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Hari Bolo Hari Bol (हरि बोलो हरि बोल) 10

Tenth Discourse from the series of 10 discourses - Hari Bolo Hari Bol (हरि बोलो हरि बोल) by Osho. These discourses were given during JUN 01-10 1978.
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पहला प्रश्न: भगवान,
जब से तुझे पाया, तेरी महफिल में दौड़ा आया तू ही जाने तू क्या पिलाता, हम तो जानें तेरी महफिल में सबको मधु पिलाता, जहां पक्षी भी गीत गाएं और पौधे भी लहराएं हम न जानें प्रभु-प्रार्थना, नहीं समझें स्वर्ग-नरक की भाषा अब हमें न कहीं जाना, न कुछ पाना, हमें तो लगे यही संसार प्यारा। अब न जाने का गम है, न मौत का डर है। हम इंसान बनें या हैवान, यही हम जो भी हैं क्या कम हैं। हम चले तेरे साथ जहां चाहे ले चल।.
सत्संग! मैं जानता हूं तुम्हारे हृदय में क्या घट रहा है। एक क्रांति! और यह क्रांति आज अचानक नहीं घट रही है--धीरे-धीरे घटती रही है। यह आग धीरे-धीरे सुलगती रही है। तुम्हें इसका पता भी नहीं चला। जब क्रांति एकदम से घटती है तो पता चलता है और जब धीरे-धीरे घटती है, आहिस्ता-आहिस्ता जैसे उम्र बढ़ती है या रोज रात का चांद बढ़ता है, ऐसे जब घटती है तो पता भी नहीं चलता। ऐसी ही तुम्हारे जीवन में क्रांति घट रही है--शनैः-शनैः, एक-एक कदम, इंच-इंच। मैंने तुम्हें अंधेरे से धीरे-धीरे रोशनी की तरफ बढ़ते देखा है, विक्षिप्तता से धीरे-धीरे विमुक्तता की तरफ कदम रखते देखा है।
और सत्संग ने पहली दफा प्रश्न पूछा है, संबंध उनका मुझसे पुराना है। इस जन्म में भी काफी वर्षों से मेरा संबंध है। और संबंध इसी जन्म पर समाप्त नहीं हो जाता--जन्म-जन्म की प्रीति पुरानी! पहले ही क्षण से जब वे मुझे इस जन्म में मिले, तो मेरे और उनके तार जुड़ गए। उन्हें शायद अब धीरे-धीरे खबर होगी, लेकिन मेरी अंगुलियां उनकी वीणा पर बहुत देर हुई तब से पड़ गई हैं। शायद वे सोए ही रहे और कब उनकी वीणा से संगीत उठने लगा, उन्हें स्मरण भी न हो; लेकिन अब संगीत जोर से उठ रहा है। नींद टूटने लगी है।
यह प्रश्न शुभ है। ठीक तुमने समझा है। यहां मैं कोई शास्त्र समझाने को नहीं बैठा हूं, न सिद्धांतों की कोई चिंता है। तुम्हें किसी मत में रूपांतरित नहीं करना है। मतों से तो तुम वैसे ही पीड़ित हो। तुम्हें उनसे मुक्त करना है। यह कोई मंदिर नहीं बन रहा है। यह कोई नई मस्जिद नहीं खड़ी हो रही है। मंदिर-मस्जिद ने तो तुम्हें खूब सताया है। यहां तो मंदिर और मस्जिद गिराने का काम चल रहा है।
तुम ठीक ही कहते हो। यहां तो हम एक मधुशाला बना रहे हैं। वही बुद्ध ने किया था, वही महावीर ने, वही कृष्ण ने, वही क्राइस्ट ने। जब भी कोई व्यक्ति जला है, जागा है, उसके भीतर रोशनी प्रकट हुई है, जब भी किसी व्यक्ति के भीतर का संगीत मुखर हुआ है--तो मधुशाला बनी है। मधुशालाएं जब मर जाती हैं तो मंदिर बनते हैं। मंदिर मधुशालाओं की लाशें हैं। जब बुद्ध चलते हैं, जीते हैं, उनके साथ जो संबंध जोड़ लेता है, वह तो मतवाला ही हो जाता है, वह तो दीवाना ही हो जाता है।
बुद्ध से संबंध जोड़ना इस जगत में जो गहरी से गहरी शराब है, उसको पी लेना है। फिर और सब शराबें पानी की तरह फीकी हो जाती हैं। उस जगत की जो शराब पी ले, इस जगत की कोई शराब किसी काम की नहीं रह जाती।
और मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि इस जगत की शराबों में इतना रस है, क्योंकि तुम्हें उस जगत की शराब का कोई पता नहीं। और यह रस कायम रहेगा। यह रस मिटने वाला नहीं है। सदियों से है। नीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ और महात्मा और साधु समझाते रहे हैं--शराब मत पीओ, कौन सुनता है! नियम बनते हैं और तोड़े जाते हैं। नियम बनाने के लिए ही साधु-संत चेष्टा करते रहते हैं। नियम बनाने का मतलब ही यह होता है, कानून बनाने का मतलब ही यह होता है कि लोगों के भीतर बेहोश होने की प्रबल कामना है। जितने मजबूत कानून बनाए जाते हैं वे इसी की खबर देते हैं, कि उतनी ही प्रबल कामना है। तभी कानून बनाया जाता है। लेकिन कामना इतनी प्रबल है कि कानूनों को तोड़ देती है, मिटा देती है। सब कानून तोड़े जाने के लिए ही बनते हैं।
सदियां बीत गई हैं, आदमी नई-नई शराबें खोजता है। इसे जरा हम खोजें--क्यों? कहीं भीतर मनुष्य के कोई गहरा भाव है जिसकी तलाश है, कोई गहरी प्यास है। मनुष्य मस्त होना चाहता है। बिना मस्त हुए भी जीवन कोई जीवन है? और चूंकि परमात्मा की शराब नहीं मिलती तो फिर परिपूरक शराबें खोज लेता है। फिर कुछ भी बना लेता है। असली सिक्के न मिलें तो आदमी करे क्या? नकली सिक्के इकट्ठे कर लेता है। नकली से ही मन को समझाता है, सांत्वना करता है।
