YOG/DHYAN/SADHANA

Jeevan Sangeet 02

Second Discourse from the series of 9 discourses - Jeevan Sangeet by Osho.
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उसे अनबंधा किया जा सकता है, जो कारागृह में हो; उसे मुक्त किया जा सकता है। जो सोया हो, उसे जगाया जा सकता है। लेकिन जो जागा हो और इस भ्रम में हो कि सो गया हूं, उसे जगाना बहुत मुश्किल है। और जो मुक्त हो और सोचता हो कि बंध गया हूं, उसे खोलना बहुत मुश्किल है। और जिसके आस-पास कोई जंजीरें न हों और आंख बंद करके सपना देखता हो कि मैं जंजीरों में बंधा हूं, और पूछता हो, कैसे तोडूं इन जंजीरों को, कैसे मुक्त हो जाऊं, कैसे छूटूं, तो बहुत कठिनाई है।
रात्रि इस संबंध में पहले सूत्र पर मैंने आपसे कुछ कहा।
मनुष्य की आत्मा परतंत्र नहीं है और हम उसे परतंत्र माने हुए बैठे हैं।
मनुष्य की आत्मा को स्वतंत्र नहीं बनाना है, बस यही जानना है कि आत्मा स्वतंत्र है।
आज दूसरे सूत्र में, दूसरी दिशा से, उसी तरफ फिर इशारा करना जरूरी है। एक ही चांद हो, बहुत अंगुलियों से इशारे किए जा सकते हैं। एक ही सत्य है, बहुत द्वारों से प्रवेश किया जा सकता है। दूसरे सूत्र में यह समझना जरूरी है कि हम क्या खोज रहे हैं?
हर आदमी कुछ खोज रहा है--कोई धन, कोई यश। और जो धन और यश से बचते हैं, वे धर्म खोजते हैं, मोक्ष खोजते हैं, परमात्मा खोजते हैं। लेकिन खोजते जरूर हैं। खोजने से नहीं छूटते हैं।
आमतौर से यही समझा जाता है कि जो धन खोजता है, वह अधार्मिक है और जो धर्म खोजता है, वह धार्मिक है।
और मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जो खोजता है, वह अधार्मिक है और जो खोजता नहीं, वह धार्मिक है।
आप क्या खोजते हैं, इससे कोई संबंध नहीं है। जब तक आप खोजते हैं, तब तक आप अपने से दूर निकल जाएंगे। जो खोजेगा, वह स्वयं से दूर चला जाएगा। जो नहीं खोजेगा, वही स्वयं में आ सकता है। खोज का अर्थ ही है, खोज का अर्थ है: दूर जाना।
खोज का क्या अर्थ है?
खोज का अर्थ है: जहां हम नहीं हैं, वहां जाना है; जो हमारे पास नहीं है, उसे पाना है; जो नहीं मिला है, उसे ढूंढना है। और जो मैं हूं, वह तो मुझे मिला है, वह तो सदा उपलब्ध है। वह तो मैं हूं ही। उसे कैसे खोजा जा सकता है? और जितना मैं खोज में लग जाऊंगा, उतना ही उसे खो दूंगा, जो मैं हूं।
और हम सबने खोज में उलझ कर स्वयं को खो दिया है। फिर कोई धन खोजता है, कोई यश खोजता है, कोई मोक्ष खोजता है, इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता। ये एक ही बीमारी के अलग-अलग नाम हैं। खोजने की बीमारी है। बुनियादी बीमारी क्या खोजते हैं इसकी नहीं है, बुनियादी बीमारी खोजने की है। बिना खोजे नहीं रह सकते हैं--खोजेंगे! खोजने का अर्थ है: दृष्टि दूर चली जाएगी। खोजेंगे और खो देंगे खुद को!
स्वभावतः जो दूर है उसे खोजा जा सकता है। जो पराया है उसे खोजा जा सकता है। जिसके और मेरे बीच में फासला है, डिस्टेंस है, उसे खोजा जा सकता है। लेकिन जिसके और मेरे बीच में सुई भर भी फासला नहीं, जो और मैं एक ही हूं, जिससे मैं दूर चाहूं तो भी नहीं जा सकता, जहां भी चला जाऊं जो मेरे साथ ही होगा, उसे कैसे खोजा जा सकता है?
खोजना सबसे बड़ा भ्रम है। और खोजने वाला भटक जाता है। और खोजने के भ्रम की जो सबसे बड़ी आधारशिला है, वह यह है कि जब हम एक खोज से ऊब जाते हैं, तो दूसरी खोज सब्स्टीट्यूट की तरह पकड़ लेते हैं, लेकिन खोजना जारी रहता है।
एक आदमी धन खोजते-खोजते ऊब गया है। अब उसने धन का अंबार लगा लिया है। अब वह कहता है, अब धन में कुछ रस नहीं है, अब हम धर्म खोजेंगे! इसलिए तो यह होता है कि जिनके पास धन ज्यादा हो जाता है, वे धर्म को खोजने निकल जाते हैं।
धनी ही धर्म को खोजने क्यों निकलते हैं, पता है? जैनों के चौबीस तीर्थंकर ही राजाओं के लड़के हैं। बुद्ध राजा के लड़के हैं। राम और कृष्ण राजाओं के लड़के हैं। हिंदुस्तान के सब तीर्थंकर, सब बुद्ध, सब अवतार राजाओं के लड़के हैं। धनियों के बेटे धर्म को खोजने क्यों निकल जाते हैं?
धन इकट्ठा हो गया। अब खोज में कोई रस न रहा। जो मिल जाता है, उसकी खोज में कोई रस नहीं रह जाता। अब उसे खोजना है, जो नहीं मिला है। तो धन से ऊबा हुआ आदमी धर्म खोजने लगता है। संसार से ऊबा हुआ आदमी मोक्ष खोजने लगता है।
खोज बदल जाती है, लेकिन खोज जारी है। और खोज करने वाले का जो चित्त है, वह वही का वही है, चाहे आप कुछ भी खोजें।
एक दुकानदार है, सुबह से उठ कर बैठा है दुकान पर और धन की चिंता कर रहा है। एक भगवान का खोजी है, वह भी सुबह से उठ कर मंदिर में बैठ गया है और भगवान को पाने की उतनी ही चिंता कर रहा है जितना दुकानदार धन को पाने की। एक संसारी है, दौड़ रहा है, दौड़ रहा है, इकट्ठा कर रहा है। संन्यासी को देखें, वह भी दौड़ रहा है। दोनों एक-दूसरे की तरफ पीठ किए हुए हैं, लेकिन दौड़ में कोई फर्क नहीं है, दोनों दौड़ रहे हैं। दौड़ जारी है। संसारी भी मरते वक्त उतना ही परेशान मर रहा है कि जो चाहा था, वह नहीं मिल पाया है। और संन्यासी भी उसी परेशानी में मर रहा है कि जिसके दर्शन चाहे थे, नहीं हो पाए। दौड़ जारी है।
मैं आपको यह समझाना चाहता हूं कि असली सवाल दौड़ से मुक्त होने का है, दौड़ से छूट जाने का है। दौड़ का अर्थ ही यही है कि मेरी नजर किसी और पर लगी है। और जब तक मेरी नजर किसी और पर लगी है तो स्वयं पर कैसे हो सकती है? चाहे फिर परमात्मा पर लगी हो और चाहे दिल्ली के सिंहासन पर लगी हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरी नजर कहीं और है। वहां नहीं है, जहां मैं हूं।
यह दौड़ने वाले चित्त का रूप है। फिर एक ऑब्जेक्ट बदल लिया। एक दौड़ का लक्ष्य बदल लिया, दूसरा लक्ष्य तय कर लिया। लेकिन काम जारी है, दौड़ने वाला दौड़ रहा है।
एक कोल्हू का बैल चल रहा है, वह कौन सी चीज का तेल निकालता है इससे थोड़े ही फर्क पड़ता है। कोल्हू के बैल को चलना पड़ता है, तेल किसी चीज का निकलता हो। तेल कोई भी निकलता हो, कोल्हू का बैल चलता है। दौड़ने वाला चित्त दौड़ता है, वह किस चीज के लिए दौड़ रहा है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन हम फर्क करते हैं। हम कहते हैं, यह संसारी आदमी है, यह धन के पीछे मरा जा रहा है! यह बहुत आध्यात्मिक आदमी है, यह भगवान को खोज रहा है!
