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Jharat Dashahun Dis Moti 10

Tenth Discourse from the series of 21 discourses - Jharat Dashahun Dis Moti by Osho. These discourses were given during JAN 21 - FEB 10 1980.
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पहला प्रश्न:
भगवान, संन्यास की पुरानी धारणा और आपके संन्यास में मौलिक भेद क्या है?
रामनारायण! संन्यास की पुरानी धारणा जीवन-विरोधी थी। मेरा संन्यास जीवन के प्रति अनुग्रह, प्रेम और आनंद-उत्सव है। पुराना संन्यास निषेधात्मक था, नकारात्मक था। ठीक से कहूं तो पुराना संन्यास नास्तिक था। मेरा संन्यास आस्तिक है।
नकारात्मकता नास्तिक ही हो सकती है। लाख ईश्वर की बात करो, स्वर्ग, नरक, मोक्ष, लेकिन अगर जीवन को स्वीकार करने की सामर्थ्य भी तुममें नहीं है, तो तुम कल्पनाजाल में उलझे हो। तुम्हारा ईश्वर थोथा, तुम्हारे स्वर्ग-नरक केवल तुम्हारे सपने हैं। तुम्हारे बड़े-बड़े सिद्धांत केवल तुम्हें छिपाने के लिए, ओढ़ लेने के लिए वस्त्र और उपाय हैं। आड़ें हैं, दीवालें हैं, जिनके पीछे तुम अपने अंधेरे गड्ढों को छिपा लो, अपने घावों को छिपा लो। ज्यादा से ज्यादा सांत्वनाएं हैं, सत्य नहीं।
वास्तविक आस्तिकता का अर्थ होता है: जीवन के प्रति सम्मान, सत्कार, स्वागत। जीवन का आलिंगन कर लेने का सामर्थ्य का नाम आस्तिकता है। जीवन के रस को जो पूरा पीता है, वही जानता है कि परमात्मा है। दूसरे तो बातें करते हैं। और दूसरों को ही नहीं फंसाते बातों में, अपनी बातों में खुद भी फंस जाते हैं। मेरे लिए स्रष्टा और सृष्टि में कोई भेद नहीं है। मेरे लिए सृष्टि के अतिरिक्त कोई स्रष्टा नहीं है। स्रष्टा केवल नाममात्र है सृजन की महत प्रक्रिया का। यह जो बीज फूटता है और अंकुर बनता है, यह जो नदी बहती है और सागर से मिलती है, ये जो चांद-तारे आकाश में परिभ्रमण करते हैं, ये जो अनंत-अनंत विस्तार है अस्तित्व का, इसकी समग्रता का नाम ही ईश्वर है। इससे भिन्न कोई ईश्वर नहीं है। इसके जोड़ का नाम ही ईश्वर है। ईश्वर केवल संज्ञा मात्र है, ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है।
पुराना संन्यास बड़ा आश्चर्यजनक था। इस समग्र को तो इनकार करता था, जो है, जो प्रत्यक्ष है, जिसे हम जी रहे हैं, जिसमें हम जी रहे हैं, जिसके बिना हम क्षण भर नहीं हो सकते, इसको तो माया कहता था और जो नहीं है, जिसका हमें कोई पता नहीं है, जिसका कोई अनुभव नहीं है, उस धारणा में, उस ईश्वर की कल्पना में भरोसा करता था। और जो नहीं हैं, उसके लिए सिखाता था उसे छोड़ दो, जो है। पुराने संन्यास ने मनुष्य-जाति का जितना अहित किया है, उतना किसी और बात ने नहीं। अच्छी बातें कभी-कभी बड़ी महंगी पड़ जाती हैं। देखने में अच्छी लगती हैं, लेकिन भीतर जहर भरी हो सकती हैं। और अक्सर झूठ शुरू में मीठे होते हैं। सत्य शुरू में कड़वे होते हैं। झूठ मनमोहक होते हैं सम्मोहक होते हैं। क्योंकि हमारा मन भी झूठ है, हमारा अहंकार भी झूठ है, हमारे अहंकार से इन झूठों का तालमेल बैठ जाता है, जुगलबंदी हो जाती है।
पुराना संन्यास अहंकारी था। त्याग जितना अहंकार देता है मनुष्य को उतना कोई और चीज नहीं दे सकती। भयंकर अहंकार जन्म पाता है। लात मार दी लाखों रुपयों पर, पद पर, प्रतिष्ठा पर, सम्मान पर, सत्कार पर, संसार पर; मुंह फेर लिया सबसे; जहां सब भागे जा रहे हैं कीड़े-मकोड़ों की तरह, वहां से मैं हट आया हूं। पुराना संन्यास तुम्हें एक अहंकार का शिखर बना देता था।
इसलिए अगर तुम पुराने संन्यासियों को क्रोधी पाओ तो आश्चर्य नहीं। अगर दुर्वासा जैसे ऋषि हुए तो आश्चर्य नहीं। होंगे ही। क्रुद्ध, अहंकार से भरे हुए, अभिशाप से भरे हुए--उनकी आत्मा ही अभिशाप से भरी हुई है। ऐसे व्यक्ति ऋषि और मुनि! और उनका दान क्या है जगत को? तुम जब किसी महात्मा की प्रशंसा करते हो, तो कभी तुमने सोचा तुम्हारी प्रशंसा किन मूल्यों पर आधारित होती है? कितना उसने छोड़ा। नकार होता है तुम्हारी प्रशंसा का आधार। इसलिए लोग जो छोड़ आए, उसे बड़ा-चढ़ा कर बताते हैं।
जैनों से पूछो। महावीर ने कितना छोड़ा? तो उनके शास्त्रों में बड़ी संख्याएं लिखी हैं। इतने हाथी, इतने घोड़े, इतने रत्न, इतने महल। सब सरासर झूठ है। क्योंकि महावीर एक बहुत छोटे से राज्य में राजकुमार थे। उस राज्य में इतने हाथी-घोड़े खड़े करने की भी जगह नहीं हो सकती थी। महावीर के समय भारत में दो हजार राज्य थे। महावीर की हैसियत एक तहसीलदार से ज्यादा की नहीं थी। या बहुत समझ लो तो डिप्टी क्लेक्टर। इतने हाथी-घोड़े वगैरह थे नहीं। मगर जिन्होंने शास्त्र लिखे, उनको लिखना पड़े। और जैसे-जैसे तुम आगे बढ़ोगे, तुम पाओगे संख्या बढ़ती जाती है। हर नये शास्त्र में संख्या बढ़ती जाती है; पुराने शास्त्र से ज्यादा हो जाती है। क्योंकि एक प्रतियोगिता चल रही थी बुद्ध के साथ। उधर बुद्ध के शिष्य अपने हाथी-घोड़े बढ़ाए जा रहे थे, तो इधर महावीर के शिष्य अपने हाथी-घोड़े बढ़ाए जा रहे थे। क्योंकि त्याग का और मूल्य क्या? नापो कैसे? कितना छोड़ा!
यह तो बड़े मजे की बात हुई। संसार में भी तुम नापते हो धन से, कि कितना है और संन्यास भी नापते हो धन से, कि कितना छोड़ा? दोनों की तराजू एक है। कितनी सुंदरियां छोड़ीं, कितने महल छोड़े? कितना धन था, कितने अंबार छोड़े? इसलिए तो जैनों के चौबीस तीर्थंकर राजपुत्र हैं। किसी गरीब को तीर्थंकर मानते भी तो कैसे मानते! क्योंकि पहला सवाल यह था: उसके पास छोड़ने को क्या है? बुद्ध भी राजपुत्र हैं और कृष्ण और राम भी। हिंदुओं के अवतार, बौद्धों के बुद्ध, जैनों के तीर्थंकर, इस देश में सभी राजपुत्र। कारण साफ है। गरीब आदमी हो ही कैसे सकता है तीर्थंकर या अवतार! छोड़ेगा क्या? नंगा नहाएगा तो निचोड़ेगा क्या? पहले निचोड़ने को कुछ होना चाहिए, तभी तुम दावा कर सकते हो कि मैंने नहाया।
मगर जितनी बातें हैं, उतना कुछ था नहीं। लेकिन शास्त्र अतिशयोक्तियों से भरे हैं।
कुरुक्षेत्र में अठारह अक्षौहिणी सेनाएं खड़ी हुईं। हो ही नहीं सकतीं खड़ी। कुरुक्षेत्र का मैदान ही छोटा सा है। एक फुटबॉल मैच हो जाए तो बहुत! लेकिन अठारह अक्षौहिणी सेनाएं! पूरा उत्तर भारत अगर युद्ध का मैदान बनता तो संभव था। फिर इनके हाथी, घोड़े और बड़ा लश्कर था! और सारी दुनिया से अलग-अलग देशों से राजे-महाराजे अपनी सेनाएं लेकर आए थे। जिसको तुम महाभारत कहते हो, वह कोई बहुत बड़ा युद्ध नहीं था। एक पारिवारिक कलह थी। एक छोटा-मोटा झगड़ा था। एक छोटे-मोटे मैदान में हुआ। लेकिन हमें अतिशयोक्ति की आदत हो गई है। जब तक हम बड़ा करके न बताएं, हमारे अहंकार को तृप्ति नहीं मिलती। हमारा अहंकार बड़ा किए जाता है।
तीन बच्चे स्कूल जा रहे थे। एक बच्चे ने कहा कि तैरना तो कोई मेरे पिताजी से सीखे! अरे, पांच-पांच, सात-सात मिनट तक डुबकी मार जाते हैं! दूसरे बच्चे ने कहा: यह कुछ भी नहीं। तैरना सीखना हो तो मेरे पिताजी से कोई सीखे! आधा-आधा घंटा निकलते ही नहीं। तीसरे ने कहा: यह कुछ भी नहीं है। मेरे पिताजी से सीखो अगर तैरना सीखना है! सात साल हो गए, डुबकी मारी, निकले ही नहीं। एक ही दिक्कत है कि उनको तुम कहां पाओगे, कैसे उनसे सीखोगे? उनको खोजना मुश्किल। जो मार गए डुबकी सो मार गए डुबकी।
अब जब अतिशयोक्ति ही चल रही है, तो फिर क्या पांच-सात मिनट, फिर बढ़ाए चले जाओ अतिशयोक्तियों को।
पुराना संन्यास चूंकि त्याग पर खड़ा था, इसलिए असृजनात्मक था; बोझ था, भार था पृथ्वी पर। उसका कोई भविष्य नहीं है, वह मर चुका है। उसकी लाश कुछ दिन तक तुम ढो सकते हो, वह तुम्हारी मौज! लाश से भी छूटने में मुश्किल होती है।
कहते हैं जब पार्वती की मृत्यु हुई तो शंकर उसकी लाश को लेकर बारह वर्षों तक घूमते रहे। जब शंकर की यह हालत, तो तुम्हारी क्या हालत होगी? लिए लाश को घूमते रहे कि मिल जाए कोई वैद्य, कि कोई मिल जाए चमत्कारी... मगर क्या करते, उस वक्त सत्य साईं बाबा थे ही नहीं! सो शंकर जी भटकते रहे। कोई मदारी न मिला। कोई जादूगर न मिला। पार्वती के अंग-अंग टूट कर गिरने लगे--सड़ ही गए, तो गिरेंगे नहीं तो क्या होगा! मगर शंकर भी अपनी धुन के आदमी थे। फिकर ही नहीं। हाथ गिर गए, पैर गिर गए, खोपड़ी गिर गई, मगर वे जो बचा उसको ही लिए घूमते रहे। शास्त्र कहते हैं, जहां-जहां पार्वती के अंग गिरे वहां-वहां तीर्थ बन गए। वह जो भी हो! मगर शंकर जी की बुद्धि को भी तो कुछ ध्यान दो। ये मरी औरत को लिए घूमते रहे। यहां जिंदा औरतों को छुड़वाने का उपाय चल रहा है और शंकर जी मुर्दा को नहीं छोड़ रहे।
पुराना संन्यास तो लाश है अब। ढोओ; जितने दिन ढोना है, ढो सकते हो! अंग-अंग गिर रहे हैं उसके, दुर्गंध उठ रही है उससे--उठनी ही चाहिए। कारण साफ है: क्योंकि असृजनात्मक है। संन्यास ने कुछ दान नहीं दिया दुनिया को। इसे सुंदर नहीं बनाया। इसे थोड़ा काव्य नहीं दिया, संगीत नहीं दिया, नृत्य नहीं दिया। दिया क्या संन्यास ने! तो जब भी तुम महात्मा की तारीफ करते हो, तुम बताते हो उसने कितना छोड़ा।
छोड़ना कोई गुण नहीं है। निर्माण क्या किया? यह गुण होगा। उसने लाख रुपये छोड़े हों, तो भी मैं गुण नहीं मानता। और एक कविता बनाई हो या एक सुंदर चित्र रंगा हो, या एक प्यारा बगीचा लगाया हो, दो फूल खिलाए हों, तो मेरे लिए ज्यादा मूल्य है। लाख रुपये छोड़ दिए, इससे क्या होता है। करोड़ों रुपये पैदा करने की कोई विधि निकाली हो, कोई तकनीक, कोई टेक्नालॉजी खोजी हो, कोई विज्ञान दिया हो, तो मूल्य है।