इसलिए मेरी दृष्टि और है। मेरी दृष्टि यह है कि तुम अगर परमात्मा को पीकर मस्त हो जाओ, तुम्हारी जिंदगी से इस जगत की शराबें अपने आप चली जाएंगी। किसी कानून को बनाने की जरूरत नहीं है। किसी कानून को बनाने से कुछ होने वाला भी नहीं है। और एक तरह की शराब बंद कर दोगे तो दूसरी तरह की शराब पीओगे। पद की भी शराब होती है--भयंकर शराब होती है! धन की भी शराब होती है--गहरी शराब होती है! वह जो दुकानों पर बिकती है शराब, वह तो कुछ भी नहीं है। वह तो रात पी, सुबह उतर जाती है। पद की शराब चढ़ती है तो चढ़ी ही रहती है, उतरती नहीं। तुम चाहे पद से उतर जाओ, मगर शराब नहीं उतरती। फिर पद पर चढ़ाने की कोशिश में लगी रहती है।
मैं तुम्हें शराब पिला रहा हूं, ताकि शराबें छूट जाएं। यह मधुशाला ही है। यहां हम उस रस की तलाश कर रहे हैं, जिसकी बूंद भी गिर जाए तो सब सागर छोटे पड़ जाते हैं। फिर वह रस कैसे मिले. किसी को ध्यान से मिलता है, किसी को प्रेम से मिलता है; किसी को सत्संग से मिलता है, किसी को गुरु के साथ बैठ कर ही मिल जाता है; किसी को गुरु की वाणी सुन-सुन कर मिलता है, किसी को सिर्फ गुरु के प्रेम से मिल जाता है। कैसे मिले, यह बात और है। उस परमात्मा के द्वार अनेक हैं। मगर मिलना चाहिए। नहीं तो जीवन व्यर्थ गया। नहीं तो जीवन में कोई अर्थ न था। नहीं तो यूं ही जीए--हवा के थपेड़े खाते रहे; यहां से वहां भटकते रहे; ठोकरें खाते रहे। जन्म और मृत्यु के बीच फिर ठोकरों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
तो तुम ठीक ही कहते हो, कि यहां मधु ही पिलाया जा रहा है। यहां सिद्धांत, शास्त्र, शब्द, इनका कोई मूल्य नहीं है। इनका भी उपयोग किया जा रहा है सीढ़ियों की तरह। मगर ले चलना है इनके पार--एक ऐसी मस्त दशा में, जहां तुम्हारे भीतर से ही तुम्हारा रस बहने लगे। रस लिए हो तुम। स्रोत तुम्हारे भीतर है। चोट पड़ने की जरूरत है। यह मेरा तीर तुम्हें छेद दे, तो तुम्हारे भीतर झरना फूट उठे। फिर तुम कहीं भी न खोजोगे। फिर तुम कहीं बाहर न जाओगे। फिर तुम आंख बंद करोगे और भीतर डुबकी लगाओगे। उस डुबकी का नाम ही संन्यास है।
सत्संग बहुत दिन तक सत्संग तो करते रहे, लेकिन संन्यास टालते रहे, बचते रहे। मैंने कभी उन्हें कहा भी नहीं, क्योंकि मैं जानता था आज नहीं कल यह घटना घटने ही वाली है, कहने की कोई जरूरत नहीं। मैं पिलाए गया। मुझे पिलाने पर भरोसा है, समझाने पर नहीं। फिर एक दिन आ गए। आंखों में शराब का नशा। और एक दिन संन्यास में डुबकी मार ली। वर्षों तक बचे। किनारे पर खड़े देखते रहे। मगर कब तक किनारे पर रुकोगे! मंझधार का आमंत्रण मिलना शुरू हो जाए तो कितनी देर! थोड़ी देर कर सकता है कोई, लेकिन ज्यादा देर नहीं कर सकता। जब उस पार का निमंत्रण आ जाता है तो जाना ही होगा।
यहां जो व्यक्ति आते हैं, उनमें देर नहीं लगती मुझे छांट लेने में कि कौन उस पार जाने की तैयारी रखेगा। फिर उस पर मैं अपना प्रेम बरसाए जाता हूं और प्रतीक्षा करता हूं--कब. कब वह साहस जुटा पाएगा।
सत्संग ने कहा: ‘जब से तुझे पाया, तेरी महफिल में दौड़ा आया।’
यह सच है। वर्षों पहले पूना में जब मैं पहली बार आया था तब से ही वे दौड़े आते रहे हैं। कभी उन्होंने कोई सैद्धांतिक सवाल मुझसे पूछा नहीं। बस मेरे पास होने का रस लेते रहे हैं। बहुत मुश्किल होता है--मेरे पास होना और सवाल न पूछना। मेरे पास घंटों बैठे हैं। सुबह से लेकर सांझ तक मेरे साथ रहे हैं। लेकिन कभी कोई सैद्धांतिक सवाल नहीं पूछा। यह बात मुझे प्रीतिकर लगी है। बहुत कम लोग हैं जो सैद्धांतिक सवाल पूछने की उत्तेजना से बच पाएं। इस बात का मेरे मन में समादर रहा है। और इसलिए जब उन्होंने संन्यास लिया तो मैंने उन्हें सत्संग नाम दिया। सत्संग का अर्थ यह होता है: बिना पूछे साथ होना। चुपचाप साथ होना। रस पीना, जैसे भंवरा रस पीता है।
‘तू ही जाने तू क्या पिलाता।’
अब तो तुम भी जानते हो। अब तो जो भी पी रहे हैं वे सभी जानते हैं कि यहां शराब-बंदी का नियम तोड़ा जा रहा है।
‘जहां पक्षी भी गीत गाएं और पौधे भी लहराएं।’
अब तुम्हारे गीत गाने और तुम्हारे लहराने का भी क्षण करीब आ गया सत्संग! अब पक्षियों को मात देनी है। अब पौधों को हराना है। और तभी आदमी अपने पूरे रूप में प्रकट होता है, अपनी पूरी महिमा में--जब पक्षी ईर्ष्या करने लगें, जब पौधे जलन से भर जाएं।
मीरा जब नाची होगी तो तुम सोचते हो, पौधे और पक्षी ईर्ष्या से न भर गए होंगे? और जब कृष्ण ने बांसुरी बजाई होगी, तो तुम सोचते हो या नहीं, सारी प्रकृति क्षण भर को स्तब्ध नहीं हो गई होगी? मनुष्य जैसी बांसुरी बजा सकता है, न कोई पक्षी बजा सकता है, न कोई हवा की लहर पौधों से गुजरते हुए वैसा स्वर नाद पैदा कर सकता है। वह उनकी सामर्थ्य नहीं है। वह मनुष्य की ही सामर्थ्य है। जैसा नाच मनुष्य में पैदा हो सकता है वैसा किसी में पैदा नहीं हो सकता।
