हरि बोलौ हरि बोल! बोलने योग्य कुछ और है भी नहीं, न सुनने योग्य कुछ और है। बोलो तो हरि बोलो, चुप रहो तो हरि में ही चुप रहो। भीतर जाती श्वास हरि में डूबी हो, बाहर जाती श्वास हरि में डूबी हो। उठो तो हरि में, सोओ तो हरि में। जब हरि तुम्हें सब तरफ से घेर ले, जब हरि तुम्हारी परिक्रमा करे, जब तुम हरि के आवास हो जाओ… जागने में वही तुम्हारी दृष्टि में हो, स्वप्न में वही तुम्हारा स्वप्न भी बने, तुम्हारा रोआं-रोआं उसी में ओत-प्रोत हो जाए, तुम्हारे पास जगह भी न बचे जो उसके अतिरिक्त किसी और को समा ले–जब हरि ऐसा व्याप्त हो जाता है तभी मिलता है। थोड़ी भी जगह रही हरि से गैर-भरी तो तुम संसार बना लोगे। और एक छोटी सी बूंद संसार की सागर बन जाती है। एक छोटा सा बीज, वैज्ञानिक कहते हैं, सारी पृथ्वी को हरियाली से भर सकता है। एक छोटा सा बीज, जहां तुम्हारे भीतर हरि नहीं है, पर्याप्त है तुम्हें भटकाने को–जन्मों-जन्मों तक भटकाने को। ओशो पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु: संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है? मनुष्य की वस्तुतः अंतिम खोज क्या है? क्या परमात्मा सिर्फ एक उपाय भर है सत्य तक पहुंचने के लिए? ‘प्रतीक्षा’ का क्या अर्थ होता है? ‘स्वच्छंदता’ शब्द का क्या अर्थ है? प्रेम ‘करने’ और प्रेम में ‘होने’ का क्या अर्थ है?