UPANISHAD

Kaivalya Upanishad 10

Tenth Discourse from the series of 19 discourses - Kaivalya Upanishad by Osho. These discourses were given in MOUNT ABU during MAR 25 - APR 02 1972.
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स एव मायापरिमोहितात्मा शरीरमास्थाय करोति सर्वं।
स्रियन्नपानादिविचित्रभोगैः स एव जाग्रतपरितृप्तिमेति।।12।।
स्वप्ने स जीवः सुखदुःखभोक्ता स्वमायया कल्पितजीवलोके।
सुषुप्ति काले सकलेविलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति।।13।।
मनुष्य माया के वशीभूत होकर शरीर को ही सब-कुछ समझ लेता है, और सब तरह के कर्मों को करता है। वही मनुष्य विषय-वासना और मद्यपान आदि विचित्र भोगों को भोग कर जाग्रत अवस्था में तृप्त होता है।।12।।
माया से कल्पित जीवलोक में वही मनुष्य स्वप्नावस्था में शरीर के सुखों व दुखों को भोगता है और सुषुप्तावस्था में जब समस्त माया का प्रपंच समाप्त हो जाता है, तब तमोगुण से पराजित होकर सुख का अनुभव करता है।।13।।
थोड़े से शब्दों को पहले समझ लें।
‘मनुष्य माया के वशीभूत होकर शरीर को ही सब-कुछ समझ लेता है, और सब तरह के कर्मों को करता है।’
माया के वशीभूत होकर शरीर को ही सब-कुछ समझ लेता है।
‘माया’ शब्द को सबसे पहले हम समझ लें। साधारणतः लोग समझते हैं माया उसे कहते हैं जो नहीं है। इसलिए अंग्रेजी में उसका अनुवाद लोग ‘इलूजन’ करते हैं। वह अनुवाद गलत है।
माया का अर्थ भ्रम नहीं है। माया का अर्थ सम्मोहन है, हिप्नोसिस है। माया का अर्थ है: मनुष्य के मन की ऐसी क्षमता है कि वह जो भी मान ले, वैसा ही उसके मन के समक्ष होना शुरू हो जाता है। उसकी मान्यता ही यथार्थ बन जाती है। वह जैसा स्वीकार कर ले, जैसा अंगीकार कर ले, वैसा ही घटित होना शुरू हो जाता है। माया मनुष्य के मन की एक क्षमता है और इसी का बड़ा विस्तार पूरे जगत में दिखाई पड़ता है। सारे मनुष्य मिल कर सारे जगत में जो सम्मोहन की अवस्था पैदा करते हैं, वह पूरे जगत की माया बन जाता है। जैसे एक आदमी पागल है तो एक आदमी पागल है। अगर पूरा समूह पागल हो जाए, तो वह समूह जो पैदा करेगा, वह पूरे ही जगत को पागल कर देगा।
माया मन की सम्मोहित होने की क्षमता का नाम है। सम्मोहन का अर्थ है: कि हम जैसा मानते हैं, वैसा होना शुरू हो जाता है।
थोड़े से खयाल लेंगे तो समझ में आ जाएगा।
अगर आपने किसी हिप्नोटिस्ट को, किसी सम्मोहन करने वाले को, सम्मोहनविद को देखा हो--किसी मेक्सकोली को, या किसी और को--न देखा हो तो भी कोई बात नहीं, छोटा सा प्रयोग कहीं भी करके देख ले सकते हैं, खुद भी। यहां इतने लोग बैठे हैं, अगर हम सारे लोग अपनी मुट्ठियां बंद कर लें और एक पांच मिनट तक सोचते रहें कि ये मुट्ठियां अब खुल न सकेंगी, ये मुट्ठियां खुल न सकेंगी, ऐसा पांच मिनट सोचते रहें, फिर पांच मिनट के बाद मैं आपसे कहूं कि अब खोलिए मुट्ठियां पूरी ताकत लगा कर, तो कम से कम तीस प्रतिशत लोग मुट्ठियां नहीं खोल पाएंगे। और जितनी कोशिश करेंगे, उतना ही पाएंगे कि मुट्ठी खोलना असंभव है। अपनी ही मुट्ठी! यहीं तीस प्रतिशत लोग मुट्ठी नहीं खोल पाएंगे। इससे ज्यादा भी संभव हो सकता है। मगर तीस का तो होगा ही और जितनी आप कोशिश करेंगे खोलने की उतना ही पाएंगे कि आपके वश के बाहर हुआ जा रहा है, मुट्ठी और बंधती जा रही है। और मजा यह है कि मुट्ठी आपकी है। और सदा खोलते रहे हैं, और आज क्या हो गया!
वह जो पांच मिनट आपने भाव किया कि अब मुट्ठी नहीं खुल पाएगी, वह सम्मोहन की क्षमता का उपयोग है। मुट्ठी बंध गई!
अगर हम एक व्यक्ति को, दो दूर कुर्सियां रख दें, पांच फीट की दूरी पर, एक कुर्सी पर उसका सिर रखें, दूसरी कुर्सी पर उसके थोड़े से पैर आ जाएं और उसको कहें कि लेट जाओ तो फौरन नीचे गिर जाएगा, क्योंकि कमर झुक जाएगी। कमर के लिए कोई सहारा चाहिए। लेकिन इस व्यक्ति को जमीन पर पहले लिटा दें और सम्मोहित कर दें और उसको कहें कि चाहे कुछ भी हो जाए तुम्हारी कमर नहीं झुकेगी। फिर पांच-सात मिनट के बाद इसको उठा कर कुर्सी पर रख दें, यह लकड़ी के तख्ते की तरह दोनों कुर्सियों पर रख जाएगा। न केवल इतना बल्कि अब इसकी कमर पर बीच पर एक आदमी सवार होकर बैठ जाए तो भी इसकी कमर झुकने वाली नहीं है। क्या हुआ इसको? इसके मन की सम्मोहन की क्षमता का प्रयोग हुआ और शरीर इस क्षमता का अनुगमन करता है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे जीवन की सौ में से नब्बे घटनाएं हमारे सम्मोहन से घटती हैं। एक आदमी खांसना शुरू करता है, अचानक सबको खांसी आनी शुरू हो जाती है। एक आदमी उठ कर पेशाब करने चला जाएगा, न मालूम कितने लोग उठ कर जाने लगेंगे। आपको पता नहीं है, यह सिर्फ सम्मोहन है। यह सिर्फ आपकी क्षमता है अपने को सम्मोहित करने की। अभी तक आप बैठे थे, कोई खांसी न थी। लेकिन एक खांसा कि आपको खांसी का खयाल आया। खयाल आते से ही आपने सम्मोहन को पकड़ा। सम्मोहन को पकड़ते ही से आपके गले में खराश शुरू हुई। अब आप खासेंगे, अब आप बच नहीं सकते। यह सजेशन है, यह मंत्र का काम किया। पहले आदमी ने खांसकर मंत्र का काम किया। अब आप इसका अनुगमन करेंगे।
गांव में महामारी फैल जाती है। आप कभी खयाल किए हैं, संक्रामक बीमारी फैल जाती है, लोग एकदम बीमार पड़ने लगते हैं। लेकिन डॉक्टर और नर्सेज दिन रात उन्हीं मरीजों की सेवा करते रहते हैं और बीमार नहीं पड़ते हैं। अगर बीमारी इनफेक्शियस है, तो सबसे पहले उनको लग जानी चाहिए। सिर्फ सम्मोहन, क्योंकि डॉक्टर जानता है कि मैं डॉक्टर हूं, यह सम्मोहन उसको बीमारी के प्रवेश से रोकता है। वह दूसरे की सेवा में इस तरह रत है कि बीमारी का मंत्र उस पर काम नहीं कर पाता। और बाकी लोग बीमार पड़ते चले जाते हैं।
मनस्विद कहते हैं कि इसमें बीमारी के कीटाणु जितना काम करते हैं, वह गौण है, इसमें सम्मोहन की क्षमता जितना काम करती है वह प्रमुख है। बीमार होते हैं, स्वस्थ होते हैं, यहां तक कि मनस्विद कहते हैं कि अगर एक मुल्क में लोग सत्तर साल तक जीते हैं तो मुल्क के मनस में यह सम्मोहन बैठ जाता है कि इससे ज्यादा तो जीया नहीं जा सकता। शरीर-शास्त्री कहते हैं कि मनुष्य का शरीर कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता कि इतनी जल्दी क्यों मर जाए। बहुत जी सकता है। लेकिन अगर मुल्क में सत्तर साल की सीमा है लोगों के खयाल में, तो वह सत्तर साल के करीब-करीब पहुंचते आप ही सम्मोहित हो जाते हैं कि अब मरने का वक्त करीब आ रहा। अब बूढ़ा होने का वक्त करीब आ रहा। अब मरने का वक्त करीब आ रहा।
गांधी जी को खयाल था कि वेएक सौ पच्चीस वर्ष जीएंगे, वेजी सकते थे। इसमें किसी और शक्ति का प्रयोग नहीं है। वेजीवन भर से सोच रहे थे, एक सौ पच्चीस वर्ष जीऊंगा, यह सम्मोहन काम करता। अगर उनकी हत्या न की जाती तो यह सम्मोहन काम करता। और अगर इसमें और गहरे उतरें, तो गोडसे उनकी हत्या कर सका, इसमें भी उनका स्वयं का थोड़ा हाथ स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि हत्या के छह महीने पहले से उन्होंने एक सौ पच्चीस वर्ष जीने का खयाल छोड़ दिया था। और छह महीने से वेकहने लगे थे, अब तो परमात्मा मुझे उठा ले। भीतर कहीं मरने का भाव बैठना शुरू हो गया था।
जीवन बहुत रहस्यपूर्ण है। अगर मैं मरने के भाव को भीतर बिठाना शुरू कर दूं तो--इस जीवन में हम सब संयुक्त हैं--कोई मुझे मारने के भाव से संक्रमित हो जाएगा। और हम दोनों के मेल से घटना घटेगी, जिम्मेवार अकेला वही होगा।
जीसस के बाबत कहा जाता है कि उनको सूली चढ़ा दी गई, फिर वे पुनरुज्जीवित हो गए। यह सिर्फ सम्मोहन की गहन घटना है। जीसस को निरंतर खयाल था कि मुझे मार डालो तो परमात्मा मुझे पुनरुज्जीवित करेगा। क्योंकि यहूदी शास्त्रों में कहा हुआ है कि जो पैगंबर होगा, जो क्राइस्ट होगा, वह मारा जाएगा और पुनरुज्जीवित होगा। जीसस को खयाल था कि वही मैं आदमी हूं, जिसका शास्त्रों ने विचार किया है। उनके शिष्यों को खयाल था कि वही आदमी हैं जीसस। इसलिए हिम्मत से वे सूली पर चले गए। सूली का उन्हें जरा भी भय नहीं था, क्योंकि उन्हें पता था कि मैं पुनरुज्जीवित हो जाऊंगा।
