GULAL

Jharat Dashahun Dis Moti 03

Third Discourse from the series of 21 discourses - Jharat Dashahun Dis Moti by Osho. These discourses were given during JAN 21 - FEB 10 1980.
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कोउ नहिं कइल मोरे मन कै बुझरिया।
घरि घरि पल पल छिन छिन डोलत-डालत साफ अंगरिया।।
सुर नर मुनि डहकत सब कारन, अपनी अपनी बेरिया।।
सबै नचावत कोउ नहिं पावत, मारत मुंह मुंह मरिया।।
अब की बेर सुनो नर मूढ़ो, बहुरि न ल्यो अवतरिया।।
कह गुलाल सतगुरु बलिहारी, भवसिंधु अगम गम तरिया।।

तन में राम और कित जाय। घर बैठल भेटल रघुराय।।
जोगि जती बहु भेष बनावै। आपन मनुवां नहिं समुझावै।।
पूजहिं पत्थल जल को ध्यान। खोजत धूरहिं कहत पिसान।।
आसा तृस्ना करै न थीर। दुविधा-मातल फिरत सरीर।।
लोक पुजावहिं घर-घर धाय। दोजख कारन भिस्त गंवाय।।
सुर नर नाग मनुष औतार। बिनु हरिभजन न पावहिं पार।
कारन धै धै रहत बुलाय। तातें फिर फिर नरक समाय।।
अबकी बेर जो जानहु भाई। अवधि बिते कछु हाथ न आई।।
सदा सुखद निज जानहु राम। कह गुलाल न तौ जमपुर धाम।।
झरत दसहुं दिस मोती!
बस आंख की कमी है, मोती झर ही रहे हैं। कान बहरे हैं, उसकी वीणा बज ही रही है। शाश्वत। एक क्षण को रुकती नहीं। यह सारा जीवन उसके ही स्वरों से, उसके ही आनंद से, उसके ही उत्सव से रंगीन है, मदमस्त है। एक आदमी है कि बाहर पड़ गया है इस उत्सव के। पड़ जाने का कारण भी है! क्योंकि एक आदमी ही है जो होशपूर्वक इस उत्सव का आनंद ले सकता है। वृक्ष भी सम्मिलित हैं; पौधे, पशु-पक्षी; नदी-नद-पहाड़, तारे, वे सब सम्मिलित हैं उत्सव में, लेकिन उनका सम्मिलित होना उनकी स्वेच्छा से नहीं है। वे चाहें तो भी इस उत्सव से बाहर नहीं हो सकते। यह उत्सव उनके लिए अनिवार्य है। मनुष्य की चेतना स्वतंत्र है। चुनाव की क्षमता है। चाहो तो देखो: झरत दसहुं दिस मोती: चाहो, तो मत देखो। लेकिन तुम चाहो या न चाहो, तुम देखो या न देखो, मोती तो झरते ही जा रहे हैं।
देखोगे तो भर लोगे अपनी झोली, न देखोगे तो रह जाओगे रिक्त और खाली। देखोगे तो धन्यवाद से भर जाओगे। धन्यवाद का भाव ही धर्म है। देखोगे तो अनुग्रह में डूब जाओगे। अनुग्रह प्रार्थना है, पूजा है, आराधना है। न देखोगे, तो शिकायत और शिकवे हैं; संदेह, हजार-हजार संदेह। न देखोगे तो कांटों ही कांटों में चुभ जाओगे। अंधों को कांटे ही मिलते हैं। आंख वाले फूल चुन लेते हैं। और आंखें जितनी गहरी होती हैं उतने ही धीरे-धीरे कांटे भी फूल हो जाते हैं। आंखें न हों तो फूल कांटे हो जाते हैं। तुम्हारी आंख का सारा खेल है।
और तुम पौधे नहीं हो, पशु नहीं हो, पक्षी नहीं हो, इसलिए अनिवार्यरूपेण तुम इस उत्सव के अंग नहीं हो। निमंत्रण है, चाहो स्वीकार कर लो, चाहो इनकार कर दो। स्वीकार कर सको तो तुम्हारे प्राणों के अंतर्तम से पुकार उठने लगे। फिर न मंदिर जाने की जरूरत है न मस्जिद, न गिरजा न गुरुद्वारा। जहां बैठ कर यह पुकार उठेगी, वहीं मंदिर, वहीं मस्जिद, वहीं गिरजा, वहीं गुरुद्वारा।
पूनम बन उतरो!
भावों की कोमल पाटी पर--

शाश्वत रंग भरो!!
पूनम बन उतरो!!!

आतप से झुलसा तन-सरवर,
झरते ज्वालाओं के निर्झर;
अधरों पर परितोष अधर धर,

युग की तृषा हरो!
पूनम बन उतरो!!

मुक्त-प्राण निष्प्राण नियम-यम,
गंध-विधुर प्राणों का सम्भ्रम;
निष्फल हों शूलों के श्रम-क्रम,

साधक सिद्ध करो!
पूनम बन उतरो!!

विकसित हों साधों के शतदल,
मुकुलित परिमल के पाटल-दल;
जीवन के सितप्रभ, प्रण-उज्ज्वल,

