे हैं, बजाय महावीर या बुद्ध के।
बिजली का बटन दबाओ, तो एडिसन का आविष्कार है। रेडियो खोलो तो एडिसन का आविष्कार है। फोन उठाओ, तो एडिसन का आविष्कार है। हिलो-डुलो, सब तरफ एडिसन है। एक हजार आविष्कार हैं, जो हमारी जिंदगी के हिस्से बन गए हैं। इस आदमी के पास जानकारी का अंत नहीं था। बड़ा अदभुत जानकार आदमी था।
लेकिन एक दिन एडिसन का एक मित्र मिलने आया है। एडिसन सुबह-सुबह अपना नाश्ता करता है। नाश्ता रखा हुआ है। और एडिसन कि
सी सवाल को हल करने में लगा है। नौकर को आज्ञा नहीं है कि वह कहे, चुपचाप नाश्ता रख जाए। मित्र ने देखा, एडिसन उलझा है अपने काम में। नाश्ता तैयार है, उसने नाश्ता कर लिया। प्लेट साफ करके, ढांक कर रख दी। थोड़ी देर बाद जब एडिसन ने अपनी आंख उठाई कागज के ऊपर, देखा, मित्र आया है। कहा कि बड़ा अच्छा हुआ आए। नजर डाली खाली प्लेट पर। एडिसन ने कहा, जरा देर से आए। पहले आते तो तुम भी नाश्ता कर लेते। मैं नाश्ता कर चुका। खाली प्लेट।
जानकारी अदभुत है इस आदमी की, लेकिन होश? होश बिलकुल नहीं है।
होश और बात है, जानकारी और बात है। आप कितना जानते हैं, यह अंततः निर्णायक नहीं है धर्म की दृष्टि से। आप कितने हैं, कितने चेतन हैं, कितने जगे हुए हैं, इस पर निर्भर करेगा।
कबीर की जानकारी कुछ भी नहीं है, लेकिन होश अनूठा है। मोहम्मद की जानकारी बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन होश अनूठा है। जीसस की जानकारी क्या है? कुछ भी नहीं, एक बढ़ई के लड़के की जानकारी हो भी क्या सकती है? लेकिन होश अनूठा है।
एडिसन नाश्ते में भी बेहोश हो जाता है और जीसस सूली पर भी होश में हैं। इसलिए महावीर कहते हैं, प्रमाद को मैं कहता हूं, मूर्खता। अप्रमाद को मैं कहता हूं, पांडित्य, प्रज्ञा।
‘जिसे मोह नहीं, उसे दुख नहीं।’
जो प्रज्ञावान है, उसको यह सूत्र खयाल में आ जाएगा जीवन की व्यवस्था का। जीवन की जो आंतरिक व्यवस्था है वह यह है, जिसे मोह नहीं, उसे दुख नहीं। अगर आपको दुख है, तो आप जानना कि मोह है। दुख हम सभी को है। कम-ज्यादा, और हर आदमी सोचता है, उससे ज्यादा दुखी आदमी संसार में दूसरा नहीं है। हर आदमी यह सोचता है, सारे दुख के हिमालय वही ढो रहा है।
‘जिसे मोह नहीं, उसे दुख नहीं।’
अगर आपको ऐसा लगता हो कि दुख के हिमालय ढो रहे हैं तो समझ लेना कि मोह के प्रशांत सागर भी आपके भीतर होंगे। मोह के बिना दुख होता ही नहीं। जब भी दुख होता है, मोह से होता है।
मोह का अर्थ है--ममत्व। मोह का अर्थ है--मेरा का भाव। मकान में आग लग गई, मेरा है तो दुख होता है। मेरा नहीं है तो दुख नहीं होता। मेरा नहीं है तो सहानुभूति दिखा सकते हैं आप, लेकिन उसमें भी एक रस होता है। मेरा है, तब दुख होता है। मकान वही है, लेकिन अगर इन्श्योर्ड है तो उतना दुख नहीं होता। बीमा कंपनी का जाता होगा, सरकार का जाता होगा; अपना क्या जाता है?
अपना है, तो दुख होता है। आपका बेटा मर गया, छाती पीट रहे हैं। और तभी एक चिट्ठी आपके हाथ लग जाए, जिससे पता चले कि यह बेटा आपसे पैदा नहीं हुआ। पत्नी का किसी और से संबंध था, उससे पैदा हुआ। आंसू तिरोहित हो जाएंगे, दुख विलीन हो जाएगा। छुरी निकाल कर पत्नी की तलाश में लग जाएंगे कि पत्नी कहां है।
क्या हो गया?
