QUESTION & ANSWER

Jeevan Darshan 03

Third Discourse from the series of 7 discourses - Jeevan Darshan by Osho.
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मेरे प्रिय आत्मन्‌!
एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करना चाहूंगा।
अभी सुबह ही थी और गांव के बच्चे स्कूल पहुंचे ही थे कि अनायास ही उस स्कूल के निरीक्षण को एक इंस्पेक्टर का आगमन हो गया। वह स्कूल की पहली कक्षा में गया और उसने जाकर कहा: इस कक्षा में जो तीन विद्यार्थी सर्वाधिक कुशल, बुद्धिमान हों; उनमें से एक-एक क्रमशः मेरे पास आए और जो प्रश्न मैं दूं, बोर्ड पर उसे हल करे।
एक विद्यार्थी चुपचाप उठ कर आगे आया। उसे जो प्रश्न दिया गया, उसने बोर्ड पर हल किया और अपनी जगह जाकर वापस बैठ गया। फिर दूसरा विद्यार्थी उठ कर आया। उसे भी जो प्रश्न दिया गया, उसने हल किया और चुपचाप अपनी जगह जाकर बैठ गया। लेकिन तीसरे विद्यार्थी के आने में थोड़ी देर लगी है। और जब तीसरा विद्यार्थी आया भी, तो वह बहुत झिझकते हुए आया। बोर्ड पर आकर खड़ा हो गया। उसे सवाल दिया गया। लेकिन तभी इंस्पेक्टर को खयाल आया कि यह तो पहला ही विद्यार्थी है जो फिर से आ गया है। तो उसने उस विद्यार्थी को कहा: जहां तक मैं समझता हूं, तुम पहले विद्यार्थी हो जो फिर से आ गए?
उस विद्यार्थी ने कहा: माफ करिए, हमारी कक्षा में जो तीसरे नंबर का होशियार लड़का है, वह आज क्रिकेट का खेल देखने चला गया है। मैं उसकी जगह हूं। वह मुझसे कह गया है कि मेरा कोई काम हो तो तुम कर देना।
इंस्पेक्टर यह सुनते ही आगबबूला हो गया और बहुत जोर से चिल्लाने लगा और बहुत नाराज हुआ। उसने कहा: यह बात भी कभी देखी और सुनी गई है कि एक विद्यार्थी के प्रश्न दूसरे विद्यार्थी हल करे? या एक की परीक्षा दूसरा दे? इससे ज्यादा अनैतिक बात और क्या हो सकती है? और उसने विद्यार्थियों को काफी समझाया कि यह बहुत भूलभरी बात है। और तब शिक्षक की तरफ वह मुड़ा और उसने कहा: महानुभाव, आप खड़े-खड़े देख रहे हैं और आप रोक नहीं सके? और आप, मुझे मूर्ख बनाया जा रहा है, यह भी चुपचाप खड़े देख रहे हैं! आपने यह भी नहीं कहा कि यह विद्यार्थी एक बार आ चुका है? वह शिक्षक भी विद्यार्थियों पर नाराज हुआ।
लेकिन अंत में इंस्पेक्टर ने पूछा: मुझे ऐसा मालूम पड़ता है, जैसे आप इन विद्यार्थियों को पहचानते नहीं?
उस शिक्षक ने कहा: माफ करिए! असल में, मैं इस क्लास का शिक्षक नहीं हूं। इस क्लास का शिक्षक क्रिकेट का खेल देखने चला गया है। और वह मुझसे कह गया है कि मैं उसकी जगह थोड़ी क्लास देख लूं।
इंस्पेक्टर तो पागल हो गया। उसने कहा: यह क्या, यह क्या स्थिति है, आप भी धोखा दे रहे हैं मुझे! आप दूसरी क्लास के शिक्षक हैं और आप यहां खड़े हैं? उसने शिक्षक को भी बहुत भला-बुरा कहा। और तब अचानक वह थोड़ा नरम हो गया। और उसने कहा: वह तो अच्छा हुआ, आपका सौभाग्य है कि आज असली इंस्पेक्टर निरीक्षण करने नहीं आया, वह क्रिकेट का खेल देखने गया है। मैं तो असली इंस्पेक्टर का मित्र मात्र हूं। अगर आज असली इंस्पेक्टर आया होता तो तुम्हारी खैरियत न थी।
इस घटना से इसलिए आज की बात शुरू करना चाहता हूं कि हम सारे लोग एक ही नाव पर सवार हैं। हम सब एक से ही दोषी और जिम्मेवार हैं। यहां यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि हम दूसरों की तरफ इशारे उठाएं, बल्कि यही महत्वपूर्ण है कि हम अपनी तरफ लौट कर देख लें कि हम किस स्थिति में हैं? हम सब एक ही नाव पर सवार हैं। और एक सी हमारी जिम्मेवारी है इस समाज को और इस दुनिया को बनाने में। और इस दुनिया के अंधकार में हमारा भी योगदान है, हम भी साझीदार हैं।
बहुत आसान है कि हम दूसरों की भूलें देख लें। बहुत आसान है कि हम दूसरों की नग्नता देख लें। वह बहुत कठिन बात नहीं है। आसान है। सुखद और प्रीतिकर है। क्योंकि जब भी हम दूसरों की भूलें और दूसरों के अंधकार से भरे पहलू देखते हैं, तो हमें एक खुशी मिलती है। वह खुशी दो कारणों से मिलती है।
एक तो इस कारण से कि दूसरों के जीवन के अंधकार-स्थल देखने पर हमारे खुद के जीवन के अंधकार-स्थल अत्यंत सामान्य हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, सभी लोग ऐसे हैं। तो मुझमें कोई विशेष खराबी नहीं है। दूसरी बात, दूसरों के जीवन के अंधकार को देखने से हमारे खुद के भीतर, हमारे खुद के जीवन में जो नग्न-तथ्य हैं, उनको देख कर जो पीड़ा होनी चाहिए, जो आत्म-दंश होना चाहिए, जो चिंतन होना चाहिए, वह पैदा नहीं होता।
कल मैंने आपसे यह कहा कि धर्म के रास्ते पर प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के तथ्यों को देख लेना जरूरी है। दूसरों के जीवन के तथ्यों को तो हम सारे लोग देखते हैं, अपने जीवन को लेकिन नहीं। दूसरों के जीवन में तो हम झांकते हैं, लेकिन अपने जीवन में नहीं। और तब, तब हमारे जीवन में धर्म का कोई अवतरण संभव नहीं हो सकता है।
धर्म आत्म-आलोचना है। धर्म है स्वयं के संबंध में अत्यंत तीखी और पैनी आंखों से दर्शन, स्वयं का स्पष्ट विश्लेषण, स्वयं के प्रति अत्यंत सजग जागरूकता।
और जब तक हम स्वयं को उसकी पूरी सच्चाई में न जान लें, तब तक स्वयं के परिवर्तन का कोई मार्ग नहीं है। जो व्यक्ति अपने को बदलने चला है, किसी क्रांति से गुजरने चला है, अपने जीवन को आलोकित करने की जिसकी प्यास पैदा हुई है, उसे स्वयं को बहुत बारीक आंखों से देख लेना आवश्यक है।
और जैसा मैंने कल आपसे कहा, हम तो स्वयं के तथ्यों को छिपाते हैं, हम तो उन्हें ढांकते हैं। किसी दूसरे से ढांकते होते तो भी एक बात थी, हम अपने से ही उन तथ्यों को ढांक लेते हैं। हम खुद को ही धोखा देते हैं।
अधर्म की परिभाषा मेरी आंखों में यही है: जो खुद को धोखा देता है, वह अधर्म में जीता है।
और जो खुद को धोखा देने में असमर्थ हो जाता है, उसके जीवन में धर्म की यात्रा शुरू हो जाती है।
लंदन में शेक्सपीयर का एक नाटक चलता था। बहुत उसकी प्रशंसा थी, सारे नगर में उसकी बात थी। नगर का जो सबसे बड़ा पुरोहित था, सबसे बड़ा पादरी था, उसके भी मन में था कि मैं भी जाऊं और उस नाटक को देखूं। लेकिन पुरोहित का नाटक देखने जाना शोभन न था। आखिर पुरोहितों ने ही तो नाटकों को गाली दे-दे कर निंदित किया है। तो वह स्वयं पुरोहित देखने जाए, यह ठीक न था। लेकिन मन उसका बहुत, बहुत उत्सुकता से भरा था कि देखूं।
उसने उस थियेटर के मैनेजर को एक पत्र लिखा। और उस पत्र में लिखा कि मेरे मित्र, मेरे मन में बड़ी तीव्र आकांक्षा है कि मैं भी नाटक देखने आऊं। क्या तुम्हारे थियेटर में पीछे का कोई दरवाजा नहीं है, जिससे मैं तो आ सकूं और नाटक देख सकूं, लेकिन देखने वाले दूसरे लोग मुझे न देख सकें?
उस थियेटर के मैनेजर ने जो उत्तर दिया, वह बड़ा अदभुत था। उसने लिखा कि जरूर आएं। आपका स्वागत है। पीछे दरवाजा है। उससे अक्सर धर्म-पुरोहित, साधु-संन्यासी आते हैं। उनके लिए विशेष रूप से उसे बनाना पड़ा है। आप आएं, आपका स्वागत है। लेकिन एक बात मैं निवेदन कर दूं, ऐसा दरवाजा तो है हमारे थियेटर में कि आप आएं और देखने वाले दूसरे लोग, दूसरे दर्शक आपको न देख पाएं, लेकिन ऐसा कोई दरवाजा हमारे थियेटर में नहीं है जिससे आप आएं और परमात्मा आपको न देख सके!