ज्योतिर्मयि विचरो!
पूनम बन उतरो!!
जैसे ही तुम देखने लगो, पुकार उठती है: अहर्निश उतरो, पूनम बन उतरो! और परमात्मा उतरता है। उतर ही रहा है। सिर्फ पुकार की कमी है, इसलिए तुम संयुक्त नहीं हो पाते।
गुलाल के इन सूत्रों को हृदयंगम करो--
कोउ नहिं कइल मोरे मन कै बुझरिया।
कोई नहीं मेरे मन को बुझा सका। कोई नहीं मेरे मन की दहकती अंगार को बुझा सका। कोई नहीं मेरे मन के समाधान को दे सका। कोई दे भी नहीं सकता। और हम सब इसी आशा में हैं कि कोई दे देगा। तुम्हें खोजना होगा। मिलता है, जरूर मिलता है समाधान, पर खोज से मिलता है, उधार नहीं। न गीता दे सकती है, न कुरान दे सकता; न बुद्ध दे सकते, न महावीर दे सकते; न मैं दे सकता, न कोई और दे सकता। काश, कोई दूसरा दे सकता तो बात बड़ी सरल हो जाती! धर्म का कोई शिक्षण होता ही नहीं। विज्ञान का शिक्षण हो सकता है, धर्म का शिक्षण नहीं होता। क्योंकि विज्ञान दूसरा तुम्हें दे सकता है। विज्ञान उधार है, बासा है। धर्म सदा ताजा है।
अलबर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता के सिद्धांत को एक बार खोज लिया, अब हर आदमी को बार-बार खोजने की जरूरत नहीं--कोई पागल है जो उसे बार-बार खोजे! आइंस्टीन ने खोज लिया, सबका हो गया। अब बस थोड़ा सा समझ लो, पढ़ लो, कोई भी जो जानता हो समझा दे कि सिद्धांत तुम्हारा हो गया। लेकिन बुद्ध ने जो खोजा, वह इस तरह सबका नहीं होता। महावीर ने भी खोजा, सबका नहीं होता। जीसस ने खोजा, मोहम्मद ने खोजा, सबका नहीं होता। कबीर ने, नानक ने, गुलाल ने, अनेक-अनेक ज्योतिर्मय लोगों ने खोजा उसे, पाया उसे, वे भर गए अनाहत के नाद से, पर बड़ी असमर्थता है, सिर्फ तुम्हें पुकार सकते हैं, तुम्हें आवाहन दे सकते हैं, तुम्हें चुनौती दे सकते हैं, लेकिन तुम्हारे चित्त के समाधान को तुम्हीं को खोजना होगा। धर्म की यह विशिष्टता है, यह उसकी गरिमा भी है, गौरव भी कि वह बासा नहीं होता। फिर-फिर खोजना होता है, ताजा ही पाना होता है।
कोउ नहिं कइल मोरे मन कै बुझरिया।
लेकिन जब भी कोई खोजने निकलता है तो इसी आशा में कि कोई मेरे मन की समस्याओं को सुलझा देगा, कोई मेरे उलझाव मिटा देगा, कोई मेरी अड़चनें साफ कर देगा, कोई मेरे द्वंद्व, मेरी दुविधाएं पोंछ देगा; कोई कर देगा मेरे मन के दर्पण को साफ, कोई मेरी आंखों से परदे काट देगा, इस आशा में खोजने निकलता है व्यक्ति। यह स्वाभाविक भी है। क्योंकि और सब चीजों के संबंध में दूसरों की सलाहें काम आ जाती हैं। बीमार हो तो चिकित्सक के पास चले जाते हो। वह विशेषज्ञ है, वह तुम्हारी बीमारी का निदान कर देता है, औषधि का भी निर्देश दे देता है, बात खतम हो गई। तुम्हें चिंता नहीं करनी पड़ती है बीमारी की, निदान की, औषधि की। विशेषज्ञ हैं बाहर के जगत में। यंत्र बिगड़ जाए, विशेषज्ञ हैं। चाहे विशेषज्ञ थोड़ा सा ही करे!
मैंने सुना है कि एक बहुत बड़ी फैक्टरी, ऑटोमैटिक फैक्टरी, नई-नई डाली गई, एक दिन चली और दूसरे दिन बंद हो गई। बहुत कोशिश की मालिकों ने, मगर कुछ उपाय न बना। नये-नये यंत्र थे, अत्याधुनिक थे, अभी-अभी खोजे गए थे। तो खबर करनी पड़ी जहां से बन कर आया था पूरा का पूरा यंत्रजाल। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ हम भेज सकते हैं। विशेषज्ञ आया, उसने एक नजर डाली, उसने कहा दस हजार डालर मेरी फीस है। फीस थोड़ी ज्यादा मालूम पड़ी। दस हजार डालर मतलब एक लाख रुपये! मगर फैक्टरी बंद पड़ी रहे तो लाखों का रोज नुकसान हो रहा था। मालिक राजी हुए, उन्होंने कहा कि ठीक करो, दस हजार लेना। उसने कुछ भी न किया। उसने जरा पेंचकस लिया और कहीं कुछ ढीला था, उसको कस दिया। फैक्टरी चल पड़ी। मालिक खड़ा देख रहा था और उसने कहा, यह तो हद हो गई, जरा से पेंच के कसने के दस हजार डालर! उस विशेषज्ञ ने कहा कि पेंच को कसने के दाम नहीं ले रहा हूं, कहां पेंच ढीला है, इसको जानने का; कहां पेंच कसना है, इसको जानने के पैसे ले रहा हूं। पेंच तो कोई भी कस देता। लेकिन किसी के भी कसने से यह यंत्र चलने वाला नहीं था। पूरा जीवन इस यंत्र को समझने में लगाया है, उसके दाम ले रहा हूं। यह तो मैं भी जानता हूं कि जरा सा पेंच कसा, यह दो पैसे का काम है, इसके लिए दस हजार मांगना ठीक नहीं मालूम पड़ता। मगर कहां कसना, कितना कसना--वह मैं जानता हूं!
बाहर के जगत में विशेषज्ञ होता है। लेकिन भीतर के जगत में कोई विशेषज्ञ नहीं होता। भीतर के जगत में कोई विशेषज्ञ काम नहीं आता।
गुलाल कहते हैं:
कोउ नहिं कइल...
गया बहुत जगह, द्वार कितने खटखटाए...
कोउ नहिं कइल मोरे मन कै बुझरिया।
लेकिन कोई ऐसी बात कह न सका, कोई ऐसा सुझाव-सलाह दे न सका, जिससे मेरे मन की दुविधाओं, मन की समस्याओं का अंत हो जाता। कि मुझे समाधान मिल जाता। कि मैं तृप्त हो जाता। कि मेरी बेचैनी कट जाती। कि मैं मुक्त हो जाता मन के जाल से।
यह कोई कर ही नहीं सकता।
धर्म के जगत में विशेषज्ञ नहीं होते, प्रबुद्ध पुरुष होते हैं। उनके पास बैठ कर तुम इशारे समझ सकते हो। मगर इशारे समझना तुम्हें ही होते हैं। उनके पास बैठ कर तुम उनके रंग में रंग सकते हो। मगर रंगना तुम्हें ही होता है। उनके पास बैठ कर तुम चलना सीख सकते हो। मगर चलना तुम्हें ही होता है। उनके पास बैठ कर तुम अपने भीतर के दीये को जलाने की कला सीख सकते हो। मगर सीखनी तुम्हें ही होती है। सब करना तुम्हारा है। सदगुरु तो केवल एक उपस्थिति मात्र है, जिसकी उपस्थिति में तुम्हारे भीतर सोए हुए तत्त्व जागने लगें। जैसे सुबह हो जाए और फूल खिल जाएं। कोई सूरज एक-एक फूल को आकर खिलाता नहीं! सुबह हो गई और पक्षी गीत गाने लगे। कोई सूरज एक-एक पक्षी के कंठ को आकर गुदगुदाता नहीं! सुबह हो गई और रात भर सोए हुए लोग जगने लगे। सूरज एक-एक द्वार पर आकर दस्तक देता नहीं कि उठो भाई, सुबह हो गई, कि अब कब तक सोए रहोगे! नहीं, सूरज की मौजूदगी में कुछ घटता है। लेकिन उन्हीं को घटता है जो घटाने के लिए राजी हैं। नहीं तो सूरज भी निकल आता है, बहुत से लोग तो सोए ही पड़े रहते हैं। सच तो यह है, कुछ लोगों को तभी नींद लगती है जब सूरज निकलता है। तब वे और कंबल ओढ़ कर सो जाते हैं।
विंस्टीन चर्चिल ने कहा है कि मैं जिंदगी में एक बार सुबह जल्दी उठा। क्योंकि बार-बार सुना, पढ़ा कि सुबह का मुहूर्त बड़ा सुंदर। एक बार ही उठा... वह तो उठता ही दस बजे था... और एक ही बार उठ कर जो दुख पाया, फिर दुबारा वह भूल नहीं की। सुबह उठ तो आया, लेकिन सुबह से ही नींद पीछा करने लगी। जिंदगी भर की आदत। किसी चीज में मन ही न लगे, झपकियां आएं। चाय की टेबल पर पहले ही पहुंच गया। बैठ कर आधा घंटा राह देखी तब चाय आई। तब तक इतना झल्ला चुका था कि चाय पीने का मजा भी खराब हो गया। दफ्तर जाने के लिए... युद्ध के दिन थे, पेट्रोल की कमी थी, बस से ही जाना होता था... दफ्तर जाने के लिए बस के लिए जाकर खड़ा हो गया आधे घंटे पहले ही से, वहां कोई था ही नहीं। न बस, न लोगों का ‘क्यू’--अभी टिकट बेचने वाला भी नहीं आया था। आधा घंटा भुनभुनाता रहा। दफ्तर पहले पहुंच गया, चपरासी बाद में पहुंचा।... मैं दरवाजे पर खड़ा था जब चपरासी पहुंचा। मुझे बैठ कर दफ्तर में धूल-धवांस खानी पड़ी; क्योंकि दफ्तर साफ हुआ। दिन भर परेशान रहा और दिन भर मैंने गालियां दीं उन सब लोगों को जो ब्रह्ममुहूर्त में उठने की बातें करते हैं। ऐसा दुख मैंने कभी पाया नहीं। फिर कभी यह भूल नहीं की।
ऐसे लोग भी हैं जिनको सूरज ऊगते ही नींद आती है। जो रात भर जागते रहें मगर सुबह सूरज जब ऊगता है तब उनके लिए जागना मुश्किल हो जाता है। ऐसे लोग भी सत्संग में पहुंच जाते हैं कि और कहीं जागे रहें, सत्संग में सो जाते हैं। कुछ लोग तो सत्संग का मतलब ही यह लेते हैं, कि सब चिंता-फिकर छोड़ कर सो जाना। अब करना ही क्या है! घर-द्वार रहो, चिंता-फिकर, पत्नी जान खाए जाती है, बच्चे उपद्रव मचाते, दफ्तर जाओ, परेशानियां हैं, सत्संग में न कोई परेशानी, न कोई झंझट--बैठे कि नींद लगी!
एक फकीर हुए, भीखण। वे बोल रहे थे एक गांव में--राजस्थान का कोई गांव रहा होगा; भीखण राजस्थान में हुए। सभा में नगर का जो सबसे बड़ा धनपति था--आसो जी--वह सामने ही बैठा था। वह बार-बार झपकी खा रहा था। भीखण से न रहा गया। कोई साधारण पंडित-पुरोहित नहीं थे कि इसकी फिकर करें कि यह धन-पैसे वाला है तो इससे कुछ डरें। बार-बार उसकी झपकी से भीखण के बरदाश्त के बाहर हो गया। भीखण ने कहा: आसो जी, क्या सोते हो? आसो जी ने आंख खोली, कहा: नहीं-नहीं, सोता नहीं, आंख बंद करके ध्यानपूर्वक सुनता हूं। होशियार आदमी तो हर तरफ तरकीबें निकाल लेता है। भीखण ने देख तो लिया कि वह झूठ बोल रहा है। क्योंकि ध्यान में इस तरह सिर नहीं डगमगाता। झोंका ऐसा आता था कि वह गिर-गिर पड़ता जैसा हो रहा था। ध्यान में यह नहीं होता। शकल-सूरत से साफ था कि ध्यान इत्यादि कुछ भी नहीं है। फिर थोड़ी देर और फिर आसो जी ने झपकी खाई। फिर पुकारा भीखण ने: आसो जी, सोते हो? आसो जी ने कहा, नहीं-नहीं, आपने भी क्या लगा रखा है! आप अपना काम करो, बोलो, मैं ध्यानपूर्वक सुन रहा हूं! क्या गांव में मेरी बदनामी करवानी है? एक बार हो तो ठीक, दुबारा आप फिर वही पूछने लगे; आपको बोलना है कि मेरे पीछे पड़े हो?