पुराने शास्त्र कहते हैं कि देवता भी मनुष्य होने को तड़फते हैं। जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो कहानियां कहती हैं कि सबसे पहले जो लोग उनके चरणों में आकर झुके, वे स्वर्ग के देवता थे। क्यों एक आदमी के चरणों में झुके होंगे? इस देश ने जितना सम्मान मनुष्य को दिया है उतना किसी देश ने नहीं दिया। देवताओं को मनुष्य के चरणों में झुकाया है। क्यों? देवता सुख में होंगे भला, बड़ी मौज में रह रहे होंगे, बड़ी सुविधा में, संपन्नता में, ऐश्वर्य में, वहां कोई कष्ट न होगा, गरीबी न होगी, बीमारी न होगी, दुख-दुर्बलता न होगी--मगर यह नृत्य उनमें पैदा नहीं हो सकता, जो बुद्ध में पैदा होता है, जो कृष्ण में पैदा होता है।
मनुष्य चौराहा है। इसके पीछे पशुओं का जगत है; वह एक राह है। इसके आगे देवताओं का जगत है; वह एक राह है। और मनुष्य के भीतर एक तीसरी राह है: नरक और स्वर्ग दोनों से ऊपर उठ जाने की। उस स्थिति को हम मोक्ष कहते हैं। उसको ही मैं शराब कह रहा हूं। नरक में पड़े होने का मतलब है: दुख में पड़े है। स्वर्ग में पड़े होने का मतलब है: सुख में पड़े। लेकिन सुख चुक जाता है। और सुख भी ज्यादा दिन भोगने पर दुख जैसा हो जाता है। सुख भी बासा हो जाता है। तुम सोचो, आज भी वही सुख, कल भी वही सुख, परसों भी वही सुख, कितने दिन तक तुम रस लोगे उसमें? जल्दी ही ऊब जाओगे। देवता बिलकुल ऊबे हुए हैं। स्वर्ग में अगर कोई सबसे बड़ा सवाल है, जो स्वर्ग के निवासी पूछते हैं, तो वह बोर्डम है, ऊब है। ऊबे हुए हैं।
तुम धनी आदमियों को देखते हो, उनमें थोड़ी सी झलक मिलेगी तुम्हें ऊब की। अगर अमरीका में, यूरोप में, जहां संपन्नता बड़ी है, कोई सवाल सबसे बड़ा दार्शनिक मूल्य रखता है तो वह ऊब का है। तुम अगर आधुनिक दर्शनशास्त्र की किताबें पढ़ोगे तो तुम बहुत हैरान होओगे, उनमें ईश्वर की चर्चा न भी हो, आत्मा की चर्चा न भी हो, मगर ऊब की चर्चा जरूर होती है। ऊब! यह भी कोई आध्यात्मिक सवाल है? यह है। यह सम्पन्न आदमी का सवाल है।
तुम्हीं जरा सोचो, सुंदर से सुंदर स्त्रियां हों, सुंदर से सुंदर भवन हो, सुंदर से सुंदर भोजन हो, सुंदर से सुंदर वस्त्र हों, कितने दिन तक अटके रहोगे? जल्दी ही ऊब पैदा हो जाएगी। अब और आगे क्या है? गरीब आदमी में ऊब पैदा नहीं होती, उसकी आशा रहती है जिंदा। वह सोचता है: कल इससे बेहतर होगा, परसों उससे बेहतर; जल्दी ही मैं भी अच्छा मकान बनाऊंगा, सुख-सुविधा से रहूंगा। उसकी आशा उसे जिलाए रखती है।
अमीर आदमी की तकलीफ एक है कि उसकी आशा मर जाती है। आगे अब और क्या है? अगर रॉकफेलर यह सोचे कि कल अच्छा होगा, तो कैसे सोचे? कल्पना की सुविधा नहीं रही। अमीर आदमी की कल्पना आत्मघात कर लेती है। और कल्पना ही तुम्हारा जीवन है। कल्पना से ही तुम जी रहे हो। कल अच्छा हो जाएगा, इस सहारे आज को गुजार रहे हो। अमीर आदमी की तकलीफ समझो। कल अच्छे होने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि अच्छी से अच्छी कार हो सकती थी, वह है। अच्छे से अच्छा हवाई जहाज हो सकता है, वह है। अच्छे से अच्छा मकान, अच्छी से अच्छी पत्नी, पति, जो भी हो सकता था, है। कल इससे बेहतर होने की कोई संभावना नहीं है। आगे जाने का कोई उपाय नहीं है। अंत पर आ गया।
अमीर आदमी ऊब जाता है। अमीर आदमी परेशान हो जाता है। और यह तो कुछ भी नहीं है, स्वर्ग में तो इससे बहुत ज्यादा गुना सुख होगा। वहां ऊब है। नरक में ऊब नहीं है। नरक में आशा है। नरक में आशा के दीये जलते हैं। आदमी दुख भोगता है तो सोचता है कि आज नहीं कल नरक से निकल जाऊंगा। लेकिन जहां सुख ही सुख है, आदमी सोचता है: अब क्या होगा? अब आगे क्या है? क्या यही जीना पड़ेगा, ऐसे ही जीना पड़ेगा? ऐसे ही जीऊंगा सदा-सदा? अब मेरी जिंदगी में नया कुछ भी न होगा।
इसलिए भारत ने, सिर्फ भारत ने. दुनिया में और भी धर्म हैं--ईसाइयत है, यहूदी धर्म है, इस्लाम है--उन तीनों धर्मों में मोक्ष की कोई धारणा नहीं है। उस लिहाज से वे धर्म थोड़े अधूरे पड़ जाते हैं। स्वर्ग की धारणा है, नरक की धारणा है; मोक्ष की कोई धारणा नहीं है। सच तो यह है ‘मोक्ष’ शब्द को अनुवादित करने के लिए दुनिया की भाषाओं में कोई शब्द नहीं है। क्योंकि जब धारणा ही नहीं तो शब्द कैसे होगा? ‘मोक्ष’ हमारा बहुमूल्य शब्द है। वह हमारी सबसे बड़ी खोज है। दुख है, उससे भी छूटना है; सुख है, उससे भी छूटना है। दुख और सुख के द्वंद्व के पार जाना है: न जहां दुख रह जाए, न जहां सुख रह जाए। उस अवस्था को हम मोक्ष कहते हैं। मनुष्य ही उस अवस्था में उठ सकता है। मनुष्य ही उस अंतर्यात्रा पर जा सकता है।