लेकिन तुम महात्माओं की तारीफ इस बात से नहीं करते। तुम अलबर्ट आइंस्टीन को महात्मा नहीं कहोगे। तुम रदरफोर्ड को महात्मा नहीं कहोगे। न्यूटन को महात्मा नहीं कहोगे। हालांकि न्यूटन के बिना एक मिनट नहीं जी सकते हो--तुम्हारे सब महात्मा न होते तो भी तुम मजे से जी सकते थे, न्यूटन के बिना एक मिनट नहीं जी सकते, खयाल रखना। न्यूटन ने कोई एक हजार आविष्कार किए। बिजली का बल्ब नदारद हो जाएगा, न्यूटन न हो तो ग्रामोफोन रिकॉर्ड नदारद हो जाएगा। रेडियो नदारद हो जाएगा। और जहां रेडियो नहीं होगा, वहां टेलीविजन कैसे हो सकता है! और जहां बिजली नहीं होगी, वहां बिजली का पंखा कैसे हो सकता है? तुम जरा सोचो, न्यूटन के बिना तुम एक दिन न जी सकोगे। बिजली का पंखा नहीं, बिजली नहीं, रेडियो नहीं, टेलीविजन नहीं। लेकिन न्यूटन को तुम महात्मा कहोगे? इसने एक हजार आविष्कार किए, लेकिन तुम्हारे मन में कोई सम्मान नहीं है। और कोई मूढ़ सिर के बल खड़ा है और तुम एकदम चरणों में लोटे जा रहे हो। क्योंकि महात्मा शीर्षासन कर रहा है! कोई मूढ़ कांटों पर लेटा हुआ है और तुम्हारे सम्मान का अंत नहीं है। इस तरह के कृत्य मूढ़ ही कर सकते हैं। पहले तो मूढ़ होने ही चाहिए वे और अगर पहले न होंगे तो बाद में हो जाएंगे। क्योंकि सिर के बल जो ज्यादा देर खड़ा रहेगा, वह निश्चित मूढ़ हो जाएगा।
वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी में यह जो मानसिक ज्योति दिखाई पड़ रही है, यह जो चैतन्य दिखाई पड़ रहा है, यह जो मनुष्य के भीतर प्रतिभा दिखाई पड़ रही है, यह दो पैर के बल खड़े होने से हुई। बंदरों में नहीं है, हाथियों में नहीं है, घोड़ों में नहीं है--क्या कारण है? आदमी में ही क्यों है? आदमी दो पैर के बल खड़ा हुआ। इसका एक परिणाम हुआ, गहन परिणाम हुआ: उसका सिर गुरुत्वाकर्षण के विपरीत हो गया। तो खून को सिर तक पहुंचने में बहुत मुश्किल होने लगी। सभी जानवर गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल हैं, समतल हैं। घोड़ा है, गुरुत्वाकर्षण के समतल है; जितना खून उसकी पूंछ में जाता है, उतना ही खून उसके मस्तिष्क में जाता है। तो मस्तिष्क कुछ पूंछ से ज्यादा विकसित नहीं हो पाता। मनुष्य का मस्तिष्क विकसित हो सका एक ही आधार पर, क्योंकि खून की गति उस तरफ कम हो गई। खून की गति कम हो जाने से सूक्ष्म तंतु निर्मित हो सके। बारीक तंतु निर्मित हो सके। इतने बारीक तंतु हैं कि तुम्हारा बाल भी मोटा है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि एक लाखमस्तिष्क के तंतुओं को एक के ऊपर एक करके रखा जाए तो एक बाल की मोटाई के होंगे।
तुम्हारे इस छोटे से मस्तिष्क में सात करोड़ तंतु हैं। ये पैदा नहीं हो सकते थे अगर खून की धारा बहती रहती। क्योंकि खून की धारा इनको तोड़ देती। इसलिए सिर के बल जो ज्यादा खड़ा होगा, अगर पहले बुद्धू नहीं रहा होगा--पहले तो होना ही चाहिए बुद्ध, नहीं तो क्यों सिर के बल खड़ा होगा? तुमने परमात्मा की कोई मूर्ति देखी शीर्षासन करते हुए? कि रामचंद्र जी खड़े हैं; कि कृष्णजी सिर के बल खड़े हैं और बांसुरी बजा रहे हैं! महात्मा की खूबी क्या है अगर कोई पूछे, तुम कहते हो--तीन-तीन घंटा शीर्षासन करते हैं। गए काम से! तो पहुंच गए उसी हालत में जिसमें बंदर थे! इनके मस्तिष्क के सब सूक्ष्म तंतु मर जाएंगे। इसलिए तुम्हारे महात्माओं में प्रतिभा नहीं दिखाई पड़ती। और जहां प्रतिभा न हो, वहां क्या सृजन होगा? इनसे कुछ नहीं होता-जाता! ये चमीटा बजा सकते हैं, धूल लगा सकते हैं, धूनी लगा कर बैठ सकते हैं, राम-राम की धुन मचा सकते हैं।
तुमसे कोई पूछे कि तुम्हारे महात्मा की खूबी क्या? तुम कहोगे, इतना उपवास करते हैं। महीनों उपवास करते हैं। कुछ ये ऐसा करें कि जिससे जिनके पेट भूखे हैं उनके भूखे पेट भरें, तो कुछ गुण की बात हुई! ये भूखों में और खुद भूख बढ़ाते हैं। खुद भी भूखे खड़े हो गए। दस आदमी बीमार थे, ये और जाकर लेट गए कि हम भी चलो बीमार! इनके भूखे होने से दुनिया में भोजन नहीं बढ़ जाएगा। इनके भूखे होने से दुनिया की भूख नहीं मिट जाएगी। इनका भूखे रहने का जो यह पूरा का पूरा आयोजन है, केवल एक बात का सबूत है कि इनके भीतर कहीं न कहीं आत्मघात की प्रवृत्ति होगी। ये दुष्ट प्रकृति के आदमी मालूम होते हैं। ये चाहते तो थे कि किसी और को सताते, लेकिन उतनी हिम्मत भी नहीं है, तो खुद ही को सता रहे हैं। दुनिया में सबसे असहाय व्यक्ति अगर कोई है तो वह तुम हो अगर तुम अपने को सताने लगो, तो बचाने वाला भी कोई नहीं है फिर। कोई रक्षा नहीं है। अगर तुम दूसरे को भूखा मारो, अदालत पकड़ेगी। तुम लाख कहो कि हम इसको उपवास करवा रहे थे, अदालत कहेगी कि ऐसे उपवास किसी को नहीं करवा सकते। जब वह नहीं करना चाहता, तुम कैसे करवा सकते हो? तुम कहोगे, हम धार्मिक बना रहे थे, कांटे पर लिटा रहे थे, सिर के बल खड़ा कर रहे थे, ये तो महात्माओं के लक्षण हैं--कोई अदालत न सुनेगी। लेकिन अगर तुम खुद को ही सताओ, तो अदालत के मजिस्ट्रेट भी आकर तुम्हारे चरण छू जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के जज आ जाएंगे--महात्मा को नमस्कार करने!
इस नकारात्मक प्रक्रिया का परिणाम यह हुआ है कि हम मूल्य गलत चीजों को देने लगे।
दिगंबर जैन मुनि अपने बाल नोंचता है। इसका मूल्य हो गया। कुछ पागल होते हैं जो अपने बाल नोंचते हैं। पागलपन में अक्सर बाल नोंचते हैं लोग। तुम भी अपने घर में देखो, अगर स्त्री जब बहुत बिफरा जाती है, तुम्हारी पत्नी जब बहुत ही आपे के बाहर हो जाती है, तो नोंचना तो तुम्हारे बाल चाहती है, लेकिन परमात्मा हो तुम, पति हो तुम, तुम्हारे कैसे नोंचे--तुमने ही खूब समझा रखी हैं बातें उसको, नहीं तो नोंच कर रख देती तुम्हारे बाल कभी के--अपने ही नोंचने लगती है। जब तुम्हारी पत्नी अपने बाल नोंचे, एकदम गिर कर साष्टांग दंडवत करना--यह जैन मुनि हो रही है। यह बड़ी साधना कर रही है। जैन मुनि केश-लुंच करते हैं, हजारों की भीड़ इकट्ठी होती है।
मैं एक गांव से गुजर रहा था, बड़ी भीड़ देखी, मैंने पूछा: बात क्या है? उन्होंने कहा कि मुनि महाराज केश-लुंच कर रहे हैं। मैंने कहा: हद्द पागलपन है! एक आदमी अपने बाल नोंच रहा है तो नोंचने दो, इसमें इतना शोरगुल मचाने की क्या जरूरत? मगर लोगों की आंखों से आंसू बह रहे हैं कि आहा, मुनि महाराज महात्याग कर रहे हैं! मैंने कहा: मूढ़ो, अगर तुमको इसमें ही रस है, तो नाइयों की दुकानों के सामने बैठ गए, और रोते रहे कि आहा, कि बिलकुल सिर घुट गया, कि यह देखो दुष्ट नाई बिलकुल ही काटे दे रहा है, सारे बाल निकाले दे रहा है! मगर नहीं, वह नोंचने में रस है। नोंचने में जो कष्ट होता है, जो दुख होता है, उसको ये आदर दे रहे हैं।
पुराना संन्यास दुखवादी था। सैडिस्ट, मैसोचिस्ट--मनोविज्ञान ये दो शब्द उपयोग करता है--पर-दुखवादी और स्व-दुखवादी। खुद को भी दुख देता था और दूसरों को भी दुख देने की तरकीबें ईजाद करता था। और संन्यास तो होना चाहिए उल्लास, आनंद; संन्यास तो होना चाहिए उत्सव! लेकिन तुम्हारे सारे मूल्य गलत हैं। भविष्य तुम पर हंसेगा। लोग आश्चर्य करेंगे कि तुम इन लोगों को आदर क्यों देते थे, किस बात का आदर देते थे? एक आदमी सर्दी में नंगा खड़ा हो गया, तुम इसको ही आदर दोगे। इसमें आदर की क्या बात है! तुम भी अगर कुछ दिन खड़े रहो, तो चमड़ी इसके लिए समायोजित हो जाती है। आखिर सारे जानवर बिना वस्त्रों के हैं! ठंड की क्या कहो? ठंडे से ठंडे पानी में मछलियां देखो--और गैरिक रंग की मछलियां, बिलकुल संन्यासी, नंग-धड़ंग और ठंडे से ठंडे पानी में मजे से तैर रही हैं। सारे पशु-पक्षी नंगे हैं। आदमी हजारों साल तक जंगलों में नंगा रहा है। आज भी आदिवासी नंगे हैं। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारे हाथ अब भी ठंड को अनुभव नहीं करते। नाक छू कर देखो अपनी, तो बरफ जैसी ठंडी मालूम होती है। मगर नाक को कुछ पता नहीं चलता। आदत हो गई, समायोजन हो गया।
तो अगर नग्न रहोगे कुछ दिन, तो धीरे-धीरे चमड़ी तुम्हारी संवेदनहीन हो जाएगी। उसकी संवेदना मर जाएगी। चमड़ी के जो सूक्ष्म तंतु संवेदना अनुभव करते हैं, वे जड़ हो जाएंगे। और इसको तुम सम्मान दे रहे हो? यह आदमी अपनी संवेदना मार रहा है, यह आदमी अपनी चमड़ी को नष्ट कर रहा है, मुर्दा कर रहा है, इसको तुम सम्मान दे रहे हो! गर्मियों में लोग हैं कि कंबल ओढ़े बैठे हुए हैं, काली कमली वाले, वे गर्मी में भी कंबल ओढ़े हुए हैं। उनको भी आदर मिल रहा है, क्योंकि गर्मी में कंबल ओढ़े हुए हैं। मगर तुम भी ओढ़ो तो थोड़े दिन में आदी हो जाओगे।
शरीर की एक खूबी है कि शरीर सब तरह के समायोजन कर लेता है। इसीलिए तो दुनिया की विभिन्न-विभिन्न भौगोलिक स्थितियों में, अलग-अलग हवाओं में, अलग-अलग वातावरण में, अलग-अलग तापमानों में भी रहने में कुशल है। सब जगह अपना समायोजन कर लेता है। भूमध्य रेखा पर भयंकर से भयंकर अग्नि बरस रही है, वहां भी जीता है। और दूर ध्रुव प्रदेशों में, जहां साल के अधिकांश महीनों में बर्फ जमी रहती है, वहां भी जीता है। धीरे-धीरे समायोजन इतना गहरा हो जाता है कि बच्चे समायोजन लेकर ही पैदा होते हैं।
तुमने कभी सोचा कि भूमध्य रेखा के आस-पास रहने वाले लोग काले क्यों हैं? सदियों-सदियों में समायोजन हो गया है। काले रंग की एक खूबी है, वह ज्यादा धूप को सह सकता है। गोरा रंग ज्यादा धूप को नहीं सह सकता। गोरा रंग धूप से बहुत ज्यादा संवेदित हो जाता है। फर्क बहुत ज्यादा नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं कि थोड़े से पिगमेंट का फर्क है। चार-छह आने के रंग का फर्क है, बस। चार-छह आने का इंजेक्शन मार दिया जाए कि नीग्रो हो जाओगे। आज नहीं कल इसकी व्यवस्था हो जाएगी कि जो सफेद चमड़ी के लोग हैं, उनको अगर भूमध्य रेखा पर रहना है तो पहले इंजेक्शन ले लें, तो इनकी चमड़ी में काला रंग फैल जाएगा। काला रंग फैल जाए तो शरीर के भीतर किरणें प्रवेश नहीं कर पातीं। सफेद रंग हो तो किरणें प्रवेश कर जाती हैं। सफेद रंग ठंडे इलाके के लिए ठीक है, गरम इलाके के लिए ठीक नहीं है।