फिर थोड़ी देर और आसो जी की फिर नींद लग गई। भीखण ने तीसरी बार आवाज दी: आसो जी, जिंदा हो? और आसो जी ने कहा: नहीं-नहीं। वह समझा कि पुरानी वही बात कि आसो जी सोते हो। भीखण ने कहा: अब तुम धोखा न दे सकोगे। तुम निश्चित सो रहे हो। क्योंकि इस बार मैंने बात ही दूसरी पूछी और तुम उत्तर वही दे रहे हो। मगर एक लिहाज से तुम्हारा उत्तर सही है, क्योंकि जो सोता है, वह मुर्दा है; जिंदा है कहां?
सत्संग में कोई सोए तो सदगुरु के पास बैठ कर भी कहां बैठ पाता! सत्संग में कोई बंद रहे तो सूरज द्वार पर भी खड़ा रह जाता है, फिर भी नींद लगी रह जाती है। मगर स्मरण रखना, इस आशा में मत रहना कि कोई और तुम्हारी समस्याएं हल कर देगा। गुलाल का वचन महत्वपूर्ण है, बहुत महत्वपूर्ण है। खूब संवार कर रख लेना। क्योंकि यह आशा कहीं मन में बनी ही रहती है छिपे में कि कोई दूसरा...! हमारे सोचने का ढंग यह है। हम हर चीज दूसरे पर टालना चाहते हैं। अगर कुछ भूल हो तो हम किसी पर टालते हैं। कोई जिम्मेवार होना ही चाहिए जिसके कारण भूल हुई। हम अपने पर जिम्मेवारी नहीं लेते। अगर हमारे जीवन में उलझन है तो दूसरे लोगों के कारण है। जब उलझन दूसरों के कारण है तो दूसरों को ही हल करनी होगी। हम हल करेंगे भी तो कैसे करेंगे। हमने सीख लिया है टालना, अपने से दूसरे के कंधे पर टालना। हम सब टाले चले जाते हैं। और यह बुनियादी भूल है।
कोई जिम्मेवार नहीं है सिवाय तुम्हारे। और उस व्यक्ति को ही मैं धार्मिक व्यक्ति कहता हूं, जो समग्ररूपेण अपने जीवन का सारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेता है। कठिन है यह बात। कठिन इसलिए है कि दूसरे के ऊपर टाल देने में राहत मिलती है, कि कोई हमारा कसूर तो नहीं, हम करेंगे भी क्या? सब तरफ उपद्रवी हैं, वे जीवन उलझाए चले जा रहे हैं। पति पत्नी पर टाल देता है कि उसकी वजह से सब उपद्रव है। इन्हीं पतियों ने शास्त्र लिखे हैं, वे कहते हैं, स्त्री नरक का द्वार है। नरक तुम्हें जाना है, नरक तुम बनाते हो अपना, स्त्री को द्वार बताते हो। और रही आए स्त्री द्वार, मत निकलो उस द्वार से; मत जाओ उस रास्ते; कौन तुमसे कहता है?
संसार दुख का मूल है, यही तोतारटंत पंडित तुम्हें समझाते रहे हैं। संसार दुख का मूल नहीं है। यह टालना है। दुख का मूल तुम्हारे भीतर छिपा अज्ञान है। दुख का मूल तुम्हारे भीतर सोई हुई चेतना है, संसार नहीं। और एक दफा अगर तुमने यह गलत निर्णय ले लिया कि संसार दुख का मूल है, तो फिर और-और गलत निर्णय इससे निकलेंगे। फिर इसका अर्थ होगा कि संसार को छोड़ो। फिर तुम्हारा संन्यास संसार का त्याग बन जाएगा। पहली भूल से दूसरी भूल पैदा हो रही है। पहले संसार दुख का मूल था, यह मान लिया, अब सुख की तलाश में चले तो संसार छोड़ कर चले। न संसार दुख का मूल था, न संसार के त्याग से सुख की उपलब्धि होने वाली है। दुख का मूल तुम्हारी अचेतना है, मूर्च्छा है। सुख का मूल भी वहीं है। जाग जाओ भीतर तो सुख है। जाग जाओ भीतर तो स्वर्ग है। सोए रहो भीतर तो नरक है।
महावीर से किसी ने पूछा है कि आप मुनि की क्या परिभाषा करते हैं और अमुनि की क्या परिभाषा करते हैं? तो महावीर ने वही परिभाषा नहीं की जो जैन शास्त्रों में की गई है, जैन मुनि करते हैं। महावीर कैसे वैसे परिभाषा कर सकते थे! महावीर तो उन उत्तुंग शिखरों से बोलते हैं, जहां से केवल सत्य ही बोला जा सकता है। महावीर ने व्याख्या की--शायद किसी ने इतनी सरल, इतनी सीधी, इतनी साफ, इतनी सचोट व्याख्या नहीं की है--महावीर ने कहा: ‘असुत्ता मुनिः,’ जो सोया नहीं है, वह मुनिः, ‘सुत्ता अमुनिः,’ और जो सोया है, वह अमुनि। सोया है, वह असाधु, जागा है, वह साधु।
यह बात हीरों में तौली जाए, ऐसी बात है।
नहीं कहा कि जो दिगंबर खड़ा है, वह मुनि; कि जो उपवास करता है, वह मुनि। नहीं कहा कि जो संसार को छोड़ दिया है, वह मुनि। ठीक दो छोटे से शब्दों में सारे शास्त्रों का सार भर दिया। गंगोत्री बन गए दो छोटे से शब्द: असुत्ता मुनिः। फिर इससे गंगा बह सकती है, पूरा जीवन गंगा हो सकता है।
पहला कदम भ्रांति का और सारी यात्रा गलत हो जाती है। और हमने जो बुनियादी रूप से गलतियां की हैं, उनमें एक गलती यह है कि हम सदा दूसरे पर टालते हैं। कोई भाग्य पर टालता है, कोई संसार पर टालता है, कोई विधाता पर टालता है, कोई किस्मत पर टालता है; कोई कहता है, क्या करें, यह दुनिया का ढंग ही ऐसा है। इस दुनिया में तो दुख सबने पाया है सो हम पा रहे हैं। इस तरह अपने को समझाता है, सांत्वना देता है। दुनिया का इससे कुछ लेना-देना नहीं है। यहीं बुद्ध हुए और इसी पृथ्वी पर परम आनंद में जीए! और यहीं कबीर हुए और इसी पृथ्वी पर परमात्मा में जीए! और यहीं तुम हो--वही पृथ्वी है, वही मिट्टी की देह है, उसी तरह के लोग तुम्हें घेरे हुए हैं जिस तरह के लोग कबीर को, गुलाल को, बुल्लाशाह को घेरे हुए थे... दुनिया कोई बदल नहीं गई, दुनिया वही की वही है। मगर लोग बड़े चालबाज हैं; लोग कहते हैं, पहले सतयुग था। कब था यह सतयुग? यह हमेशा पहले था। जब पूछो तभी पहले था।
छह हजार वर्ष पुरानी एक ईंट मिली है बेबीलोन में जिस पर एक छोटा सा उल्लेख है। उस ईंट पर यह लिखा हुआ है कि पहले सतयुग था और अब दुनिया बिलकुल भ्रष्ट हो गई है,... छह हजार साल पहले!... बेटा बाप की नहीं सुनता, पत्नी पति की नहीं मानती, नैतिकता भ्रष्ट हो गई है, मनुष्य का महान पतन हो गया है, हम महासंकट की घड़ी से गुजर रहे हैं! यह तो ऐसा लगता है जैसे कि आज के ही सुबह के अखबार का संपादकीय हो।... छह हजार साल पहले!
चीन में और भी पुरानी एक धरोहर मिली है। आदमी के चमड़े पर लिखी हुई कोई सात-आठ हजार साल पुरानी दस्तावेज है। वह अपने ढंग की अकेली चीज है आदमी की चमड़ी पर लिखी गई; उसको बड़ा सम्हाल कर रखा गया है। अभी तक राज नहीं खुल सका कि किस तरह के रासायनिक द्रव्यों में आदमी की चमड़ी बचाई जा सकी। क्योंकि आदमी की चमड़ी तो एकदम सड़ जाती है। उसमें भी यही लिखा हुआ है कि पहले सतयुग था। धन्य थे वे प्राचीन दिन जब पृथ्वी पर स्वर्ग था! मगर वे दिन कब थे? क्या तुम सोचते हो राम के समय में थे? तो फिर रावण कब हुआ? तो फिर सीता कब चुराई गई? फिर सीता को, गर्भवती सीता को कब उसके पति ने जंगल भिजवा दिया, छोड़ दिया, त्याग दिया? तुम सोचते हो कृष्ण के समय में सतयुग था? तो फिर महाभारत कब हुआ? सतयुग कब था? सतयुग कभी नहीं था, वह सिर्फ मनुष्य की कल्पना है। वह आज की परिस्थितियों को जिम्मेवार ठहराने के लिए कल्पना कर लेता है अतीत की, सुंदर अतीत की। और अगर अतीत से बचता है, तो भविष्य की कल्पना कर लेता है।
सतयुग पीछे था, और भविष्य में स्वर्ण-युग है--और अभी? अभी क्या करें, मजबूरी है। अभी तो हर चीज मुश्किल है। और जब भी तुम रहोगे, यही हालत रहेगी। सतयुग अतीत में रहेगा, स्वर्ण-युग भविष्य में रहेगा--और तुमको रहना है अभी! कुछ राह अभी खोजनी पड़ेगी। राह मिलती नहीं। कारण साफ है: तुम औरों पर टाले चले जाते हो। सतयुग जाग्रत व्यक्ति के भीतर होता है। और कलियुग सोए हुए व्यक्ति के भीतर होता है। सतयुग-कलियुग बाहर की बातें नहीं हैं, इतिहास की बातें नहीं हैं, तुम्हारे अंतरतम की कथाएं हैं।
ठीक कहते हैं गुलाल:
कोउ नहिं कइल मोरे मन कै बुझरिया।
घर-घर गया हूं, द्वार-द्वार खटखटाए हैं, न मालूम कितनी जगह भिक्षापात्र फैलाया कि बुझा दो कोई मेरे मन को, सुलझा दो कोई मेरी उलझन को, अंधेरे को मेरे मिटा दो, जला दो मेरे दीये को; कैसे देखूं प्रभु को, कैसे छुटकारा हो बंधन से, कब बरसेंगे मोती, कब मेरे जीवन में भी वह धन्य घड़ी आएगी, मगर नहीं, कोई भी कुछ न कर सका।
घरि घरि पल पल छिन छिन डोलत-डालत साफ अंगरिया।।
और यह मेरा मन है कि दहका जाता अंगार की तरह और कोई कुछ नहीं कर पाता। कोई इस आग को बुझा नहीं पाता।
घरि घरि पल पल छिन छिन डोलत-डालत साफ अंगरिया।।
मैं देखता हूं कि भीतर आग ही आग है। प्रतिपल आग जल रही है, धू-धू कर आग जल रही है, मैं धुएं की तरह उड़ा जा रहा हूं, अपनी ही आग में जला जा रहा हूं। और कितनों से कहा, कितनों के सामने हाथ जोड़े, चरण छुए, कि वर्षा कर दो, कि बुझा दो मेरी इस आग को, कि मैं जल-जल कर ही नहीं मर जाना चाहता हूं! मगर कोई यह कर न सका। कोई यह कर ही नहीं सकता है। यह तुम्हें ही करना होगा।
धर्म तुम्हें व्यक्ति बनाता है। और व्यक्ति होने का अर्थ होता है: अपनी लगाम अपने हाथ में लो। बुद्ध ने कहा है: अप्प दीपो भव! अपने दीये खुद बनो! कोई दूसरे से आशा न रखो। आशा में भ्रांति है। आशा में विषाद आएगा। आशा आज नहीं कल निराशा बनेगी। तब तुम बहुत तड़फोगे। और हो सकता है तब तक समय भी बीत जाए। तुम दूसरों पर आशा लगाए रखो, और ऐसे लोग हैं, धोखेबाज, बेईमान। धर्म के नाम पर जितनी बेईमानी और धोखा चलता है उतना किसी और चीज के नाम पर न चलता है, न चल सकता है। क्योंकि धर्म इतना रहस्यपूर्ण मामला है कि धोखा-धड़ी की बहुत गुंजाइश है। परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए कोई भी उसका पैगंबर हो सकता है।
