DHARAMDAS

Jas Panihar Dhare Sir Gagar 05

Fifth Discourse from the series of 11 discourses - Jas Panihar Dhare Sir Gagar by Osho. These discourses were given during JAN 30 - FEB 10 1978.
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कहो केते दिन जियबो हो, का करत गुमान।।
कच्चे बांसन का पिंजरा हो, जा में पवन समान।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन में उड़ि जान।।
कच्ची माटी के घडुवा हो, रस-बूंदन सान।
पानी बीच बतासा हो, छिन में गलि जान।।
कागद की नइया बनी, डोरी साहब हाथ।
जौने नाच नचैहें हो, नाचब वोही नाच।।

धरमदास एक बनिया हो करे झूठी बाजार।
साहिब कबीर बंजारा हो करै सत्त व्यापार।।
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
वाही देस की बतिया रे लावै संत सुजान।।
उन संतन के चरण पखारूं तन-मन करि कुर्बान।
वाही देस की बतिया हमसे सतगुरु आन कही।।
आठ पहर के निरखत हमरे नैन की नींद गई।
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
धरमदास के दाता सतगुरु पल में कियो निहाल।।
आवागमन की डोरी कट गई मिटे भरम जंजाल।

मैं हैरि रहूं नैना सो नेह लगाई।।
राह चलत मोहि मिलि गए सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई।
देइ के दरस मोहि बौराए, ले गए चित्त चुराई।।
छवि सत दरस कहां लगि बरनौं, चांद सूरज छपि जाई।
धरमदास बिनवै कर जोरी, पुनि पुनि दरस दिखाई।।
खल्वतो-जल्वत में तुम मुझसे मिली हो बारहा
तुमने क्या देखा नहीं मैं मुस्कुरा सकता नहीं
मैं कि मायूसी मेरी फितरत में दाखिल हो चुकी
जब्र भी खुद पर करूं तो गुनगुना सकता नहीं
मुझमें क्या देखा कि तुम उल्फत का दम भरने लगीं
मैं तो खुद अपने भी कोई काम आ सकता नहीं
रूह-अफजा हैं जुनूने-इश्क के नग्मे मगर
अब मैं इन गाए हुए गीतों को गा सकता नहीं
मैंने देखा है शिकस्ते-साजे-उल्फत का समां
अब किसी तहरीक पर बरबत उठा सकता नहीं
दिल तुम्हारी शिद्धते-अहसास से वाकिफ तो है
अपने अहसासात से दामन छुड़ा सकता नहीं
तुम मेरी होकर भी बेगाना ही पाओगी मुझे
मैं तुम्हारा होके भी तुममें समा सकता नहीं
गाए हैं मैंने खलूसे-दिल से भी उल्फत के गीत
अब रियाकारी से भी चाहूं तो गा सकता नहीं
किस तरह तुमको बना लूं मैं शरीके-जिंदगी
मैं तो अपनी जिंदगी का बार उठा सकता नहीं
यास की तारीकियों में डूब जाने दो मुझे
अब मैं शमअ-ए-आरजू की लौ बढ़ा सकता नहीं
एक ऐसे सौभाग्य की या दुर्भाग्य की घड़ी है, जब जीवन का सब व्यर्थ हो जाता है। जहां-जहां मूल्य देखे थे, वहां-वहां राख दिखाई पड़ती है। जहां-जहां फूल देखे थे वहां-वहां कांटे। जहां सोचा था सौंदर्य है, वहां सपना। जहां धन मान कर चले थे वहां कुछ भी नहीं।
जैसे रात सोया हुआ आदमी सुबह जागता है और सपनों में देखे सारे महल और सपनों में देखे सारे व्यवसाय व्यर्थ हो जाते हैं। ऐसी भी एक सौभाग्य या दुर्भाग्य की घड़ी है, जब जीवन में आदमी एकदम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। जो सोचा था ठीक है, सब व्यर्थ हो गया और इसके अतिरिक्त किसी सार्थक की कोई खबर नहीं है।
मैं दोनों शब्दों का उपयोग कर रहा हूं--सौभाग्य की या दुर्भाग्य की; सोच कर। क्योंकि यह घड़ी सौभाग्य की हो सकती है और दुर्भाग्य की भी हो सकती है। अगर तुम्हारे जीवन के द्वार-दरवाजे बंद हों और तुमने पहले से ही अनास्था में आस्था कर रखी हो, अविश्वास को विश्वास बना रखा हो, नकार और नास्तिकता तुम्हारे जीवन की पद्धति हो, तो यह घड़ी दुर्भाग्य की घड़ी है। फिर तुम अंधेरे और अंधेरे में गिरते जाओगे और गर्त में खो जाओगे। फिर यह घड़ी बड़ी निराशा की घड़ी है। फिर तुम्हें जीवन अर्थहीन मालूम होगा, एक बेबूझ पागलपन मालूम होगा।
लेकिन यह घड़ी सौभाग्य की भी हो सकती है। अगर तुमने अपनी चेतना के द्वार-दरवाजे बंद नहीं किए हैं और नकार तुम्हारी जीवन-शैली नहीं है, तो तुम आंखें उठा कर अभी भी देख सकते हो। यह जीवन व्यर्थ हुआ इससे जीवन व्यर्थ नहीं होता। यह जीवन व्यर्थ हुआ इससे केवल उस जीवन के द्वार खुलते हैं। यह धन मिट्टी साबित हुआ इससे धन मिट्टी साबित नहीं होता, इससे नये धन की खोज, नये धन की यात्रा शुरू होती है।
जो दिखाई पड़ता है वह व्यर्थ हुआ, इससे सब व्यर्थ नहीं होता, इससे अदृश्य की यात्रा शुरू होती है। इसलिए मैंने कहे दोनों शब्द एक साथ--दुर्भाग्य या सौभाग्य की घड़ी।
जो व्यक्ति अपने जीवन को नकार में ढाल लेता है--नकार यानी जो मान कर ही बैठा है कि जीवन व्यर्थ है; जो मान कर ही बैठा है कि यहां कोई परमात्मा नहीं है; जो मान कर ही बैठा है कि जो दिखाई पड़ता है इसके पार और कुछ भी नहीं है। खोजा नहीं है, गया नहीं है, आंख नहीं उठाई है, जो मान कर बैठा है कि भीतर कुछ भी नहीं है लेकिन भीतर कभी झांका नहीं है। ऐसा जो मान कर बैठा है उसके लिए तो दुर्भाग्य की घड़ी आ गई। उसके लिए तो बड़े संकट का क्षण आ गया। आत्मघात के अतिरिक्त अब कुछ भी नहीं सूझेगा। अपने को मिटा लूं, समाप्त कर लूं, बस यही समझ में आएगा।
लेकिन जिसने अपने को इस तरह नकार में कस नहीं लिया है, जो कहता है, हो सकता है और भी जीवन हो। जो कहता है, हो सकता है बुद्ध और महावीर, कृष्ण और कबीर, नानक और दादू सही हों। जो कहता है मैं खोजूं, तभी निर्णय लूंगा, उसके जीवन में यह घड़ी आत्मघात की नहीं है, आत्म रूपांतरण की घड़ी है। यहीं से या तो आदमी अपने को मिटाना शुरू करता है या अपने को जगाना शुरू करता है।
यह बड़ा महत्वपूर्ण दोराहा है। और हर जीवन इस दोराहे पर आता है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, एक न एक दिन तुम्हें इस दोराहे पर आना ही होता है, जहां विकल्प होते हैं दो--या तो निराशा में डूब जाओ या नई आशा के गीत को फूटने दो। या तो सब व्यर्थ मान कर हार जाओ, पराजित हो जाओ या कुछ और भी विजय हो सकती है उसके अभियान पर निकलो।
धनी धरमदास के जीवन में यह घड़ी आ गई थी। सब था उनके पास। धन था, पद था, प्रतिष्ठा थी, यश था। सफलता ही सफलता के ढेर लगे थे। और एक दिन जाग आई और यह दिखाई पड़ा कि यह सब तो बेकार है। क्योंकि जो भी मैंने इकट्ठा किया है, मौत छीन लेगी। मेरे पास ऐसा क्या है जो मौत न छीन सकेगी?
यह प्रश्न जिस दिन उठा उसी दिन नींद टूट गई। उसी दिन से एक दूसरी खोज शुरू हुई। इस खोज में सदगुरु अनिवार्य है। क्योंकि जब तुम अनजान की खोज पर निकलते हो तो किसी ऐसे व्यक्ति को खोजना होगा जो उस अनजान में गया हो। जब तुम सागर की यात्रा पर निकलते हो तो किसी ऐसे नाविक को खोजना होगा जिसने यात्रा की हो। और जब तुम पहाड़ पर चढ़ते हो तो तुम किसी ऐसे संगी-साथी को चाहते हो जो पहाड़ों से वाकिफ हो, परिचित हो।
यह बिलकुल स्वाभाविक है। अनजान की यात्रा में कोई चाहिए हाथ। अदृश्य की यात्रा में कोई चाहिए साथ--कोई ऐसा, जो उस दूसरे लोक की खबर तुम्हें दे सके। शब्द ओछे हैं, खबर ठीक-ठीक दी जा नहीं सकती लेकिन फिर भी इशारे किए जा सकते हैं।
और इशारे भी बड़े मूल्य के हैं। वे इशारे काम आते हैं। क्योंकि रास्ता बेबूझ है, रहस्यपूर्ण है। सुगम भी नहीं है, दुर्गम है। हजार मौके आएंगे जब तुम अटक जाओगे, राह खो-खो जाएगी। और हजार मौके आएंगे जब तुम गलत राह पकड़ लोगे। और हजार मौके आएंगे जब तुम्हारा मन कहेगा, लौट चलो, यहां आगे कुछ भी मालूम नहीं होता, सब अंधेरा है। अपनी पुरानी दुनिया ही ठीक थी--बुरी-भली जैसी भी थी। लौट चलो, कम से कम साफ-सुथरी थी। हम जानते थे कहां चल रहे हैं। भूगोल हमारे हाथ में था, नक्शा हमारे हाथ में था। यह किस जंगल में खोए जाते हो?
भय की बड़ी दुर्दांत घड़ियां आएंगी, जब ऐसा लगेगा कि यह तो जीवन की खोज न हुई, यह तो अपने हाथ से मौत की तलाश हो गई। मैं फिर से दोहरा दूं--उस परम की खोज में वह घड़ी निश्चित आती है जब तुम्हें लगता है, मैं मरा। उसी मृत्यु में से तो तुम्हारे नये जीवन का अंकुर निकलता है। बीज जब टूटता है तभी तो वृक्ष पैदा होता है। तुम मिटोगे तो ही तुम्हारे भीतर कुछ नये का सूत्रपात है।
कौन तुम्हें सम्हालेगा उस दिन? कौन तुम्हें सहारा देगा? कौन तुम्हें आश्वासन देगा कि घबड़ाओ मत, ऐसा मुझे भी हुआ है और फिर भी मैं हूं। सच तो यह है कि ऐसा जब से हुआ है, तब से ही मैं हूं; उसके पहले मैं कहां था!