नरकमें लोग बहुत दुखी हैं, अंतर्यात्रा करने की सुविधा नहीं है। स्वर्ग में लोग बहुत सुखी है, ऊबे हुए हैं, अंतर्यात्रा तक उठने की संभावना नहीं है। ऊब ही उन्हें मारे डाल रही है। वे नई-नई उत्तेजनाएं खोजने में लगे रहते हैं। मनुष्य चौराहा है, जहां सारी प्रकृति के सारे रास्ते आकर मिलते हैं। मनुष्य में जीवन का सबसे बड़ा फूल खिल सकता है--मोक्ष कहो, निर्वाण कहो। यह फूल जब खिलता है तो वृक्षों में खिले फूल फीके पड़ जाते हैं। यह फूल जब खिलता है, पक्षियों के गीत फीके पड़ जाते हैं। यह फूल जब खिलता है, चांद-तारों की रोशनी फीकी और मंदी मालूम होती है।
तुम कहते हो: जहां पक्षी गीत गाते, पौधे लहराते। अब सत्संग! तुम भी लहराओ और तुम भी गीत गाओ। छोड़ो लाज-संकोच। छोड़ो सब संस्कार। छोड़ो बंधी-बंधाई धारणाएं। मस्ती भीतर आ रही है, उसे बाहर भी बहने दो।
लोग बड़े कंजूस हैं। एक मित्र ने चार छह दिन पहले ही मुझसे आकर पूछा कि हम और सदगुरुओं के पास भी रहे हैं, वहां तो सदा यही कहा गया कि जब भीतर ऊर्जा उठे, कुंडलिनी जगे, तो उसको भीतर ही सम्हाल लेना और आप यहां कहते हैं: अभिव्यक्ति दो, अभिव्यंजना दो। यह बात बड़ी उलटी है।
मैंने उनसे कहा: तुम किन्हीं कंजूसों के पास रहे होओगे--भीतर ही सम्हाल लेना! आदमी की कंजूसी जाती ही नहीं। जो भीतर उठे बाहर प्रकट करो। और जितना तुम बांटोगे उतना बढ़ेगा। और क्या बाहर-भीतर का भेद किया है? श्वास भीतर जाती है, फिर उसको बाहर जाने देते हो कि नहीं? नहीं जाने दोगे, उसी क्षण मर जाओगे। इसलिए तुम्हारे तथाकथित महात्मा मुर्दे हैं। पकड़े हैं, थोड़ी सी किरण आ गई है, थोड़ी सी ज्योति आ गई है, थोड़ी सी झलक आ गई है--ऐसे झपट्टा मार कर बैठ गए हैं, कि अब उसी से अटक गए हैं।
लुटाओ! और बहुत आएगा। इतनी जल्दी पकड़ने की बात ही मत करो। जिस कुएं से पानी भरा जाता है, उसमें ताजी धार बहती रहती है। उसका जल निर्मल रहता है, जीवंत रहता है। जिस कुएं से लोग पानी नहीं भरते, कंजूस कोई हो तो ढांक कर रख दे कुएं को, कि कोई पानी न भरे, खुद भी न भरे; प्यासा मरे, मगर पानी न भरे, क्योंकि खर्च कहीं न हो जाए! वह कुआं मर जाएगा। उस कुएं का जल मुर्दा हो जाएगा। उस कुएं के झरने सूख जाएंगे। उनकी जरूरत ही न रहेगी। उस कुएं का पानी जल्दी ही जहर से भर जाएगा, पीने योग्य नहीं रह जाएगा।
कुछ रोकना नहीं है, बांटना है। पाओ और लुटाओ। दोनों हाथ उलीचिए! जरा भी कृपणता मत करना। उसी को मैं नृत्य कह रहा हूं, उसी को फूल कह रहा हूं। जब तुम भीतर मस्ती से भरो। तो छलकने देना। लबालब भरोगे तो मस्ती छलकेगी ही। छलकनी ही चाहिए। और तुम चकित होओगे यह बात जानकर: जितनी छलकेगी उतने ज्यादा तुम भरोगे। जितना बांटोगे उतना मिलेगा। यहां बांटने वालों को मिलता है।
नाचो वृक्षों की भांति! गाओ पक्षियों की भांति। मुक्त भाव से लुटाओ!
जीसस ने कहा है: जो बचाएगा वह खो देगा और जो खो देगा उसे मिल जाएगा। ठीक कहा है।
यहां मैं चाहता हूं तुम्हें एक ऐसा नृत्य देना, एक ऐसा गीत. लेकिन तुम्हारी हजारों-हजारों साल की धारणाएं हैं, वे तुम्हारे पीछे खड़ी हैं। मेरे पास भी आ जाते हो तो वे धारणाएं पीछे अटकी रहती हैं। वे कहती हैं: ठीक है, सुख मिला तो अपना सम्हाल कर रखो। बताना क्या है? दिखाना क्या है? दिखाने के लिए नहीं दिखाना है। बताने के लिए नहीं बताना है। मगर लुटाना जरूर है। और लुटाने में दिखाई पड़ेगा, वह दूसरी बात है।
मेरे पास कृपणता मत रखना। इसीलिए हर ध्यान के बाद मैं अनिवार्य रूप से यह अंग मानता हूं ध्यान का, कि जब तुम आनंद से भरो तो नाच कर उसे प्रकट कर देना। श्वास भीतर ली, उसे बाहर छोड़ देना। क्या बाहर क्या भीतर! सब उसका है। वही है। बाहर भी वही, भीतर भी वही। उसी से लेते हैं, उसी को दे देते हैं। त्वदींयं वस्तु तुभ्यमेव समर्पये! तेरी चीज तेरे को लौटा दी, तुझ ही को भेंट कर दी!
ये फूल जो खिलते हैं, कहां से आते हैं? ये पृथ्वी से आते हैं। ये आकाश से आते हैं। ये सूरज की किरणों से आते हैं। ये चांद के अमृत से आते हैं। यह हवाओं से आते हैं। फिर इसी में बिखर जाते हैं, इसी में सुगंध को लुटा देते हैं, इसी मिट्टी में गिर कर फिर मिट्टी हो जाते हैं। सूरज की किरण सूरज में गई, पानी सागर में गया, हवा हवा में उड़ गई। मिट्टी मिट्टी में गिर गई। फिर उठेगा फूल, फिर जगेगा फूल। अगर वृक्ष कंजूस हो जाएं और फूल खिल जाएं और उनको पकड़ कर बैठ जाएं तो वे फूल प्लास्टिक के हो जाएंगे, असली नहीं रह जाएंगे। असली तो आता है, जाता है। असली में तो गति होती है। असली में प्रवाह होता है। असली में परिवर्तन होता है।
नाचो! गाओ! हरि बोलौ हरि बोल!