शरीर सब तरह के आयोजन कर लेता है। जब आदमी नंगा रहता था तो उसके सारे शरीर पर बाल ऊगते थे। जब उसने कपड़े पहनने शुरू कर दिए तो धीरे-धीरे बाल नदारद हो गए। बालों की जरूरत न रही। जो काम बाल करते थे, वह कपड़े करने लगे।
तुम किन कारणों से आदर देते रहे हो संन्यासियों को, जरा उन कारणों पर पुनर्विचार करना। कोई पत्नी को छोड़ भागा है, कोई बच्चों को छोड़ भागा है। ये आदर के कारण हैं! ये कायर और भगोड़े, ये जो पीठ दिखा गए जीवन के संग्राम को, इनको तुम आदर दे रहे हो! इनमें से अधिकांश ऐसे हैं जो नहीं जुटा सके दो रोटी, कि जिन्हें जीवन का भार झेलने की सामर्थ्य नहीं थी। तो शादी क्यों की? तो बच्चे क्यों पैदा किए? बच्चे पैदा करने में बड़े कुशल! बच्चे पैदा करने में कहते हैं, हम क्या करें, परमात्मा की मर्जी! और भागते वक्त? भागते वक्त इनकी मर्जी! भागते समय ये संन्यास ले रहे हैं। भागते वक्त इनको सत्कार मिलना चाहिए। बच्चे भूखे मरेंगे कि पत्नी वेश्या हो जाएगी, इसका इन्हें कोई प्रयोजन नहीं है। तुम्हारे संन्यासियों ने कितने बच्चों को अनाथ कर दिया और कितनी स्त्रियों को पति के जीते जी विधवा कर दिया! और कितनी स्त्रियां भूखों मरीं, भीख मांगी और कितनी स्त्रियों ने अपने शरीर बेचे! और कितने बच्चे बड़े ही न हुए, मर ही गए! ये सब तुम्हारे संन्यासियों के नाम पर लिखी जाएंगी बातें। और इनको तुम कहते हो: महापुण्य।
और फिर ये भगोड़े संन्यासी जो छोड़ कर भाग आए हैं, इनके जीवन में कोई क्रांति तो होती नहीं। जंगल में भी बैठ कर करेंगे क्या? तुम क्या सोचते हो सच में आकाश से अप्सराएं उतरती हैं? कहां की अप्सराएं! लेकिन अगर किसी ने बिना जीवन-रूपांतरण के घर-द्वार छोड़ दिया है, तो जंगल में बैठ कर पत्नी की याद करेगा। स्त्री उसके मन को डांवाडोल करेगी, आंदोलित करेगी। वह स्त्रियों के संबंध में सोचेगा दिन-रात। जपेगा राम-राम, माला फेरेगा, ऊपर होगा राम-राम, भीतर होगा काम-काम। एक ऐसी अवस्था आ जाएगी उसके भीतर दमित वासना की कि वह खुली आंख सपने देखने लगेगा। वे ही सपने हैं अप्सराएं। कोई अप्सराएं आती नहीं। और तुम्हारे इन महात्माओं के पास आएंगी भी किसलिए? ये जो शरीर पर भभूत रमाए हुए, धूनी लगाए हुए शरीर को सब तरह के कष्ट दे रहे हैं--अप्सराओं को कोई और नहीं मिलता कि इन बेचारे दीन-हीन लोगों की तलाश में जाएं! ये खुद भी अगर अप्सराओं की तलाश में जाएंगे तो अप्सराएं भाग खड़ी होंगी। इन्हें दूर से ही देख कर भाग खड़ी होंगी कि आ रहा है महात्मा, भागो! जैन मुनि स्नान नहीं करते। इनको देख कर अप्सराएं आएंगी? दातौन नहीं करते, मुंह से बास आती है--अप्सराएं इनका आलिंगन करेंगी, चुंबन करेंगी? अप्सराएं पागल हो गई हैं? इनकी दुर्गंध इनकी सुरक्षा करेगी। अप्सराएं तो छोड़ो, कोई फिल्म अभिनेत्री, एक्सट्रा इत्यादि भी शायद ही इनका पीछा करे! लेकिन इनके कल्पना-जाल में अप्सराएं उतरती हैं। दमित वासना कल्पना बन जाती है।
पुराना संन्यास दमन था। मेरा संन्यास रूपांतरण है। पुराना संन्यास भगोड़ापन था। मेरा संन्यास जीवन को जीने की कला है। मैं चाहता हूं, तुम जहां हो वहीं इस ढंग से जीओ कि तुम्हारा जीवन-कमल खिल सके। पुराना संन्यास सरल है। मेरा संन्यास कठिन है। हालांकि लोग तुमसे उलटी ही बात कहेंगे, वे कहेंगे मैंने संन्यास को सरल बना दिया। उनके लिहाज से ठीक ही है, क्योंकि मैं तुमसे बाल नोंचने को नहीं कहता, मैं कहता हूं, बाल कटवाने हों तो जाकर नाई से कटवा लेना। अगर नाई से कटवाने में तुम्हें बहुत अड़चन होती हो कि इसमें परालंबन हो जाएगा, तो अपने घर ही रेज़र रखना, खुद ही बना लेना अपने हाथ से। इस लिहाज से लग सकता है कि मेरा संन्यास सरल है। लेकिन यह बात सच नहीं है। मेरा संन्यास अति कठिन है। क्योंकि मैं तुमसे कह रहा हूं, बीच बाजार में शांत हो जाओ।
और जो बीच बाजार में शांत हो गया, वह कहीं भी शांत रहेगा। उसे तुम नरक में भी भेज दो तो वह स्वर्ग में रहेगा। उसे तुम नरक भेज ही नहीं सकते। मेरे संन्यासी के मन को डोलाया नहीं जा सक
ता। कोई अप्सरा उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मेरे इतने संन्यासी हैं, एक लाख संन्यासी हैं, अनेक से मैं पूछता हूं कि भई, अप्सरा वगैरह आईं? कहते हैं, अभी तक तो नहीं आईं। वे आएंगी ही नहीं। उनके आने के लिए पहली बुनियादी बात चाहिए: दमित चित्त। मैं चूंकि दमन नहीं सिखा रहा हूं, इसलिए इस तरह की मूढ़तापूर्ण कल्पनाएं, रुग्ण, विक्षिप्त कल्पनाएं पैदा भी नहीं होंगी।
देख सहज श्रृंगार तुम्हारा,
संन्यासी मन डोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!

मैं वह सुख-सपना अनदेखा--
निखर गया जो दर्द-महल में,
मैं ऐसा सूरज अनजनमा--
डूब गया जो उदयाचल में;
अवरोधों की अंधी आंधी,
कांप रहा तिनकों जैसा मन;
देख अलक-भ्रम-जाल तुम्हारा,
पीर-पखेरू बोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!

रूप-रतन के सुख-सागर में--
मैं अरूप को खोज रहा हूं,
संयम की नौका में तिर कर--
मैं अनूप को खोज रहा हूं;
अनथाही सरिता जीवन की,
अभी बहुत बाकी गहराई;
उफनाती आकर्षण-धारा
बांध हृदय का खोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!

कुछ न रहेगा मेरे पीछे,
जल पर मेरा नाम लिखा है;
मुरझाऊं खिलने से पहले,
यह मेरा परिणाम लिखा है;
महामोह की शून्य परिधि से--
घिरा-घिरा सा उन्मन-उन्मन,
सम्मोहक उपकार तुम्हारा,
जीवन में रस घोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!
ये पुराने संन्यासी के संबंध में सच हो सकता है, मेरे संन्यासी के संबंध में नहीं। उसका मन डोल नहीं सकता। जिन चीजों से उसका मन डोल सकता है, मैं उनसे कह रहा हूं कि उनसे गुजरो! उनसे भागो मत! उनसे मुक्त होने का एक ही उपाय है, उनको जीओ। उनको भरपूर जी लो। वासना की व्यर्थता को अनुभव से देख लो। कामना की असारता को तुम्हारे रोएं-रोएं में, अंग-अंग में समा जाने दो। फिर तुम्हें कुछ भी डोला न सकेगा।
पुराना संन्यासी तो बहुत भयभीत था; बहुत डरा हुआ था! हर वक्त घबड़ाया हुआ था। किससे घबड़ाया हुआ है? किससे डरा हुआ है? और ऐसे डरपोकों के लिए मोक्ष है? घबड़ाया हुआ है अपने से!
विनोबा जी के सामने अगर तुम रुपये ले जाओ, वे एकदम आंख बंद कर लेते हैं। अब रुपये में ऐसा क्या है कि आंख बंद करो! जरूर कोई आकर्षण कहीं अटका रह गया होगा। नहीं तो रुपया देख कर आंख बंद करने की क्या जरूरत है? रुपया रुपया है, सो अपनी जगह है, तुम्हारी आंख में घुसा जा नहीं रहा है, कोई धूल-धवांस भी नहीं है कि आंख बंद करो; अरे, नोट है, यह आंख में कोई चला थोड़े ही जाएगा, इससे इतना क्या डर! हाथ से नहीं छूते। उनके एक शिष्य मुझे मिलने आए थे, कहने लगे, विनोबा जी रुपया हाथ से नहीं छूते। तो मैंने कहा, क्यों? तो कहा: रुपया मिट्टी है। तो मैंने कहा: मिट्टी तो छूते हैं कि नहीं? मिट्टी तो छूते हैं, उस से तो रोज हाथ धोते हैं। तो मैंने कहा: उनसे जाकर कहना कि नोट वगैरह से हाथ धोया करें, मिट्टी को क्यों खराब कर रहे हो। और नोट छूने से इतना डर क्या है? नोट कोई शूद्र है। अगर शूद्र है तो हरिजन। लेकिन भय कहीं भीतर छिपा होगा। कहीं भीतर मोह है, कहीं आकर्षण है, कहीं आसक्ति है।
पुराने संन्यास ने तो भय सिखाया, डर सिखाया, मैं तुम्हें निर्भय होना सिखा रहा हूं। मैं कह रहा हूं, धन का उपयोग है, करो उपयोग। धन से इतना डरना नहीं है; धन में है क्या? एक कामचलाऊ व्यवस्था है। दस का नोट है कि सौ का नोट है, एक कामचलाऊ बात है। हमने तय कर रखा है, इसको सौ का नोट मान लिया है--यह उपयोगी है विनिमय के लिए।
मुझसे एक व्यक्ति मिलने आए थे, संन्यासी, पुराने ढब के। मैंने उनसे कहा: कल सुबह ध्यान के लिए आ जाओ। उन्होंने कहा: कल मैं न आ सकूंगा। क्यों? तो उन्होंने कहा: आप देखते हैं मेरे साथ ये सज्जन बैठे हुए हैं, इनके बिना मैं नहीं आ सकता। कल इनका अदालत में मुकदमा है। मैंने कहा: इनके बिना तुम क्यों नहीं आ सकते? तुम संन्यासी हो, सब छोड़-छाड़ चुके, ये कौन हैं? इनके बिना तुम क्यों नहीं आ सकते? ये तुम्हारी गृहस्थी हैं, क्या मामला क्या है? तुम पत्नी छोड़ चुके, ये तो पुरुष हैं--ये तुम्हारी पत्नी हैं या क्या मामला है? उन्होंने कहा: नहीं-नहीं, आप समझे नहीं। बात यह है कि मैं पैसा नहीं छूता। पैसा ये रखते हैं। और आप तक आने के लिए टैक्सी में आना पड़ेगा, तो पैसा कौन रखेगा? यही चुकाते हैं पैसा। तो मैंने कहा: पैसा किसका रखते हैं ये। कहने लगे, जो लोग मुझे चढ़ा जाते हैं, वह ये रखते हैं, मैं छूता नहीं। मैं संन्यासी हूं, मैं धन इत्यादि नहीं छूता।
यह भी एक खूब जाल रहा। पैसा तुम्हारा है, रखते ये हैं, यह एक और नया जाल फैलाया तुमने, एक आदमी को और उलझाया। अब ये तुम्हारे पीछे-पीछे फिरें, तुम इनके पीछे-पीछे फिरो। तुम अपनी जेब में ही रख लेते और अपने ही हाथ से निकाल लेते तो कुछ हर्जा था? इनकी जेब में रखते हो, इनके हाथ से निकलवाते हो! टैक्सी में तुम बैठते हो, यह भी खूब रही! तुम भी मूढ़ हो और यह आदमी और भी मूढ़ है। वह दूसरा आदमी एकदम कहने लगा कि मैं मूढ़ नहीं हूं। अरे, मेरा क्या बिगड़ता है, मुझे तीन सौ रुपया महीना देते हैं। मैं तो नौकरी कर रहा हूं। आखिर कहीं तो काम मुझे करना पड़ेगा और इससे सरल काम क्या? मैंने उनसे पूछा कि तीन सौ तो तनख्वाह मिलती है, ऊपर भी कुछ मार देते हो कि नहीं? उन्होंने कहा: वह बहुत मुश्किल है, क्योंकि बाबाजी हिसाब रखते हैं। वे देखते रहते हैं--कितना पैसा आया? रोज रात पूछ लेते हैं कि आज कितना आया?