मुझे पता नहीं, वह पादरी गया या नहीं। वह जरूर गया होगा। क्योंकि कोई पादरी परमात्मा से जरा भी नहीं डरता है।
जीवन में हम दूसरों को धोखा देना चाहते हैं, वह तो ठीक ही है; लेकिन अपने को भी धोखा देना चाहते हैं। लेकिन क्या कोई ऐसा दरवाजा हो सकता है जिससे हम जाएं और हम ही अपने को जाते हुए न देख सकें? हो सकता है परमात्मा भी चूक जाए। हो सकता है परमात्मा भी न देख पाए। आखिर परमात्मा किस-किस के दरवाजों पर कितनी देर तक नजर रखता होगा। और यह नजर रखते-रखते अब तक ऊब भी गया होगा, घबड़ा भी गया होगा। लेकिन क्या कोई ऐसा दरवाजा हो सकता है जिससे मैं निकलूं और मैं ही न जान पाऊं? ऐसा कोई दरवाजा नहीं हो सकता।
लेकिन हम बहुत होशियार हैं, हम आंखें बंद करके निकल जाते हैं। खुद को भी पता नहीं चलने देते। और यह धोखा गहरा होता चला जाता है, यह डिसेप्शन भारी होता चला जाता है। इसका बोझ बढ़ता चला जाता है। आत्मा बोझिल से बोझिल होती चली जाती है। फिर हम आत्मा को जानने के लिए आकांक्षा करते हों, तो क्या यह हो सकेगा? जिसने निरंतर अपने को धोखा दिया है--अपने को; वह स्वयं को कैसे जान सकेगा? हो सकता है, वह अंतिम धोखा और दे ले और बिना स्वयं को जाने और समझ ले कि मैंने स्वयं को जान लिया है। और यह धोखा भी हम देते हैं।
शास्त्र से पढ़ लेते हैं आत्मा की बातें, सुन लेते हैं परंपराओं से परमात्मा के विचार और उन्हें सीख लेते हैं। और इस भांति उनकी बातें करने लगते हैं जैसे हम जानते हों। जैसे हम जानते हों! ऐसे उधार ज्ञान को हम अहसास करने लगते हैं कि हमारा अपना है। यह अंतिम धोखा है जो कोई आदमी अपने को देता है। पंडित इसी भांति अपने को धोखा दे लेता है। जो उसने नहीं जाना है, जो उसने केवल सुना है और सीखा है, जो उसने पढ़ा है और स्मरण कर लिया है, उसे भी वह ज्ञान मान लेता है।
हम सारे लोग यहां बैठे हैं, हममें से कोई ईश्वर को मानता होगा, कोई आत्मा को मानता होगा, कोई मोक्ष को मानता होगा। और हममें से कोई भी नहीं जानता इन बातों की सच्चाई। लेकिन निरंतर इन बातों को दोहराते रहने से ऐसा भ्रम पैदा हो जाता है जैसे कि हम जानते हैं। और जब हम दूसरों को ये बातें समझाने लगते हैं और उनको अहसास होता है, उनकी आंखों में हमें ऐसा दिखाई पड़ता है कि उनको बातें समझ में आ रही हैं। तो उनकी आंखों में यह झलक देख कर हमको खुद यह विश्वास आ जाता है कि हम जो बातें कह रहे हैं, वे जरूर सच होंगी और हमने जानी होंगी।
आज ही दोपहर मैं एक घटना कह रहा था। अमरीका में एक आदमी ने सबसे पहले बैंक डाला। बाद में, कोई चालीस वर्षों बाद जब वह बूढ़ा हो गया, और उसकी कोई जयंती मनाई जा रही थी, तो उसके एक मित्र ने उससे पूछा कि तुमने सबसे पहले बैंक किस तरह शुरू किया? उसने कहा: मैंने एक तख्ती बनवाई, जिस पर मैंने लिख दिया ‘बैंक’ और उसे घर के सामने टांग दिया। और मैं एक पेटी और किताबें लेकर बैठ गया पीछे। कोई घंटे भर बाद एक आदमी आया और उसने पचास रुपये जमा करवाए। फिर कोई दो घंटे बाद एक आदमी आया और उसने भी डेढ़ सौ रुपये जमा करवाए। उन दोनों आदमियों को जमा करते देख कर मेरा आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि मैंने भी अपने पचास रुपये उसमें जमा कर दिए। वह दो आदमियों को जमा करते देख कर मेरा भी विश्वास इतना बढ़ गया कि मैंने भी अपने पचास रुपये उसमें जमा कर दिए कि जरूर यह बैंक चल जाएगा। ऐसे बैंक शुरू हो गया।
शास्त्रों से हम शब्द सीख लेते हैं। उन शब्दों को हम दूसरों को बताने लगते हैं। और उनकी आंखों में अगर हमें झलक दिखाई पड़ती है कि हां, बात उन्हें ठीक लग रही है, तो हमारा खुद का विश्वास इतना बढ़ जाता है कि हमें लगता है कि जो हम कह रहे हैं वह बिलकुल सही है। और इस भांति शब्द ज्ञान बन जाते हैं। शब्द जो कि उधार और बासे हैं। और शास्त्र को हम स्मरण कर लेते हैं और भूल जाते हैं कि हम कुछ भी नहीं जानते हैं। यह अंतिम धोखा है, जो आदमी अपने को दे सकता है।
अगर मैं आपसे पूछूं, ईश्वर है? और अगर आप चुप रह जाएं और कहें: मुझे कुछ भी पता नहीं, मैं निपट अज्ञानी हूं। तो मैं कहूंगा: आप एक धार्मिक आदमी हैं, आप अपने को धोखा नहीं दे रहे हैं। लेकिन अगर आप कहें कि हां, ईश्वर है, और इस रंग का है और इस शक्ल का है, और इस मंदिर वाला सच्चा ईश्वर है और दूसरे मंदिर वाला झूठा है। तो मैं आपसे कहूंगा: आपने अपने को धोखा देना शुरू कर दिया।
ईश्वर जैसी बात कहां हमें ज्ञात है? अननोन है। अज्ञात है सत्य। और हम अपनी क्षुद्र बुद्धियों को लेकर चार शब्दों को सीख लेते हैं और कहने लगते हैं, हमें ज्ञात है। या एक आदमी कहे कि नहीं है ईश्वर, वह भी इतनी ही मतांध बात कह रहा है। बिना इस बात को जाने कि जिसका उसे पता नहीं है, उसे इनकार करना ठीक नहीं है। तो जो आदमी अपने प्रति सच्चाई बरतेगा, वह कहेगा कि मैं नहीं जानता हूं, मुझे कुछ पता नहीं है। और इस सरलता से, इस सच्चाई से उसके भीतर एक अन्वेषण की शुरुआत होगी, एक खोज की शुरुआत होगी।
ऐसे ही कल मैंने आपसे कहा, हमें अपने जीवन के सारे तथ्य अत्यंत निर्ममता से, सच्चाई से देख लेने जरूरी हैं। वे तथ्यों को देखने के सूत्र मैं आज आपसे कहूंगा।
जीवन के तथ्यों को देखने के सूत्र क्या हैं?
तीन सूत्रों पर आज मैं आपसे बात करूंगा।
पहला सूत्र है: विचार।
लेकिन हमने अपने जीवन में विचार के लिए कोई स्थान नहीं बनाया है। हम सारे लोग विश्वास से जीए चले जाते हैं। और जो आदमी विश्वास से जीता है, वह अंधा हो जाता है। विश्वास का अर्थ ही है जो हम नहीं जानते उसे मान लेना। और जब हमारी यह आदत हो जाए, जिसे हम न जानते हों उसे मान लेने की, तो धीरे-धीरे जीवन अंधा हो जाता है, आंखें खो देता है।
विश्वास नहीं, आत्म-निरीक्षण के लिए चाहिए विचार।
तीव्र विचार चाहिए, अत्यंत पैना विचार चाहिए, जो कि हमारे सारे अंधकार को और अंधेपन को काट सके। लेकिन हमने शायद विचार करने की आदत खो दी है। हम सारे लोग बहुत विचारों से भरे हुए मालूम पड़ते हैं। लेकिन मैं आपसे कहता हूं: विचार आप कभी नहीं करते हैं। विचारों से जरूर भरे रहते हैं, लेकिन विचार आपने शायद ही किया हो। विचार करने की पहली तो शर्त यह है: किसी बात को स्वीकार न करें। अपनी चेतना को पूरी तरह से उस प्रश्न पर सजग बनाएं, खुद देखें और सोचें।
एक मुसलमान फकीर था, नसरुद्दीन। एक संध्या भीख में किसी ने उसे थोड़ा सा मांस दे दिया। कोई तीन पौंड के करीब मांस रहा होगा। वह घर आया। उसने अपनी पत्नी को वह मांस दिया और कहा: आज बड़े सुख का दिन है, रोटियों की जगह मांस मिल गया है। मैं जाऊं अपने मित्रों को बुला लाऊं दो-चार को, तू तब तक तैयार कर। वह लौट कर जब मित्रों को लेकर घर आया, जैसी उसकी पत्नी की आदत थी, अपनी आदत के अनुसार ही उसने काम किया था। इसके पहले कि वह घर आता, उसकी पत्नी ने सारा मांस छिपा दिया। उसके आते से ही उसने कहा कि माफ करें, बड़ी मुश्किल हो गई। आप यहां से गए और हमारे घर की जो बिल्ली है, वह मांस खा गई।
अगर आप उस फकीर की जगह होते तो क्या करते? चार मित्र वह साथ ले आया था। वे द्वार पर खड़े थे। और उसकी पत्नी ने कहा कि मांस बिल्ली खा गई। अगर वह विश्वासी होता, अपनी पत्नी की बात मान लेता और चुप रह जाता। अविश्वासी होता, तो मन ही मन में संदेह करता, झगड़ा खड़ा करता। लेकिन न तो वह विश्वासी था और न अविश्वासी। उसने क्या किया? वह भाग कर पड़ोस की दुकान पर गया और तराजू ले आया और तराजू पर बिल्ली को रख कर तौल लिया। बिल्ली तीन पौंड निकली। तो उस फकीर ने कहा कि अगर यह मांस है, तो बिल्ली कहां है? और अगर यह बिल्ली है, तो मांस कहां है?