बगदाद में एक आदमी पकड़ा गया जिसने घोषणा कर दी कि मैं ईश्वर का पैगंबर हूं और ईश्वर ने मुझे भेजा है मोहम्मद के बाद। क्योंकि मोहम्मद की किताब अब बहुत पुरानी पड़ गई। अब नई किताब की जरूरत है। संशोधित संस्करण चाहिए कुरान का। मुसलमान यह बरदाश्त नहीं कर सकते। मुसलमान तो बहुत मतांध लोग हैं। उन्होंने तो फौरन पकड़ लिया इस आदमी को कि यह कौन है? क्योंकि मुसलमानों की धारणा है: एक ही अल्लाह है और उस अल्लाह का एक ही पैगंबर और वह है मोहम्मद। और तो कोई पैगंबर नहीं। वहां दूसरे की गुंजाइश ही नहीं है। और कुरान में सुधार!
उसको पकड़ कर ले जाया गया खलीफा के दरवाजे पर। खलीफा भी आग बबूला हो गया, उसने कहा: बांध दो खंबे से जेलखाने में, करो इसकी पिटाई; सात दिन रखो भूखा-प्यासा और मारो जितना मार सको; सात दिन बाद मैं आऊंगा, अगर होश आ जाए, ठीक!
सात दिन बाद खलीफा गया। वह आदमी सूख कर हड्डी रह गया था। न पानी दिया, न भोजन दिया और पिटाई उसकी चलती ही रही? न सोने दिया उसे। जंजीरों से बंधा था खंबे से। खलीफा ने पूछा: कहो, क्या खयाल है? कुछ अक्ल आई! उसने कहा कि निश्चित आई! जब मैं चलने लगा परमात्मा के यहां से तो परमात्मा ने कहा था कि देख, मेरे पैगंबरों को बड़ी तकलीफें आती हैं। तुमने सिद्ध कर दिया कि मैं सच में ही उसका पैगंबर हूं। कभी-कभी मुझे शक होता था, वह शक भी खतम हो गया। उसके पैगंबरों को ये तकलीफें आती ही रही हैं। खलीफा भी चौंका। उसने यह नहीं सोचा था कि नतीजा ऐसा निकलेगा। और भी चौंका इसलिए कि दूसरे खंबे से बंधे हुए एक आदमी ने चिल्ला कर कहा: यह आदमी सरासर झूठ बोल रहा है। खलीफा ने पूछा कि तुम्हें कैसे पता? उसने कहा: मुझे पता नहीं! अरे, मैं ही हूं जिसने मोहम्मद को भेजा था; और इसको मैंने कभी भेजा ही नहीं!... उसको कुछ दिनों पहले पकड़ा गया था। उसने घोषणा की थी कि मैं स्वयं सृष्टि का निर्माता हूं, यह सृष्टि मैंने ही बनाई है। और मैंने ही भेजे तीर्थंकर और पैगंबर और अवतार। और यह आदमी सरासर झूठ बोल रहा है, इस बदमाश को मैंने कभी भेजा ही नहीं! इसकी शकल मैं नहीं पहचानता। इसको मैंने खुद अपने हाथ से बनाया हो, यह भी पक्का नहीं है। निश्चित ही नौकर-चाकरों ने बनाया है। इसका चेहरा ही मुझे पहचाना हुआ नहीं मालूम पड़ता!
धर्म के नाम पर तो कुछ भी घोषणा कर सकते हो। कोई उपाय नहीं तुम्हारी घोषणाओं को खंडित करने का। तुम अगर कह दो कि मैंने दुनिया बनाई, तो कोई सिद्ध नहीं कर सकता कि तुमने नहीं बनाई। कैसे सिद्ध करेगा? न तुम सिद्ध कर सकते हो कि मैंने बनाई, न वह सिद्ध कर सकता है कि तुमने नहीं बनाई। धर्म के नाम पर कुछ भी कल्पनाओं-परिकल्पनाओं का विस्तार फैला सकते हो। धर्म के नाम पर बहुत धोखाधड़ी चलती है। और धोखाधड़ी का प्रमाण एक ही है: सिर्फ उस व्यक्ति के जीवन में धर्म है, जिसके पास उठते-बैठते तुम्हें वे सूत्र मिलने शुरू हो जाएं जिनसे तुम अपने भीतर की आग बुझा लो।
सदगुरु सांत्वना नहीं देता, इशारे देता है, जिनसे तुम अपने भीतर छिपे हुए सत्य को खोज ले सकते हो। सदगुरु सत्य नहीं देता--सत्य दिया नहीं जा सकता, सत्य का कोई हस्तांतरण नहीं होता। सत्य कोई वस्तु नहीं है कि कोई तुम्हें दे दे, कि तुम ले लो किसी से; न चुराया जा सकता, न छीना जा सकता। सत्य तो एक बोध है। किसी प्रज्वलित व्यक्तित्व के पास बैठ कर तुम्हें यह बोध आ जाता है कि अरे, मैं भी ऐसा ही हो सकता हूं! किसी प्रज्वलित व्यक्ति के पास बैठ कर तुम्हारे भीतर भी एक उमंग उठती है, एक उत्साह उठता है कि यह असंभव नहीं, यह संभव है। हड्डी-मांस-मज्जा की देह में अगर ऐसी ज्योति जल सकती है, तो मैं भी तो हड्डी-मांस-मज्जा का बना हूं, यह ज्योति मुझमें भी जल सकती है! यह भरोसा सदगुरु के पास मिल सकता है। और यह भरोसा काफी है। फिर इसके बाद असली खोज शुरू होती है। यह श्रद्धा काफी है। खयाल रखना, श्रद्धा का अर्थ यह नहीं होता कि तुम ईश्वर पर श्रद्धा करो। ईश्वर पर तुम कैसे श्रद्धा करोगे? जिसको जाना नहीं, देखा नहीं, पहचाना नहीं, जिसका कोई पता नहीं, उस पर कैसे श्रद्धा करोगे? और जिस ईश्वर को न जानते, न देखा, न पहचाना, उस पर अगर श्रद्धा कर लिए तो झूठों का झूठ हो गया। ऐसे झूठ से कहीं तुम सत्य तक पहुंच सकते हो! श्रद्धा का यह अर्थ नहीं होता कि गीता पर श्रद्धा करो, कुरान पर श्रद्धा करो, वेद पर श्रद्धा करो। कौन जाने वेद केवल बहुत कुशल लोगों के वचन हों, जिन्होंने खुद भी न जाना हो! हजारों किताबें हैं दुनिया में, सुंदर किताबें हैं, लेकिन ज्ञाताओं से नहीं निकली हैं। लिखने में जो कुशल थे, सोचने में जो कुशल थे, शब्दों के जो धनी थे, शब्दों के साथ खेल सकते थे, उनसे निकली हैं। तुम्हें कैसे पक्का होगा कि वेद जिन्होंने जाना उनसे बहे? कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि कुरान उनसे उठी, जिन्होंने जाना। मानना ही पड़ेगा, प्रमाण तो कुछ भी नहीं हो सकता। मगर यह मानना तो शुरुआत ही बेईमानी की हो गई। सत्य का शोधी ऐसी मान्यता में नहीं पड़ता।
फिर श्रद्धा का क्या अर्थ होता है?
श्रद्धा का अर्थ होता है: सदगुरु के पास तुम्हें अपने में श्रद्धा आ जाए। सदगुरु वही, जो तुम्हें स्वयं में श्रद्धा दिला दे। जिसकी मौजूदगी तुम्हारे भीतर स्वर छेड़ दे। तुम्हारे भीतर भी कोई अनजगे राग जग पड़ें। तुम्हारे भीतर भी कोई बीज टूट जाए, अंकुरित होने लगे। अपने में श्रद्धा आ जानी धर्म है। मैं भी परमात्मा को पा सकता हूं, मैं भी सत्य को पा सकता हूं, मैं भी परम मुक्ति को पा सकता हूं। अगर बुद्ध ने पा ली, कबीर ने पा ली, गुलाल ने पा ली, तो मेरा क्या कसूर है? अगर मुझ जैसे व्यक्तियों ने पा ली, तो मैं भी पा सकता हूं।
एक दिन बुद्ध भी ऐसे ही अंधेरे में भटकते थे, फिर प्रकाश को उपलब्ध हो गए! आज तुम अंधेरे में भटक रहे हो, कल प्रकाश को उपलब्ध हो सकते हो। अंधेरे में भटकने वाले ही तो प्रकाश को उपलब्ध हुए हैं। अंधों ने ही तो आंखें पाई हैं और बहरों ने ही तो उस अमृत-नाद को सुना है। हम भी बहरे हैं, हम भी अंधे हैं; तो घबड़ाने की कोई बात नहीं; तो चिंता की कोई बात नहीं; तो हताश होने की कोई बात नहीं--ऐसा जिसके पास भरोसा आ जाए। बस, इतना भरोसा सदगुरु दे सकता है।
सुर नर मुनि डहकत सब कारन, अपनी अपनी बेरिया।।
ऐसे तो बकवास लगी हुई है। सब बोले जा रहे हैं। साधु हैं, संत हैं, महात्मा हैं--सुर नर मुनि डहकत--डहक रहे हैं। और तुम्हारी भी आदत है, जो जितने जोर से बोले, टेबल पीट कर बोले, लगता है सत्य ही बोल रहा होगा। यहां जोर से बोलने वाला आदमी समझा जाता है कि सच बोल रहा है। कोई धीरे-धीरे बोले, खुसपुसा कर बोले, तो तुम्हें लगता है: खुद ही डरा हुआ है, यह क्या खाक सच बोलेगा! और खुसपुसा कर बोलने में कुछ का कुछ लोग मतलब समझ लेते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन को सर्दी-खांसी हुई थी। आवाज कंठ से निकलती नहीं थी। जाकर दरवाजे पर डॉक्टर के दस्तक दी। डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला। मुल्ला ने खुसपुसा कर कहा: डॉक्टर साहब हैं? पत्नी ने कहा: वे बाहर गए हैं, जल्दी से भीतर आ जाओ!
खुसपुसा कर बोलने में और खतरा है। पता नहीं लोग क्या का क्या समझ लें! ...कि अच्छे मौके पर आए! ऐसे ही आ जाया करो!
एक विधि विद्यालय का प्रोफेसर अपना अंतिम संदेश दे रहा था स्नातकों को, जो उत्तीर्ण हो गए थे और अब जल्दी ही अदालतों में जाकर वकालत शुरू करेंगे। तो उसने कहा, यह मेरा आखिरी संदेश तुम्हारे लिए, जो मैं सदा अपने विद्यार्थियों को देता हूं जब वे मुझे छोड़ते हैं। अगर कानून तुम्हारे पक्ष में हो तो कानून की किताबों का उद्धरण दो। सिर्फ कानून की किताबें काफी हैं। अगर कानून तुम्हारे पक्ष में न हो, तो जितने जोर से बोल सको उतने जोर से बोलो, कानून की फिकर छोड़ दो। और अगर कानून बिलकुल विपक्ष में हो, तो सिर्फ बोलने से काम नहीं चलेगा, टेबल भी पीटो! उछलो-कूदो; हंगामा मचा दो! कानून पक्ष में हो तो धीमे बोलो, चलेगा। लेकिन अगर कानून विपरीत हो, फिर धीमे मत बोलना। फिर तो तुम्हारे हंगामे पर ही सब निर्भर है। फिर मजिस्ट्रेट हंगामे से ही प्रभावित होगा।
कुछ वकीलों का काम ही हंगामा करना है। वे सिंह की तरह दहाड़ते हैं। जब भी कोई वकील सिंह की तरह दहाड़े तो समझ लेना कि कानून पक्ष में नहीं है। कानून पक्ष में हो तो दहाड़ने की कोई जरूरत नहीं, इतना श्रम लेने की कोई जरूरत नहीं; कानून काफी है। मगर कानून पक्ष में न हो तो दहाड़ना पड़ेगा। कमी की पूर्ति करनी होगी न!
गुलाल खूब शब्द उपयोग किए हैं: ‘सुन नर मुनि डहकत।’दहाड़ रहे हैं! मगर कहते हैं, मैं सब जगह से खाली हाथ लौटा। ये चिल्लाने वाले लोग, ये शोरगुल मचाने वाले लोग, ये हंगामा मचाने वाले लोग, ये सिद्धांतों का वाद-विवाद, शास्त्रार्थ फैलाने वाले लोग, ये हजार तरह के तर्क-कुतर्क करने वाले लोग, इनसे कुछ हाथ पड़ा नहीं, मेरी अंगार बुझी नहीं; मेरे भीतर का दीया जला नहीं; मेरे भीतर कोई मोतियों की वर्षा न हुई; वही कंकड़-पत्थर जो पहले थे, फिर भी रहे; इनका ज्ञान मेरे किसी काम नहीं आया।
सदगुरु वह है, जिसके पक्ष में अस्तित्व है। वह शास्त्रों के आधार से नहीं बोल रहा है।
वह बोल रहा है अपने अनुभव के आधार से। यद्यपि सभी शास्त्र उसके अनुभव के पक्ष में होते हैं--होंगे ही, होना ही पड़ेगा--क्योंकि सत्य तो एक है। सदगुरु मिल जाए, तो तुम्हारे जीवन में क्रांति होनी शुरू हो जाती है।
एक रात चांदी की,
एक रूप सोने का;
फिर आया है मौसम,
भीगने-भिगोने का!
भीगने-भिगोने का!