अगर इसको हम मनसशास्त्र की तरफ से सोचें तो ऐसा दिखाई पड़ता है कि जब उनको सूली दी गई, तो वे सिर्फ गहरे बेहोश हो गए--लेकिन इस भरोसे से, इस आश्वासन से कि मैं पुनरुज्जीवित हो जाऊंगा। यह बेहोशी हिप्नोसिस थी। यह बेहोशी आत्म-सम्मोहन था। मर रहा हूं, यह उन्होंने स्वीकार कर लिया। लेकिन इस स्वीकार के पीछे एक गहरा मंत्र काम कर रहा था कि मैं तीन दिन के बाद पुनरुज्जीवित हो जाऊंगा। वह गहरे कोमा में, बेहोशी में चले गए। यह बेहोशी स्व-निर्मित थी।
और जब दुश्मनों ने जाना कि वेमर गए हैं, तो उनकी लाश को पास की एक गुफा में रख कर वे चले गए। तीन दिन बाद गुफा खाली पाई गई। और जीसस के अनेक शिष्यों ने जीसस को अलग-अलग स्थानों पर देखा। फिर इसके बाद ईसाइयत के पास जीसस का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि फिर जीसस का क्या हुआ? अगर जीसस पुनरुज्जीवित हो गए तो फिर वे कब मरे? उनके पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि जीसस पुनरुज्जीवित हो गए, फिर उन्होंने जेरुसलम छोड़ दिया। क्योंकि वहां दुबारा मारे जाने के सिवाय कोई उपाय न था। वेहिंदुस्तान चले आए और श्रीनगर के पास एक छोटे से गांव में रहे और वहीं मरे। उस छोटे से गांव का नाम आज भी बेथलेहम है। और उस गांव में आज भी एक कब्र है, जो ईसा की कब्र कही जाती है।
यह पुनरुज्जीवन, यह मृत्यु गहरे सम्मोहन से घटित हुई। वस्तुतः ही जीसस मर गए हों तो फिर पुनरुज्जीवित होने का कोई उपाय नहीं है। मरे ही नहीं थे। एक गहरे सम्मोहन में चले गए थे, तीव्र तंद्रा में उतर गए थे, जहां श्वास भी खो जाती है, हृदय की धड़कन भी बंद हो जाती है। सम्मोहन की यह भी क्षमता है कि अगर आप चाहें तो अपनी नाड़ी को कम-ज्यादा कर सकते हैं, बड़ी आसानी से। आप थोड़ा नाड़ी पर हाथ रख कर गिनती कर लें, फिर पांच मिनट सोचते रहें कि नाड़ी की गति बढ़ रही है, बढ़ रही है, बढ़ रही है और पांच मिनट बाद आप फिर नाड़ी को नाप लें, आप पाएंगे नाड़ी की गति बढ़ गई। सूत्र आपके हाथ में आ गया। अब चाहें, आप घटा लें। अभ्यास करते-करते एक दिन आप इस जगह आ सकते हैं कि नाड़ी बंद हो जाए और आप जीवित हों। फिर आप हृदय पर भी प्रयोग कर सकते हैं। उसकी धड़कन को घटाने-बढ़ाने का प्रयोग करें, फिर घटाते-घटाते उस जगह ले आएं जहां हृदय की धड़कन शून्य हो जाए। तो एक छह महीने में आपकी हृदय की धड़कन बंद हो जाएगी और आप जीवित होंगे।
शरीर हमारे मन की आज्ञा मान कर ही चल रहा है। अभी भी। बीमार पड़ता है तो हमारी आज्ञा मानकर चलता है, स्वस्थ होता है तो हमारी आज्ञा मानकर चलता है। बूढ़ा होता है तो हमारी आज्ञा मान कर चलता है। जीता है, मरता है, तो भी हमारी गहरी स्वीकृति और आज्ञा उसको होती है। बूढ़े आदमी मर जाते हैं, उसका गहरा कारण यह है कि बूढ़े होते से ही आदमी मरने की आकांक्षा करने लगता है। जवान आदमी नहीं मरते हैं, उसका मौलिक कारण जवानी नहीं है; जवान आदमी मरना नहीं चाहते हैं, वह मौलिक कारण है। यह शारीरिक घटना कम है और मानसिक घटना ज्यादा है।
सम्मोहन को हिंदू शास्त्रों ने माया कहा है। हम जो भी कर रहे हैं, जो भी हैं, जो भी हमारी चित्तदशा है, वह सब हमारा सम्मोहन है। आप सुखी हैं, दुखी हैं, वह आपका सम्मोहन है। लेकिन आपको पता भी नहीं है, इसलिए बदलाहट बड़ी मुश्किल पड़ती है। बड़ी मुश्किल पड़ती है बदलाहट करना। अगर आप दुखी हैं और किसी से कहो कि यह तुम्हारा सम्मोहन है कि तुम दुखी हो, तो वह मानने को राजी नहीं होगा, क्योंकि बदल नहीं सकता। लेकिन सम्मोहन के आप प्रयोग करें तो आप चकित ही हो जाएंगे। एक व्यक्ति को सम्मोहित करके लिटा दें, फिर उसको प्याज का टुकड़ा दे दें और कह दें कि यह सेब है, वह खाएगा और कहेगा सेब है। फिर आप उसके मुंह में मिट्टी डाल दें और कहें कि यह मिठाई है और वह मिठाई की तरह ही भाव पैदा करेगा चेहरे पर। स्वाद लेगा, आनंदित होगा और कहेगा बहुत मीठा है।
क्या हो रहा है उसको?
कुछ भी नहीं हो रहा है, उसका मन जो स्वीकार कर रहा है वैसा ही शरीर चलना शुरू कर देता है। मुसलमान फकीर, और भी लोग आग पर कूदते रहते हैं। सूफी फकीर आग पर उतर जाते हैं। वह सिर्फ सम्मोहन है। सिर्फ यह भाव प्रगाढ़ है कि पैर नहीं जल सकते, अल्लाह का साथ है, फिर पैर नहीं जल सकते। इसमें अल्लाह कुछ भी नहीं कर रहा है। सिर्फ यह भाव, प्रगाढ़ भाव कि पैर नहीं जल सकते, तो अंगारा भी पैर पर असर नहीं कर पाता है; क्योंकि अंगारे को भी असर करना हो पैर पर, तो मन का सहयोग चाहिए। मन के सहयोग के बिना वह भी प्रभावी नहीं है। तो आग से आदमी गुजर जाएगा और पैर नहीं जलेंगे। और आप सोचते हैं यह बहुत कठिन है, तो आप किसी को भी सम्मोहित करके बेहोश कर लें और उसके हाथ में साधारण कंकड़ रख दें और कहें कि यह अंगारा है और हाथ पर फफोला आ जाएगा।
यह मन की क्षमता का नाम माया है, इस सूत्र में। और इस माया से वशीभूत सारे लोग मिल कर जो जगत निर्माण करते हैं, वह बिलकुल मैजिकल है, वह बिलकुल जादूगरी है। जिस जगत में हम रह रहे हैं वह हमारा जादू है। छाती पीट रहे हैं, रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, यह दुख हो रहा, वह सुख हो रहा है, यह तकलीफ हो रही है, वह तकलीफ हो रही है, और वह हमारा ही जादू है, और हमारे ही हाथ में उसकी कुंजी है।
यह सूत्र कहता है: ‘मनुष्य माया के वशीभूत होकर शरीर को ही सब-कुछ समझ लेता है।’
शरीर को सब-कुछ समझना हमारा सम्मोहन है। यह सिर्फ हमारा खयाल है। और यह खयाल आप किसी भी चीज के साथ जोड़ दें। यह खयाल जुड़ सकता है किसी भी चीज के साथ। एक स्त्री है, वह आज मर जाए तो आपको कुछ कठिनाई नहीं होगी। कल आप उससे विवाह कर लेते हैं। विवाह करके आप करते क्या हैं? सात चक्कर लगा कर आप करते क्या हैं? वह सिर्फ सम्मोहन की प्रक्रिया है, कि सात चक्कर लगा कर, धूमधाम मचा कर, बैंड-बाजा बजा कर, पंडित-पुरोहित को बुला कर, लोगों को इकट्ठा करके आप अपने को सम्मोहित कर रहे हैं कि अब मेरी पत्नी हुई जा रही है यह। वह वही स्त्री है। कल मरती, आपको कोई दुख न होता, आज मरेगी आप छाती पीट कर रो रहे हैं। बड़ा आश्र्चर्य है! यह सात चक्कर ने, यह मंत्र-तंत्र ने, यह भीड़-भड़क्के ने, बैंड-बाजे ने बड़ा चमत्कार किया है कि आप छाती पीट कर रो रहे! सिर्फ सम्मोहित किया है।
इसलिए जो लोग सोचते हैं कि शादी-विवाह में इतने क्रियाकांड की जरूरत नहीं है, उनको पता नहीं है, अगर यह क्रियाकांड नहीं होगा, तो पत्नी पैदा ही नहीं हो सकती। यह क्रियाकांड अनिवार्य है, सम्मोहन का हिस्सा है। इसलिए जिन मुल्कों ने बुद्धिमानों की बातें मान कर--और बुद्धिमान कभी-कभी बहुत बुद्धिहीनता की बातें कहते हैं--उनकी बातें मान कर कि इससे क्या फायदा, सात चक्कर लगाने से क्या मतलब, बैंड-बाजे से क्या मतलब, फुलझड़ी-फटाके से क्या मतलब है, घोड़े पर बैठने से क्या मतलब है, दूल्हे के कपड़े पहनने से, न पहनने से क्या मतलब है, विवाह करना है तो कर लो, हाथ मिला लो, माला डाल दो, विवाह हो गया। लेकिन ध्यान रखना, वह सारी की सारी प्रक्रिया सम्मोहन की प्रक्रिया थी। उस सम्मोहन के प्रभाव में ही तुम पति बनते हो, वह पत्नी बनती है, तुम्हारे बीच संबंध निर्मित होता है। वह तुम्हें अपनी मालूम पड़ती है, तुम उसे उसके मालूम पड़ते हो। अब अगर वह सारी क्रिया तुमने छोड़ दी, तो वह एक स्त्री है, तुम एक पुरुष हो। और तब तलाक अनिवार्य है।
जिन-जिन मुल्कों ने विवाह का क्रियाकांड छोड़ दिया, उन उन मुल्कों को तलाक का क्रियाकांड निर्मित करना पड़ा है। यह अनिवार्य है, क्योंकि हमें पता नहीं है कि एक मन के काम करने के ढंग क्या हैं। मन के काम करने के ढंग हैं। और मन के काम करने के सब ढंग सम्मोहन के ढंग हैं। उस प्रक्रिया से गुजरेंगे तो मन सम्मोहित हो जाएगा।
अब एक लड़के को और गांव में आप दूल्हा बना कर घोड़े पर बिठा कर निकालते हैं, ऐसा जिंदगी में मौका उसे दुबारा फिर घोड़े पर बैठ कर निकलने का आने वाला नहीं है। पहली दफा वह अनुभव करता है, मैं भी कुछ हूं। उसे हम दूल्हा-राजा कहते हैं। एक क्षण को वह भी राजा हो जाता है। और ठीक राजा की शान से घूमता है। जिंदगी में यह शिखर उसको फिर कभी नहीं मिलेगा। इस अहंकार के क्षण में सम्मोहन बहुत आसान है।
