ईशावास्योपनिषद की पृष्ठभूमि में ओशो को समझौता आह्वान – • एक ही मार्ग है कि मनुष्य जीते – जी कर्म से गुजरते हुए भी कर्म में लिप्त न हो। वह मार्ग है, जीवन को एक अभिनय के रूप में रूपांतरित कर लेना। • तेन त्यक्तेन भुंजीथाः, जिसने छोड़ा उसने पाया। जिसने खोल दी मुट्ठी, भर गई। जो बन गया झील की तरह, वह भर गया। जो हो गया खाली, वह अनंत संपदा का मालिक है। • मैं चाहता हूँ कि आप ख़ुद अपने भीतर जानें और अपने से कह पाएँ कि मैं अपने को बिना जाने जी रहा हूँ, क्योंकि स्वयं को जानने की पीड़ा इतनी घनी है कि वही आपको प्रयोग में ले जाएगी, अन्यथा नहीं ले जाएगी। • आँख से बहुत देखा, वह दिखाई नहीं पड़ा। जन्म – जन्म देखा, वह दिखाई नहीं पड़ा। अब आँखें बंद करके देखें। उपनिषद के ऋषि कहते हैं कि हमें अंधेरे से प्रकाश की ओर ले चलो। तमसो मा ज्योतिर्गमय! हमें मृत्यु से अमृत की तरफ ले चलो। मृत्योर्मा अमृतंगमय! यह प्रार्थना सारी मनुष्य – जाति की प्रार्थना है – कि हमें असत से सत की ओर ले चलो। असतो मा सदगमय – इन तीन छोटे – से वचनों में सारी प्रार्थनाओं को भी एक ही पंक्ति में बाँधा जा सकता है – असतो मा सदगमय – कि हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। असत है अंधकार और असत है मृत्यु और सत है अमृत और सत है आलोक! ईशावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा – सब कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है – ईश्वर का है सब कुछ। ईश्वर का है सब कुछ, तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती। मैं के लिए मेरे के बुनियादी पत्थर चाहिए, अन्यथा मैं का पूरा मकान गिर जाता है। ईशावास्य की पहली घोषणा इस पूरे मकान को गिरा देने वाली है। कहता है ऋषि – सब कुछ परमात्मा का है। मेरे का कोई उपाय नहीं। मैं भी अपने को मेरा कह सकूँ, इसका भी उपाय नहीं। कहता हूँ, अगर तो नाजायज़। अगर कहता ही चला जाता हूँ तो विक्षिप्त। मैं भी मेरा नहीं हूँ।