बीज तो घबड़ा जाएगा। किसी वृक्ष का साथ चाहिए जो कहे, घबड़ाओ मत; टूटने से ही होना है। मिटने से ही पाना है। खोने में ही उपलब्धि है। धन्यभागी हैं वे, जो अपने को खो देते हैं, क्योंकि वे ही मालिक हो जाते हैं। वे ही सब कुछ पा लेते हैं। इस सूली पर चढ़ जाओ।
कोई हाथ का सहारा दे, आश्वासन दे, और उसकी आंखों की चमक और उसके जीवन की ज्योति तुम्हारे भीतर श्रद्धा उमगाए तो शायद तुम सूली पर भी चढ़ जाओ। और सूली पर चढ़ कर ही सिंहासन है।
ऐसी कठिन घड़ी में ही गुरु की जरूरत है। धरमदास को कबीर जैसा गुरु मिल गया।
गुरु दो तरह के होते हैं: एक तो जिनको हम परंपरागत गुरु कहें, जिन्होंने खुद नहीं जाना है लेकिन जाने हुओं का हिसाब-किताब कंठस्थ किया है। जिन्होंने शास्त्र पढ़े हैं, शास्त्रों का विश्लेषण किया है, शास्त्रों को छांटा है, शास्त्रों में डुबकी लगाई है--सत्य में नहीं, शास्त्रों में। और शास्त्रों के संबंध में उनकी कुशलता है। शब्दों के वे मालिक हैं। सिद्धांतों पर उनकी पकड़ है।
एक तो परंपरागत गुरु है। अगर कोई सैद्धांतिक उलझन हो तो वह सुलझा देगा। अगर शास्त्र के संबंध में तुम्हारी कोई शंकाएं और जिज्ञासाएं हों तो वह हल कर देगा। इस तरह के परंपरागत गुरु तो तुम्हें जन्म से ही मिल जाते हैं। तुम जैन घर में पैदा हुए तो जैन मुनि तुम्हारा गुरु है। हिंदू घर में पैदा हुए तो कोई हिंदू पंडित तुम्हारा गुरु है। मुसलमान घर में पैदा हुए तो कोई मौलवी तुम्हारा गुरु है।
ये तुम्हें जन्म से मिल जाते हैं। इनके लिए तुम्हें खोजना नहीं पड़ता। ये तुम्हें खोजते हैं। ये हर बच्चे की गर्दन पकड़ लेते हैं। इसके पहले कि बच्चा बड़ा हो और उसकी समझ में आए, उसकी समझ जगे, उसके पहले ही गर्दन पकड़ लेते हैं। क्योंकि समझ जग जाने के बाद इनके चक्कर में वह नहीं आ सकेगा।
इसलिए तुम्हारे सभी तथाकथित धर्म बड़ी चिंता में रहते हैं कि बच्चों को धार्मिक शिक्षा कैसे दी जाए। धार्मिक शिक्षा से उनका मतलब धर्म नहीं होता। धार्मिक शिक्षा से उनका मतलब होता है, इसके पहले कि बच्चे में बोध जगे उसे कैसे जकड़ दिया जाए सिद्धांतों से। इसके पहले कि बच्चे का अपना विवेक काम करे, विश्वास का जहर उसमें डाल देना चाहिए।
हिंदू बाप चाहता है मेरा बेटा हिंदू हो जाए। मुसलमान बाप चाहता है, मेरा बेटा मुसलमान हो जाए। ये राजनीतियां हैं, इनका धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। मुसलमानों की संख्या ज्यादा रहे यह राजनीति है। हिंदुओं की संख्या ज्यादा रहे यह राजनीति है। संख्या में बल है। कहीं मेरा बेटा हिंदू न हो जाए, मुसलमान सोचता है। हिंदू सोचता है, मेरा बेटा कहीं ईसाई न हो जाए। डर है, भय है--कहीं एक की संख्या कम न हो जाए। संख्या में बल है। संख्या में राजनीति है।
इस भय से हर बाप अपने बेटे को जल्दी से जल्दी किसी धर्म में दीक्षित करवा देना चाहता है--अपने धर्म में। जो विश्वास उसके हैं वही अपने बेटे में भी डाल देना चाहता है।
इस तरह जो परंपरा से गुरु मिलता है वह तो गुरु है ही नहीं, गुरु का ढोंग है। असली गुरु तो खोजना पड़ता है। असली गुरु तो विवेक से मिलता है, विश्वास से नहीं। असली गुरु के लिए तलाश करनी पड़ती है। असली गुरु के लिए चिंता उठानी पड़ती है, संताप से गुजरना होता है।
और असली गुरु को पाने में तुम्हारे नकली गुरु बाधा बनते हैं क्योंकि असली गुरु शास्त्र से बंधा नहीं होता, असली गुरु सत्य में जगा होता है। असली गुरु सत्य बोलता है। शास्त्र से मेल बैठ जाए तो ठीक, न बैठे मेल तो उसे कुछ चिंता नहीं है। असली गुरु किसी परंपरा का हिस्सा नहीं होता। असली गुरु सदा ही सत्य का पुनराविर्भाव होता है, नया संस्करण होता है। असली गुरु खुद ही देख कर लौटा है। किन्हीं और आंखवालों का भरोसा नहीं है, अपनी आंख से देख कर लौटा है। जो देखा है वह कहता है।
कबीर ने कहा है कि मैं कागज की लिखी नहीं कहता। कहता आंखन देखी। जो आंख से देखा है वही कहता हूं।
अब जिसने भी आंख से देखा है उसके सत्य का जो प्रतिपादन होगा, विद्रोही होगा, बगावती होगा। परमात्मा इस जगत में सबसे बड़ी क्रांति है। परमात्मा परंपरा नहीं है क्योंकि परमात्मा पुराना नहीं है। परमात्मा प्रतिपल नया है। शास्त्र पुराने पड़ जाते हैं, उन पर धूल जम जाती है। परमात्मा पर कभी धूल नहीं जमती; वह शाश्वत जीवन है।
आज की सुबह कल की सुबह की पुनरुक्ति नहीं थी। और आज के पक्षियों ने जो गीत गाए हैं वे पहले कभी नहीं गाए थे। और आज सांझ आकाश में जो बदलियां तैरेंगी वैसी बदलियां पहले कभी नहीं तैरी थीं। यहां अस्तित्व में सभी कुछ प्रतिपल नया होता रहता है। यहां सब नूतन है।
जब तुम आंख खोल कर सत्य को देखोगे, उस नूतन का तुम पर आघात पड़ेगा। और तुम्हारी हृदय-तंत्री पर जो संगीत उठेगा वैसा संगीत पहले कभी नहीं उठा था। महावीर की हृदय-तंत्री ने एक गीत गाया था। बुद्ध की हृदय-तंत्री ने दूसरा गीत गाया, कबीर ने तीसरा। जिसने भी जाना है उसका अपना गीत है। उसका विशिष्ट गीत है। उसका अद्वितीय गीत है, बेजोड़ गीत है।
परंपरा उन्हीं-उन्हीं गीतों को बार-बार दोहराती है। परंपरा ऐसी है जैसे तस्वीर।
एक महिला ने पिकासो से कहा, वह दीवानी थी पिकासो की, उसने पिकासो से कहा कि कल तुम्हारी एक तस्वीर देखी किसी के घर में। इतनी प्यारी थी कि मुझसे रहा न गया। मैंने तुम्हारी तस्वीर चूम ली। पिकासो ने कहा: चूम ली--तस्वीर मेरी? फिर क्या हुआ? तस्वीर ने चुंबन का उत्तर दिया या नहीं? उस महिला ने कहा: क्या बात करते हो! तस्वीर कैसे चुंबन का उत्तर देगी? तो पिकासो ने कहा: फिर वह मैं नहीं था। तस्वीर ही रही होगी, कागज ही रहा होगा, कागज पर रंग रहे होंगे, मैं नहीं था।
शास्त्र तस्वीर है। तुम शास्त्र को चूम सकते हो, शास्त्र चुंबन का उत्तर नहीं देता।
जब कबीर या बुद्ध या महावीर या धनी धरमदास जैसे आदमी से तुम्हारा मिलना हो जाए तो तस्वीर से मिलना नहीं होता, तुम जीवंत सत्य से मिल रहे हो। तुम चूमोगे, चूमने का उत्तर भी पाओगे।
गुरु वह है जो उत्तर दे। शास्त्र वह है, जिसमें तुम चाहो तो उत्तर खोज लो, मगर वह है उत्तर तुम्हारा ही। शास्त्र ने कुछ दिया नहीं। जब तुम गीता पढ़ते हो तो तुम सोचते हो, तुम कृष्ण को समझ रहे हो। तुम कृष्ण को क्या समझोगे! तुम कृष्ण को कैसे समझोगे? कृष्ण सामने थे तब अर्जुन को इतनी कठिनाई हुई समझने में। तुम कैसे समझोगे? कृष्ण उत्तर देने को मौजूद थे जीवंत, तब भी अर्जुन के मन में हजार-हजार शंकाएं उठती रहीं।
तुम्हारे मन में भी उठेंगी। तुम उन शंकाओं का हल भी कर लोगे। लेकिन वह तुम्हीं प्रश्न बना रहे हो, तुम्हीं उत्तर दे रहे हो। कृष्ण तो चुप हैं। वह तो पिकासो की तस्वीर हैं, वहां से कोई उत्तर नहीं आ रहा है।
शास्त्र मुर्दा होता है। इन दो शब्दों को याद रखना: शास्त्र और शास्ता। शास्ता यानी गुरु। जिससे शास्त्र पैदा होते हैं उसे खोजो। जो शास्त्र पैदा हो चुके हैं उनमें अब तुम तलाश करते रहोगे तो तुम नाहक कूड़ा-करकट खोजते रहोगे। और जो अर्थ तुम उनसे पाओगे वह तुम्हारा दिया हुआ अर्थ है। वह तुम्हारा ही दिया हुआ रंग है। दूसरी तरफ से कोई उत्तर नहीं आया है, वहां कोई है नहीं।
अब गीता में कृष्ण कहां? अब धम्मपद में बुद्ध कहां? किताबों में कैसे जीवंतता हो सकती है? असली गुरु की तलाश शास्त्रों से अन्य शास्ता की तलाश है। ऐसे किसी मूल स्रोत की, जिससे अभी शास्त्र पैदा हो रहा है। पैदा हो जाने के बाद परंपरा बन जाती है। जब शास्त्र पैदा हो रहा है उस घड़ी में पकड़ लेना किसी को। जब कहीं वेद जन्म रहा हो उस घड़ी में पकड़ लेना पैर, तो तुम धन्यभागी हो। तो तुम धन्यता से भर जाओगे।
लेकिन दुर्भाग्य ऐसा है कि जब शास्त्र जन्म जाता है तब लोग पकड़ते हैं। क्योंकि लोग प्रतिष्ठा की फिकर करते हैं। प्रतिष्ठा में तो समय लगता है। बुद्ध जब जिंदा थे तब तो प्रतिष्ठा नहीं है। प्रतिष्ठा बनने में तो कुछ वर्ष बीतें, बुद्ध मरें, कहानियां गढ़ी जाएं, उनके आस-पास शास्त्र रचा जाए, पुराण बनें, सैकड़ों वर्ष बीतें, तब प्रतिष्ठा मिलती है।
लोग प्रतिष्ठा से प्रभावित होते हैं। अब कबीर जिंदा जब हैं तब तो प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। प्रतिष्ठा बनने में समय लगता है। जिंदगी पर लकीर खींचने में समय लगता है।
इसलिए बड़ी सजग आंख चाहिए तो ही कोई गुरु को खोज सकता है। बड़ी गहरी प्यास चाहिए तो ही कोई गुरु को खोज सकता है। और जिसने गुरु को खोज लिया उसकी आधी यात्रा पूरी हो गई। वह आधा परमात्मा में आ ही गया। उसका साथ मिल गया, जो परमात्मा से जुड़ा है तो तुम्हारा एक हाथ परमात्मा के हाथ में पहुंच ही गया। गुरु के जिसने पैर पकड़े, अनजाने उसने परमात्मा के पैर पकड़ लिए।
शास्ता को खोजना, शास्त्र को नहीं।
और ध्यान रखना, सभी शास्ता अंततः शास्त्र बन जाते हैं। और यह भी खयाल रखना कि सभी शास्त्र प्रथम में शास्ता थे। मगर तुम कब पकड़ोगे? तुम तब पकड़ना जब शास्त्र जन्म रहा हो, जब सुबह हो रही हो, जब घटना घट रही हो, जब परमात्मा उतर रहा हो, तभी पकड़ लेना। उतर चुका, फिर तस्वीरें रह जाती हैं, फिर मूर्तियां रह जाती हैं, फिर सिद्धांत रह जाते हैं। फिर तुम लाख सिर पटको उन मूर्तियों के सामने, कुछ भी न होगा। वहां से चुंबन का उत्तर नहीं आता। तुम्हारा प्रश्न आकाश में गूंजता है, कोई उत्तर देने वाला नहीं।
गुरु का अर्थ है: तुम प्रश्न उठाओ और उत्तर आ सके--जीवंत; तुम्हारे लिए आ सके; तुम्हारे प्रश्न की संवेदना में आए; तुम्हारे प्रश्न के लिए आए; ठीक तुम्हें ध्यान में रख कर आए।
कबीर ऐसे गुरु थे। अब कठिनाई क्या हो जाती है.मैं कहता हूं, कबीर ऐसे गुरु थे। अभी कुछ दिन पहले एक युवक आया संन्यास लेने। मैंने पूछा: कैसे संन्यास का भाव उदय हुआ? कहा कि मैं कबीरपंथी हूं और आप कबीर पर इतना सुंदर बोले हैं कि कोई कभी नहीं बोला। इसलिए संन्यास लेने आया हूं। मैंने पूछा: रुकोगे दो-चार दिन? उसने कहा कि नहीं, बस लेना है और गया। जाना है आज ही रात।
कुछ ध्यान करोगे? कुछ समझो-बूझोगे? सिर्फ कपड़े रंग लेने से तो संन्यास नहीं हो जाएगा। कुछ ध्यान में उतरोगे?