हिसाब भी बाबा जी रखते हैं, टैक्सी में बाबा जी चलते हैं--और इस गरीब आदमी को तीन सौ रुपया और चुकाते हैं! मैंने उनसे कहा: तीन सौ रुपया और तुम अपने काम में ला सकते थे। और जब हिसाब ही रखना है और पैसा का उपयोग भी करना है--करना ही पड़ेगा; मैं कुछ कह नहीं रहा हूं कि मत करो उपयोग--मगर यह जाल क्यों? मगर इसके कारण उनका सम्मान है। पैसा छूते नहीं।
हमारे अजीब सिद्धांत हैं, अजीब धारणाएं हैं! कभी इनकी मूढ़ता पर विचार करो, इनकी जड़ता पर विचार करो। और फिर ऐसा आदमी भयभीत तो रहेगा, डरा तो रहेगा। ऐसे आदमी की भी एक सीमा होगी। समझो कि ऐसा आदमी दस रुपये न छुए, हजार रुपये न छुए, दस लाख? तो शायद डांवाडोल हो जाए। सोचे कि अब दस लाख मिल रहे हैं, अब एक दफा भूल ही कर लो। और दुनिया में लोग इतनी भूलें कर रहे हैं और हमने एक दफे की तो हर्ज क्या? और फिर कर लेंगे तीर्थयात्रा, कि कुछ पुण्य कर लेंगे, कुछ सत्यनारायण की कथा करवा देंगे।
चंदूलाल पर एक मुकदमा था। चंदूलाल का एक दोस्त वकील था। चंदूलाल ने सोचा, वकील के मार्फत सब अधिकारियों से जान-पहचान कर ली जाए तो ठीक रहेगा। वकील ने कहा तुम मेरे साथ आज कचहरी चलो, वहीं सबसे परिचय करवा दूंगा। वकील ने सबसे पहले एक मुंशी से मिलवाया। बताया कि ये मुंशी जी हैं, बड़े काम के आदमी हैं। फिर चंदूलाल के कान में कहा: दस रुपये इसे दे दो, तो यह तत्काल काम कर देता है। इसके बाद एक इंस्पेक्टर से मुलाकात कराते समय कान में कहा, सौ रुपये दो और चाहे जो काम करवा लो। इसी तरह एस. पी. से परिचय कराने के बाद वकील दोस्त ने चंदूलाल के कान में कहा: तीन सौ रुपये में खुश! मजिस्ट्रेट से भी पहचान कराते समय जब दोस्त ने चंदूलाल के कान में कहा, पांच सौ रुपये, तो चंदूलाल से न रहा गया, वह बोला, आश्चर्य है, न्यायालय में जब इतनी रिश्वतखोरी चलती है तो फिर न्याय कैसे होगा? क्या इस इंसाफ के मंदिर में कोई पवित्र और चरित्रवान अधिकारी काम नहीं करता? करता है, जरूर करता है--वकील ने जवाब दिया--मगर प्यारे चंदूलाल, उसे खरीदना और खुश करना तुम्हारी औकात के बाहर है।
सबकी सीमाएं हैं। कब तक आंख बंद रखोगे? और एकदम से अगर--झरत दसहुं दिस मोती! फिर क्या करोगे? फिर भूल-भाल कर एकदम बीनने लगोगे कि अब छोड़ो न मौका! चारों तरफ देख लो कि कोई देख तो नहीं रहा है, ऐसा अवसर न चूको! ऐसे ही अप्सराएं उतरीं। झरत दसहुं दिस मोती! फिर ऋषि-मुनियों से न रहा गया। फिर ऋषि-मुनियों की पतन की कहानियां हैं। पहले उनको दमन सिखाओ, फिर बेचारों का पतन करवाओ! तुमने उन्हें कहीं का न रखा, न घर का न घाट का, धोबी के गधे हो गए।
मैं एक संन्यास की नई धारणा दे रहा हूं। मौलिक भेद यही है कि मैं संन्यासी को सृजनात्मक देखना चाहता हूं। उसकी कीमत उसके उपवास करने से नहीं होगी, वह कितना पैदा करता है इस दुनिया में, इससे होगी। उसकी कीमत उसने क्या छोड़ा, इससे नहीं होगी, क्या निर्माण किया, इससे होगी। उसकी कीमत उसने शरीर को कितना कुरूप और अपंग किया, इससे नहीं होगी, बल्कि शरीर को कितना सुंदर किया, स्वस्थ किया, इससे होगी। इस संसार को तुमने जैसा पाया है, उससे कुछ थोड़ा सुंदर छोड़ जाओ, तो तुम संन्यासी हो। इस संसार को कुछ थोड़ा सा प्रीतिकर कर जाओ, थोड़ा प्रेम में पग जाए यह संसार, तो तुम संन्यासी हो। इस संसार में थोड़े फूल खिला जाओ, थोड़ी सुगंध बिखरा जाओ, तो तुम संन्यासी हो। तुम्हारा मूल्य तुम्हारी सृजनात्मकता से तय होगा और तुम्हारे भगोड़ेपन से नहीं। जीवन को उसकी सघनता में जीओ, मगर ऐसे जीओ जैसे कमल जल में। जल में रहे और जल छूए भी न। नहीं तो तुम अगर भागे कच्चे, तो अटके रहोगे। और तुम्हारा पुराना संन्यास कच्चा था। वह तुम्हें जीवन को उसकी गहराई में नहीं जाने देता था। जीवन से तुम्हें डरा देता था। जीवन पाप है। जीवन दुष्कर्मों का फल है। नहीं, बिलकुल नहीं, हजार बार नहीं। जीवन पुरस्कार है। जीवन अवसर है विकास का, प्रौढ़ता का। तुम्हें खिलना है। जीवन उस खिलने के लिए एक मौका है, एक भूमिका है।
दृग-गगन में तैरते हैं,
रूप के बादल रुपहले!

मन पराया हो रहा है,
तन उनींदा सो रहा है;
क्या करें, ऋतु का विपर्यय,
धैर्य-साधन खो रहा है;
इस नशीली चांदनी में,
चंद्रवदना यामिनी में;
रे हठी! मत झिझक तू भी,
आज मन की बात कह ले!

मधुवनों ने सुरा पीली,
सुरभि-वेणी हुई ढीली;
प्रस्तरों को बेधती हैं--
रेशमी किरणें नुकीली;
अब न कोई बच सकेगा;
यम-नियम क्रम रच सकेगा;
बेखुदी में डूब कर तू भी,
ज्योत्सना की बांह गह ले!

चांदनी ने चिटख तोड़े,
लाज के बंधन निगोड़े;
निर्वसन अंबर दिगंबर,
दिग्वधू से गांठ जोड़े;
इस धुले वातावरण में,
झिलमिलाते मधु-क्षरण में;
एक पल को ही सही, पर्र
अमिय-सरि में मुक्त बह ले!
मेरा संदेश संन्यासियों को यही है--
एक पल को ही सही, पर--
अमिय-सरि में मुक्त बह ले!
इस जीवन की अमृत धारा में मुक्त भाव से बह लो एक क्षण को भी, तो तुम जाग जाओगे। जीवन ही जगा देगा, भागना नहीं पड़ेगा। जीवन की असारता ही तुम्हें दिखा देगी कि इसके पार भी कुछ होना चाहिए जो सार है। जीवन की क्षणभंगुरता तुम्हें बेध देगी, तुम्हें चौंका देगी, तुम्हें उस खोज में लगा देगी जो शाश्वत की खोज है, जो समयातीत की खोज है। चारों तरफ जाग कर जीओगे तो मृत्यु को देखोगे नहीं? द्वार-द्वार मृत्यु दस्तक दे रही है; और मृत्यु तुमसे कुछ कहेगी या नहीं कहेगी? मृत्यु कहेगी कि यह घड़ी तुम्हारी भी आती है। इसके पहले कि यह घड़ी आए, जान लो कुछ, पहचान लो कुछ जो अमृत है--और वह अमृत तुम्हारे भीतर छिपा है।
जंगलों में होता तो मैं भी कहता कि जंगल भाग जाओ। वह अमृत तुम्हारे भीतर छिपा है। बाल उखाड़ने से मिलता होता तो मैं भी कहता, बाल उखाड़ो। मगर बाल उखाड़ने से उस अमृत के मिलने का कोई संबंध नहीं। नग्न होने से मिलता होता तो मैं भी कहता कि नग्न हो जाओ, सब दिगंबर हो जाओ। मगर वस्त्र भी बाहर हैं और नग्नता भी बाहर है--और अमृत भीतर है। वस्त्र पहनने वाला भी बहिर्मुखी है और जो नग्न होकर खड़ा हो गया है, वह भी बहिर्मुखी है--और यात्रा अंतर की करनी है। भोजन भी बाहर है, उपवास भी बाहर है--भोजन तुम्हारी आत्मा में नहीं जाता, तुम्हारे शरीर में ही जाता है; और उपवास भी तुम्हारे शरीर में ही अटका रह जाता है, तुम्हारी आत्मा में नहीं जाता। तुम चाहे पैर के बल खड़े होओ, चाहे सिर के बल खड़े होओ, तुम्हारे सिर के बल खड़े होने से तुम आत्मवान नहीं हो जाते। तमाशा हो जाते हो, सर्कस हो जाते हो, मगर आत्मवान नहीं हो जाते। शरीर को इरछा-तिरछा करो, तरह-तरह के आसन-व्यायाम करो, इस सबसे कुछ भी न होगा, जाना होगा भीतर--और भीतर जाने की एक ही प्रक्रिया है: ध्यान।
मैं संन्यास को सिर्फ ध्यान का पर्याय मानता हूं। संन्यास अर्थात ध्यान। ध्यान अर्थात संन्यास। ध्यान से ज्यादा कुछ और करने की जरूरत नहीं है। ध्यान सध जाए, संन्यास सध गया। ध्यान सधने का अर्थ है: तुमने जान लिया कि मैं देह नहीं, मन नहीं, आत्मा हूं। और मेरे कहने से नहीं--मेरे कहने से क्या होगा; मैं लाख कहूं, इससे क्या होगा--तुम्हारा अनुभव होना चाहिए, तुम्हारा साक्षात्कार होना चाहिए।
मैं जीवन के साथ प्रेम सिखाता हूं। क्योंकि प्रेम के द्वारा ही तुम जीवन की गहराइयों को जान सकोगे। और जानोगे तो मुक्त हो सकोगे। ज्ञान के अतिरिक्त और कोई मुक्ति नहीं है। और मैं भयभीत होना नहीं सिखाता। और मैं नहीं कहता कि भूलें करना ही मत। क्योंकि जो भूलें नहीं करता, वह सीखता भी नहीं। हां, एक ही भूल दुबारा मत करना। एक ही भूल दुबारा करने वाला मूढ़ है। नई-नई भूलें करना ताकि नया-नया सीखने को मिले। मैं तुमसे नहीं कहता कि भटकना मत कभी; क्योंकि भटकता वही नहीं जो बैठा ही रहता, चलता ही नहीं, उठता ही नहीं। मगर जो उठता ही नहीं, चलता ही नहीं, वह पहुंचता भी नहीं। भटकना, बेफिकरी से भटकना, क्या घबड़ाने की बात है, परमात्मा सब तरफ व्याप्त है। भटकोगे भी तो भी उसी में भटकोगे, उसके पार नहीं जा सकते, उससे दूर नहीं जा सकते। लेकिन हर भटकाव बोधपूर्वक हो, ताकि हर भटकाव के बाद जब तुम वापस लौटो तो कुछ ज्ञान की संपदा लेकर लौटो, कुछ हीरे-जवाहरात लेकर लौटो, हर भूल के बाद कुछ नया जागरण, कुछ नई किरण बोध की तुम्हारे हाथ लगे--लगनी चाहिए, लगती है।
इसलिए मैं न तो भूलों का विरोधी हूं, न भटकावों का विरोधी हूं, न जीवन का विरोधी हूं। मैं कहता हूं: जीवन को उसकी समग्रता में जीओ--निर्भय होकर, छोड़ कर सब धारणाएं परिणामों की। लोग बिलकुल डरे हुए खड़े हैं, बंधे हुए खड़े हैं, सब ने लक्ष्मण-रेखाएं खींच रखी हैं, उनके बाहर नहीं निकलते। अपने-अपने घेरे में हैं। और वे ही घेरे तुम्हारा नरक बन गए हैं। निकलो बाहर, तोड़ो लक्ष्मण-रेखाएं! पहले डर लगेगा, क्योंकि अज्ञात में प्रवेश हमेशा डर देता है।
मैं नहीं सिखाता तुम्हें चरित्र, मैं तुम्हें सिखाता हूं चैतन्य। चरित्र दो कौड़ी का होता है, ऊपर से थोपा होता है। तुम्हारा पुराना संन्यास चरित्र पर निर्भर था, मेरा संन्यास चैतन्य पर निर्भर है। चैतन्य भीतरी घटना है, चरित्र ऊपरी घटना है। चरित्र तो ऐसा है जैसे रंग लिए ओंठ। लाल रंग लो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि तुम्हारे ओंठों में खून का प्रवाह हो रहा है! चरित्र तो थोथा है, ऊपरी है, नकली है। चैतन्य जैसे तुम्हारे ओंठ में जीवन का, रक्त का, यौवन का प्रवाह हो रहा हो। तब ओंठ लाल हों तो ठीक। लिपस्टिक से लाल कर लिए और चल पड़े!!