इस आदमी को हम कहेंगे, यह विचार का उपयोग कर रहा है। चीजों को तौल रहा है, परख रहा है, माप रहा है, कसौटी पर कस रहा है। उसने कहा: अगर यह है बिल्ली, तो फिर मांस कहां है? तीन पौंड तो मांस ही था। और अगर तू कहती है, उसने अपनी पत्नी से कहा कि यह मांस ही है, तो मैं पूछता हूं, बिल्ली कहां है? उसकी पत्नी ने सोचा भी न होगा कि बिल्ली तराजू पर तौली जाएगी।
हमने जिंदगी में तथ्यों को तराजू पर तौलना बहुत दिनों से बंद कर दिया है। हम आंख बंद करके या तो स्वीकार किए चले जाते हैं या अस्वीकार किए चले जाते हैं--लेकिन आंख बंद करके। आंख खोल कर जीवन के तथ्यों को, सच्चाइयों को हम तौलते नहीं हैं। और तब धीरे-धीरे सारा रास्ता भटक जाता है और अंधेरा हो जाता है।
अत्यंत सजग विचार चाहिए। हर चीज को कसौटी चाहिए। जिंदगी खिलवाड़ नहीं है, जिंदगी एक बड़ी परीक्षा है। जिंदगी एक बड़ी कसौटी है। जिंदगी का प्रतिपल एक अवसर है कि हम अपने भीतर सोई हुई शक्तियों को जगाएं, या सोने दें।
जो आदमी विश्वास कर लेता है, उसके भीतर विचार की, तर्क की प्रतिभा जन्मती नहीं।
अगर कोई आदमी अपनी आंखों का उपयोग न करे, कुछ वर्षों तक आंखें बंद रखे, तो फिर उसकी आंखें काम करना बंद कर देंगी। अगर कोई अपने पैरों को बांध कर बैठ जाए और कुछ वर्षों तक न चले, तो उसके पैर चलना बंद कर देंगे। क्योंकि जिस शक्ति का हम उपयोग करना बंद कर देते हैं, वह शक्ति क्षीण हो जाती है। जिस शक्ति का हम जितना अधिक उपयोग करते हैं, वह उतनी विकसित होती है।
लेकिन हजारों साल से मनुष्य-जाति का जिन लोगों ने शोषण किया है, उन्होंने चाहा नहीं कि मनुष्य सोचे, विचार करे। क्योंकि विचार बड़ी खतरनाक बात है। विचार बहुत विद्रोही है, बहुत रिबेलियस है। जो आदमी विचार करेगा, उसका शोषण नहीं किया जा सकता। उसे धोखा नहीं दिया जा सकता। उसे बरगलाया नहीं जा सकता। उसे गलत रास्तों पर नहीं ले जाया जा सकता। और आज तक मनुष्य-जाति को कुछ थोड़े से लोग--जैसे एक बड़ा षडयंत्र काम कर रहा है--अपने हित और स्वार्थ में गलत रास्तों पर ले जाते रहे हैं। इसके लिए जरूरी था कि वे मनुष्यों के भीतर विचार को पैदा न होने दें।
इसलिए उन्होंने सिखाया--विश्वास करो। धर्म-पुरोहितों ने, राजनीतिज्ञों ने, धनपतियों ने, सभी ने सिखाया: विश्वास करो। विश्वास फलदायी है। विश्वास धर्म का आधार है। जो विश्वास करता है वह परमात्मा को पा लेता है। इस तरह की बातें सिखाईं, जो निहायत झूठी और गलत हैं।
विश्वास से कभी कोई सत्य तक, ईश्वर तक न पहुंचा है और न पहुंच सकता है। क्योंकि जो खुली आंख चाहिए थी सत्य के निरीक्षण को, देखने को, दर्शन को, वह विश्वास बंद कर देता है। इसलिए जो व्यक्ति भी अपने जीवन को उघाड़ने को उत्सुक हुआ है, और अपने भीतर प्रवेश करके जीवन की शक्ति को जानने की आकांक्षा से भर गया है, उसे जानना चाहिए--उसे विचार करना होगा।
विचार बड़ी तपश्चर्या है। क्योंकि अनेक बार विचार बहुत से भ्रम छीन लेगा, बहुत से इलूजंस। और बहुत से इलूजंस, बहुत से भ्रम बड़े सुखदायी हैं। उनका छिन जाना बहुत दिल को चोट पहुंचाएगा, बहुत घबड़ाहट होगी। सारे भ्रम छिन जाएं तो आदमी बहुत बेचैनी अनुभव करेगा। लेकिन सत्य तक पहुंचने के पहले भ्रमों का छिन जाना जरूरी है। विचार की तेज तलवार भ्रमों के जाल को तोड़ देती है। इसलिए सोचना जरूरी है। दूसरे को स्वीकार या अस्वीकार करना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर समग्र चेतना से लग कर सोचना-विचारना जरूरी है। हर तथ्य को उलटना-पलटना जरूरी है। उसे तराजू पर तर्क के कसना जरूरी है। पहला सूत्र है विचार।
और जिस व्यक्ति के भीतर विचार सजग होता है, उसके जीवन में एक अलग तेजस्विता पैदा हो जाती है। जिसके भीतर विचार फीका पड़ जाता है, उसके जीवन में एक डलनेस, एक शिथिलता, एक उदासी, एक सुस्ती छा जाती है। मनुष्य के भीतर जो सबसे तेज तेजस्विता है, जो सबसे ज्वलंत अग्नि है, वह विचार की है। जिसके प्राण जितने विचारपूर्ण होते हैं, उसके जीवन में उतनी रोशनी और तेज आ जाता है, उतना प्रकाश आ जाता है।
एक बहुत बड़ा विचारक था। वह एक दिन सुबह-सुबह अपने गांव के तेली के घर तेल खरीदने गया था। उसने तेल खरीदा। तब तक तेल तेली तौल रहा था, वह देखता रहा कि उसके पीछे ही तेली का कोल्हू चल रहा था। बैल की आंखों पर पट्टियां बंधी थीं और वह बैल कोल्हू को चला रहा था। कोई चलाने वाला नहीं था। उसने उस तेली को पूछा: कोई चला नहीं रहा है, फिर भी यह बैल चल रहा है, बात क्या है?
उस तेली ने बड़े मतलब की बात कही। उसने कहा: देखते नहीं हैं, उसकी आंखें हमने बंद कर रखी हैं। जब आंख बंद होती है, तो बैल को पता ही नहीं चलता है कि कोई चला रहा है कि नहीं चला रहा है। आंख खुली हो, तो बैल पता लगा लेगा कि कोई नहीं चला रहा है, तो वह खड़ा हो जाएगा।
उस विचारक ने पूछा: लेकिन अगर वह खड़ा हो जाए, तो तुम्हें कैसे पता चलेगा, तुम तो पीठ किए बैठे हुए हो?
उसने कहा: उसके गले में हमने घंटी बांध रखी है। चलता है, घंटी बजती रहती है। जैसे ही घंटी रुकती है, हम फिर उसे चला देते हैं। उसे कभी यह खयाल ही नहीं आ पाता कि बीच में चलाने वाला गैर-मौजूद था।
उस विचारक ने कहा: लेकिन यह भी तो हो सकता है कि बैल खड़ा हो जाए और सिर हिलाता रहे, घंटी बजती रहे।
उस तेली ने कहा: हाथ जोड़ते हैं आपके, कृपा करके यहां से चले जाइए। कहीं बैल ने आपकी बात सुन ली, बड़ी मुश्किल हो जाएगी। आप जाइए। और अगली बार कहीं और से तेल खरीदा करिए। बैल बेचारा सीधा काम कर रहा है, इस तरह की बात सुन ले, सब गड़बड़ हो जाए।
बैल का मालिक नहीं चाहता है कि विचार बैल तक पहुंच जाए।
दुनिया में कोई मालिक नहीं चाहता है कि विचार मनुष्य तक पहुंच जाए।
और मनुष्य को जोता हुआ है, बहुत से, बहुत से कोल्हुओं में उससे काम करवाया जा रहा है। और उसके गले में घंटियां बांध दी गई हैं, जो बज रही हैं। और आदमी है कि आंख बंद किए चला जा रहा है।
आंख किस बात से बंद है?
आंख विश्वास से बंद है, बिलीफ। आदमी की आंख पर बिलीफ की पट्टियां हैं, विश्वास की पट्टियां हैं।
तभी तो एक रंग की पट्टी एक आदमी को मुसलमान बना देती है, दूसरे को हिंदू, तीसरे को जैन, चौथे को ईसाई बना देती है। अन्यथा आदमी-आदमी में कोई और फर्क है सिवाय विश्वासों के? एक आदमी और दूसरे आदमी में कोई भेद है? कोई दीवाल है? कोई खाई है उन दोनों के बीच? उनके प्रेम को रोकने वाली कोई दीवाल है? सिर्फ विश्वास के अतिरिक्त और कोई दीवाल नहीं है। मैं मुसलमान हो जाता हूं, आप हिंदू हो जाते हैं। क्योंकि मुझे बचपन से दूसरे विश्वास का जहर पिलाया गया और आपको दूसरे विश्वास का जहर पिलाया गया। आपकी आंख पर दूसरे ढंग की पट्टियां बांधी गईं, कोई दूसरे कोल्हू में आपको जोता गया, मुझे किसी दूसरे कोल्हू में जोता गया। और चाहे हम किसी भी कोल्हू में जुते हों, एक बात तय है कि हमारी आंखें बंद कर दी गई हैं। हमारी आंख के खुलने के सारे द्वार बंद कर दिए गए हैं। हमारे भीतर खयाल भी पैदा न हो।
और अगर कभी कोई खयाल दिलाने आ जाए, तो कोल्हू का मालिक कहता है: आपके हाथ जोड़ते हैं, आप यहां से जाइए। आपकी बातें अगर बैल ने सुन लीं, तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।
इसलिए दुनिया में जब भी विचार को जन्म देने वाले लोग पैदा हुए, तो हमने उनकी हत्या कर दी। हमने उनको सूली पर लटका दिया, या जहर पिला दिया।
सुकरात को यूनान ने जहर पिलाया। एक आदमी था, जिसने विचार के लिए कोशिश की थी। जो एथेंस की सड़कों पर गया और चिल्ला-चिल्ला कर लोगों को जगाने लगा कि तुम सोए हुए हो, तुम अंधे हो। तो उस इलाके के, जिनके स्वार्थ निहित होंगे, उन्होंने फिर सुकरात को बर्दाश्त नहीं किया। उन्होंने कहा: यह आदमी, समाप्त कर देना जरूरी है इसे। क्योंकि यह ऐसी बातें कह रहा है कि अगर लोगों ने सुन लीं, तो फिर उनका किसी तरह शोषण न किया जा सकेगा, उनका एक्सप्लाइटेशन नहीं हो सकेगा। तो सुकरात को उन्होंने कहा कि तुम लोगों को बिगाड़ रहे हो।
जरूर, अगर कोई विचारक किसी बैल को समझाए कि तू विचार कर और देख, तो उसका मालिक कहेगा कि बैल को बिगाड़ते हो?