उसने कहा: ध्यान तो मैं करता ही हूं। कबीर जी का शास्त्र पढ़ता हूं और ध्यान करता हूं। और आपने तो सब कह दिया है कि कबीर में सब है।
ध्यान रखना, कबीर में सब था; है मैं नहीं कह सकता। क्योंकि कबीर अब वैसे ही शास्त्र हो गए। कबीर ने जिन शास्त्रों का विरोध किया था, कबीर अब वैसे ही शास्त्र हो गए। अब शास्ता कहां है? कबीर ने वेद का विरोध किया था, अब यह कबीरपंथी कबीर के बीजक को पकड़ कर बैठा है उसी तरह, जिस तरह एक दिन कोई वेद को पकड़ कर बैठा था। क्या फर्क हुआ?
सब शास्ता आज नहीं कल शास्त्र बन जाएंगे। जब शास्त्र बन जाएं तब तुम फिर शास्ता की खोज में लग जाना। जीवंत अवतरण को पकड़ना। इसे ऐसा समझो, मैं तुमसे कहता हूं अवतारों को मत पकड़ो, अवतरण को पकड़ो। जब परमात्मा उतर ही रहा हो ताजा-ताजा, उष्ण, श्वास लेता हुआ, हृदय धड़कता हो, तभी पकड़ लो। उतनी हिम्मत हो तो ही कोई सदगुरु से मिल पाता है।
नहीं तो लोग किताबें ढोते हैं। कायर किताबें ढोते हैं, हिम्मतवर सदगुरु को खोज लेते हैं। कायर किताबों के बोझ में दब जाते हैं और मर जाते हैं। हिम्मतवर सदगुरु के सहारे निर्भार हो जाते हैं और उड़ जाते हैं।
धनी धरमदास खूब उड़े। कबीर जैसा गुरु मिले तो आदमी बिना पंखों के आकाश में उड़ जाता है। ये वचन उन्हीं उड़ानों के वचन हैं। उन्हीं नये-नये आकाशों के अनुभव के वचन हैं। समझना।
कहो केते दिन जियबो हो, का करत गुमान।
धरमदास कह रहे हैं, कितने दिन जीओगे! एक बार सोच तो लो ठीक से। इस जिंदगी पर गुमान कर रहे हो! इस जिंदगी पर बड़ा अहंकार कर रहे हो! बड़े फूले-फूले चल रहे हो, छाती बड़ी अकड़ा कर चल रहे हो! का करत गुमान!
कहो केते दिन जियबो हो,.
जीओगे कितने दिन? यह छाती अकड़ी कितनी देर रहेगी? यह श्वास अभी आई, अभी न आए। इसका भरोसा कहां है! इतना तो पक्का है कि एक दिन नहीं आएगी। मृत्यु सुनिश्चित है। इस जगत में एक ही चीज सुनिश्चित है--मृत्यु। और तो सब अनिश्चित है, हो या न हो; मगर मृत्यु सुनिश्चित है।
तुमने देखा! पांच हजार साल हो गए, आदमी औषधियां खोज रहा है, चिकित्सा के शास्त्र बना रहा है--हकीमी और आयुर्वेद और होम्योपैथी और एलोपैथी लेकिन मृत्यु की दर वही की वही है: सौ प्रतिशत। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। जन्म दर बदली है, मृत्यु दर नहीं बदलती। पहले भी जितने लोग पैदा होते थे उतने ही मरते थे, अब भी जितने लोग पैदा होते हैं उतने ही मरते हैं। एक बात बिलकुल निश्चित है, कोई फर्क नहीं पड़ता--सौ प्रतिशत लोग मरते हैं। थोड़ी देर-अबेर मरें, थोड़ा टालम-टूल हो जाती है लेकिन मृत्यु को समाप्त नहीं किया जा सकता।
मृत्यु इस जीवन का केंद्रीय सत्य है। इसलिए समस्त सदगुरु तुम्हें मृत्यु के प्रति सचेत करते हैं। तुम्हें अच्छा भी नहीं लगता कि कोई तुम्हें मृत्यु की याद दिलाए। तुम्हें बुरा भी लगता है कि यह भी क्या अपशगुन की बात कही! अभी तो हम जिंदा हैं और जवान हैं। सदगुरु की बात तीखी भी लगती है, कड़वी भी लगती है। वही तो धनी धरमदास ने कहा, अति कड़वी।
क्यों कड़वी लगती होगी? जहर जैसी लगती है। क्योंकि सदगुरु पहली जो याद दिलाता है, वह मौत की। धर्म की यात्रा मृत्यु से शुरू होती है। जिसको मृत्यु का खयाल आना शुरू हो गया उसको धार्मिक हो ही जाना पड़ेगा। फिर ज्यादा देर अधार्मिक नहीं रह सकता। मृत्यु पीछा करने लगे, मृत्यु की छाया स्पष्ट होने लगे तो तुम्हारे जीवन मूल्य बदल जाएंगे।
फिर तुम इसी पागलपन से धन इकट्ठा करोगे--इसी छीना-झपटी से? इसी गलाघोंट प्रतियोगिता में लगोगे? मन कहने लगेगा, किसलिए? अभी तो आएगी मौत और सब पड़ा रह जाएगा। आती ही होगी। कौन जाने, द्वार पर ही आकर खड़ी हो, कब दस्तक दे दे!
कहो केते दिन जियबो हो, का करत गुमान।
यह शरीर तो मिट्टी में पड़ा रह जाएगा। कितने शरीर हमारे जैसे इस जमीन पर चले, अब कहां हैं? वैज्ञानिक कहते हैं, जिस जगह तुम बैठे हो वहां कम से कम दस आदमियों की लाशें गड़ी हैं। इतने लोग हो चुके हैं कि सारी जमीन मरघट है। अब तुम्हें मरघट मरघट का भेद नहीं करना चाहिए। सारी जमीन मरघट है। जहां बस्तियां थीं वहां अब मरघट हो गए, जहां मरघट थे वहां बस्तियां हो गईं। सारी जमीन मरघट है।
इतने लोग मर चुके हैं, जमीन का टुकड़ा-टुकड़ा कब्र है। मिट्टी के टुकड़े-टुकड़े किसी देह के हिस्से रह चुके हैं। यहां सब तरफ हड्डियां और लाशें बिखरी हैं। तुम मरघट में हो। जरा गौर से देखो, तुम्हें लाशें साफ दिखाई पड़ने लगेंगी। तुम चल रहे हो लाशों पर। दस-दस आदमियों की लाशें नीचे पड़ी हैं जिन पर तुम चल रहे हो। कल तुम्हारी भी लाश उन्हीं में सम्मिलित हो जाएगी। लोग तुम पर भी चलेंगे।
.का करत गुमान।
फिर यह इतनी अकड़, और झंडा लिए चले जा रहे हैं--झंडा ऊंचा रहे हमारा! यह निपट मूढ़ता है। मगर हम सब अपना अपना झंडा ऊंचा करने में लगे हैं। जरा सा ऊंचा मकान बना लें पड़ोसी से, उसी में जीवन दांव पर लगा देते हैं। वह झंडा है तुम्हारा। कि जरा और बड़ी कार खरीद लें पड़ोसी से। वह झंडा है तुम्हारा। कि लड़की की शादी हो रही है तो शादी ऐसी करके दिखा दें कि गांव में किसी की न हुई हो। वह झंडा है तुम्हारा। हजार ढंग से तुम एक ही काम कर रहे हो--झंडा ऊंचा रहे हमारा। अच्छा यह हो कि अपना एक बड़ा डंडा ले लो, उसमें एक झंडा लगा लो और मजे से चलो। वह ज्यादा सीधा-सुथरा है और साफ है।
मैं जबलपुर कोई बीस वर्ष रहा। वहां एक आदमी--दिमाग उसका खराब था। वह अपना तिरंगा झंडा लिए हमेशा घूमता रहता। कभी गया होगा जेल भी, तभी से पगला गया। और तभी से वह झंडा लिए घूमता। आजादी भी आ गई मगर उसका ढंग अपना जारी है। लोग उसको पागल समझते हैं। वह कभी-कभी मेरे पास आता था। उससे मेरी दोस्ती थी। जिनके घर मैं रहता था वे कहते, आप भी क्या पागल से बात करते हैं! मैं उनसे कहता कि यह आदमी सीधा-साफ आदमी है। यह कहता है, झंडा ऊंचा रहे हमारा, खतम! एक डंडे पर झंडा लगा लिया है, इसमें कोई ज्यादा झगड़ा भी नहीं है किसी से।
तुम भी यही कर रहे हो लेकिन तुम्हारे झंडे जरा सूक्ष्म हैं। तुम जरा बड़े पागल हो। तुम भी यही कर रहे हो। यह आदमी सीधा सादा आदमी है। यह कहता है, इतनी झंझट क्या लेनी! अब कहां जाकर बड़ा मकान बनाओ, फिर धन कमाओ, फिर दुनिया को दिखाओ कि मैं कौन हूं। चुनाव लड़ो! यह कहता है, इतनी झंझट क्या करनी! एक बांस ले लिया और उसमें कोई भी कपड़ा बांध लिया--झंडा ऊंचा रहे हमारा--सुगमता से। इसमें कोई झगड़ा भी नहीं करता इससे, और यह अपना मजा ले रहा है पूरा।
लोगों के भीतर देखना, सारे जीवन कोशिश क्या चलती है? एक ही कोशिश कि किसी तरह सिद्ध कर दूं कि मैं विशिष्ट हूं; मैं कुछ खास हूं। मेरे जैसा कोई और नहीं। मेरे होने से पृथ्वी धन्य है। मैं न होता तो न मालूम दुनिया का क्या होता! मैं न रहूंगा तो दुनिया का पता नहीं क्या हो जाएगा।
धनी धरमदास कहते हैं कि थोड़ा सोचो! केते दिन जियबो हो.कितने दिन यह झंडा ऊंचा रखोगे?.का करत गुमान! किस बात का गुमान कर रहे हो? पैरों के नीचे से धरती खिसकी जाती है। प्रतिपल मौत करीब आई जाती है। रोज मर रहे हो।
जब से पैदा हुए हो तब से एक ही काम नियमित किया है, वह है मरने का। सुबह-शाम मरते ही जाते हो। जन्म के बाद मृत्यु घटनी शुरू हो गई है। एक दिन का बच्चा एक दिन मर चुका। दो दिन का बच्चा दो दिन मर चुका। बीस साल का आदमी बीस साल मर चुका। मौत करीब आने लगी।
हम सब क्यू में खड़े हैं और क्यू छोटा होता जाता है। उसमें से आगे से लोग खिसकते जाते हैं। जब भी कोई मरता है, तुम्हारी मौत और करीब आ जाती है क्योंकि क्यू में एक आदमी और कम हो गया। अब तुम चले खिड़की की तरफ। जल्दी ही टिकट तुम्हारे हाथ में भी आ जाएगी। भाग भी नहीं सकते हो। भागने का कोई उपाय भी नहीं।
एक सूफी फकीर था, उसका एक शिष्य बाजार गया। और बाजार में मदारी खेल दिखा रहा था तो वह भी भीड़ में खड़ा होकर देख रहा था। किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसने पीछे लौट कर देखा। देखा, एक काली भयंकर छाया! वह तो घबड़ा गया, प्राण कंप गए। उसने कहा: तू कौन? उसने कहा: मैं मौत हूं। और तुझे खबर करने आई हूं कि तू यहां क्या कर रहा है? आज सांझ तेरी मौत आ रही है। आज शाम को मैं आऊंगी तुझे लेने। तू यहां क्या मदारी का खेल देख रहा है?