लिपस्टिक लगाई हुई औरतें जितनी भद्दी और बेहूदी लगती हैं--सुंदर से सुंदर स्त्रियां बेहूदी और भद्दी लगने लगती हैं। मगर हम झूठ पर हर तरफ से भरोसा किए हुए हैं। शर्म भी नहीं आती स्त्रियों को। सब झूठ है। चोलियां पहन रखी हैं, जो कि झूठ हैं, जो कि स्तनों को उभार कर दिखलाने की चेष्टा हैं। चाहे स्तन हों या न हों, चाहे स्तन कभी के ढल चुके हों, मगर रबर की गद्दियां! और इसको इस देश में, इस पुण्य-भूमि में बड़ा महत्वपूर्ण समझा जाता है! लोग कोट के कंधों में रुई भरवा लेते हैं, कोट की छाती में रुई भरवा लेते हैं--और चले अकड़ कर! भीतर छाती हो या न हो! मगर रबर के कंधे, रबर की छाती अकड़ कर चलने के लिए थोड़ा सुख दे जाते हैं। मगर किसको धोखा दे रहे हो?
और ये साधारण लोग करते रहें तब तो ठीक है, जिनको तुम महात्मा कहते हो, उनका भी मामला यही है। सारा चरित्र थोपा हुआ है, आरोपित है, ऊपर-ऊपर है। चैतन्य से नहीं उठा है। आरोपित चरित्र का लक्षण होता है कि वह भय के कारण होता है। या लोभ के कारण होता है। तुम पूछो अपने महात्मा से कि तुमने क्यों संन्यास लिया? तुमने क्यों संसार छोड़ा? तो वह कहेगा कि क्या मुझे नरक में सड़ना था! नरक के भय से संसार छोड़ा है। ये बच्चे हैं। जैसे बच्चे भय से स्कूल जाएं, मास्टर की मार-पीट से डर कर पढ़ाई करें। या लोभ के कारण छोड़ा है। कि स्वर्ग पाना है, स्वर्ग के सुख पाने हैं। जैसे बच्चे पुरस्कार के लोभ में--कि गोल्ड मेडल मिलेगा--मेहनत करें। ये तुम्हारे महात्मा भी बच्चे हैं। और बड़ी हैरानी तो तब होती है कि छोटों से लेकर बड़ों तक वही मूढ़ता!
अभी कलकत्ता की मदर टेरेसा को नोबल प्राइज मिल गई। वे लेने पहुंच गईं। बच्चों को छोड़ो ये बातें! ये पुरस्कार! इससे तो बर्नार्ड शॉ ने ठीक किया। जब उसे नोबल प्राइज मिली तो उसने कहा कि नहीं, अब मैं उस उम्र के पार हो चुका जब पुरस्कार मुझे आनंदित कर सकते थे, यह किसी युवक लेखक को, कथाकार को दो। लेकिन मदर टेरेसा... खाक मदर!... पहुंच गईं नोबल प्राइज लेने। अब जगह-जगह प्राइज मिल रहीं, जगह-जगह पुरस्कार; अब भारतरत्न हो गईं!
कागज इकट्ठे करते फिरते हैं लोग। सम्मान, सत्कार। और यही आशा आगे भी है कि स्वर्ग में भी पुरस्कार मिलेंगे। तो झेल लो, यहां तो थोड़े दिन की बात है, थोड़े दिन, चार दिन की बात है, अरे, दुख में भी झेल लिए तो कोई हर्ज नहीं, फिर पीछे तो शाश्वत सुख है। ये तुम्हारे महात्मा बचकाने हैं। ये प्रौढ़ भी नहीं हैं, महात्मा तो बहुत दूर। इनको कम से कम इतना तो पता होना चाहिए कि चरित्र भय और लोभ के आधार पर निर्मित होगा तो झूठा होगा, मिथ्या होगा। असली चरित्र चैतन्य से निर्मित होता है। तुम जागते हो भीतर, ध्यान तुम्हारी ऊर्जा को प्रज्वलित करता अग्नि की भांति, तुम्हारे भीतर दीया जलाता है और उस दीये के प्रकाश में तुम देखते हो क्या ठीक है, और क्या गलत है। न तो गीता से तुम जीते हो, न कुरान से, न बाइबिल से, न महावीर से, न बुद्ध से, तुम जीते हो अपनी रोशनी में। और यही परम बुद्धों ने कहा है। बुद्ध का अंतिम संदेश पृथ्वी पर यही था: अप्प दीपो भव। अपने दीये बनो। अपने दीये खुद बनो।
तुम्हारे भीतर ध्यान का दीया जले, फिर अड़चन नहीं रह जाती, फिर तुम्हें दिखाई पड़ता है क्या करने योग्य है, क्या करने योग्य नहीं है। फिर तुम वही करते हो जो करने योग्य है। फिर चाहे शास्त्र के अनुकूल हो, चाहे प्रतिकूल हो। क्योंकि शास्त्रों में सभी बातें सही नहीं हैं। अगर शास्त्रों के अनुकूल ही कोई चले, तो समय तो रोज बदलता जाता है, शास्त्र तो बदलते नहीं। शास्त्र जब लिखे गए थे तब के लिए शायद कोई बात ठीक रही भी हो, उस समय के अनुकूल रही हो, अब हजारों साल बीत गए, वह बात ही कचरा हो गई।
आदमी बहुत आगे निकल चुका। अब तुम उस शास्त्र के अनुसार जीओगे तो सिर्फ अबुद्धि का परिचय दोगे। अब भारत के शास्त्रों में तो ऐसे यज्ञों का वर्णन है जिनमें बलि दी जाती थी। अश्वमेध-यज्ञ: उसमें अश्व की बलि दी जाती थी। और अश्वमेध-यज्ञ ही होता तो भी ठीक था, नरमेध-यज्ञ भी होते थे, जिनमें मनुष्यों की बलि दी जाती थी। अब अगर शास्त्र की मान कर चलोगे--और अभी भी कुछ लोग मान कर चलते हैं। तो तुम आए दिन खबरें पढ़ लेते हो अखबारों में कि किसी ने अपने बेटे की ही बलि दे दी। वह कर रहा है शास्त्र के अनुकूल काम। मगर शास्त्र लिखे गए थे पांच हजार साल पहले। जिनने लिखे थे, रहे होंगे जंगली और बर्बर। बलि की बात ही अधार्मिक है। मगर करीब-करीब दुनिया के सारे धर्मों में बलि की प्रथा जारी रही। हटते-हटते हटी। अब भी पूरी नहीं हट गई है। शास्त्रों में तो सती की प्रथा लिखी है। सब शास्त्र पुरुषों ने लिखे। अगर स्त्रियां भी लिखतीं तो ‘सता’ की भी प्रथा लिखतीं, कि जब स्त्री मर जाए तो पति को ‘सता’ हो जाना चाहिए। जिंदगी भर तो सताया, अब ‘सता’ होओ। अब कहां जाते हो बच कर? लेकिन चूंकि शास्त्र पुरुषों ने लिखे, इसलिए वे अपने लिए क्यों लिखेंगे? मर्द बच्चे की बात ही और! इधर एक औरत मरी नहीं, मरघट से लोग लौटते वक्त ही विचार करने लगते हैं कि अब भई, कहां लगाएं, शादी कहां लगानी है, कहां करनी है? किसकी लड़की ढूंढें? क्या करें क्या न करें? और स्त्री को सती हो जाना चाहिए!
और तुमने लाखों स्त्रियों को जलाया। और यह मत सोचना कि वे अपनी इच्छा से सती हुई थीं। अपनी इच्छा से कोई सती हो तो समझ में आती है बात। इतना प्रेम रहा हो, इतना प्रगाढ़ प्रेम रहा हो कि किसी के लिए जीना असंभव ही हो जाए प्रेमी के बिना। तो ऐसा तो दिखाई नहीं पड़ता। वही पति पत्नी जिंदगी भर कलह करते रहे, एक-दूसरे की छाती पर मूंग दलते रहे और मर कर एकदम से प्रेम हो गया! इतना प्रेम कि जीवन दे दिया! नहीं, हालत कुछ और ही थी। हालत बिलकुल उलटी थी। सतियां इच्छा से नहीं होती थीं--हां, हजार में कोई एकाध होती होगी, उसकी बात छोड़ दो; अपवाद को मत गिनो, उससे नियम सिद्ध होता है, खंडित नहीं होता--नौ सौ निन्यानबे स्त्रियां जबरदस्ती धक्का देकर सती की गईं। इस तरह का इतंजाम करते थे; खूब बैंड-बाजे बजाते थे और खूब घी फेंकते थे और बड़ी चिता जलाते थे। घी से इतना धुआं उठता कि किसी को कुछ दिखाई नहीं पड़ता कि क्या हो रहा है और उसमें जिंदा स्त्री को बिठा देते। और चारों तरफ ब्राह्मण पुरोहित मशालें लेकर खड़े रहते थे कि वह स्त्री भागती थी--जिंदा आदमी को तुम जलाओगे! जरा, अपना हाथ तो आग में डाल कर देखो! तुम्हें पता ही नहीं चलेगा कब हाथ बाहर आ गया! बाद में पता चलेगा जब हाथ बाहर आ जाएगा। इसको वैज्ञानिक कहते हैं: कंडीशंड रिफ्लेक्स। इसमें तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता। जैसे कोई आदमी तुम्हारे आंख के पास हाथ लाए तो आंख एकदम झपक जाती है--तुम्हें झपकाना थोड़े ही पड़ती है! अगर तुम पहले विचार करो कि आंख झपकनी है कि नहीं झपकनी है, तब तक तो मामला ही खराब हो जाए! इतना सोच-विचार का मौका नहीं दिया जा सकता, आंख जैसी नाजुक चीज, तो कंडीशंड रिफ्लेक्स, आंख की पलक खुद ही झपक जाती है। अपने से झपक जाती है।
रात तुम सो रहे हो, पैर पर कोई चींटा चढ़ने लगा, पैर झटक देता है उसको। इसके लिए जगने की कोई जरूरत नहीं होती। नींद में तुम मच्छर को हाथ से उड़ा देते हो, जगने की कोई जरूरत नहीं होती। अगर तुम आग में हाथ डालोगे तो हाथ अपने से बाहर आ जाता है, तुम्हें लाना नहीं पड़ता। जिंदा स्त्री को, पूरी स्त्री को तुम बिठा लोगे आग में, वह भाग कर बाहर नहीं निकल आएगी! अपने से निकल आएगी। निकलना नहीं चाहेगी तो भी निकल आएगी।
तो वे पंडित-पुरोहित खड़े होते थे जोर-जोर से मंत्रों का उच्चार करते हुए और इतना धुआं पैदा करते थे घी डाल कर कि किसी को दिखाई न पड़े असलियत और मशालों से उस स्त्री को वापस धक्के देकर चिता में गिरा देते थे। यह सीधी नरहत्या थी। यह महापाप था। लेकिन इसको बड़ी चरित्र की बात समझी जाती थी। हां, अगर यह चैतन्य से उठे, तब बात और है। तो चैतन्य से तो किसी लैला को उठ सकती है, कि किसी मजनू को; कि किसी शीरी को, कि किसी फरहाद को। यह तो कभी बात घट सकती है। और उसके लिए न तो धुआं पैदा करना पड़ेगा और न मंत्रोच्चार करना पड़ेगा। सच तो यह है कि अगर यह बात चैतन्य से घटेगी तो उस स्त्री को या पुरुष को चिता में जाने की जरूरत ही न रहेगी। इधर एक के प्राण निकलेंगे कि उधर दूसरे के प्राण उड़ जाएंगे; श्वास चलेगी ही नहीं। अगर प्रेम इतना सघन होगा तो बात खत्म ही हो गई। श्वास चलने का कोई कारण ही न रहा। तब तो यह बात कुछ और होती। नहीं तो बस सब थोपी हुई बातें हैं।
शास्त्रों के अनुसार जीने से तुम चरित्रवान हो जाओगे, इस भ्रांति में मत रहना। फिर शास्त्र तो अलग-अलग बातें कहते हैं। फिर किस शास्त्र की मानोगे? द्रौपदी के पांच पति थे, यह शास्त्रानुकूल है, इसमें कोई हर्जा नहीं है, पाप नहीं हो सकता, क्योंकि पाप हो तो द्रौपदी महापापी हो जाएगी--और द्रौपदी तो पंच-कन्याओं में एक है। तो किसी स्त्री को पांच पति अगर करने हों, तो इसमें कुछ चरित्रहीनता नहीं है, शास्त्र के अनुकूल बात हो रही है। हालांकि कानून के खिलाफ होगी और पांचों पति और स्त्री सब जेलखाने में बंद होंगे, वह दूसरी बात है। लेकिन चरित्र के संबंध में कोई बात नहीं है। नहीं तो द्रौपदी के चरित्र पर संदेह पैदा हो जाएगा।
अगर शास्त्रों को देखते हो तो तुम्हारे धर्मराज युधिष्ठर जुआ खेलते हैं और उनको धर्मराज कहते हो! शर्म भी नहीं आती! धर्मराज जुआ खेल रहे हैं। और छोटा-मोटा जुआ नहीं खेल रहे, सब हार गए। सब हार गए, वह भी ठीक, पत्नी को भी दांव पर लगा दिया। अब तो बेशर्मी की हद हो गई! आदमियों को कहीं दांव पर लगाया जाता है? पत्नी कोई चीज-वस्तु, कोई तुम्हारी मालकियत? लेकिन उन दिनों यही खयाल था, शास्त्र यही कहते: स्त्री-धन। पुरुष-धन नहीं कहते, स्त्री-धन। बाप बेटी को दान कर देता है, कन्यादान! जैसे यह कोई सामान है कि कर दिया दान। स्त्री-धन, अगर धन है तो फिर ठीक है, फिर दांव पर लगाने में कोई हर्जा नहीं। और धर्मराज धर्मराज ही रहे! स्त्री को भी दांव पर लगा कर हार गए। तो जुआ खेलने में कोई पाप नहीं है। जब धर्मराज हो सकता है कोई व्यक्ति जुआ खेल कर, तो तुम मजे से जुआ खेल सकते हो, इसमें क्या अड़चन है! तुम्हारे साधु-संत सदियों से गंज़ेडी-भंगेड़ी! इसको अगर तुम चरित्र कहते हो, तो फिर दुश्चरित्रता और क्या होगी?