ध्यान रखना, अहंकार-शून्य आदमी हो तो सम्मोहित नहीं किया जा सकता। यह साधारण आदमी अचानक दूल्हा-राजा हो गया है। इसका अहंकार मजबूत है, यह घोड़े पर सवार है। सारा गांव घोड़े के नीचे है, यह घोड़े के ऊपर है। इसके अहंकार को एक शिखर उपलब्ध हो रहा है। इस शिखर के क्षण में जो भी घटना घटेगी, यह इस वक्त बहुत डेलीकेट है, बहुत नाजुक है, इसके भीतर कोई भी चीज प्रवेश कर जाएगी। सम्मोहन पकड़ जाएगा। फिर दुबारा इस ऊंचाई पर यह कभी नहीं होगा। और इसलिए जिस ऊंचाई पर जो सम्मोहन पैदा हुआ था वह जिंदगी भर टिकेगा। वह अब छूट नहीं सकता पीछे, वह इसके अहंकार का हिस्सा हो गया।
जिन्होंने ये सारी प्रक्रियाएं खोजी थीं वे मन की माया को समझते थे। और आज के जो तथाकथित बुद्धिमान आदमी हैं, उनको मन की माया का कुछ भी पता नहीं है। वे निपट मूढ़तापूर्ण बातें लोगों को समझाते रहते हैं। यद्यपि वे तर्क देते हैं, लेकिन तर्क थोथे हैं। और तर्कों के पीछे मनुष्य के मन के विज्ञान का कोई बोध नहीं है। और जब वे बातें करते हैं तो ऐसा लगेगा कि बिलकुल ठीक तो कह रहे हैं, क्या जरूरत है इतना खर्च करने की। हम समझाते हैं कि भई, क्या जरूरत है इतना खर्च करने की! लेकिन वह खर्च अगर न हो तो सम्मोहन पैदा नहीं होगा। इसलिए गरीब अपनी हैसियत से भी ज्यादा खर्च कर लेता है। वह हैसियत से ज्यादा खर्च करने का मौका दुबारा उसको नहीं आएगा। हैसियत से ज्यादा खर्च करके वह दिल को नाजुक कर लेता है और अहंकार से भर जाता है। उस क्षण में उसके भीतर जो प्रवेश कर जाता है, वह टिकेगा। वह उसकी माया का हिस्सा हो गया। अब यह स्त्री नहीं रही, पत्नी हो गई। अब यह पराई नहीं रही, मेरी हो गई। यह जो मेरा होना है, इसके लिए मूल्य चुकाना पड़ता है। और हमारा सारा का सारा जीवन ऐसे ही चलता है। ऐसे ही चलता है।
हम अपने शरीर के संबंध में भी जो धारण बनाए हुए हैं कि यह मेरा है, यह भी सम्मोहन है। बचपन से हमें सिखाया जाता है, बचपन से हम सीखते हैं। अनुभव से भी पता चलता है। लेकिन मनस्विद कहते हैं कि बच्चा जब पैदा होता है तो उसे कुछ पता नहीं होता कि यह शरीर उसका है। उसे कुछ पता नहीं होता। उसे यह भी पता नहीं होता कौन उसकी मां है, कौन उसका पिता है, कुछ पता नहीं होता। यह सब सम्मोहन से वह सीखता है। मां उसके ज्यादा निकट होती है, दूध पिलाती है, उसकी फिकर करती है, धीरे-धीरे वह उसका चेहरा पहचानना शुरू कर देता है। चेहरा भी वह बाद में पहचानता है, स्तन ही पहले पहचानता है, इसी कारण पुरुष पूरे जीवन स्त्री के स्तन से मुक्त नहीं हो पाता।
पूरे जीवन, हमारे चित्रकार हों, कवि हों, लेखक हों, बड़े विद्वान हों, स्त्री के स्तन से मुक्त नहीं हो पाते। क्योंकि वह पहला सम्मोहन है दूसरे के शरीर का। इसलिए स्तन की तलाश चलती रहती है। खोज चलती रहती है। मूर्ति हो, चित्र हो, कविता हो, सब जगह स्तन उभर-उभर कर आता रहता है। वह पुरुष के मन में पहला सम्मोहन है। गहरे बैठ जाता है। स्त्री शब्द का उच्चारण करते ही स्तन की छाया निर्मित हो जाती है। फिर वह चेहरे को बच्चा पहचानना शुरू करता है। दूसरों को पहचानना शुरू करता है। धीरे-धीरे दूसरों के बीच अपने को अलग अनुभव करना शुरू करता है। मां का हाथ उसे अलग मालूम पड़ने लगता है। अपना हाथ अलग मालूम पड़ने लगता है। धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व का अलग बोध होना शुरू होता है।
पशुओं के मनोविज्ञान पर कुछ काम चलते हैं। जैसे भेड़ के बाबत हम सब को अंदाज है कि भेड़ भीड़ में चलती है। और एक भेड़ एक तरफ चली जाए तो सारी भेड़ें उस तरफ चली जाती हैं। भेड़ का नेता एक तरफ जाए तो फिर सारी भेड़ें उस तरफ जाएंगी, चाहे वह खड्डा ही क्यों न हो, जान ही खतरे में क्यों न हो! अब तक ऐसा ही समझा जाता था कि भय के कारण ऐसा होता है, लेकिन अभी नई खोजें यह कहती हैं कि भेड़ों को अपने शरीर का व्यक्तिगत बोध नहीं है। उनके पास एक कम्यूनल माइंड है। एक सामूहिक चित्त है। तो वह जो दूसरी भेड़ है, वह भेड़ को दूसरी मालूम पड़ती ही नहीं। भेड़ एक ग्रुप माइंड में जीती है। उनका एक समूह-चित्त है। इसलिए एक भेड़ वहां जा रही है उसका मतलब है कि मेरा एक हिस्सा वहां जा रहा है, तो मैं भी खिंचा चला जा रहा हूं। व्यक्ति-चित्त भेड़ में पैदा नहीं होता।
चींटियों में भी ठीक समूह-चित्त है, कलेक्टिव माइंड है। और समूह-चित्त पैदा हो सकता है। सिर्फ सम्मोहन की बात है। व्यक्ति-चित्त पैदा हो सकता है, वह भी सम्मोहन की बात है। समूह-चित्त पैदा हो सकता है, वह भी सम्मोहन की बात है।
पूरब के मुल्कों में एक पारिवारिक-चित्त था। तो परिवार का एक आदमी मर जाए तो परिवार के पूरे आदमी मरने को तैयार हो जाएं। लेकिन पश्चिम में परिवार-चित्त टूट गया--पूरब में भी टूट रहा है। अगर बाप पिट रहा हो तो भी बेटा पहले यह सोचेगा पश्चिम में कि सही कौन है? यह बाप जो पिट रहा है यह ठीक है, कि मारने वाला ठीक है, जब तक यह साफ न हो तब तक किसी का पक्षपात लेना ठीक नहीं है। ऐसे यह ठीक है बात। क्योंकि बाप होने से कोई ठीक तो नहीं हो सकता। हो सकता है कि इसने कुछ गड़बड़ की हो और ठीक पिट रहा हो! लेकिन पूरब में यह संभव नहीं था। धीरे-धीरे यहां भी संभव हो जाएगा। परिवार-चित्त था। तो यह सवाल ही नहीं था कि बाप पिट रहा है--मैं पिट रहा हूं। एक सामूहिक भाव था। दोनों के शरीर कहीं भीतर एक ही सम्मोहन में गुंथे थे। वह सम्मोहन टूट जाए, तो भिन्न स्थिति निर्मित हो जाएगी।
मेरा शरीर भी मेरा ही सम्मोहन है। इसलिए खयाल करें आप कि आपके शरीर में भी बड़े विभाजन हैं। जैसे शरीर के ऊपर का हिस्सा आपका ज्यादा मेरा है और शरीर के नीचे का हिस्सा आपका कम मेरा है। यह बड़े मजे की बात है। एक ही शरीर है। उसमें नीचे के शरीर को आदमी ऐसा समझता है कि अपना नहीं, ऊपर के शरीर को समझता है अपना। और सबसे ज्यादा तो खोपड़ी को अपना समझता है, बाकी... अगर आपका हाथ कट जाए तो आपको ऐसा नहीं लगता कि मैं मर गया; लेकिन खोपड़ी, तो गए! शरीर में भी आपके विभाजन हैं।
और विभाजन इतने गहरे हो सकते हैं, जैसे कि सारी संस्कृतियों ने जिन्होंने भी कामवासना का दमन करवाया है तो जननेंद्रिय से आपको ऐसा नहीं लगता कि यह मेरा हिस्सा है। इसलिए उसको छिपाए फिरते हैं। घबड़ाए रहते हैं, डरे रहते हैं। भयभीत रहते हैं। ऐसा लगता है कि वह कोई जैसे कोई दुश्मन शरीर के भीतर है, अपना नहीं है। छोटे से बच्चे में हम सम्मोहन पैदा करवाते हैं। बच्चा जैसे ही जननेंद्रिय छूता है, सारा घर रोकने को तत्पर हो जाता है--छुओ मत! बच्चे को खुद ही हैरानी होती है, क्योंकि उसको, बच्चे को अभी कुछ पता नहीं हैं कि हाथ और जननेंद्रिय में कोई फर्क है। लेकिन सारा घर सचेत हो जाता है और सारे घर के मन में निंदा का भाव आ जाता है। बच्चा भी भयभीत हो जाता है कि मामला कुछ और है, बाकी सब शरीर ठीक है, जननेंद्रिय ठीक नहीं है। फिर यह भाव सघन होता चला जाता है। फिर आप अगर अपने से पूछें, तो आपको पता बिलकुल पक्का चल जाएगा कि जननेंद्रिय आपका शरीर का हिस्सा नहीं है।
अभी अमरीका की एक खिलौनों की कंपनी ने खिलौना बनाया है--आपने खयाल नहीं किया होगा कि आपके सब खिलौने झूठे हैं, क्योंकि उनमें जननेंद्रिय नहीं होती है। अगर आपका एक गुड्डा है, लड़का है तो उसमें जननेंद्रिय नहीं होती और बाकी सब होता है। लड़की है, गुड़िया है, तो जननेंद्रिय नहीं होती और बाकी सब होता है। एक कंपनी को सूझा--बड़ी सूझ की बात है, और मैं समझता हूं पांच-छह हजार वर्षों में पहली दफे सूझी किसी खिलौने बनाने वाले को कि यह बात तो झूठ है, प्रामाणिक नहीं है--तो उसने जननेंद्रियां बना दीं खिलौनों में। तो सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा गया। और आखिर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया अमरीका की कि जननेंद्रियां खिलौनों में नहीं बनाई जा सकतीं।
आश्चर्यजनक बात है! क्या हमारा दिमाग है! क्यों नहीं बनाई जा सकती हैं? उस कंपनी ने बहुत लड़ाई की, लेकिन नहीं बनाई जा सकतीं। कंपनी का कहना यही था कि अगर यह शरीर में है, तो फिर खिलौनों में क्यों नहीं होनी चाहिए? खिलौना प्रामाणिक होना चाहिए। लेकिन बड़ी घबड़ाहट फैल गई और ऐसा मालूम पड़ा कि सारे अमरीका की बुद्धि इस पर अटक गई। बड़े विरोध में पत्र लिखे गए, अखबारों में खबरें छपीं, विवाद चला, जगह-जगह सिंपोजियम हुए कि यह नहीं हो सकता, इससे तो संस्कृति नष्ट हो जाएगी। आदमी में जननेंद्रिय है और संस्कृति नष्ट नहीं हो रही, और खिलौने में जननेंद्रिय होगी तो संस्कृतियां नष्ट हो जाएंगी!