सुकरात को जहर दे दिया।
इधर तीन-चार हजार वर्षों में जब भी विचार की कोई किरण मनुष्य के भीतर पैदा होने को हुई और ऐसा डर पैदा हुआ कि हवाएं कहीं उसे दूर न ले जाएं और सबके हृदय में चिनगारी न जला दे, तभी जल्दी से जो स्वार्थांध थे, उन्होंने उसकी हत्या कर दी, उस चिनगारी को वहीं बुझा दिया।
आज भी हम करीब-करीब वैसे ही अंधेरे में खड़े हैं, जैसे सुकरात के वक्त लोग थे। कोई फर्क पैदा नहीं हुआ।
एक साजिश है, एक कांस्पिरेसी है, एक षडयंत्र है। कुछ लोगों के हित में है यह बात कि समस्त मनुष्य-जाति अंधी बनी रहे। फिर इन अंधे लोगों से कुछ भी करवाया जा सकता है। इनसे कहा जा सकता है कि इस्लाम खतरे में है, तो आग लगाओ हिंदुओं के घरों में। तो ये अंधे आदमी आग लगाएंगे। ये न पूछेंगे कि लोगों के मकान में आग लगाने से धर्म का क्या संबंध हो सकता है? अब इनसे कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म खतरे में है, तो जलाओ मस्जिदों को। तो ये मस्जिदों को जलाएंगे, निहत्थे बच्चों की हत्या कर देंगे। और ये न पूछेंगे कि हिंदू धर्म की रक्षा का किसी के बच्चे की हत्या करने से कौन सा संबंध है? ये पूछेंगे ही नहीं। क्योंकि पूछता वह है, जो विचार करता है। जो विश्वास करता है, वह पूछता नहीं है, वह क्वेश्चंस खड़े नहीं करता। उसे तो जो कहा जाता है--आज्ञा--आज्ञा होती है उसे। वह उसे स्वीकार कर लेता है।
इसीलिए तो दुनिया में आज तक न मालूम किस-किस तरह की बेवकूफियां आदमी को समझाई जाती रहीं, आदमी उनके लिए लड़ाया जाता रहा, उसकी हत्या करवाई जाती रही, वह हत्या करता रहा। क्योंकि एक बुनियादी तरकीब काम में ले आई गई--विचार को जन्मने मत दो। क्योंकि विचार पूछेगा, विचार झिझकेगा, विचार हेजिटेट करेगा, विचार संदेह करेगा, विचार तर्क करेगा, पूछेगा। और जब खुद उसे अहसास होगा कि ठीक है, तब, तब एक कदम आगे उठाएगा।
इसलिए जो लोग उपद्रव जारी रखना चाहते हैं दुनिया में, शोषण जारी रखना चाहते हैं, युद्ध जारी रखना चाहते हैं, वे नहीं चाहते कि विचार पैदा हो। वे चाहते हैं, विश्वास रहे। हिटलर भी वही चाहता है, स्टैलिन भी वही चाहता है, दुनिया के और नेता भी वही चाहते हैं, धर्म नेता भी वही चाहते हैं।
इसलिए मैं कहता हूं कि चाहे वे धार्मिक नेता हों, चाहे राजनैतिक, वे सब एक बात पर सहमत हैं कि वृहत्तर मनुष्यता की आंखें खुलनी नहीं चाहिए। और तब वे सब एक ही षडयंत्र में सहभागी हैं।
मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं आंख खोलने के लिए, पूछने के लिए, प्रश्न खड़े करने के लिए। जिंदगी अंधे की तरह स्वीकार कर लेने की चीज नहीं है, खुली आंखों से खोजने की बात है। लेकिन हमने सब उत्तर बिना पूछे स्वीकार कर लिए हैं। इसीलिए तो हमारा सारा ज्ञान मुर्दा है। उसमें जीवन नहीं है, उसमें लिविंग क्वालिटी नहीं है। जो ज्ञान हम पूछ कर, खोज कर उपलब्ध करते हैं, उसमें जीवंतता होती है, उसमें जीवन होता है। जो ज्ञान हम चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं, वह मृत होता है।
जापान के एक गांव में दो मंदिर थे। उन दोनों मंदिर में पुश्तैनी झगड़ा था, जैसा कि मंदिरों में होता है। वे दोनों मंदिर हमेशा से एक-दूसरे के दुश्मन थे। वह दुश्मनी बड़ी पुरानी थी। अनेक लोग मर चुके थे पीढ़ियों से, लेकिन दुश्मनी कायम थी। क्योंकि मां-बाप अपने बच्चों को इतना प्रेम करते हैं कि वे अपनी दुश्मनी भी बपौती में दे जाते हैं कि तुम इसको सम्हाले रखना। तो उन मंदिरों के पुजारी बदलते गए थे। हजार साल पुराने वे मंदिर थे। लेकिन हर पुजारी नये पुजारी को बपौती दे गया था कि दूसरा मंदिर दुश्मन है। दुश्मनी इतनी ज्यादा थी कि उनमें आपस में कोई बोलचाल न था।
किस धर्म में आपस में बोलचाल है? मस्जिद और मंदिर में बोलचाल है? चर्च में और मंदिर में बोलचाल है? कभी कोई बोलचाल नहीं है। उनके बीच कभी कोई लेन-देन नहीं है।
उन दोनों मंदिरों में भी नहीं था। लेकिन उन दोनों मंदिरों के पुजारियों के पास दो छोटे-छोटे बच्चे थे। जो छोटी-मोटी सेवा-टहल के लिए थे, छोटा-मोटा काम कर देने के लिए थे। अब बच्चे बच्चे हैं! वे दोनों कभी आपस में रास्ते पर मिल जाते थे, तो हंस-बोल भी लेते थे। बच्चों को बूढ़े बिगाड़ते तो हैं, लेकिन वक्त लग जाता है बिगाड़ने में। बच्चे आखिर बच्चे हैं, एकदम से नहीं बिगाड़े जा सकते हैं। तो हालांकि उनके पुजारी समझाते थे कि देखो, दूसरे मंदिर के बच्चे से बात मत करना। लेकिन फिर भी बच्चे बच्चे हैं। बिगाड़ने में वक्त लग जाता है। वे कभी-कभी बोल लेते थे।
एक दिन उत्तर के मंदिर के पुजारी ने देखा कि उसका बच्चा दक्षिण के मंदिर के पुजारी के बच्चे से बातें कर रहा है। उसने, जब वह वापस लौटा, तो उसे डांटा और कहा कि तुम क्या बातें कर रहे थे? और मैंने कह दिया कि बात मत करो।
उस लड़के ने कहा: मैं खुद भी आपसे पूछने को था। आज कुछ ऐसी बात हो गई है कि मैं निरुत्तर हो गया। मैंने उस लड़के से पूछा, उस मंदिर के लड़के से कि तुम कहां जा रहे हो? वह लड़का बोला, जहां पैर ले जाएं। और तब मेरी समझ में कुछ भी न आया कि अब मैं उससे और आगे क्या कहूं।
उसका गुरु बहुत नाराज हुआ। उसने कहा कि यह बहुत बुरी बात है। उस मंदिर के बच्चे से हार जाना हमारे मंदिर की तौहीन है। तो तुम कल फिर यही बात पूछना, कहां जा रहे हो? और जब वह कहे, जहां मेरे पैर ले जाएं, तो तुम उससे कहना कि और समझ लो, अगर तुम्हारे पैर न होते तो तुम कहां जाते? जाते कि नहीं? तब फिर वह भी रह जाएगा, उसको भी फिर सूझे नहीं मिलेगा उत्तर कि क्या दे।
दूसरे दिन नियत जगह पर वह लड़का जाकर खड़ा हो गया। उस मंदिर का लड़का निकला, उसने पूछा: कहां जा रहे हो मित्र?
लेकिन उस लड़के ने नहीं कहा कि जहां पैर ले जाएं, उस लड़के ने कहा: जहां हवाएं ले जाएं!
बहुत मुश्किल हो गई। बंधा हुआ उत्तर तैयार था, लेकिन अब उसको देने का कोई मतलब न था। तैयार करके वह आया था कि कहूंगा कि अगर तुम्हारे पैर न हों, फिर कहीं जाओगे कि नहीं? लेकिन अब इसके कहने का कोई सार न था।
बड़ा क्रोध आया उस पर कि यह लड़का तो बड़ा बेईमान है। कल कुछ कहा, आज कुछ कहने लगा। लौट कर आया, अपने गुरु को कहा कि मैं आज भी हार गया हूं। वह लड़का तो बहुत बेईमान मालूम होता है।
उसके गुरु ने कहा: बेईमान लड़का, हजार साल से उस मंदिर में बेईमानों के सिवा कभी कोई रहा है? जरा सी बात में बदल जाते हैं वे लोग! लेकिन तुम डरो मत। कल तुम फिर पूछना। और जब वह कहे, जहां हवाएं ले जाएं। तो कहना, और अगर हवाएं बंद हों, तो कहीं जाओगे कि नहीं?
वह लड़का फिर नियत जगह पर जाकर खड़ा हो गया। उसके पास अपना कोई विचार तो था नहीं, अपनी कोई बुद्धि तो थी नहीं, अपना कोई चिंतन तो था नहीं। बंधे हुए उत्तर थे। वह लेकर उत्तर वहां जाकर खड़ा हो गया। जैसे कि हम सब लोग बंधे हुए उत्तर लिए हुए खड़े हैं। ऐसे ही वह भी खड़ा हो गया। फिर उसने लड़के से पूछा: कहां जा रहे हो मित्र? वह लड़का सच में ही बेईमान था, जैसी कि जिंदगी बेईमान है, रोज बदल जाती है। उस लड़के ने कहा: सब्जी खरीदने जा रहा हूं! और वह हवाओं का बंधा हुआ प्रश्न और उत्तर वहीं के वहीं रह गए।
जिंदगी भी बंधे हुए उत्तर नहीं मानती। रोज जिंदगी प्रश्न बदल देती है और हमारे उत्तर बंधे-बंधाए, सीखे हुए तैयार रह जाते हैं।
जिंदगी बंधे हुए उत्तर नहीं चाहती, जिंदगी चाहती है विचारपूर्ण चेतना। जो भी प्रश्न खड़ा हो, उस चेतना में प्रतिफलित होगा। चैलेंज होगा, चुनौती होगी और उत्तर आएगा। विचार में उत्तर आता है।
विश्वास में उत्तर सीखा हुआ, बंधा हुआ होता है। वह हम गीता से सीखते हैं, बाइबिल से सीखते हैं, कुरान से सीखते हैं, कृष्ण से, महावीर से, क्राइस्ट से सीखते हैं। वह उत्तर हम किसी से सीख कर आते हैं और जिंदगी के चौराहे पर खड़े हो जाते हैं। और जिंदगी रोज बदल जाती है, हमारा उत्तर पीछे पड़ जाता है। हम परेशान हो जाते हैं।
जो आदमी सीखे हुए उत्तर बांध लेता है अपने मन में, उसका जिंदगी से कभी मेल नहीं हो पाता। जिंदगी रोज आगे बढ़ जाती है। जिंदगी की गंगा ठहरती नहीं। वह आपके बंधे हुए उत्तरों के लिए नहीं है। वह रोज नई हो जाती है और नये प्रश्न खड़े कर देती है। आप अपनी किताब खोल कर जब तक उत्तर खोजते हैं, तब तक आप आंखें उठा कर देखते हैं, जिंदगी और आगे बढ़ गई, उसने और नये प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आप हमेशा पीछे रह जाते हैं।
विश्वास करने वाला हमेशा पीछे रह जाता है। जिंदगी से उसका संपर्क नहीं हो पाता। क्योंकि विश्वास दूसरे से ग्रहण करने पड़ते हैं। और दूसरे से ग्रहण करने में बासे हो जाते हैं, बंधे-बंधाए हो जाते हैं, डेड हो जाते हैं, मुर्दा हो जाते हैं। उनका बोझ तो जीवन पर हो जाता है, लेकिन जीवन को वे निर्भार नहीं कर पाते हैं।
इसलिए पहला सूत्र है: स्वयं के विचार की शक्ति को जगाना।
कैसे जगेगी? विचार करेंगे, तो जगेगी। सोचें। जीवन के हर पहलू को ऐसे ही स्वीकार न कर लें। सोचें। तराजू उठा लें तर्क का और तौलें। और विचार की कसौटी पर जो खरा न उतरता हो--चाहे वह कितना ही प्रीतिकर लगे, चाहे वह कितना ही सुखद मालूम हो, चाहे कितनी ही सांत्वना उससे मिलती हो--हिम्मत करें, उसे स्वीकार न करें। और तब तक प्रतीक्षा करें, जब विचार की कसौटी पर वह सही उतर आए। बहुत तपश्चर्या की बात है, कठिन बात है। हमारा मन तो ऐसे चुपचाप मानने को राजी हो जाता है। कौन मेहनत करे?