उड़ते स्वर के फाहे,
गीत बने चरवाहे;
घूम रहे गलियों में--
गूंज रहे चौराहे;
अंतस पर थाप पड़ी,
गम की मंजीर-लड़ी;
फिर आया है मौसम,
अपनापन खोने का!
भीगने-भिगोने का!!

गत-आगत जुड़ आए,
मादक क्षण मुड़ आए;
मस्ती ने संयम के--
गठबंध तुड़वाए;
सुमनासव पिए हुए,
अलमस्ती लिए हुए;
फिर आया है मौसम,
लाज-शरम धोने का!
भीगने-भिगोने का!!

कलियों के तन चिटके,
परिमल के कण छिटके,
मलयानिल ने रह-रह--
सुरभित आंचल झिटके;
जाग उठे बन सोए,
किरणों ने मुंह धोए;
फिर आया है मौसम,
बल्लरी पिरोने का!
भीगने-भिगोने का!!
सदगुरु मिल जाए तो समझना--
फिर आया है मौसम,
भीगने-भिगोने का!
वहां से बिन-भीगे मत लौट आना, अनभीगे मत लौट आना! सरोबोर हो जाना, तरोबोर हो जाना!
अंतस पर थाप पड़ी,
गम की मंजीर-लड़ी;
फिर आया है मौसम,
अपनापन खोने का!
भीगने-भिगोने का!!
कहीं सदगुरु मिल जाए तो डुबकी मार लेना! साहस करना अपने को खोने का! अहंकार को एक तरफ सरका कर रख देने का! बस, उतनी ही बाधा है। अहंकार जो हटा सकता है, वह शिष्य हो जाता है। जो अहंकार को परिपूर्ण रूप से हटा सकता है, वह सदगुरु से जुड़ जाता है। अहंकार बीच की दीवाल है। और जब भी तुम्हारे अंतस पर थाप पड़े, जब किसी की सन्निधि में तुम्हारे भीतर कोई धुन बजने लगे, कुछ गुनगुन होने लगे--नहीं कि तर्क जंचे--तर्क तो बुद्धि की बात है, उसका कोई बहुत मूल्य नहीं है--नहीं कि गणित साफ बैठे--गणित तो बच्चों का खेल है, उसकी कोई गहराई नहीं--अंतस पर थाप पड़े, हां, तुम्हारे भीतर गहराई में कोई गूंज उठने लगे, थाप पड़े, कोई नृत्य होने लगे, तो फिर चूकना मत! समझ लेना--
फिर आया है मौसम,
अपनापन खोने का!
भीगने-भिगोने का!!
डरेगा मन। अहंकार झिझकेगा। अहंकार हजार तरकीबें खोजेगा, कि सावधान!
इधर मैं देखता हूं रोज, नए लोग आ जाते हैं--खास कर भारतीय--उन्हें देख कर मुझे हैरानी होती है! सुनने आते हैं, मैं हाथ जोड़ कर आते-जाते नमस्कार करता हूं, वे हाथ जोड़ कर नमस्कार भी नहीं कर सकते, नमस्कार का उत्तर भी नहीं दे सकते! यहां सैकड़ों लोग हाथ जोड़ कर नमस्कार कर रहे हैं, मगर वे ऐसे बैठे रहते हैं अकड़े पत्थर की तरह जैसे हाथ जोड़ कर नमस्कार कर लेंगे तो कुछ खो जाएगा, कुछ गंवा देंगे। और उनसे यह आशा मैं रखता नहीं कि पहले वे नमस्कार करें, पहले मैं ही नमस्कार कर रहा हूं। नमस्कार का उत्तर देने तक में कंजूसी हो जाती है। क्या खाक समझेंगे! क्या खाक सुनेंगे! झुकना तो बहुत दूर, भीगना तो बहुत दूर, वे ऐसे बच कर खड़े हैं कि कहीं बूंदाबांदी पड़ न जाए कोई। कोई और उचके, छलांग मारे और कहीं पानी से कुछ बूंदाबांदी इन पर न पड़ जाए। वे ऐसे डरे हुए खड़े हैं। वे ऐसे दूर किनारे पर खड़े हुए हैं कि यहीं से देखते रहें कि खतरे का कोई मौका आ जाए तो भाग खड़े हों! भागने का इंतजाम करके खड़े हुए हैं।
इतना दयनीय तो यह देश कभी भी न था।
पश्चिम से लोग यहां आए हुए हैं, जिनको हाथ जोड़ने की कोई परंपरा का अनुभव नहीं है, जिन्हें सिर झुकाने की कोई आदत नहीं है, वे हाथ जोड़ लेते हैं, सिर झुका देते हैं। और भारतीय--पता नहीं किस दंभ में, किस अहंकार में, किस अकड़ में! शायद रामायण की चार चौपाइयां आती होंगी। तो अकड़! शायद ब्राह्मण होंगे। तो अकड़! और अब तो अकड़ का कहना क्या? अब तो शूद्र भी अकड़ा हुआ है, वह भी अब शूद्र नहीं है, हरिजन है। तो वह कैसे हाथ जोड़े! यहां देखते हैं सत्संग का यह विहान, यह प्रभात, ये शांत मौन बैठे हुए लोग... इनमें अधिक हैं जिनको जो भाषा मैं बोल रहा हूं अभी, समझ में भी नहीं आती, फिर भी बैठे हैं मौन, फिर भी पी रहे हैं। नहीं भाषा तो भाव सही। असली बात तो भाव ही है। नहीं शब्द समझ में आते, क्या लेना-देना शब्दों से? असली सवाल तो सदगुरु के साथ होना है। और भारतीय आते हैं तो मैं चकित होता हूं! एक उठा, दूसरा उठा, तीसरा उठा... जैसे उठने को ही आए थे! आए ही क्यों थे? क्यों नाहक कष्ट किया!
एक भ्रांति है भारतीय मन को। क्योंकि शास्त्र, सुने हुए शब्द, पंडित-पुरोहित, उनके वचन सदियों-सदियों से हमारे भीतर बैठ गए और हमें यह भ्रांति दे रहे हैं कि हमें मालूम ही है, सुनना क्या है? तुम बुद्ध से चूके, तुम महावीर से चूके, तुम कबीर से चूके--तुम चूकते ही रहोगे। और जब तुम चूक जाते हो, जब बुद्ध जा चुके होते हैं, तब तुम उनके शब्दों के मालिक हो जाते हो, तब उनके शब्दों को तुम कंठस्थ कर लेते हो। जब वे मौजूद होते हैं, तब तुम अकड़े खड़े रहते हो। इसलिए इस देश में इतने महिमावान लोग हुए, लेकिन इस देश में महिमा पैदा नहीं हो पाई। यह देश सभी तरह से दीन और दरिद्र रह गया।
ठीक कहते हैं गुलाल:
सुर नर मुनि डहकत सब कारन, अपनी अपनी बेरिया।।
सबै नचावत कोउ नहिं पावत,...
और पंडित-पुरोहितों के, तथाकथित तोतों के चक्कर में पड़े हुए, नाच तो वे तुम्हें बहुत नचाएंगे, लेकिन पाओगे तुम कुछ भी नहीं। पाया उन्होंने स्वयं नहीं है। लेकिन फिर तुम उनसे राजी कैसे हो जाते हो? उनसे राजी होने का कारण है। वे जानते हैं कला। कला सीधी-साफ है, कुछ बहुत जटिल नहीं। तुम जो चाहते हो, वही कहते हैं। तुम्हारी मान्यताओं को सहारा देते हैं। तुम्हारी मान्यताओं को पुष्ट करते हैं। तुमसे अहंकार नहीं छीनते, तुम्हारे अहंकार को और बल देते हैं। कहते हैं, तुम महान हो। कहते हैं कि तुम हिंदू हो, कि मुसलमान हो, कि ईसाई हो; कि तुम धन्यभागी हो, कि न मालूम कितने जन्मों के पुण्यों के कारण तुम इस पुण्यभूमि में पैदा हुए हो। और तुम्हारा अहंकार फूल कर कुप्पा हो जाता है।
कहां की पुण्यभूमि! किन जन्मों के पुण्य! कहीं कोई पुण्य की गंध तो दिखाई पड़ती नहीं। लेकिन तुम अकड़ जाते हो, तुम फूल जाते हो, तुम प्रसन्न हो जाते हो। तुम जो चाहते हो सांत्वनाएं, वे तुम्हें देते हैं। सत्य नहीं। सत्य तो चोट करता है, सत्य तो झकझोरता है; सत्य तो आंधी है, अंधड़ है, सब धूल-धवांस तुम्हारी ले जाएगा तुम्हारी उड़ा कर, सूखे पत्ते गिरा देगा। और अगर तुम ज्यादा अकड़े, तो बड़े-बड़े वृक्ष भी अकड़ में गिर जाते हैं। अंधड़ जब आता है तो घास के पौधे बच जाते हैं, बड़े वृक्ष गिर जाते हैं। क्योंकि घास के पौधों को एक कला आती है, झुक जाने की कला, वे अंधड़ के साथ ही झुक जाते हैं। वे अंधड़ से लड़ते नहीं, वे अंधड़ से राजी हो जाते हैं, वे आंधी के साथ ही डोलते हैं, आंधी का उपयोग कर लेते हैं। आंधी जा चुकी होती है, घास के पौधे फिर खड़े हो जाते हैं--ताजे और भी ताजे! धूल गई, वह अंधड़ ले गया! और बड़े वृक्ष अकड़ कर खड़े रहे, गिर गए, तो फिर उठ सकते नहीं।
सत्य तो आंधी है, तूफान है, सांत्वना नहीं है, मलहम-पट्टी नहीं है, सर्जरी है। और तुम अगर सांत्वना खोज रहे हो, तो तुम जरूर किसी चक्कर में पड़ जाओगे। वे तुमसे वही कहेंगे जो तुम चाहते हो। तुम चाहते हो कोई तुम्हें भरोसा दिला दे कि मरने पर भी तुम मरोगे नहीं। तो तुम्हारे पंडित-पुरोहित उदघोषणा करते रहते हैं: आत्मा अमर है। मैं नहीं कह रहा हूं कि आत्मा अमर नहीं है, मैं इतना ही कह रहा हूं कि आत्मा अमर है, यह जानना होता है, यह पंडित-पुरोहितों के कहने से आत्मा अमर नहीं होती। मगर तुम सुन कर बड़े प्रसन्न हो जाते हो। तो तुम कहते हो, ठीक है, देह ही जाएगी, तो जाने भी दो, हम तो रहेंगे! यह हम, यह अहंकार बचा रहे, तुम्हारा चित्त प्रसन्न हो जाता है, तुम राजी हो जाते हो। फिर तुम हजार नाच नाचने को राजी हो जाते हो। फिर वे कहें कि यहां पूजा चढ़ाओ, यहां फूल लगाओ, यहां बत्ती लगाओ, यहां आरती उतारो, तुम राजी! क्योंकि उन्होंने तुम्हारी आरती पहले ही उतार दी। उन्होंने कहा कि तुम अमर हो, और उन्होंने कहा कि तुम्हें कुछ और करना नहीं है, पूजा-पाठ करो, सब पाप कट जाएंगे; उसकी अनुकंपा अपार है, वह तुम्हारे सब पाप काट देगा। तो वे तुम्हें नचवाते हैं; कि तुम तो हनुमान-चालीसा पढ़ते रहो; कि तुम तो गीता को दोहराते रहो, कंठस्थ करते रहो।
सबै नचावत कोउ नहिं पावत, मारत मुंह मुंह मरिया।।
और इस तरह बस मुंह से मुंह मारते-मारते, बकवास ही बकवास करते-करते, वे खुद भी मरते हैं और तुम्हें भी ले डूबते हैं।
अबकी बेर सुनो नर मूढ़ो, बहुरि न ल्यो अवतरिया।।
गुलाल कहते हैं: लेकिन अब की बार मैं तुमसे कहता हूं कि हे मूढ़ो, अब जागो! अब सुन लो! ताकि फिर तुम्हें दुबारा पैदा न होना पड़े; ताकि फिर तुम्हें दुबारा इस जाल में, इस जंजाल में, इस अंधकार में न उलझना पड़े।
कह गुलाल सतगुरु बलिहारी, भवसिंधु अगम गम तरिया।।
अगम्य है इस भवसागर को पार करना। लेकिन गुलाल कहते हैं: सदगुरु मिल जाए तो असंभव भी संभव हो जाता है। कोई मिल जाए जो उस पार पहुंच गया, किसी की उपस्थिति तुम्हारे लिए प्रमाण बन जाए उस पार पहुंचने की, तो असंभव भी संभव हो जाता है, फिर तुम्हारे जीवन में एक नई किरण का सूत्रपात होता है, तुम फिर वही नहीं रह जाते तुम जो हो, तुम वह होने लगते हो जो तुम्हें होना चाहिए।
जीवन की जगी आग!
दिग्‌-दिगंत दहके!!
पवनान्दोलित हुलास,
छल-छल छलके विलास।
सौरभ के मेले हैं--
ठौर-ठौर, आस-पास,
पुष्प को मिला सुहाग!
मधु-महंत महके!!
दिग्‌-दिगंत दहके!!!