वही व्यक्ति मरा हुआ पड़ा है सामने। मरने में कोई कमी नहीं होती है, आपकी इस जानकारी से, इस पत्र से। मौत हो गई है, लेकिन मौत का दुख नहीं है, मेरे का दुख है। जो हमारा नहीं है उसे हम मारना भी चाहते हैं। जो हमारे विपरीत है, उसको हम नष्ट भी करना चाहते हैं। जो अपना है, उसे बचाना चाहते हैं।
महावीर कहते हैं: ‘जिसे मोह नहीं, उसे दुख नहीं।’
अगर दुख है, तो जानना कि मोह है।
‘जिसे तृष्णा नहीं, उसे मोह नहीं।’
अगर मोह है, तो उसके भीतर तृष्णा होती है। ‘मेरा’ हम कहते ही क्यों हैं? क्योंकि बिना ‘मेरे’ के ‘मैं’ को खड़े होने की कोई जगह नहीं। जितना मेरे ‘मेरे’ का विस्तार होता है उतना बड़ा मेरा ‘मैं’ होता है। इसलिए ‘मैं’ की एक ही तृष्णा है, एक ही वासना है कि बड़ा, बड़ा हो जाऊं।
जिसके पास बड़ा राज्य है, उसके पास बड़ा मैं है। एक राजा का राज्य छीन लो, राज्य ही नहीं छिनता उसका, मैं भी छिन जाता है, सिकुड़ जाता है। एक धनी का धन छीन लो, धन ही नहीं छिनता, धनी सिकुड़ जाता है।
जो भी आपके पास है, वह आपका फैलाव है। मैं की एक ही तृष्णा है कि मैं ही बचूं। यह सारा ब्रह्मांड मेरे अहंकार की भूमि बन जाए। यह जो वासना है कि मैं फैलूं, मैं बचूं, सुरक्षित रहूं, सदा रहूं, अमरत्व को उपलब्ध हो जाऊं, मेरी कोई सीमा न हो, अनंत हो जाए मेरा साम्राज्य, तो यह है तृष्णा, यह है डिजायर।
महावीर कहते हैं: ‘जिसे तृष्णा नहीं, उसे मोह नहीं।’
जिसको अपने ‘मैं’ को बढ़ाना ही नहीं है, वह ‘मेरे’ से क्यों जुड़ेगा?
छोटे झोपड़े में जब आप रहते हैं तो आपका मैं भी उतना ही छोटा रहता है, झोपड़े वाले का मैं। बड़े महल में रहते हैं तो बड़े महल वाले का मैं। मैं आपका खोज करता है, कितनी बड़ी जगह घेर ले, कितनी बड़ी जगह घेर ले। स्पेस चाहिए मैं को फैलने के लिए।
इसलिए आप देखते हैं कि अगर एक नेता चल रहा हो भीड़ में, तो बिलकुल भीड़ के साथ नहीं चलता, थोड़ी स्पेस, थोड़ा आगे चलेगा, भीड़ थोड़ी पीछे चलेगी, जगह चाहिए। अगर भीड़ बिलकुल पास आ जाए तो नेता को तकलीफ शुरू हो जाती है। तकलीफ इसलिए शुरू हो जाती है कि उसका जो विस्तार था मैं का, वह छीना जा रहा है।
और कोई आदमियों के नेता की ही ऐसी बात नहीं, अगर बंदरों का झुंड चल रहा हो, तो जो नेता है, उसमें जो बॉस है, उसके आस-पास एक आदरपूर्ण स्थान होता है, जिसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। बाकी बंदर की जो भीड़ है, वह थोड़ी दूर जगह पर बैठेगी।
अगर आप नेता से मिलने गए हैं तो बिलकुल पास नहीं बैठ सकते। अपने-अपने स्थान पर बैठना पड़ता है। एक जगह है, उसको वैज्ञानिक कहते हैं, टैरिटोरियल। एक अहंकार है जो प्रदेश घेरता है। फिर कितना बड़ा प्रदेश घेरता है? जितना बड़ा घेरता है उतना ‘मैं’ को मजा आता है। उतना लगता है कि अब मैं मजबूत हूं, शक्तिशाली हूं। इसलिए किसी सम्राट के कंधे पर हाथ जाकर मत रख देना।
कहा जाता है कि हिटलर की जिंदगी में कोई उसके कंधे पर हाथ नहीं रख सका। इतना फासला ही कभी मिटने नहीं दिया। गोबेल्स हो कि उसके और निकट के मित्र हों, वह भी एक फासले पर खड़े रहेंगे, दूर, कंधे पर कोई हाथ नहीं रख सकता।
हिटलर का कोई मित्र नहीं था। मित्र बनाए नहीं जा सकते, क्योंकि मित्र का मतलब है कि वह जो जगह है अहंकार की, उसको आप दबाएंगे। छीनेंगे। राजनीतिज्ञ के आप अनुयायी हो सकते हैं, शत्रु हो सकते हैं, मित्र नहीं हो सकते।