नहीं, कोई दूसरा निर्णायक नहीं हो सकता। और तुम दूसरे के आधार से चरित्र को सोच कर जीना भी मत। निर्णय तो तुम्हारे भीतर से आना चाहिए। अगर तुम बाहर निर्णय खोजने गए, तो बहुत मुश्किल में पड़ोगे। कुछ भी तय करना मुश्किल हो जाएगा। फिर तो तुम जो चाहो वह करो, उसके लिए तुम शास्त्रों में हमेशा समर्थन पा जाओगे। शास्त्रों में हर चीज का समर्थन है। एक शास्त्र में नहीं मिलेगा, दूसरे शास्त्र में मिल जाएगा। दूसरे में नहीं तो तीसरे में मिल जाएगा। तुम अपने मनोनुकूल शास्त्र चुन लेना। और एक धर्म में नहीं तो दूसरे धर्म में। मांसाहार करना हो तो आधार मिल जाएंगे। मांसाहार न करना हो तो आधार मिल जाएंगे।
और कैसे-कैसे अदभुत आधार लोगों ने खोज लिए हैं। जहां बिलकुल नहीं मिल सकते थे वहां भी खोज लिए हैं।
बौद्ध सारे जगत में मांसाहार करते हैं, हालांकि बुद्ध अहिंसा के परम उपदेष्टा थे और सारे बौद्ध मांसाहार करते हैं। जापान में, चीन में, कोरिया में, सब जगह मांसाहारी हैं। एक छोटी सी घटना से मांसाहार शुरू हो गया।
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा था--सोचा भी नहीं होगा बेचारे बुद्ध ने कि ऐसा भी हो सकता है, कि आदमी इतना चालबाज और बेईमान है--अपने भिक्षुओं को कहा था कि तुम्हारे पात्र में जो भी मिल जाए, उसको स्वीकार कर लेना। इसलिए कहा था, नहीं तो फिर भिक्षु इशारा करने लगते हैं। मैं जैन मुनियों को जानता हूं, वो भिक्षा लेने जाते हैं तो इशारा करते हैं। ढंग से इशारा करते हैं--बोलते नहीं, बोलने की मनाई है। मांग नहीं सकते कि यह दो, मगर जो लेना हो, उस तरफ आंख कर देते हैं। थाली सजा कर रखी जाती है, जो लेना हो उस तरफ आंख कर देते हैं, जो न लेना हो उस तरफ सिर हिला देते हैं। इसकी मनाही है ही नहीं शास्त्र में कि आंख मत करना, सिर मत हिलाना! जो और लेना हो तो सिर और हिला देते हैं कि हां, थोड़ा और। अब गाजर का हलुआ है तो कहते हैं--थोड़ा और!
महावीर ने उनको समझाया था कि मांगना मत। क्योंकि मांगने लगो तुम तो तुम बोझ हो जाओगे। तो मांगते नहीं हैं, मुंह से नहीं बोलते, एक शब्द नहीं बोलते, मगर आदमी इतना होशियार है कि मांगने न मांगने का क्या सवाल है इशारे तो कर ही सकता है। इशारे के लिए तो मनाही की नहीं--वह महावीर भी चूक गए।
बौद्धों के शास्त्रों में तैंतीस हजार नियम हैं जो भिक्षु को पालन करना चाहिए। तैंतीस हजार! जिनकी संख्या भी इतनी है कि पूरे नियम भी याद नहीं रखे जा सकते। इतने नियम के बाद भी मांसाहार की तरकीब खोज ली। बुद्ध ने कहा था कि जो तुम्हारे पात्र में पड़ जाए वह ले लेना। रूखी-सूखी जो मिल जाए, यह मत कहना कि मैं तो पूड़ी लूंगा, कि मैं तो हलुआ लूंगा, कि मैं तो यह लूंगा।
एक दिन एक भिक्षु भिक्षा मांग कर आ रहा था और एक चील उड़ी और उसके मुंह से मांस का एक टुकड़ा उसके पात्र में गिर गया। अब यह बिलकुल संयोग की बात है। उसने सोचा, अब क्या करना! क्योंकि बुद्ध ने तो कहा कि जो पात्र में पड़ जाए। तब तक मांसाहार शुरू नहीं हुआ था बौद्धों में। उस भिक्षु ने जाकर बुद्ध को पूछा कि अब आप क्या कहते हैं? बुद्ध थोड़ी देर सोच में पड़े। बुद्ध ने सोचा कि यह कोई चील इस तरह का काम कोई रोज-रोज तो करेंगी नहीं, यह संयोग की बात है। सिर्फ इस कारण अगर मैं इतना कहूं कि तुम चुन सकते हो; जो तुम्हें न लेना हो, गलत तुम्हारे पात्र में पड़ जाए, छोड़ देना, तो बस उपद्रव शुरू हो जाएगा। फिर लोग हटा देंगे रूखी-सूखी रोटी, चुन लेंगे अच्छा-अच्छा, और इससे बहुत सा भोजन भी नष्ट होगा, लोगों पर बोझ भी पड़ेगा--और चील तो कोई रोज यह काम करेगी नहीं, तो अपवाद है, तो बुद्ध ने कहा, कोई फिकर नहीं, जो तुम्हारे पात्र में पड़ गया वह स्वीकार कर लो। उस दिन मांसाहार हुआ! फिर बात आई और गई हो गई।
बुद्ध के समाप्त हो जाने पर भिक्षुओं ने सोचा कि अब क्या करना? मांसाहार के बाबत क्या करना, क्योंकि मांसाहार हो चुका। एक भिक्षु ने तो मांसाहार कर लिया--और बुद्ध के सामने किया, बुद्ध की आज्ञा से किया। सवाल इतना ही है कि पात्र में जो पड़ जाए। तो बस, इशारे। एजेंटों ने खबर कर दी होगी। एजेंट तो होते ही हैं महात्माओं के, उन्होंने खबर कर दी होगी कि अगर भिक्षुओं के पात्रों में मांस डाला जा सकता है। और मांस डाला जाने लगा। और भिक्षु मांस को लेने लगे।
बुद्ध ने कहा था कि मांस भी बुरा नहीं है अगर मरे हुए जानवर का लिया जाए, क्योंकि उसमें हिंसा नहीं होती। बिलकुल तात्विक बात कही थी। मारने में हिंसा है। कोई जानवर मर ही गया है, उसका मांस लेने में कोई हिंसा नहीं है। इससे उन्होंने तरकीब निकाल ली। तो अब जापान में या चीन में तुम्हें होटलों के सामने तख्तियां लगी मिलेंगी--जैसे भारत में मिलेंगी, दुकानों पर लगा रहता है: ‘यहां शुद्ध घी बिकता है।’ पक्का समझ लेना कि यहां शुद्ध घी क्या, घी भी शायद ही बिकता हो। शुद्ध घी! घी काफी है, शुद्ध की क्या जरूरत? लेकिन शुद्ध लिखना जरूरी है, क्योंकि शुद्ध कहीं मिलता नहीं--चीन-जापान की होटलों में लिखा रहता है: यहां मरे हुए जानवरों का मांस ही पकाया जाता है। अब इतने जानवर कहां मरते हैं रोज? चीन की संख्या है अस्सी करोड़। इतने जानवर रोज कहां मरते हैं? और फिर चीन में अगर जानवर इतने रोज मरते हैं, तो हजारों जो कसाई खाने हैं वो किसलिए हैं? और चीन में तो सभी बौद्ध हैं। कोई गैर-बौद्ध तो है नहीं। जापान में भी सभी बौद्ध हैं, कोई गैर-बौद्ध तो है नहीं। तो कसाईखाने किसलिए हैं? मगर कसाईखानों में काटे जाते हैं जानवर और होटलों में बेचे जाते हैं। और होटलें लिख कर रखती हैं कि यहां मरे हुए जानवर का ही मांस मिलता है, बस वो सूत्र मिल गया बुद्ध में कि मरे जानवर का मांस खाने में क्या हिंसा है!
आदमी बहुत होशियार है। अगर तुम बाहर से चरित्र खोजोगे, तो तुम जैसा चाहोगे वैसा रास्ता निकाल लोगे। ऐसा रास्ता लोगों ने निकाल लिया है। सब तरह के रास्ते लोगों ने निकाल लिए हैं।
चरित्र तो भीतर से ही आ सकता है। संन्यास तो चरित्र की आत्यंतिक अवस्था है। अंतिम ऊंचाई, पराकाष्ठा, परम प्रकाश, परम सुगंध। यह तो केवल चैतन्य से ही संभव हो सकता है। यह तुम्हारे पास देखने की अंतर्दृष्टि होनी चाहिए: क्या करने योग्य है, क्या करने योग्य नहीं है। जैसे दीया जल रहा हो घर में, तो तुम दरवाजे से निकलते हो, टटोलते नहीं। दीया न जल रहा हो घर में, तो टटोलना भी पड़ता है, और कभी-कभी दीवाल से भी टकरा जाते हो, कभी फर्नीचर से भी टकरा जाते हो, कभी कोई सामान भी गिरा देते हो। ऐसे ही तुम्हारे भीतर दीया जल रहा हो तो दरवाजा दिखाई पड़ता है। वही दरवाजा चरित्र है।
मैं ऊपर से चरित्र थोपने के विरोध में हूं। पुराना संन्यास ऊपर से चरित्र को थोपता था। वह कहता था, ऐसा करो। मैं कहता हूं, ध्यान को जगाओ। फिर ध्यान से जो भी फलित हो, शुभ है। इसलिए मेरा जोर चरित्र पर बिलकुल नहीं है, बल्कि थोथे चरित्र के मैं विरोध में हूं, क्योंकि थोथे चरित्र के कारण आदमी ध्यान की तरफ मुड़ता ही नहीं। वह तो सोचता है, करना क्या, मैं तो चरित्रवान हो गया!
