QUESTION & ANSWER

Jeevan Darshan 07

Seventh Discourse from the series of 7 discourses - Jeevan Darshan by Osho.
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मेरे प्रिय आत्मन्‌!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी चर्चा शुरू करना चाहूंगा।
एक राजमहल के द्वार पर बहुत भीड़ लगी हुई थी। सुबह से भीड़ का इकट्ठा होना शुरू हुआ था, अब दोपहर आ गई थी और लोग बढ़ते ही गए थे। जो भी आकर खड़ा हो गया था, वह वापस नहीं लौटा था। सारे नगर में उत्सुकता थी, कुतूहल था कि राजमहल के द्वार पर क्या हो रहा है? वहां एक बड़ी अघटनीय घटना घट गई थी। सुबह ही सुबह एक भिखारी ने अपना भिक्षापात्र राजा के सामने फैलाया। भिखारी तो बहुत होते हैं, लेकिन भिखारी का कोई चुनाव नहीं होता, कोई शर्त नहीं होती। उस भिखारी की शर्त भी थी। उसने राजा से कहा था, मैं भिक्षा एक ही शर्त पर लेना स्वीकार करता हूं, और वह शर्त यह है कि मेरा भिक्षापात्र यदि पूरा भर सको तो ठीक, अन्यथा मैं दूसरे द्वार पर चला जाऊंगा।
स्वभावतः राजा को यह बात सुन कर बहुत हंसी आ गई थी। राजा के पास क्या कमी थी जो एक भिखारी के पात्र को न भर सके। और उसने अत्यंत अभिमान से भर कर उस भिक्षु को कहा था: जब ऐसी ही शर्त है, तो तेरे भिक्षापात्र को अन्न से न भरूंगा, स्वर्ण-अशर्फियों से भरूंगा। लेकिन वह भिखारी बोला कि पहले मेरी शर्त ठीक से समझ लें, पीछे कहीं पछताना न पड़े। मैं चाहता हूं कि मेरा पूरा भिक्षापात्र भरे, अधूरा पात्र भरा हुआ लेकर मैं न जाऊंगा।
राजा ने अपने वजीर को कहा: जाओ, स्वर्ण-अशर्फियों से इसके भिक्षापात्र को भर दो।
स्वर्ण-अशर्फियां लाई गईं, भिक्षु के पात्र में डाली गईं। लेकिन बड़ी हैरानी की बात हो गई। पात्र में डाली गईं स्वर्णमुद्राएं न मालूम कहां खो गईं, पात्र खाली का खाली रहा। फिर तो एक कठिनाई खड़ी हो गई। वजीर दौड़-दौड़ कर मुद्राएं लाते रहे और पात्र भरा जाता रहा, लेकिन भर भी नहीं पाता था कि वह खाली हो जाता था। दोपहर हो गई। सारे नगर में उत्सुकता भर गई। राजधानी के लोग द्वार पर इकट्ठे हो गए। ऐसा न दिखाई पड़ता था कि राजा उसके पात्र को भर पाएगा।
राजा भी घबड़ाया। उसने बड़े युद्ध जीते थे। जीवन में बड़ी लड़ाइयां लड़ी थीं। लेकिन ऐसी लड़ाई कभी उसके सामने खड़ी न हुई थी। विजय की कोई संभावना न थी। उस भिक्षु से हारना ही पड़ेगा। लेकिन अंतिम क्षण तक राजा भी कोशिश करने को आबद्ध था।
उसने अपनी सारी तिजोड़ियां खाली करवा दीं। सांझ होने को आ गई, सूरज ढलने लगा। और राजा की हार भी निश्चित हो गई। उसकी तिजोड़ियां खाली हो गई थीं, लेकिन भिक्षु का पात्र अभी भी खाली था। अंततः वह उसके पैरों पर गिर पड़ा। सम्राट उस भिखारी के पैरों पर गिर पड़ा और उससे कहा: क्षमा कर दें मुझे! अभिमान में मुझसे भूल हो गई! मैं नहीं भर सकूंगा इस पात्र को। आप किसी और द्वार पर चले जाएं। लेकिन जाने के पहले मुझ पराजित को एक छोटी सी बात बताते जाएं। अगर बता देंगे वह बात, तो मैं समझूंगा, मैं क्षमा कर दिया गया। छोटा सा प्रश्न मेरा यह है, यह भिक्षापात्र कैसे जादू से बना है? किस मंत्र से बना है? क्या है रहस्य इसका? क्या है मिस्टरी? भरता क्यों नहीं है यह पात्र?
उस भिक्षु ने कहा: कोई रहस्य नहीं, कोई मंत्र नहीं, कोई जादू नहीं। मैं एक मरघट से निकलता था, वहां आदमी की खोपड़ी पड़ी मिल गई, उसी से मैंने इस पात्र को बना लिया है। मैं खुद ही हैरान हूं कि यह भरता क्यों नहीं है! फिर पीछे मुझे पता चला, आदमी की खोपड़ी कुछ ऐसी है कि वह कभी भी नहीं भरती। इसलिए यह पात्र भी नहीं भरता है।
इस कहानी से इसलिए मैं अपनी बात को शुरू करना चाहता हूं, क्योंकि मैं उसी शिक्षा को ठीक शिक्षा मानता हूं जो आदमी की खोपड़ी को भरने का उपाय बता सके। लेकिन आज तक हमने मनुष्य को जो शिक्षा दी है, उससे मनुष्य का हृदय भरता नहीं है, बल्कि और खाली हो जाता है। जैसे राजा हार गया था उस भिखारी के सामने, ऐसे ही मनुष्य के कभी न भरने वाले मन के सामने आज तक की शिक्षा भी हार गई है। अब तक हम मनुष्य को इस भांति निर्मित नहीं कर पाए कि वह तृप्त हो सके जीवन से, संतुष्ट हो सके, भरा-पूरा हो सके। फुलफिलमेंट मिल सके उसे जीवन में। वह यह कह सके कि जीवन में मैं खाली नहीं रहा, भर गया हूं। ऐसी शिक्षा हम आज तक विकसित नहीं कर पाए, इसलिए सारी मनुष्यता दुखी और पीड़ित है।
इसी संबंध में थोड़ी सी बातें तुमसे मैं कहूंगा।
तुम भी उसी रास्ते पर हो, जिस रास्ते पर करोड़-करोड़ जन तुमसे भी आगे निकल चुके हैं, दुखी और पीड़ित। और जीवन भर के अभाव के बाद, खालीपन के बाद भी उनका भिक्षापात्र खड़ा रहता है, हाथ फैले रहते हैं। खाली पात्र जीवन भर भरने पर भी नहीं भर पाता। और फिर, और फिर आ जाती है मौत। जीवन भर दुख, दारिद्रय, पीड़ा, अभाव, अशांति, अतृप्ति और फिर मौत। ऐसी यह कथा है। ऐसा यह रास्ता है। इसी रास्ते पर तुम भी एक यात्री हो। तुम्हारी यात्रा भी शुरू हो गई है।