नहीं, पर उसका कारण है। इस जिद्द और झगड़े का कारण है। और सुप्रीम कोर्ट के बुद्धिमान जजों को भी निर्णय देने के पीछे कारण है। कोई जननेंद्रिय को अपना हिस्सा मानता ही नहीं। हमारा बस चले तो हम उन्हें काट डालें। जिनका बस चला उन्होंने काट डालीं। और रूस में एक बड़ा संप्रदाय था केथॅलिक ईसाइयों का जिसका नियम यह था कि जब तक कोई जननेंद्रिय न काट डाले तब तक वह धार्मिक नहीं हो सकता। तो जननेंद्रियां काट डालीं।
चार-पांच हजार साल पहले सारी दुनिया में ऐसे समूह थे जो जननेंद्रियों को काटने में भरोसा रखते थे। मुसलमान आज भी खतना करते हैं, यहूदी खतना करते हैं, वह सिर्फ उसी का सिंबालिक है। एक जमाना था पूरी जननेंद्रिय काट कर आदमी धार्मिक होता था, फिर उतना तो मुश्किल पड़ने लगा लोगों को, लोग राजी न रहे, तो थोड़ी सी चमड़ी काट कर प्रतीकात्मक रूप से खतने को जारी रखा गया। तो अगर खतना नहीं हुआ है, तो कोई आदमी मुसलमान नहीं है। अगर खतना नहीं हुआ है तो वह स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता। यह सिर्फ छोटा सा प्रतीक रह गया, लेकिन मौलिक आधार यही था।
पर यह, अगर यह हमारे मस्तिष्क में हो तो फिर शरीर में विभाजन हो जाएंगे। हमारे शरीर में विभाजन हैं। विभाजन इतना गहरा घुस जाता है कि जिसका कोई हिसाब नहीं है। पर हम उतने शरीर से जितने से हमारा तादात्म्य बना लेते हैं, उससे तादात्म्य बन जाता है। और जिससे हम तादात्म्य छोड़ देते हैं, उससे तादात्म्य छूट जाता है। यह जान कर आप हैरान होंगे कि आप बालों को काटते हैं तो आपको कोई तकलीफ नहीं होती। क्योंकि अधिकतर समाजों ने बाल और नाखून को शरीर का हिस्सा नहीं माना है। वे मुर्दे हिस्से हैं। लेकिन एक आदमी को सम्मोहित करें और उससे कहें कि बाल भी तुम्हारे शरीर का जीवंत हिस्सा है और अब जब तुम्हारे बाल कभी भी काटे जाएंगे तो तुम्हें तकलीफ होगी, उसे तकलीफ होगी। फिर उसके बाल काटिए तो वह वैसे ही चीखेगा-चिल्लाएगा जैसे अंगुली काटी हो।
क्या यह संभव है कि मैं अपने हाथ को सम्मोहन के द्वारा मान लूं कि मेरा नहीं है और तब आप काटें तो मुझे दर्द न हो? यह संभव है। यह संभव है, अगर जीसस को तकलीफ न हुई सूली पर चढ़ते वक्त, तो उसका कारण इस बात की प्रतीति थी कि यह शरीर मैं नहीं हूं। अगर मंसूर के हाथ-पैर काटे गए और वह हंसता रहा, तो उसका कुल कारण इतना था कि उसको प्रतीति थी कि यह शरीर मैं नहीं हूं। अगर यह प्रतीति हो कि यह शरीर मैं हूं, तो दुख होगा, पीड़ा होगी। तो पीड़ा और दुख या सुख हमारी प्रतीतियां हैं, हमारे सम्मोहन हैं।
इसे थोड़ा प्रयोग करके देखें।
आपके पैर में तकलीफ हो रही हो तब आप बैठ कर ध्यान करें कि यह पैर मेरा नहीं है। और आप पाएंगे कि तकलीफ की मात्रा एकदम क्षीण हो गई। एकदम से पूरी समाप्त नहीं होगी, क्योंकि आप पूरा सम्मोहन नहीं कर पाएंगे! लेकिन जितना कर पाएंगे उसी मात्रा में पैर की पीड़ा कम हो जाएगी। और इससे उलटा भी करके देखें। दूसरे के पैर में तकलीफ हो रही हो और आप यह सम्मोहन करें कि वह भी शरीर मेरा है, वह भी पैर मेरा है, तकलीफ शुरू हो जाएगी। यह तकलीफ इतनी बढ़ सकती है कि फोड़ा आपके पैर पर भी प्रकट हो जाए।
अभी इस पर काफी खोज-बीन चलती है कि जब बच्चे को कोई तकलीफ होती है तो उसकी मां को भी तकलीफ पैदा हो जाती है--दूर रखो तो भी। असल में बच्चे से इतना गहरा सम्मोहन है कि वह कितने ही दूर पीड़ा में पड़े, तो वह मां का ही फैला हुआ हिस्सा है। और यह सम्मोहन इतना गहरा है कि इसके दूर-संप्रेषण, इसकी टेलीपैथिक खबरें मां को मिल जाएंगी।
जानवरों पर बहुत प्रयोग किए जा रहे हैं। और क्योंकि जानवरों के पास और भी सरल मन है, इसलिए प्रयोग बहुत ही आसान होते हैं। कुछ खरगोशों पर प्रयोग किए गए रूस में तो खरगोशों की माताओं को समुद्र के नीचे ले जाया गया पनडुब्बियों में, हजार-दो हजार फीट नीचे, और बच्चों को रखा गया किनारे पर। और बच्चों को यहां मारा गया और वहां उनकी माताओं की जांच-पड़ताल जारी रखी गई। जिस क्षण बच्चे मरते हैं, उसी दिन मां, उसी क्षण मां कंप जाती है, उदास, परेशान हो जाती है। और मां को कोई भी खबर नहीं है कि बच्चे के साथ क्या हो रहा है, बहुत दूरी है। लेकिन सम्मोहन संबंध जोड़ देता है। सम्मोहन ही संबंध है।
जिस-जिस से आप संबंधित हैं, वह आपका सम्मोहन है। और सम्मोहन जरा में टूट सकता है। आप अपने बेटे के लिए जान दे सकते हैं, मर सकते हैं, लेकिन आज आपके हाथ में एक चिट्ठी पड़ जाए और पता चले कि यह बेटा आपसे पैदा नहीं हुआ है, सब सम्मोहन टूट जाएगा। आप इस बेटे की जान लेने को तैयार हो जाएंगे। और जान ले लें और बड़े प्रसन्न हों और तब पता चले कि चिट्ठी जाली है, तो फिर छाती पीट कर रोएंगे कि यह क्या कर दिया? यह सारा का सारा खेल न बेटे से संबंधित है, न बाप से संबंधित है, यह सारे का सारा खेल सम्मोहन से संबंधित है। जहां-जहां हम अपने सम्मोहन को फैला देते हैं, वहां-वहां सुख और दुख का राज्य शुरू हो जाता है।
‘मनुष्य माया के वशीभूत होकर शरीर को ही सब-कुछ समझ लेता है और सब तरह के कर्मों को करता है।’
फिर शरीर जो कर्म बताता है वे उसे करने पड़ते हैं। फिर वह मालिक नहीं रह जाता। फिर शरीर हो जाता है मालिक और आदमी हो जाता है अनुगामी। शरीर जो कहता है, फिर वह वही करता है। जानते हुए भी करता है कि इससे हानि हो रही है, तो भी करता है। जानता है कि यह शराब पी रहा हूं तो जहर पी रहा हूं, लेकिन यह जानना काम नहीं आता। क्योंकि शरीर कहता है--पीओ। शरीर की रासायनिक पकड़ शराब पर हो जाती है।
जो आदमी शराब पीता है, उसके शरीर में रासायनिक फर्क हो जाते हैं। और जान कर आप हैरान होंगे कि जो आदमी शराब पीता है उसके शरीर का एक-एक सेल धीरे-धीरे शराब का आदी हो जाता है। एक-एक सेल! और एक-एक सेल वक्त पर मांगता है कि शराब दो। इसलिए शराबी जब छोड़ देता है, तो तड़फड़ाता है, परेशान होता है, दिक्कत में पड़ता है। और सब संकल्प धरा रह जाता है, क्योंकि शरीर कहता है: दो, नहीं तो मर जाएंगे, जीना मुश्किल है। शरीर के पीछे उसे चलना पड़ता है। क्योंकि यह शरीर ही तो मैं हूं, ऐसी गहरी प्रतीति बैठी है। फिर शरीर जो भी करवाता है वह आदमी करता चला जाता है।
शरीर क्या-क्या करवाता है वह इस सूत्र में कहा है--
‘वही मनुष्य विषय-वासना और मद्यपान आदि विचित्र भोगों को भोग कर जाग्रत-अवस्था में तृप्त होता है।’
विचित्र भोग कहा है। विचित्र कारण से कहा है। दो कारण हैं। एक तो कि अगर उसी चीज से आपका सम्मोहन छूट जाए तो आप एकदम हैरान हो जाएंगे कि जिससे आप तृप्त हो रहे थे, उससे तृप्त होना तो दूर, उससे विकर्षण, जुगुप्सा, घृणा पैदा हो जाएगी।
बुद्ध को ऐसा ही हुआ।
बुद्ध को उनके पिता ने सारी सुंदरतम स्त्रियां इकट्ठी कर दीं, यहीं भूल हो गई। नहीं तो बुद्ध संन्यासी न होते। अगर उनको एक भी स्त्री न मिलती तो शायद एकाध-दो जन्म और लग जाते। क्योंकि जो नहीं मिलता उसका आकर्षण बना रहता है। जो मिल जाता है, उसका आकर्षण खो जाता है। फिर भी अगर और भी सुंदर स्त्रियां होतीं राज्य में जो बुद्ध को उपलब्ध न होतीं, तो भी वे शायद सोचते कि इन स्त्रियों से सुख न मिला हो, उनसे तो मिल सकता है, तो दौड़ में लगे रहते। लेकिन राज्य में जो भी श्रेष्ठतम सुंदर स्त्रियां थीं, वे बुद्ध के पिता ने बुद्ध के आस-पास इकट्ठी कर दीं। एक ज्योतिषी की सलाह पर!