हमारे चरित्र भी बड़े अदभुत हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे को समझा रहा था कि व्यवसाय में हमेशा नीति का ध्यान रखना चाहिए। चरित्र बड़ा मूल्यवान है। जैसे, उदाहरण के लिए कल की ही बात है। एक आदमी सौ रुपये के एक नोट की जगह भूल से दो नोट दे गया, जो एक-दूसरे से चिपके हुए थे। अब नैतिक सवाल उठता है कि मैं अपने पार्टनर को बताऊं कि नहीं बताऊं? अब देख रहे हैं नैतिक सवाल! वह जो आदमी दे गया है, उसको बताऊं कि नहीं, यह सवाल तो उठता ही नहीं। अब सवाल यह उठता है कि अपने साझीदार को बताऊं कि नहीं बताऊं?
जब मुल्ला मरने लगा, अपने बेटे को कहा: आखिरी संदेश तुझे देता हूं। दो नियम का सदा पालन करना, ये व्यवसाय के आधार-स्तंभ हैं। यही चरित्र है, यही शील है व्यवसाय में। पहला कि जो वचन दो, उसे पूरा करना। और दूसरा कि कभी भूल कर किसी को वचन मत देना।
ढब्बू जी ने अपने जिगरी दोस्त चंदूलाल को बताया, गजब हो गया, यार! यही समझो कि सब कलयुग का प्रताप है। लोगों में नैतिकता तो नाममात्र भी नहीं रही। जानते हो, अभी जो मेहमान आए थे हमारे यहां, वे जनाब जाते समय हमारी खूबसूरत अटैची मार कर ले गए। बेईमानी की भी हद होती है, भाई!
चंदूलाल ने सहानुभूति जताते हुए कहा: राम-राम, राम-राम! यह बीसवीं सदी तो चरित्र के पतन की सदी है, दोस्त! दुख न करो! क्या वह अटैच
ी बहुत महंगी थी? क्या मालूम महंगी थी कि सस्ती, ढब्बू जी बोले, अपने को तो रेल के डिब्बे में पड़ी मिली थी।
अगर भीतर की आंख न हो तो यह होने ही वाला है। तुम्हें दुनिया भर का दुश्चरित्र व्यवहार दिखाई पड़ेगा। सिर्फ दीया तले अंधेरा रहेगा। सिर्फ तुम्हें तुम स्वयं दिखाई नहीं पड़ोगे। और सब दिखाई पड़ेगा। और तुम सबकी भूलें देख लोगे सिर्फ अपनी भूलें नहीं दिखाई पड़ेंगी। औरों की भूलें देखने में तो हम उत्सुक होते ही हैं। अपनी भूल देखने में उत्सुक नहीं होते। अपनी भूल से तो आघात लगता है। दूसरे की भूल को तो हम बड़ी करके देखते हैं। उसको बड़ी करके देखने में बड़ा रस आता है। उससे ऐसा लगता है कि अरे, इससे तो हम ही अच्छे! संसार भर की भूलें देख कर कि कलयुग है, अरे, पाप ही पाप है, राम-राम, राम-राम, दिल को बड़ी राहत मिलती है, कि हम ही एक सतयुगी। दुनिया भर के पाप इतने बड़े अगर कर लो तुम, तो स्वभावतः लगता है कि तुम सतयुगी हो।
महामहिम मटकानाथ ब्रह्मचारी ने बड़ा आश्रम खोल रखा था। पांच सौ साधु और पांच सौ साध्वियां तपश्चर्या और कठिन योग-साधना करते हुए सच्चे ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करते थे। धीरे-धीरे उनके आश्रम की ख्याति कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैल गई। एक बार नई दिल्ली में आयोजित सर्व-धर्म-सम्मेलन में उनके आश्रम के एक वक्ता को भी निमंत्रण मिला। ब्रह्मचारी जी ने साध्वियों की प्रधान निर्मला देवी से सलाह-मशविरा कर आश्रम के नाम की धूम मचाने हेतु आश्रम की अल्पायु किंतु सर्वाधिक प्रतिभाशाली साध्वी सीतामणि को भेजने का निश्चय किया। वह अभी मात्र बारह वर्ष की ही थी, लेकिन उसे सारे उपनिषद और चारों वेद कंठस्थ थे। चूंकि वह पहली ही बार आश्रम के बाहर की दुनिया में कदम रख रही थी, इसलिए प्रधान साध्वी निर्मलादेवी ने उसे अकेले में बुला कर कुछ बातें समझा देना उचित समझा। उन्होंने कहा: बेटी सीतामणि, अभी तू अल्पायु है, अतः कुछ निर्देशों का खयाल रखना। बाहर का कलुषित जगत और कलयुग का समय हमारे पवित्र आश्रम से बिलकुल भिन्न है। वहां पुरुष रहते हैं जो बड़े मायावी होते हैं। वे स्त्रियों को मीठी-मीठी बातों द्वारा फुसला कर मौका पाते ही किसी एकांत स्थल में ले जाते हैं। सीतामणि ध्यानपूर्वक सुनने लगी। प्रधान साध्वी कहती गई: इन कामुक युवकों के जाल से बचने की जी-जान से कोशिश करना, बेटी! वे बड़े लुभावने होते हैं। सुनसान कमरे में ले जाकर वे प्रकाश बुझा देते हैं। और फिर सम्मोहित करके धीरे-धीरे नारी के वस्त्र उतारने लगते हैं। सीतामणि के कान खड़े हो गए, उसकी श्वासें तेज चलने लगीं। निर्मला देवी ने आगे कहा, तब वे दुष्ट स्त्रियों के साथ ऐसे घृणित कृत्य करते हैं कि उनका वर्णन करने में मेरी जीभ लड़खड़ाने लगती है। नारी की इज्जत लूट कर वे नीच दस रुपये का एक नोट उन्हें देकर वहां से भगा देते हैं।
दस रुपये! यह सुन कर तो आश्चर्य से सीतामणि की आंखें फटी रह गईं। उसने बड़ी उत्सुकता से प्रश्न किया, हे निर्मला देवी, वे पापी पुरुष अंत में दस रुपये का नोट क्यों थमा देते हैं? उत्तर मिला, तुम नहीं समझोगी, बेटी, वे संसारी धूर्त जो न करें सो कम है। गजब की बात है, परम पूज्य माता जी--भोली-भाली सीतामणि बोली--समझ नहीं आता कि वे लोग दस रुपये क्यों थमा देते हैं, जब कि हमारे आश्रम के साधु तो मात्र एक संतरा देकर ही भगा देते हैं। और ब्रह्मचारी महाराज, वे तो एक संतरा तक नहीं देते; कहते हैं, अभी तू बहुत छोटी है।
ऊपर से थोपोगे तो पाखंड ही पैदा होने वाला है।
पुराना संन्यास शुद्ध पाखंड था। अन्यथा हो ही नहीं सकता था। उसके भीतर कुछ और, बाहर कुछ और। मेरा संन्यास जैसा भीतर, वैसा बाहर। मेरा संन्यासी पाखंडी नहीं हो सकता। उसका उपाय ही नहीं है। क्योंकि मैं उसे कोई नियम नहीं दे रहा हूं। क्योंकि मैं उसे कुछ आवरण नहीं दे रहा हूं। क्योंकि मैं उसे कुछ आचरण नहीं दे रहा हूं। इसलिए उसके पाखंडी होने का कोई उपाय नहीं है। वह धूर्त नहीं हो सकता। धूर्त होने की उसे कोई जरूरत नहीं है। अगर उसे जीवन जीना है, जैसा जीना है, मैं उसे कहता हूं वैसा ही जीवन तू जी, बस इतना ही खयाल रख, ध्यानपूर्वक जी! और अगर ध्यान तुझे मुक्त करा सके व्यर्थता से, तो ठीक। अगर न करा सके, तो ठीक। जो असार है, ध्यान उससे मुक्त करा ही देगा। और जो असार नहीं है, ध्यान उससे मुक्त नहीं कराएगा, उसको और मजबूत कर देगा। सार-असार की कसौटी ध्यान है।
पुराना संन्यास ध्यान तो भूल ही गया।
मेरे पास पुराने संन्यासी आते हैं--जैन, हिंदू, बौद्ध--मैं उनसे पूछता हूं कि तुम तीस, बीस, पच्चीस साल से संन्यासी हो और अब तुम पूछने आए कि ध्यान कैसे करें? तुम संन्यासी कैसे हुए? ध्यान तो उन्हें किसी ने बताया ही नहीं। ध्यान की तो जैसे बात ही नहीं है। और ध्यान के नाम पर जो बताया जाता है, वह बिलकुल थोथा है, कि बैठे राम-राम जपो। अब राम-राम दोहराने से क्या होगा? थोड़ी बहुत बुद्धि होगी, वह भी कुंठित हो जाएगी। अगर राम-राम कोई दोहराता रहेगा, दोहराता ही रहेगा, दोहराता ही रहेगा, तो ज्यादा से ज्यादा इससे एक ही बात हो सकती है कि अच्छी नींद आ जाए। क्योंकि मन थक जाए। और थकने से नींद आती है। और बकवास तुम लगाए रखो: राम-राम, राम-राम, और मन को भागने का कोई उपाय न मिले, तो वह नींद में सरक जाए। यह तो पुरानी विधि है, स्त्रियां जानती हैं, बच्चों को सुलाने के लिए यही तो उपयोग करती हैं वे। राजा बेटा, सो जा; राजा बेटा, सो जा! यह मंत्र है! राजा बेटा कुनमुनाता है, करवट बदलता है, मगर माताराम बिलकुल उसकी छाती पर बैठी हैं कि राजा बेटा, सो जा, थोड़ी-बहुत देर वह कोशिश करता है, हाथ-पैर तड़फड़ाता है, उठने की कोशिश करता है, फिर जब देखता है कोई उपाय नहीं, माताराम छोड़ेंगी नहीं, सुला कर ही मानेंगी, और राजा बेटा, सो जा, राजा बेटा, सो जा, सुनते-सुनते, सुनते-सुनते न भी हो राजा बेटा, तो भी सो जाता है। यह तो पतिदेव पर प्रयोग करो तो भी काम आएगा कि राजा बेटा, सो जा, राजा बेटा, सो जा। नहीं भी आएगी नींद तो भी पति सो जाएगा।
मुल्ला नसरुद्दीन को नींद नहीं आती थी सब डॉक्टरों को हरा दिया, सब चिकित्सकों को हरा दिया। होम्योपैथ आए, आयुर्वेदिक आए, हकीम आए, नेचरोपैथ आए, उरलीकांचन ले गए, मगर सबको हरा दिया। उसके लड़के बड़े परेशान। आखिर एक हिप्नोटिस्ट को, एक सम्मोहनविद को लाए। वह आखिरी उपाय था! सम्मोहनविद ने कहा कि कोई फिकर न करो, मैंने अच्छे-अच्छों को सुला दिया है। अब सम्मोहनविद आया, उसने कमरे के लाइट बुझवा दिए, नसरुद्दीन को कहा लेट जाओ, हाथ-पैर ढीले छोड़ दो, समझो कि नींद आ रही। आ रही, आ रही, आ रही, नींद आ रही, पलकें भारी हो रही हैं, पलकें भारी हो गईं, हाथ-पैर बिलकुल सुस्त हो गए, गहन नींद उतर रही है... वह कहता ही रहा, कहता ही रहा, कहता ही रहा। नसरुद्दीन सो गया, एकदम घुर्राटे लेने लगा। लड़के तो बड़े प्रसन्न हुए नसरुद्दीन के। उन्होंने हिप्नोटिस्ट को बहुत धन्यवाद दिया, उसको दुगनी फीस दी, उसे बाहर छोड़ कर लौटे। जैसे ही भीतर आए, नसरुद्दीन ने एक आंख खोली और कहा कि वह हरामजादा गया कि नहीं? मेरी जान खा गया कि आ रही, आ रही, आ रही! न कोई आया, न कोई गया। पलकें भारी हो रही हैं, भारी हो रही हैं। मैंने देखा यह दुष्ट जाएगा ही नहीं, सो मैं बन कर घुर्राटे लेने लगा कि इससे छुटकारा तो हो, नींद आए कि न आए!