लेकिन ये दोनों एक जैसे आदमी हैं, इनमें कोई भी फर्क नहीं है। दोनों दौड़ रहे हैं। दोनों किसी चीज को पाने के लिए पागल हैं। दोनों का दिमाग कोई आकांक्षा कर रहा है। दोनों अपने से बाहर के लिए पीड़ित हैं। दोनों अपने से बाहर कहीं पहुंच जाने के लिए आतुर हैं। दोनों प्यासे हैं। दोनों कहते हैं, वह मिल जाएगा तो सुख होगा, नहीं तो सुख नहीं हो सकता। कोई और चीज है, जो मिल जाए तो आनंद होगा, अन्यथा मैं दुखी रहूंगा। उस चीज का नाम अ ब स कुछ भी हो सकता है। नाम बदल लेने से कोई अंतर नहीं पड़ता।
दौड़ने वाला चित्त. दौड़ने वाला चित्त ही सत्य की खोज में, खोजने वाला चित्त ही सत्य की खोज में सबसे बड़ी बाधा है।
और क्या रास्ता है? आप कहेंगे, अगर खोजें न, फिर क्या होगा? फिर तो जैसे हम हैं, वैसे ही रह जाएंगे?
नहीं, अगर आपने खोज जारी रखी, तो जैसे आप हैं, वैसे ही आप रह जाएंगे। अगर आप एक क्षण को भी खोज छोड़ दें, तो आप वह हो जाएंगे, जैसे आप अब तक कभी भी नहीं रहे। लेकिन एक क्षण को भी खोज छोड़ना बहुत मुश्किल है।
खोज छोड़ने का मतलब है: एक क्षण को चित्त कुछ भी नहीं खोज रहा है। हमने कह दिया: नहीं हमें कुछ पाना है, नहीं हमें कहीं जाना है, न हमें कुछ होना है; कोई बिकमिंग नहीं हमारी, कोई, कोई मंजिल नहीं हमारी, हम ही काफी हैं। हम जैसे हैं, वही काफी हैं। एक क्षण को हम खड़े हो गए हैं। सब दौड़ बंद हैं, सब हवाएं बंद हैं--न पत्ता हिलता है, न तरंग उठती है, न हम कहीं जाते हैं, न किसी को पुकारते हैं, न कहीं प्रार्थना करते हैं, न हाथ जोड़ते हैं, न कोई तिजोरी बंद करते हैं, न कोई शास्त्र। हम रह गए हैं खड़े हुए। हम चुप हो गए हैं, हम मौन हैं, हम खोज नहीं रहे हैं। इस शांत क्षण में वह प्रकट हो जाता है, जो सदा से ही उपलब्ध है, जिसे खोजने की कोई जरूरत नहीं है। जिसे दौड़-दौड़ कर हम भूले हुए हैं।
चीन में एक अदभुत विचारक हुआ, लाओत्सु। लाओत्सु ने एक वचन कहा है, कहा है: ‘जब तक खोजा तब तक नहीं पाया और जब छोड़ दी खोज तो पाया कि जिसे खोज रहे थे, वह खुद ही खोजने वाला था।’ जैसे कोई खुद को ही खोजने चला जाए, तो कितना ही दूर जाए, कितना ही दूर जाए, कहां खोज पाएगा?
सुना है मैंने, एक आदमी रात शराब पीकर घर आ गया है। अपने घर पहुंच गया है। पैर की आदत है रोज। कोई पैर को रोज-रोज जानना तो नहीं पड़ता। आप अपने घर जाते हैं, तो सोचना तो नहीं पड़ता कि अब बाएं घूमें, अब दाएं घूमें, अब यह अपना घर आ गया। ऐसा सोचना नहीं पड़ता। यांत्रिक आदत है। आप कुछ भी सोचते रहें, पैर बाएं घूम जाते हैं, घर पहुंचा देते हैं, सीढ़ियां चढ़ जाते हैं, आप अंदर हो जाते हैं, कपड़े उतार देते हैं, खाना खाने लगते हैं। शायद ही सोचते हैं कि अपना घर आ गया।
उस आदमी ने शराब पी ली है, तो भी अपने घर पहुंच गया। लेकिन शराब के नशे में है। और अपने घर के पास जाकर उसे शक हुआ कि कहीं मैं किसी और के घर के पास तो नहीं आ गया हूं। उसने पास-पड़ोस के लोगों से कहा कि भाइयो, मैं जरा बेहोश हूं, मुझे मेरे घर पहुंचा दो।
वह अपनी सीढ़ियों पर बैठा हुआ है। आस-पड़ोस के लोग हंसी-मजाक करने लगे। और वह कह रहा है कि आप हंसी-मजाक मत करिए, मुझे मेरे घर पहुंचा दीजिए, मेरी मां मेरा रास्ता देखती होगी।
और लोग उसे हिलाते हैं और वे कहते हैं, खूब मजा कर रहे हो, अपने घर में बैठे हो!
वह आदमी कहता है: देखो, व्यर्थ की बातें मत करो। मेरा घर कहां है, मुझे मेरे घर पहुंचा दो।
उसकी मां की नींद खुल गई है। आधी रात है। वह बाहर उठ कर आई है। वह अपने बेटे के सिर पर हाथ रख कर कहती है कि बेटा, यह तेरा घर है, तुझे हो क्या गया?
वह उसका बेटा उसके पैर पकड़ लेता है और कहता है: माई, मुझे मेरे घर पहुंचा दे, मेरी मां मेरा रास्ता देखती होगी!
पास-पड़ोस में कोई बुद्धिमान आदमी है। बुद्धिमानों की कोई कमी तो नहीं है। सब जगह बुद्धिमान भरे हुए हैं। बुद्धिमानों से बड़ी परेशानी है। क्योंकि बुद्धू को यह भी पता होता है कि बुद्धू हूं, बुद्धिमान को यह भी पता नहीं होता। एक बुद्धिमान आ गया, उसने कहा: ठहर! मैं बैलगाड़ी जोत कर ले आता हूं, तुझे तेरे घर पहुंचा देता हूं।
पड़ोस के लोगों ने कहा: क्या पागलपन हो रहा है यह, वह आदमी अपने घर के द्वार पर बैठा हुआ है! अगर तुम बैलगाड़ी जोत कर ले आए--और तुम उसे कहीं भी ले जाओ दुनिया में, वह घर से और दूर चला जाएगा।
लेकिन बुद्धिमान नहीं माना। वह बैलगाड़ी जोत कर ले आया। उसने कहा: कहीं भी जाना हो तो बैलगाड़ी की जरूरत पड़ती है।
अब अपने घर जाने में--अपने ही घर मौजूद, बैलगाड़ी की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन तर्क तो ठीक है कि कहीं भी जाना हो तो बैलगाड़ी की जरूरत पड़ती है।
उस शराब पीए आदमी को बैलगाड़ी में लोग बिठाने लगे। उसकी मां चिल्लाने लगी: यह क्या पागलपन कर रहे हो! क्योंकि जो अपने घर ही मौजूद है, उसे अगर तुम बैलगाड़ी में बिठा कर जितना भी दूर ले जाओगे, वह उतना ही दूर हो जाएगा! लेकिन कौन सुने!