यह जो महावीर कहते हैं, जिसे मोह है, उसे तृष्णा है। अगर दुख है तो जानना कि मोह का सागर भरा है नीचे। अगर मोह है तो जानना कि तृष्णा की दौड़ है पीछे।
‘जिसे लोभ नहीं, उसे तृष्णा नहीं।’
और इसलिए लोभ गहरे से गहरा है। तृष्णा भी लोभ का विस्तार है, ग्रीड का। मैं ज्यादा हो जाऊं। ज्यादा होने की जो दौड़ है, वह तृष्णा है। ज्यादा होने की जो वृत्ति है, वह लोभ है।
तृष्णा परिधि है, लोभ केंद्र है। परिधि सफल हो जाए तो मोह निर्मित होता है। परिधि असफल निर्मित हो जाए, असफल हो जाए तो क्रोध निर्मित होता है। जितनी तृष्णा सफल होती जाए, मोह बनता जाता है, और जितनी सफल हो उतना दुख। असफल हो, तो दुख।
‘जिसे लोभ नहीं, उसे तृष्णा नहीं; और जो ममत्व से अपने पास कुछ भी नहीं रखता, उसका लोभ नष्ट हो जाता है।’
क्या है उपाय फिर?
एक ही उपाय है--‘मेरे’ को क्षीण करते जाना। पत्नी होगी, पर मेरे का भाव क्षीण कर लें। बेटा होगा, पर मेरे का भाव क्षीण कर लें। मकान को रहने दें, मकान को गिराने से कुछ न गिरेगा। मेरे को हटा लें। मकान पर वह जो ‘मेरे’ को चिपका दिया है, वह जो आपके प्राण भी मकान के ईंट-गारे में समा गए हैं, उनको वापस हटा लें।
मेरे को हटाते जाएं, ममत्व को तोड़ते चले जाएं, और एक दिन ऐसी स्थिति आ जाए कि मकान तो दूर, यह जो और पास का मकान है--देह, शरीर--इससे भी पीछे हटा लें। ये हड्डियां भी मेरी नहीं; हैं भी नहीं। यह मांस भी मेरा नहीं, यह खून भी मेरा नहीं, यह चमड़ी भी मेरी नहीं। है भी नहीं। मैं नहीं था, तब ये हड्डियां किसी और की हड्डियां थीं, और मैं नहीं रहूंगा तब यह मांस किसी और का मांस हो जाएगा। यह खून किसी और की नसों में बहेगा। और यह चमड़ी किसी और के मकान का घेरा बनेगी। यह मेरा है नहीं। यह मेरे पहले भी था और मेरे बाद भी होगा। इससे भी अपने को हटा लें।
फिर और भीतर मैं का एक मकान है, मन का। कहते हैं, मेरे विचार। तो जरा गौर से देखें, कौन सा विचार आपका है? सब विचार पराए हैं। सब विचार पराए हैं। सब संग्रह हैं, सब स्मृति है। वहां से भी अपने को तोड़ लें। तोड़ते चले जाएं ममत्व से उस घड़ी तक, उस समय तक, जब तक कि मेरा कहने योग्य कुछ भी बचे। जब कुछ भी न बचे मेरा कहने योग्य, तब जो शेष रह जाता है, उसका नाम आत्मा है।
लेकिन हम तो ऐसे हैं कि हम कहते हैं, मेरी आत्मा। मेरी आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती। जहां तक मेरा होता है, वहां तक आत्मा का कोई अनुभव नहीं होता।
इसलिए बुद्ध ने तो कह दिया कि आत्मा शब्द ही छोड़ दो, क्योंकि इससे मेरे का भाव पैदा होता है, यह शब्द ही मत उपयोग करो, क्योंकि इससे लगता है मेरा, आत्मा का मतलब ही होता है मेरा। यह छोड़ ही दो। तो बुद्ध ने कहा, यह शब्द ही छोड़ दो, ताकि यह मेरा पूरी तरह टूट जाए। कहीं मेरा न बचे, तब भी आप बचते हैं।
जब सब मेरा छूट जाता है तब जो बचता है, वही है आपका अस्तित्व, वही है आपकी चेतना, वही है आपकी आत्मा। वह जो शून्य निराकार, होना, बच रहता है, वही है आपकी मुक्ति, वही है आनंद।

आज इतना ही।

रुकें पांच मिनट, कीर्तन करें...!


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