कनबतियां कलियों की
बरजोरी अलियों की;
मौसम के अधरों पर--
गजलें रंगरलियों की;
जै जैवंती-विहाग!
रागवंत चहके!!
दिग्‌-दिगंत दहके!!!
जिस दिन सदगुरु मिलता है, उस दिन वसंत आ जाता है।
जीवन की जगी आग!
दिग्‌-दिगंत दहके!!
चारों तरफ हुलास छा जाता है।
पवनान्दोलित हुलास,
छल-छल छलके विलास।
सौरभ के मेले हैं--
ठौर-ठौर, आस-पास,
पुष्प को मिला सुहाग!
जब गुरु मिलता है तो ऐसी ही घटना घटती है, जैसे--
पुष्प को मिला सुहाग!
मधु-महंत महके!!
दिग्‌-दिगंत दहके!!!
तुम अभी कली की तरह हो, फूल हो सकते हो। तुम अभी बीज की तरह हो, वृक्ष हो सकते हो। लेकिन बीज किसी वृक्ष को देख ले तो भरोसा आए संभावना का। नहीं तो आदमी अपने को उतना ही मान लेता है, जितना है। उससे ज्यादा हो सकता है, इसकी कल्पना ही नहीं उठती।
कनबतियां कलियों की
बरजोरी अलियों की
मौसम के अधरों पर--
गजलें रंगरलियों की;
जै जैवन्ती-विहाग!
रागवंत चहके!!
दिग्‌-दिगंत दहके!!!
सदगुरु कौन, कैसे पहचानोगे? यह सवाल पुराना और नित-नया, नित-नूतन: कैसे पहचानोगे? गुरु तो बहुत हैं, गुरुडमें बहुत हैं, सदगुरु कौन? गुरुओं की इस भीड़-भाड़ में सदगुरु को कैसे पहचानोगे?
कुछ सूत्र सहयोगी हो सकते हैं।
पहली बात, जो सदगुरु नहीं है, वह तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करेगा। जो सदगुरु है, वह तुम्हारी अपेक्षाओं को धूल-धूसरित कर देगा। जो सदगुरु नहीं है, वह हमेशा तुम्हारी मान्यताओं का समर्थन करेगा। और जो सदगुरु है, वह तुम्हारी मान्यताओं का खंडन करेगा, क्योंकि मान्यताओं के सहारे ही तुम्हारा मन जी रहा है। मान्यताएं गिर जाएं तो मन गिर जाए--और मन गिर जाए तो चैतन्य जग जाए। जो गुरु है और सदगुरु नहीं, वह परंपरावादी होगा, पुराणवादी होगा, लकीर का फकीर होगा; वह तुम्हारे अतीत को ही पीटेगा, अतीत के ही गुणगान गाएगा, क्योंकि अतीत में ही तुम्हारा अहंकार है। जितना महान तुम्हारा अतीत, उतना तुम्हारा बड़ा अहंकार। जो सदगुरु है, वह तुम्हारे अतीत को छिन्न-भिन्न कर देगा। वह कहेगा: कोई अतीत नहीं है, जो बीता सो बीता, जो गया सो गया, और जो अभी नहीं आया है, नहीं आया है।
सदगुरु तुम्हें वर्तमान में ठहराने के सारे उपाय करेगा। उन्हीं उपायों का नाम प्रार्थना है, ध्यान है। प्रार्थना का अर्थ परमात्मा के साथ हाथ जोड़ कर कुछ बातचीत करना नहीं है। प्रार्थना का अर्थ है: प्रेम में झुक जाना; इस अस्तित्व के प्रेम में झुक जाना, भीग जाना, आर्द्र हो जाना। और ध्यान का अर्थ कोई राम-राम जपना नहीं है। ध्यान का अर्थ है: शून्य हो जाना, मिट जाना। प्रेम और ध्यान का अंतिम अर्थ एक ही है: मिट जाना, शून्य हो जाना।
सदगुरु तुम्हें मिटने की कला सिखाएगा; तुम्हें शून्य होने की कला सिखाएगा। साधारण गुरु, मिथ्या गुरु तुम्हें भरेगा जानकारियों से और सदगुरु तुम्हारी जानकारियों को छीन लेगा। सदगुरु तुम्हें फिर आश्चर्य से भर देगा, क्योंकि ज्ञान को हटा लेगा। मिथ्या गुरु के पास किताबों की गंध होगी। मिथ्या गुरु तो ऐसा है जैसे सूखा फूल। किताबों में दबा कर रख देते हैं न; सूखा फूल; न गंध, न जीवन। किताबों में दबा हुआ फूल। बस, फूल का आभास मात्र। समझो कि फूल की तस्वीर--फूल भी नहीं। सदगुरु खिला हुआ फूल है। अभी उसकी जड़ें भूमि में हैं। अभी हरे पत्तों पर उसका नृत्य चल रहा है। सदगुरु जीवंत घटना है। वह किन्हीं सहारों पर खड़ा नहीं होता। वेद न हों, कुरान न हो, बाइबिल न हो, कोई अंतर नहीं पड़ता, सदगुरु का कुछ भी नहीं छिनेगा। लेकिन मिथ्या गुरु का सब छिन जाएगा। उसके तो प्राण वहीं हैं। वह तो तोतों की तरह रट रहा है। तोतों में भी कहते हैं थोड़ी ज्यादा अकल होती है। पंडितों से तो थोड़ी ज्यादा होती है।
मैंने सुना है, एक तोते को खरीदने एक पंडित गया था। सुनी उसने खबर कि अनूठा तोता आया है। तोते वाले की दुकान पर! गायत्री मंत्र बोलता है, नमोकार मंत्र बोलता है! गया देखने। बड़ा शुद्ध उसका उच्चारण था। उसने पूछा दुकानदार से कि क्या इशारे से यह गायत्री बोलेगा? तो दुकानदार ने कहा: आप देखते हैं, इसके बाएं पैर में छोटा सा धागा लटका हुआ है, वह किसी और को दिखाई नहीं पड़ता, पतला सा धागा, काला धागा, बस, आप जरा सा वह धागा खींच देना; जिसको आप दिखला रहे होंगे, उसको पता भी नहीं चलेगा; उसके धागे को खींचते ही बाएं पैर के, यह गायत्री मंत्र बोलता है। और अगर नमोकार मंत्र सुनना हो, तो दाएं पैर में वैसा ही धागा बंधा हुआ है, उसे आहिस्ता से खींच देना। किसी को पता नहीं चलेगा और यह तत्क्षण नमोकार मंत्र बोल देता है। पंडित ने पूछा: और अगर दोनों धागे एक साथ खींच दें? तो तोता बोला: उल्लू के पट्ठे! दोनों एक साथ खींचोगे तो मैं नीचे नहीं गिर जाऊंगा!
तोतों में भी थोड़ी ज्यादा अक्ल होती है। पंडित तो बिलकुल तोते हैं; पोपट! पंडित के भीतर तुम्हें कोई प्रमाण नहीं मिलेगा, उसका अस्तित्व प्रमाण नहीं देगा, उसके आस-पास आभा नहीं होगी, उसके आस-पास गंध नहीं होगी, उसके आस-पास सत्य का कोई आभास भी नहीं होगा। हां, यंत्रवत दोहराएगा वह। अगर तुम खुली आंख से देखते रहो, तो बहुत अड़चन न आएगी मिथ्या को सदगुरु से अलग कर लेने में। और सदगुरु के पास बैठते ही तुम्हारे हृदय में कुछ होना शुरू हो जाएगा। आंखें गीली हो सकती हैं; तुम विवश हो सकते हो।...
कल मीरा यहां बैठे-बैठे रोने लगी। उसने अपने को बहुत रोका, मैं देख रहा था, वह अपने को रोकने की हर चेष्टा कर रही थी, नहीं रोक पाई। समझदार है, तो उसे बड़ी अड़चन भी हो रही थी कि कोई क्या कहेगा! और यह भी उसे पता था कि सामने ही बैठ कर मेरे बोलने में बाधा डाल रही है। फिर बाद में उसने पत्र लिखा कि मुझे क्षमा करना, मैं अवश हो गई! रोक कर भी न रोक सकी! बस हो ही गया! जितनी चेष्टा की, उतनी ही मुश्किल हो गई।
सदगुरु के पास तुम्हारे हृदय के तंतु अनायास नाचने लगते हैं। वहां से तुम ज्ञान लेकर नहीं लौटते, एक सुरभि लेकर लौटते हो।
अब की बेर सुनो नर मूढ़ो, बहुरि न ल्यो अवतरिया।।
कह गुलाल सतगुरु बलिहारी, भवसिंधु अगम गम तरिया।।
तन में राम और कित जाय।...
और कहते हैं, कहां जा रहे हो खोजने?
तन में राम और कित जाय। घर बैठल भेटल रघुराय।।
लाओत्सु का वचन याद आता है। लाओत्सू ने कहा है कि सत्य को पाने के लिए अपने कमरे को भी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं। कमरे से अर्थ घर का नहीं है, कमरे से अर्थ देह का है। कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि सत्य तुम्हारे भीतर विराजमान है। तलाशना है तो वहां!
तन में राम और कित जाय।...
थोड़ी भीतर तलाश करनी है। हम तो बाहर-बाहर भागे रहते हैं, चौबीस घंटे बाहर-बाहर भागे रहते हैं। हमारी धारणा यह है कि जितनी तेजी से भागेंगे उतनी जल्दी पहुंचेंगे। इसकी फिकर ही नहीं है कि बाहर कोई कभी कहीं पहुंचा नहीं। दौड़े बहुत लोग, गिरे अंततः, धूल में गिरे, कब्र में गिरे। बड़े-बड़े दौड़ने वाले कहां पहुंचे? सिकंदर कहां पहुंचे? नेपोलियन कहां पहुंचे? तुम कहां पहुंच जाओगे? मगर हमारा मन कहता है, अगर नहीं पहुंच रहे तो उसका अर्थ है कि तुम धीमे-धीमे दौड़ रहे; जरा तेजी से दौड़ो! उसका भी तर्क साफ समझ में आ जाता है हमें कि बात तो ठीक है, धीरे-धीरे दौड़ोगे, इतनी दौड़ मची है, इतने लोग जा रहे हैं, पिट जाओगे। जरा तेजी से दौड़ो! यह संघर्ष है दुनिया, यह प्रतिस्पर्धा है दुनिया, यहां टक्कर मारो जोर से, यहां किसी की फिकर न करो, लोगों के कंधों पर सिर रखो, लोगों के सिरों की सीढ़ियां बनाओ--मगर चढ़ो! लक्ष्य सामने रखो कि दिल्ली पहुंच कर रहेंगे; कि दिल्ली दूर नहीं है!
और दिल्ली जाकर क्या करोगे? दिल्ली में राजघाट है, जो दिल्ली गया वह राजघाट पहुंच जाता है। फिर पड़े हैं चारों खाने चित राजघाट में।
बाहर दौड़-दौड़ कर सिवाय मृत्यु के कुछ हाथ आता है! मगर सब दौड़ रहे हैं, इसलिए स्वभावतः हम भी दौड़ने लगते हैं। भीड़ का एक प्रभाव होता है। अगर तुम पचास-सौ आदमियों के साथ कहीं जा रहे हो, अगर सब तेज चल रहे हों तो तुम भी तेज चलने लगते हो बिना इसकी फिकर किए कि जा कहां रहे हैं, पहले पूछ तो लें! किसलिए जा रहे हैं? नहीं लेकिन उनकी तेजी संक्रामक होती है। बीमारी की तरह लग जाती है। अगर दो-चार सौ आदमियों की भीड़ मस्जिद में आग लगाती है, कि मंदिर में आग लगाती है, तुम भी आग लगाने में सम्मिलित हो जाते हो। हिंदू धर्म खतरे में है! कि इस्लाम खतरे में है! खतरे में है तो रहने दो खतरे में! इस्लाम के न होने से क्या बिगड़ जाएगा? कि हिंदू धर्म के न होने से क्या बिगड़ने वाला है? होने से ही क्या भला हो गया है? अच्छा ही है खतरे में है! मगर सुना कि इस्लाम खतरे में है कि तुम चले। और तुम्हें कभी इस्लाम की खबर नहीं आती। खबर ही तब आती है जब खतरे में होता है। हिंदू धर्म से तुम्हें कुछ और लेना-देना नहीं है। मगर अगर कोई चिल्ला दे कि खतरे में है, कि बस भागे! फिर तुम ऐसा काम कर गुजरोगे जो तुम अकेले कभी भी नहीं कर सकते थे।
मनोवैज्ञानिक इस पर बहुत खोज करते हैं। और वे कहते हैं कि भीड़ का एक अपना अलग मनोविज्ञान होता है। व्यक्ति अकेला नहीं कर सकता जो काम... अगर एक-एक मुसलमान से पूछो कि तुमने यह जो मंदिर जलाया, तुम अकेले जला सकते थे? तो वह कहेगा कि नहीं। एक-एक हिंदू से पूछो कि तुमने यह जो मस्जिद जला दी, तुम अकेले जला सकते थे? वह कहेगा कि नहीं। मुझे खयाल ही नहीं आता जलाने का। यह बात ही गलत लगती। मगर भीड़ जला रही थी, मैं क्या करूं, मैं तो सम्मिलित हो गया।
हमें सम्मिलित होने की आदतें हो गई हैं। जहां भीड़ जा रही है, हम उसी तरफ चल पड़ते हैं। और सारी भीड़ बाहर जा रही है। उस संबंध में सब राजी हैं--हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध सब बाहर जा रहे हैं। छोटा सा बच्चा अनुकरण करना सीखता है। बाप जहां जा रहे हैं, वह भी करने लगता है वही। आस-पास के लोग जो कर रहे हैं, वह भी करने लगता है वही। सबको कहीं पहुंचना है बाहर। कोई नहीं बताता कहां पहुंचना है। सब उससे कहते हैं, बड़े होकर पता चल जाएगा। और बड़ा होते-होते वह इतना बुद्धू हो जाता है कि फिर खुद भी नहीं पूछता कि कहां जा रहे हो? फिर वह अपने बच्चों को कहने लगता है: घबड़ाओ मत, जब बड़े हो जाओगे, तुमको भी पता चल जाएगा।
किसी को पता नहीं चल रहा है कहां हम जा रहे हैं, क्यों हम धन इकट्ठा कर रहे हैं? क्यों पद, क्यों प्रतिष्ठा? क्या मिलेगा? क्या खाक मिल जाएगा अगर सारी दुनिया भी तुम्हें जान लेगी? अगर तुम्हारा नाम दीवाल-दीवाल पर भी होगा, तो भी क्या हो जाएगा? क्या पा लोगे? और जिसे तुम पाने की तलाश कर रहे हो, वह तुम्हारे भीतर मौजूद है। जिसे तुम खोजने निकले हो, वह खोजने वाले में मौजूद है। चलो, उसको ही ध्याएं! उसकी ही तलाश करें!
आओ फिर से ध्याएं,
चंद्रमुखी संध्याएं,
औ’ सूर्यमुख सबेरे!