क्या तुम भी उन्हीं लोगों जैसी समाप्त हो जाओगी जैसे तुमसे पहले के यात्री समाप्त हुए हैं, या कि तुम एक भरा-पूरा जीवन, एक संतुष्ट और आनंद से भरा हुआ, जिसका पात्र भर जाए, ऐसा जीवन और व्यक्तित्व उपलब्ध कर सकोगी? मैं आश्चर्य करता हूं, क्या तुम्हें कभी इसका खयाल भी आया है या नहीं? लेकिन इसी संबंध में थोड़ी सी बात मुझे तुमसे कहनी हैं। और इसके पहले कि यह बात मैं तुमसे कहूं, यह समझ लेना जरूरी है कि अधिक लोग जीवन से खाली ही विदा हो जाते हैं। उनकी दौड़, उनका श्रम कुछ भी नहीं उपलब्ध कर पाता है।
जिस दिन सिकंदर मरा, शायद तुमने इतिहास की किताबों में यह बात न पढ़ी होगी। क्योंकि इतिहास लिखने वाले लोग जैसे जानबूझ कर वे बातें छोड़ देते हैं जो कि लिखना बहुत जरूरी हैं। और जो बातें लिखना बिलकुल जरूरी नहीं हैं, जिनसे केवल जहर फैलता है और आदमी का मन विषाक्त होता है, उन्हें बहुत बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया जाता है। आदमी की सामूहिक विक्षिप्तता का यह हिस्सा है।
सिकंदर जिस दिन मरा, जिस नगर में उसकी अरथी निकली, सारे लोग हैरान हो गए। लाखों लोग दूर-दूर से देखने इकट्ठे हुए थे। सिकंदर की जिंदगी भी देखने जैसी थी और मौत भी। वह कोई साधारण जिंदगी न थी। वह कोई जिंदगी के किसी अंधेरे कोने में जीने वाला आदमी न था। बड़ी उसकी विजय की गाथाएं थीं। बड़े साम्राज्य उसने जीते। दूर-दूर तक उसका नाम, कीर्ति और यश की पताका बन कर फहराया। आकाश में उसका नाम लिखा हुआ था--पहाड़ों पर, पर्वतों पर, जमीन पर--सब तरफ सिकंदर का नाम था। वह आदमी मर गया था। लाखों लोग देखने इकट्ठे हो गए थे। वे सब हैरान थे लेकिन एक बात से। सिकंदर की अरथी के बाहर उसके दोनों हाथ लटके हुए थे!
अरथियों के बाहर कभी किसी के हाथ नहीं लटके होते हैं। सारा नगर परेशान था, पूछ रहा था एक-दूसरे से कि बात क्या है? सांझ होते-होते पता चला, सिकंदर ने मरने के पहले कहा था: मेरे हाथ अरथी के बाहर रहने देना, ताकि लोग देख सकें कि मैं भी खाली हाथ जा रहा हूं। मेरी दौड़, मेरी विजय-यात्राएं, मेरे युद्ध, मेरी हिंसा, मेरी हत्याएं, मेरी क्रूरताएं कुछ भी नहीं ला सकीं, मैं एक खाली आदमी था और खाली आदमी मर रहा हूं, इसे लोग देख सकें।
लेकिन इसे हम आज तक भी नहीं देख पाए हैं। और मुझे शक है कि उस राजधानी में जिन लोगों ने वे हाथ अरथी के बाहर लटके देखे होंगे, वे भी शायद इस तथ्य को न देख पाए होंगे। हंसे होंगे और कहे होंगे, बड़ी अदभुत सूझ है। और अपने घर चले गए होंगे। और अपनी दौड़ में लग गए होंगे। वे भी अपनी छोटी-मोटी विजय की यात्रा में लग गए होंगे।
आदमी ऐसा ही अंधा है। वह नहीं देख पाता चारों तरफ क्या हो रहा है। और उन्हीं भूलों को खुद भी दोहराए चला जाता है, जिनको दूसरे लोग दोहरा रहे हैं। हो सकता है उसी भीड़ में से और सिकंदर पैदा हो गए होंगे। आदमी का अंधापन बहुत अदभुत है।
उस शिक्षा को मैं शिक्षा कहता हूं, जो आदमी के इस अंधेपन को तोड़ दे और जिंदगी को देखने की आंखें दे।
इंग्लैंड में आज से सौ और डेढ़ सौ वर्ष पहले तक चोरों को चौरस्तों पर खड़ा करके कोड़े मारे जाते थे, ताकि और लोग देख लें कि चोरी करनी बुरी बात है। उनको लहूलुहान कर दिया जाता, उनकी चमड़ी उधेड़ दी जाती। उन्हें नग्न, चौरस्तों पर लटका कर सारे शरीर पर कोड़े मारे जाते। खून चूने लगता उनके शरीर से और चमड़ी जगह-जगह से उखड़ जाती। और हजारों लोग आस-पास इकट्ठा होकर देखते। सोचा गया था यह कि जो लोग यह देखेंगे, वे फिर कभी चोरी न करेंगे।
लेकिन डेढ़ सौ वर्ष पहले इस प्रथा को वहां की अदालतों को उठा देना पड़ा। और तुम जान कर हैरान होओगी कि क्यों उठा देना पड़ा? उठा देना पड़ा इसलिए कि जब किसी चोर को इस तरह सजा दी जाती थी, तो हजारों लोग देखने इकट्ठे हो जाते थे। और वे इतने तल्लीन हो जाते थे इस चोर को पिटते हुए देखते कि लोग तब तक दूसरे लोगों की जेब काट लेते थे। उन भीड़ों में इतनी जेबें कटने लगीं कि कानून को यह तय करना पड़ा कि इसका कोई मतलब नहीं है। लोग इतने अंधे हैं।
एक चोर को सामने मारा जा रहा है, पीटा जा रहा है, नंगा किया गया है, खून बह रहा है और उस भीड़ को देखने जो लोग इकट्ठे हुए हैं, बाकी लोग, कुछ लोग उनकी जेबें काट रहे हैं। तब खयाल में आया कि आदमी इतना अंधा है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
इसलिए मैं कहता हूं, सिकंदर के लटके हुए हाथ भी बहुत मुश्किल से किसी को दिखाई पड़े होंगे। और रोज सिकंदर मरते हैं और रोज खाली हाथ जाते हैं, लेकिन हमको किसी को भी दिखाई नहीं पड़ते। और हम भी उसी यात्रा में सम्मिलित हो जाते हैं। उसी भ्रांत यात्रा में, झूठी यात्रा में। और हमारी शिक्षा भी, हमारा समाज, हमारा संस्कार, हमारी सभ्यता, हमारे शिक्षक, हमारे मां-बाप हमें उसी यात्रा में कुशल बनाने की कोशिश में लग जाते हैं।
हमारी सारी शिक्षा उसी एफिशिएंसी को देने के लिए है जिससे हम इस यात्रा में कुशल सिद्ध हों। जब कि यह यात्रा ही भ्रांत और गलत है। इसी दौड़ में हम अग्रणी हो सकें, आगे हो सकें, इस दौड़ में हम पीछे न रह जाएं, प्रथम हो सकें, इसके लिए हम अपने बच्चों को तैयार करते हैं। और अगर यह दौड़ ही पूरी गलत है, तो इसमें आगे हो जाने का क्या मूल्य है? क्या अर्थ है?