फिर कहां मदारी का खेल! मौत तो चली गई, वह भागा। अपने गुरु के पास भागा हुआ आया। उसने कहा: मारे गए! अब बचाओ। गुरु ने कहा: हम पहले ही से तेरे से कहते थे। अब बहुत देर हो चुकी। अब शाम को कितनी देर है! सुबह हो चुकी, शाम को कितनी देर है! जब सुबह ही हो चुकी तो शाम आने लगी करीब।
वह युवक तो इतना घबड़ाया था कि उसने सोचा कि अब ज्ञान की बातों में कोई सार नहीं है। फुर्सत कहां ज्ञान की बातें सुनने की? वह भागा राजा के पास गया। उसने राजा से जाकर अपनी कथा कही कि मुझे बचाओ। राजा ने कहा: तू एक काम कर, मेरे पास बड़ा तेज घोड़ा है, इसको लेकर तू निकल जा। भाग जा। जितने दूर निकल सके, निकल जा। सांझ तक सैकड़ों मील दूर निकल जाएगा। यह घोड़ा बड़ा तेज है। ऐसा घोड़ा दुनिया में दूसरा नहीं है।
उसने तो लिया घोड़ा और निकल भागा। बड़ा खुश था। रुका नहीं दिन में। पानी पीने को नहीं रुका, भोजन करने को नहीं रुका। भागता ही रहा। जितने दूर निकल जाए, अच्छा। सांझ को जब सूरज ढल रहा था तो उसने जाकर दमिश्क नाम के नगर के बाहर बगीचे में घोड़े को बांधा। घोड़े को थपथपाया और कहा: तू गजब का घोड़ा है। सैकड़ों मील दूर ले आया। मेरा बड़ा धन्यवाद।
तभी पीछे कंधे पर किसी ने हाथ रखा। वह घबड़ा गया। वह हाथ वही था जो सुबह था। उसने लौट कर देखा, मौत खड़ी थी और खिलखिला रही थी। और मौत ने कहा कि मैं भी घोड़े का धन्यवाद करती हूं। क्योंकि मैं बड़ी परेशान थी कि तेरी मौत तो दमिश्क में घटनी है शाम को और तू हजारों-सैकड़ों मील दूर है। तू शाम तक पहुंचेगा कैसे? मैं भी परेशान थी। मेरा तुझसे मिलना यहां तय है।
जब गुरु को बाद में मौत मिली तो गुरु ने कहा कि तूने मेरे शिष्य को क्यों डराया? उसने कहा: मैंने डराया नहीं। मैं तो खुद ही डर गई थी उसको देख कर बाजार में खड़े हुए। मदारी का मजा ले रहा था। मैं खुद ही डर गई थी कि करूंगी क्या! इसकी मौत तो सैकड़ों मील दूर दमिश्क में होने को है। इसको दमिश्क पहुंचाएगा कोई कैसे! मगर राजा के घोड़े ने काम कर दिया। वह ठीक वक्त पर, ठीक सूरज ढलते ढलते जगह पर पहुंच गया, जहां पहुंचना था।
जिंदगी भर तुम चलो, पहुंचते कहां हो? ठीक जगह पर जहां मरना होता है--दमिश्क! कोई अपने बड़े तेज घोड़े पर जा रहा है, किसी पर घोड़ा नहीं है तो अपने टट्टू पर ही जा रहा है मगर लोग जा रहे हैं। गरीब पैदल ही जा रहे हैं। कोई हवाई जहाजों पर जा रहा है। अपनी-अपनी सुविधा! मगर सब जा रहे हैं दमिश्क। और जब तुम शाम को जाकर अपना घोड़ा, अपना टट्टू, अपना गधा, अपना हवाई जहाज कुछ भी सही--बांधोगे, उतरोगे नीचे, जिस पंजे से तुम जिंदगी भर भागते रहे उसे कंधे पर पाओगे।
यह स्मरण आ जाए तो गुमान टूट जाता है।
लोग मुझसे पूछते हैं, अहंकार कैसे छोड़ें? उनसे मैं कहता हूं, अहंकार छोड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती। मौत की समझ आ जाए, अहंकार छूट जाता है। मौत दिख जाए, फिर कैसा अहंकार?
इसलिए धनी धरमदास कहते हैं: का करत गुमान!
कच्चे बांसन का पिंजरा हो, जा में पवन समान।
हो ही क्या तुम? कच्चे बांसन का पिंजरा। पके बांस भी नहीं, कच्चे बांस। जरा सी हवा समा गई है कच्चे बांस के पिंजरे में। छाती धुक-धुक हो रही है, श्वास आ-जा रही है। का करत गुमान! इसमें है क्या? इतना मूल्यवान यहां कुछ भी नहीं है। और इस जिंदगी में तुमने पाया भी क्या है?
मुख्तसर ये है कि दास्ताने-हयात
फूल ढूंढे हैं, खार पाए हैं
खोजे तो फूल थे, मिले कांटे हैं। कांटों के अतिरिक्त तुमने पाया क्या है? दुखों के अतिरिक्त पाया क्या है? सुख की तो सिर्फ आशा है, दुख अनुभव है। आशा के सहारे जीए जाते हो कि शायद कल मिले, शायद परसों मिले, शायद.शायद। न कल मिलेगा, न परसों मिलेगा। सुख मिलता कहां है? अंततः मौत मिलती है। जिंदगी दुख देती है और अंततः सरकते-सरकते तुम मौत में समा जाते हो।
तुम्हारी जिंदगी कितने कच्चे बांस की है यह तो देखो। वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी की जिंदगी है, यही चमत्कार है। जरा जीवन की सीमा को देखो तो खयाल में आ जाए। एक दो-चार-पांच मिनट के लिए श्वास न आए और तुम गए। कच्चे बांस का पिंजरा। बुखार एक सौ दस डिग्री पहुंच जाए, गए! दस-ग्यारह डिग्री का फासला है। इधर अट्ठानबे रहे तो ठीक, इधर एक सौ दस हुआ कि गए। बारह डिग्री तुम्हारी जिंदगी है।
कच्चे बांसन का पिंजरा हो,.
इधर श्वास में इतनी मात्रा आक्सीजन की आती रहे तो ठीक, और रात द्वार-दरवाजे बंद करके सो गए और सिगड़ी जला ली, सर्द रात, और धुआं कमरे में ज्यादा भर गया--सुबह फैसला! जरा सा धुआं आ गया कि गए। दो बूंद जहर की जीभ पर पड़ जाएं और गए। पक्का बांस भी नहीं है यह, जो टिके थोड़ी-बहुत देर, जो थोड़ा संघर्ष कर ले। और कितने रोग भीतर भरे हैं! यह चमत्कार है कि हम जी रहे हैं। इतनी छोटी सीमा है हमारे जीवन की अट्ठानबे डिग्री से एक सौ दस डिग्री के बीच में; बारह डिग्री का खेल है। थोड़ी सी श्वास इधर उधर, कि गए।
और कितना जटिल जाल है! जरा रक्तचाप बढ़ जाए कि गए। जरा मात्रा में खून में मिठास बढ़ जाए कि गए; कि मिठास कम हो जाए कि गए। जाना ही जाना चारों तरफ से घेरे हुए है। छोटी सी दुनिया है। उसमें किस तरह जी रहे हो, एक चमत्कार है, एक रहस्य है। आदमी होना नहीं चाहिए, जीवन होना नहीं चाहिए। मौत का विराट सागर है और छोटा सा द्वीप है हमारा। अंधेरा है मौत का सब तरफ और जरा सा दीया जल रहा है। हवा का झोंका आया कि गया। मिट्टी का दीया है यह।
कच्चे बांसन का पिंजरा हो, जा में पवन समान।
बस, थोड़ी सी हवा है। जिंदगी हवा है, हवा का एक झोंका है। का करत गुमान! अकड़ क्या है? अकड़ किस बात की है? अकड़ के योग्य कुछ भी तो नहीं है। शायद इसीलिए हम अकड़ रहे हैं। इसे समझना।
मनस्विद कहते हैं कि आदमी वही अकड़ता है जिसको अपने भीतर की हीनता का भाव साफ होता है। अकड़ हीनता को भुलाने का उपाय है, इनफिरिआरिटी कांप्लेक्स से बचने की व्यवस्था है। अगर अपने को देखो तो बड़ी हीनता मालूम होगी। है ही क्या! मामला ही क्या है? एक हिचकी आ जाए कि गए। एक हिचकोला काफी है। एक धुकधुकी न हो हृदय की और गए। इतनी मौत करीब है। मौत और तुम्हारे बीच फासला क्या है? कागज की दीवाल समझो।
और शायद इसीलिए हम गुमान के लिए नये-नये रास्ते खोजते हैं। आखिर आदमी को जीने के लिए कुछ तो बहाना चाहिए। अगर जिंदगी को पूरा-पूरा देखे तो जीने के सब बहाने खो जाते हैं। तो देखता ही नहीं। अपनी तरफ नजर ही नहीं करता। दौड़ता ही रहता है, दौड़ता ही रहता है। न रहेगी फुर्सत, न होगा स्वयं से साक्षात्कार। सुबह उठा कि भागा। थका-मांदा रात आया कि गिरा बिस्तर में, फिर सुबह हुई कि भागा। फुरसत नहीं मिले। एक घड़ी को अपने जीवन पर पुनर्विचारणा का अवसर न मिले, यह आदमी की जिंदगी का हिसाब है। वह भागा ही रहता है।
ध्यान का क्या अर्थ होता है? ध्यान का अर्थ होता है: चौबीस घड़ी में कम से कम एक घंटा बैठ जाओ। जिंदगी पर पुनर्विचार कर लो। आपाा-धापी से एक घंटा बचा लो। एक घंटा जरा अपने पर सोच लो, देख लो अपने को कि मामला क्या है, मैं कर क्या रहा हूं? करने योग्य भी है यह? कर-कर के भी क्या पाऊंगा? इसका अंतिम परिणाम क्या होगा! उसी तरफ इशारा कर रहे हैं--
कहो केते दिन जियबो, हो का करत गुमान।।
कच्चे बांसन का पिंजरा हो, जा में पवन समान।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन में उड़ि जान।।
कच्ची माटी के घडुवा हो, रस-बूंदन सान।
कच्ची मिट्टी के घड़े हो। रज-वीर्य का थोड़ा सा रस सना है, उसी थोड़े से रस के आधार पर कच्ची मिट्टी बंधी है। कब बिखर जाएगी कोई नहीं कह सकता। नियमानुसार कभी बिखर जानी चाहिए थी। क्यों नहीं बिखरी यह अभी तक, यही चमत्कार है।
तुम जरा गौर से देखो। तुमने उलटी बात मान रखी है। कोई मर जाता है तो तुम कहते हो, कैसे मर गया! अभी कैसे मर गया! असमय में मर गया। तुम उलटी बात कर रहे हो। सच में जिंदा आदमी देख कर कहना चाहिए हद्द, अभी भी जिंदा हो? कैसे जिंदा हो? चमत्कार कर रहे हो। बड़ा जादू है। रोज सुबह उठ कर सोचा करे कि हद्द, आज फिर जिंदा हूं! तो रात फिर बच गया! विस्मय से भरना।
बुद्धिमान आदमी विस्मय करता है जीवन पर। बुद्धू आदमी विस्मय करता मृत्यु पर। बस इतना ही फर्क है बुद्धिमत्ता और बुद्धूपन का। बुद्धू कहता है, कैसे यह हुआ कि मर गया आदमी! अभी कोई मरने का वक्त था? यह कोई समय था? बुद्धिमान आदमी कहता है कि तुम जिंदा हो? कैसे जिंदा हो! यह मिट्टी का घड़ा इतनी बरसातें झेल गया, अभी भी जिंदा है, पिघल नहीं गया! यह कागज की नाव इतने दूर तक चल गई, अभी तक डूबी नहीं?