ज्योतिषी ने कहा कि यह बेटा या तो चक्रवती राजा होगा और या संन्यासी हो जाएगा। यहां तक तो उसने ठीक कहा था। क्योंकि यहां तक अपने विज्ञान की बात कर रहा था, गणित की। बुद्ध के पिता ने उससे पूछा कि तो मैं कैसे इसे रोकूं? तो ज्योतिषी ने अपनी बुद्धि से कहा होगा, उसको स्त्रियों में रस रहा होगा। उसने अपनी बुद्धि से कहा। उसने कहा कि अच्छी स्त्रियां इसके आस-पास रख दो, अच्छे महल बना दो, सब सुख-सुविधा जुटा दो, फिर किसलिए संन्यास लेगा। आदमी दुखी होता है--यह नहीं मिला, यह नहीं मिला, यह नहीं मिला; ज्योतिषी गरीब रहा होगा! आमतौर से ज्योतिषी गरीब होते हैं। उसने सोचा होगा कि अगर यह सब चीजें मिल जाएं मुझे तो मैं किसलिए छोडूंगा! उसे कुछ पता नहीं था। ज्योतिष का पता होगा, लेकिन मनुष्य की अंतरात्मा का उसे कोई पता नहीं था।
बुद्ध के बाप ने सारा इंतजाम कर दिया, फिर वही संन्यास का कारण बना। सब उपलब्ध था। सुंदरतम स्त्रियां उपलब्ध थीं। लेकिन बुद्ध को धीरे-धीरे घबड़ाहट होनी शुरू हो गई। जब सब उपलब्ध हो, तो विरक्ति बहुत आसान हो जाती है। ऊब पैदा हो जाती है। बोर्डम पकड़ लेती है। सुंदरतम चेहरे भी कितनी देर तक सुंदर रह सकते हैं। जब तक न मिलें तभी तक। सुंदर चेहरा मिल जाए फिर क्या करिएगा! फिर थोड़े दिन में उसका सौंदर्य खो जाता है। अगर इसे हम ठीक से समझें तो सौंदर्य दूरी का फल है। इसलिए सुंदर व्यक्ति सदा ही खयाल में रहता है एक दूरी बनी रहे। नहीं तो सौंदर्य खो जाने में देर नहीं लगती है। एक फासला बना रहे। एक जगह रहे, जिसको पार न किया जा सके।
बुद्ध एक रात उठे। नींद नहीं उन्हें आ रही थी। वह सोच रहे हैं कि क्या इस सब को पाकर कुछ मिल तो नहीं रहा है--क्या होगा, क्या नहीं होगा! देखा कि जो लड़कियां नाचते हुए--उनको सुलाते वक्त उनके चारों तरफ नाच रही थीं और जब वे सो गए थे तो वे भी गिर कर नीचे सो गई थीं, तो बुद्ध ने एक दफा उनके चेहरे पर नजर डाली। किसी की लार बह रही थी, किसी का मुंह खुला था, घरघराहट की आवाज आ रही थी, किसी की आंख में कीचड़ जम गया था, कोई नींद में बड़बड़ा रही थी, कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे, किसी के शरीर से पसीना बह रहा था, बहुत घिनौना मालूम पड़ा। एक-एक के पास जाकर देखा तो उन्हें पता चला कि यह सब सौंदर्य के पीछे यह सब भी छिपा है। बहुत घिनौना मालूम पड़ा। वही रात उनके भागने की रात हो गई।
लेकिन जो भी हम भोगते रहते हैं, उस किसी भी भोगी गई चीज को अगर हम बहुत गौर से देखें, बहुत निकट से देखें, तो घबड़ाहट पैदा होगी, ऊब पैदा होगी, भागने का मन होगा, कि हम यह क्या कर रहे हैं!
तो विचित्र कहने का एक तो कारण यह है--ऋषि कह रहा है कि बड़ी विचित्र बात है कि जिन चीजों में कुछ भी नहीं है भीतर, उनको भी आदमी भोगकर और तृप्ति भी अनुभव करता है। भोगता भी है और तृप्ति भी अनुभव करता है। उसे विचित्र लग रहा है। लगेगा। जो आदमी भी भोग के प्रति जागेगा उसे हमारा सारा भोग बहुत विचित्र लगेगा। उसे ठीक वैसे ही लगेगा जैसे आपके घर का बच्चा खिलौने से खेल रहा है, खिलौने की टांग टूट गई तो रो रहा है; खिलौना उसके बिस्तर पर नहीं है तो उसे नींद नहीं आ रही है, आपको बहुत विचित्र लगता है कि बिलकुल पागल है, खिलौने से क्या लेना-देना है, क्या मतलब है? लेकिन आप बच्चे नहीं हैं, सिर्फ इसलिए।
इस ऋषि को विचित्र लगता है क्योंकि यह भी अब आप जैसा बच्चा नहीं है। ऊपर उठ गया है। एक और प्रौढ़ता आ गई है। अब इसको लग रहा है कि लोग कैसा-कैसा विचित्र भोग भोग रहे हैं। और भोग ही नहीं रहे हैं, बड़ी तृप्ति भी अनुभव कर रहे हैं।
‘इसी माया, इसी सम्मोहन के वशीभूत होकर मनुष्य विषय-वासना और मद्यपान आदि विचित्र भोगों को भोग कर जाग्रत अवस्था में तृप्त होता है।’
आदमी की तीन अवस्थाएं हैं: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति। जागा हुआ वह तृप्त होता रहता है। कहीं बड़ा मकान बना लेता है, कहीं किसी के प्रेम में पड़ जाता है, कहीं शरीर की कोई तृप्ति कर लेता है, कहीं भोजन कर लेता है, कहीं अच्छे वस्त्र पहन लेता है और तृप्त मालूम पड़ता है। लगता है कि सब ठीक चल रहा है। कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है! आप कितने ही अच्छे कपड़े पहन लें और कितने ही हीरे-जवाहरात शरीर पर लाद लें, क्या होगा? क्या उसका अर्थ है! आपका पूरा शरीर हीरे-जवाहरातों से लाद दिया जाए, तो भी क्या होगा? इससे क्या मिलेगा? विचित्र है! विचित्र है बात, लेकिन आदमी तृप्त मालूम पड़ता है। एक आदमी तिजोड़ी भरता जाता है, तिजोड़ी में राशि बढ़ती चली जाती है और बड़ा तृप्त होता है। रोज गिनती करता रहता है और तृप्त होता रहता है। क्या होगा? इससे क्या मिलेगा?
एक आदमी बड़े पद पर बैठ जाता है और सोचता है सब-कुछ मिल गया। और जिंदगी उस पर दांव में लगा देता है, सब दांव पर लगा देता है, बस बड़े पद पर होने की दौड़ में हो जाता है। एक दिन हो जाता है। लेकिन क्या होगा? जीवन का कौन सा रहस्य हाथ में आ जाएगा? जीवन की कौन सी शाश्वतता मिलेगी? क्या जीवन-मृत्यु के पार चला जाएगा? क्या सुख और दुख के ऊपर उठ जाएगा? क्या शांति अनुभव होगी? क्या अमृत का दर्शन होगा? क्या होगा इस सब से?
लेकिन आदमी विचित्र है। वह भोगे चला जाता है। वह भागे चला जाता है। फुर्सत ही नहीं मिलती उसे सोचने की। एक भोग चुकता नहीं, दूसरा भोग खींचने लगता है। एक इच्छा पूरी नहीं होती कि दूसरी जग जाती है। इच्छाएं दौड़ाए रखती हैं। और जाग्रत में पूरे समय हम करते क्या हैं। सुबह से लेकर सांझ तक जब तक हम जागे हुए हैं, हम कर क्या रहे हैं? हम सब इन्हीं इच्छाओं के पीछे भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं और हम कभी यह भी नहीं देखते कि ये इच्छाएं जिनकी पूरी हो गई हैं, उनको क्या मिला है? और जो लोग इन बातों को पा गए हैं, जिनको हम पाने की कोशिश कर रहे हैं, क्या वे सुखी हैं? क्या वे आनंदित हैं?