क्यों है यह दौड़ गलत? और क्यों इस दौड़ से मनुष्य के जीवन में संपूर्णता, शंाति और संतोष उपलब्ध नहीं हो पाते हैं? कुछ कारण होंगे। कुछ बात होगी। कौन से कारण हैं?
सबसे पहला कारण यह है: जो मनुष्य भी अपने से बाहर अपने आनंद की खोज में लग जाता है, वह असफल होकर ही रहेगा। उसे सफलता मिलनी संभव नहीं है। क्योंकि जीवन का आनंद, जीवन की शांति, जीवन का सौंदर्य और सत्य, जीवन का जो भी महत्वपूर्ण है, वह मनुष्य के भीतर से आविर्भूत होता है, बाहर से उपलब्ध नहीं। और हम सिखाते हैं बाहर--हम सिखाते हैं बाहर जाना, हम सिखाते हैं बाहर की यात्राएं, बाहर की उपलब्धियां। भीतर तो आदमी दरिद्र का दरिद्र रह जाता है। बाहर बहुत कुछ इकट्ठा कर लेता है। उस बाहर की इकट्ठी हुई संपदा का, उस साम्राज्य का कोई भी मूल्य नहीं है। क्योंकि जो दुख है, जो पीड़ा है, जो बेचैनी है, जो अशांति है वह भीतर है। वह मनुष्य के भीतर है। वह मनुष्य की अंतरात्मा में है। अगर हम उसे वहां शांत और तृप्त होना सिखा सकें, तो ही कोई मनुष्य जीवन में सफलता के शिखर को उपलब्ध होता है।
एक होटल में एक संध्या कुछ मेहमान आमंत्रित थे। सात मंजिल मकान था वह। और सातवीं मंजिल पर बैठ कर वे मेहमान भोजन कर रहे थे। वे मेहमान, वे पच्चीस मेहमान किसी एक साधु के स्वागत के लिए बुलाए गए थे। वह साधु भी वहां मौजूद था। आधा भोजन हो पाया था। उस साधु की अत्यंत गंभीर और मीठी बातों को वे सुन रहे थे और भोजन भी कर रहे थे। और तभी अचानक उस नगर में भूकंप आ गया।
अभी इस नगर में भूकंप आ जाए, तो फिर मेरी बातें सुनने को यहां कौन रुकेगा? किसी को खयाल भी न आएगा यहां रुकने का। पता भी नहीं चलेगा कि हमने कब भागना शुरू कर दिया है। भागना पहले शुरू हो जाएगा, खयाल पीछे आएगा कि मैं भाग रहा हूं।
उस होटल के वे मेहमान भी भागे। सातवीं मंजिल पर थे। नगर में भूकंप था, हाहाकार था, नीचे से आवाजें आ रही थीं, मकान गिर रहे थे, मकान में आग लग गई थी, और उपद्रव हो गए थे। वे भागे। छोटा सा संकरा दरवाजा था।
क्योंकि आदमी दरवाजे भूकंप में भागने के लिए नहीं बनाता है। भूकंप से भागने के खयाल से बनाए तो दरवाजे ही न बनाए, खुली दीवालें रखे, ताकि भाग सके। आदमी तो सुविधा के लिए बनाता है। उसे पता भी नहीं कि भूकंप भी आते हैं।
वे भागे और दरवाजे पर रुक गए। भीड़ हो गई। संकरी सीढ़ियां थीं। जो उन मेहमानों को बुलाने वाला मेजबान था, वह भी भागा। लेकिन भीड़ थी, तो उसने पीछे लौट कर देखा कि जिस साधु को हमने बुलाया था, जो प्रमुख अतिथि था, वह भी भाग गया है क्या? लौट कर देखा, तो वह साधु अपनी कुर्सी पर ही बैठा हुआ है। आंख लेकिन उसने बंद कर ली है।
उस मेजबान को बड़ी हैरानी हुई। और एक चुनौती उसके मन में पैदा हुई, एक चैलेंज पैदा हुआ कि अगर यह साधु नहीं भाग रहा है, तो मैं भी क्यों भागूं? जो कुछ इसका होगा, वह मेरा भी हो जाएगा। और फिर यह भी क्या जरूरी है कि मैं भागूं और बच जाऊं? सात मंजिल नीचे तक पहुंच पाऊं, यह भी क्या जरूरी है? और जहां मैं भाग रहा हूं, वहां भी तो मकान गिर रहे हैं, वहां भागने से भी क्या मतलब है? एक क्षण में बिजली की तरह ये बातें उसके मन में कौंध गईं होंगी। वह रुक गया और साधु के पास बैठ गया।
थोड़ी देर, थोड़े क्षणों में भूकंप समाप्त हो गया। नगर ध्वस्त हो गया था। सब जगह शोरगुल था, रोना, रुदन था। उस साधु ने आंख खोली, जहां बात टूट गई थी, वहीं से उसने फिर बात शुरू कर दी। न तो उसने यह पूछा कि वे पच्चीस लोग कहां गए, न उसने यह कहा कि यह भूकंप आया, बहुत बुरा हुआ, न नीचे उठते हाहाकार की उसने कोई चर्चा की। वह तो भूकंप के आने से उसकी बात जहां टूट गई थी, उसने वहीं से फिर शुरू कर दी उस अकेले आदमी के सामने।
लेकिन वह मेजबान बोला: क्षमा करें! मुझे कुछ भी पता नहीं कि भूकंप के पहले आप क्या कह रहे थे? इतनी बड़ी बात घट गई है कि मैं बिलकुल अस्तव्यस्त हो गया हूं। मेरा मन ठिकाने पर नहीं है, मेरे हाथ-पैर कांप रहे हैं। अभी उस बात को शुरू मत करें, मैं तो एक दूसरी बात आपसे पूछना चाहता हूं। यह जो भूकंप आया है, इसका क्या हुआ? इसके बाबत कुछ न कहेंगे?
