UPANISHAD

Kathopanishad 05

Fifth Discourse from the series of 19 discourses - Kathopanishad by Osho. These discourses were given in MOUNT ABU during OCT 06-13 1973.
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अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्‌।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद।।14।।

सर्वे वेदा यत्‌ पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्‌।।15।।

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्‌।
एदद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्‌।।16।।

एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्‌।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।17।।

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्‌।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।18।।

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्‌।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।19।।

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्‌।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः।।20।।


(यमराज के इन वचनों को सुनकर नचिकेता बोला--) जिस उस परमेश्वर को धर्म से अतीत, अधर्म से भी अतीत तथा कार्य और कारणरूप संपूर्ण जगत से भी भिन्न और भूत, वर्तमान एवं भविष्य, तीनों कालों से तथा इनसे संबंधित पदार्थों से भी पृथक (आप) जानते हैं, उसे बतलाइए।।14।।

यम ने कहा, संपूर्ण वेद जिस परमपद का बारंबार प्रतिपादन करते हैं और संपूर्ण तप जिस पद का लक्ष्य कराते हैं अर्थात वे जिसके साधन हैं, जिसको चाहने वाले साधकगण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद तुम्हें (मैं) संक्षिप्त में बतलाता हूं। (वह है) ओम--ऐसा यह एक अक्षर।।15।।

यह अक्षर ही तो ब्रह्म है (और) यह अक्षर ही परब्रह्म है, इसलिए इसी अक्षर को जानकर ,जो जिसको चाहता है, उसको वही (मिल जाता है)।।16।।
यही अत्युत्तम आलंबन है, यही (सबका) अंतिम आश्रय है। इस आलंबन को भलीभांति जानकर (साधक) ब्रह्मलोक में महिमा को उपलब्ध होता है।।17।।

नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है; यह न तो स्वयं किसी से हुआ है, न (इससे) भी कोई हुआ है, अर्थात यह न तो किसी का कार्य है और न कारण है। यही अजन्मा, नित्य, सदा एकरस रहने वाला (और )पुरातन है, अर्थात क्षय और वृद्धि से रहित है। शरीर के नाश किए जाने पर भी (इसका) नाश नहीं किया जा सकता है।।18।।