नहीं, उनका दुख भी इतना ही है। और वे भी किसी और आगे की चीज के लिए दौड़े चले जा रहे हैं। और हर आदमी में--चाहे वह कहीं भी हो--और उसकी इच्छा में बराबर फासला है। अगर आपके पास हजार रुपये हैं, तो दस हजार की इच्छा है। दस हजार हैं, तो लाख की इच्छा है। लेकिन आपमें और आपकी इच्छा में फासला सदा बराबर है। वह फासला कभी कम होता ही नहीं। एक रुपया हो तो दस की इच्छा होती है। दस हों तो सौ की हो जाती है। सौ हों तो हजार की हो जाती है। हजार हों, दस हजार की हो जाती है। वह उतना ही गणित फैलता चला जाता है।
विचित्र है आदमी! जब एक था तब सोचता था दस मिल जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा। जब दस मिल जाते हैं तो बिलकुल भूल जाता है कि कुछ भी ठीक नहीं हुआ और मैंने सोचा था कि जब एक था तो दस मिलेंगे तो सब ठीक हो जाएगा। कुछ भी ठीक नहीं हुआ! यह बात ही भूल जाता है। अब वह सोचता है, सौ मिल जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा। वही गणित। फिर सौ भी मिल जाएंगे और वह पाएगा कि अब हजार के बिना काम नहीं चलने वाला। लेकिन वह कभी लौट कर नहीं देखेगा कि यह तो मैंने पहले भी सोचा था कि दस मिलेंगे तो सब ठीक होगा, सौ मिलेंगे तो सब ठीक होगा, वह मिल गए हैं। अब मुझे हजार भी मिल जाएंगे तो ठीक होगा? नहीं, यह सोचेगा ही नहीं। वही मन जो एक पर खड़े होकर दस मांगता था, हजार पर खड़े होकर दस हजार मांगता रहेगा। वही मन, ठीक वही अनुपात, कहीं कोई अंतर नहीं, और आदमी चलता चला जाता है।
इसलिए ऋषि कहता है: विचित्र! भोगों को आदमी जाग्रत में भोगता है--यह तो विचित्रता है ही, लेकिन और भी विचित्रता यह है कि तृप्त बिलकुल नहीं होता और फिर भी तृप्त अनुभव करता है। यह और भी बड़ी विचित्रता है। किसी से भी पूछो, कोई तृप्त नहीं है--और फिर भी ऐसा चेहरा लेकर घूमता रहता है, जैसे सब ठीक है। किसी से पूछो: कैसे हैं? कहता है: सब ठीक है। और कुछ भी ठीक नहीं है। और कभी नहीं सोचता कि जो मैं कह रहा हूं यह क्या कह रहा हूं? क्या ठीक है? कुछ भी ठीक नहीं है! लेकिन झूठा चेहरा लगा कर आदमी घूमता रहता है।
शिक्षक विद्यार्थियों को समझाते रहते हैं ऐसे भाव से, जैसे उन्होंने पा लिया हो। पिता पुत्रों को समझाते रहते हैं ऐसे भाव से, जैसे उन्होंने पा लिया हो। बूढ़े नई पीढ़ी को समझाते रहते हैं ऐसे भाव से, जैसे उन्होंने पा लिया हो। जैसे वे तृप्त हो गए हों। कोई यह नहीं कहता कि मैं तृप्त नहीं हुआ हूं। क्योंकि उससे अहंकार को चोट लगती है। उससे ऐसा लगता है कि जिंदगी भर दौड़े, इतना दौड़े, इतना परेशानी और अब यह भी कहें कि तृप्त भी नहीं हुए, तो फिर निपट मूढ़ हैं।
तो भीतर तो जानते रहते हैं कि तृप्त नहीं हुए, लेकिन बाहर ऐसा भाव प्रकट करते रहते हैं कि सब ठीक है। यह सब ठीक एक बड़ा गहन धोखा है। अगर यह सारी पृथ्वी के लोग एक बार भी एक स्वर से ईमानदारी से, प्रामाणिकता से कह दें कि हम तृप्त नहीं हुए हैं, तो इस जमीन के सारे धोखे टूट जाएं। क्योंकि इस धोखे के पीछे फिर बहुत धोखे खड़े करने पड़ते हैं।
किसी से जाकर पूछिए ईश्वर है, तो वह ऐसा नहीं कहता कि मुझे पता नहीं। या तो कहेगा: है, या कहेगा: नहीं है। दोनों हालत में पता तो है ही। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है जो कहे कि नहीं, मुझे पता नहीं है। मुझे कोई पता नहीं है। क्योंकि यह कहना तो फिर भीतर की अतृप्ति को प्रकट कर देगा। और यह कहना तो फिर भीतर के अहंकार को तोड़ देगा।
किसी भी आदमी से पूछिए तो ऐसा लगता है कि वह जो कहता है, बताता है चेहरे से, वैसी वास्तविक स्थिति नहीं है। निकट आइए, करीब आइए, दो-चार दिन में वह अपने दुख का रोना शुरू कर देगा। दो-चार दिन भी बहुत दूर हैं। सफर में किसी के साथ दो-तीन घंटे भी रह जाइए तो वह अपना दुख रोना शुरू कर देगा। वैसे पहले जब मिला था तो उसका चेहरा और था, फिर धीरे-धीरे चेहरे की खुशी, वह जो धोखा था, जो पलस्तर था, वह हट जाएगा। और फिर उदासी, दुख, पीड़ा के सब भाव प्रकट होने शुरू हो जाएंगे।
इसलिए अजनबी आदमी से मिलने में सुख मिलता है। सुख का कुल कारण इतना है कि दोनों थोड़ी देर एक-दूसरे को धोखा देने में सफल रहते हैं। परिचित आदमियों से बिलकुल सुख नहीं मिलता, क्योंकि वह सब उपद्रव प्रकट कर देते हैं आकर। और तुम भी प्रकट, और वे भी प्रकट कर देते हैं, तो दोहरा दुख हो जाता है उलटा। अपरिचित आदमी से मिलने में थोड़ी देर तो कम से कम चेहरे बने रहते हैं और सुख मिलता है। इसलिए अपरिचित आदमी अच्छे लगते हैं। परिचित आदमी धीरे-धीरे बुरे लगने लगते हैं, क्योंकि उनके आते ही से वह सब गमगीनी, सब उदासी; फिर उन्हें यह कहने की जरूरत नहीं रहती कि सब अच्छा है, वह आते ही से अपना ब्यौरा शुरू कर देते हैं कि क्या-क्या बुरा है।
यह जो जाग्रत में हम भोगते हैं वे तो विचित्र भोग हैं ही, हम तृप्त होने का धोखा भी अपने को पैदा करते रहते हैं। वह भी आश्चर्यजनक है! और यह धोखा इतने आयामों में फैल जाता है, जिसका हिसाब नहीं है! बच्चे से पूछो, बच्चा सुखी नहीं है। लेकिन बूढ़े से पूछो तो वह कहता है: जब मैं बच्चा था तो बहुत सुखी था। एक बच्चा नहीं कहता कि मैं सुखी हूं। यही बच्चे सब कल बूढ़े होकर कहना शुरू करेंगे कि जब मैं बच्चा था तो बहुत सुखी था, बचपन में बड़ा आनंद था। यह धोखा है। यह बूढ़ा अपने को समझाने की कोशिश कर रहा है कि भला आज न हो सुख, लेकिन बचपन में तो था। सब बच्चे जल्दी बड़े होना चाहते हैं। क्योंकि बचपन सुखद नहीं है। बच्चों से पूछो। बूढ़ों से मत पूछना, क्योंकि बूढ़े धोखा देंगे। वे अपने को भी धोखा दे लिए हैं कि बचपन बड़ा सुखद था।
असल में आदमी के मन का एक नियम है। जो-जो दुखद होता है, आदमी उसका स्मरण छोड़ देता है। क्योंकि उससे अहंकार को चोट लगती है। जो-जो सुखद होता है, उसको बचाता चला जाता है। तो दुख की स्मृतियां छूट जाती हैं।
मनोवैज्ञानिक एक बहुत अजीब निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। वे यह कहते हैं, खासकर फ्रायड यह कहता है, और उसकी बात ठीक मालूम पड़ती है कि किसी भी आदमी को अगर हम पूछें कि तुम्हें आखिरी स्मरण कब का आता है, तो पांच साल, चार साल तक मुश्किल से आदमी पीछे लौट सकता है। कह सकता है कि जब मैं चार साल का था तब का मुझे आखिरी स्मरण है। लेकिन चार साल भी तो वह था, उसका कोई स्मरण क्यों नहीं है?
फ्रायड का कहना है कि बचपन के तीन-चार साल इतने दुखद हैं कि मन उनकी याद रखता ही नहीं। उनकी याद ही नहीं रखता। उनको भूल ही जाता है। बिलकुल पोंछ ही डालता है। उनकी जगह ही नहीं रह जाती चित्त में कोई। इसलिए हमारी पांच साल की स्मृति तो बिलकुल कोरी रहती है। लेकिन कोरी नहीं है। अगर आपको सम्मोहित करके बेहोश किया जाए तो आप बताना शुरू कर देते हैं। यहां तक हैरानी होती है कि बच्चे को अपनी मां के पेट में भी जो घटनाएं घटती हैं, उनका भी स्मरण है। अगर मां गिर पड़ी है और बच्चा गर्भ में है, तो उसको स्मरण में आ जाता है। अगर मां बीमार है तो बच्चा भी दुखी होता है भीतर, स्मरण बन जाता है। लेकिन सम्मोहित करें तो ही स्मरण प्रकट होते हैं। नहीं तो ऐसे बंद हैं। आपको कोई याद नहीं है।
आप कहते हैं: पांच साल के पहले का मुझे कुछ याद नहीं है। इसका कारण यह है कि वह स्मरण ट्रॉमेटिक हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं: बहुत दुखद हैं, बहुत पीड़ादायी हैं। क्योंकि बच्चा इतना असहाय था। इतना परेशान था, हर चीज के लिए मोहताज था, दीन था। दूध भी उसे मांगना है तो रोए, चिल्लाए, कोई दे दे तो ठीक, कोई न दे तो ठीक। उसे अभी दूध और पीना है और मां अलग हट जाए, तो उसके पास कोई उपाय नहीं था। उसको मच्छर काट रहे हैं, वह कुछ कह नहीं सकता। वह पड़ा है, उसको नींद नहीं आ रही है तो उसको जबर्दस्ती सुलाया जा रहा है--वह जगना चाहता है तो उसे जबर्दस्ती। नहीं जगना चाहता तो जबर्दस्ती जगाया जा रहा है। नहीं खाना चाहता तो खिलाया जा रहा है। खाना चाहता है तो कोई देने को तैयार नहीं है। उसकी स्थिति अत्यंत दयनीय और भारी कष्ट की थी। उसको बिलकुल भूल गया है। क्योंकि वह उसके अहंकार को सुखद नहीं है।
हम धीरे-धीरे, जो दुखद है उसको अलग करते जाते हैं, जो सुखद है उसको बचाते चले जाते हैं। न केवल बचाते हैं, फिर सुखद को हम मेग्नीफाई करते हैं, उसको बड़ा करते हैं। जरा सा रहा हो तो उसको हजार गुना करते हैं। फिर बूढ़ा आदमी कहता है कि बचपन तो स्वर्ग था। कोई बच्चे ने कभी नहीं कहा! कोई बच्चा कभी कहेगा नहीं! लेकिन बूढ़ा कहता है।
क्यों?