इसलिए ज्ञानी रोज सुबह उठ कर चमत्कृत होता है, धन्यवाद देता है परमात्मा को कि आश्चर्य, अभी मैं हूं! आज और हूं? कुछ क्षण और मिले? नहीं मिलने चाहिए थे नियमानुसार। कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता यह मिट्टी का घड़ा कैसे जीआ चला जाता है। मृत्यु दुर्घटना नहीं है, जीवन दुर्घटना है।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन में उड़ि जान।।
कच्ची माटी के घडुवा हो, रस-बूंदन सान।
पानी बीच बतासा हो, छिन में गलि जान।।
कभी बतासे को पानी में डाल कर देखा? देर नहीं लगती। इधर डाला, उधर गला।
पानी बीच बतासा हो.
आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर
टूटता भी है, डूबता भी है
फिर उभरता है, फिर से बहता है
न समुंदर निगल सका इसको
न तवारीख तोड़ पाई है
वक्त की हथेली पर बहता
आदमी बुलबुला है पानी का
बड़ा चमत्कार है आदमी! बहता जाता है। तुमने कभी कभी देखा न, पानी पर बहते हुए बुलबुले को? लगता है अब टूटा, अब टूटा, तब टूटा; फिर भी बहा जा रहा है। तुम भी उत्सुक हो जाते हो पानी को बबूले में बहते देख कर। और अगर थोड़ी देर टिक जाता है तो चमत्कृत होते हो, अरे टिका है! और बड़ा होता जा रहा है, पतला होता जा रहा है। क्योंकि जैसे-जैसे बड़ा होता है वैसे-वैसे पानी की जो पतली सी तह है, वह और पतली होती जा रही है, और झीनी होती जा रही है।
जैसे आदमी का अहंकार बड़ा होता है वैसे ही आदमी का होना और भी चमत्कार होता चला जाता है। क्योंकि उतना ही बड़ा गुब्बारा। फूटने के उतने ही करीब। मगर यह चमत्कार घट रहा है।
इस चमत्कार को जो ठीक से देखता है उसके जीवन में क्रांति घट ही जाती है। वह फिर इस जगत की चीजों को नहीं जोड़ता। फिर इस जगत में अपना घर नहीं बनाता। नहीं कि भाग जाता है जंगल में क्योंकि जंगल भी इसी जगत का हिस्सा है। भाग कर वहां जाने से क्या होगा? नहीं कि गुफा में बैठ जाता है क्योंकि गुफा भी ऐसी ही मिट्टी की है जैसा तुम्हारा मकान। यहां पहाड़ भी रेत हो जाएंगे। यहां हर चीज मिट जाने वाली है। नहीं, कहीं भागता नहीं लेकिन अपने भीतर उसकी तलाश में लग जाता है जो शाश्वत है।
पानी बीच बतासा हो, छिन में गलि जान।
दुनिया की हकीकत है फकत एक दिखावा
कहने को तो सब कुछ है मगर कुछ भी नहीं है।
कहने को ही सब-कुछ है--घर है, मकान है, पत्नी है, पति है, बच्चे हैं, बेटे हैं, बेटियां हैं, रिश्तेदार हैं, मित्र हैं। कहने को सब-कुछ है। बस, कहने को ही है। इधर श्वास गई कि सब व्यर्थ हुआ।
श्वास जाए उसके पहले जाग जाओ। श्वास जाए उसके पहले समाधि का थोड़ा अनुभव कर लो। जीवन उसी अनुभव के लिए एक अवसर है और तुम उसे गंवाते हो। तुम्हें भेजा गया है हीरे की खदान पर और तुम कंकड़-पत्थर बीन रहे हो। और जल्दी ही खबर आ जाएगी कि समय पूरा हो गया। तब तुम बहुत पछताओगे लेकिन मृत्यु फिर समय नहीं देती। फिर तुम लाख कहो कि चौबीस घंटे का वक्त दे दो, उतना भी नहीं मृत्यु से मिलता। आई तो आई। आई तो फिर कोई मोहलत नहीं है।
सिकंदर चौबीस घंटे ज्यादा जिंदा रहना चाहता था। क्योंकि वह अपनी मां को वचन देकर आया था कि सारी दुनिया को जीत कर जब लौट कर आऊंगा तो तेरे चरणों में सारी दुनिया का राज्य रख दूंगा। वह हिंदुस्तान से लौट रहा था। उस समय की जानी हुई सारी दुनिया उसने जीत ली थी। लेकिन अपनी राजधानी से चौबीस घंटे के फासले पर था, तब चिकित्सकों ने कह दिया कि अब बच न सकोगे। उसने बहुत आरजुएं कीं, बहुत मिन्नतें कीं। परमात्मा की कभी उसने याद नहीं की थी, पहली दफे याद की। सारी सेना ने प्रार्थना की। लाखों लोगों ने प्रार्थना की कि सिर्फ चौबीस घंटे.। क्योंकि सिकंदर की एक ही मंशा थी कि पूरी कर लूं, कि जाकर मां के चरणों में सारा राज्य दुनिया का रख दूं। किसी बेटे ने कभी अपनी मां के चरणों में सारी दुनिया का राज्य नहीं रखा; वह मैं करके दिखा दूं। वह सिर्फ चाहता था चौबीस घंटे, ज्यादा नहीं मांगता था। लेकिन वह भी नहीं हो सका।
सिकंदर को भी चौबीस घंटे ज्यादा नहीं मिलते। मौत आ ही गई। जब मौत आ ही गई तब उसे दिखाई पड़ा कि मैं चूक गया। इस जिंदगी को मैंने व्यर्थ की चीजें इकट्ठा करने में गंवा दिया। मैंने ऐसा कुछ भी सार्थक नहीं खोजा है, जो मैं कह सकूं परमात्मा के सामने कि यह मैं खोज कर लाया हूं। सब गंवा कर लौटा हूं। मैं भिखमंगे की तरह जा रहा हूं, सम्राट की तरह नहीं। सिकंदर के अंतिम वचन यही थे कि मैं भिखमंगे की तरह मर रहा हूं, सम्राट की तरह नहीं।
सम्राट की तरह भी मरने का ढंग है और भिखमंगे की तरह भी। अधिकतर लोग भिखमंगे की तरह मरते हैं।
धरमदास सम्राट की तरह मरे, इसलिए कबीर ने उनको नाम दिया धनी धरमदास। धनी होकर मरे। कौन सा धन पा लिया? ध्यान का धन। परमात्मा को पाकर मरे, आत्मा को जान कर मरे, जीवन की शाश्वतता को पहचान कर मरे। फिर कोई मृत्यु नहीं है। जिसने अपने भीतर के आत्यंतिक सत्य को पहचान लिया उसने अमृत को पहचान लिया। फिर कोई मृत्यु नहीं है। मृत्यु तो तभी तक घटती है जब तक हम बाहर से जुड़े हैं। मृत्यु हमें बाहर से तोड़ती है। और हम बाहर से जुड़े हैं। जैसे ही हम भीतर से जुड़ गए, फिर मृत्यु हमें नहीं तोड़ सकती।
कागद की नइया बनी, डोरी साहिब हाथ।
जौने नाच नचैहें हो, नाचब वोही नाच।।
काहे करत गुमान!
ये वचन बड़े प्यारे हैं। धरमदास कह रहे हैं,
कागद की नइया बनी, डोरी साहिब हाथ।
लेकिन उसका अंतिम धागा परमात्मा के हाथ में है। नाव बह रही है, है कागज की, लेकिन जब कागज की नाव भी बहेगी तो वह भी अकड़ कर फूल जाएगी। वह भी कहेगी धाराओं से, लहरों से कि देखो! देखो मेरा रोब। देखो मेरी गति। वह भी चांद-तारों के सामने इठलाएगी और अकड़ेगी। साहब के हाथ में डोरी है। नाव अपने से नहीं चल रही है।
तुम अपने से थोड़े ही जी रहे हो--डोरी साहब हाथ। तुमने अपने से क्या किया है? श्वास भी तो तुम अपने से नहीं ले रहे हो। वह भी चल रही है तो चल रही है। वही तो डोरी है। जब नहीं चलेगी तो तुम कुछ लाख उपाय करो, नहीं चला सकोगे। सिर कितना ही पटको, एक श्वास भी भीतर नहीं ले सकोगे। का करत गुमान!
कहो केते दिन जियबो हो,.
यह डोरी साहिब के हाथ है यह समझ में आ जाए तो सदगुरुओं की सारी शिक्षा का सूत्र तुम्हें पकड़ में आ गया।
जौने नाच नचैहें, नाचब वोही नाच।।
तुम यह कहो ही मत कि मैं हूं। वही है; जो नाच नचाता है, नाचता हूं। बचाता है, बचता हूं। डुबाता है, डूबता हूं। बनाता है, बनता हूं। मिटाता है, मिटता हूं। जैसे ही तुम्हें यह बात दिखाई पड़ने लगी कि उसके इशारे पर ही सब हो रहा है, वैसे ही तुम्हारा मैं-भाव खो जाएगा, गुमान खो जाएगा, अकड़ मिट जाएगी। तुम सरल हो जाओगे। तुम विनम्र हो जाओगे। तुम शून्य हो जाओगे। और शून्य में ही परमात्मा उतरता है।
शून्य ही सूली है जिसकी मैंने तुमसे बात कही। और शून्य में ही पूर्ण का अवतरण होता है। पूर्ण सिंहासन है, जिसकी मैंने तुमसे बात कही। तुम शून्य हो जाओ तो तुम सूली पर चढ़ गए क्योंकि तुमने मैं को सूली दे दी। अब तुमने मैं-भाव छोड़ दिया। अब तुमने कहा कि--
कागद की नइया बनी, डोरी साहब हाथ।
जौने नाच नचैहें हो, नाचब वोही नाच।।
अब तेरी मर्जी। जो करवाए। जैसा करवाए। तू ही करनेवाला है, मैं कर्ता नहीं हूं। कर्ता तू है। तेरा जीवन, तेरी मौत। तेरी हार, तेरी जीत। तेरा सौंदर्य, तेरी कुरूपता। सब तेरा। बुरा भी तेरा, भला भी तेरा।
इसको जरा खयाल में रखना। पुण्य भी तेरा, पाप भी तेरा। चोरी करवाए तो चोरी। साधु बनाए तो साधु। तू कहे कि रावण बन, तो मैं कैसे राम बनूं? तू रावण बनाए तो रावण। तू राम बनाए तो राम। यह बड़ी गहरी अनुभूति है। यह नाटक है, इसमें तू जो पार्ट दे देगा, हम पूरा करेंगे।
जौने नाच नचैहें हो, नाचब वोही नाच।।
हम हैं ही नहीं। तेरी मर्जी ही सब कुछ है। ऐसी समर्पण की दशा में ही परमात्मा अवतरित होता है। परमात्मा को खोजने भी नहीं जाना पड़ता। उसको जिसने समझ लिया--डोरी साहब हाथ। कहीं खोजने नहीं जाना पड़ता। किसी हिमालय में नहीं। जहां तुम बैठे हो वहीं परमात्मा आ जाता है। बस, यह डोरी तुम्हें दिखाई पड़नी शुरू हो जाए।
धरमदास एक बनिया हो करे झूठी बाजार।
धरमदास कहते हैं, मैंने खूब झूठा बाजार किया है। मैं बनिया हूं। मैंने खूब धन कमाया है झूठ का, पद कमाया है झूठ का, यश कमाया है झूठ का। मैंने झूठ के सिक्के खूब चलाए। झूठ के सिक्कों में खूब जीआ।
जिसको तुम संसार कहते हो, वह झूठ का व्यापार है। वहां सच्चा आदमी हार जाता है और झूठा जीत जाता है। वहां झूठ कला है। वहां सत्य आदमी बुद्धू समझा जाता है। वहां झूठ कुशल समझा जाता है। इसे जरा खयाल में लेना।
तुम कई दफे चौंकते भी हो कि झूठे सफल हो रहे हैं। लेकिन संसार झूठ का व्यापार है। वहां झूठे ही सफल हो सकते हैं क्योंकि झूठ वहां भाषा है। वही समझी जाती है। वहां भोला-भाला आदमी, जो सच बोल दे, वह तो खेल के बाहर हो गया। वह तो खेल का हिस्सा ही न रहा। वहां सीधे-सादे की गति नहीं है। वहां जो जितनी तिरछी चाल चले, उतनी ही सफलता की संभावना है। इस झूठ के व्यापार में बेईमान सफल होते हैं। मगर उनकी सफलता क्या है? मर जाएंगे और सब सफलता पड़ी रह जाएगी; किसी काम न आएगी।
धरमदास एक बनिया हो करे झूठी बाजार।
साहिब कबीर बंजारा हो करै सत्त व्यापार।।
और कहते हैं, कबीर से मिलना हुआ तब समझा कि एक और भी व्यापार है। एक और भी सौदा है। करने योग्य असली सौदा और ही है। वह इस कबीर बंजारे से मिल कर हुआ।
बंजारा शब्द बड़ा प्यारा है। बंजारा का अर्थ होता है: जिसका यहां कोई घर नहीं। बंजारा हम उसको कहते हैं न--खानाबदोश को। खानाबदोश शब्द भी बड़ा प्यारा है। उसका मतलब होता है: जिसका घर उसके कंधे पर है। खाना यानी घर, बदोश यानी कंधे पर। जिसका घर उसके कंधे पर। जिसका और कोई घर नहीं है, बस खुद ही अपना घर है।
बंजारा तंबू में जीता है। आज बांध लिया तंबू, कल उखाड़ दिया तंबू। उसके पास कोई स्थिर घर नहीं होता। बंजारा घर नहीं बसाता। बंजारा इस संसार में मंजिल नहीं मानता, पड़ाव बनाता है। रुक गए, सराय है जैसे। सुबह हुई, चल पड़े। इसलिए धरमदास कहते हैं,
साहिब कबीर बंजारा हो करै सत्त व्यापार।।
और कबीर के पास आकर पता चला कि एक और भी व्यापार है, जो मैंने किया ही नहीं। मैं फिजूल के व्यापार में पड़ा रहा। मैं सपने में धन खोजता रहा। असली सिक्के भी हैं यहां, यहां असली संपदा भी है, लेकिन उस संपदा के लिए अंतर्यात्रा करनी होती है।
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
वाही देस की बतिया रे लावै संत सुजान।।
उन संतन के चरण पखारूं, तन-मन करि कुर्बान।
एक बात खयाल लेना, अचानक धनी धरमदास अपने को स्त्री की तरह प्रतिपादित करने लगते हैं। अचानक! अभी तक बोलते थे पुरुष की भाषा में। अब यहां कहते हैं: सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी! अचानक!