यदि कोई मारने वाला व्यक्ति अपने को मारने में समर्थ मानता है और यदि (कोई) मारा जाने वाला व्यक्ति अपने को मारा गया समझता है, (तो) वे दोनों ही (आत्मस्वरूप को) नहीं जानते; (क्योंकि) यह आत्मा न तो (किसी को) मारता है (और) न किसी के द्वारा मारा जा सकता है।।19।।
इस जीवात्मा के हृदयरूप गुहा में रहने वाला परमात्मा सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म और महान से भी महान है। परमात्मा की इस महिमा को कामनारहित (और) चिंतारहित (कोई बिरला साधक) सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पाता है।।20।।
भारतीय अध्यात्म साधना की एक मौलिक खोज को समझ लेना जरूरी है, तभी हम इस सूत्र में प्रवेश कर सकेंगे। आधुनिक विज्ञान ने पदार्थ के विश्लेषण से ऐसी निष्पत्ति निकाली कि यदि हम पदार्थ को विश्लिष्ट करते जाएं, खंडित करते जाएं, तोड़ते जाएं, तो अंत में जो तत्व शेष रह जाता है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता, जो आखिरी इकाई बचती है, वह इकाई विद्युत की है, इलेक्ट्रॉन है। इसलिए विज्ञान के अनुसार, जगत में जो भी दिखाई पड़ रहा है, वह विद्युत का ही समागम है। विभिन्न-विभिन्न रूपों में विद्युत ही सघन होकर पदार्थ हो गई है। विद्युत मौलिक तत्व है।
पूरब के मनीषियों ने भी एक मौलिक तत्व खोजा था। पर उनकी खोज दूसरी तरह से थी, और दूसरी दिशा से थी। पश्चिम के विज्ञान ने पदार्थ को तोड़-तोड़कर आखिरी अणु, परमाणु और परमाणु का भी विभाजन करके जिस तत्व को पाया है, वह है विद्युत। पूरब के मनीषियों ने भी चेतना की आत्यंतिक गहराई में उतर-उतरकर चेतना का जो आखिरी बिंदु है, उसे पकड़ा था। उस बिंदु को उन्होंने कहा था--ध्वनि, साउंड।
पूरब की खोज है कि सारा अस्तित्व ध्वनि का ही घनीभूत रूप है; शब्द का घनीभूत रूप है। इसलिए वेद को हमने परमेश्वर कहा, क्योंकि वह शब्द है। और ऐसी पूरब के मनीषियों की ही खोज नहीं है, जिन्होंने भी आत्मा की तरफ से यात्रा की है, उन्होंने भी यही कहा है।
बाइबिल कहती है, जगत के प्राथमिक चरण में शब्द था, लोगोस, दि वर्ड। शब्द था जगत के प्रारंभ में। फिर शब्द से ही सब उत्पत्ति हुई।
जिन्होंने आत्मा के भीतर प्रवेश करके जीवन की आधारशिला खोजनी चाही, उन सभी ने ध्वनि को आधारभूत माना है। जिन्होंने पदार्थ की खोज की है, उन्होंने विद्युत को आधारभूत माना है। पर एक बड़े मजे की बात यह है कि पश्चिम का विज्ञान कहता है कि ध्वनि विद्युत का एक रूप है। और पूरब का योग कहता है कि विद्युत ध्वनि का एक रूप है।
इस मामले में विज्ञान और योग दोनों सहमत हैं कि विद्युत और ध्वनि दो चीजें नहीं हैं। यह परिभाषा की बात है कि हम विद्युत को ध्वनि का रूप कहें, कि ध्वनि को विद्युत का रूप कहें। लेकिन एक बात में दोनों राजी हैं कि जीवन की चरम, आखिरी, आत्यंतिक जो इकाई है, वह या तो विद्युत-जैसी है, या ध्वनि-जैसी है। और विद्युत और ध्वनि में कोई भेद नहीं है। पर दोनों ने अलग-अलग तरह से यात्रा की है, और अलग-अलग रूप से आत्यंतिक को पकड़ा है।
यदि पदार्थ से खोज की जाए तो विद्युत ही मिलती है। पदार्थ जड़ है। विद्युत भी जड़ है। लेकिन अगर चैतन्य से खोज की जाए, तो चैतन्य का आधारभूत स्वरूप ध्वनि है, शब्द है, विचार है, चैतन्य है, मन है, मनन है। कितने ही गहरे हम उतरते चले जाएं, तो ध्वनि के शुद्धतम रूप शेष रह जाते हैं। ध्वनि का यह अंतिम जो रूप है, उसे हमने नाम दिया है--ओंकार, ओम।
यह ओम कुछ हिंदुओं से बंधा हुआ नहीं है। जैन हिंदुओं से राजी नहीं हैं तत्व-दर्शन में, लेकिन इस बात में राजी हैं कि जो आत्यंतिक घटना भीतर घटती है, उसकी ध्वनि ओंकार की है। बौद्ध राजी नहीं हैं, सब सिद्धांतों में भेद हैं, लेकिन जब समाधि फलती है और समाधि पूर्ण होती है, तो जो ध्वनि भीतर स्फुरित होती है, वह ओंकार की है, वह ओम है।
मुसलमान अपनी प्रार्थना के बाद आमीन शब्द का प्रयोग करते हैं; ईसाई भी, यहूदी भी। शब्दशास्त्री कहते हैं कि आमीन ओम का ही रूप है। वह जो भीतर ध्वनि होती है, उसे कोई ओम की तरह भी समझ सकता है, कोई ओमीन की तरह भी समझ सकता है। ध्वनि में अपनी तरफ से समझ लेने की बहुत आसानी है।
रेलगाड़ी चलती हो और उसके चकों की आवाज होती हो, तो आप जो भी चाहें सुनना वह सुन सकते हैं। आप चाहें तो किसी गीत की कड़ी भी सुन सकते हैं। अगर कोई फिल्मों का भक्त हो, तो उसे कोई गीत की कड़ी सुनाई पड़ जाएगी। और अगर कोई राम का भक्त हो, तो उसे लगेगा कि रेलगाड़ी के चक्के राम, राम, राम कर रहे हैं।
ध्वनि बहुत सूक्ष्म है। पूरब के मनीषियों ने उसे ओम की तरह पकड़ा। यहूदी, मुसलमान फकीरों ने उसे ओमीन की तरह पकड़ा, जिसका आमीन रूप हो गया।
अंग्रेजी में कुछ शब्द हैं, जिसको अंग्रेजी भाषाशास्त्री समझा नहीं पाते कि उनकी उत्पत्ति क्या है। जैसे ओमनीप्रेजेंट, ओमनीपोटेंट। शब्दशास्त्री नहीं समझा पाते कि इनकी उत्पत्ति क्या है। लेकिन जो लोग ओम के विज्ञान को समझते हैं, वे कहेंगे कि इन शब्दों का जन्म ओम से हुआ है। ओमनीपोटेंट का अर्थ है कि ओम की तरह जो शक्तिशाली हो गया--विराट। ओमनीप्रेजेंट का अर्थ है कि ओम की भांति जो सब जगह उपस्थित हो गया--सर्वकाल में।
संस्कृत से संसार की करीब-करीब सभी सुसंस्कृत भाषाओं का जन्म हुआ है। संस्कृत आदि भाषा है। अंग्रेजी हो कि लिथवानियन हो कि फ्रेंच हो कि स्लाव, रशियन हो कि जर्मन हो कि इटेलियन हो, स्पेनिश हो, स्विस हो, डेनिश हो, सारी भाषाओं में संस्कृत की मूल धातुएं उपस्थित हैं।
ओम संस्कृत की आधारभूत ध्वनि है। इस ओम में संस्कृत की जितनी ध्वनियां हैं, सभी का समावेश है। ओम बना है अ, उ और म--तीन ध्वनियों के जोड़ से। ए, यू, एम। ये तीन मूल स्वर हैं। बाकी सारी भाषा इन्हीं से पैदा होती है। सारे शब्द फिर इनसे ही निर्मित होते हैं। ओम मूल है, अ, उ, म उसकी तीन शाखाएं हैं। और फिर इन तीन शाखाओं से सारी ध्वनि का जाल और सारे शब्दों का जन्म होता है। ओम को लोगोस कहेंगे यहूदियों की भाषा में; शब्द कहेंगे ईसाइयों की भाषा में। इस ओम के संबंध में यह सूत्र है।
और इस सूत्र को बहुत ठीक से समझ लेना। क्योंकि भीतर जिन्हें प्रवेश करना है, वे इस ध्वनि के सहारे बड़े आसानी से भीतर प्रवेश कर सकते हैं। क्योंकि यह ध्वनि भीतर निनादित हो रही है। प्रतिक्षण यह ध्वनि भीतर गूंज रही है। यह ध्वनि ही आपका प्राण है। यह ध्वनि भीतर से खो जाए, आप खो जाएंगे। आपका अस्तित्व इसी ध्वनि की स्फुरणा है।
लेकिन हम इतने शब्दों और इतनी ध्वनियों से भरे हैं, इतने शोरगुल से, कि भीतर की धुन सुनाई नहीं पड़ती। यह बड़ी सूक्ष्म है, और यह बड़ी गहरे में है। और हम बाजार में इतने उलझे हैं, वहां इतना उपद्रव है, इतना शोरगुल है और हमारे कान उससे इस बुरी तरह भरे हैं कि इस छोटी-सी, धीमी-सी, मौलिक गहरी आवाज को हम सुन नहीं पाते हैं।
इसे सुनने के लिए जरूरी है कि हमारा मन पूरी तरह शांत हो जाए। इसके लिए जरूरी है कि हमारे बाहर का जो शोरगुल है, वह छूट जाए। हमारा मन अव्यस्त हो जाए, अनआकुपाइड हो जाए। बाहर से हम कुछ भी न सुनें और भीतर कोई विचार न चलें, तो धीरे-धीरे-धीरे इस ध्वनि का अनुभव होना शुरू हो जाता है।