हम सब भी ऐसी हालत में हैं। हम जिसे खोज रहे हैं, वहीं हम खड़े हैं। हम जिसे पुकार रहे हैं, वह वही है, जो पुकार रहा है।
यह बड़ी अजीब स्थिति है। और इस अजीब स्थिति की वजह से बड़ी मुश्किल है। जितना पुकारते हैं, जितना खोजते हैं, उतना मुश्किल होती चली जाती है। और खयाल भी नहीं आता कि एक बार हम भीतर तो देख लें कि कौन है, जो खोज रहा है?
इसलिए मैं आपसे कहता हूं: धार्मिक आदमी वह नहीं है, जो पूछता है, क्या मैं खोजूं? धार्मिक आदमी वह है, जो पूछता है कि ‘यह कौन है, जो खोजता है?’ यह सवाल ही नहीं है कि क्या हम खोजें? अधार्मिक आदमी यह पूछता है, क्या मैं खोजूं? धार्मिक आदमी पूछता है, यह कौन है, जो खोज रहा है? हम पहले इसे तो खोज लें। फिर हम कुछ और खोजेंगे। पहले अपने को तो खोज लें, फिर हम परमात्मा को खोजने निकलेंगे। पहले स्वयं को तो जान लें, फिर हम धन को भी जान लेंगे, फिर हम जगत को भी जान लेंगे। और जो स्वयं को ही नहीं जानता वह और क्या जान सकेगा?
धार्मिक आदमी यह नहीं पूछता हुआ आता कि परमात्मा कहां है? और जो आदमी पूछता है, परमात्मा कहां है, उसका धर्म से कोई भी संबंध नहीं है। धार्मिक आदमी यह नहीं पूछता कि मोक्ष कहां है? और जो पूछता है, उसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। धार्मिक आदमी यह पूछता है, यह मुक्त होने की आकांक्षा किसकी है? यह कौन है जो मुक्त होना चाहता है? यह परमात्मा की प्यास किसकी है? यह कौन है जो परमात्मा की मांग करता है? यह आनंद की आकांक्षा किसकी है? यह कौन है जो आनंद के लिए रो रहा है, तड़प रहा है, पुकार रहा है? यह कौन हूं मैं? यह खोजने वाला कौन है, इसे तो जान लूं? इसे तो पहचान लूं?
लेकिन धर्म के नाम पर अब तक व्यर्थ की बातें ही सिखाई और समझाई गई हैं। धर्म की सारी दिशा ही गलत कर दी गई है।
धर्म का कोई भी संबंध खोज से नहीं, खोज के विषय से नहीं, खोजने वाले से है, दि सीकर। वह कौन है, जो खोज रहा है? और इसे खोजना हो, तो कहां जाना पड़ेगा खोजने? कहां जाना पड़ेगा--हिमालय, बद्री-केदार, काशी--कहां जाना पड़ेगा?
एक गांव में बड़ी भीड़ थी। एक फकीर अपने झोपड़े से निकला और लोगों से पूछने लगा, बड़ी भीड़ है, सारे लोग कहां जा रहे हैं?
तो उन लोगों ने कहा: तुम्हें पता नहीं, एक आदमी हमारे गांव का मक्का-मदीना होकर लौटा है। ये लाखों लोग उसके दर्शन करने जा रहे हैं।
उस फकीर ने कहा: धत्‌ तेरी की! मैं तो समझा कि किसी आदमी को दर्शन करने मक्का-मदीना आए हुए हैं, इसलिए लोग जा रहे हैं। क्योंकि इतनी भीड़! एक आदमी मक्का-मदीना हो आए, इसमें क्या मतलब है? जब मक्का-मदीना किसी आदमी के पास आते हैं, तब कुछ मतलब होता है। वह वापस अपने झोपड़े के भीतर चला गया।
धार्मिक आदमी वह नहीं है, जो ईश्र्वर के पास पहुंच जाता है; धार्मिक आदमी वह है, जो अपने पास पहुंच जाता है। क्योंकि अपने पास पहुंचते ही ईश्र्वर आ जाता है। ईश्र्वर को आप नहीं खोज सकते हैं, ईश्र्वर ही आपको खोज सकता है।
हम कैसे ईश्र्वर को खोज सकते हैं? हम तो अपने को ही नहीं खोज पाते हैं, अपने को ही नहीं जान पाते हैं और ईश्र्वर को जानने की कामना जगाते हैं!
अहंकार है मनुष्य का कि मैं ईश्र्वर को पा लूं। यह सबसे बड़ा अहंकार है। धन पाने वाले का अहंकार इतना बड़ा नहीं है। इसलिए संन्यासियों से ज्यादा दंभी आदमी खोजना बहुत मुश्किल है। बड़ा ईगो है, बड़ा अहंकार है। काहे का अहंकार है? ईश्र्वर को पा लेने का भ्रम। और ईश्र्वर को कोई कभी नहीं पा सकता है। बस कोई अपने को पा ले, और ईश्र्वर को पा लेता है। और ईश्र्वर के पास कोई कभी नहीं जा सकता है। कोई अपने पास आ जाए, और ईश्र्वर उसके पास आ जाता है।
इसलिए दूसरा सूत्र आपसे कहना चाहता हूं: खोजें मत, ठहरें! दौड़ें मत, रुकें! किसी और पर नजर हटाएं, लेकिन किसी और के लिए नहीं--सब तरफ से नजर हटा लें, ताकि नजर अपने पर ही आ जाए। और अपने पर नजर नहीं लगाई जा सकती, यह भी ध्यान रखना आप! अपने पर नजर नहीं लगाई जा सकती, अपने पर ध्यान नहीं लगाया जा सकता। ध्यान सदा दूसरे पर ही लगाया जा सकता है। क्योंकि ध्यान के लिए कम से कम दो तो चाहिए। एक, मैं जो ध्यान लगाऊं और एक, जिस पर लगाऊं।
तो जब मैं कहता हूं, सब तरफ से ध्यान हटा लें, तो यह नहीं कहता हूं कि अपने पर ध्यान लगाएं। जब सब तरफ से ध्यान हट जाता है, तो वहीं रह जाता है जहां हम हैं। वहां लगाना नहीं पड़ता। वहां कोई लगा नहीं सकता ध्यान। इसलिए ध्यान की सारी प्रक्रिया निगेटिव है, नकारात्मक है, नेति-नेति की है। यह भी नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। इस पर भी हटाएंगे ध्यान, इस पर भी हटाएंगे, इस पर भी हटाएंगे। कहीं न लगाएंगे ध्यान। ध्यान को छोड़ देंगे खाली, एंप्टी। जैसे ही सब तरफ से ध्यान हट आता है, तो अपने पर बैठ जाता है।
दूसरा सूत्र समझ में आ सके, उसके लिए जरूरी है कि हम संसारी के भ्रम को भी समझें और संन्यासी के भ्रम को भी।
एक सिकंदर है, एक चंगीज है, वे सारी दुनिया को जीतने निकले हुए हैं। वे कहते हैं, हम सारी दुनिया जीत लेंगे! ‘मैं’ कहता है, सारी दुनिया जीत लूंगा! अहंकार कहता है, सारी दुनिया को मुट्ठी में ले लूंगा! और एक आदमी है, जो कहता है, मैं ईश्र्वर को खोजने निकला हूं। अहंकार कहता है कि ईश्र्वर को अपनी मुट्ठी में ले लूंगा! ‘मैं’ ईश्र्वर को खोज कर रहूंगा! इन दोनों में कोई फर्क है?