पूछा है: ‘हम न जानें प्रभु-प्रार्थना।’
यही तो है प्रभु-प्रार्थना। यही नाचना, यही गाना, यही गुनगुनाना, यही प्रकृति के प्रति आह्लाद का भाव--बस यही है प्रार्थना। मंदिरों में जो हो रही है, मस्जिदों में जो हो रही है, वह प्रार्थना नहीं है, प्रार्थना की पिटी हुई लकीर है; प्रार्थना का नाम है, प्रार्थना नहीं है। मस्ती है प्रार्थना। शब्दों से कोई संबंध नहीं है। कभी शब्द उठेंगे भी और नहीं भी उठेंगे। उठ जाएं तो ठीक, न उठें तो ठीक। प्रार्थना कोई औपचारिक बात नहीं है--हिंदू की और ईसाई की और जैन की। प्रार्थना कहीं हिंदू, ईसाई और जैन की हो सकती है? प्रार्थना तो भाव-दशा है। प्रार्थना तो अनुग्रह का बोध है। परमात्मा को धन्यवाद है।
और हमारे पास शब्द भी क्या हैं कि हम उसे धन्यवाद दें। इसलिए तो हम झुकते हैं। शब्द से कैसे कहें? झुक कर अपने पूरे प्राणों से कह देते हैं।
‘हम न जानें प्रभु प्रार्थना, नहीं समझें स्वर्ग-नरक की भाषा।
अब हमें न कहीं जाना न कुछ पाना, हमें तो यही संसार प्यारा।’
यही मेरी देशना है। कहीं किसी को नहीं जाना है। मोक्ष कहीं और नहीं है, मोक्ष इसी संसार में होने का एक ढंग है। नरक भी इसी संसार में होने का एक ढंग है, स्वर्ग भी इसी संसार में होने का एक ढंग है। ये होने के ढंगों के नाम हैं। यात्राएं नहीं हैं। कहीं जाना नहीं है। यहीं सब हो जाता है। जैसे तुम रेडियो पर स्टेशन लगाते हो न, कहीं जाना-आना थोड़े ही होता है कि दिल्ली लगाया कि लंदन लगाया कि न्यूयार्क, तो तुम्हें कहीं जाना-आना तो नहीं होता। बस जरा रेडियो की सुई घुमानी पड़ती है। रेडियो की सुई उस तरंग से जोड़ देनी होती है जहां दिल्ली और तत्क्षण तुम जुड़ गए।
ऐसे ही व्यक्ति के भीतर चित्त है और चित्त में तरंगें हैं। उन तरंगों को जोड़ने की बात है।
तुमने कभी देखा? दुख में बैठे हो, प्रयोग करना। दुख में बैठे हो, अचानक इसको एक अवसर बना लेना और सोचना कि कैसे सुख से जुड़ जाऊं। पहले तो बहुत मुश्किल होगी क्योंकि पुरानी आदत, और पुराना ढंग यह है कि दुखी हो अभी कैसे सुखी हो सकता हो? अभी तो दिल्ली लगी है, लंदन कैसे लग सकता है? हमेशा लग सकता है। जरा कोशिश करना, दुख में बैठे हो, खड़े होकर गीत गुनगुनाने लगना। पहले तो हंसी आएगी। पहले तो खुद पर भरोसा नहीं आएगा। पहले तो सोचोगे: क्या मैं पागल हो रहा हूं? यह कोई वक्त है? अभी दुख का समय है। फिर थोड़ा नाचने लगना और तुम चकित हो जाओगे। जल्दी ही तुम इस घटना को अपने भीतर घटते देखोगे कि दुख की बदली छंट गई, सुख का सूरज निकला। और जब तुम बहुत सुखी हो रहे हो, तब भी बदल कर देखना। बड़े सुख में हो, बड़े प्रसन्न बैठे हो, बदल कर देखना हवा को। सोचने लगना दुख की बातें--फलां आदमी ने गाली दी और फलां आदमी ने धोखा दिया और फलां आदमी ने ऐसा दुर्व्यवहार किया। जरा सोचने में उतरना। तरंग को ले जाना उस तरफ, सुई को घुमाना उस तरफ--और जल्दी ही तुम पाओगे, विदा हो गया स्वर्ग, भूल गए सुख, चित्त क्रोध से भरा है, वैमनस्य से भरा है। ईर्ष्या-हिंसा से भरा है, बदला लेने का भाव उठा है। हाथ तलवार खोज रही है।
एक झेन फकीर के पास जापान का सम्राट मिलने गया। पुरानी कहानी है, जब सम्राट फकीरों के पास जाते थे। अब तो दो कौड़ी के फकीर हैं, वे चले जाते हैं, कुछ नहीं चलो मोरार जी भाई देसाई के दर्शन करने चले जाते हैं। अभी कुछ दिन पहले खबर थी: गणेशपुरी के गोबर नरेश मुक्तानंद मोरार जी देसाई का दर्शन करने गए।. मोरार जी देसाई का दर्शन करने! तुम्हें दर्शन को कोई और दर्शनीय स्थान न मिला? जमाने बदल गए हैं। और न केवल दर्शन किया, बल्कि मोरार जी देसाई को कह कर आए कि हम सौभाग्यशाली हैं कि आप जैसा साधु-पुरुष भारत का प्रधानमंत्री है! प्रधानमंत्री साधु-पुरुष हो सकता है? साधु-पुरुष को तुम प्रधानमंत्री होने दोगे? प्रधानमंत्री होने के लिए असाधुता अनिवार्य शर्त है। हां, साधुता का दिखावा जरूरी है। भीतर सब चालबाजियां, सब जालसाजियां। भीतर सब बेईमानियां। भीतर सब उठा-पटक। ऊपर-ऊपर साधुता का वेश जरूरी है। बगुला भगत होना जरूरी है।
देखते हैं बगुला भगत को! बिलकुल एक टांग पर खड़ा रहता है योगासन साधे! अकंप! बड़े से बड़े योगी मात हो जाएं! बिलकुल आंख बंद किए, हिलता नहीं, डुलता नहीं, इसलिए इसको बगुला भगत कहते हैं। कितनी भक्ति से खड़ा है! फिर आई मछली और उसने झपट्टा मारा।
राजनीति की दौड़ में जो लगा हो वह साधु तो हो ही नहीं सकता। राजनीति की दौड़ ही असाधु चित्त में पैदा होती है। पद की आकांक्षा हीनग्रंथि से पीड़ित लोगों में होती है। पद मद है।
पुरानी कहानी है। सम्राट एक झेन फकीर के दर्शन को गया। फकीर बैठा खंजड़ी बजा रहा था। सम्राट ने पूछा कि मैं एक प्रश्न लेकर आया हूं--स्वर्ग क्या है, नरक क्या है? उस फकीर ने खंजड़ी नीचे रख दी और उसने कहा: प्रश्न तो बड़ा ले आए और चेहरा बिलकुल बुद्धू जैसा है। खोपड़ी में गोबर भरा है।