इसमें एक खतरा है। और वह खतरा बड़े गहरे खड्डे में भारत को ले गया। जैसे ही यह पता चल गया अज्ञानियों को कि ओम मूलमंत्र है, तो उन्होंने ओम का पाठ शुरू कर दिया। तो वे बैठकर ओम-ओम-ओम का पाठ करने लगे।
यह जो आप पाठ करते हैं, यह मूल नहीं है। जो बिना पाठ किए भीतर गूंज रहा है, वह मूल है। जो आप बोलते हैं होंठों से या मन से, वह तो आपका ही है, वह तो ऊपर-ऊपर है। वह जो भीतर से आता है बिना किसी प्रयास के, जो आपको तोड़कर आता है, पर्त-पर्त उघाड़कर आता है, जो आपके ऊपर छा जाता है, जो आपका कृत्य नहीं है, जो आपके भीतर घटी घटना है, एक हैपनिंग है--उस ओम से जिसका संबंध जुड़ जाता है, वह जीवन के परम आधार से एक हो गया। उसने ब्रह्म के साथ मैत्री बना ली। वह मोक्ष को उपलब्ध हो गया।
लेकिन जैसे ही यह पता चल गया, तो हमने इस पता का यह उपयोग किया कि हम बैठकर ओम-ओम का पाठ करने लगे। अगर आप इसका पाठ करेंगे तो धीरे-धीरे आपका मन ओम की ध्वनि से भर जाएगा। लेकिन वह ध्वनि पैदा की हुई है। वह आपके ही द्वारा पैदा की हुई है। और जो आप पैदा करते हैं, वह आपसे बड़ा नहीं हो सकता।
इसे बहुत ठीक से समझ लें। जो भी आप पैदा करते हैं, वह आपसे बड़ा नहीं हो सकता। आपसे बड़ा, आप कैसे पैदा कर सकते हैं? और जो भी आप पैदा करते हैं, वह हाथ के मैल की तरह है। जिसने आपको पैदा किया, जिससे आप पैदा हुए हैं, उसे आप पैदा नहीं कर सकते। कोई भी अपने बाप को जन्म नहीं दे सकता। इसका कोई उपाय नहीं है।
लेकिन जो लोग ओम का पाठ करके सोचते हैं कि मूल ध्वनि में उतर जाएंगे, वे अपने बाप को जन्म देने की कोशिश कर रहे हैं। यह असंभव है। इसके होने का कोई उपाय ही नहीं है। खतरा यह है कि वह ओम जपते-जपते कहीं इतना कंठस्थ हो जाए और इतना यांत्रिक हो जाए, तो वे यह भूल ही जाएंगे कि यह असली नहीं है, नकली है।
हमने हर चीज में नकल पैदा की है। हमने मंत्र भी नकली पैदा कर लिए! आदमी इतना कुशल है नकल करने में कि जैसे ही उसे पता चल जाए कि मूल कैसा है, वह उसकी नकल बना लेता है। हमने प्लास्टिक के, कागज के ही फूल नहीं बनाए, फूलों में ही हमने कागज का प्रयोग नहीं किया, हमने महामंत्र भी कागज के बना लिए हैं। फिर उन कागज के महामंत्रों को लेकर हम घूमते फिरते हैं, इस खयाल में कि शायद फूल, वास्तविक जीवन का फूल, हमारे हाथ लग गया।
खतरा यह है कि आप ओम का पाठ कर-कर के इतना शोरगुल भीतर पैदा कर लें कि वह जो भीतर की सूक्ष्मातिसूक्ष्म ध्वनि है, वह सुनाई ही न पड़े। आपका ओम ही उसमें बाधा बन जाए।
ऋषियों ने कहा है कि वह जो भीतर का ओम है, वह अनाहत नाद है। अनाहत नाद का अर्थ होता है, जो किसी चीज की चोट से पैदा न हो, आहत न हो। जैसे मैं ताली बजाऊं, यह आहत नाद है। दो चीजें टकराईं, उनसे शब्द पैदा हुआ। होंठ टकराए, शब्द पैदा हुआ। जीभ तालू से टकराई, शब्द पैदा हुआ। जो भी चीज दो चीजों के टक्कर से पैदा होती है, वह अनाहत नहीं है। और यह जो ओम है, अनाहत नाद है। यह किसी चीज की टक्कर से पैदा नहीं होता। यह है। यह अस्तित्व का स्वरूप है। यह पैदा कभी हुआ ही नहीं।
और ध्यान रहे, जो चीज भी पैदा होती है, वह मर जाएगी। और जो चीज दो चीजों की टकराहट से पैदा होती है, वह कितनी देर टिकेगी? हो भी नहीं पाएगी और मिट जाएगी। ताली बज भी नहीं पाई कि खो गई। इन दो हाथों की टक्कर से जो थोड़ी-सी शक्ति मिली ताली की आवाज को, वह कितनी देर चलेगी? और ओम है शाश्वत--सदा, सदैव, नित्य। वह दो चीजों की टक्कर से पैदा नहीं हो रहा है। वह है, वह पैदा हो ही नहीं रहा है।
इस अनाहत की खोज में आप ओम के मंत्र का सहारा ले सकते हैं, लेकिन बड़ी कुशलता की जरूरत है। इसलिए मैंने रात को आपके लिए जो प्रयोग करने को दिया, उसमें मैंने कहा, आप सिर्फ ओ की आवाज करें। म को मत आने दें। आप सिर्फ करें ओऽऽऽ...सिर्फ ओऽऽऽ करते रहें। और एक दिन आप अचानक पाएंगे कि ओम आना शुरू हो गया। आप सिर्फ ओ से चोट मार रहे थे, सिर्फ साज बिठा रहे थे, ताकि भीतर का साज बैठ जाए।
और जिस दिन आप अचानक पाएं चौंककर कि आप तो ओ कहते हैं, लेकिन भीतर से ओम आता है, उस दिन आप समझना कि कोई और धारा भीतर टूट गई। तो प्रतीक्षा करना। आप जल्दी मत करना। आप सिर्फ ओ का उपयोग करना और आधे हिस्से को छोड़ देना भीतर पर। जिस दिन धारा बहेगी, उस दिन वह जुड़ जाएगा।
और जिस दिन आपको ऐसा लगे कि आपके ओ में कोई नई चीज भीतर से आकर जुड़ गई है, उस दिन से आप ओ का उच्चारण भी बंद कर देना। उस दिन से सिर्फ आप आंख बंद करके बैठ जाना और सुनने की कोशिश करना, मंत्र बोलने की नहीं। मंत्र को सुनने की कोशिश करना। होंठ और जीभ का प्रयोग मत करना, कान का प्रयोग करना भीतर। सुनना, कि भीतर क्या हो रहा है। और आप पाएंगे कि ओम का नाद भीतर हो रहा है। वह आपका पैदा किया हुआ नहीं है। आप नहीं थे तब वह था, आप नहीं होंगे तब भी वह होगा। आपका होना एक लहर की तरह है, वह आपके नीचे छिपा हुआ सागर है।
आदमी कभी-कभी अधैर्य में बहुत जल्दी कर लेता है। इसलिए मैंने आपको आधा मंत्र दिया है, आधा छोड़ रखा है। ताकि आधा भीतर से पूरा हो, तो आपको पता चल जाए कि अब कोई नई घटना घट रही है, जो मैं नहीं कर रहा हूं। उसी वक्त आप रुक जाना और मंत्र बोलने की जगह मंत्र को सुनना शुरू कर देना।
ऋषियों ने मंत्र को सुना है, बोला नहीं है। लेकिन जहां आप खड़े हैं, वहां कुछ तो बोलने से शुरू करना पड़ेगा, ताकि पत्थर हट जाए और झरना बहने लगे।
यह ओ की चोट सिर्फ पत्थर को हटाने के लिए है। और जैसे ही पत्थर हटेगा कि ओम का झरना बहने लगेगा। फिर आप चुपचाप हो जाना। फिर आप बोलना मत। फिर आहत नाद पैदा मत करना। फिर तो अनाहत करीब है। और जरा कान उसमें लग जाएंगे, एक ट्यूनिंग हो जाएगी, तो बस सुनाई पड़ना शुरू हो जाएगा। और तब आप चकित होंगे कि यह तो स्वर निरंतर गूंज रहा था, अब तक मैंने सुना क्यों नहीं? आप कहीं और उलझे थे, मन कहीं और व्यस्त था।
मन का एक नियम खयाल में ले लें। मन जहां व्यस्त होता है, उतना ही उसे बोध होता है। और जब मन कहीं बहुत ज्यादा व्यस्त होता है, तो शेष सब जगह अनुपस्थित हो जाता है।
एक युवक खेल रहा है हॉकी के मैदान में। पैर में चोट लग जाती है, खून बहना शुरू हो जाता है। दर्शक जो बैठे हैं ग्राउंड के किनारे, उन्हें दिखाई पड़ता है कि पैर से खून बह रहा है, जमीन पर खून के दाग पड़ गए हैं। लेकिन उस युवक को न तो चोट का पता है, न दर्द हो रहा है, न खून के बहने का कोई खयाल है। उसका सारा ध्यान खेल में लगा है।
लेकिन खेल बंद होगा। घंटी बजेगी, खेल बंद होगा, और तत्क्षण खून बह रहा है, और पैर में दर्द है, पीड़ा है, चोट लग गई है, उसे स्मरण आएगा। यह चोट तो बहुत पहले की लग गई थी! लेकिन ध्यान कहीं और था।
आपके घर में आग लगी हो और कोई आपको नमस्कार करे। आपको दिखाई भी नहीं पड़ेगा, सुनाई भी नहीं पड़ेगा। आंखें देखेंगी, फिर भी नहीं दिखाई पड़ेगा। कान सुनेंगे, फिर भी सुनाई नहीं पड़ेगा। घर में आग लगी है। आप रास्ते से गुजरते हैं रोज। किनारे लगे दीवालों पर पोस्टर भी पढ़ते हैं, दुकानों के साइनबोर्ड भी पढ़ते हैं। दुकानों में भी झांककर देखते बढ़ते चले जाते हैं। लेकिन घर में आग लगी है, उस दिन आपको कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। उसी रास्ते से आप गुजरेंगे, कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। आंखें तो हैं, लेकिन अब आंखों के पीछे मन नहीं है। और जब तक आंखों के पीछे मन न जुड़ा हो, तब तक कुछ अनुभव नहीं होता।