हां, थोड़ा फर्क है। संसारी की खोज छोटी है, संसार बहुत छोटा है। ईश्र्वर का तो अर्थ है: समग्र, दि टोटल, वह जो पूरा है। संन्यासी कहता है, पूरे को अपनी मुट्ठी में ले लूंगा! दोनों में कोई भी धार्मिक नहीं है।
धार्मिक कहता है, मैं खोजूंगा, मेरी मुट्ठी किसकी है? मैं किसी को मुट्ठी में लेने नहीं चला हूं, मैं यह खोजने चला हूं कि यह मुट्ठी किसकी है? कौन इस मुट्ठी को बांधता है, कौन इस मुट्ठी को खोलता है? मुझे इसकी फिकर नहीं कि मुट्ठी में क्या है, मुझे इसकी फिकर है कि मुट्ठी में कौन है? वह मुट्ठी के भीतर कौन है, जो मुट्ठी बांधता है और खोलता है? इसकी मुझे फिकर नहीं कि आंख से मैं क्या देखूं--एक सुंदर स्त्री देखूं, एक सुंदर फूल देखूं, एक सुंदर भवन देखूं, या भगवान देखूं। यह सवाल नहीं है कि आंख से मैं किसको देखूं। ऑब्जेक्ट का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि यह कौन है, जो आंख से देखता है? इन दोनों बातों में स्पष्ट भेद हो जाना चाहिए। एक वह जो दिखाई पड़ता है, और एक वह जो देखता है।
दिखाई पड़ने वाली चीजें बदल सकती हैं। कोई धन को देखते-देखते भगवान को देखने लग सकता है। कोई बाजार देखते-देखते स्वर्ग देखने लग सकता है। कोई दुकान पर रुपये गिनते-गिनते अचानक भगवान की बांसुरी सुनने लग सकता है। लेकिन ये सब हमसे अलग अनुभव हैं। ये दृश्य हैं, यह कुछ पता नहीं चल रहा कि मैं कौन हूं। चाहे आप कृष्ण को बांसुरी बजाते हुए देखें और चाहे किसी नाटक को देखें, आप दोनों हालत में अपने बाहर कुछ देख रहे हैं। उसका कोई पता नहीं चल रहा कि यह कौन देख रहा है।
धार्मिक आदमी की खोज इस बात के लिए है कि यह कौन है, जो देख रहा है? दृश्य नहीं, द्रष्टा कौन है? जो दिखाई पड़ता है, वह नहीं, जो देखता है, वह कौन है? निश्र्चित ही इसकी खोज के लिए दौड़ने से काम नहीं चलेगा। भागने से काम नहीं चलेगा। खोजने से काम नहीं चलेगा। ठहरने से काम चलेगा! रुकने से काम चलेगा! बैठ जाने से काम चलेगा!
लेकिन हम दौड़ना जानते हैं, भागना जानते हैं, खोजना जानते हैं। इसलिए अगर कोई हमें सब्स्टीट्यूट बता दे, कोई बता दे कि यह खोज छोड़ो, यह खोज में लग जाओ, तो आसान मालूम पड़ता है कि ठीक है, इस खोज को नहीं करेंगे, इस खोज को करेंगे।
धन की खोज करने वाला धर्म की खोज में आसानी से लग जाता है। इसलिए आप बहुत हैरान मत होना कि फलाना धनपति देखो संन्यासी हो गया। कोई फर्क नहीं है। वह जो धन की खोज करने का चित्त था, वह कहता है, हमें खोज चाहिए, हम किसी को खोजेंगे। अगर धन नहीं खोजना है, तो चलो धर्म को खोजेंगे। वह धन को खोजने वाला कहता है, धन क्यों खोजना है, धन इसलिए खोजना है कि धन से आदर मिलेगा। फिर वह चित्त कहता है कि ठीक है, धन न खोजेंगे, धर्म खोजेंगे; धर्म खोजने से और भी ज्यादा आदर मिलेगा। धनी आदमी को कितने लोग आदर देते हैं? और वही धनी आदमी मुनि हो जाए, तो वे ही नासमझ जो कभी उसे आदर न देते थे, या आदर देते भी थे तो झूठा देते थे, रास्ते पर नमस्कार करते थे, पीछे गाली देते थे; वे ही नासमझ उसके पैर छूने लगते हैं।
धन की खोज भी आदर के लिए है, धर्म की खोज भी आदर के लिए हो जा सकती है। लेकिन खोज चाहिए! चित्त कहता है, खोज चाहिए। बिना खोज के हम न रहेंगे। क्यों? क्योंकि बिना खोज में चित्त मर जाता है। जैसे ही खोज गई, चित्त गया। खोज गई, मन गया। खोज नहीं, मन नहीं। जब तक खोज है तब तक मन है। अगर ठीक से समझें तो मन खोज का उपकरण है। जब तक खोज है, तब तक मन जिंदा रहेगा। खोज गई, मन गया।
हम आमतौर से कहते हैं, मन खोज रहा है। यह गलत बात है। लेकिन हमारी भाषा में बहुत सी गलतियां हैं।
रात बिजली चमकती थी, तो किसी ने कहा कि बिजली चमक रही है। अब थोड़ा सोचें! इसमें ऐसा मालूम पड़ता है कि बिजली कुछ और है और चमकना कुछ और है। सच बात यह है कि जो चमक रहा है, उसका नाम बिजली है। बिजली चमक रही है, ऐसा कहना गलत है। चमकना और बिजली एक ही मतलब रखते हैं। बिजली चमक रही है, इसमें ऐसा मालूम पड़ता है, दो चीजें हैं। बिजली कुछ और है, चमक कुछ और है। आप चमक को अलग कर सकते हैं बिजली से? अगर चमक को छीन लेंगे, बिजली खो जाएगी। अगर बिजली को छीन लेंगे, चमक खो जाएगी। चमक और बिजली एक ही चीज के दो नाम हैं। लेकिन हम कहते हैं, बिजली चमक रही है! गलत बात है।
ऐसे ही हम कहते हैं: मन खोज रहा है! यह भी गलत बात है। खोजने की प्रक्रिया का नाम मन है। मन खोज रहा है, ऐसा कहना फिजूल है, ऐसा कहना बेकार है। मन, यानी खोजना। जब तक खोज रहे हैं, तब तक मन है। फिर चाहे कुछ भी खोजिए, मन रहेगा। और मत खोजिए, मन खो जाएगा। और जहां मन खो जाता है, वहां उसके दर्शन हो जाते हैं, जो है।
जो है, उसे खोजना नहीं है, वह है ही। खोज बंद कर देनी है।
एक बगिया है और फूल खिले हैं और आप उस बगिया के पास से एक जेट हवाई जहाज में बैठ कर निकलते हैं। तेजी से चले जाते हैं। हजार बार बगिया के पास चक्कर लगाते हैं, फूल दिखाई नहीं पड़ते। फूल तो हैं, लेकिन आप इतनी तेजी में हैं, इतनी दौड़ में हैं कि फूल दिखाई कैसे पड़ें? आपको ठहरना पड़ेगा, तो वह दिखाई पड़ जाएगा, जो है। और आप भागते रहे, तो वह नहीं दिखाई पड़ेगा, जो है।
जितनी तेजी से आप गुजरेंगे, उतनी ही तेजी से उसे चूक जाएंगे, जो है। इसलिए जितना तेज दौड़ने वाला मन है, उतना ही सत्य से दूर हो जाता है। जितना ठहरा और खड़ा हुआ मन है, उतने सत्य के निकट हो जाता है। सच तो यह है कि ठहरा हुआ मन: उसका अर्थ है: अ-मन, नो-माइंड। मन गया--ठहरा, कि गया।
यह बात ठीक से समझ लेनी जरूरी है, क्योंकि हम ऐसा ही रोज बोलते हैं। हम कहते हैं, फलां आदमी के पास बड़ा शांत मन है। बड़ी गलत बात बोलते हैं। शांत मन जैसी कोई चीज होती ही नहीं। अशांति का नाम मन है। मन सदा ही अशांत है। अगर अशांति गई तो मन गया।
इसको इस तरह समझें। एक नदी में जोर का तूफान है, लहरें विक्षुब्ध हैं। आंधी चलती है। सब अशांत है। हम कहते हैं कि नदी की लहरें बड़ी अशांत हैं। फिर सब लहरें शांत हो जाती हैं। तो हम क्या कहेंगे अब, लहरें शांत हो गईं? इसका मतलब है कि लहरें न हो गईं? अब लहरें नहीं हैं?