अब सम्राट से ऐसी बात कहोगे.। सम्राट ने तो सोचा भी नहीं था कि कोई फकीर ऐसा बोलेगा। और यह परम ज्ञानी था। और इसकी बड़ी दूर-दूर तक ख्याति थी। और वजीरों ने बड़ी प्रशंसा की थी कि आदमी जाने योग्य
अगर कोई है तो यह। सम्राट तो भूल ही गया। उसने तो तलवार खींच ली। और जब उसने तलवार खींची और तलवार उठा कर फकीर को मारने को ही था, फकीर खिलखिला कर हंसा और उसने कहा। यह रहा नरक का द्वार।
एक क्षण को चौंका। एक होश आया कि यह मैं क्या कर रहा हूं। यह मुझसे क्या हो गया। एक क्षण में इस फकीर ने चाबी घुमा दी, हटा दी सुई! अभी आया था बड़ी गरिमा से, सत्संग करने आया था, बड़े भाव-विभोर होकर आया था, अभी चरणों में झुका था--और तलवार निकाल ली! और जब फकीर ने हंस कर कहा कि यह नरक का द्वार है, चोट लगी होगी गहरी, तलवार म्यान में वापस चली गई, साष्टांग जमीन पर गिर पड़ा, फकीर के चरण पकड़ लिए, आंख से आंसू बहने लगे। फकीर ने कहा: यह स्वर्ग का द्वार है।
स्वर्ग और नरक चित्त की दो अवस्थाएं हैं। जरा में स्वर्ग, जरा में नरक हो जाता है। और ऐसा ही जो परम अवस्था है, मोक्ष, वह भी है--जहां दोनों से मुक्त हो गए, जहां दोनों के मध्य ठहर गए; जहां सब तादात्म्य विलीन हो गए; जहां साक्षी का आविर्भाव हुआ; न तो जहां यह रहा कि मैं दुख हूं, न मैं सुख; जहां किसी चीज से कोई संबंध जोड़ने की बात ही न रही, सारे संबंध टूट गए, असंग भाव हुआ--वहीं मुक्ति, वहीं मोक्ष।
यही संसार मोक्ष हो जाता है, लेकिन तुम अपने ढंग से समझते हो। जब तुमसे कहा जाता है मोक्ष, तो तुम सोचते कहीं दूर-दूर, बहुत दूर आकाश में! मोक्ष यहीं है, जहां तुम हो। जब तुमसे कहा जाता है नरक, तुमने कहानियां गढ़ ली हैं कि बहुत दूर-दूर पाताल में। कहां जाओगे? पाताल में अमरीका मिलेगा। खोदते चले गए, चले गए। और अमरीका के लोग भी सोच रहे हैं कि पाताल में नरक है। अगर अमरीका के लोग खोदते-खोदते चले आएं तो तुम मिलोगे। जमीन गोल है। कहां खोजोगे? और ऊपर कहां जाओगे? इस जगत में न कोई ऊपर है न कोई नीचे, क्योंकि इसकी कोई सीमा नहीं है। सीमा होती तो ऊपर-नीचे हो सकता था। कोई छप्पर थोड़े ही है आकाश में कहीं। छप्पर कहीं भी नहीं है। अंतहीन विस्तार है। तो किसको ऊपर कहोगे, किसको नीचे कहोगे? यहां प्रत्येक चीज मध्य में है। ऊपर-नीचे की तुलना का उपाय नहीं है।
नहीं; वे धारणाएं बचकानी हैं, छोटे बच्चों को समझाने के लिए हैं। बच्चों को समझाना होता है तो प्रतीक चुनने पड़ते हैं। ऐसे प्रतीक तुम्हारे लिए चुन लिए गए हैं। सचाई कुछ और है। सचाई सिर्फ इतनी है कि स्वर्ग-नरक मनोवैज्ञानिक अवस्थाएं हैं, तुम्हारे होने के ढंग हैं। अगर तुम यहां शांत बैठे हो, आनंदमग्न मेरे पास, तुम स्वर्ग में हो। घर लौटोगे, भूल-भाल जाएगा सब आनंद, पहुंच जाओगे अपनी पुरानी दुनिया में, वही उपद्रव फिर तुम्हें पकड़ लेंगे तुम नरक में आ गए। अगर समझ जगने लगेगी तो धीरे-धीरे तुम यहां जो पैदा होता है, उसे घर तक सम्हाल कर ले जाओगे, उसे घर में भी सम्हाले रखोगे। तुम हर अवसर को एक परीक्षा बना लोगे कि पत्नी बिगड़ रही है, मगर तुम अपना स्वर्ग सम्हाले हो; तुम कहते हो कि बिगड़ने न देंगे स्वर्ग। तुम होश सम्हाले हो, कि करने दो पत्नी को शोरगुल, पटकने दो प्लेटें, बजाने दो दरवाजे, करने दो जो करना है--मैं अपना स्वर्ग सम्हालूं। एक दिन तुम पाओगे कि तुम वहां भी सम्हाल सकते हो। दुकान पर भी सम्हाल सकते हो। धीरे-धीरे यह अनुभव गहन होता जाएगा कि तुम जहां चाहो वहां सम्हाल सकते हो।
नरक से स्वर्ग और फिर स्वर्ग से मोक्ष तक उठ जाना। मगर है सब यहीं। इस संसार के अतिरिक्त और कोई संसार नहीं।
रुकी-रुकी सी शबे-मर्ग खत्म पर आई।
वो पौ फटी वो नई जिंदगी नजर आई।।
सत्संग, जागो! सुबह पास ही है, हाथ फैलाओ और पकड़ो।
रुकी-रुकी सी शबे-मर्ग खत्म पर आई।
मौत की रात समाप्त होने को आ गई।
वो पौ फटी वो नई जिंदगी नजर आई।।
वह सुबह होने को है। वह नई जिंदगी पैदा होने को है। लेकिन नई जिंदगी कोई दूसरी जिंदगी नहीं है। नई जिंदगी इसी जिंदगी का एक नया रूप है, एक नया निखार, एक नई शैली, एक नया अंदाज।
रुकी-रुकी सी शबे-मर्ग खत्म पर आई।
वो पौ फटी वो नई जिंदगी नजर आई।।
ये मोड़ वो हैं कि परछाइयां भी देंगी न साथ।
मुसाफिरों से कहो उसकी रहगुजर आई।।
फजा तबस्सुमे-सुबहे-बहार थी लेकिन।
पहुंच के मंजिले-जानां पे आंख भर आई।।
किसी की बज्मे-तरब में हयात बटती थी।
उमीदवारों में कल मौत भी नजर आई।
कहां हर एक से इंसानियत का बार उठा।
कि ये बला भी तेरे आशिकों के सर आई।।
दिलों में आज तेरी याद मुद्दतों के बाद।
ब-चेहरा-ए-तबस्सुम व चश्मे-तर आई।।
नया नहीं है मुझे मर्गे-नागहां का पयाम।
हजार रंग से अपनी मुझे खबर आई।।
फजा को जैसे कोई राग चीरता जाए।
तेरी निगाह दिलों में यूं ही उतर आई।।
जरा विसाल के बाद आईना तो देख ऐ दोस्त!