तो आप बाहर इतने व्यस्त हैं, इसलिए भीतर की तरफ ध्यान नहीं है। सारी चेष्टा इतनी है योग की, कि आप बाहर से थोड़े मुक्त हो जाएं, ताकि ध्यान की धारा भीतर बहने लगे। और भीतर सब कुछ मौजूद है, जो चाहा जा सकता है। जो चाह-चाहकर नहीं मिलता, वह मौजूद है। जिसको हम खोज रहे हैं जन्मों-जन्मों से, वह मौजूद है।
बुद्ध को जब ज्ञान हुआ, और किसी ने पूछा कि आपको क्या मिला, तो बुद्ध ने कहा है कि मुझे मिला कुछ भी नहीं, जो मिला ही हुआ था उसका पता चला। वह सदा से था ही।
यह ओम आपके भीतर गूंज ही रहा है। यह आपके प्राणों का स्वर है। यह आपका होना है। यह आपका अस्तित्व है। इसको खयाल में लेकर अब इस सूत्र में उतरें--
यमराज के इन वचनों को सुनकर नचिकेता बोला--जिस उस परमेश्वर को धर्म से अतीत, अधर्म से भी अतीत, तथा कार्य और कारणरूप संपूर्ण जगत से भी भिन्न और भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालों से तथा इनसे संबंधित पदार्थों से भी पृथक आप जानते हैं, उसे बतलाइए।
वह जो न मरता है, न जन्मता है; न जिसका कोई अतीत है, न जिसका कोई वर्तमान, न जिसका कोई भविष्य; जो सदा है, जो कालातीत है; जिसके पैदा होने का कोई कारण नहीं और जिसके मिटने का कोई उपाय नहीं; उस परमात्मा को, उस अंतिम तत्व को आप मुझे बतलाइए--वह क्या है?
नचिकेता ने कहा, यह जो सारे संपूर्ण जगत से भिन्न है, सारे जगत से अतीत है, अतिक्रमण कर जाता है; जो दिखाई पड़ता है, उसके पार है; जो सुनाई पड़ता है, उसके पार है--उस परम तत्व को आप मुझे समझाइए।
यम ने कहा, संपूर्ण वेद जिस परमपद का बारंबार प्रतिपादन करते हैं और संपूर्ण तप जिस पद का लक्ष्य कराते हैं अर्थात वे जिसके साधन हैं, जिसको चाहने वाले साधकगण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद तुम्हें मैं संक्षिप्त में बतलाता हूं, वह है ओम--ऐसा यह एक अक्षर।
यह ओम वैसा ही है, जैसे कि फिजिक्स या केमिस्ट्री के फार्मूले होते हैं, सूत्र होते हैं। इस ओम में भारत की सारी खोज समाई हुई है। इस एक शब्द में हमने सब रख दिया है। और इस छोटे-से शब्द को कोई छोटा न समझे। कुंजी छोटी होती है, लेकिन महलों का द्वार खोल देती है। इस एक छोटी-सी कुंजी से सारे अस्तित्व का द्वार खुल सकता है। लेकिन कुंजी का ठीक-ठीक उपयोग करना आना चाहिए। आपके हाथ में भी कुंजी हो, दरवाजे पर भी आप खड़े हों, और कुंजी को ताले में न लगाएं और कहीं लगाते रहें। ताला न मिले; कुंजी पास हो!
मैंने सुना है, एक रात मुल्ला नसरुद्दीन नशा करके घर आया। वह चाबी घुमा रहा है, बड़ी देर से घुमा रहा है, लेकिन कुछ खुलता नहीं। तो उसकी पत्नी ऊपर से कहती है कि क्या इतने नशे में धुत हो गए हो, कि चाबी खो गई? नसरुद्दीन कहता है, चाबी तो मेरे पास है। पत्नी ने कहा, अगर चाबी खो गई हो, तो मैं दूसरी चाबी फेंकूं? नसरुद्दीन ने कहा, चाबी तो मेरे पास है, अगर दूसरा ताला तेरे पास हो तो फेंक, क्योंकि ताला नहीं मिल रहा है।
चाबी ही हाथ में हो तो काफी नहीं है, ताला भी पता होना चाहिए। चाबी के घुमाने की भी ठीक व्यवस्था खयाल में होनी चाहिए। क्योंकि आप चाबी उलटी भी घुमाते रह सकते हैं। जरा-सी चूक और सब भटक जाएगा। और जितना सूक्ष्म होता है प्रयोग, उतने ही भटकने की संभावना बढ़ जाती है। क्योंकि जरा-सी चूक, कि हजारों मील का फासला हो जाता है।
यम ने नचिकेता को कहा कि वेद जिसका बारंबार गुणगान करते हैं; संपूर्ण तप जिसकी ओर लक्ष्य कराते हैं। साधक जिसके लिए ब्रह्मचर्य साधते हैं...।
इसे थोड़ा समझ लेना चाहिए। जो लोग भी अति कामी हैं, उन्हें भीतर की ओंकार की ध्वनि सुनाई पड़ने में बड़ी कठिनाई होगी। उसके कारण हैं।
कामवासना सिर्फ वासना ही नहीं है, शक्ति का अपव्यय भी है। और जो ऊर्जा हम बाहर फेंक रहे हैं, वह ऊर्जा हमें भीतर रिक्त कर जाती है, क्षीण कर जाती है, दीन कर जाती है, और भीतर हमें जड़ कर जाती है। संवेदना कम हो जाती है। जिन्हें भी ओम की ध्वनि सुननी हो, उन्हें अपनी शक्ति के अपव्यय से बचना चाहिए। क्योंकि जितनी ज्यादा शक्ति भीतर होगी आंदोलित, जितनी शक्ति की तरंगें भीतर होंगी, उन तरंगों में वह भीतर की ओंकार की ध्वनि टकराने लगेगी। और वह जो टकराहट है, वह आपको पहले सुनाई पड़ेगी।
ब्रह्मचर्य का मूल्य ब्रह्मचर्य में स्वयं नहीं है। ब्रह्मचर्य का मूल्य तो केवल भीतर शक्ति की एक दीवाल खड़ी करने में है, जिसमें भीतर का ओंकार टकराने लगे और उस टकराहट को हम सुन पाएं। बिना ब्रह्मचर्य के आप दीवालरहित हैं। जैसे कोई घर हो, जिसमें दीवाल न हो। आवाज आप करें, तो लौटकर कभी न आए। निकल जाए, आकाश में खो जाए। ब्रह्मचर्य से हीन व्यक्ति दीवालरहित है। उसके आसपास कोई भी घेरा नहीं है, जिस घेरे में भीतर की ध्वनि टकराकर वापस लौट सके और सुनी जा सके। वह बिना दीवाल का मकान है। उसमें से आवाज गूंजती है और अनंत शून्य में, आकाश में खो जाती है।
ब्रह्मचर्य एक वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसके माध्यम से शरीर की पर्त के साथ-साथ शक्ति की पर्त इकट्ठी होती चली जाती है। इस शक्ति की पर्त में पहली बार ओंकार की ध्वनि गूंजती है। और जब इस गूंज को हम सुन लेते हैं, तो हमें एक बात तो पक्की हो जाती है कि जिसकी यह गूंज है, वह भीतर छिपा है। फिर इस गूंज का ही रास्ता पकड़कर हम उस मूल तक पहुंच सकते हैं।
इसलिए हम इस देश में बच्चों को पहले ब्रह्मचर्य के लिए गुरुकुल भेज देते थे, ताकि वे भीतर की ध्वनि से थोड़े परिचित हो जाएं। एक बार व्यक्ति ब्रह्मचर्य से छूट जाए बिना भीतर की ध्वनि का अनुभव किए, तो फिर बहुत कठिन हो जाता है, अति कठिन हो जाता है उस ध्वनि को पकड़ना। आपके मकान में दीवालों में छेद हो जाते हैं। चीजें जैसे विकृत हो जाती हैं, फिर उनको सुधारना अति कठिन होता चला जाता है।
और एक घड़ी है, ठीक जिस समय चौदह या तेरह वर्ष की उम्र में युवक और युवतियां कामवासना से प्रौढ़ होते हैं, वह क्षण शक्ति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षण है। उस समय उनके शरीर के आसपास वह सारी ऊर्जा इकट्ठी है। वह ऊर्जा असाधारण है। क्योंकि उसी ऊर्जा से जन्म होगा। वह ऊर्जा जन्मदात्री है। उस ऊर्जा से बच्चे पैदा होंगे। वह ऊर्जा परमात्मा की है, तभी तो उससे बच्चे पैदा हो पाते हैं। वह सृष्टि की मूल शक्ति है।
और एक-एक व्यक्ति कितनी शक्ति लेकर पैदा होता है, आपको कल्पना नहीं। एक संभोग में जितना वीर्य नष्ट होता है, उससे दस करोड़ बच्चे पैदा हो सकते हैं। वैज्ञानिक हिसाब से दस करोड़ जीवकोष्ठ एक संभोग में स्खलित होते हैं। और एक जीवकोष्ठ एक बच्चे को जन्म दे सकता है। अगर एक व्यक्ति के सारे जीवकोष्ठों का उपयोग हो, तो इस पृथ्वी को हम एक ही व्यक्ति के बच्चों से भर सकते हैं। एक व्यक्ति सामान्य रूप से संभोग करे तो जीवन में चार हजार संभोग कर सकता है। और एक-एक संभोग में एक-एक करोड़ बच्चे पैदा कर सकता है। चार अरब बच्चे एक आदमी की संपदा है। इतनी जीवन-ऊर्जा एक-एक आदमी लेकर पैदा होता है।