उस फकीर ने क्या कहा? उस फकीर ने कहा: मेरे मित्र, भूकंप आया, निश्चित आया था। तुम भाग गए थे, तुम भाग रहे थे और लोग भाग गए थे। मैं भी भाग गया था, लेकिन तुम बाहर की तरफ भागे, मैं भीतर की तरफ भागा। मैंने भी आंख बंद कर ली और मैं भी भाग गया था। लेकिन तुम बाहर की तरफ भागे थे, मैं भीतर की तरफ आ गया था। तुम्हें पैरों से भागना पड़ा, मुझे चित्त से भागना पड़ा। और तुम जिस तरफ भागे, बिलकुल नासमझ हो, क्योंकि तुम जहां भाग रहे थे वहां भी भूकंप था। तुम भूकंप से भूकंप में ही भाग रहे थे, तुम भूकंप के बाहर नहीं जा सकते थे। लेकिन मैं ऐसी जगह चला गया जहां कोई भूकंप कभी नहीं पहुंचते। मैं अपने भीतर भाग गया था। मैंने अपने भीतर एक ऐसा स्थल खोज लिया है, जहां बाहर का कोई कंपन कभी नहीं पहुंचता है। मैं वहीं चला गया था।
दो ही तरह की जीवन यात्राएं हैं: एक बाहर की तरफ, एक भीतर की तरफ।
जो बाहर की तरफ भागता है, वह ठीक से समझ ले, वह कभी उस स्थिति को उपलब्ध नहीं हो सकेगा जिसे शांति कहें, संतोष कहें, आनंद कहें। क्योंकि जिस तरफ वह भाग रहा है, वहां भी भूकंप ही भूकंप है। जिस तरफ वह भाग रहा है, वहां मृत्यु के सिवाय और किसी चीज से मिलन न होगा।
लेकिन एक भीतर की तरफ भी यात्रा है। और ये दोनों यात्राएं विरोधी हैं। और इन दोनों यात्राओं की निष्पत्तियां, उपलब्धियां भी विरोधी हैं। बाहर की तरफ जो भाग रहा है, अंतिम परिणाम में मृत्यु से होगा मिलन उसका। भीतर की तरफ जो भागता है, अंतिम परिणाम में उसे उपलब्ध होता है जो अमृत है, जिसकी कभी मृत्यु नहीं होती। बाहर की तरफ जो भाग रहा है, वह ऐसी चीजें इकट्ठी कर लेगा जो छोड़नी पड़ेंगी। भीतर की तरफ जो भाग रहा है, वह उसको उपलब्ध हो जाता है जो शाश्वत है, जिसे कभी छोड़ना नहीं पड़ता। बाहर की तरफ जो भाग रहा है, वह जो कुछ भी उपलब्ध करेगा, उस उपलब्धि में दूसरों से छीनना पड़ेगा। क्योंकि बाहर की चीजें सड़कों पर पड़ी हुई नहीं मिलती हैं। कोई न कोई उनका मालिक है।
अगर मैं धन इकट्ठा करूंगा, तो दूसरे की जेब मुझे खाली करनी पड़ेगी। अगर मैं बड़ा मकान बनाऊंगा, तो दूसरों के झोपड़े जमीन से मिला देने होंगे। और अगर मैं बहुत वस्त्र इकट्ठे कर लूंगा, तो कुछ लोग जमीन के किसी कोने पर जरूर ही नंगे हो जाएंगे। बाहर की चीजें किसी से छीननी पड़ती हैं। और जब हम किसी से कुछ छीनते हैं, तो उसे दुखी कर जाते हैं। और जब मेरा सारा जीवन दूसरों को दुखी करने में व्यतीत होता हो, तो यह संभव नहीं है कि मैं आनंदित हो जाऊं।
लेकिन भीतर के जगत में हम जो भी पाते हैं, उसे किसी से भी छीनना नहीं पड़ता है। वह किसी दूसरे की मालकियत नहीं है, वह मेरी मालकियत है। उसे मुझे किसी से छीन कर गरीब नहीं बनाना पड़ता है। मेरी भीतर की उपलब्धि से कोई गरीब नहीं होता, लेकिन मैं समृद्ध जरूर हो जाता हूं। मेरी बाहर की समृद्धि से, बड़े आश्चर्य की बात है, मैं तो समृद्ध नहीं हो पाता, लेकिन दूसरा जरूर गरीब हो जाता है।
ठीक-ठीक शिक्षा मनुष्य को भीतर की यात्रा पर गतिमान करती है। लेकिन आज तो हम सब बाहर की यात्रा पर चल पड़े हैं। हम जो भी सीख रहे हैं, जो भी पढ़ रहे हैं, वह सब बाहर ले जाने वाला है। और धीरे-धीरे हम उसमें दीक्षित हो जाएंगे। हमें यह बात ही भूल जाएगी कि भीतर भी हमारे कुछ था। हमें यह खयाल ही भूल जाएगा कि हमारे अंतस में, हमारी आत्मा में भी कोई संपदा छिपी थी, कोई समृद्धि थी, कोई साम्राज्य था, कुछ पाने योग्य वहां भी था, यह हमें भूल ही जाएगा।
जिंदगी इतनी छोटी है और उसके बीत जाने में पता भी नहीं चलता कि कब बीत गई। क्षण-क्षण रीत जाते हैं और आदमी रोज-रोज मृत्यु के करीब पहुंच जाता है। शायद मरते क्षण खयाल आता हो कि जिंदगी तो व्यर्थ बीत गई और मैं कुछ पा नहीं पाया। लेकिन तब उस खयाल का कोई उपयोग भी नहीं है। काश, यह खयाल जीवन की शुरुआत में दिया जा सके। काश, यह विचार, यह संकल्प, यह चुनौती, यह आवाहन, यह आमंत्रण बहुत छोटे-छोटे बच्चों के हृदय में पैदा किया जा सके कि तुम्हारे जीवन की जो सर्वाधिक बहुमूल्य संपदा है, वह तुम्हारे भीतर है। उसे खोजने के रास्ते बाहर की दुनिया की खोज के रास्तों से बिलकुल उलटे हैं। उसे पाने की विधियां, टेक्नीक और शिल्प बहुत दूसरा है। उसका गणित, उसकी इंजीनियरिंग अलग है। उसका विज्ञान अलग है।