तेरे जमाल की दोशीजगी निखर आई।।
अजब नहीं कि चमन-पर-चमन बने हर फूल।
कली-कली की सबा जाके गोद भर आई।।
शबे-‘फिराक’ उठे दिल में और भी कुछ दर्द।
कहूं मैं कैसे तेरी याद रात भर आई।।
परमात्मा को याद करने का क्षण सत्संग करीब आ गया! नाचो! गुनगुनाओ! मस्त होओ! बांटो!
यही है, जैसा तुमने पूछा है। ऐसा ही सत्य है। न स्वर्ग है कोई, न नरक है कोई, न मोक्ष है कहीं। सब यहीं है--तुम्हारे होने के ढंग, तुम्हारे होने की शैलियां।
प्रार्थना क्या है, नहीं समझ में आया। कोई जरूरत नहीं है। प्रार्थना भाव की दशा है, समझने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। प्रार्थना झुकने का आनंद है, नमन है, धन्यवाद है, अनुग्रह का भाव है।
और तुमने कहा: ‘न कहीं जाना है न, कुछ होना है।’ बस मेरी बात समझ में आने लगी। यही तो मैं कह रहा हूं। न कहीं जाना है, न कुछ होना है। जागना है। तुम्हें जो होना चाहिए, हो ही। और तुम्हें जहां होना चाहिए, वहीं तुम हो। सिर्फ तुम सोए हो। जागो! और नाचने लगो तो जाग ही जाओगे।
जरा सोचो, कोई सोया आदमी उठ कर नाचने लगे, कितनी देर सोया रहेगा? नाचा कि जागा। जागा कि नाचा। दोनों तरफ से यात्रा होती है। जो जागने लगते हैं वे नाचने लगते हैं। जो नाचने लगते हैं वे जागने लगते हैं। ये एक ही घटना के दो हिस्से हैं। नाचता हुआ आदमी कैसे सोएगा? गाता हुआ आदमी कैसे सोएगा?
गीत को जोर से उठने दो! प्राण के संगीत को जोर से मुखर होने दो।
रुकी-रुकी-सी शबे-मर्ग खत्म पर आई।
वो पौ फटी वो नई जिंदगी नजर आई।।

दूसरा प्रश्न: भगवान,
प्यार पर तो बस नहीं है मेरा लेकिन फिर भी तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं?
माला! पूछने की सुविधा कहां है? प्रेम हो जाता है तो हो जाता है, नहीं होता तो नहीं होता। करने की बात कहां है? निर्णय की सुविधा कहां है प्रेम में? प्रेम अवसर कहां देता है कि चुनो? प्रेम तो पकड़ लेता है। तुम्हारे हाथ में थोड़े ही प्रेम है--तुम प्रेम के हाथ में हो। प्रेम तुमसे बड़ा है। और जब आता है तब आ जाता है और तुम्हें बहा ले जाता है। जैसे बाढ़ आ जाए, जैसे तूफान आए। ऐसा प्रेम आता है।
तुमने पूछा:
‘प्यार पर तो बस नहीं है मेरा लेकिन फिर भी
तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं?’
प्रेम पर बस नहीं है, यह अगर समझ में आ गया, तो फिर ‘लेकिन, फिर भी’ का उपाय कहां? फिर से वापस ‘बस’ की बात मत उठाओ। और प्रेम पूछता थोड़े ही है। और जिस प्रेम में तुम मेरे साथ बंध रहे हो, इसमें पूछने की कोई जरूरत ही नहीं है। क्योंकि यह प्रेम बंधन नहीं है, यह प्रेम स्वतंत्रता है।
प्रेम के दो रूप हैं। एक तो प्रेम का रूप है--बंधन का। उससे ही तो लोग पीड़ित हैं, परेशान हैं, थक गए हैं, बुरी तरह थक गए हैं।
कल ही रात मैं एक कहानी कह रहा था। एक आदमी अपने विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ मना रहा था। नाच-गीत चल रहा था, शराब ढाली जा रही थी। मित्र इकट्ठे हुए थे। अमरीका की बात है, जहां कि पच्चीस साल एक ही विवाह में रहे आना बड़ी अद्वितीय घटना है। तीन-चार साल में लोग जैसे और सब चीजें बदल लेते हैं वैसे पत्नी भी बदल लेते हैं। पच्चीस साल! रजत-जयंती मना रहा था। लेकिन अचानक एक मित्र ने देखा कि वह एकदम से उदास हो गया और फिर बाहर चला गया। तो वह मित्र भी उसके पीछे हो लिया। बाकी तो अपने मस्ती में थे, नाच-गीत चल रहा था, शराब ढाली जा रही थी, भोजन हो रहा था। वह मित्र उसके पीछे-पीछे बाहर चला गया। वह आदमी बाहर गया, जिसकी विवाह की रजत-जयंती मनाई जा रही थी, और एक वृक्ष के नीचे खड़े होकर रोने लगा। उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे। उस मित्र ने उससे पूछा कि क्या बात है? इस खुशी के अवसर पर क्यों रो रहे हो?
उसने कहा: रोने का कारण है। विवाह के पांच साल बाद मैं ऊब गया इस विवाह से, इसके बंधन से इतना ऊब गया कि मैंने सोचा कि इस स्त्री की हत्या ही कर दूं। मैं अपने वकील के पास गया--पूछने कि अगर मैं हत्या करूं तो क्या होगा? अगर पकड़ा जाऊं तो क्या होगा?
तो वकील ने कहा कि कम से कम बीस साल की सजा होगी। कम से कम। इतना तो पक्का ही है। ज्यादा भी हो सकती है, लेकिन कम से कम बीस साल की सजा होगी। तो मैं डर गया और मैंने हत्या नहीं की।
तो उसने पूछा कि फिर अब क्यों रो रहे हो?