विचार में तो श्रम है, विश्वास में कोई श्रम नहीं है। मैंने कह दिया और आपने मान लिया। आपको कुछ भी न करना पड़ा। आप सहयोगी न हुए, आप सक्रिय न हुए, आप दूर खड़े रहे। मैंने कहा और आपने मान लिया और सुन लिया और अपने रास्ते पर चले गए। इस तरह निष्क्रिय रूप से जो स्वीकार करता है, उसकी आंखें बंद रह जाती हैं।
समग्र जीवन को एक सक्रिय विचार के रूप में लेना जरूरी है, यह पहला सूत्र है।
दूसरा सूत्र: वही व्यक्ति सक्रिय रूप से विचार कर सकता है, जो निष्पक्ष हो।
दूसरा सूत्र है: निष्पक्षता।
जो आदमी किसी पक्ष में बंध जाता है, वह सोच-विचार नहीं कर सकता। उसकी जाने-अनजाने इच्छा यही होती है कि मेरा पक्ष सही सिद्ध हो जाए। वह फिर निष्पक्ष नहीं हो पाता, अनप्रिज्युडिस्ड नहीं हो पाता। उसके मन का लगाव होता है कि यही सही हो।
अगर आप हिंदू हैं, तो आप सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं; आप फिर इस बात की खोज कर रहे हैं कि हिंदू होना कैसे सच्चा सिद्ध हो। कैसे यह मान लिया जाए कि हिंदू ही सही है, इसकी खोज चल रही है। यह खोज फिर निष्पक्ष सत्य की खोज नहीं है, आपने अपना पक्ष तय कर लिया है। आप पहले से ही निर्णय कर चुके हैं। और तब फिर बहुत आसान है, जो आदमी किसी पक्ष को पहले से स्वीकार कर ले। जिंदगी बहुत बड़ी चीज है, उसमें से वह अपने पक्ष की बातें चुन ले सकता है और भ्रांति में पड़ सकता है।
एक आदमी ने एक किताब लिखी है। अमरीका में तेरह का अंक, तेरह की तारीख अशुभ समझी जाती है। तो एक आदमी ने एक किताब लिखी है और उसने सिद्ध कर दिया है कि हां, तेरह का अंक, तेरह की तारीख अशुभ है। कैसे उसने सिद्ध कर दिया? तेरह तारीख को अमरीका में जितनी हत्याएं होती हैं, उसने उन सबका हिसाब लगवा लिया। तेरह तारीख को कितने लोग किन-किन बीमारियों से मरते हैं, उसके आंकड़े इकट्ठे कर लिए। तेरह तारीख को सड़कों पर कितने एक्सीडेंट होते हैं, उसके आंकड़े इकट्ठे कर लिए। तेरह तारीख को और क्या-क्या उपद्रव होते हैं--कितनी स्त्रियां भगाई जाती हैं, कितने मकानों में आग लगती है। और क्या-क्या होता है, वह सब इकट्ठा कर लिया। और सबको इकट्ठा करके उसने रख दिया किताब में। और उसने कहा: यह सब तेरह तारीख को होता है। इससे सिद्ध होता है कि तेरह तारीख बुरी तारीख है। अगर आप भी पढ़ेंगे, तो बहुत प्रभावित हो जाएंगे कि बात तो ठीक ही मालूम पड़ती है।
लेकिन अगर कोई चाहे तो बारह तारीख को भी इसी भांति सिद्ध कर देगा। कोई चाहे तो ग्यारह तारीख को भी इसी भांति सिद्ध कर देगा। एक्सीडेंट ग्यारह तारीख को भी होते हैं, मरना ग्यारह तारीख को भी होता है, बीमारियां ग्यारह तारीख को भी होती हैं, आग भी लगती है, सब-कुछ होता है। लेकिन तेरह तारीख का पक्ष लेकर वह चला, तो उसने चुनाव कर लिया, खोज लिया। आप बारह तारीख को लेकर चलें तो बारह तारीख के लिए भी खोज लेंगे। कोई दस तारीख के लिए चले तो दस तारीख के लिए भी खोज लेगा।
यह खोज नहीं है। यह पहले से पक्ष बना कर उस पक्ष को सिद्ध करना है। यह वैज्ञानिक बुद्धि नहीं है, यह साइंटिफिक एटिट्यूड नहीं है। जिंदगी के प्रति इस भांति का जो रुख लेता है, वह जो चाहे सिद्ध कर लेता है, लेकिन उस सिद्ध होने से कोई सत्य की खोज नहीं होती।
निष्पक्ष होना चाहिए। कोरे कागज की तरह खाली, जीवन की खोज में जाना चाहिए। पहले से मैं कुछ निर्धारित करके न जाऊं। शुभ और अशुभ, सत्य और असत्य, मैं पहले से तय करके न जाऊं। मेरा मन खुला हो, ओपन हो। जीवन जो कहे, उसे मैं सुनने को राजी होऊं। और तब, तब जरूर तथ्य खोजे जा सकते हैं। सत्य की खोज की जा सकती है। दूसरा सूत्र है निष्पक्षता।
क्या हमारे मन निष्पक्ष हैं? क्या किसी भी मसले पर हम निष्पक्ष होकर सोच सके हैं कभी? अगर न सोचा हो आपने, तो आप समझ लेना, आपने फिर सोचा ही नहीं है कभी। क्योंकि निष्पक्ष हुए बिना कोई सोच नहीं सकता।
लेकिन हम सब तो पक्षधर हैं। हम तो किसी न किसी पक्ष में हैं। और जब हम किसी पक्ष में होते हैं, तो फिर, तो फिर हमारी आकांक्षा बहुत दूसरी होती है।
एक फकीर ने एक बार कहा था। दो तरह के लोग जमीन पर हैं। एक तो वे, जो चाहते हैं, सत्य मेरे पड़ोस में आकर खड़ा हो। दूसरे वे, जो चाहते हैं, सत्य कहीं भी हो, मैं उसके पास जाकर खड़ा हो जाऊं। एक तो वे, जो चाहते हैं, सत्य मेरे बगल में आकर खड़ा हो। दूसरे वे, जो चाहते हैं, मैं सत्य के बगल में जाकर खड़ा हो जाऊं।
यह दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। जो आदमी चाहता है, सत्य मेरे बगल में आकर खड़ा हो, यह पक्षपात से घिरा हुआ आदमी है। चाहे सत्य को अपने पड़ोस में खड़ा करने में सत्य के प्राण निकल जाएं, लेकिन यह उसको अपने बगल में खड़ा करके रहेगा। यह सत्य से इसे कोई प्रेम नहीं है। प्रेम है खुद के अहंकार से। और उसके अहंकार की पूर्ति के लिए सत्य को भी ले आता है। लेकिन दूसरा व्यक्ति, जो कहीं भी सत्य हो उसके पक्ष में जाकर खड़े होने को राजी है। ऐसा व्यक्ति जरूर ही जीवन में सरल हो जाता है, अहंकार से शून्य हो जाता है और सत्य को उपलब्ध कर पाता है।
निष्पक्ष होना जरूरी है। सोचना जरूरी है भीतर कि मैं पक्षों से बंधा हुआ तो नहीं हूं?
अगर जमीन पर थोड़े से लोग भी निष्पक्ष हो जाएं, तो जमीन पर युद्धों का कोई कारण न रह जाए। क्योंकि बड़े आश्चर्य की बात है, आज तक जमीन पर किसी भी कौम ने यह नहीं कहा कि हमने आक्रमण किया है। सभी कहते हैं, हमने केवल अपनी रक्षा की है। फिर आक्रमण कौन करता है? दुनिया में जितनी हुकूमतें हैं, उन सबके जो उपद्रव और युद्ध के विभाग हैं, वे सब डिफेंस कहलाते हैं। वे सब कहलाते हैं रक्षा-विभाग। जब दुनिया में सभी लोग डिफेंस करते हैं, तो अटैक कौन करता है? जब दुनिया में सभी लोग सुरक्षा करते हैं अपनी सिर्फ, तो हमला कौन करता है? लेकिन कोई निष्पक्ष होकर सोचने को राजी नहीं है। इसलिए खुद जो हम करते हैं, वह सुरक्षा है; दूसरा जो करता है, वह आक्रमण है।
एक ईसाई पिता अपने बच्चे को कह रहा था: दस हिंदू ईसाई हो गए, परमात्मा को धन्यवाद। उन दस लोगों को सुबुद्धि आ गई। उसके बच्चे ने कहा: लेकिन पिताजी, एक बार एक ईसाई हिंदू हो गया था, तब तो आपने यह बात नहीं कही थी। तब तो आपने कुछ और ही कहा था। उसका पिता लाल आंखें करके बोला: चुप, उस गद्दार का नाम भी मत लेना, जो ईसाई से हिंदू हो गया।
वह है गद्दार, जो ईसाई से हिंदू हो जाए। और जो हिंदू से ईसाई हो जाए, उसको आ गई सुबुद्धि, वह है परमात्मा का प्यारा!
हम सब पक्षधर हैं, इसलिए हम सोच नहीं पाते, देख नहीं पाते, समझ नहीं पाते कि जिंदगी कैसे रास्ते चल रही है। और तब हम अपने-अपने कुएं में बंद होते हैं, उसके बाहर हमारी आंख नहीं जाती है।
सुनी ही होगी वह बात, सागर का एक मेढक एक छोटे से कुएं में आ गया था। उस कुएं के मेढक ने उससे कहा: मित्र, तुम कहां से आते हो? उसने कहा: मैं समुद्र से आता हूं। उस मेढक ने कहा: कितना बड़ा है तुम्हारा समुद्र, इतना बड़ा?--थोड़ी सी छलांग लगाई उसने कुएं के भीतर, एक फीट छलांग लगाई--कहा: इतना बड़ा है? सागर से आने वाला मेढक हंसा और उसने कहा: नहीं मित्र, इससे बहुत ज्यादा बड़ा है। उसने और जरा डेढ़ फीट लंबी छलांग लगाई, इतना बड़ा? उसने कहा: नहीं मित्र, सागर और बहुत बड़ा है। वह छलांग लगाता गया। आखिर जितना बड़ा कुआं था, कोई आठ फीट, आठ फीट की छलांग लगाई, उसने कहा: बस इतना बड़ा? उस सागर से आने वाले मेढक ने कहा: नहीं मित्र, तुम्हारे पास नापने का कोई उपाय नहीं है। कुएं वाला मेढक हंसने लगा और उसने कहा: निहायत पागलपन की बातें करते हो, इससे बड़ी कोई जगह भी है दुनिया में! इस कुएं से बड़ी कोई जगह भी है?