अधूरी है हमारी जिंदगी आज, क्योंकि हम केवल बाहर और बाहर की खोज करते हैं, विचार करते हैं, अनुसंधान करते हैं। अधूरी है यह जिंदगी। और भीतर सब खाली और रिक्त और एंप्टी रह जाता है। फिर यह भीतर का खालीपन बहुत सालता है, बहुत दुख देता है। जैसे-जैसे तुम बड़ी होती जाओगी, वैसे-वैसे यह भीतर का दुख बड़ा होता जाएगा। वैसे-वैसे तुम्हारी समझ में आने लगेगा कि भीतर तो मैं कुछ भी नहीं हूं। अच्छे वस्त्र हैं मेरे पास, अच्छा मकान है, रेडियो है, गाड़ी है, और सब-कुछ है, लेकिन भीतर? भीतर मैं कुछ भी नहीं हूं। और भीतर का यह खालीपन इतना बड़ा है, यह भिक्षापात्र इतना बड़ा है कि बाहर की सारी समृद्धि भी इसे नहीं भर पाएगी। और तब, तब अंत में पराजय उपलब्ध होती है।
जीवन में विजय बहुत कम लोगों को उपलब्ध होती है, जब कि सबको उपलब्ध हो सकती थी। तुम भी विजयी हो सकती हो। लेकिन कुछ करना पड़ेगा, अन्यथा पराजय निश्चित है। और हमें दिखाई नहीं पड़ती यह पराजय, क्योंकि हमारे आस-पास भी सब पराजित लोग हैं। अगर इस कमरे में जितने लोग हैं, सभी एक बीमारी से बीमार हों जाएं, तो फिर हमें पता नहीं चलेगा कि हम बीमार हैं, क्योंकि खयाल ही नहीं आएगा। सभी लोग उसी बीमारी से बीमार हैं, इसलिए खयाल पैदा नहीं होगा। हमें बीमारी का पता चलता है, क्योंकि बाकी लोग स्वस्थ होते हैं और हम बीमार हो जाते हैं। चूंकि सारी दुनिया बाहर की बीमारी से पीड़ित है, इसलिए पता नहीं चलता हमें।
एक राजधानी में ऐसा हुआ था। एक दोपहर एक जादूगर उस राजधानी में आया और उसने एक पुड़िया उस राजधानी के कुएं में छोड़ दी और कहा कि अब जो भी इस कुएं का पानी पीएगा, वह पागल हो जाएगा। उस राजधानी में दो ही कुएं थे। एक नगर की आम जनता का कुआं था और एक राजा के महल का। मजबूरी थी, प्यासा कोई कब तक रहता? जान कर भी उस कुएं के जहर को पीना पड़ा। सारा गांव सांझ होते-होते पागल हो गया।
सिर्फ राजा, उसका वजीर, उसकी रानी पागल नहीं हुए थे, उनका अपना अलग कुआं था। लेकिन सांझ को बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई। सारे गांव के लोगों ने सभा की और वे सारे लोग यह विचार करने लगे कि ऐसा मालूम होता है राजा का दिमाग खराब हो गया है! क्योंकि सारा गांव तो पागल हो गया था, इसलिए उस सारे गांव को राजा ही पागल मालूम पड़ रहा था। जो कि बिलकुल स्वाभाविक था। गांव तो पागल नहीं मालूम पड़ता था, क्योंकि वे सभी लोग पागल थे। राजा अजीब मालूम पड़ता था, अलग मालूम पड़ता था। गांव के लोगों ने कहा: ऐसे राजा को गद्दी से हटाना पड़ेगा। मालूम होता है राजा का दिमाग खराब हो गया है!
राजा बहुत घबड़ाया। उसने अपने वजीर को कहा कि मैं क्या करूं अब?
उस वजीर ने कहा: एक ही रास्ता है, हम भी उसी कुएं का पानी पी लें।
और वे भागे हुए उस कुएं पर गए, क्योंकि थोड़ी भी देर हो जाए, तो जनता पागल हो चुकी थी, बहुत कठिन मामला था। उन्होंने कुएं पर जाकर पानी पीया। उस रात उस राजधानी में जलसा मनाया गया और गांव के लोगों ने गीत गाए, नृत्य नाचे और भगवान को धन्यवाद दिया कि हमारे राजा का दिमाग ठीक हो गया।
हम भी बाहर के कुएं का पानी पीकर सब पागल हैं और इसलिए किसी को भी दिखाई नहीं पड़ता। बल्कि अगर हमारे बीच कभी कोई स्वस्थ आदमी आ जाए जिसने हमारे कुएं का पानी नहीं पीया है--कभी-कभी भूल-चूक से ऐसे आदमी आ जाते हैं, जिनका अपना कुआं है और हमारे कुएं का पानी नहीं पीते हैं, वे हमको पागल मालूम होते हैं। महावीर को हम पागल समझते हैं, बुद्ध को पागल समझते हैं, क्राइस्ट को पागल समझते हैं, गांधी को पागल समझते हैं। वे हमें बिलकुल पागल मालूम होते हैं। उनकी बातें हमारी समझ में नहीं पड़ती हैं कि ये लोग क्या कह रहे हैं। ये क्या बातें कर रहे हैं।
लेकिन एक ही सबूत काफी है सोच लेने के लिए कि जिन लोगों को हमने पागल समझा है--बुद्ध को, महावीर को, क्राइस्ट को, वे लोग बड़े अति आनंद से भरे हुए थे। उनके जीवन में कोई दुख की रेखा न थी। उनकी आंखों में एक रोशनी थी, उनके हृदय में एक गीत था, उनके जीवन में एक सुगंध थी, जो हमारे जीवन में नहीं है। न हमारी आंखों में रोशनी है, न हमारे हृदय में गीत है, न हमारे प्राणों में कोई आह्लाद है, न हमारे जीवन में कोई संगीत है। हैं चिंताएं, है दुख, है पीड़ा, उदासी, ऊब, यह सब है हमारे जीवन में।
तो अगर वे पागल भी हों, तो भी मैं कहूंगा, उन्हीं जैसा पागल सारी दुनिया को हो जाना चाहिए। और हम अगर ठीक भी हों, तो मैं कहूंगा, यह ठीक होना बड़ी बीमारी है। दिखाई नहीं पड़ता है, क्योंकि आस-पास सभी लोग वैसे हैं।
इसलिए मैं पहली बात तुमसे यह कहूंगा: जीवन में दुख और चिंता और पीड़ा जिन बातों से बढ़ती हो, तनाव और अशांति और बेचैनी और टेंशन जिनसे पैदा होता हो, उनसे थोड़ा सावधान होना, सचेत होना। और उस मार्ग को खोजने की कोशिश करना जहां शांति घनीभूत होती हो, प्राण विश्राम को उपलब्ध होते हों। मौन, चुप हो जाना, उस दिशा को खोजना जहां भीतर जाने का मार्ग मिलता हो। यह हो सकता है।