यह जीवन-ऊर्जा असाधारण है। एक छोटे-से वीर्य के कण में छिपी हुई ऊर्जा एटम में छिपी ऊर्जा से कुछ कम शक्तिशाली नहीं है, ज्यादा ही शक्तिशाली है। हमें कल तक पता नहीं था, उन्नीस सौ पैंतालीस तक पता नहीं था कि एक छोटे-से अणु में, जो दिखाई नहीं पड़ता आंख से, उसमें इतनी ऊर्जा हो सकती है कि पूरा हिरोशिमा, कोई एक लाख लोग एक क्षण में राख हो गए। एक एटम से एक क्षण में एक लाख लोग नष्ट होते हैं, वह हमें पहली दफा पता चला। इस पूरी पृथ्वी को थोड़े-से ही एटम नष्ट कर देंगे। लेकिन एटम से भी बड़ी ऊर्जा जीवकोष्ठ की है। क्योंकि एक ही क्षण में एक व्यक्ति, एक करोड़ व्यक्तियों को पैदा करने की क्षमता को संभोग में खोता है।
और आज नहीं कल, विज्ञान जब जीवकोष्ठ की भी शक्ति को पकड़ लेगा, तो परमाणु बम की शक्ति बहुत छोटी हो जाएगी। जिस दिन भी हम जीवकोष्ठ की शक्ति को पकड़ लेंगे, उस दिन हमने परमात्मा की शक्ति को पकड़ लिया। हमने मौलिक तत्व पकड़ लिया, जिससे सारे जीवन का विस्तार है।
चौदह वर्ष की उम्र में, जब कि पहला स्खलन होगा व्यक्ति का वीर्य का, उस स्खलन के पहले अगर उसे ओंकार की ध्वनि सुनाई पड़ जाए, उसका जीवन दूसरा ही हो जाएगा। उस स्खलन के बाद, हर स्खलन के बाद इस ओंकार को सुनना कठिन होता जाएगा। दीवारों में छेद होने लगे। प्रतिध्वनि वापस नहीं आएगी, बिखर जाएगी, खुले आकाश में लीन हो जाएगी।
जिन्होंने बच्चों को पहला पाठ ब्रह्मचर्य का देना चाहा था, उनके प्रयोजन बड़े गहन थे। और ध्यान रहे, यह पाठ उस दिन शुरू हो जाने चाहिए, जब बच्चों के मन में कोई कामवासना ही पैदा नहीं हुई। एक बार कामवासना पैदा हो गई, फिर ब्रह्मचर्य की शिक्षा का कोई भी अर्थ नहीं। बल्कि वह खतरनाक है, घातक है। क्योंकि उससे मन सिर्फ विकृत होगा, रुग्ण होगा, दमन से भरेगा; कुछ परिणाम नहीं होगा।
छोटे बच्चे, जब उन्हें कामवासना की कोई झलक ही नहीं है, और जब उनके शरीर तैयार हो रहे हैं, और वासना के पहले कृत्य के लिए जब उनकी ऊर्जा इकट्ठी हो रही है, उस क्षण में ही, उस क्षण के पूर्व ही अगर ओम की ध्वनि से संबंध जुड़ जाए, जो कि बहुत आसान है...। छोटे बच्चों को ओंकार की तरफ ले जाना बिलकुल सरल बात है; बूढ़ों को ले जाना बहुत कठिन बात है।
यह जो यम ने कहा कि साधक उसके लिए ही ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं; उसके लिए ही तप करते हैं। वही संपूर्ण वेदों का सार है। वह एक छोटा शब्द, उसने कहा, वह मैं तुम्हें संक्षिप्त में बतलाता हूं। वह है ओम--ऐसा यह एक अक्षर।
यह अक्षर ही तो ब्रह्म है, और यह अक्षर ही परब्रह्म है। इसलिए इसी अक्षर को जानकर, जो जिसको चाहता है, उसको वही मिल जाता है।
यह सूत्र बड़ा खतरनाक है। और इसलिए इस सूत्र की प्राथमिक साधना में इच्छाओं से मुक्त हो जाना जरूरी है।
ओंकार की ध्वनि आपको सुनाई पड़ जाए, फिर आप जो भी इच्छा करेंगे, वह करते ही पूरी होने लगेगी। इसलिए आप जैसे अभी हैं, ठीक वैसे ही अगर ओंकार की ध्वनि आपको मिल जाए, तो अपनी आत्महत्या में आप लग जाएंगे।
आपकी हालत वैसी हो जाएगी जैसा मैंने सुना है कि एक यात्री भूला-भटका हुआ स्वर्ग में पहुंच गया। वह कल्पवृक्ष के नीचे थका हुआ विश्राम करने लगा। उसे कुछ पता नहीं कि यह स्वर्ग है। उसे कुछ पता नहीं कि यह कल्पवृक्ष है। वह तो सिर्फ छाया...आंख खुली, थका-मांदा, भूख लगी, उसे खयाल आया कि अगर इस समय कहीं भोजन मिल जाए। इतना खयाल का आना था कि--वह कल्पवृक्ष के नीचे था, कि एकदम चकित हुआ--आकाश में से तैरती हुई थालियां, स्वादिष्ट भोजनों को लिए हुए, उसके सामने उपस्थित हो गईं। वह थोड़ा डरा भी। लेकिन भूख इतनी ज्यादा थी कि उसने भोजन कर लिया। भोजन कर भी नहीं पाया था कि उसे लगा कि यह जगह कुछ खतरनाक मालूम होती है। कोई भूत-प्रेत तो नहीं! देखा कि चारों तरफ भूत-प्रेत खड़े हो गए। उसने कहा कि मरे! कि सब भूत-प्रेत उसकी छाती पर चढ़ गए। उसकी गर्दन दबाने लगे। तो उसने सोचा कि अब यह छोड़ने वाले नहीं, अब तो मार ही डालेंगे। कि उन्होंने उसे मार ही डाला।
वह कल्पवृक्ष था। उसके नीचे जो भी कामना होगी, वह तत्क्षण पूरी हो जाएगी। आप जैसे हैं, कल्पवृक्ष के नीचे पहुंच जाएं, तो यही होगा। ऐसा मत समझना कि मैंने कहानी कह दी तो आप कुछ और करेंगे। आप यही करेंगे। इससे कोई भेद नहीं पड़ेगा। आपकी इच्छाएं, वासनाएं आपके बस में तो नहीं हैं। उठती हैं, तो आप कुछ कर नहीं सकते। विक्षिप्त है भीतर मन।
यम कह रहा है कि यह अक्षर ही तो ब्रह्म है। यह अक्षर ही परब्रह्म है। इसलिए इसी अक्षर को जानकर, जो जिसको चाहता है, उसको वही मिल जाता है।
इस अक्षर को जानते ही, इस ओंकार की ध्वनि के साथ एक होते ही, जो भी वासना है, वह तत्क्षण पूरी हो जाती है। इसलिए शर्त है कि वासनाएं छोड़कर ही ओंकार की साधना करनी है। नहीं तो आप क्षुद्र से भर जाएंगे और विराट की ऊर्जा क्षुद्र में खो जाएगी। जो मिला था, उसे आप नष्ट कर देंगे। हीरा मिला था, आप कंकड़ खरीद लेंगे, हीरा दे देंगे।
इसीलिए इतनी ज्यादा यम ने परीक्षा ली है, कि कोई वासना तो नहीं है नचिकेता में? और जब पाया कि कोई वासना नहीं है, वैराग्य का भाव पूरा है, तब वह बताने को राजी हुआ है। लेकिन जो व्यक्ति निर्वासना से भरकर ओंकार की साधना में डूब जाता है, उसकी एक ही प्यास शेष रहती है--परमात्मा से मिल जाने की, परम सत्य से एक हो जाने की, लीन हो जाने की महासागर में, बूंद की भांति खो जाने की। बस, वह इच्छा पूरी हो जाती है। ओंकार की ध्वनि की स्फुरणा के साथ ही जो भी प्यास शेष रहती है, वह तत्क्षण पूरी हो जाती है।
ओंकार वैसा ही सूत्र है, जैसा कि एटामिक फिजिक्स का सूत्र है, कि हाथ में पड़ते ही विनाश का महामंत्र मिल गया। आइंस्टीन ने कहा है मरने के कुछ दिन पहले कि अगर मुझे दुबारा जन्म मिले, तो मैं किसी गांव में प्लंबर होना पसंद करूंगा, लेकिन अब दुबारा आइंस्टीन होने की इच्छा नहीं है। क्योंकि मुझे पता नहीं था कि मेरे हाथ से विनाश की शक्ति का सूत्र निकल रहा है।
यह ओम सृजन की शक्ति का सूत्र है। यह महासृजन की शक्ति का सूत्र है। इससे हम जीवन के मूल केंद्र पर पहुंच जाते हैं, जहां से सारी सृष्टि विकसित हुई है; उस गंगोत्री पर, जहां से जीवन की सारी गंगा बहती है। लेकिन उसके पहले सारी वासनाएं जड़मूल से खो जानीं चाहिए।
इसलिए मेरा इतना आग्रह है कैथार्सिस का, कि आपका सब तरह से रेचन हो जाना चाहिए। अगर जरा भी कुछ रोग आपके भीतर पड़े रह गए, और ध्यान आपका सधने लगा, तो वे रोग आपको बहुत बुरी तरह सताएंगे। उनका हट जाना जरूरी है। क्योंकि ध्यान महाशक्ति है, अगर रोग मौजूद रहे, तो वह महाशक्ति रोगों को मिल जाएगी। वे रोग हट जाने चाहिए।
लोग मेरे पास आते हैं। वे कहते हैं, इस उछलने-कूदने से क्या होगा? चिल्लाने-रोने से क्या होगा? उन्हें पता नहीं है कि क्या हो सकता है। जब कोई घर में मर जाए और रोना आता हो, आप मत रोएं, रोक लें रोने को, तब आपको पता चलेगा कि क्या हो सकता है। न रोने से क्या हो सकता है! सारे प्राण सिकुड़ जाएंगे। भीतर दुख ही दुख भर जाएगा। आप एक घाव हो जाएंगे, जो रिसने लगेगा। और जब तक आप रो न लेंगे भरपूर, तब तक इस घाव से छुटकारा न होगा।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं, जो कि बड़ा उलटा मालूम पड़ता है...। आमतौर से जैसा हम समझते हैं, स्त्रियां ज्यादा पागल होनी चाहिए बजाय पुरुषों के। लेकिन बड़ी अजीब बात है, स्त्रियां कम पागल होती हैं, पुरुष ज्यादा पागल होते हैं। होना उलटा चाहिए। क्योंकि स्त्रियां काफी पागल मालूम पड़ती हैं। लेकिन पागल होती नहीं। राज साफ है। पागलपन रोज निकाल लेती हैं, इकट्ठा कभी हो नहीं पाता। पुरुष बड़ा सम्हलकर चलता है। कोई कुछ कह न दे कि क्या नासमझी की बात कर रहे हो! स्त्री दिल खोलकर रो लेती है, कोई भी कुछ नहीं कहेगा। कहेगा, स्त्री है। आप रो रहे हैं, तो कहेगा, क्या मर्द होकर रो रहे हो? आंसू रुक जाएंगे। यह मर्दपन पागलपन में ले जाएगा। अगर ज्यादा मर्दानगी की, तो आप पागलखाने में दिखाई पड़ेंगे।