जो एक कुएं में रहा है, उसे अगर ऐसा खयाल पैदा हो जाए कि इससे बड़ी कोई जगह नहीं, तो हंसने की क्या बात है? जो कुएं में ही रहा है, उसे पता भी कैसे चलेगा कि इससे बड़ी कोई जगह है?
हम सारे लोग भी तो अपने-अपने कुएं बना लिए हैं और उनमें रह रहे हैं। और जब भी कोई सागर की खबर लाता है, तो हम कहते हैं: गीता में जो लिखा है वही आप कह रहे हैं न? बाइबिल में जो लिखा है वही न? कुरान में जो लिखा है वही न? और वह अगर कहे कि नहीं, जो मैं खबर लाया हूं, वह कहीं भी लिखी हुई नहीं है। तो हम कहेंगे, रहने दीजिए, ऐसी कोई बात ही नहीं हो सकती। हमारे कुएं से बड़ा भी कोई और स्थान हो सकता है? शब्दों में जो कहा गया है, उससे भी बड़ा कोई सत्य हो सकता है? परंपराओं ने जो कहा है, उससे भी बड़ी कोई बात हो सकती है?
हम अपने-अपने कुओं में बंद हैं। जो अपने कुएं में बंद है, उसे मैं कह रहा हूं पक्षपाती, पक्षधर, प्रिज्युडिस्ड। सोच-विचार के लिए चाहिए कुएं के बाहर आ जाना। उस मेढक ने भूल की जो सागर से आया था। मैं उसकी बड़ी तलाश करता हूं कि वह मुझे कहीं मिल जाए तो उससे मैं दो बातें कर लूं। उसने बड़ी भूल की। कुएं वाले मेढक
ने कोई भूल नहीं की। भूल की तो सागर से आने वाले मेढक ने की। जब कुएं के मेढक ने छलांग लगाई थी और कहा था इतना बड़ा, तभी सागर वाले मेढक ने भूल कर दी। उसने यह कहा: नहीं, इतना बड़ा नहीं, और बड़ा। इससे कुएं के मेढक को यह भ्रम पैदा हुआ कि और दूसरी छलांग लगाऊं जरा और लंबी, और तीसरी लगाऊं, और चौथी लगाऊं।
अगर मैं उसकी जगह होता तो उस कुएं के मेढक को कहता: मित्र, छलांग मत लगाओ। और लगानी ही है, तो पानी में मत लगाओ, कुएं के बाहर लगाओ, बाहर आ जाओ। और सागर को अगर जानना ही है तो कुएं में बैठ कर जानने का कोई उपाय नहीं है। चलो, जिस रास्ते से मैं सागर से यहां तक आया हूं, वह रास्ता मुझे पता है। मैं तुम्हें सागर तक ले चलता हूं। अगर वह कुएं के मेढक को सागर तक ले गया होता, तो जो बात समझानी कठिन थी, संभव नहीं हुई थी, वह उस कुएं के मेढक को खुद भी दिखाई पड़ जाती।
तो मैं आपसे कहूंगा: कुएं के भीतर नापना-जोखना बंद करें। थोड़ा कुएं के बाहर आएं--हिंदू के कुएं के, मुसलमान के कुएं के, जैन के कुएं के--थोड़ा बाहर आएं। परमात्मा का सागर बहुत बड़ा है। धर्म-पुरोहितों के कुएं बहुत छोटे हैं। किताबों के कुएं बहुत छोटे हैं। शब्दों के कुएं बहुत छोटे हैं। सत्य का सागर बहुत बड़ा है। और जो वहीं शब्दों में उनको नापने की कोशिश करेगा, अपने-अपने कुएं की इकाई में--चाहे उसका कुआं कितना ही बड़ा हो, वह कभी भी सत्य को न नाप पाएगा।
निष्पक्ष मन कुएं के बाहर आ गया मन है।
इसलिए दूसरा सूत्र है: पक्ष को विसर्जन कर दें, पक्ष को जाने दें।
तीसरा सूत्र, जिसके बिना दूसरा सूत्र भी संभव नहीं होगा। जैसे दूसरे के बिना पहला संभव नहीं हो सकता। तीसरा सूत्र क्या है?
पहला सूत्र है: विचार।
दूसरा सूत्र है: निष्पक्षता।
तीसरा सूत्र है: जागरूकता, अवेयरनेस।
जीवन के प्रति हम सोए-सोए जीते हैं। आंखें बंद किए से, सोए-सोए नींद में से जीते हैं। जाग कर नहीं। इसलिए बहुत सी सच्चाइयां हमारे पास से निकल जाती हैं, उन्हें हम देख भी नहीं पाते।
बुद्ध का जन्म हुआ। तो उनके पिता ने ज्योतिषियों को बुलाया और उनसे पूछा: यह बच्चा क्या बनेगा? उन ज्योतिषियों ने कहा कि या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या एक संन्यासी।
बड़े मजे की बात है, मां-बाप, बच्चा चोर हो जाए, हत्यारा हो जाए, इससे भी इतने नहीं डरते, जितने संन्यासी होने से डरते हैं। क्योंकि चोर-हत्यारा फिर भी दुनिया का एक हिस्सा होता है। संन्यासी बड़ी दूसरी राह पर चला जाता है। चोर और बेईमान के रास्ते भी मां-बाप के परिचित रास्ते होते हैं। संन्यासी का रास्ता बड़ा अननोन, अज्ञात होता है। वह बड़े अनजान रास्ते पर जाना है। कोई बाप नहीं चाहता, कोई मां नहीं चाहती।
यद्यपि बुद्ध के मां-बाप गांव में आए संन्यासियों के पैर छूते थे। दूसरे का लड़का संन्यासी हो जाए, किसी को क्या लेना-देना है। लेकिन खुद का लड़का संन्यासी हो जाएगा, इससे इतने घबड़ा गए कि नगर के सब विद्वानों को बुला कर पूछा कि इसे संन्यासी होने से कैसे बचाएं?
उन लोगों ने कहा: एक ही तरकीब है संन्यासी होने से बचाने की--जिंदगी इसे दिखाई न पड़े। यह बेहोश रहे, इसे पता न चले जिंदगी का, तो यह फिर संन्यासी नहीं होगा। क्योंकि जिस आदमी को जिंदगी दिखाई पड़ जाती है, उसकी जिंदगी में बदल हो जाती है, क्रांति हो जाती है।
तो बुद्ध को उन्होंने इस भांति पाला, जिसमें कि उसे कुछ भी दिखाई न पड़े। कहते हैं, बुद्ध की बगिया के फूल कुम्हलाने के पहले रात-रात अलग कर दिए जाते थे। कहीं कुम्हलाया हुआ फूल देख कर बुद्ध को यह खयाल न आ जाए कि जिंदगी भी एक दिन कुम्हला जाएगी। बूढ़े लोगों को बुद्ध के आस-पास जाने की आज्ञा न थी। युवा-युवतिएं ही उनके पास आते-जाते थे। ताकि बुद्ध को यह खयाल न आ जाए कि जिंदगी एक दिन बुढ़ापे में से भी गुजरती है। बुद्ध युवक हो गए तब तक उन्होंने मृत्यु की खबर न सुनी थी। कहीं मृत्यु की खबर, आघात जीवन में कोई क्रांति न ला दे।
फिर बुद्ध युवा हो गए। लेकिन जिंदगी से कब तक किसी को छिपाया जा सकता है। जिंदगी चारों तरफ से हमले किए जाती है रोज। और छिपाने की तरकीब ही खतरा बन गई।
बुद्ध युवा हुए। उस राज्य का यूथ फेस्टिवल होता था, युवक-महोत्सव होता था। बुद्ध उसमें भाग लेने गए। वे अपने रथ पर थे, और तभी उन्होंने पहली बार एक बूढ़े आदमी को देखा। अगर उन्होंने बचपन से ही बूढ़े आदमी को देखा होता, तो यह चोट इतनी गहरी न होती। बूढ़ा आदमी देखने की आदत हो गई होती। बचपन से उन्होंने बूढ़ा आदमी नहीं देखा था। हम भी रोज बूढ़े आदमी को देखते हैं निकलते अपने करीब से। बुद्ध ने भी देखा निकलते, लेकिन बुद्ध को वह बहुत, बहुत प्रगाढ़ होकर दिखाई पड़ा। अजनबी थे वे बिलकुल, उन्होंने बूढ़ा आदमी नहीं देखा था। उन्होंने अपने सारथी को पूछा: इस आदमी को क्या हो गया? ऐसा आदमी तो मैंने कभी देखा नहीं।
सारथी ने कहा: यह वृद्ध हो गया, बूढ़ा हो गया।
अगर आप होते बुद्ध की जगह तो आप कहते, अरे बेचारा, कितनी बुरी बात हो गई, बूढ़ा हो गया। चलो किसी धर्मार्थ अस्पताल में भरती करवा दें, इसका इलाज करवा दें। या सरकार को कहें कि बूढ़ा न होने दे किसी को, ऐसी योजना करे। आपने कोई ऐसी बात सोची होती। लेकिन बुद्ध ने यह नहीं सोचा। बुद्ध ने यह भी नहीं पूछा कि यह बूढ़ा कहां रहता है, क्या है, क्या नहीं। सारथी ने जैसे ही कहा, यह आदमी बूढ़ा हो गया, तो बुद्ध ने दूसरी कौन सी बात पूछी? कोई भी विचारशील बात वही पूछेगा। बुद्ध ने पूछा: क्या सभी मनुष्य बूढ़े हो जाते हैं?
सारथी ने कहा: निश्चित ही, सभी मनुष्य बूढ़े हो जाते हैं।
तो बुद्ध ने तीसरी बात कौन सी पूछी? बुद्ध ने पूछा: क्या मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा?
