ओशो की चर्चाओं में से मा योग क्रांति द्वारा संगृहीत कुछ अंश
Chapter titles:
1. मौन
2. प्रेम
3. समग्र जीवन
4. प्यास
5. संकल्प
6. साहस
7. जीवन-परिवर्तन का विज्ञान
8. शुद्ध वर्तमान में जीओ
9. जागरण
10. ज्ञान का भ्रम
11. जीवन एक अवसर है
12. विचारों से मुक्ति का उपाय
13. आंतरिक क्रांति
14. बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता
15. मृत्यु का बोध
16. विचार का अर्थ
17. सृजनात्मक श्रम
18. तथ्य नहीं, व्यक्ति महत्वपूर्ण है
19. विचार
20. स्वतंत्रता
स्वतंत्रता
धर्म को जो नहीं खोजता है, वह जाने-अनजाने अधर्म में जीता है। और अधर्म अमुक्ति है। प्रकाश की दिशा में जो गति नहीं करता है, वह निरंतर अंधकार से और अंधकार में गिरता जाता है। और अंधकार आत्मघात है। सत्य की अभीप्सा जिसमें नहीं है, वह स्वतंत्र नहीं हो सकता है। सत्य स्वतंत्रता लाता है। सत्य स्वतंत्रता है। और स्मरण रहे कि जो परतंत्र है, परमात्मा उसके लिए नहीं है। परतंत्रता की चित्तभूमि में परमात्मा के फूल नहीं लगते हैं। उसके लिए तो स्वतंत्रता की भूमि चाहिए, और सरलता का खाद, और स्वच्छता का जल, और शून्यता के बीज। और सबसे ऊपर सजगता का पहरा। इन शर्तों को जो पूरा करने का साहस और शक्ति दिखलाता है, उसके जीवन से सारे बंधन गिर जाते हैं। और उसकी आत्मा से परतंत्रता की राख झड़ जाती है। और उसके भीतर परमात्मा की प्रसुप्त अग्नि जाग्रत हो जाती है। उस अग्नि में दुख और असंतोष, पीड़ाएं और संताप–सभी दग्ध हो जाते हैं। और उसी अग्नि से उन फूलों का जन्म होता है, जो कि आनंद के हैं, जो कि अनंत के हैं, जो कि अमृत के हैं।
‘क्या हमारे विद्यालय विचार नहीं सिखाते हैं?’
‘विचार याद कराते हैं, लेकिन विचार करना? नहीं, विचार करना नहीं सिखाते हैं। विचार को बाहर से डालना मात्र स्मृति को भरता है। विचार को भीतर से जगाना ज्ञान है। विचार की शक्ति प्रत्येक में प्रसुप्त है। उसे दूसरों के विचारों से भरना नहीं, वरन उघाड़ना और आविष्कृत करना है। हम सब निरंतर विचारों से भरे हैं, लेकिन कोई यदि पूछे कि क्या आप कभी विचार करते हैं? तो सच्चाई यही होगी कि हमें इनकार करना होगा। बहुत कम व्यक्ति हैं जो कि विचार करते हैं। वस्तुतः तो अधिकांश को ज्ञात ही नहीं है कि उनमें विचार की क्षमता भी है! और ज्ञात होगा भी कैसे? हम केवल उन्हीं क्षमताओं के प्रति सचेत हो पाते हैं जिनका कि हम उपयोग करते हैं। सक्रिय उपयोग से ही क्षमताएं वास्तविकताओं में परिणत होती हैं। निष्क्रिय पड़ी क्षमताएं सहज ही विस्मरण हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं है।
विचार-शक्ति ऐसी ही निष्क्रिय पड़ी शक्ति है। साधारणतः हम स्वचालित यंत्रों की भांति प्रतिक्रियाएं करते हैं और विचार का कोई उपयोग ही नहीं होता है। बाहर से आई उत्तेजनाएं हमें यंत्रवत चालित कर देती हैं और इस उत्तेजना-प्रतिक्रिया के मध्य विचार के लिए कोई अवकाश ही नहीं छूटता है। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या तुम्हारे चित्त से टकराती उत्तेजनाओं और तुम्हारी प्रतिक्रियाओं के मध्य में विचार को स्थान होता है? क्या किसी के द्वारा अपमानित किए जाने और क्रोधान्वित होने के मध्य विचार होता है? यदि नहीं, तो फिर तुम्हें विचार की शक्ति का न बोध है, न तुम्हारे जीवन में उसका कोई स्थान ही है।
ओशो