शांत लहर जैसी कोई लहर नहीं होती। लहर का मतलब ही अशांत होना होता है। लहर है तो अशांति होगी। शांत लहर जैसी कोई चीज नहीं होती। शां
त लहर का मतलब है, लहर मर गई। अब लहर नहीं है। इसी का मतलब शांत लहर है।
मन हमेशा अशांत है। और अशांत क्यों है? जो खोजेगा, वह अशांत रहेगा। खोज का अर्थ है तनाव, खोज का अर्थ है टेंशन। मैं यहां हूं और जो मुझे पाना है वह वहां है। वह उतने दूर है। वह वहां है, जो मुझे पाना है और जिसे पाना है, वह यहां है। दोनों के बीच तनाव है। जब तक मैं उसे न पा लूं, तब तक शांत नहीं हो सकता हूं। और जब तक मैं उसके पास पहुंचूंगा, तब तक मेरी खोज आगे बढ़ जाएगी। क्योंकि वह मन कहेगा, और आगे, और आगे, और आगे। क्योंकि मन जब तक कहे, और आगे, तभी तक जी सकता है। मन जब तक कहे, और खोजो, और आगे खोजो, तभी तक बच सकता है। इसलिए मन रोज आपको और आगे ले जाता है। मन भविष्य में ले जाता है और आप वर्तमान में हैं।
खोज भविष्य में ले जाती है और सत्ता वर्तमान में है। खोज कहती है: कल। खोज कहती है: कल मिलेगा। कल धन मिलेगा, कल पद मिलेगा, कल भगवान मिलेगा--कल। खोज कहती है: कल, और जो है, वह आज है, अभी और यहां।
कुछ फकीर एक साथ यात्रा कर रहे थे। एक सूफी फकीर भी था उसमें, एक योगी भी था, एक भक्त भी था। वे एक गांव में ठहरे और गांव में उन्होंने भीख मांगी और फिर उस सूफी को कहा कि तुम जाओ और बाजार से भोजन ले आओ।
वह बाजार से हलवा ले आया। लेकिन पैसे कम थे, हलवा थोड़ा था, आदमी ज्यादा थे। तो उन सबने दावा करना शुरू किया। भक्त ने कहा कि सबसे पहला हक मेरा है; क्योंकि मैं भगवान का सबसे बड़ा भक्त हूं। और भगवान मुझे अक्सर बांसुरी बजाते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसलिए हलवा पहले मुझे मिलना चाहिए।
योगी ने कहा: क्या बातचीत लगा रखी है। मेरी जिंदगी गुजर गई शीर्षासन करते हुए। मुझसे ज्यादा उलटा अब तक कोई आदमी नहीं खड़ा रहा। योग की मुझे सिद्धि है। हलवा मैं लूंगा।
और उन सबमें विवाद हो गया और कुछ तय न हो सका। सूरज ढल गया। हलवा था थोड़ा। कोई राजी न था। पहले हक किसका है?
आखिर उस सूफी फकीर ने कहा: एक काम करो, हम सो जाएं। रात जो सबसे अच्छा सपना देखे--सुबह हम अपने सपने बताएं--जिसका सपना सबसे अच्छा हो, वह हलवे का मालिक हो जाएगा।
रात वे सो गए। निश्र्चित ही उन्होंने अच्छे सपने देखे। अब सपने पर किसी का वश तो नहीं है। लेकिन सपने उन्होंने गढ़े!
सुबह उठ कर वे सब अपने सपने बताने लगे। उस भक्त ने कहा कि भगवान प्रकट हुए और उन्होंने कहा, तू मेरा सबसे बड़ा भक्त है। तुझसे बड़ा मेरा कोई भक्त नहीं है। हलवे का हकदार मैं हूं।
योगी ने कहा कि मैं समाधि में चला गया, मोक्ष तक पहुंच गया, परम आनंद का अनुभव किया। हलवे का हकदार मैं हूं। और सबने अपने दावे किए। आखिर में उस सूफी फकीर से पूछा: तुम्हारा क्या खयाल है?
उसने कहा: मैं बड़ी मुश्किल में हूं। क्योंकि मैंने एक सपना देखा कि भगवान कह रहे हैं कि उठ और हलवा खा! मैं उठा और हलवा खा गया! क्योंकि आज्ञा नहीं टाली जा सकती। आज्ञा कैसे टाल सकता था!