क्यों प्रकृति ने आपकी आंखों में भी उतने ही आंसू की क्षमता दी है जितनी स्त्री की आंखों में? प्रकृति ने भेद नहीं किया। उतनी ही ग्लैंड्‌स आपकी आंखों में हैं जितनी स्त्री की। अगर प्रकृति को भेद करना होता स्त्री और पुरुष का, तो पुरुष की आंखों में ग्लैंड्‌स कम होतीं आंसू की, पर वे उतनी ही हैं।
और ध्यान रहे, जो रोने को रोक लेगा, उसका हंसना भी रुक जाएगा। यह जरा जटिल है। क्योंकि जो ठीक से रो नहीं सकता, वह ठीक से हंस भी नहीं सकता। वह हंसने से भी डरेगा। असल में वह सभी चीजों को नियंत्रित करने लगेगा। क्योंकि भयभीत है कि कुछ छूट न जाए; कहीं कुछ बंधन न टूट जाए; चीजें बाहर न निकल पड़ें।
पुरुष ज्यादा पागल होते हैं। पुरुष ज्यादा आत्महत्या करते हैं। स्त्रियां कम पागल होती हैं, कम आत्महत्या करती हैं। बातें बहुत करती हैं कि आत्महत्या कर लेंगे; करती कम हैं! वह बातों में ही निकल जाता है मामला! इसलिए मनोवैज्ञानिक कहते हैं, जो बहुत कहता है आत्महत्या करेंगे, उससे निश्चिंत रहना। जो कभी न कहता हो, वह खतरनाक है। वह कभी न कभी कर सकता है। उसने कभी कहा नहीं, निकल नहीं पाया। सब इकट्ठा होता चला गया है।
जो आदमी रोज क्रोध करता है छोटी-छोटी बातों में, उससे डरने की कोई जरूरत नहीं। वह उपद्रव कोई नहीं कर सकता। वह किसी की हत्या नहीं कर सकता। हत्या के लिए महाक्रोध इकट्ठा होना चाहिए। उसमें कभी इकट्ठा ही नहीं होगा। इसलिए छोटी-छोटी बातों में क्रोध करने वाले लोग अक्सर प्यारे और भले होते हैं। साधु, सज्जन, जो क्रोध नहीं करेंगे, पी जाएंगे, ये खतरनाक हैं। इनसे जरा दूर रहना, ये दुष्ट हैं। ये किसी भी दिन, जब भी करेंगे, तो गर्दन से कम नहीं! इससे कम में इनका काम ही नहीं चलेगा। इन्होंने इतना इकट्ठा कर लिया है।
आप कहते हैं, क्या होगा नाचने-कूदने से, रोने-चिल्लाने से? और आपने जिंदगीभर यह सब इकट्ठा कर रखा है। वही तो आपका रोग है, उसकी वजह से तो आप सरल नहीं हो पाते।
बच्चे क्यों सरल हैं? उनकी सरलता का कुल एक ही कारण है कि अगर क्रोध है, तो बच्चा उछल-कूद पूरी कर लेता है, हाथ-पैर पटक लेता है। बच्चे को क्रोध में देखें, तब जैसे सारी दुनिया की शक्ति उसमें आ जाती है। चेहरा लाल हो जाता है, आंखें जलने लगती हैं, हाथ-पैर पटकने लगता है। है छोटा-सा, लेकिन जैसे विराट उसमें प्रकट होने लगता है। फिर क्रोध बह गया, और एक क्षण बाद वह हंस रहा है। और उसके हंसने में क्रोध का जरा-सा भी विकार नहीं है। उसकी हंसी में क्रोध का जरा-सा भी दाग नहीं है। उसकी हंसी फिर फूल की तरह है। हमें बड़ी हैरानी होती है कि अभी यह इतने क्रोध से भरा था, अब इतना खुश नजर आ रहा है!
असल में क्रोध बह गया, कुछ बचा नहीं, जो खुशी को बिगाड़ सके, जो खुशी में जहर बन सके। क्रोध बह गया, बच्चा हंस रहा है। फिर क्रोध आएगा, फिर क्रोध कर लेगा, फिर हंस लेगा, खुश होगा, दुखी होगा। लेकिन जो भी होगा वह क्षण में हो जाएगा, इकट्ठा कुछ भी न होगा। जिस दिन बच्चा इकट्ठा करने लगा, उसी दिन बचपन मर गया। अब बच्चे ने बूढ़ा होना शुरू कर दिया। और हम सब कितना इकट्ठा कर लिए हैं! उसकी वजह से हम जटिल हैं, सरल नहीं हैं।
और जो सरल नहीं है, सहज नहीं है, उसका इस भीतर के ओंकार से कोई संबंध नहीं हो सकता। इसलिए इतना जोर है कैथार्सिस पर, रेचन पर, कि फेंक दें सब जन्मभर का इकट्ठा हुआ कचरा। उसे सम्हालकर मत चलें।
लेकिन डर है कि कोई देख न ले, कि आप जो कभी नहीं रोए, रो रहे हैं! आपकी प्रतिमा है एक, एक इमेज है, कि आप इस तरह पागलों की तरह खिलखिलाकर हंस रहे हैं? आपसे ऐसी आशा नहीं थी, कि आप ऐसा नाचेंगे, कूदेंगे, कभी सोचा भी नहीं था!
दूसरे के भय से अगर आप रोक लेंगे, तो मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूं। दूसरे के भय से अगर आप जी रहे हैं, दूसरा अगर आपको नियोजित कर रहा है, इतना भी साहस नहीं है, तो धर्म आपकी यात्रा नहीं हो सकती। वह निर्भीक, साहसी लोगों का काम है।
एक मित्र आए हैं। वे मुझसे आकर बोले कि और तो सब ठीक है, लेकिन पत्नी भी साथ आई है। मैं नाचूं-कूदूं कुछ, तो वह घर जाकर...।
तो उनकी एक प्रतिमा है पत्नी के सामने, वह मिट जाएगी। पत्नी उनसे डरी हुई है। वह भी मुझसे अलग आकर कह गई कि पति साथ आए हुए हैं! एक-दूसरे से डरे हुए लोग हैं।
ध्यान रहे, जिनसे आप डर रहे हैं, वे भी आपसे डर रहे हैं। इतनी कृपा करें, उनसे मत डरें, तो वे भी आपसे नहीं डरेंगे। इनमें से, पति-पत्नी में से एक भी उछलने-कूदने लगे, तो दूसरा स्वतंत्र हो जाएगा कि बात खतम हो गई। अब क्या अपनी प्रतिमा बचानी, जब दूसरे ने नहीं बचाई!
इस प्रतिमा को बचाने के मोह में हम दमित, सप्रेस्ड बने रहते हैं। वह दमित व्यक्तित्व मूल स्वरों को नहीं पकड़ सकता। वह उतना गहरा नहीं जा सकता। गहराई में जाने के लिए सरलता चाहिए, निर्दोष सरलता चाहिए, बच्चे जैसी सरलता चाहिए।
आप इन दिनों में यहां बिलकुल छोटे बच्चे जैसे हो जाएं। इस संबंध में एक सूत्र और आपको जोड़ देना है, जो कल सुबह से आप प्रयोग करें। एक सूत्र मैंने दिया, एक विधि रात को करने की, सोने के पहले दस मिनट जोर से श्वास को छोड़ें और ओऽऽऽ...की आवाज करते हुए छोड़ें। और फिर सो जाएं। उसी ओ की आवाज करते-करते लीन हो जाएं, सो जाएं।
सुबह जैसे ही आपको पता चले कि नींद खुल गई है, आंख मत खोलें। जैसे ही अनुभव में आ जाए कि नींद खुल गई, पहला काम करें--जैसा कि बिल्लियां या कुत्ते पूरे शरीर को खींचते हैं, तानते हैं--वैसा पूरे शरीर के अंगों को खींचें, तानें, शिथिल करें, ताकि पूरे शरीर में शक्ति का प्रवाह हो जाए। सारे अंगों को खींचें और ढीला छोड़ दें, खींचें और ढीला छोड़ दें। पैरों को, हाथों को, गर्दन को, पूरे शरीर को अकड़ाएं और सब तरह से, जैसा कि पशु करते हैं, ताकि शरीर की शक्ति पूरी तरह प्रवाहित हो जाए। ढाई मिनट, दो-ढाई मिनट, अभी भी आंख न खोलें और जब दो-ढाई मिनट ऐसा करने के बाद आप पाएं कि स्फूर्ति आ गई, सारा शरीर जग गया, रोआं-रोआं जग गया, तब ढाई मिनट तक खिलखिलाकर पागल की तरह हंसें। आंख बंद ही रखें। उसके बाद ही बिस्तर छोड़ें, ताकि शुभ-मुहूर्त--सुबह ही रेचन शुरू हो जाए। और जब आप ध्यान करने यहां आएं तो पहले ही तैयारी हो चुकी हो।
और डरें मत कि बगल के कमरे का व्यक्ति क्या सोचेगा? उसकी भी सहायता करें, आपका करना सुनकर उसकी भी हिम्मत बढ़ेगी। वह आपसे डरा हुआ है। इस प्रयोग को सुबह के लिए जोड़ दें।
यही अत्युत्तम आलंबन है, यही सबका अंतिम आश्रय है। इस आलंबन को भलीभांति जानकर साधक ब्रह्मलोक में महिमा को उपलब्ध होता है।
नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह न तो स्वयं किसी से हुआ है, न इससे भी कोई हुआ है। अर्थात यह न तो किसी का कार्य है और न कारण है। यह अजन्मा, नित्य, सदा एकरस रहने वाला और पुरातन है, अर्थात क्षय और वृद्धि से रहित है। शरीर के नाश किए जाने पर भी इसका नाश नहीं किया जा सकता है।
यदि कोई मारने वाला व्यक्ति अपने को मारने में समर्थ मानता है और यदि कोई मारा जाने वाला व्यक्ति अपने को मारा गया समझता है, तो वे दोनों ही आत्मस्वरूप को नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जा सकता है।
ओम की ध्वनि के माध्यम, सहारे से जैसे ही कोई व्यक्ति स्वयं के स्वरूप की झलक पाता है, वैसे ही मृत्यु असत्य हो जाती है। और तब वह देखता है कि भीतर जो है उसे मिटाने का कोई भी उपाय नहीं, वह नहीं मिट सकता। क्योंकि वह कभी जन्मा नहीं है। जो जन्मता है, वह मरेगा। आप नहीं जन्मे हैं माता-पिता से, केवल आपकी देह जन्मी है। देह निर्मित हुई है, आप प्रविष्ट हुए हैं उस देह में।
वैज्ञानिक सोचते हैं कि आज नहीं कल वे टेस्ट-ट्यूब में मनुष्य की देह का निर्माण कर लेंगे। और इसमें कुछ अड़चन ज्यादा नहीं मालूम होती। यह हो जाएगा। लेकिन वैज्ञानिक सोचते हैं कि जिस दिन वे मनुष्य को निर्माण कर लेंगे प्रयोगशाला में, और मां और पिता के गर्भ की और वीर्य की कोई भी जरूरत न रहेगी, जिस दिन बच्चा पूरा यंत्रों के बीच यांत्रिक गर्भ में पैदा और बड़ा होगा, उनकी धारणा है, उस दिन उन्होंने सिद्ध कर दिया होगा कि कोई आत्मा नहीं है। वे गलती में हैं। उससे कुछ भी सिद्ध न होगा--आत्मा का न होना। उससे सिर्फ इतना ही सिद्ध होगा कि अब तक प्राकृतिक ढंग से शरीर निर्मित होता था और आत्मा उसमें प्रविष्ट होती थी। अब शरीर वैज्ञानिक ढंग से निर्मित होने लगा और आत्मा उसमें प्रविष्ट होने लगी। आत्मा सिर्फ प्रवेश करती है, आत्मा पैदा नहीं होती।
इसलिए वैज्ञानिक अगर प्रयोगशाला में भी मनुष्य को पैदा कर लें, तो भी आत्मा को पैदा नहीं कर रहे हैं। वे इस भ्रम में न पड़ें। उन्होंने केवल प्राकृतिक शरीर की जगह कृत्रिम शरीर निर्मित कर दिया। और जिस दिन शरीर इस योग्य होगा--कृत्रिम शरीर--कि आत्मा उसमें प्रवेश कर सके, आत्मा प्रवेश कर जाएगी। आत्मा अजन्मी है और उसकी कोई मृत्यु भी नहीं है। शरीर ही बनता है और शरीर ही मिटता है।
लेकिन यह बात कुछ मान लेने की नहीं है। और यह बात कुछ सिद्धांत की तरह पकड़ लेने की नहीं है। यह तो तभी समझ में आएगी, जब इसका भीतर अनुभव हो जाएगा। इसलिए मैं नहीं कहता कि आप मान लें कि आत्मा अमर है। मैं तो कहता हूं, जानने में लगें।
एक महिला ने मुझे आज आकर कहा कि वह नास्तिक है। बुरा नहीं है, अच्छा है। सभी को नास्तिक होना ही चाहिए। नास्तिक का इतना ही मतलब है कि जिसका हमें पता नहीं, उसे हम कैसे मानें? नास्तिकता वस्तुतः इनकार नहीं है। नास्तिकता का मतलब यह नहीं है कि आत्मा नहीं है। अगर कोई नास्तिक ऐसा कहे कि आत्मा नहीं है, तब तो वह नास्तिकता के बाहर जा रहा है। वह एक ऐसी बात की घोषणा कर रहा है जिसका उसने कोई अनुभव नहीं किया। वह घोषणा भ्रांत है। वह घोषणा निराधार है। क्योंकि अब तक कोई भी सिद्ध नहीं कर पाया है अनुभव से कि आत्मा नहीं है।
अनुभव से तो जिन्होंने भी जाना उन सबने कहा कि आत्मा है। अनुभवी तो कहता है, है। हां, आपको जब तक अनुभव न हो, तब तक आप कह सकते हैं कि मुझे पता नहीं है। बस इतना ही। अगर आप जोर देकर कहने लगें कि नहीं है, तो आप नास्तिक नहीं हैं, आप तर्कयुक्त नहीं हैं। आप बुद्धिमानी की बात नहीं कर रहे हैं। आप अंधे हैं, श्रद्धालु हैं। आपकी श्रद्धा आत्मा के न होने में है, लेकिन अनुभव यह आपका नहीं है। नास्तिक होना बुरा नहीं, लेकिन नास्तिक पर रुक जाना बुरा है।
एक और मित्र दो दिन पहले मुझे मिले। और उन्होंने कहा कि मैं तो नास्तिक हूं और मुझे कोई बात समझ में नहीं आती आस्तिकता की। तो मैंने उनसे कहा कि समझने की जरूरत भी क्या है? परेशान क्यों हैं? मत समझें। छोड़ें। लेकिन जाहिर है कि नास्तिकता में तृप्ति नहीं है। इसलिए समझने की कोशिश है। नहीं तो मेरे शिविर में आने का क्या प्रयोजन है?
और मैंने कहा कि अगर नास्तिकता से आनंद उपलब्ध हो रहा हो, तो मैं खुद भी नास्तिक बनने को तैयार हूं। वे बोले कि आनंद तो बिलकुल उपलब्ध नहीं हो रहा है। तो फिर मैंने कहा कि मुझे कहीं आनंद उपलब्ध हो रहा है, मैं कहता हूं, इस रास्ते पर थोड़ा चलकर देखो। अगर तुम्हें आनंद उपलब्ध हो रहा हो, भरोसे से तुम कहते हो, तो मैं तुम्हारे रास्ते पर चलने को राजी हूं। या मैं तुम्हें भरोसे से कहता हूं कि मुझे आनंद उपलब्ध हुआ है, चलकर देख लो।
नास्तिकता नपुंसकता है, क्योंकि उससे कुछ मिलता तो है नहीं। वह सिर्फ निषेध है। वह कहती है, यह नहीं है, यह नहीं है, यह नहीं है। लेकिन उपलब्धि क्या है? उससे मिलेगा क्या? नकार से पैदा क्या हो सकता है?
नास्तिकता ऐसे है जैसे एक आदमी खेत में कंकड़ बो दे और मैं उससे कहूं कि बीज देता हूं, बीज बो दे, और वह कहे कि बीज में हमारा भरोसा नहीं, हम तो कंकड़ में भरोसा करते हैं। तो मैं उससे यही पूछूंगा कि फसल कहां है? अगर तेरा भरोसा कंकड़ों में है, तो फसल दिखा। क्योंकि फल ही प्रमाण है। अंकुर कहां हुए हैं? फल कहां लगे हैं? फूल कहां आए हैं? कंकड़ बोने तक ही काम होता तब तो ठीक था, फसल भी कभी काटी है? अब तक किसी नास्तिक ने कोई फसल नहीं काटी है। तो अगर कंकड़ बोना ही केवल सुख हो, तो बोए चले जाओ।
लेकिन आदमी बोता इसलिए है कि काट सके। आदमी बीज इसलिए डाल सकता है कि वृक्ष हो, कि फूल लगें; कि फल लगें, कि कोई तृप्ति हो, कि कोई उपलब्धि हो; कि कहीं कोई जीवन का रूपांतरण हो। निषेध से कोई रूपांतरण तो नहीं होता। सिर्फ कह देने से कि मोक्ष नहीं है, कुछ हल नहीं होता। इससे आप मुक्त नहीं होते। इससे आप बदलते भी नहीं। इससे आप कहीं जाते भी नहीं। कोई मंजिल उपलब्ध नहीं होती।
लेकिन मैं नहीं कहता कि आप बिना जाने मान लें। मैं कहता हूं कि बिना जाने न तो मानें, और न न-मानने का जोर करें। बिना जाने इतना ही समझें कि मुझे पता नहीं, और खोज के लिए तैयार हों।
आत्मा अमर है, ऐसा सिद्धांत कुछ काम का नहीं है। लेकिन आत्मा अमर है, ऐसी प्रतीति अनूठी है। और वह आपके भीतर छिपा है तत्व। जो आप नहीं थे इस शरीर की भांति, तब भी था; और जब यह शरीर आपके प्रियजन-परिजन मरघट में जला देंगे, तब भी होगा। लेकिन उसे पाने के लिए थोड़ा पीछे सरकना होगा। थोड़ा शरीर से हटना होगा, मन से हटना होगा। और थोड़ा अपने भीतर उस केंद्र को खोजना होगा, जिसके आगे कुछ भी नहीं है।
इस केंद्र की खोज ओंकार से, ओम से हो सकती है। ओम इसकी कुंजी है।
इस जीवात्मा के हृदयरूप गुहा में रहने वाला परमात्मा सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म और महान से महान है। परमात्मा की इस महिमा को कामनारहित, चिंतारहित कोई बिरला साधक सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पाता है।
यह आखिरी बात थोड़ी खयाल में ले लेनी चाहिए। यह बड़ी जटिल है और बड़ी विवादग्रस्त है। और इस पर हजारों साल तक चर्चा हुई है। और दो बड़े मत हैं, जो एक-दूसरे के विरोधी हैं।