बाहर की दिशा का सूत्र है: एंबीशन, महत्वाकांक्षा। हम सबको वही सिखाया जा रहा है। पहली कक्षा में बच्चे को हम भरती करते हैं और उसको कहते हैं कि पहले आना, पहले नंबर आना। जहर डालना हमने शुरू कर दिया। अब यह जिंदगी भर पहले आने की कोशिश करेगा। धन कमाएगा, तो सबसे ज्यादा मैं कमाऊं; मकान बनाएगा, तो सबसे ऊंचा मेरा हो; कुर्सी बनाएगा, तो सबसे ऊंची मेरी हो, दिल्ली तक पहुंचे, यहीं न रह जाए। कोशिश करेगा, इसकी सारी दौड़ यह होगी कि मैं पीछे न रह जाऊं, मैं आगे हो जाऊं, मैं आगे हो जाऊं।
और तुम्हें पता है, आज तक कोई आदमी कभी आगे पहुंच पाया है? आज तक पूरे मनुष्य-जाति के इतिहास में एक भी आदमी ने यह नहीं कहा कि मैं आ गया सबके आगे। जब भी किसी ने पाया, तो पाया कि कुछ लोग उसके भी आगे हैं। जब दस हजार साल के अनुभव से कोई आदमी नहीं कह सका कि मैं आ गया आगे, अब मुझे आगे और जाने को कोई जगह नहीं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि शायद हम एक चक्कर में खड़े हैं, जिसमें कोई आगे हो नहीं सकता। हम एक गोल घेरे में खड़े हुए दौड़ रहे हैं। हरेक को मालूम होता है कि मेरे से आगे कोई है, मेरे से पीछे कोई है। वह आगे होने की कोशिश करता रहता है, कोशिश करता है। लेकिन कितनी ही कोशिश करता है, पाता है कि फिर भी आगे कोई है, फिर भी पीछे कोई है। कोई आदमी कभी आगे नहीं पहुंच पाता। एक गोल घेरे में आदमी दौड़ रहा है। और हम बचपन से उसे सिखाते हैं, आगे हो जाओ। इस दौड़ में वह पड़ जाता है। फिर सारा जीवन नष्ट हो जाता है, इस आगे होने की दौड़ में।
क्राइस्ट ने एक वचन कहा है, जो बहुत अदभुत है। क्राइस्ट ने कहा है: ‘धन्य हैं वे लोग जो अंतिम खड़े होने में समर्थ हैं।’ बड़ी अजीब बात है। हमारी शिक्षा से तो बिलकुल उलटी है। इसीलिए तो हम कहते हैं कि क्राइस्ट पागल रहा होगा। तभी तो हमने सूली पर लटका दिया ऐसे आदमी को। अगर क्राइस्ट हमारे स्कूलों में आ जाए और बच्चों को समझाने लगे कि देखो, धन्य है वह बच्चा, जो अंतिम होने में समर्थ है। तो हम कहेंगे, निकालो इसको बाहर। सारी शिक्षा गड़बड़ हो जाएगी। सारी दौड़ खराब हो जाएगी। यह तो नीचे का आधार खींचे ले रहा है।
लेकिन मैं यही बात तुमसे कहने आया हूं। जीवन में अंतिम खड़े होने की सामर्थ्य बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है। दूसरे के आगे खड़ा होना सिर्फ अहंकार है, सिर्फ ईगो है। सिर्फ कि मैं बड़ा हूं। और जिस आदमी को यह खयाल पैदा हो जाता है कि मैं बड़ा हूं, मुझे बड़ा होना है, मुझे आगे होना है, वह जीवन भर ज्वर से ग्रस्त हो जाता है। जीवन भर फिर उसे एक बुखार घेरे रहता है--आगे होने का बुखार। फिर न वह सोता है, न जागता है, फिर वह दौड़ता ही रहता है। एक नशा है जो पकड़े रहता है।
लेकिन जो आदमी पीछे खड़े होने में समर्थ हो जाता है, उसके जीवन का सारा बुखार चला जाता है। वह शांत हो जाता है और स्वस्थ हो जाता है।
लेकिन तुम कहोगी कि अगर हम आगे जाने की दौड़ छोड़ दें, तब तो सीखना ही बंद हो जाएगा। हम गणित सीखते हैं, क्योंकि पड़ोसी से आगे निकलना है; हम संगीत सीखते हैं, क्योंकि पड़ोसी से आगे निकलना है। अगर आगे नहीं निकलना है, तब तो फिर सारी दौड़ बंद हो जाएगी।
नहीं, दौड़ बंद नहीं होगी। एक नई दौड़ शुरू होगी। अभी तुम्हें संगीत सीखना होता है, तो तुम्हें पड़ोसी के प्रति ईर्ष्या जगानी पड़ती है कि मैं उससे आगे निकल जाऊं । तो संगीत तो तुम सीखती ही हो और साथ ही ईर्ष्या भी सीखती हो। एक दिन संगीत तो भूल जाता है, ईर्ष्या शेष रह जाती है। गणित तो भूल जाता है, ईर्ष्या शेष रह जाती है। भूगोल तो भूल जाती है, ईर्ष्या शेष रह जाती है। सारे सर्टिफिकेट तो स्कूल में पड़े रह जाते हैं और जिंदगी में ईर्ष्या रह जाती है। और वह ईर्ष्या फिर दौड़ाती है और दूसरों को दुख दिलवाती है।
पर हम ईर्ष्या के बल पर ही अभी सिखाते रहे हैं। हम कहते हैं, आगे होने की दौड़ में बच्चे के अहंकार को हम चोट पहुंचाते हैं कि तुम पीछे मत रह जाना। देखो, दूसरा बच्चा तुमसे आगे निकला जा रहा है। उसके अहंकार को चोट लगती है। वह भी आगे होने की कोशिश में लग जाता है। ऐसा हम फीवर पैदा कर देते हैं बच्चों में। फिर वे दौड़ने लगते हैं। और जीवन भर दौड़ते रहते हैं और गिर जाते हैं मर कर, वह फीवर फिर उनका पीछा नहीं छोड़ता, वह बुखार उनके पीछे लगा रहता है।
क्या और कोई रास्ता नहीं हो सकता?
महत्वाकांक्षा जीवन को ज्वरग्रस्त करने का मार्ग है।
फिर क्या और कोई रास्ता नहीं हो सकता?