बस, यहीं से विद्यार्थी शिष्य बनता है। जैसे ही विद्यार्थी शिष्य बनता है, स्त्रैण हो जाता है। विद्यार्थी पुरुष होता है, शिष्य स्त्रैण होता है। मतलब खूब खयाल में ले लेना। विद्यार्थी तलाश में होता है, खोजता है। खोज का अर्थ है पुरुष। शिष्य ग्रहण करता है, खोजता नहीं। स्वीकार करता है, अपने को खोल देता है, अंगीकार करता है। शिष्य स्त्रैण होता है।
जैसे स्त्री अंगीकार करती है। स्त्री गर्भ है। पुरुष गर्भ खोजता है। स्त्री प्रतीक्षा करती है। स्त्री सिर्फ स्वीकार करती है अहोभाव से। इसलिए स्त्री अगर किसी पुरुष के पीछे पड़ जाए तो पुरुष डर जाता है। ऐसी स्त्रियों से लोग प्रेम नहीं करते जो पुरुषों के पीछे पड़ जाएं। क्योंकि वे स्त्रियां ही नहीं हैं। स्त्री का लावण्य यही है कि वह प्रतीक्षा करे, धैर्य करे। स्त्री पहल नहीं करती। उसे तुमसे लाख प्रेम हो, वह तुमसे यह न कहेगी आकर कि मुझे तुमसे प्रेम है। वह प्रतीक्षा करेगी, तुम जब कहोगे.और तब भी शायद नहीं नहीं कहेगी। तुम्हें अनुमान लगाना पड़ेगा कि उसका चेहरे का भाव हां का है, स्वीकार का है।
लेकिन जो स्त्री जाकर किसी से कहे, मुझे तुमसे प्रेम है, उसमें स्त्रैण-तत्व की कमी है, कोमलता की कमी है। उसमें आक्रमक भाव है।
पुरुष आक्रमक है, स्त्री ग्राहक है।
विद्यार्थी और शिष्य का वही फर्क है। विद्यार्थी तलाश में खोजता है, सक्रिय रूप से। मिल जाए कहीं कुछ। शिष्य को मिल गया वह आदमी, जिसके पास घटना घट सकती है। अब वह अपने को खोल देता है। अपने द्वार-दरवाजे खोल देता है। अब वह स्त्रैण हो जाता है।
यह जो कृष्ण के पास तुमने गोपियों का नाच देखा है, इसका मौलिक अर्थ यही है कि गुरु के पास जो भी होगा, वही गोपी हो जाता है; वही स्त्रैण हो जाता है। इसका यह मतलब नहीं है कि उनके पास सिर्फ स्त्रियां ही स्त्रियां नाच रही थीं; मगर जो भी उनके पास नाच रहे थे वे सब स्त्रियां हो गए थे। इसलिए पुरुषों को भी पुरुष की तरह चित्रित नहीं किया है।
शिष्य में पुरुषभाव रहता ही नहीं। शिष्य में प्रीति होती है, स्त्रैण प्रीति। समर्पणभाव होता है।
इसलिए अचानक भाषा बदल गई। धनी धरमदास कहते हैं--
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
अब वे कहते हैं कि मैंने अपना हृदय का द्वार तुम्हारे लिए खोल दिया, अब तुम आ जाओ मेरे देश में; अब तुम मुझमें समा जाओ।
मिलता नहीं सुकूं किसी उन्वां तेरे बगैर
फिरता हूं दश्त-दश्त परेशां तेरे बगैर
एक घड़ी होती है, जब आदमी खोजता-फिरता है, खोजता-फिरता है। फिर किसी आंख से आंख मिली। फिर किसी से रंग बैठा। किसी के साथ तार जुड़े।
पूजता हूं तुझे खयालों में
कर रहा हूं बंदगी खामोश
फिर सब खोज समाप्त हुई।
पूजता हूं तुझे खयालों में
कर रहा हूं बंदगी खामोश
फिर तो कहने को भी कुछ नहीं रह जाता। बंदगी भी खामोश हो जाती है। फिर तो सिर्फ प्रतीक्षा है एक प्रार्थना भरे हृदय की। शब्द भी नहीं है, सिर्फ राह है; सिर्फ बाट है।
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
वाही देस की बतिया रे लावै संत सुजान।।
उस दूसरे देश की खबर लाते हैं जो, वे ही संत हैं। उस दूसरे देश होकर आते हैं जो, वही संत हैं। उस दूसरे देश की सुगंध से भरे आते हैं जो, वही संत हैं।
इस बगीचे में तुम जाओ, फूलों को तुम छुओ, फूलों से तुम बतियाओ, वृक्षों के पास नाचो, फिर तुम अपने घर लौट जाओ। फूल भी तुम न ले जाओ। शायद फूल ऐसे हैं कि ले जाए भी नहीं जा सकते। और तुम ले भी जाओ तो उस घर के निवासियों ने फूल कभी देखे नहीं; वे पहचान भी नहीं सकेंगे। मगर फिर भी एक सुगंध तुम्हारे पास चली जाएगी, तुममें भरी चली जाएगी, तुम्हारे वस्त्रों में लगी चली जाएगी। एक ताजगी! एक भीना-भीना भाव! एक वातावरण!
वही वातावरण सदगुरु के पास होता है। तुम उसके पास बैठ कर अगर अपने नासापुटों में उसकी सुगंध लोगे, तो तुम्हें एक बात तो समझ में आएगी कि कुछ है, जो इस जगत के पार का है। कुछ है जो दूर का है। कुछ है जो मैंने नहीं जाना; जिससे मैं अपरिचित हूं।
तुम गुरु की आंखों में आंखें डाल कर देखोगे तो तुम्हें द्वार मिलेगा। द्वार--जो किसी अज्ञात में खुलता है।
ऐसी घड़ी में ही विद्यार्थी शिष्य हो जाता है।
न मालूम वह घड़ी क्या रही
जब हम तुमपे निसार हो गए
समझ भी नहीं पड़ता कि कब घट गई घटना। मगर एक निसार होने की घटना हो जाती है, न्योछावर हो जाने की घटना हो जाती है।
न मालूम वही घड़ी क्या रही
जब हम तुमपे निसार हो गए
वैसी घड़ी आ जाए इसके लिए भटकना पड़ता है। कहां आएगी, किस द्वार से गुरुद्वारा बन जाएगा, कहना मुश्किल है। कौन सा द्वार गुरुद्वारा बन जाएगा, कहना मुश्किल है। पहले से तय करना मुश्किल है।
और जो तय करके चले हैं वे चूक जाएंगे। सिर्फ खुले भाव से खोज होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म खोजना चाहिए। धर्म जन्म से नहीं मिलता। धर्म जन्म से मिल ही नहीं सकता। धर्म कोई वसीयत थोड़े ही है! धर्म कोई खून में थोड़े ही है! हड्डी-मांस-मज्जा में थोड़े ही है! बाप से नहीं मिलता धर्म; न मां से मिलता है धर्म; न संस्कार से मिलता है धर्म; न शिक्षा से मिलता है धर्म।
धर्म खोजना पड़ता है--प्यास से भर कर, तड़फते हुए, जलते हुए। और जब कोई प्यासा आदमी खोजता है.खोजता है.खोजता है, एक घड़ी वह घटना घट जाती है।
न मालूम वह घड़ी क्या रही
जब हम तुमपे निसार हो गए
सरोवर दिखाई पड़ता है, और सब हो जाता है।
फिर जरूरी नहीं है कि तुम्हें जो सरोवर है, वह दूसरे को भी सरोवर हो। प्यासें अलग हैं, आंखें अलग हैं, व्यक्तित्व अलग हैं। जो तुम्हारे लिए गुरु है, जरूरी नहीं है कि दूसरे के लिए भी गुरु हो। इसलिए अपने गुरु को किसी पर थोपने की कोशिश मत करना। और न किसी और के गुरु को स्वीकार कर लेने की जल्दी कर लेना। खोजना। निजी खोज करना। और अगर ठीक-ठीक खोजा तो जरूर पाओगे। जो खोजता है उसे मिलता है। जो नहीं खोजते वे ही चूकते हैं। और जिस दिन मिल जाएगा उस दिन खोज बंद हुई, उस दिन पुरुष गया; उस दिन आक्रामक वृत्ति गई। उस दिन तुम्हारे भीतर स्त्री का जन्म हुआ।
शिष्य स्त्रैण होता है। इसलिए बहुत ठीक किया धनी धरमदास ने, भाषा एकदम बदल दी।
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
वाही देस की बतिया हमसे सतगुरु आन कही।।
आठ पहर के निरखत हमरे नैन की नींद गई।
गुरु आया कि नींद गई। गुरु यानी जागरण। फिर सोना कहां! फिर सपने कहां! फिर अंधेरा कहां! फिर रोशनी ही रोशनी है।
क्या जानूं आज किसका मुझे इंतजार है
पलकों की एक झपक भी मुझे नागवार है
और जब तुम्हारे पास जीवंत सत्य खड़ा हो तो कैसे झपकी लोगे? कैसे आंख झपकोगे? कहीं चूक न जाए। कहीं कोई संदेश चूक न जाए। कहीं कोई भाव भंगिमा चूक न जाए।
आठ पहर के निरखत हमरे नैन की नींद गई।
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
भूल गई तन-मन-धन सारा--जिसके चरणों में तुम सब न भूल जाओ, समझना कि वे चरण तुम्हारे लिए गुरु के चरण नहीं हैं। जहां तुम कुछ भी बचा लो, समझ लेना कि वे तुम्हारे लिए गुरु के चरण नहीं हैं। जहां तुम बचा ही न सको कुछ.।
और ध्यान रखना, न बचाने का अर्थ यह नहीं होता कि तुम सारा घर जाकर उसके चरणों में रख दोगे। नहीं बचाने का यह अर्थ भी नहीं होता कि अपना परिवार, अपनी दुकान, सब बरबाद कर दोगे। न बचाने का यही अर्थ होता है कि अगर उसका इशारा हो जाए तो तुम बरबाद करने को तैयार हो। तुम जरा भी ना-नुच न करोगे। यद्यपि कोई गुरु इशारा नहीं करता।
इसको खयाल में रखना, गुरु तुमसे मांगता नहीं कि तुम सब दे दो। इससे बड़ा नुकसान हुआ है, और बड़ी हानि हुई है। इस तरह के वचन बड़े गलत ढंग से व्याख्या किए गए। इन वचनों का ठीक-ठीक अर्थ समझ में न हो तो बड़ी चूक हो सकती है, और बड़ा पाखंड पैदा हो जाता है। इस वचन का अर्थ समझो--