गोपन व्यापारों को--
कहा नहीं जाता है,
किंतु कहे बिन भी तो--
रहा नहीं जाता है;
आओ पुनः रचाएं,
संकेत की ऋचाएं;
औ’ सप्तपदी फेरे!
औ’ सूर्यमुख सबेरे!!
राग-रंगी चितवन में--
ओर-छोर बंध जाएं,
पर्वत-से मनसूबे--
बिन साधे सध जाएं,
आओ फिर पिघलाएं,
अलगाव की शिलाएं,
औ’ अजनबी अंधेरे!
औ’ सप्तपदी फेरे!!

आलिंगित श्वासों में--
फिर आदिम गंध भरें,
दुष्यन्ती रागों में--
शाकुन्तल छन्द भरें,
आओ पुनः जगाएं,
सोई स्वर-बल्गाएं,
औ’ गीत-वन घनेरे!
औ’ सप्तपदी फेरे!!

आओ फिर से ध्याएं,
चंद्रमुखी संध्याएं,
औ’ सूर्यमुख सबेरे!
चांद भी भीतर है और सूरज भी भीतर है। भीतर तुम्हारे पूरा आकाश है। उस भीतर की विराटता का नाम ‘राम’ है।
तन में राम और कित जाय।...
और भाई, तुम कहां चले, गुलाल कहते हैं! जितना दूर निकल जाओगे अपने से उतने ही राम से दूर निकल जाओगे। भीतर आओ, लौटो!
...घर बैठल भेटल रघुराय।।
मैं तुमसे कहता हूं! घर बैठे-बैठे उस परम सत्य से मिलन हो जाता है। कहीं जाना नहीं पड़ता। इंच भर यात्रा नहीं करनी पड़ती।
जोगि जती बहु भेष बनावै।...
जोगी हैं, जती हैं, न मालूम क्या-क्या भेष बना रहे हैं! कोई धूल लपेटे बैठा है, किसी ने तिलक-टीके लगा रखे हैं, कोई उलटा खड़ा हुआ है, किसी ने उलटे-सीधे शरीर को तोड़ा-मरोड़ा है, इस सबसे क्या लेना-देना! क्यों राम को सता रहे हो? जरा सोचो तो, जब तुम सिर के बल खड़े हो, तो राम पर क्या गुजर रही है! कि जब तुम उपवास कर रहे हो, तो किसको उपवास करवा रहे हो? राम को ही करवा रहे हो। क्योंकि वही तो बैठा है तुम्हारे भीतर। जब कांटों की सेज पर सो रहे हो, तो किसको सुला रहे हो? क्यों व्यर्थ के उपद्रव खड़े कर रहे हो? मगर इन व्यर्थ के उपद्रवों का बड़ा सम्मान है। इनसे अहंकार को तृप्ति मिलती है, आदर मिलता है।
जोगि जती बहु भेष बनावै।...
फिर न मालूम किस-किस तरह के वेष बनाते हैं लोग! अगर तुम जोगियों के अलग-अलग वेष देखो, अलग-अलग उनके रंग-ढंग देखो, तो बड़े हैरान हो जाओगे। एक से एक मूढ़ता दिखाई पड़ेगी। हालांकि हर मूढ़ता कहीं किसी बहुत गहरे सत्य से शुरू हुई। जैसे तुम्हें मिल जाएंगे कनफटे जोगी, जो कान को फाड़ लेते हैं। अब हुआ न पागलपन! कान के फाड़ने से क्या होगा? लेकिन यह प्रक्रिया शुरू हुई एक महान सदगुरु से, गोरख से। गोरख के मानने वाले अपने को कनफटा जोगी कहते हैं। और गोरख ने कहा था यह, कि फाड़ो अपने कान के पर्दे ताकि मुझे सुन सको! और इन मूढ़ों ने कान के पर्दे वगैरह तो नहीं फाड़े, कान ही फाड़ लिया। गोरख भीतर की बात कर रहे हैं कि बहरे न रहो, वज्र-बधिर हो तुम, थोड़ा सुनो हम क्या कह रहे हैं, ये कान फाड़ कर बैठ गए हैं!
मैं दिल्ली के एक घर में मेहमान था। जिनके घर मेहमान था, वे किसी महात्मा के बड़े भक्त थे। उन्होंने कहा कि हमने महात्मा जी को भी आपसे मिलने बुलाया है; बड़े अदभुत महात्मा हैं! मैंने कहा: उनकी खूबी क्या है? कहा: लंगोट के पक्के हैं! खूब खूबी बताई! खैर ठीक है, अब आ रहे हैं तो, लंगोट के पक्के...! और सच में वे लंगोट के पक्के थे। ऐसा कस कर लंगोट बांधा हुआ था कि भीतर के राम पर क्या गुजर रही होगी! ब्रह्मचर्य का अर्थ लंगोट का पक्का होना हो गया।
हजार तरह की मूढ़ताएं चल पड़ी हैं। और एक से एक वेष!
दुनिया में वेषभूषा प्रतियोगिताएं होती हैं, यह तो भला हो जोगी-जतियों का कि भाग नहीं लेते, नहीं तो उनको कोई जीत नहीं सकता। और वे जैसी कारगुजारियां कर सकते हैं, दूसरा कर भी नहीं सकता। उसका उनको बहुत अभ्यास होता है।
मुझे याद है, एक योगी मेरे गांव में हुआ करते थे, वे किसी को भी डरा कर पैसे ले लेते थे। और उनके डराने का ढंग ऐसा था कि कोई भी डर जाए। सिर्फ लंगोटी बांधते थे वे और साथ में एक जंजीर रखते थे और एक बड़ी चट्टान। चट्टान जंजीर में बंधी हुई, उसको लेकर वे चलते थे। और किसी के भी घर के सामने खड़े हो जाएं, वे जितना मांगे, कि पांच रुपये चाहिए, कि दस रुपये चाहिए, तो देना पड़े। अगर न दो, तो वहीं भीड़ लगा कर उपद्रव खड़ा कर दें। उपद्रव उनका यह था कि वे जननेंद्रिय में--अपना लंगोट निकाल कर फेंक देते--और जननेंद्रिय में जंजीर बांध कर जननेंद्रिय से उस चट्टान को उठवा कर दिखाते। भीड़ लग ही जाए! और घर के बाल-बच्चे-स्त्रियां, लोग कहें कि भैया तुम पांच रुपये लो और जाओ! यह काम तुम कहीं और दिखाना! और वे कहें, यह तो कुछ नहीं, अरे चलती कार को खींच लूं!
अगर तुम्हें यह सब जोगी-जतियों का तमाशा देखना हो तो कभी कुंभ के मेले में पहुंच जाना चाहिए! वहां सब कमबख्त इकट्ठे होते हैं! उनका दर्शन करके तुम्हारा चित्त बड़ा प्रसन्न होगा।
जोगि जती बहु भेष बनावै। आपन मनुवां नहिं समुझावै।।
और सब उपद्रव करते हैं, एक बात भर नहीं करते कि अपने मन को हल नहीं करते, उस मन के पार नहीं जाते।
पूजहिं पत्थल जल को ध्यान।...
पत्थर को पूजेंगे, जल का ध्यान करेंगे--सूर्य-नमस्कार हो रहा है! पत्थरों पर रंग पोत लेंगे। और देर नहीं लगती, किसी भी पत्थर पर रंग पोत लो, हनुमानजी हो गए! पूजा शुरू!
मैंने सुना है, एक सूफी फकीर अपने शिष्य पर बहुत प्रसन्न हुआ और जब वह जाने लगा यात्रा पर--वह काबा की यात्रा को जा रहा था--तो जिस गधे पर बैठ कर वह यात्रा कर रहा था, वह अपने शिष्य को दे गया। फकीर तो चला गया, अब शिष्य ने कहा कि गुरु का गधा है, कोई साधारण गधा तो है नहीं यह, इसकी सेवा करो! तो वह उस गधे की सेवा करता था। संयोग की बात गधा मर गया। ज्यादा सेवा की होगी! गधों को सेवा की आदत होती भी नहीं। कुछ ज्यादा ही सेवा कर दी दिखता है! ज्यादा नहलाया-धुलाया होगा, रगड़-रगड़ कर, उसका खात्मा कर दिया, वह मर गया। मर गया तो उसने उसकी समाधि बनाई। और समाधि पर बैठ कर रो रहा था। क्योंकि गुरु एक दान दे गए थे, एक भेंट कर गए थे, पता नहीं क्या राज था इसमें--और यह मर गया! अब जो कर सकते थे, समाधि बना दी संगमरमर की, उस पर बैठा रो रहा था फूल चढ़ा कर। गांव में और लोग आए, उन्होंने भी देखा और सोचा कि जरूर कोई महापुरुष की समाधि है। और कोई फूल चढ़ा गया, कोई पैसा चढ़ा गया। चढ़ोतरी बढ़ने लगी। वह आदमी वहीं बैठा रहे, चढ़ोतरी इकट्ठी करने लगा वह, धीरे-धीरे उसने वहां एक मंदिर बना लिया। गधे की तो बात ही भूल-भाल गया वह। काफी भीड़-भाड़ इकट्ठी होने लगी वहां! लोग मनौतियां करने लगे। मनौतियां पूरी भी होने लगीं। मनौतियों का बड़ा मजा है; अगर सौ आदमी मनौती करें, गधे की कब्र ही हो, तो भी पचास की तो गणित के नियम से ही पूरी हो जाने वाली है। जिनकी पूरी हो गई, वे तो चढ़ोतरी चढ़ाने आएंगे। और जिनकी पूरी नहीं हुई, वे किसी और गधे की कब्र की तलाश करेंगे। धीरे-धीरे जिनकी पूरी होंगी, उनकी भीड़ बढ़ती जाएगी। और जब हजारों लोग कहेंगे कि हमारी मनौती पूरी हुई, हमारी पूरी हुई, तो नए आने वाले लोग भी सम्मोहित होते हैं। कि जब इतने लोगों की पूरी हुई, तो हमारी भी होगी; क्यों नहीं होगी? अरे, श्रद्धा का तो फल मिलता ही है!
फिर काबा से गुरु वापस लौटा। इधर तो मंदिर बन गया था, समाधि लग गई थी। गुरु को देख कर शिष्य को याद आया कि अरे, यह क्या मैंने किया? एकदम गुरु के पैर पकड़ लिए, कहा, क्षमा करिए, माफ करिए! मगर आप बड़ा चमत्कारी गधा दे गए थे। लोगों की मनौतियां पूरी हो रही हैं! और लोगों की हों या न हों, मेरे तो भाग्य खुल गए! धन की वर्षा हो रही है। झरत दसहुं दिस मोती! मेला ही लगा रहता है यहां। गुरु ने कहा: तू फिकर मत कर, यह गधा था ही चमत्कारी! इसकी मां भी बड़ी चमत्कारी थी! शिष्य ने पूछा कि इसकी मां के संबंध में कुछ समझाइए। उसने कहा: समझाना क्या, अरे जैसे तू इसकी कब्र का मजा ले रहा है, इसकी मां की कब्र का मजा हम ले रहे हैं! हमारे गांव में इसकी मां की हमने कब्र बनवा ली है। यह खानदानी चमत्कारी था! यह कोई साधारण गधा नहीं था, बड़ा पहुंचा हुआ गधा था।
पत्थर पूजे जाते हैं, मिट्टी पूजी जाती है, पानी पूजा जाता है। किससे तुम पूजा करवा रहे हो--और कभी इसका सोचा? पत्थर के सामने किसको झुका रहे हो? राम को झुकने के लिए कहां-कहां ले जा रहे हो! राम की कितनी कवायदें करवा रहे हो!
पूजहिं पत्थल जल को ध्यान। खोजत धूरहिं कहत पिसान।।
धूल हाथ लगती है जिंदगी भर में, मगर धूल को तुम आटा समझ रहे हो! धूल बटोर रहे हो और समझ रहे हो भोजन है। मिट्टी, पत्थर, इनसे पुष्टि नहीं होगी; इनसे तृप्ति नहीं होगी; इनसे परितोष नहीं होगा।
आसा तृस्ना करै न थीर।...
असली काम कब करोगे? कि तृष्णा को थिर करो, कि वासना की दौड़ को रोको, कि भविष्य की आशा का त्याग करो।
आसा तृस्ना करै न थीर। दुविधा-मातल फिरत सरीर।।
और आशा-तृष्णा के चक्कर में पड़े हुए, पागल हुए, दीवाने हुए... ‘दुविधा-मातल’ शब्द बड़ा प्यारा है! अंग्रेजी में एक शब्द है: स्किजोफ्रेनिया। ठीक इसका अनुवाद: दुविधा-मातल। जो दो में बंट गया है, उसको कहते हैं: स्किजोफ्रेनिक: जो एक नहीं है, जो दो है। पल में कुछ, पल में कुछ। और करीब-करीब सभी इसी हालत में हैं। अभी देखो तो बड़े प्रसन्न थे, अभी देखो तो रो रहे हैं! अभी देखो तो बड़े प्रेमपूर्ण मालूम हो रहे थे, अभी देखो तो लट्ठ लेकर खड़े हो गए हैं! अभी कहते थे तुम्हारे बिना न जी सकूंगा, अब कहते हैं कि तुम्हें बिना मारे न जी सकूंगा। जरा लोगों का तुम... दुविधा-मातल, दो में बंटे हैं और दीवाने हैं। ‘दुविधा-मातल फिरत सरीर।’
लोक पुजावहिं घर-घर धाय।...
और इनकी आकांक्षा एक ही है कि लोग इनको पूजें। इनकी आकांक्षा परमात्मा पाने की नहीं है। पूजा मिले, सम्मान मिले, सत्कार मिले! लोग कहें संत हो तुम, महात्मा हो तुम!
लोक पुजावहिं घर-घर धाय।...
और इसके लिए घर-घर जाते हैं। बजाते हैं चमीटा घर-घर के सामने।
...दोजख कारन भिस्त गंवाय।।
और इस अहंकार की पूजा से नरक में पड़ोगे।
...दोजख कारन भिस्त गंवाय।।
और नरक के लिए बहिश्त को, स्वर्ग को गंवा रहे हो। अहंकार-शून्य होना स्वर्ग को पा लेना है, अहंकारपूर्ण होना नरक में पड़ जाना है।
सुर नर नाग मनुष औतार। बिनु हरिभजन न पावहिं पार।।
एक बात पक्की स्मरण रखना कि परमात्मा की स्मृति जब तक तुम्हारे प्राण-प्राण में न उठने लगे, श्वास-श्वास में न उठने लगे, तब तक भटकते ही रहोगे। तब तक कितने ही पत्थर पूजो, कितनी ही गंगा जाओ, कितनी ही काशी, कितने ही काबा, कुछ लाभ नहीं होने का। रोएं-रोएं से प्रभु का स्मरण उठना चाहिए।
मैं अकिंचन बन गया हूं,
द्वार पर आकर तुम्हारे!