सारथी ने कहा: आप भी। कोई अपवाद नहीं हो सकता।
तो पता है बुद्ध ने क्या कहा? बुद्ध ने कहा: सारथी, रथ वापस लौटा लो, मैं बूढ़ा हो गया। बुद्ध ने कहा: सारथी, रथ वापस लौटा लो, मैं बूढ़ा हो गया! अब युवक-महोत्सव में जाने से क्या लाभ? वहां तो सब युवा लोग इकट्ठे हुए होंगे, मैं बूढ़ा हो गया। क्योंकि जो हो ही जाना है, वह हो ही रहा होगा। मैं बूढ़ा हो ही रहा होऊंगा, तभी तो बूढ़ा हो जाऊंगा। कोई अचानक थोड़े ही बुढ़ापा आ जाएगा, रोज-रोज आ रहा होगा। तो मैं बूढ़ा हो ही रहा हूं, थोड़े पल की बात है, थोड़े क्षण की, थोड़े दिन की कि दुनिया देख लेगी कि मैं बूढ़ा हो गया, लेकिन बूढ़ा होने की प्रक्रिया तो मेरे भीतर चलती ही होगी। मैं बूढ़ा हो ही गया हूं, मुझे वापस लौटा लो।
इस बूढ़े को बुद्ध ने जिस भांति देखा, यह आंखें खोल कर देखना है, जागरूक होकर देखना है।
जिंदगी को जो भी जाग कर देखेगा, उसकी जिंदगी एक क्रांति हो जाएगी, उसके भीतर सब बदल जाएगा।
लेकिन हम तो आंख बंद करके चले जाते हैं, देखते नहीं चारों तरफ क्या हो रहा है। पत्ते वृक्षों से गिर रहे हैं, जवान आदमी बूढ़ा हो रहा है, बूढ़ा आदमी मर रहा है। चारों तरफ मौत, सब तरफ से मौत घेरे चले जाती है और फिर भी हम जीए चले जाते हैं। और जीवन में कोई प्रश्न खड़ा नहीं होता। मौत जिज्ञासा नहीं बनती। बल्कि अगर कोई आपको पकड़ कर दिखाए कि देखो, यह मौत है, तो आप कहेंगे, ऐसी अपशगुन की बातें न करें। रहने दें, होगी, मुझे क्या लेना-देना, मैं तो जिंदा हूं। हम आंखें चुराते हैं।
जो आदमी मौत से आंखें चुराता है, वह आदमी जिंदगी को कभी न देख सकेगा। क्योंकि जिसे मौत को देखने का साहस नहीं, वह जिंदगी को भी नहीं देख सकेगा। जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
तो जिंदगी को बहुत जाग कर देखना जरूरी है, उसकी समग्रता में--उसकी कुरूपता, उसका सौंदर्य, उसके गड्ढे, उसकी बुराइयां, उसका अंधकार, उसका प्रकाश--सब देखना जरूरी है। और उसके लिए बहुत सतेज, खुली हुई आंख चाहिए। सोया हुआ आदमी नहीं।
मैंने सुना है एक फकीर के बाबत। वह राजस्थान के एक गांव में गया। जैसे मैं यहां बोलता हूं, ऐसे उस रात वह वहां बोलता था। जैसे आप यहां इकट्ठे हो गए हैं, उस गांव के लोग वहां इकट्ठे हो गए थे। सामने ही एक आदमी आगे बैठा था और सोया हुआ था। सामने जो लोग आगे बैठते हैं, अक्सर सो जाते हैं। कुछ कारण होता है। असल में, सामने बैठने का जो मोह है, वह सोए हुए आदमी का लक्षण ही है। वह गांव का सबसे बड़ा धनपति था, जो सामने बैठा था। और भी संन्यासी गांव में आए थे, लेकिन सब संन्यासियों ने देखा था कि वह आदमी सोता है, लेकिन कौन संन्यासी धनपति को कहे कि तुम सोते हो? क्योंकि सारा संन्यास और सारा धर्म और सारे मंदिर उसी धनपति से चलते हैं, उसे कौन नाराज करे? तो धनपति आंख बंद किए बैठा रहता था, सोता रहता था। दिन भर की मेहनत, थकान के बाद मंदिर सोने के लिए बड़ा अच्छा स्थल है! वह भी सोया रहता था।
वह जो संन्यासी था, लेकिन वह इसे बर्दाश्त न कर सका। और संन्यासी तो उससे यही कहते थे कि आप... उसका नाम था, आसो जी। उससे कहते थे, आसो जी, आप बड़े ध्यानमग्न होकर सुनते हैं। आसो जी बड़े प्रसन्न होते थे। हालांकि वे सोते थे, लेकिन संन्यासी उनसे यही कहते थे कि आप बड़े ध्यानमग्न होकर सुनते हैं। वे बड़े प्रसन्न होते थे। इस बात को सुन कर कोई भी प्रसन्न होता है कि आप ध्यानमग्न हैं और यह सुन कर नाराज होता है कि आप सो रहे हैं। हालांकि जितने लोग आपको ध्यानमग्न दिखाई पड़ेंगे, सौ में से निन्यानबे सोए हुए होते हैं।
लेकिन यह संन्यासी बहुत गड़बड़ था। इसने बीच में ही भाषण बंद कर दिया और कहा: आसो जी, सोते हैं?
आसो जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा: कौन कहता है मैं सोता हूं? मैं तो आंख बंद करके ध्यानमग्न होकर आपकी बातें सुन रहा हूं। अब आदमी खुद ही अपने को धोखा देना चाहे तो कोई क्या करे।
फिर उस फकीर ने बोलना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बात चली होगी। फिर उनको नींद लग गई। अब जिसको नींद लगने को आ रही हो, कितनी देर अपने को जगाए रखेगा। थोड़ी देर में फिर नींद आ गई होगी। लेकिन यह फकीर अजीब था, इसने फिर टोक दिया और कहा: आसो जी, सोते हो?
अब की बार आसो जी को और गुस्सा आ गया। क्योंकि सारा गांव इकट्ठा था, सारा गांव सुन रहा था। और संन्यासी तो कहते थे, आप ध्यानमग्न होकर सुन रहे हो। तो सारा गांव सुनता था, प्रसन्न होता था कि आसो जी बड़े धार्मिक हैं। और यह सारा गांव सुन रहा है और यह आदमी फिर दुबारा बोला। तो आसो जी ने कहा: समझते नहीं आप, मैंने कहा कि मैं ध्यानमग्न होकर सुन रहा हूं! मैं सोया नहीं हूं।
फिर उस फकीर ने बोलना शुरू किया। थोड़ी देर बात चली होगी। फिर आसो जी सो गए। सोए हुए आदमी की बात का कोई भरोसा थोड़े ही है। लेकिन अब की बार फिर उस संन्यासी ने फिर टोका। लेकिन अब की बार बड़ी अजीब बात उसने कही। हर बार वह कहता था, आसो जी, सोते हो? इस बार उसने कहा: आसो जी, जीते हो? नींद में आसो जी ने समझा वही पुराना प्रश्न है। वे बोले: नहीं-नहीं, कौन कहता है?
उस फकीर ने कहा कि अब तो बचना बहुत मुश्किल है आपका। अब आप पकड़ में आ गए हैं। वैसे आपने गलती से एक सच्ची बात कह दी है: जो सोता है, वह जीता भी नहीं है, जीने के लिए जागना जरूरी है।
क्या आपको कभी अनुभव नहीं होता है चौबीस घंटे में कि कभी हमारा जागरण थोड़ा तेज होता है, कभी कम? चेतना बहुत से ग्रेड्‌स में, चेतना बहुत से तलों पर सोती-जागती रहती है, कभी आपको खयाल होता है? कभी आपको ऐसा नहीं लगता है कि कभी हम ज्यादा जागे हुए मालूम पड़ते हैं? किसी खतरे में आदमी ज्यादा जागा हुआ मालूम पड़ता है। खतरा न हो तो सो जाता है। अगर आपको...
एक घटना मुझे याद आई, उससे शायद समझ में आ सके।
जापान में एक बहुत बड़ा कला गुरु था। और उसकी कला, पाइन के जो बड़े-बड़े दरख्त होते हैं, उन पर चढ़ना सिखाने की थी। सीधे दरख्तों पर, जहां फिसलने का बहुत भय है, चढ़ना सिखाता था लोगों को। एक युवक उसके पास सीखने आया था। उसने उस युवक को चढ़ने की तरकीब बताई और कहा, चढ़ो। वह बूढ़ा था, नब्बे वर्ष का था वह गुरु। वह नीचे बैठ गया और युवक चढ़ने लगा। युवक उस ऊंचे, लंबे दरख्त को, आकाश छूते दरख्त की आखिरी, आखिरी शाखा पर पहुंच गया। बिलकुल ऊपर पहुंच गया। उसके आगे जाने को कोई जगह न थी। वह गुरु बैठा रहा चुपचाप दरख्त के नीचे। और दो-चार लोग बैठ कर देख रहे थे।
फिर वह युवक वापस उतरना शुरू हुआ। जब जमीन से वह कोई बीस फीट दूर रह गया, तब वह बूढ़ा एकदम उठा और कहा: सम्हल कर उतरना! सम्हल कर!
वह युवक हैरान हुआ। जब वह दरख्त की ऊपर की चोटी पर था, तब तो इस पागल ने नहीं कहा कि सम्हल कर चढ़ना, सम्हल कर! अब जब कि वह वापस लौट आया है और जमीन पास आ गई है, खतरा गुजर चुका है, तब यह चिल्ला कर कह रहा है, सम्हल कर उतरना!
वह नीचे उतरा और उसने कहा: मैं हैरान हूं, आप बड़े अजीब आदमी मालूम पड़ते हैं! जब मैं खतरे में था, तब तो तुम चिल्लाए नहीं सम्हल कर, तब तो तुम चुपचाप आखें बंद किए दरख्त के नीचे बैठे रहे। और जब मैं खतरे के बाहर हो गया था, तब तुम चिल्लाए?
उस बूढ़े ने कहा: जब कोई खतरे में होता है, तब वह खुद ही जागा हुआ होता है। उस वक्त चिल्लाने की कोई जरूरत नहीं। खतरा वहीं से शुरू होता है, जहां आदमी खतरे के बाहर होता है। जैसे ही मुझे लगा कि तुम अब जमीन को करीब समझ रहे हो और निश्चिंत उतरने लगे, मैंने देखा कि तुम सोने के करीब आ गए हो, तो मैं चिल्लाया कि होश से उतरना, गिरना हो सकता है!
जिंदगी में कुछ क्षणों में, बहुत खतरे के क्षणों में हम जागे हुए होते हैं, बाकी साधारणतः हम सोए हुए होते हैं।
तो धार्मिक आदमी सदा जागा हुआ जीए कैसे? कैसे जीए? और जब तक वह जागा हुआ न जीए, तब तक जीवन के सत्य की कोई झलक उसे नहीं मिल सकेगी। सोए हुए आदमी को क्या अनुभव हो सकता है? क्या दर्शन हो सकता है?
धार्मिक आदमी कैसे जीए?