वह जिस सूफी ने यह कहानी अपने जीवन में लिखी है, उसने कहा है, जो उठते हैं अभी और हलवा खा लेते हैं, बस वे ही.। जो कहते हैं, कल; जो कहते हैं, इसलिए; जो एक क्षण के लिए भी आगे को टालते हैं, वे चूक जाते हैं। और खोज सदा आगे को टालती है। खोज पोस्टपोनमेंट है, खोज स्थगन है। खोज--आज और अभी नहीं हो सकती। खोज करनी पड़ेगी, करनी पड़ेगी--कल हम कहीं पहुंचेंगे, वहां उपलब्धि होगी। वहां तक पहुंचते-पहुंचते वह खोज करने वाला मन आगे फोकस बना लेगा, वह कहेगा, और आगे, और आगे।
जैसे क्षितिज दिखाई पड़ता है। जाएं भवन के बाहर, चारों तरफ आकाश छूता हुआ मालूम पड़ता है पृथ्वी को। लगता है, यह रहा छूता हुआ। जरा उदयपुर के आगे गए, पहाड़ियों के पार और आकाश छूता होगा। फिर जाएं वहां। जितना आगे बढ़ेंगे, आकाश उतना आगे बढ़ जाएगा! वह कहीं छूता ही नहीं है। आकाश पृथ्वी को कहीं नहीं छूता है। आप बढ़ते जाएंगे, वह आगे बढ़ता चला जाएगा। आप सारी पृथ्वी का चक्कर लगा आएं, वह हमेशा मालूम पड़ेगा वह रहा छूता हुआ, बुला रहा है। और आप आगे बढ़ जाएंगे और पाएंगे, वह और आगे बढ़ गया है।
इच्छा का आकाश भी ऐसे ही कहीं नहीं छूता। इच्छा का आकाश भी मनुष्य की आत्मा की पृथ्वी को कहीं नहीं छूता। आप बढ़ते हैं, और वह आकाश आगे बढ़ जाता है। दौड़ते हैं, दौड़ते हैं, खोजते हैं, खोजते हैं, समाप्त हो जाते हैं। एक जन्म, दो जन्म, अनंत जन्म.। और वह खोज का पागलपन नहीं छूटता है।
हां, एक बात भर होती है, एक खोज से ऊब जाते हैं तो दूसरी खोज शुरू कर देते हैं। लेकिन ‘खोज’ जारी रहती है।
और मैं आपसे यह कह रहा हूं कि धार्मिक आदमी वह है, जो ‘खोज’ से ऊब गया। किसी खोज से नहीं--खोज से! जो खोज से ही ऊब गया और अब जो कहता है, खोजेंगे ही नहीं। अब तो हम बैठेंगे, बिना खोजे देखेंगे कि क्या है!
बिना खोजे बैठ कर देखने का नाम ध्यान है। ए नॉन-सीकिंग माइंड। जो नहीं खोज रहा है, ऐसा चित्त। वह ध्यान में उतर जाता है। वह ध्यान में पहुंच जाता है। वह अवस्था ही ध्यान है।
ए नॉन-सीकिंग माइंड--एक क्षण को भी हमने नहीं जाना है ऐसा कि जब हम न खोजते हों। हम कुछ न कुछ खोजते ही हैं। यह खोज हमारी भीतरी बेचैनी का लक्षण है।
अगर एक आदमी को एक कमरे में आप खाली छोड़ दें, और कुछ भी न हो, और एक छेद से देखते रहें, तो वह आदमी खोज करेगा उस कमरे में। वह बैठेगा नहीं। वहां कुछ भी नहीं है। अगर एक रद्दी अखबार का टुकड़ा पड़ा मिल जाएगा, तो उसको पढ़ेगा। एक दफा, दो दफा, दस दफा। उसी को बार-बार पढ़ेगा! खिड़की खोलेगा, बंद करेगा! वह कुछ न कुछ करेगा। वह कुछ न कुछ करना जारी रखेगा। लेटेगा तो करवट बदलेगा। उठेगा तो हाथ-पैर हिलाएगा।
बुद्ध के सामने एक दिन एक आदमी बैठा है, पैर का अंगूठा हिला रहा है। बुद्ध ने बोलना बंद कर दिया और कहा कि मेरे मित्र, यह अंगूठा क्यों हिलता है वह जैसे ही बुद्ध ने कहा, उस आदमी का अंगूठा रुक गया।
उसने कहा: आप तो अपनी बात जारी रखिए, आप कहां अंगूठा वगैरह देखते हैं। आपको क्या मतलब मेरे अंगूठे से?
बुद्ध ने कहा: तुझे मतलब नहीं है तेरे अंगूठे से, मुझे है। यह अंगूठा हिलता क्यों है?
उस आदमी ने कहा: यूं ही हिलता था, मुझे कुछ पता भी नहीं था।
बुद्ध ने कहा: तेरा अंगूठा है और तुझे ही पता न हो! तब तो बड़ी मुश्किल हो गई! तू आदमी होश में है कि बेहोश? अंगूठा क्यों हिलता था?
उस आदमी ने कहा: आप भी कहां की फिजूल की बातों में उलझते हैं। अंगूठे से क्या लेना-देना है?
बुद्ध ने कहा: यह सवाल अंगूठे का नहीं है। यह बताता है कि चित्त भीतर बेचैन है, हिलता है।
आप देखें, एक आदमी कुर्सी पर बैठा है, कुछ नहीं टांगें ही हिला रहा है। पूछें उससे, ये टांगें किसलिए हिला रहे हैं? कहीं जाएं और टांगें हिलाएं, समझ में आता है। कहीं जा नहीं रहे, बैठे-बैठे ही टांगें हिला रहे हैं! क्या हो गया आपको? भीतर मन हिल रहा है। वह कहता है, कुछ करो। कुछ न करो तो कुछ फिजूल ही करो।
एक आदमी सिगरेट पी रहा है। अब सिगरेट पीने में कोई भी सार्थकता नहीं है। धुआं भीतर ले जा रहा है, बाहर निकाल रहा है। कोई पूछे कि यह तुम क्या कर रहे हो? धुएं को बाहर-भीतर क्यों कर रहे हो? वह तो चलता है और हम सब देखने के आदी हो गए हैं।
अगर एक आदमी एक गिलास में पानी ले ले, पानी अंदर ले जाए और बुलके, तो हम उसको पागल कहेंगे। मगर अगर वह भी चल पड़े और सभ्यता उसको ग्रहण कर ले कि यह भी एक तरकीब है मन बहलाव की। तो आप देखेंगे कि घर-घर में लोग बैठे हुए हैं और पानी अंदर ले जा रहे हैं और बुलक रहे हैं।
और अगर हजार दो हजार साल तक यह चलता रहे तो धर्मगुरु समझाएंगे कि पानी बुलकना बड़ी बुरी चीज है। लेकिन लोग कहेंगे, क्या करें महाराज, छूटता नहीं है। आदत पड़ गई है। नहीं बुलकते हैं तो याद आती है, तलब मालूम होती है, अर्ज मालूम होती है, दिन में चार-छह दफे बुलकना ही पड़ता है।
अब आपको पता नहीं है। यहां हिंदुस्तान में कोई गाद को नहीं चबा रहा है। पूरी अमरीका में लोग चबा रहे हैं। गाद को रखे हुए हैं दांत के नीचे, चबाए चले जा रहे हैं। गाद नहीं छूटती। अब हमको कभी खयाल भी नहीं आया है कि बैठो और दिन में चार-छह दफे गाद चबाओ। क्यों? बस वहां चल गया है फैशन, तो चल रहा है।
सिगरेट लोग फूंक रहे हैं, धुआं भीतर ले जा रहे हैं, बाहर ला रहे हैं। यह क्या कर रहे हैं? यह सिगरेट पीने न पीने का सवाल नहीं है, यह बुनियादी रूप से बेचैन आदमी कुछ न कुछ करना चाहता है। खाली बैठा है, अब क्या करे? वह धुआं ही अंदर-बाहर कर रहा है! उसे एक काम मिल गया, एक ऑक्युपेशन मिल गया। सिगरेट एक ऑक्युपेशन है। खाली आदमी के लिए कुछ उलझाव का रास्ता है।