क्योंकि हम तृप्ति को, अगर यहां नहीं मिल रही तो कहीं और हटा देना चाहते हैं। बचपन में मिलती थी, जवानी में मिलती थी, कहीं हटा देना चाहते हैं। लेकिन तृप्ति कहीं मिलती थी, इस भ्रम से हम नहीं छूटना चाहते। क्योंकि यह अगर भ्रम छूट जाए तो आदमी के जीवन में क्रांति घटित हो जाए। तृप्ति मुझे मिली ही नहीं ऐसा जो आदमी जान लेगा, वही धार्मिक हो सकता है। तृप्ति मैंने जानी ही नहीं, सब तृप्तियां मेरे ही धोखे थे, मैंने मानी थीं, कभी मैंने कोई तृप्ति जानी नहीं, कोई ऐसा क्षण नहीं आया जिसे मैं तृप्ति का क्षण कहूं, ऐसा जो आदमी जान लेगा... यह बड़ा दुखद है जानना। क्योंकि इससे लगेगा कि हम बिलकुल भिखारी हैं तो हमने जीवन यूं ही गंवाया? अहंकार बिखरेगा। लेकिन उसके बिना बिखरे कोई धार्मिक होता नहीं।
जाग्रत के लिए ऋषि ने कहा कि विचित्र भोगों को भोग कर और मानता है कि तृप्त हो रहा हूं। लेकिन यहीं तक पूरा नहीं होता है आदमी का मन। सपने में भी भोग जारी रखता है। और मजा तो यह है कि कम से कम चाहे हम पहली बात से राजी न भी हो सकें कि जाग्रत में जो भोग मिलते हैं वे वास्तविक नहीं हैं, लेकिन इतना तो हम भी मानेंगे कि स्वप्न में जो भोग मिलते हैं, वे वास्तविक नहीं हैं। लेकिन जब वे मिलते हैं, तब हम उनको बड़े मजे से भोगते हैं। बड़े मजे से भोगते हैं।
सपने का आपको खयाल है? जो-जो आप नहीं भोग पाते जागने में, वे-वे सपने में भोगते हैं। बड़े महल में नहीं रह पाते, तो बड़ा महल बना लेते हैं सपने में। और सपने में दिक्कत नहीं आती। महल बनाने के लिए न कोई धन की जरूरत पड़ती, न कुछ। क्योंकि आपका जो मन है, सपने में अपनी माया का पूरा प्रयोग कर पाता है क्योंकि यथार्थ कोई बाधा नहीं डालता।
समझ लें।
आप जागने में भी माया का प्रयोग करते हैं, लेकिन यथार्थ बाधा डालता है। आप तो मानना चाहते हैं कि चारों तरफ सोना है, लेकिन चारों तरफ पत्थर पड़े हैं। वे बाधा डालते हैं। वे बाधा डालते हैं, वे कहते हैं: कैसे मानोगे? आपका मन तो मानने का होता है। जिस आदमी को हम पागल कहते हैं, असल में वह वह आदमी है जिसने यथार्थ को इतना इनकार कर दिया कि अब वह जागने में भी अपनी माया का पूरा प्रयोग कर रहा है। पागल का और कोई मतलब नहीं है। पागल का मतलब इतना ही है कि जैसा हम सपने में करते हैं, वैसा अब वह जागने में भी करने में समर्थ हो गया है। अगर उसे अपने मित्र से मिलना है, तो कहीं मित्र के पास जाने की जरूरत नहीं है, वह यहीं बैठे हुए शून्य में उससे बातचीत करता रहेगा। हम कहते हैं, यह आदमी पागल हो गया है। पागल नहीं हो गया है, यह आदमी अपनी माया की शक्ति का पूरा प्रयोग कर रहा है। आप थोड़ा कम कर रहे हैं। आप भी मित्र से बातचीत करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं मानते कि वह सामने मौजूद है, आंख बंद करके भीतर उसको देखते हैं, फिर उससे बातचीत करते हैं।
आंख बंद करके जरा कुर्सी पर लेट जाइए और आपको पता चल जाएगा, आपकी माया ने काम शुरू कर दिया। बातें शुरू हो गईं, चर्चा शुरू हो गई। और ऐसा भी नहीं है कि कभी-कभी हम बाहर तक नहीं आ जाते। कभी किसी आदमी को रास्ते से चलते हुए देखें, कहीं वह हाथ हिला रहा है, कुछ इशारा कर रहा है, ओंठ हिल रहे हैं, कुछ बोल रहा है। किसी से बातचीत कर रहा है, जो वहां मौजूद नहीं है। तो हममें और पागल में मात्राओं का ही फर्क है।
हम सपने में बिलकुल पागल होते हैं, दिन में जरा सम्हाल कर चलते हैं। पागल जरा ज्यादा हिम्मतवर है। वह अपने सपने को जागने तक फैला देता है। और इसलिए पागल बड़ा सुखी मालूम पड़ता है। अब इसको ठीक से समझ लें। पागल बड़ा सुखी मालूम पड़ता है, क्योंकि अब सुख बिलकुल उसकी सम्मोहन की बात है।
मैं ऐसे मित्रों को जानता हूं, जो पीरियाडिकली पागल होते हैं। कभी छह महीने के लिए पागल हो जाते हैं, छह महीने के लिए ठीक हो जाते हैं। यह बड़े मजे की बात है कि जब वे पागल होते हैं तब बिलकुल स्वस्थ होते हैं और बड़े प्रसन्न होते हैं। और जब ठीक होते हैं, तब बीमार पड़ जाते हैं और बड़े दुखी हो जाते हैं। क्या मामला है? क्या मामला है!
असल में जब वे पागल होते हैं तब यथार्थ को इतना इनकार कर देते हैं कि यथार्थ उनके लिए बाधा डाल ही नहीं सकता। कल्पवृक्ष के नीचे हो जाते हैं। जो उनकी इच्छा है, वह पूरी हो जाती है, दुनिया उसको रोक नहीं सकती। क्योंकि अब वे सपने से ही पूरा कर लेते हैं। अब उन्हें वास्तविक पूर्ति की कोई जरूरत नहीं है। सुखी हो जाते हैं।
अगर ठीक से समझें, तो इस तथाकथित जगत में जो लोग सुखी दिखाई पड़ते हैं, वे पागलपन की वजह से हैं। इसको अगर ठीक से समझें, तो इसका मतलब यह हुआ, इसका अभिप्राय यह हुआ कि इस तथाकथित विचित्र भोगों को भोगते हुए जो लोग सुखी दिखाई पड़ते हैं, वह उनकी पागलपन की मात्रा के कारण है। बुद्धिमान आदमी तो यहां एकदम उदास हो जाएगा। क्योंकि बुद्धिमान आदमी को तत्क्षण दिखाई पड़ जाएगा कि यह निपट गंवारी है, मूढ़ता है। यह जो हो रहा है इसमें कुछ है नहीं। लेकिन पागल दौड़े चला जाएगा।
कभी आपने देखा है किसी राजनीतिज्ञ को, जब वह सिंहासन पर पहुंच जाता है तो कैसा खुश मालूम होता है? वह पागलपन के शिखर पर खड़ा है। लेकिन उसका सुख तो है। उसका सुख तो है। सुखी तो दिखाई पड़ता है। गहन अध्ययनों से पता चला है कि राजनीतिज्ञ जब तक शक्ति में होते हैं तब तक न बीमार पड़ते हैं, न मरते हैं। बड़े ताजे और स्वस्थ होते हैं। जैसे ही शक्ति से उतरते हैं, वैसे ही जल्द मर जाते हैं। बीमार पड़ जाते हैं।
राजनीतिज्ञ तो सभी लोग नहीं होते, लेकिन दूसरी तरह से समझ लें। रिटायर्ड आदमी जल्दी मर जाता है। और उदास हो जाता है। और दुखी हो जाता है।
समझ लें कि एक तहसीलदार है। तो गांव में वह राजा है। सारा गांव नमस्कार करता है। दफ्तर में आता है, लोग खड़े होते हैं। घर में पहुंचता है, पत्नी भी मानती है, बच्चे भी मानते हैं। तहसीलदार है! सारा गांव मानता है। उसकी दुनिया पूरी उसे मानती है। जहां मूव कर जाए, जहां चला जाए, वहीं सब जाहिर हो जाता है कौन आ रहा है। फिर वह रिटायर्ड हो गए। फिर उसी रास्ते से निकलता है, कोई नमस्कार नहीं करता है। बल्कि जिन-जिन ने नमस्कार किया था, वे बच कर निकलते हैं कि अब इसको कहीं नमस्कार न करना पड़े। अब कोई मतलब का भी नहीं है, बेकार आदमी है। चली हुई कारतूस है। इसका क्या करना है! घर में आता है तो बच्चे भी उसकी तरफ देखते नहीं, पत्नी भी उसकी फिकर नहीं करती, अब तहसीलदार तो रहे नहीं। क्रीज तो निकल गई। कपड़ा बिलकुल ऐसा हो गया जैसे रात भर कोई आदमी सोया रहा हो पहन कर। अब उसकी कौन फिकर करता है, कौन उसकी तरफ देखता है। वह एकदम उदास हो जाता है। उसे पता चलता है अब कोई मानने वाला नहीं रहा। भीतर टूटना शुरू हो जाता है, सम्मोहन खंडित होता है, मौत करीब आने लगती है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि रिटायर्ड होते ही आदमी की उम्र दस वर्ष कम हो जाती है। दस वर्ष और जी सकता था, लेकिन दस वर्ष कम हो जाते हैं। क्योंकि अब उसे कुछ नहीं सूझता, कहीं उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। कहीं उसके अहंकार की कोई तृप्ति नहीं है। कहीं सुख नहीं मिलता। वह एकदम उदास हो जाता है। इरिटेटेड हो जाता है। चिड़चिड़ा हो जाता है। उसका भीतरी कारण है कि वह जो सुख ले रहा था सम्मोहन का, अब उसको यथार्थ साथ नहीं देता। अब उसको यथार्थ साथ नहीं देता।
लेकिन मैं एक ऐसे तहसीलदार को जानता हूं जो रिटायर होने के साथ ही पागल हो गए। मतलब वे अपने को अब भी तहसीलदार मानते हैं, और अब भी दफ्तर में तहसीलदार की अकड़ से कभी-कभी पहुंच जाते हैं, और अब भी वे इसकी फिकर नहीं करते कि कौन खड़ा है, कि नहीं खड़ा है। इसकी भी फिकर नहीं करते कि नमस्कार आपने किया नहीं, वे जवाब देते हैं। वे बड़े प्रसन्न हैं और लगता है कि वे जीएंगे, उनके दस साल कम नहीं हो सकते। वे उसकी फिकर ही नहीं करते, वे अपने को तहसीलदार मानते ही हैं! वे रिटायर्ड हुए ही नहीं, अपनी तरफ से।
मैं एक हेडमास्टर को जानता हूं। वे अब भी पहुंच जाते हैं स्कूल में। और अब भी थोड़ी देर हेडमास्टर की कुर्सी पर बैठ कर शांति से लौट आते हैं। और बड़े आनंदित हैं। उनको खयाल में नहीं है कि वे रिटायर्ड हो गए हैं। उनका दिमाग खराब हो गया है।
लेकिन यह मैं आपसे इसलिए कह रहा हूं ताकि आपको खयाल में आ जाए कि आपके सब सुख आपकी कल्पना से पैदा होते हैं और आपके पागलपन के हिस्से हैं। बुद्धिमान आदमी यहां जरा भी सुख नहीं देख पाएगा, जहां आप सुख देख रहे हैं।
मगर बड़ा मजा है, बुद्धिमान आदमी हमें पागल मालूम पड़ता है; कि इसका दिमाग खराब हो गया है। कितना मजा आ रहा है, सिनेमा में बैठ कर हम कितना आनंद ले रहे हैं, इसका दिमाग खराब हो गया है। क्या मजा ले रहे हैं आप वहां? वहां पर्दे पर सिवाय छाया और धूप के कुछ भी नहीं है। लेकिन मैं ऐसे नासमझों को जानता हूं कि अगर कोई स्त्री नाच रही हो और उसका घाघरा ऊपर उठ रहा हो तो कुर्सी से नीचे झुक कर देखते हैं। और बड़ा सुख पाते हैं। बड़ा सुख पाते हैं!