तो धार्मिक आदमी वही है, जो खतरों में जीता है।
नीत्शे से मरते वक्त किसी ने पूछा कि तुम एक छोटे से सूत्र में बता सकोगे क्या कि सत्य की खोज का रास्ता क्या है? तो उसने कहा: लिव डेंजरसली, खतरे में जीओ! बड़ी अजीब बात कही है। बड़ी सच।
हम सब तो खतरे से बच कर जीते हैं। सब तरफ से सिक्योरिटी कर लेते हैं, सब तरफ से बैंक-बैलेंस कर लेते हैं। सब तरफ से व्यवस्था कर लेते हैं, मजबूत दीवालें बना लेते हैं। सब इंतजाम कर लेते हैं। कहीं से कोई खतरा नहीं रहने देते। तो फिर हम सो जाते हैं, फिर हम सोए-सोए जीने लगते हैं।
संन्यासी वह है, धार्मिक वह है, जो खतरे में जीता है।
एक राजा ने एक महल बनवाया। और उसमें एक ही दरवाजा रखा, जिसमें कि चोरी न हो सके। पूरे भवन में एक ही दरवाजा रखा। विशाल भवन बनवाया और एक दरवाजा, जिसमें कि चोरी न हो सके। सारी सुरक्षा कर ली उसने। पड़ोस का दूसरा राजा उसके महल की खबर सुन कर देखने आया। उन दोनों ने... उसने अपना महल दिखलाया। पड़ोस का राजा भी बहुत प्रभावित हुआ। और उसने कहा कि बड़ा सुरक्षित महल तुमने बनाया है। इसमें खतरे की गुंजाइश नहीं है। चोर नहीं आ सकता, शत्रु नहीं आ सकता। और दूसरे लोग भी सड़क पर इकट्ठे हो गए थे। दूसरा राजा दूसरे नगर से देखने आया था।
एक बूढ़ा आदमी भी सामने ही खड़ा था। जब परदेसी राजा प्रशंसा कर रहा था उसके महल की, तब वह बूढ़ा आदमी जो सामने ही खड़ा था, अत्यंत दीन-दरिद्र, भिखारी मालूम होता था, वह हंसने लगा।
उस भवन के मालिक राजा ने पूछा: क्यों हंसते हो? कोई भूल है?
उसने कहा: सिर्फ एक भूल है। एक दरवाजा रखा है, यह गलती है, यह भी बंद कर दो। इस दरवाजे से तुम्हारी मौत भीतर घुस जाएगी। इसको भी बंद कर दो, तुम भीतर हो जाओ। फिर तुम बिलकुल सुरक्षित हो जाओगे, फिर तुम मर भी नहीं सकते। क्योंकि मौत को जाने-आने का भी फिर रास्ता नहीं रहा।
बात तो उसने ठीक कही। अगर यह राजा इस दरवाजे को भी बंद कर ले, तो फिर यह पूरी सिक्योरिटी में हो गया, पूरी सुरक्षा में। फिर कोई खतरा नहीं है। लेकिन तब जिंदगी से भी चूक जाएगा।
जिंदगी एक खतरा है प्रतिक्षण, एक असुरक्षा है, एक इनसिक्योरिटी है। जिंदगी बिलकुल वैसे ही है जैसे पत्ते पर ओस की बूंद हवा में कंपती रहती है। किसी भी क्षण गिर सकती है। जैसे ओस की बूंद घास के तिनके पर पड़ी होती है, किसी भी क्षण सूरज निकलेगा और भाप बन जाएगी। जिंदगी एक कंपन है। उसे जो ठोस बना लेते हैं और सब तरफ से सुरक्षित कर लेते हैं, वे कब्र बना लेते हैं अपने ही हाथ अपनी, और फिर उस कब्र में सो जाते हैं।
धार्मिक आदमी वह आदमी है जो जिंदगी की असुरक्षा को, इनसिक्योरिटी को स्वीकार करता है। मानता है और जानता है कि जिंदगी निरंतर खतरे में है। जीना एक खतरा है, मरना एक सुरक्षा है। तो जिंदगी को जो प्रतिक्षण एक असुरक्षा में अनुभव करता है... और जिंदगी असुरक्षा है। जिसे मैंने आज प्रेम किया है, कोई भरोसा है कि कल वह मुझे प्रेम देगा? जिसे मैंने आज मित्र कहा है, कोई भरोसा है कि कल सुबह वह मेरा मित्र रहेगा? जिसे मैंने अपना जाना है, कोई भरोसा है कि वह कल सुबह दुनिया से विदा नहीं हो जाएगा?
सब असुरक्षित है। जिंदगी में कुछ भी सुरक्षित नहीं है। जिंदगी जितनी तीव्र होगी, उतना सब असुरक्षित मालूम होगा।
इस असुरक्षा में जो जीता है और सुरक्षा के झूठे इंतजाम नहीं करता। सब इंतजाम झूठे हैं। क्योंकि आज तक कोई आदमी सुरक्षित कहां हो पाया, मौत सबको हटा कर ले गई, सबके इंतजाम झूठे साबित हो गए।
तो जो इंतजाम के झूठेपन को देख लेता है और जिंदगी की असुरक्षा को जीता है, डेंजरसली जीता है, खतरे में जीता है, प्रतिपल खतरे में जीता है, उस आदमी के भीतर एक जागरण पैदा होता है, एक अवेयरनेस पैदा होती है, वह होश से भर जाता है, उसके भीतर जागरूकता आ जाती है।
आप थोड़ा सोचें, अगर एक युवक एक युवती को प्रेम करे, तो जिसे वह प्रेम करता है उसके प्रति पूरी तरह जागा हुआ होता है। लेकिन कल वह उससे शादी कर लेता है और वह उसकी पत्नी बन जाती है, फिर वह उसके प्रति बिलकुल सो जाता है। फिर उसे देखता भी नहीं। याद करें, आपने अपनी पत्नी को कभी देखा है आंख भर कर? नहीं। नींद हो जाती है, फिर सब ठीक है। सुरक्षित हो गई सब बात, ठीक है।
बायरन ने शादी की। और जिस लड़की से उसने विवाह किया, चर्च से नीचे उतर रहा था उसका हाथ पकड़ कर। अभी शादी हुई थी, चर्च की मोमबत्तियां जली रही थीं और घंटियां बज रही थीं। अभी मेहमान उतर ही रहे थे सीढ़ियों से। वह अपनी पत्नी का हाथ लेकर नीचे उतर रहा था। गाड़ी में जाकर उसने बिठाया अपनी पत्नी को और उससे कहा कि एक बड़ी अजीब बात का मुझे अनुभव हुआ। कल तक जब तक तू मेरी नहीं थी, मैं तेरे प्रति बहुत जागा हुआ था। आज जैसे ही मैं सीढ़ियां उतर रहा था, तेरा हाथ मेरे हाथ में था, लेकिन एक क्षण को मुझे खयाल ही नहीं रहा कि तू साथ में भी है। मुझे एक दूसरी स्त्री दिखाई पड़ गई, जो रास्ते पर जा रही थी। और मेरा मन उसके प्रति कामना से भर गया। मैं उसके प्रति तो जागा हुआ था, तेरे प्रति सो गया था।
और कल तक, कल तक वह इसके प्रति भी बहुत जागा हुआ था। कल तक एक खतरा था, एक इनसिक्योरिटी थी। यह पत्नी हो भी सकती थी, नहीं भी हो सकती थी। यह मिल भी सकती थी, खो भी सकती थी। कल तक एक खतरा था, एक कंपन था। तो आदमी जागा हुआ था, चित्त होश से भरा था। आज सुरक्षित हो गई बात। वह पत्नी हो गई, वह मुट्ठी में हो गई, वह घर का एक सामान हो गई। अब कोई चिंता की बात नहीं है। अब कोई खतरा नहीं है।
ऐसे हमने सारे तरफ से जीवन को जड़ कर लिया है। और इस जड़ता के बीच हम निश्चिंतता से सो गए हैं। इस सोने के कारण, जो चेतना हमारे भीतर जागनी चाहिए थी, उसके जागने का कोई मौका नहीं रहा।
स्मरण रखिए, खोजिए कि आपने जो-जो सुरक्षा बनाई है वह सच्ची है? क्या वह टिकने वाली है? क्या वह सुरक्षा है? और आपको दिखाई पड़ेगा: कोई चीज सुरक्षित नहीं है, जीवन निरंतर एक खतरा है। और जो इस खतरे को अनुभव करता है, वह जागना शुरू हो जाता है।
ये तीन छोटे सूत्र मैंने आज आपसे कहे। कल कुछ और थोड़ी बातें आपसे मुझे करनी हैं।
ये तीन सूत्र मैंने आपसे कहे:
विचार का जन्म होना चाहिए।
निष्पक्ष चित्त होना चाहिए।
जागरूक चेतना होनी चाहिए।
ये तीन सूत्र जिसके जीवन में फलित होते हैं, उसके जीवन में सत्य के आगमन का मार्ग बन जाता है।
एक छोटी सी कहानी और मैं आपको विदा दूंगा।
एक बहुत दूर से भटकता हुआ एक फकीर अपने देश वापस लौटा। उस देश के राजा का वह बचपन का मित्र था। राजा ने उसे आमंत्रित किया और उसका स्वागत किया। और स्वागत के बाद उससे कहा: मेरे मित्र, तुम सारी जमीन घूम कर आए हो, कुछ मेरे लिए भेंट भी लाए या नहीं? मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूं कि तुम लौटोगे तो मेरे लिए कुछ लाओगे।
उस फकीर ने कहा कि मैं जमीन के कोने-कोने पर गया और मैंने अनूठी से अनूठी चीजें देखीं और मेरा हमेशा दिल हुआ कि तुम्हारे लिए कुछ भेंट ले चलूं। तुम जरूर यही पूछोगे, जब मैं लौटूंगा। लेकिन जो चीज भी मैंने लेनी चाही, मुझे खयाल आया, तुम इतने बड़े सम्राट हो, तुम्हारी सीमाएं राज्य की इतनी बड़ी हैं कि तुम्हारे पास यह चीज अब तक जरूर पहुंच गई होगी। तो मैं कोई ऐसी चीज लाना चाहता था जो तुम्हारे पास अब तक न पहुंची हो।
राजा बहुत उत्सुकता से भर गया। उसने कहा: फिर तुम लाए?
उस फकीर ने कहा: मैं ले आया हूं। मेरी झोली में रखी है।
उस राजा ने झोली छीन ली। हैरान हुआ, उस झोली में क्या ऐसी चीज होगी? छोटी सी फटी झोली थी फकीर की। इसमें क्या होगा जो मेरे पास नहीं है? हाथ डाला, तो चकित हो गया और भी ज्यादा। जो निकला, वह एक बहुत सस्ती चीज थी। वह दो पैसे का दर्पण था।
उस फकीर ने कहा: तुम्हारे पास सब-कुछ होगा, लेकिन ऐसी चीज न होगी, जिसमें तुम स्वयं को देख सको। मैं यह दर्पण ले आया हूं।
ये तीन सूत्र मैंने आपसे कहे। अगर ये आपकी जिंदगी में उतर जाएं, वह दर्पण आपको मिल जाएगा, जिसमें आप अपने को देख सकते हैं।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उसके लिए बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।


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