रास्ता है। वह रास्ता है प्रेम का, महत्वाकांक्षा का नहीं।
संगीत से प्रेम सिखाएं, दूसरे संगीत सीखने वाले से प्रतिस्पर्धा नहीं। गणित से प्रेम सिखाएं, दूसरे गणित के विद्यार्थी से प्रतियोगिता नहीं।
मैं संगीत ऐसे भी तो सीख सकता हूं कि मुझे संगीत से प्रेम है। और तब मैं किसी दूसरे से आगे नहीं निकलना चाहता हूं; तब मैं अपने से ही रोज आगे निकलना चाहता हूं। आज जहां मैं था, कल मैं उसके आगे जाना चाहता हूं। किसी दूसरे के मुकाबले नहीं, अपने मुकाबले में। रोज अपने को ही अतिक्रमण कर जाना चाहता हूं, अपने पार हो जाना चाहता हूं। जहां कल सूरज ने मुझे पाया था, आज का उगता सूरज मुझे वहां न पाए। मेरा प्रेम मेरी एक गहन यात्रा बन जाता है।
निश्चित ही, संगीत प्रेम से सीखा जा सकता है, गणित भी। और मैं तुमसे कहूं, दुनिया में जिन्होंने सच में संगीत जाना है, उन्होंने प्रेम से जाना है। महत्वाकांक्षा से किसी ने भी नहीं। जिन्होंने दुनिया में गणित की खोजें की हैं, उन्होंने गणित के प्रेम से की हैं, किसी की प्रतिस्पर्धा के कारण नहीं।
हमारे भीतर खोज लेना जरूरी है प्रेम को, जगा लेना जरूरी है प्रेम को। प्रेम के केंद्र पर जो शिक्षा होगी, वह बाहर ले जाने वाली नहीं होगी, वह भीतर ले जाने वाली हो जाएगी। और महत्वाकांक्षा, एंबीशन के केंद्र पर जो शिक्षा होगी, वह बाहर ले जाने वाली होगी।
महत्वाकांक्षा के केंद्र पर घूमती शिक्षा, दूसरों से ईर्ष्या सिखाएगी। प्रेम के केंद्र पर घूमती शिक्षा, खुद के विकास में ले जाएगी। ये दोनों बड़ी अलग बातें हैं।
प्रेम पर शिक्षा को केंद्रित करना है। तब, जो हम सीखेंगे, वह तो हम सीखेंगे ही, साथ ही हमारा प्रेम भी विकसित होगा।
अगर एक व्यक्ति संगीत को प्रेम करना सीख ले, तो संगीत तो सीखेगा ही, और स्मरण रहे, जो प्रेम में सीखा जाता है, वही केवल सचमुच सीखा जाता है, बाकी सचमुच नहीं सीखा जाता। संगीत तो वह सीखेगा ही, साथ ही किनारे-किनारे प्रेम भी सीखेगा। हो सकता है एक दिन संगीत भूल भी जाए, लेकिन प्रेम पीछे रह जाएगा, जो उसके जीवन को आंतरिकता से भरेगा।
प्रेम भीतर जाने का मार्ग है। महत्वाकांक्षा, एंबीशन बाहर जाने का मार्ग है।
इसीलिए तो जब भी हम प्रेम में होते हैं, तब हमें आनंद अनुभव होता है।
क्या वजह है कि प्रेम में हमें आनंद अनुभव होता है?
प्रेम में आनंद इसीलिए अनुभव होता है कि प्रेम में हम अपने भीतर पहुंच जाते हैं। घृणा में, ईर्ष्या में दुख अनुभव होता है, क्योंकि घृणा और ईर्ष्या में हम अपने से बाहर पहुंच जाते हैं।
आनंद है भीतर। इसलिए जो चीजें भी हमें भीतर ले जाती हैं, वे हमें प्रीतिकर मालूम होने लगती हैं।
तुम एक सुबह समुद्र के किनारे खड़ी हो जाओ और अगर समुद्र तुम्हें आनंद देता हुआ मालूम पड़े, तो तुम समझ जाना कि समुद्र की लहरें तुम्हें अपने भीतर ले गईं। तुम फूलों के पास खड़ी हो जाओ और अगर फूल तुम्हें आनंद देते हुए मालूम पड़ें, तो तुम समझ लेना कि फूल तुम्हें अपने भीतर ले गए। तुम आकाश के तारों के नीचे बैठ जाओ और अगर रात के आकाश के तारे तुम्हें आनंद देते मालूम पड़ें, तो तुम समझ लेना कि तुम अपने भीतर पहुंच गईं। तुम जिसे प्रेम करो, उसका सान्निध्य अगर तुम्हें आनंद में ले जाए, तो तुम समझ लेना कि तुम अपने भीतर पहुंच गईं। बिना भीतर पहुंचे कभी कोई आनंदित नहीं होता है। इसलिए जीवन में सब तरफ खोजो कि कैसे हम भीतर पहुंच जाएं?
और भीतर पहुंचने का केंद्रीय सूत्र प्रेम है।
और बाहर पहुंचने का केंद्रीय सूत्र घृणा है।
महत्वाकांक्षा घृणा का रूप है, ईर्ष्या घृणा का रूप है। इसलिए किसी से स्पर्धा मत करना। स्पर्धा ही करनी हो, तो खुद से करना। किसी दूसरे के आगे निकलने की कोशिश मत करना। आगे ही निकलना हो, तो अपने से आगे निकलना। और जो तुम सीख रही हो, उसे केवल इसलिए मत सीखना कि पड़ोस के लोग भी सीख रहे हैं। उसे इसलिए ही सीखना कि वह तुम्हारा प्रेम है। तुम्हारा अपना आनंद है। जिस दिन तुम्हारी शिक्षा तुम्हारा प्रेम बन जाएगी, उस दिन तुम्हारी शिक्षा तुम्हें भीतर ले जाने में समर्थ हो जाएगी।
सारी दुनिया के शिक्षकों और विचारशील लोगों के सामने यही सवाल है कि हम शिक्षा को मनुष्य के भीतर ले जाने का द्वार कैसे बना सकें?
प्रेम से वह द्वार बन सकता है। और जब कोई व्यक्ति अपने भीतर पहुंचता है, वहीं, उसी मंदिर में परमात्मा का निवास है। जब कोई अपने भीतर पहुंचता है, तब वह ऐसी संपदा का मालिक हो जाता है, जो कभी क्षीण नहीं होती। और ऐसे सुख की अनुभूति में डूब जाता है, जो कि जीवन की कृतार्थता है, धन्यता है, उपलब्धि है, जीवन का अर्थ है।
सारी दुनिया में यही प्रश्न है सबके सामने कि हम मनुष्य को उसके भीतर ले जाने वाला कैसे बना सकें?