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
यह शिष्य अपनी मनोदशा का वर्णन कर रहा है कि मैं सब भूल गया। तन-मन-धन जो भी था, सब विस्मृत हो गया मुझे। सारा संसार जैसे एक झूठी कहानी हो गई। गुरु ही केवल सत्य होकर सामने खड़ा है।
यह शिष्य अपनी तरफ से कह रहा है। लेकिन पाखंडी गुरुओं ने क्या किया? उन्होंने कहा कि जब तक तुम सारा तन-मन-धन मुझे न दो, तब तक तुम शिष्य ही नहीं हो।
मैं तुम्हें यह चेतावनी दूं--शिष्य को तो सब भूल जाता है, लेकिन जब शिष्य को ही सब भूल गया, शिष्य को ही सारे संसार का धन दो कौड़ी का हो गया, तो उसके गुरु को क्या इस धन में कुछ रस हो सकता है? उसका गुरु अगर यह धन मांगे तो शिष्य भला शिष्य हो, गुरु गुरु नहीं है। और गुरु अगर यह कोशिश करे कि देखो, शिष्य का यह लक्षण है कि वह सब भूले। तुम्हारे पास जितना धन हो, यहां ले आओ। सब दान कर दो मुझे। तो वह गुरु अभी झूठ के व्यापार में पड़ा है।
यह शिष्य की भाव-दशा का वर्णन है। जब शिष्य की यह दशा है तो गुरु की तो क्या होगी! उसे तो पता ही नहीं होता। उसकी तरफ से कोई मांग नहीं हो सकती।
इस तरह की बड़ी भ्रांतियां अतीत में हुई हैं। बुद्ध ने कहा कि जो उसकी खोज में निकला है, उसके मन में दान सहज होगा। वह देने को सदा तत्पर होगा। भिक्षुओं ने इसका क्या मतलब निकाला? वे लोगों को समझाने लगे कि दो; क्योंकि दोगे तो ही तुम सत-शिष्य हो।
यही हिंदू पंडित-पुरोहित करते रहे हैं सदियों से। दान का भाव शिष्य में उमगता है यह सच है; लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कोई इसका शोषण करना शुरू कर दे। पंडित-पुरोहित यही कर रहे हैं। रास्ते पर खड़े भिखारी भी यही कर रहे हैं।
तुमने देखा, भिखारी, जब तुम्हारा हाथ पकड़ लेता है और कहता है कि लोभ पाप का बाप बखाना, दान धर्म का मूल। तो वह तुमसे यही कह रहा है कि दो। अगर नहीं दिया तो लोभी हो। और मजा यह है कि वह मांग रहा है, वह लोभी नहीं है। अगर तुम दो तो तुम दानी हो, धार्मिक हो।
वह तुम्हारे अहंकार को फुसला रहा है। वह यह कह रहा है कि देखो, अब बाजार में बदनामी हो जाएगी। लोग कहेंगे कि लोभी है, एक दो पैसे भी न दे सका। इसलिए भिखारी भी तुमको ऐसी जगह पकड़ते हैं, जहां बदनामी हो जाने का डर हो; ठीक चौराहे पर पकड़ लेते हैं गांव के। एकांत में तुम मिल जाओ तो वे तुमको पकड़ते भी नहीं, क्योंकि एकांत में हो सकता है तुम एक झापड़ रसीद करो। देने की तो बात दूर।
लेकिन बीच बाजार में, जहां प्रतिष्ठा का सवाल है, जहां तुम दुकान लिए बैठे हो, जहां तुम झूठ का व्यापार कर रहे हो, वहां जरा झंझट की बात है। अब इसको दो पैसे न दो तो लोग कहेंगे कि अरे.! तुम्हें देना पड़ता है। देना भी नहीं चाहते, दिल भी कचोटता है, जानते हो कि यह ठग रहा है। क्योंकि तुम खुद दूसरों को ठग रहे हो। तुम जानते हो ठग की भाषा क्या है। यह ठग रहा है तुम्हें। तुम जानते हो कि तुम बुद्धू बनाए जा रहे हो। मगर अब दो पैसे देने जैसे लगते हैं क्योंकि सारी प्रतिष्ठा, दो पैसे में अहंकार बचता है। दो!
भिखमंगे को लोग इसलिए नहीं देते कि दया आ रही है। भिखमंगे को लोग इसलिए देते हैं कि अपनी प्रतिष्ठा दांव पर कौन लगाए। और अगर तुम नहीं देते तो भिखमंगा तुम्हें इस तरह से देखता है जैसे तुम नरक जा रहे हो। और अगर तुम देते हो तो भिखमंगा जानता है कि अरे, बुद्धू था। बड़ी दुनिया अजीब है। अगर तुम देते हो तो भिखमंगे आपस में कहते हैं, खूब बनाया। फिर तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा कि यह बुद्धू फिर कभी आ जाए चक्कर में। दो, तो तुम बुद्धू हो; न दो तो तुम पापी हो।
बुद्धों ने जो वचन कहे हैं उनके भी बड़े-बड़े अनूठे अर्थ लोगों ने निकाल लिए हैं। अपने मतलब के अर्थ निकाल लिए हैं।
ध्यान रखना, इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई गुरु तुमसे मांगेगा कि तुम अपना सब दे दो। इसका इतना ही अर्थ है कि गुरु को देखते ही तुम्हारा सब जो था, वह व्यर्थ हो गया। अब उसमें कुछ रस न रहा।
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।
इधर मैं डूबने आया हूं दरिया-ए-मोहब्बत में
उधर दुनिया बुलाती है मुझे घबड़ा कर साहिल से
जब तुम गुरु के पास जाओगे और तुम सारे तन-मन-धन को भूलने लगोगे तो सारी दुनिया तुम्हें खींचेगी, पुकारेगी कि लौट आओ, खतरे में पड़ रहे हो। गुरु का मिलन संसार पसंद नहीं करता। संसार बिलकुल राजी रहता है--पंडित के पास जाओ, पुरोहित के पास जाओ--संसार बिलकुल राजी रहता है। संसार बिलकुल साथ देता है कि जरूर जाओ। मंदिर जाओ, मस्जिद जाओ, गुरुद्वारा जाओ। संसार कहता है यह तो करना ही चाहिए धार्मिक व्यक्ति को। रविवार चर्च हो आया करे। कभी-कभी बाइबिल पढ़ लिया करे, कभी-कभी गीता पढ़ लिया करे, कभी-कभी सत्यनारायण की कथा!
मगर गुरु के पास जाओ.अगर कबीर मिल जाएं, या बुद्ध मिल जाएं, या कृष्ण मिल जाएं तो सारा संसार विरोध करेगा। क्योंकि यह अलग व्यापार है। एक झूठ का व्यापार है, एक सच का व्यापार है। इन दोनों में बड़ा संघर्ष है। मैं तुमसे यह कहूं, कि अगर किसी के पास जाने से सारा संसार तुम्हारा विरोध करता हो, तब तो तुम समझ ही लेना कि रास्ते पर ठीक हो। क्योंकि इतने लोग गलत नहीं हो सकते। जब सारा संसार विरोध कर रहा है तो जरूर कुछ बात होनी चाहिए। तुम जरा सावधान हो जाना और होशियारी से खोज में लग जाना।
जहां, जिस धर्म के नाम पर संसार विरोध न करता हो वहां कुछ सार नहीं है, समझ लेना। क्योंकि उस धर्म से संसार का कुछ नहीं बिगड़ता। वह झूठ के व्यापार का हिस्सा है इसलिए कोई विरोध नहीं करता।
एक जैन महिला ने मुझे आकर कहा.उसके पति यहां मुझे सुनने आते हैं। वह बोली कि आप उनको समझाएं, इतने ज्यादा न आएं। क्या मामला क्या है? उसने कहा कि नहीं, धर्म ही सुनना हो तो अपने जैन मुनि क्या बुरे हैं! मंदिर जाएं। मैंने कहा: जब तुझे कोई एतराज ही नहीं है तो यहां आएं कि मंदिर जाएं, तुझे क्या फिकर है? नहीं, उसने कहा कि यहां आने में सब एतराज करते हैं--परिवार के लोग, बच्चे। और सब मुझे कहते हैं कि तू अपने पति को गंवा देगी। जैन मंदिर में जाएं, हर्ज क्या.धर्म ही सुनना है न? तो जैन मंदिर में जा सकते हैं, वहां मजे से सुनें।
वह स्त्री यह कह रही है कि जैन मंदिर को तो हमने बाजार की दुनिया का हिस्सा बना लिया है। अभी इस मंदिर को बाजार का हिस्सा बनाने में समय लगेगा। और इस बीच कुछ गड़बड़ हो गई तो बस.।
जब भी संसार तुम्हारा विरोध करता हो कहीं जाने से, जब पूरा संसार एकमत होकर विरोध करता हो, तब तो तुम समझ लेना कि तुम किसी ऐसी जगह जा रहे हो, जो इस झूठ के व्यापार से भिन्न है। कुछ भेद हैं; नहीं तो इतने लोग विरोध न करते।
धनी धरमदास जब कबीर के पास गए तो यही झंझट खड़ी हुई थी। सारे लोग विरोध में थे। और धनी धरमदास पहले जीवन भर सत्यनारायण की कथा और मंदिर और यज्ञ और हवन, सब करवाते थे तब किसी ने विरोध नहीं किया था। सारा गांव कहता था, अहा, धार्मिक आदमी है। जब कबीर के पास गए, तो लोगों ने कहा, अब यह भ्रष्ट हुआ। अब इसका दिमाग खराब हुआ। यह कोई बात हुई? कबीर के पास जाना! इसे तुम संकेत समझना।
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
और जिसके पास जाकर तुम्हारी आंखों में आंसू भर जाएं--दंभ नहीं, प्रेम के, प्रीति के आंसू। मंदिर से तुम अकड़ कर लौटते हो कि कुछ धार्मिक हो गए। सच्चे ज्ञानी के पास से तुम विनम्र होकर लौटोगे कि तुम्हें अपनी जिंदगी की धूल और दिखाई पड़ गई। झूठे ज्ञानी के पास से तुम थोड़ी जानकारी बढ़ा कर लौटोगे। सच्चे ज्ञानी के पास से तुम्हारी जानकारी और छूट गई। तुम और अज्ञानी होकर लौटोगे। तुम्हें लगेगा कि मेरे जैसा अज्ञानी कौन?