एक मत कहता है कि अपने ही संकल्प और अपने ही प्रयत्न से परमात्मा या सत्य मिलता है। जो परमतत्व है, वह अपने ही प्रयास से और प्रयत्न और साधना और तप से उपलब्ध होता है। वह किसी की कृपा से नहीं मिल सकता। कृपा का कोई सवाल भी नहीं है--इस मत का कहना है। और अगर वह किसी की कृपा से मिलता है, तो यह जगत फिर बिलकुल ही एक बेबूझ पहेली है; यह बेहूदी घटना है। क्योंकि तब तो यह भी हो सकता है कि जो श्रम करे उसे न मिले, और जो श्रम न करे उसे मिल जाए।
इसलिए महावीर, बुद्ध और उस परंपरा के सारे सिद्धपुरुष कहते हैं कि किसी की कृपा का कोई सवाल नहीं है, अपना ही प्रयत्न पर्याप्त है। कृपा की बात ही थोड़ी गड़बड़ है। उसमें थोड़ी रिश्वत की बू है। एक आदमी ऐसा हाथ-पैर जोड़कर मंदिर में, और नाक रगड़कर और सिर पटककर, और कि तुम पतित-पावन हो और मैं पापी हूं, ऐसा कहकर राजी कर ले परमात्मा को। और एक आदमी जीवनभर श्रम करता रहे, तप करे, ध्यान करे, और परमात्मा का नाम भी न ले, तो उस पर कृपा कैसे होगी?
तो महावीर ने तो कहा कि परमात्मा है ही नहीं। क्योंकि वह हो तो यह कृपा का उपद्रव साथ लगा रहे! व्यक्ति का श्रम पर्याप्त है। उसका श्रम जिस दिन पूरा हो जाएगा, उस दिन सत्य उपलब्ध होगा। इस बात में थोड़ी सचाई है। और इस बात में अर्थ है।
इससे विपरीत एक विचारधारा है, जो कहती है, आदमी के हाथ में क्या है? आदमी कमजोर है, असहाय है, अज्ञानी है। और इस अज्ञान से भरा हुआ आदमी जो श्रम भी करेगा, वह श्रम भी तो अज्ञान में ही होगा। इस अज्ञान से भरा हुआ आदमी, कमजोर, दीन-हीन आदमी, जो प्रयत्न भी करेगा वह प्रयत्न भी विराट को पाने वाला कैसे हो सकता है? ये हाथ इतने छोटे हैं आदमी के, कि उस विराट को अपनी मुट्ठी में ले कैसे पाएंगे? सत्य इतना बेबूझ है, इतना दुर्गम है, और आदमी इतना कमजोर और इतने अंधेरे में है कि प्रभु-कृपा के बिना यह यात्रा हो नहीं सकती। उस विराट की कृपा होगी, तो ही इन पैरों में शक्ति आएगी।
और फिर इस दूसरी धारा का यह भी कहना है कि प्रयत्न और संकल्प और श्रम, सब अहंकार को मजबूत करेंगे, कि मैं कुछ हूं, कि मैं ही पा लूंगा। और अहंकार तो बड़ी बाधा है। इसलिए इस अहंकार को जगह मत दो। उसकी कृपा, उसका प्रसाद, उसकी ग्रेस, उसकी अनुकंपा से होगा, ताकि अहंकार को कोई जगह न रहे। इस दूसरी बात में भी बड़ा सच है।
ये दोनों बातों में सच है और दोनों बातों में खतरा भी है। पहली बात का खतरा है अहंकार। और दूसरी बात का खतरा है प्रमाद, आलस्य।
पहली बात का खतरा है कि आदमी अहंकार से भर जाए। इसलिए जैन-साधु जितना अहंकारी होता है उतना किसी समाज का साधु नहीं होता। होगा ही। जैन-साधु किसी को नमस्कार भी नहीं करेगा। जब परमात्मा नहीं है, जिसको नमस्कार करें, तो फिर किसको नमस्कार करें! जैन-साधु सिर्फ आशीर्वाद दे सकता है, नमस्कार नहीं कर सकता। झुकने की बात ही में गड़बड़ हो जाती है।
तो जैन-साधु जितना सघन अहंकार लेकर चलता है, उतना कोई साधु लेकर नहीं चलता। कारण है, क्योंकि अपने ही प्रयत्न का भरोसा है। कोई कृपा नहीं है, कोई प्रसाद नहीं है। कोई परमात्मा नहीं है जिसका सहारा चाहिए हो। अपना ही सहारा है। स्वभावतः अहंकार सघन होता है। यह खतरा है।
वे जो कृपा को मानकर चलते हैं, वे कुछ करते ही नहीं। वे कहते हैं, जब उसकी कृपा होगी। वे हाथ-पैर भी नहीं हिलाते। वे कहते हैं, जब उसकी कृपा होगी। ये प्रभु-कृपा वाले लोग गहन आलस्य को उपलब्ध हो जाते हैं। उनमें विनम्रता होती है, लेकिन आलस्य हो जाता है।
जैन-साधुओं में या इस तरह की धारा में चलने वाले साधु में बड़ी तत्परता होती है श्रम की, लेकिन अहंकार होता है। प्रसाद को मानने वाले व्यक्ति में विनम्रता होती है। भक्त जैसा विनम्र होता है, वैसा तपस्वी कभी भी नहीं हो सकता। लेकिन आलस्य पकड़ लेता है। वह कहता है, जब उसको करना होगा, करेगा। मैं कौन हूं? और मेरे करने से क्या होने वाला है? ये खतरे हैं।
मैं आपसे कहता हूं, इन दोनों ही बातों को ठीक से समझकर अगर आप पूरा कर सकें--कि प्रयत्न आपको करना होगा, फिर भी उपलब्धि उसके प्रसाद से होगी--तो आपके जीवन में बड़ी क्रांति आ जाएगी। प्रयास आपको करना होगा, क्योंकि प्रयास ही आपको इस योग्य बनाएगा कि उसका प्रसाद आपको मिल सके। लेकिन अंतिम क्षण में प्रसाद से ही घटना घटती है।
इसका यह मतलब नहीं है कि अगर कोई परमात्मा का स्मरण न करे, तो घटना नहीं घटेगी। स्मरण से थोड़े ही प्रसाद मिलता है! परमात्मा को बिलकुल ही छोड़ दें और सिर्फ प्रयत्न करते चले जाएं, तो भी एक घड़ी आएगी जब प्रसाद मिल जाएगा। कोई परमात्मा इसलिए थोड़े ही प्रसाद देता है...। वहां कोई देने वाला थोड़े ही बैठा है कि देख-देखकर देगा कि किसने मेरा नाम लिया है?
यह तो जीवन की एक आंतरिक-व्यवस्था है। जैसे सौ डिग्री तक कोई पानी को गरम करे, वह भाप बन जाता है, फिर चाहे वह अग्नि-देवता को मानता हो कि न मानता हो, कि अग्नि-देवता की पूजा करता हो कि न पूजा करता हो। सौ डिग्री पर जब पानी आ जाता है, तो भाप बन जाता है।
तो चाहे कोई परमात्मा को मानता हो, या न मानता हो, जब सौ डिग्री पर प्रयत्न आ जाता है तो प्रसाद उपलब्ध हो जाता है। लेकिन अंतिम घड़ी प्रसाद से घटती है।
और यह ऐसा होना ही चाहिए। क्योंकि व्यक्ति एक छोटा-सा अंश है इस विराट का। इस विराट को पाने में श्रम तो चाहिए, लेकिन अकेला श्रम काफी नहीं है। इस विराट को पाने में श्रम से भी ज्यादा कुछ चाहिए--इस विराट का सहयोग चाहिए। लेकिन वह मिलता उसी को है जो श्रम करता है।
यम कह रहा है नचिकेता को कि कोई बिरला साधक ही--लेकिन साधक, ध्यान रहे; साधक का मतलब है जिसने श्रम किया, साधना की--उसकी कृपा से इस परमतत्व को उपलब्ध हो पाता है।
उसकी कृपा को कभी न भूलें। और अपने प्रयत्न को भी कभी न भूलें। आपकी प्रार्थनाओं से उसका प्रसाद नहीं मिलेगा; आपकी साधना से उसका प्रसाद मिलेगा। प्रार्थनाएं बचकानी हैं; वे धोखा हैं, प्रवंचना हैं। कुछ किए बिना हाथ जोड़े खड़े हैं! यह मिल जाए, वह मिल जाए, मोक्ष मिल जाए। सब मिल जाए आपको, लेकिन मिलने की कोई पात्रता नहीं है। सागर को बुला रहे हैं और चुल्लूभर पानी को सम्हालने की पात्रता नहीं है। यह अच्छा ही है कि सागर आपकी प्रार्थना सुनकर नहीं आता, नहीं तो आप डूबेंगे। आपका उबरना मुश्किल हो जाएगा। जिस दिन पात्रता पूरी होती है, उस दिन सागर आ जाता है।
कबीर ने कहा है कि पहले तो मैं सोचता था कि बूंद सागर में खो गई, अब जानता हूं कि सागर ही बूंद में उतर आया। और पहले तो सोचता था कि बड़ा मुश्किल होगा, एक बार बूंद सागर में खो जाएगी तो उसको वापस कैसे खोजूंगा? और अब तो बड़ी मुसीबत हो गई है, क्योंकि बूंद सागर में खो जाए तो शायद खोजना किसी तरह संभव भी हो, लेकिन जब सागर ही बूंद में खो जाए, तो अब खोजने का कोई उपाय न बचा। यह मिटना पूरा हो गया।
श्रम प्रथम चरण में और अंतिम चरण में प्रसाद। ये दोनों सूत्र अगर सम्हले रहें, तो जीवन में वह जो परम विभूति, वह जो परम ऐश्वर्य है, वह जो परम आनंद है, वह जो परम चैतन्य है, उसके बरसने में देर नहीं लगती।
लेकिन ये दो विरोधी चीजें साथ जुड़ी हों, ये दोनों चाक एक साथ हों, तो आपका जीवन-रथ मुक्ति के द्वार तक निश्चित ही पहुंच जाता है।

आज इतना ही।

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