ऐसे ही तुम्हारे मन हैं। राम-राम, राम-राम, या लगे रहो अल्लाह-अल्लाह, या जो तुम्हारी मर्जी। दोहराते रहोगे, दोहराते रहोगे, भीतर तुम्हारा मन कहेगा: हरामजादा मानता ही नहीं, बके ही जा रहा है, सो जाओ।
तुम्हारे मंत्रों से सिर्फ तंद्रा पैदा होती है और कुछ भी नहीं होता। मंत्रों में ध्यान नहीं है, निद्रा है। नींद आ जाएगी। और नींद कोई बुरी चीज नहीं है, आ जाए तो अच्छी चीज है। सुबह तुम थोड़ा ताजा अनुभव करोगे। मगर इससे कोई आत्मानुभव नहीं हो जाएगा, कोई भीतर की रोशनी नहीं जल जाएगी, कोई भीतर की मशाल नहीं जल उठेगी। भीतर की मशाल तो जलती है निर्विचार से, निर्विकल्पता से।
मेरा संन्यास है निर्विचार, निर्विकल्प की साधना। बाहर का मैं कोई भी आडंबर तुम्हें नहीं देना चाहता! ये गैरिक वस्त्र दिए हैं, वे भी दो कारणों से। एक तो कि गैरिक वस्त्रों को पुराने संन्यासियों ने बहुत बदनाम कर दिया, सो गैरिक वस्त्रों को उस बदनामी से मैं मुक्त करना चाहता हूं। दूसरे, ताकि गैरिक वस्त्रों के कारण तुम्हें सतत याद रहे, स्मरण रहे। यह तो केवल आलंबन है, एक खूंटी की तरह, निमित्त। और इसका परिणाम होता है।
एक मित्र मेरे पास आए और उन्होंने कहा कि बड़ी मुश्किल में डाल दिया आपने। मैं सिनेमा का शौकीन था, अब सिनेमा नहीं जा सकता। अब कल की ही बात है, ‘क्यू’ में खड़ा था, अच्छी पिक्चर लगी है, एक आदमी आया, एकदम साष्टांग मेरे पैरों पर गिर पड़ा और कहा: महात्मा जी, आप यहां कहां खड़े हैं? उससे मैंने पूछा: क्या बात है, भाई? मैं तो समझा कोई धार्मिक सभा की ‘क्यू’ लगी है--कहना ही पड़ा मुझे! अरे, उसने कहा: धार्मिक सभा नहीं, यहां फिल्म लगी है, यह आपका काम नहीं है। सो मन मार कर मुझे घर लौटना पड़ा। अब मैं डरता हूं जाने से कि कहीं कोई फिर न मिल जाए।
एक मित्र ने संन्यास लिया, वे शराबी हैं। कहने लगे, मैं शराबी हूं। मैंने कहा: रहो; कौन नहीं है शराबी? हां, तरह-तरह की शराबें हैं, अलग-अलग ढंग की शराबें हैं। कोई मद की पीता है, कोई पद की पीता है, तुम अंगूर की पीते हो, कुछ बुरा नहीं, फलाहार है। शाकाहारी हो। कम से कम मोरार जी देसाई से तो भले हो। कम से कम स्वमूत्र तो नहीं पीते। चलो, अंगूर की ही ढली पीते हो, कोई हर्जा नहीं, पीओ। पर उन्होंने कहा: संन्यास आप देने को राजी हैं! मैंने कहा: मैं किसी को छोड़ता ही नहीं संन्यास देने से।
पंद्रह-बीस दिन बाद आकर बोले, कि अब मैं समझा कि आप क्यों किसी को भी संन्यास दे देते हैं। अब मुसीबत में पड़ा। अब शराबघर नहीं जा सकता। खुद शराबघर का मालिक उठ कर मेरे चरण छूता है। जब वह चरण छूता है तो मुझे आशीर्वाद देना पड़ता है। करना भी क्या! वह पूछता है, कैसे आए, तो मैं कहता हूं कि ऐसे ही आशीर्वाद देने चला आया--और वापस।
गैरिक वस्त्र तुम्हें याद दिलाए रखेंगे, बस, कि तुम संन्यासी हो। तुमने अंतर-खोज का व्रत-नियम लिया। तुमने अंतर-खोज की कसम खाई। तुम एक अभियान पर निकले हो, तुमने एक यात्रा शुरू की है, बस, इतना ही। अन्यथा मैं बाहर का तुम्हें कोई आवरण नहीं दे रहा हूं। एक माला दे दी है, जिसमें मेरा चित्र लगा हुआ है; वह भी तुम्हें बदनाम करवाने को। वह भी सिर्फ इसलिए कि लोग देखते ही समझ जाएं कि यह आया! अब तो सारी दुनिया में, कहीं भी तुम जाओ, बस माला देख कर लोग एकदम सावधान हो जाते हैं। कि सावधान, यह आदमी खतरनाक है! तुमसे पूछेंगे कि तुम्हें क्या हो गया? इससे बात चल पड़ती है। इससे तुम्हें मेरी भी चर्चा करनी ही पड़ती है। और इस चर्चा में कई लोग आए हैं। इस चर्चा के कारण कई लोग आए हैं। तुम्हारी मस्ती, तुम्हारा आनंद देख कर कई लोग आए हैं। कई लोग उत्सुकता से ही आ गए हैं कि देखें मामला क्या है? हवाई जहाज पर संन्यासी मिल जाते हैं किसी को, वह सोचता है कि चलो, एक चक्कर हम भी मार आएं, देखें क्या मामला है? जब इतने लोग पागल हो रहे हैं, तो कुछ न कुछ बात होगी! जब इतने लोग दीवाने होने को राजी हैं, तो अकारण नहीं हो सकता।
तो तुम पहचाने जा सको कि तुम मेरे पागलों में से एक हो, कि मेरे दीवानों में से एक हो, इसलिए बाहर का थोड़ा सा उपाय दिया है, बाकी यह कोई आचरण नहीं है, कोई चरित्र नहीं है। जोर तो सिर्फ एक बात पर है: ध्यान। उतना सध जाए तो सब सध गया। इक साधे सब सधे। वही एक ध्यान। भीतर निर्विचार होने लगो, भीतर धीरे-धीरे साक्षीभाव को आने दो, भीतर देखो न तुम देह हो, न तुम मन हो, न तुम विचार, न वासना और धीरे-धीरे एक बात तुम्हारे सामने साफ हो जाए कि तुम सिर्फ साक्षी हो कि संन्यास फलित हुआ। संन्यास उस दिन फलित नहीं होता, जिस दिन तुम संन्यास लेते हो, उस दिन तो केवल औपचारिक रूप से शुरुआत होती है। संन्यास उस दिन फलित होता है, जिस दिन तुम साक्षी का अनुभव कर लेते हो।

आखिरी प्रश्न:
मैं संन्यास लेने से डरता हूं। ऐसे ही बहुत सी मुसीबतें हैं, भगवान, अब संन्यास की मुसीबत लेने से जी डरे तो आश्चर्य नहीं। मार्ग-दर्शन दें!
सागरमल! जब ऐसे ही बहुत मुसीबतें हैं तो एक और सही! इतनी मुसीबतें लीं, बिना मुझसे पूछे लीं--और जहां तक मैं समझता हूं, बिना किसी और से पूछे लीं--तो अब यह मुसीबत भी क्या पूछ कर लेते हो! इतना ही मैं कह सकता हूं कि संन्यास इतनी बड़ी मुसीबत है कि बाकी सब मुसीबतें छोटी पड़ जाएंगी, तुम घबड़ाओ मत! और छोटी मुसीबतों से छुटकारे का एक ही उपाय है: बड़ी मुसीबत ले लो। तो छोटी अपने आप भूल जाती है। छोटी इतनी छोटी हो जाती है। मैं तो नहीं देखता कि तुम्हारी जिंदगी में सिवाय मुसीबतों के और क्या है! हालांकि छोटी-छोटी मुसीबतें हैं। क्योंकि तुम्हारी छोटी-छोटी ही आकांक्षाएं हैं! छोटी-छोटी अभीप्साएं हैं। संन्यास तो बड़ी मुसीबत है! क्योंकि बड़ी आकांक्षा है, बड़ी अभीप्सा है। परमात्मा को पाने की प्यास। इससे बड़ी तो कोई और मुसीबत नहीं हो सकती।
एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ट्रेन से सफर कर रहा था: और उसने बगैर किसी कारण के अपने छोटे बच्चे की पिटाई कर दी। एक बार, दो बार, तीन बार। सामने बैठी हुई महिला से जब यह न देखा गया तो वह बोली कि देखो जी, अब यदि तुमने एक भी चांटा इस बच्चे को मारा तो मैं तुम्हें मुसीबत में डाल दूंगी।
मुल्ला ने उसे देखा और कहा: बाई, तू कौन सी मुसीबत में मुझे डालेगी! अरे, मैं पहले से ही इतना परेशान हूं। सुन! अभी पिछले माह ही मेरे पिता की टी.बी. से मृत्यु हो गई और हम लोग यहां दिल्ली से जा रहे हैं जहां मेरी सास मृत्युशय्या पर पड़ी है, मैं खुद कैंसर का मरीज हूं, रेलवे प्लेटफार्म पर मेरी पत्नी मुझसे बिछुड़ गई है, इस छोटे बच्चे ने खिड़की में अपनी अंगुली कुचल ली है, मंझले लड़के ने यात्रा की टिकटें चबा डाली हैं, और अभी-अभी मुझे पता चला है कि हम लोग गलत ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं--अब तू और कौन सी मुसीबत में डाल सकती है!
मैं डालूंगा भी तो तुम्हें और कौन सी मुसीबत में डालूंगा! गलत ट्रेन में बैठे हो, टिकट कब का मंझला बेटा चबा चुका है, पत्नी कहां बिछुड़ गई, पता नहीं--और डरे हुए हो कि कहीं मिल न जाए--सास मरणशय्या पर पड़ी है--और भयभीत हो कि कहीं बच न जाए!
संन्यास तुम्हें क्या मुसीबत में डाल देगा? हां, थोड़ी जग-हंसाई होगी। सो सबकी हुई। मीरा की हुई, कबीर की हुई, गुलाल की हुई। हां, लोकलाज खोनी पड़ेगी। सो मीरा ने खोई, सो दादू ने खोई। सो नानक ने खोई। लोकलाज में रखा भी क्या है? बचा कर भी क्या करोगे? मूल्य क्या है उसका? हां, लोग दीवाना समझेंगे, परवाना समझेंगे, सो ठीक ही समझते हैं, मैं दीवानगी ही सिखा रहा हूं। और संन्यास केवल शुरू में ही मुसीबत है, पहले कदम पर ही मुसीबत है, जैसे ही तुम्हारे भीतर ज्योति का, ज्योतिर्मय का आविर्भाव शुरू होता है, वैसे ही आनंद की वर्षा होने लगती है। झरत दसहुं दिस मोती! जैसे ही तुम्हारे भीतर शून्य निराकार का अवतरण होना शुरू हो जाता है, सब मुसीबतें ऐसे भाग जाती हैं जैसे सूरज के ऊगने पर तारे विदा हो जाते हैं आकाश से, खोजे नहीं मिलते। जैसे ही तुम्हारे भीतर समाधि का स्वर बजेगा, वैसे ही मुसीबतें ऐसे उड़ जाएंगी जैसे सूर्य के ऊगने पर सुबह ओस के कण वाष्पीभूत हो जाते हैं।
लेकिन पहले तो मुसीबत मालूम होगी।
मगर मैं कहता हूं, यह मुसीबत लेने योग्य है। यह मुसीबत प्यारी है, मधुर है, अनंत संभावनाओं से भरी है। और तुमने दो कौड़ी की मुसीबतें ले लीं जिनमें कोई संभावना नहीं हैं और बिना पूछे ले लीं--और इस मुसीबत के लिए सोच-विचार कर रहे हो! छोड़ो सोच-विचार। क्योंकि संन्यास अंततः सोच-विचार छोड़ना ही है, उसका नाम ही संन्यास है। शुरुआत ही सोच-विचार छोड़ कर करो।
शुरू से ही, पहले कदम पर ही निर्णय लेकर मत संन्यास लो। सब तरह से सोच कर, विचार कर, गणित बिठा कर संन्यास मत लो अन्यथा चूक जाओगे। यह छलांग है। ऐसी छलांग जैसे परवाना आता और शमा पर जल मरता। मगर इस मृत्यु के पीछे पुनर्जन्म है। इस जन्म के लिए यह मृत्यु जरूरी है।
संन्यास तो सूली है। पर ध्यान रहे, सूली ऊपर सेज पिया की। जैसे ही तुम इस सूली से पार हुए कि परमात्मा तुम्हारे स्वागत के लिए तैयार खड़ा है।
घबड़ाओ मत, सागरमल! बूंद घबड़ाती है सागर होने से। मगर बूंद सागर हो ही तब सकती है जब सागर में अपने को खोने को राजी हो जाए। मिटो! मिटो ताकि हो सको! मरो संन्यास में ताकि सत्य में जन्म पा सको! खो जाओ अहंकार की तरह ताकि परमात्मा की तरह तुम्हारा आविर्भाव संभव हो सके!
तुम परमात्मा होने को पैदा हुए हो और संन्यास के बिना यह संभव नहीं है। संन्यास के बिना तुम्हारी नियति पूरी नहीं होगी, वसंत नहीं आएगा, मधुमास नहीं आएगा, तुम्हारा फूल नहीं खिलेगा; तुम बिना खिले ही विदा हो जाओगे। इसके पहले कि मृत्यु आए, संन्यास आने दो ताकि फिर मरने की कोई जरूरत न रह जाए। जो संन्यास में मरा, फिर उसे मरने की कोई जरूरत नहीं रह जाती, क्योंकि वह अमृत को जान लेता है।

आज इतना ही।

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