सच्चे ज्ञानी के पास से तुम रोते हुए लौटोगे--अपनी जिंदगी पर रोते हुए। तुम्हारी आंखों में आंसू होंगे--दो तरह के आंसू: अब तक जिंदगी गंवाई उसके आंसू, पश्चात्ताप के। और वह परम प्यारा मिल जाए, अब इसकी प्रार्थना के आंसू भी। अतीत के लिए आंसू और भविष्य के लिए आंसू।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
धरमदास के दाता सतगुरु पल में कियो निहाल।।
और जहां आंसू भरे हों, जहां सब न्योछावर कर देने की क्षमता हो, जहां स्त्रैण हो जाने का शिष्यभाव पैदा हुआ हो, फिर गुरु को देर नहीं लगती। गुरु को देर तुम्हारे कारण लगती है। फिर से तुमसे कह दूं, गुरु को देर तुम्हारे कारण लगती है; अन्यथा क्षण में हो जाए बात। तुम्हीं अड़चन खड़ी करते हो। तुम होने नहीं देते।
धरमदास के दाता सतगुरु पल में कियो निहाल।
ऐसी घड़ी तुम्हारे चित्त में आ जाए जैसी धरमदास को आई--कि सब व्यर्थ हुआ। आंख आंसुओं से भर गईं। आंख जग गईं ऐसी कि नींद मुश्किल हो गई। अब तक का किया हुआ सब अनकिया हो गया। और इस परम विनम्रता के क्षण में झुक गए चरणों में।
उन संतन के चरण पखारूं, तन-मन करि कुर्बान।
सब लुटाने की तैयारी है, फिर देरी क्यों? फिर एक क्षण की देरी नहीं होती--पल में कियो निहाल!
धरमदास के दाता सतगुरु.
और गुरु तो सदा दे रहा है, बस लेने की तुम्हारे पास तैयारी चाहिए। वहां तो वर्षा हो रही है, तुम अपना घड़ा उलटा किए रहो तो नहीं भरेगा। तुम अपने घड़े को सीधा करो।
आवागमन की डोरी कट गई मिटे भरम जंजाल।
मैं हैर रहूं नैना सो नेह लगाई।।
सदगुरु से जो लगाव है, जो नेह है, जो प्रीति है, वह उन दो आंखों से प्रीति है, जिनमें परमात्मा की छवि दिखाई पड़ती है।
सदगुरु कौन? जिसकी आंख में तुम्हें परमात्मा की थोड़ी आभा दिखाई पड़ जाए--जरा सी झलक! तुमने परमात्मा नहीं देखा, तुम्हें परमात्मा की कोई खबर नहीं है, लेकिन किसी ने देखा है तो उसकी आंख में कुछ तो अक्स रह जाएगा, कुछ तो लकीरें तैरती रह जाएंगी, कुछ तो बिंब रह जाएगा। उसकी आंखों में कुछ तो परमात्मा को देखने का भाव झलकेगा। कुछ तो तैरता हुआ मिल जाएगा। तुमने नहीं सुना वह संगीत, लेकिन जिसने सुना है उसके पास उसकी शांति में कुछ तो स्वर गूंजते होंगे।
मैं हैरि रहूं नैना सो नेह लगाई।।
राह चलत मोहि मिलि गए सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई।
राह चलत--जो खोजता है उसको ही मिलते हैं सदगुरु। घर बैठे रहे, खोजा ही नहीं तो सदगुरु नहीं मिलते। जो विद्यार्थी बनता है, वही एक दिन शिष्य बनता है। जो विद्यार्थी ही नहीं बनता वह तो शिष्य कैसे बनेगा? जो एक दिन जिज्ञासु बनता है, वही एक दिन मुमुक्षु हो जाता है। चलना तो पड़ेगा।
राह चलत मोहि मिल गए सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई।
रास्ते में आज उनसे मुलाकात हो गई
जी डर रहा था जिससे, वही बात हो गई
गुरु जब मिलता है तो तुमने चाहा था वही मिला, और फिर भी जी धक से रह जाता है। क्योंकि गुरु मृत्यु भी है और जीवन भी।
देइ के दरस मोहि बौराए,.
और जैसे ही गुरु का दर्शन मिला कि तुम पागल हुए। तुम पागल न हो जाओ तो गुरु से मिलन हुआ ही नहीं।
देई के दरस मोहि बौराए, ले गए चित्त चुराई।
जिस गुरु के पास जाकर तुम्हारा चित्त न चुरा लिया जाए, वह गुरु नहीं। जिसके पास जाकर तुम अपना चित्त न गंवा बैठो वह गुरु नहीं।
हमारे पास एक बहुत प्यारा शब्द है: हरि। हरि का अर्थ होता है, चोर: हर ले जाने वाला। हमने भगवान को नाम दिया हरि का। दुनिया में ऐसा कोई शब्द नहीं किसी भाषा में। किसी देश ने इतनी हिम्मत नहीं की कि भगवान को चोर कहे। यह तो जानने वाले ही कह सकते हैं।
भगवान चोर है! चोर इस अर्थ में कि एक बार उस तरफ दृष्टि गई कि तुम्हारा सब गया, सब लुटा। फिर तुम बच नहीं सकते। पहली घटना गुरु के पास घटती है। उसी बड़े चोर के छोटे संगी-साथी!
देइ के दरस मोहि बौराए, ले गए चित्त चुराई।
एक पागलपन! एक ऐसा पागलपन छा जाता है, एक ऐसी मस्ती, एक ऐसी दीवानगी, एक ऐसी बेखुदी, जो अपरिचित है।
उठ कर तो आ गए तेरी बज्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है किस दिल से आए हैं
फिर उठते भी नहीं बनता, चलते भी नहीं बनता, जाते भी नहीं बनता। धनी धरमदास कबीर को मिले सो फिर घर नहीं लौटे। गए सो गए! घर खबर भेज दी कि मैं पागल हो गया हूं। समझ लेना और मुझे क्षमा कर देना।
उठ कर तो आ गए तेरी बज्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है किस दिल से आए हैं
और पागलपन तो आता ही है। फकीरों का एक समुदाय बाउल कहा जाता है। बाउल का अर्थ होता है: बावला, पागल। सूफियों में फकीरों की एक अवस्था होती है, मस्त। मस्त का अर्थ होता है, दीवाना--जिसे होश नहीं रहा, हवास नहीं रहा; जिसे जिंदगी के हिसाब-किताब नहीं रहे। सभी पागल परमात्मा के प्यारे नहीं होते, लेकिन सभी परमात्मा के प्यारे जरूर पागल होते हैं।
लमहे यह आ गए हैं तेरी इंतजार के
मैं खुद जवाब देता हूं तुझको पुकार के
खूब पागलपन चढ़ता है। खुद ही भक्त भगवान की तरफ से जवाब भी देने लगता है, बातचीत होने लगती है।
लमहे यह आ गए हैं तेरी इंतजार के
मैं खुद जवाब देता हूं तुझको पुकार के
देइ के दरस मोहि बौराए! हो ही जाएगा पागलपन। जैसे चुंबक के पास छोटे-छोटे लोहे के कण जब खिंचने लगते हैं तो पागल न हो जाएंगे तो और क्या होगा? पागलपन बिलकुल सहज है। जन्मों-जन्मों से खोजते थे जिसे, उसकी पहली दफा झलक मिली है। होश न गंवा बैठोगे तो क्या करोगे? गणित खो जाएगा, तर्क खो जाएगा। बुद्धि के हिसाब-किताब एक तरफ हो जाएंगे। यह बड़े से बड़ा प्रेम है इसलिए बड़े से बड़ा पागलपन है।
प्रेम को तो लोग पागलपन कहते ही हैं। किसी सुंदर स्त्री के प्रेम में पड़े, किसी सुंदर पुरुष के प्रेम में पड़े, तब भी पागलपन हो जाता है, मगर वह क्या है! अगर कबीर मिल जाएं, अगर धनी धरमदास से मिलना हो जाए, अगर किसी धनी से मिलना हो जाए तो वहां तो परम सौंदर्य प्रकट होता है। वहां परम संगीत बज रहा है, वहां परम नाद उठ रहा है। तुम डोलोगे नहीं? बिना पीए तुम शराब न पी लोगे? यह हो ही जाएगा। यह हो ही जाना चाहिए।
हम खुदा के कभी कायल भी न थे
उनको देखा तो खुदा याद आया।
शायद कभी सोचा भी न हो ठीक-ठीक ईश्वर के संबंध में, कोई धारणा भी न बनाई हो, खोज अस्पष्ट भी रही हो, लेकिन जब किसी फकीर को देख लोगे, किसी पहुंचे हुए को देख लोगे, किसी सिद्ध को देख लोगे तो पहली दफा एक झनकार! पहली दफा वीणा झनकार उठेगी।
दिल है कि नशूर एक बाजा है
सीने में धड़कते तारों का
जब चोट लगे झनकार उठे
जब ठेस लगे थर्रा जाए
अभी तो तुमने सिर्फ थर्राना जाना है। संसार में तो चोटें ही लगती हैं इसलिए थर्राना ही जानते हैं। जब किसी सदगुरु से मिलोगे, तब जानोगे संगीत क्या है। अभी शोरगुल सुना है, उसमें भी इतने मोहित हो गए हो, जब संगीत सुनोगे तब क्या होगा? गुरु के पास जो गया, फिर खिंचने लगता है चुंबक की तरह।
बेताब नजर, आंखों में लहू
सीने में जलन, दिल में हलचल
जब दूर का रिश्ता ऐसा है
नजदीक का आलम क्या होगा
ठीक कहते हैं धरमदास--
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
देइ के दरस मोहि बौराए, ले गए चित्त चुराई।।
छवि सत दरस कहां लगि बरनौं, चांद सूरज छपि जाई।
वह जो देखा है गुरु में--छवि सत दरस कहां लगि बरनौं! धरमदास कहते हैं, उसका वर्णन नहीं कर सकता। वह अनिर्वचनीय है, अवर्णनीय है। शब्द नहीं उसे समा पाएंगे। भाषा उसे कहने में असमर्थ है।
छवि सत दरस कहां लगि बरनौं,.
जो कबीर की आंखों में छवि देखी, जो कबीर की आंखों में उसका प्रतिबिंब देखा है--दर्पण में ही देखा है प्यारे को अभी। अभी प्यारे को नहीं देखा, दर्पण में ही देखा है। लेकिन दर्पण में ही देख कर सब मन बौरा गया है। उसे कहना कठिन है। चांद सूरज छपि जाई! उस रोशनी के सामने चांद फीका है, सूरज फीका है।
धरमदास बिनवै कर जोरी, पुनि पुनि दरस दिखाई।
और धरमदास कहते हैं, बस अब एक ही अभीप्सा, एक ही प्यास, एक ही बात बार-बार मन में उठती है कि फिर-फिर, बार-बार वह झलक मिलती रहे। इस योग्य मैं होता रहूं, इस ग्रहणशीलता के योग्य बनता रहूं कि बार-बार कबीर की आंख में, गुरु की आंख में वह दिखाई पड़े।
धीरे-धीरे शिष्य गुरु के इतने करीब आ जाता है कि शिष्य और गुरु की आंखें अलग नहीं रह जातीं। जिस दिन शिष्य गुरु की आंख से देखने लगता है, उस दिन गुरु और शिष्य का मिलन हुआ। इसके पहले कि तुम परमात्मा से मिलो, गुरु से मिलना होगा। इसके पहले कि तुम परम के दर्शन के योग्य हो जाओ, तुम्हें धीरे-धीरे गुरु की आंख का ढंग सीखना होगा। तुम्हें गुरु की आंख के पीछे खड़े होकर देखना होगा।
सत्संग का कोई और अर्थ नहीं है, गुरु अपनी आंखें तुम्हें देता है। सत्संग का और कोई प्रयोजन नहीं है, तुम गुरु से आंखें लेते हो। यह आंख का लेन देन है। यह दर्शन का लेन देन है। होते-होते हो जाता है। संग-संग चलते, उठते-बैठते हो जाता है। सधते-सधते बात सध जाती है।
शिष्य को एक ही बात याद रखनी जरूरी है कि अपने को मिटा दे, पोंछ डाले; अपने को कोरा कागज कर ले, ताकि जो तस्वीर गुरु की आंखों में है, वह तस्वीर इस कोरे कागज पर उतरे तो कोई बाधा न पड़े। तुम्हारा कागज बहुत गुदा हुआ हो तो तस्वीर विकृत हो जाएगी। तुम्हारी प्लेट चित्त की बिलकुल खाली होनी चाहिए।
यह चित्त की प्लेट खाली कर लेना ही साधना है।

आज इतना ही।

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