मैंने सुना है कि पहली दफा लंदन में एक फिल्म आई--पहली दफा जब शुरू हुआ फिल्मों का सिलसिला--तो उस फिल्म में एक नग्न स्त्री एक तालाब पर स्नान कर रही है। सब कपड़े उतार कर वह तालाब में कूदी है, तभी एक ट्रेन झक-झक-झक करती हुई निकल जाती है और वह तालाब उस तरफ पड़ जाता है। तो जिन लोगों ने पहले दिन टिकट खरीदे थे, वे उसी दिन दूसरे दिन का टिकट मांगने लगे। तो मैनेजर ने कहा: तुम तो फिल्म देख चुके। तो उनमें से एक आदमी ने कहा: बात ऐसी है कि यह ट्रेन इसी वक्त पर रोज थोड़े ही आएगी! कभी तो लेट होगी! वह ऐन वक्त पर आ गई। वह जान कर ही लाई गई थी ताकि वह नग्न चित्र सीधा नग्न न हो जाए। बस कपड़े उतार रही थी सुंदरी और कूदने के करीब थी, छपाक की आवाज हुई और ट्रेन गुजर गई। तो लोगों ने कहा कि रोज कहीं ट्रेनें एक ही टाइम पर आई हैं! किसी दिन तो यह लेट हो ही जाएगी।
यह आदमी है... यह हमारे भीतर छिपा आदमी है! इसको दूसरा समझ कर मत हंसना। नहीं तो आप फिर सम्मोहन कर रहे हैं। यह मत समझना कि यह किसी और की कहानी है। यह आपकी ही कहानी है। और अगर आपने समझा कि यह मैं किसी और के संबंध में कह रहा हूं, तो आप अपने को धोखा दे रहे हैं।
आदमी सपने में भी तृप्ति खोजता है और तृप्त होता रहता है। सुबह सपना टूटता है तब थोड़ी पीड़ा होती है, लेकिन रात, रात तो सपना बड़ा सुख देता रहता है। और सपने से भी तृप्ति पाता है। आपको पता नहीं है, अभी सपने पर काफी खोज-बीन चलती है। तो यह अनुभव हुआ है कि जो लोग सुखद सपने देखते हैं, वे सुबह ज्यादा ताजे उठते हैं। और जो लोग दुखद सपने देखते हैं, वे सुबह बड़े उदास और परेशान उठते हैं। सुखद सपना सपना ही नहीं है, सुबह आपको ताजगी भी देता है, सुबह आप बड़े प्रसन्न उठते हैं। जिंदगी में रस मालूम पड़ता है, पुलक मालूम पड़ती है, ओंठों पर गीत मालूम पड़ता है। अगर रात आपने सुखद सपना देखा, तो सुबह आपके जागने का गुणधर्म बदल जाता है। अगर रात आपने दुखद सपना देखा कि काफी आपकी पिटाई हुई है, इलेक्शन हार गए हैं, या और कोई उपद्रव आपने देखा, कोई नाइटमेयर देखा, तो सुबह आप बिलकुल बेजान उठते हैं। उठने का मन नहीं होता, बिस्तर छोड़ने का मन नहीं होता।
इस पर काफी वैज्ञानिक शोध चलती है। और एक वैज्ञानिक स्लेटर ने तो कहा है कि अगर हम आदमी को स्वस्थ रखना चाहते हों, तो हमें सुखद सपने पैदा करने का कोई इंतजाम खोजना पड़ेगा। क्या यह हो सकता है कि हम सुखद सपने पैदा कर सकें? अब इस पर काफी काम चलता है। सपने पैदा किए जा सकते हैं बाहर से भी। एक आदमी सो रहा हो, आप जरा उसके पांव के पास गीले पानी का कपड़ा उसके पांव में लगाते रहें थोड़ी देर, फिर उसको उठा कर पूछें तो वह बताएगा उसने सपना देखा कि वह नदी में से गुजर रहा है। यह सपना आपने पैदा करवा दिया। जरा उसके पांव के पास स्टोव ले जाएं और थोड़ी गरमी दें, फिर उसको जगा कर पूछें तो वह कहेगा: मैंने सपना देखा कि मैं एक रेगिस्तान में चला जा रहा हूं। यह सपना आपने पैदा करवा दिया। अगर इतना हो सकता है, तो आज नहीं कल हम उपाय खोज लेंगे, कोई यांत्रिक व्यवस्था खोज लेंगे कि हर कमरे में लगा दी जाए और आदमी रात भर सुखद सपने देखता रहे। तो सुबह वह ज्यादा ताजा, जीवन से भरा हुआ--तथाकथित जीवन से भरा हुआ--ज्यादा धोखे में डूबा हुआ, ज्यादा सम्मोहित, दफ्तर की तरफ तेजी से जाता हुआ, गीत गुनगुनाता मिलेगा।
ऋषि कहता है कि ‘माया से कल्पित जीवलोक में वही मनुष्य स्वप्नावस्था में शरीर के सुखों और दुखों को भोगता है।’
वहां भी भोगता रहता है वह उसी पागलपन को, जिसको वह जागते में भोगता है। हमारा सपना हमारा जागने का ही परिशिष्ठ है, वह उसका ही हिस्सा है। जो-जो अधूरा रह गया है, उसे हम पूरा कर लेते हैं। इतना ही नहीं, जब तीसरी अवस्था होती है मनुष्य की--सुषुप्त--जब सपने भी खो जाते हैं, कुछ भी नहीं बचता, सुषुप्त-अवस्था में जब समस्त माया का प्रपंच भी समाप्त हो जाता है, चेतना ही खो जाती है, तमोगुण से पराजित होकर आदमी मूर्च्छित हो जाता है, तब भी वह सुबह उठ कर कहता है कि रात बड़ी गहरी नींद आई, बड़ा सुख मिला। जागने में वह सुख खोजता है, सपने में खोजता है, और जब कुछ भी नहीं बचता, सपना भी नहीं बचता, तब भी वह सुबह उठ कर कहता है कि खूब गहरी नींद आई, बड़ा सुख मिला।
मगर इन तीनों अवस्थाओं में सुख सम्मोहन है। और सुख मनुष्य की कल्पना है। हां, जहां-जहां सुख की कल्पना टूटती है, वहां-वहां दुख पाता है। दुख सुख की कल्पना का पूरा न हो पाना है। इसलिए जो आदमी सुख की चाह रखता है वह दुख पाता रहता है। दुख विफलताएं हैं। अपेक्षाओं का पूरा न होना है।
तो सपने भी दुख दे सकते हैं। जाग्रत भी दुख दे सकता है। सिर्फ सुषुप्तावस्था दुख नहीं देती है। क्योंकि वहां कोई जानने वाला ही शेष नहीं रह जाता है, सब सो जाता है, इसलिए अगर ठीक से समझें, तो हम तीनों ही अवस्था में मान कर जी रहे हैं कि जीवन ऐसा, ऐसा, ऐसा। प्रोजेक्ट कर रहे हैं, प्रक्षेप कर रहे हैं, जीवन को निर्मित कर रहे हैं; लेकिन जीवन कैसा है उसका हमें कोई भी पता नहीं है।
ऋषि ने ये तीनों अवस्थाओं की सम्मोहन की चर्चा इसलिए की है कि जिसे ध्यान में जाना है, उसे इस सम्मोहन को तोड़ना पड़ेगा। ध्यान सम्मोहन की विपरीत प्रक्रिया है--डी-हिप्नोटाइजेशन।
अब हम ध्यान के लिए तैयार हों।

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