धीरे-धीरे सारी दुनिया की स्त्रियां भी सिगरेट पीने लगीं। आपको पता है, जिन मुल्कों की स्त्रियां सिगरेट पीने लगीं, उन मुल्कों की स्त्रियों ने बातचीत और बकवास कम कर दी, क्योंकि नया ऑक्युपेशन मिल गया।
हिंदुस्तान है जैसे, हमारा मुल्क है, यहां औरतें सिगरेट नहीं पी सकतीं, तो बकवास करती हैं। जितना काम आप सिगरेट पीकर ओंठ चला कर कर लेते हैं, उतना उनको बातचीत करके करना पड़ता है। मामला एक ही है, उसमें कोई फर्क नहीं है। और मैं समझता हूं कि बजाय दूसरे की खोपड़ी खाने के सिगरेट पीना ज्यादा सरल है। आप अपने में ही उलझे रहें, जो भी आपको करना है खुद तो कर रहे हैं, किसी दूसरे का सिर तो नहीं खा रहे हैं।
दुनिया में स्त्रियां इसलिए ज्यादा बात कर रही हैं कि उनको अपने ओंठों को उलझाने का और कोई सरल मार्ग नहीं है। लेकिन जिन मुल्कों में स्त्रियों ने सिगरेट शुरू कर दी, वहां वे गंभीर हो गई हैं। अब वे एक कोने में बैठ कर अपनी सिगरेट पीती रहती हैं, वे बातचीत नहीं करतीं।
हमारा चित्त व्यर्थ के उपक्रम खोज रहा है। सुबह से आदमी उठा, अखबार खोल लेगा। उठते से ही पूछेगा, अखबार कहां है? आप समझ रहे हों कि वह कोई दुनिया का ज्ञान पाने के लिए बड़े आतुर हैं। ऐसा मत समझना। उन्हें अपने ही ज्ञान की फिकर नहीं है, वे किसी के ज्ञान के लिए क्या आतुर होंगे? लेकिन कोई उलझाव चाहिए। थोड़ी देर के लिए उसी में उलझे रहेंगे। फिर जल्दी से रेडियो खोल देंगे, फिर उसमें उलझे रहेंगे। उलझाव चाहिए। आदमी भीतर बेचैन है। उसे कुछ न कुछ खोज चाहिए। खोज नहीं होगी तो मुश्किल हो जाएगी।
हम अपने से ही भागे हुए हैं। खुद से ही एस्केप चल रही है। और इस एस्केप को, इस भागे हुए होने को हम नये-नये नाम दे रहे हैं!
इससे काम नहीं चलेगा। रुकना पड़ेगा। खुद से भागना नहीं पड़ेगा। ठहरना पड़ेगा। कभी तो ठहर जाएं अपने भीतर थोड़ी देर! कहीं न जाएं, कुछ न करें, कुछ न खोजें, कोई उलझाव न लें--न पैर हिलाएं, न हाथ हिलाएं, न सिगरेट पीएं, न अखबार पढ़ें, न राम-राम जपें। एक ही बात है--चाहे धुआं बाहर-भीतर ले जाएं और चाहे राम-राम करें। उलझाव एक ही है--चाहे माला फेरें, गुरियों को सरका रहे हैं।
अगर दुनिया अच्छी आएगी और बच्चे समझदार होंगे, तो बहुत हैरान होंगे--कि क्या आदमी पागल था कि बैठ कर आधा-आधा, पौन-पौन घंटे तक लोग गुरिया सरकाते रहते थे? हमको नहीं दिखता, क्योंकि हमको लगता है कि यह तो बिलकुल ठीक बात है। जो आदमी धार्मिक हो जाता है वह गुरिए सरकाता है। अब गुरिए सरकाने से धार्मिक होने का क्या संबंध है?
एक ही बात है। मेथड अलग है। सिगरेट पीने वाले का और गुरिए सरकाने वाले का कोई फर्क नहीं है। वह धुआं बाहर-भीतर कर रहा है, ये गुरिए नीचे-ऊपर कर रहे हैं! लेकिन कुछ करने में चित्त अटका हुआ है, कुछ बिना किए नहीं रह सकते हैं!
बिना किए रह जाना ध्यान है। कुछ भी बिना किए रह जाना ध्यान है।
यह दूसरा सूत्र मैंने आपसे कहा: थोड़ी देर के लिए बिना किए रह जाना। बिलकुल बिना कुछ किए।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ठीक है, तो फिर हम करें क्या उस वक्त? ओम जपें, राम-राम जपें, किसका ध्यान करें, कौन सा मंत्र पढ़ें, नमोकार पढ़ें, क्या करें?
मैं उनसे कहता हूं कि यही मैंने समझाया कि कुछ मत करो। वे कहते हैं, कुछ तो करना ही पड़ेगा। कुछ तो बता दें आप? अगर कुछ बता दें तो वे निश्र्चिंत हो जाते हैं! क्योंकि फिर दूसरी चीज उनको करने को मिल गई। उनको करने को कुछ चाहिए था। वे कुछ भी करने को राजी हैं। मगर आप कुछ करने को बता दें। वे वही करते रहेंगे और करने में लगे रहेंगे। और फिर वही काम शुरू हो जाएगा, जो जारी था।
मैं कहता हूं: कुछ देर के लिए न करना, नो एक्शन। कुछ देर के लिए नो डूइंग, कुछ भी नहीं करना है। एक सेकेंड के लिए भी अगर न करने की स्थिति उपलब्ध हो जाए, तो उसी सेकेंड से वह द्वार खुल जाएगा जो परमात्मा का द्वार है।
रात्रि हम इस प्रयोग के लिए बैठेंगे। रात्रि ध्यान के प्रयोग के लिए बैठेंगे, तब इतना ही स्मरण रखना है कि हम ध्यान कर रहे हैं--इसका मतलब: कुछ कर नहीं रहे हैं। यह सिर्फ भाषा की भूल है कि कहना पड़ता है कि ध्यान कर रहे हैं। अब ध्यान का मतलब ही न करना होता है। अब भाषा बड़ी मुश्किल है। भाषा बनाई है नासमझों ने। और समझदार अब तक भाषा नहीं बना पाए। समझदार भाषा बनाने की कोशिश करते हैं, तो नासमझ बनाने नहीं देते। समझदार अगर भाषा बनाए तो बहुत और तरह की भाषा होगी। नासमझों ने भाषा बनाई है।
एक छोटी सी कहानी और अपनी बात मैं पूरी कर दूंगा। फिर रात हम इस न करने में उतरेंगे।
आप दिन भर इसके लिए थोड़ा सोचना कि यह न करना क्या है? इसे थोड़ा निखारना। मैंने जो कहा, आप भी सोचना। कुछ मैं ही कहूं, उससे आपकी समझ में आ जाएगा, ऐसा नहीं है। मैं कहूं, उस कहने में आपको भी कुछ कंट्रिब्यूट करना पड़ेगा। आपको भी कुछ सतत चिंतन करना पड़ेगा, तो कुछ होगा।
मैंने सुना है, जापान में एक आश्रम था। और उस आश्रम को देखने जापान का सम्राट गया। बड़ा आश्रम है। सैकड़ों भिक्षुओं की कोठरियां हैं। एक-एक जगह जाकर आश्रम के गुरु ने सम्राट को दिखाई। बाथरूम भी बताए, संडासें भी बताईं; व्यायाम की जगह बताई; अध्ययन की जगह बताई। और वह सम्राट बार-बार पूछने लगा: क्या छोटी-छोटी चीजें दिखाते हो, वह बीच में जो बड़ा भवन खड़ा है, वहां क्या करते हो?