तुम्हारे जीवन की यात्रा शुरू हुई है। बहुत डर है कि तुम भी उसी ज्वर से ग्रस्त हो जाओगी जिससे सारे लोग ग्रस्त रहे हैं। इसके पहले कि तुम्हारे हृदय में घृणा का, ईर्ष्या का, अहंकार का, महत्वाकांक्षा का बीजारोपण हो, तुम बहुत सचेत होकर प्रेम की दिशा में कदम उठाना। जो भी सीखो, उसे प्रेम से सीखना।
और स्मरण रखना, निरंतर इस बात की खोज करना कि मैं जो कर रही हूं वह मेरी घृणा से, ईर्ष्या से तो नहीं आ रहा है; मेरे प्रेम से आ रहा है। अगर यह तुम्हें स्मरण रहे, अगर यह तुम्हारे ध्यान में हो, तो धीरे-धीरे तुम्हारे कदम रोज-रोज प्रेम के अभ्यासी होते चले जाएंगे। तब तुम्हारे जीवन में जो भी होगा, वह प्रेम से होगा। और प्रेम से जो भी होगा, वह अंतर की तरफ ले जाने वाला हो जाता है। प्रेम की सीढ़ियां भीतर पहुंचती हैं।
इसलिए कहा है: प्रेम परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग है। प्रेम ही परमात्मा है। और जो शिक्षा हृदय को प्रेम से भर दे समस्त जीवन के प्रति, समस्त लोगों के प्रति, वह शिक्षा धर्म हो जाती है। शिक्षा धर्म होनी चाहिए।
लेकिन शिक्षा के धार्मिक होने का मतलब यह नहीं है कि गीता पढ़ाई जाए, बाइबिल पढ़ाई जाए। न ही शिक्षा के धार्मिक होने का मतलब यह है कि जय गणेश, जय गणेश करवाया जाए। न ही शिक्षा के धार्मिक होने का यह मतलब है कि सत्य, अहिंसा के पाठ तुम्हें रटवा दिए जाएं। शिक्षा के धार्मिक होने का मतलब यह है कि तुम्हारा हृदय प्रेम से भर जाए। और वह कैसे भरेगा? अगर तुम ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा में जीओगी वह प्रेम से कभी नहीं भर सकता है। प्रेम से भरने का अर्थ है, तुम जो भी सीखो...
रवींद्रनाथ ने गीत लिखे। किसी ने पूछा रवींद्रनाथ को, क्यों लिखे हैं ये गीत? रवींद्रनाथ ने कहा: मेरा प्रेम नहीं मान सका बिना लिखे। मेरे हृदय में उठे भाव और मेरे प्रेम ने कहा कि सारी दुनिया को बांट दूं। रवींद्रनाथ ने यह नहीं कहा कि दूसरे कवियों से मुझे आगे निकलना है इसलिए लिखे मैंने ये गीत।
विनसेंट वानगॉग एक बहुत बड़ा डच चित्रकार हुआ। उससे किसी ने पूछा कि तुम क्यों बनाते हो ये चित्र, क्यों ये पेंटिंग्स करते हो? उसने कहा: चूंकि मुझे चित्र बनाने से प्रेम है।
उसका एक भी चित्र बिका नहीं जीवन में। आज तो उसके एक-एक चित्र की कीमत भी चार-चार, पांच-पांच लाख रुपया है। लेकिन उसकी जिंदगी में उसका एक भी चित्र नहीं बिक सका। उसके घरवालों ने कहा: तुम पागल हो, किसलिए चित्र बनाते हो? कोई चार पैसे में खरीदने को राजी नहीं है। उसने कहा: मैंने इन्हें बनाने में वह मूल्य पा लिया, वह आनंद पा लिया, जो मैं चाहता था। अब इनसे कुछ भी पाने का सवाल नहीं है। मैंने इन्हें बनाया, यह मेरा आनंद था, यह मेरी खुशी थी, यह मेरा प्रेम था। मैंने इनसे पा लिया जो मुझे पाना था।
जीवन में जिन लोगों ने भी आनंद पाया है, वे वे ही लोग हैं जिन्होंने प्रेम से कुछ किया है। जो लोग प्रेम से कुछ भी नहीं करते हैं और सिर्फ ईर्ष्या से करते हैं, वे लोग कभी जीवन में आनंद को नहीं पा सकते। उनके हाथ खाली रह जाएंगे। प्रेम के अतिरिक्त हाथों को भरने वाली और कोई संपत्ति नहीं है, क्योंकि प्रेम भीतर पहुंचा देता है। और प्रेम उस अंतस के केंद्र पर पहुंचा देता है जहां, जहां परमात्मा का आवास है।
तो मैं यह निवेदन करूंगा अंत में: तुम्हारा जीवन प्रेम की एक खोज बने, महत्वाकांक्षा की एक दौड़ नहीं। तुम्हारा जीवन आनंद की एक यात्रा बने, ईर्ष्या की विक्षिप्तता नहीं। तुम्हारे जीवन में वह आंतरिक सौंदर्य हो जो न केवल तुम्हें परिपूर्ण कर देगा, तुम्हें शांत और तृप्त कर देगा, बल्कि तुम्हारी सुगंध भी जिनके पास पहुंचेगी, वे भी उस आनंद के साझीदार हो जाएंगे।
लेकिन अभी तो हम बीमार और विक्षिप्त लोग हैं, जिनके चित्त में सिवाय ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा के और कोई लपटें नहीं जलतीं। और तब हम तो दुखी होते ही हैं, हम उस दुनिया को भी बनाते हैं जो नरक हो जाती है। जमीन को स्वर्ग बनाना उन बच्चों के हाथ में है, जो अपने भीतर स्वर्ग को बना सकेंगे।
ये थोड़ी सी बातें मैंने तुमसे कहीं इस आशा में कि तुम इन पर सोचोगी। हो सकता है कोई बात तुम्हें ठीक मालूम पड़े और वह ठीक बात तुम्हारी जिंदगी को बदलने का कारण हो जाए। मेरे कहने से तुम्हारी जिंदगी नहीं बदल सकती, तुम्हें दिखाई पड़ जाए कोई सत्य, तो ही तुम्हारी जिंदगी बदल सकती है।
मैंने जो कहा उसे मान मत लेना, उसे सोचना, विचारना, अपनी बुद्धि की कसौटी पर कसना। उसमें जो फिजूल मालूम पड़े, उसे बिलकुल फेंक देना। और सारी खोज-बीन और छान-बीन के बाद अगर तुम्हें एक छोटा सा टुकड़ा भी उसमें ठीक मालूम पड़ जाए, तो वह छोटा सा टुकड़ा तुम्हारे भीतर बीज बन जाएगा और तुम्हारी जिंदगी को बदल देगा।
परमात्मा करे, तुम्हारी जिंदगी प्रेम की जिंदगी बने, ईर्ष्या और घृणा की नहीं। घबड़ा चुके हैं हम जमीन पर ईर्ष्या से भरे हुए लोगों से। एक ऐसे मनुष्य की जरूरत है जो प्रेम से भरा हो।

मेरी बातों को इतने प्रेम से सुना है, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।


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