दर्द की सरिता उफनती ,
ढह रहे मन के कगारे,
मैं जिधर भी देखता हूं--
बेबसी आंचल पसारे

आज निष्फल हो रहे हैं--
धैर्य के परितोष सारे,
धार का तृण बन गया हूं,
द्वार पर आकर तुम्हारे!

आंसुओं के पालने में--

पीर ने मुझको झुलाया,
याद के गीले करों ने--
थपकियां देकर सुलाया;

लोरियों के संग जगते--
दुधमुहे सपने बिचारे;
धूल का कण बन गया हूं,
द्वार पर आकर तुम्हारे!

शब्द से इतना भरा हूं,
हो रही अवरुद्ध वाणी
पढ़ सको तो स्वयं पढ़ लो--
याचनाओं की कहानी;

हिचकियों में डूबती हैं,
करुण गीतों की पुकारें,
चिर निमंत्रण बन गया हूं,
द्वार पर आकर तुम्हारे!
सब तरफ परमात्मा मौजूद है, अगर तुम्हें भीतर दिखाई पड़ जाए तो फिर द्वार-द्वार में वही मौजूद है, पत्ते-पत्ते में वही मौजूद है। मगर पहला अनुभव होना चाहिए स्वयं के भीतर। और वह अनुभव एक ही तरह हो सकता है: हरिभजन। हरिभजन औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। औपचारिकता हुई तो व्यर्थ है। अनौपचारिक होना चाहिए। औपचारिक का अर्थ है: करना है, इसलिए कर रहे हैं, कर्तव्य निभा रहे हैं, कि रोज पांच मिनट बैठ कर माला फेर लेते हैं, हरिभजन कर लेते हैं। जल्दी-जल्दी करते हैं कि समय खराब न हो। आंख खोल-खोल कर घड़ी देखते रहते हैं कि पांच मिनट तो नहीं हो गए! ऐसे नहीं चलेगा। प्राणपूर्ण होना चाहिए; आह्लादपूर्ण होना चाहिए; मस्ती में डूब कर होना चाहिए; समय भूल कर होना चाहिए; कण-कण नाचे तुम्हारा, रोआं-रोआं पुलकित हो, हर्षोन्माद से भरे, तब जानना कि हरिभजन।
और यह हो सकता है। इसमें जरा अड़चन नहीं है। सिर्फ तुम्हारी चेतना जो बाहर दौड़ रही है, उसे भीतर की तरफ दौड़ाना है। भीतर दौड़ते ही हरिभजन शुरू हो जाता है। क्योंकि राम का अनुभव होता है तो उत्सव शुरू हो जाता है।
लो फिर से आ गए
मिलने के दिन पिया!
मिलने के दिन पिया!

फिर अलि के दल आए,
बगिया गुन-गुन गाए;
सौरभ के मृग छौने--
कस्तूरी-धन लाए;
गोरे कुछ सांवरे,
प्रसून हुए बावरे;
लो फिर से आ गए--
खिलने के दिन पिया!
मिलने के दिन पिया!!

फिर यम-संयम डोले,
मंत्र हुए मिठबोले,
फगुनाहट कण-कण में--
वासंती रस घोले,
सीप सरीखी पलकें,
मादक सपने छलकें;
फिर आए प्रण के व्रण--
छिलने के दिन पिया!
मिलने के दिन पिया!

फिर सांसें गरमाईं,
अंगारे भर लाईं,
चंदन-तन कसने को--
फिर बाहें अकुलाईं,
अंग-अंग में अनंग,
छेड़ रहा जल-तरंग;
फिर आए उधड़े मन--
सिलने के दिन पिया! मिलने के दिन पिया!
लौटो भीतर, तो मिलन का क्षण आ जाए! और एक दफे झलक मिल जाए, स्वयं के भीतर जो विराजा है, तो सारा जगत उसी के अस्तित्व से भर जाता है।
कारन धै धै रहत बुलाय।...
और वह तुम्हें बुला रहा है, रह-रह कर बुला रहा है, मगर तुम सुनो तब! तुम इतने ऊहापोह में उलझे हो, तुम इतनी दौड़ में लगे हो, आपा-धापी में, कि सुने कौन?
...तातें फिर फिर नरक समाय।।
और इसी आपाधापी में तुम बार-बार नरक में गिर रहे हो, बार-बार दुख में गिर रहे हो।
अबकी बेर जो जानहु भाई।...
कितनी बार कर चुके यह भूल, अब जागो! अब मत दोहराओ इसे!
...अवधि बिते कछु हाथ न आई।।
चूक जाओगे मनुष्य का जन्म तो फिर मुश्किल होगा। यह अवधि है, यह ठीक-ठीक समय है, जिसका उपयोग कर लो, क्योंकि: ‘अवधि बिते कछु हाथ न आई।’ और किसी योनि में परमात्मा नहीं पाया जा सकता। मनुष्य चौरास्ता है। इससे सब तरफ रास्ते जाते हैं। चाहो तो वापस लौट जाओ चौरासी कोटि योनियों में, चाहो तो परमात्मा की राह पकड़ लो।
सदा सुखद निज जानहु राम।...
और एक दफा भीतर की पहचान हो जाए, तो पाओगे सदा सुख की वर्षा हो रही है। झरत दसहुं दिस मोती!
...कह गुलाल न तौ जमपुर धाम।।
और यदि नहीं यह किया, तो गुलाल कहते हैं: मेरी मजबूरी है, कहना पड़ेगा, कि फिर जाओगे यम के हाथों में; फिर-फिर मृत्यु के हाथों में पड़ोगे।
क्रांति घट सकती है। परमात्मा के सामने झुक जाओ--अपने भीतर ही, झुक जाओ!
यों तो मेरा तन माटी है,
तुम चाहो कंचन हो जाए!

तृषित अधर कितने प्यासे हैं,
तृष्णा प्रतिपल बढ़ती जाती,
छाया भी तो छूट रही है,
विरह-दुपहरी चढ़ती जाती;
रोम-रोम से निकल रही हैं--
जलती आहों की चिंगारी;
यों तो मेरा मन पावक है,
तुम चाहो चंदन हो जाए!

मेरे जीवन की डाली को--
भायी कटु शूलों की माया,
आज अचानक अरमानों पर--
सारे जग का पतझर छाया,
असमय वायु चली कुछ ऐसी,
पीत हुई चाहों की कलियां,
यों तो सूखी मन की बगिया,
तुम चाहो नंदन हो जाए!

अब तो सांसों का सरगम भी--
खोया-खोया सा लगता है,
अनगिन यत्न किए मैंने पर--
राग न कोई भी जगता है;
साध-मींड़ के खिंचने पर भी--
स्वर-संधान नहीं हो पाता;
यों तो टूटी-सी मन-वीणा,
तुम चाहो कंपन हो जाए!

मेरा क्या है इस धरती पर--
सिर्फ तुम्हारी ही छाया है,
चांद-सितारे, तृण-तरु पल्लव,
सिर्फ तुम्हारी ही माया है,
शब्द तुम्हारे, अर्थ तुम्हारे,
वाणी पर अधिकार तुम्हारा,
यों तो हर अक्षर क्षर मेरा,
तुम चाहो वंदन हो जाए!
झुको, भीतर झुको! अपने ही भीतर झुको, वहीं काबा और वहीं कैलाश! और भीतर झुक जाओ तो क्रांति घट जाए--मिट्टी सोना हो सकती है; सूखी बगिया नंदन हो सकती है; टूटी वीणा फिर अपूर्व रागों से भर सकती है।
यों तो हर अक्षर क्षर मेरा,
तुम चाहो वंदन हो जाए!

आज इतना ही।

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