लेकिन जब भी वह सम्राट कहे, बीच में जो भवन खड़ा है, वहां क्या करते हो--वह भिक्षु ऐसा बहरा हो जाए, जैसे सुना ही नहीं। और सब बातें सुने।
सम्राट को क्रोध आ गया। क्योंकि जो देखने आया था, वह भवन वह दिखाता नहीं है। और फिजूल की चीजें दिखा रहा है कि यहां गाय-भैंसे बांधते हैं! और सम्राट ने कहा: क्या पागल हो गए हो? मुझे तुम्हारी गाय-भैंसे कहां बांधते हो, कोई प्रयोजन नहीं है। मैं यह भवन देखने आया हूं कि वहां क्या करते हो?
जैसे ही वह कहे, वहां क्या करते हो, वह भिक्षु एकदम चुप हो जाए। सम्राट क्रोध में वापस लौट आया दरवाजे पर और कहा कि मैं दुखी लौट रहा हूं, या तो तुम पागल हो और या मैं पागल हूं। यह बड़े भवन में क्या करते हो, बोलते क्यों नहीं?
उस भिक्षु ने कहा: आप गलत सवाल पूछते हैं। और अगर मैं जवाब दूंगा तो वह गलत हो जाएगा। गलत सवाल का कभी सही जवाब नहीं हो सकता।
सम्राट ने कहा: मैं क्या गलत पूछता हूं, मैं यह पूछता हूं कि इस भवन में क्या करते हो?
उसने कहा कि इसीलिए। आप करने की भाषा समझते हो, इसलिए मैंने बताया कि यहां भिक्षु स्नान करते हैं, यहां अध्ययन करते हैं, यहां व्यायाम करते हैं। और वह जो भवन है, वह हमारा ध्यान-कक्ष है, वहां हम कुछ भी नहीं करते हैं। अब आप पूछते हो, वहां क्या करते हैं? तो मैं चुप रह जाता हूं कि यह आदमी अपनी भाषा नहीं समझेगा, यह करने की भाषा समझने वाला है। इसलिए मैं बताता हूं, यहां हम गाय-भैंस बांधते हैं। और वहां? वहां जब किसी को कुछ भी नहीं करना होता तो कोई चला जाता है। वह हमारा ध्यान-भवन है, वह हमारा मेडिटेशन हॉल है। वहां हम कुछ करते नहीं महाराज! वहां जब न करने का मन होता है, तब हम चले जाते हैं। वहां हम कुछ भी नहीं करत हैं, वहां हम होते हैं। करते नहीं। बस वहां सिर्फ होते हैं। वहां हम कुछ भी नहीं करते हैं।
थोड़ा सोचना, दिन भर इस पर विचार करना, तो रात उपयोगी होगा। क्योंकि मैं कह दूं, इतना काफी नहीं है। आप सोचोगे, तो जो मैंने कहा है, वह और निखर जाएगा। कुछ आप भी उसमें अनुदान करना।
मैंने सुना है, एक सम्राट ने अपने एक मित्र को मेहमान की तरह बुलाया हुआ था। और वे शिकार के लिए गए। तो मित्र को सताने के लिए--मित्र एक ज्ञानी था, उसको सताने के लिए--शिकार पर जब गए तो उसे सबसे रद्दी घोड़ा, जो इतना धीमा चलता था कि कभी शिकार तक पहुंचना ही मुश्किल था, उसको पकड़ा दिया।
गए शिकार को, तो सब तो शिकार के जंगल में पहुंच गए। वह मित्र अभी गांव के बाहर ही नहीं निकल पाए थे। घोड़ा ऐसा चलता था कि अगर बिना घोड़े के होते तो ज्यादा चल जाते।
कई दफे ऐसा होता है कि साधन बाधा बन जाते हैं। लेकिन भाग्य की बात। पानी गिरा जोर से। तो मित्र गांव के बाहर से ही वापस लौट आया। उसने अपने सारे कपड़े निकाल कर अपने नीचे रख लिए और घोड़े के ऊपर बैठ गया। जब वह घर पहुंचा, उसने कपड़े पहन लिए।
राजा और बाकी साथी जंगल तक पहुंच गए थे। वे भागे हुए आए। बिलकुल तरबतर हो गए। देखा कि मित्र तो साफ कपड़े पहने हुए है, जरा भी भीगा नहीं। उन्होंने पूछा: क्या मामला है?
उस मित्र ने कहा: यह घोड़ा बड़ा अदभुत है। यह इस तरकीब से ले आया कि कपड़े भीग न पाए।
दूसरे दिन फिर शिकार को निकले। राजा ने कहा: आज मैं इस घोड़े पर बैठूंगा।
मित्र ने कहा: आपकी मर्जी। मित्र को तेज घोड़ा दे दिया राजा ने और राजा उस घोड़े पर बैठा। फिर पानी गिरा। मित्र ने फिर कपड़े निकाल कर घोड़े की पीठ पर रख कर उसके ऊपर बैठ गया और तेजी से घर आया। कल से भी कम भीगा, क्योंकि आज तेज घोड़ा था।
राजा कल से भी ज्यादा भीग गया। क्योंकि वह घोड़ा तो बिलकुल चलता ही नहीं था। सारी वर्षा उसके ऊपर गुजरी। घर आकर उसने कहा कि तुमने झूठ बोला। यह घोड़ा तो हमें और भीगा दिया।
मित्र ने कहा: महाराज, अकेला घोड़ा काफी नहीं होता है। यू हैव टु कंट्रिब्यूट समथिंग, आपको भी कुछ करना पड़ता है। घोड़ा अकेला क्या करेगा। कुछ आपने भी किया था कि सिर्फ घोड़े पर निर्भर रहे थे?
राजा ने कहा: मैं तो सिर्फ घोड़े पर बैठा रहा और सब गड़गड़ हो गई।
मित्र ने कहा: कुछ हम भी किए थे, तो घोड़े ने भी साथ दे दिया था। आज भी हम किए हैं, घोड़े ने साथ दे दिया है।
राजा पूछने लगा: तूने क्या किया था?
उसने कहा कि वह मत पूछो। वह पूछो ही मत। वही तो राज है। लेकिन एक बात तय है, उस आदमी ने कहा कि हमेशा कुछ आपको भी करना पड़ता है। अगर आप कुछ नहीं करते हैं, तो तेज घोड़ा भी व्यर्थ है। और अगर आप कुछ करते हैं, तो शिथिल से शिथिल चलने वाला घोड़ा भी सहयोगी और मित्र हो सकता है।
मैंने एक बात कह दी, वह एक घोड़े से ज्यादा नहीं हो सकती। आप कुछ करते हैं, तो कुछ बात होगी। अन्यथा बात आप सुनेंगे, खो जाएगी।
तो आप सोच कर रात आएं। न करने की बात को समझ कर आएं कि क्या है न करना? और फिर रात हम बैठेंगे। अगर सोच कर आप आए तो न करने में उतरना हो सकता है। अभी, इसी वक्त हो सकता है। कभी भी हो सकता है। लेकिन एक तैयारी विचार की पीछे हो, तो आदमी एक क्षण में छलांग लगा जाता है। और वह छलांग इतनी अदभुत है, वह वहां पहुंचा देती है, जहां हम सदा से हैं। वह छलांग वहां पहुंचा देती है, जहां हम सदा से हैं।
रात उस छलांग के लिए फिर मिलेंगे।

मेरी बातों को इतनी शांति और प्रेम से सुना, उससे अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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