उसने कहा कि अब रो रहा हूं कि अगर मैंने उस मूर्ख वकील की बात न मानी होती तो आज जेल से छूट जाता, मुक्त हो जाता। आज का दिन आनंद का दिन होता, मगर उस मूर्ख की बात मान कर मैं अटक गया सो अटक गया।
एक प्रेम तुमने संसार में जाना है, जो बंधन है। इसलिए उसमें दूसरे की आज्ञा लेनी जरूरी होती है। स्वाभाविक। जब किसी को बांधने चले तो उससे पूछना पड़ेगा कि भाई आप बंधने को राजी हैं कि नहीं? इसलिए कहते हैं: प्रेम-बंधन, प्रणय-बंधन। हमारे पुत्र और पुत्रियां विवाह के बंधन में बंध रहे हैं--निमंत्रण-पत्रों में लिखा होता है। बंधन! तो स्वभावतः दूसरे की मर्जी तो कम से कम शुरू में एक दफे तो पूछ ही लेना जरूरी है। एक दफे बंध गए तो फिर तो बंध गए, फिर निकलना कोई इतना आसान थोड़े ही है। फिर तो दोनों निपट लेंगे आपस में। मगर शुरुआत में तो कम से कम स्वीकृति, एक समझौता तो होना ही चाहिए।
मेरे साथ प्रेम वैसा प्रेम तो नहीं। मेरे साथ तुम बंध तो नहीं रहे हो। तुम मुझे बांध तो नहीं रहे हो। मैं तुम्हें मुक्त कर रहा हूं। और जब मैं तुम्हें मुक्त कर रहा हूं, तो स्वभावतः यह एक और ही ढंग का प्रेम है। यही प्रेम है। प्रेम की परिभाषा यही है--जो मुक्त करे। जो बंधन में ले जाए, वह शत्रुता होगी, मित्रता कैसी? जो तुम्हारे जीवन की स्वतंत्रता को खंडित कर दे, जो तुम्हारे पैरों में जंजीरें डाल दे, हाथों में हथकड़ियां डाल दे, जो तुम्हारी गर्दन में फांसी बन जाए, उसका नाम प्रेम है, तो फिर घृणा किसका नाम है? अगर कारागृह का नाम प्रेम है तो फिर मंदिर. फिर मंदिर कहां बनेगा? कैसे बनेगा?
प्रेम मंदिर है, कारागृह नहीं है। और प्रेम स्वतंत्रता देता है। प्रेम स्वतंत्रता में ही श्वास लेता है। प्रेम पंख फैलाता है स्वतंत्रता के ही आकाश में।
तो यहां तो तुम स्वतंत्रता का पाठ सीखने मेरे पास आए हो। अगर तुम मेरे प्रेम में भी पड़ रहे हो तो इसीलिए कि तुम्हें स्वतंत्रता से प्रेम है; और कोई कारण नहीं। मुझसे तुम संबंध भी जोड़ रहे हो तो इसीलिए ताकि मुक्त हो सको। मुक्ति यानी स्वतंत्रता, परम मुक्ति अनुभव में आ सके।
मुझसे पूछने की कोई जरूरत नहीं। तुम मुझे कोई बांधने तो माला जा नहीं रही हो, न मैं तुम्हें बांध रहा हूं। यहां तो सारे बंधन गिराने हैं। दिल भर के करो, जितना कर सको उतना प्रेम करो। और मैं तुमसे यह भी कहना चाहता हूं कि मुझे ही क्यों, प्रेम करो! उसे एक ही दिशा में क्यों बहाओ? जब एक दिशा में बहाने से इतना आनंद मिलता है तो सारी दिशाओं में क्यों न बहाओ? अनंत गुना आनंद होगा।
इसलिए बजाय व्यक्तियों के प्रति प्रेम की धारा बनाने के, सिर्फ प्रेम की अवस्था बनानी चाहिए। चारों तरफ बहती रहे। जिससे मिलो, जिसके पास बैठो, जहां खड़े हो जाओ, वहीं प्रेम की सुगंध उड़नी चाहिए। काश, मैं तुम्हें ऐसा प्रेम सिखा सकूं तो मेरा काम पूरा हुआ!
पर खयाल रखना, बंधन वाले प्रेम में अहंकार को मरने की जरूरत नहीं पड़ती। सच तो यह है, जितने बंधन होते हैं, अहंकार को उतना ही बचाव होता है। बंधन अहंकार के लिए आभूषण है। और जहां स्वतंत्रता प्रेम का अर्थ होता है वहां अहंकार को मरना होता है। स्वतंत्रता अहंकार के लिए मृत्यु है। वह उसकी कब्र है। इसलिए तो लोग बंधन वाले प्रेम को पसंद करते हैं; बंधन-मुक्त प्रेम को पसंद नहीं करते, क्योंकि वहां अहंकार गंवाना पड़ेगा। अगर कोई चीज बांधने को न हो तो अहंकार बच ही नहीं सकता, क्योंकि अहंकार को सीमा चाहिए और बंधन से सीमा मिलती है। मैं पति, मैं पत्नी, मैं बाप, मैं मां, मैं बेटा, भाई, मित्र--इन सबसे सीमा मिलती है, परिभाषा मिलती है। न मैं पति, न मैं भाई, न मैं बेटा, न मैं बाप, न मैं पत्नी--सब सीमाएं गईं, सब सीमाएं तिरोहित हो गईं। अब जो बचा उसे तुम ‘मैं’ नहीं कह सकते। अब ‘मैं’ कैसे कहोगे उसे? ‘मैं’ की तो सारी ईंटें निकल गईं, जिनसे ‘मैं’ का भवन बना था। अब तो अहं ब्रह्मास्मि! अब तो ब्रह्म ही है। अब तो तत्वमसि! अब तो वह ही है। अब तुम तो मिट गए।
मिटने की तैयारी करो माला! मेरे प्रेम में पड़ने का मतलब होता है: मिटने की तैयारी।
मुझको मारा है हर इक दर्दो-दवा से पहले।
दी सजा इश्क ने हर जुर्मो-खता से पहले।।
आतिशे-इश्क भड़कती है हवा से पहले।
ओंठ जलते हैं मोहब्बत में दुआ से पहले।।
अब कमी क्या है तेरे बे-सरों-सामानों को।
कुछ न था तेरी कसम तर्को-फना से पहले।।
खुद-ब-खुद चाक हुए पैरहने-ताला-ओ-गुल।
चल गई कौन हवा बादे-सबा से पहले।।
मौत के नाम से डरते थे हम ऐ शौके-हयात।
तूने तो मार ही डाला था कजा से पहले।।
गफलतें-हस्ती-ए-फानी की बता देंगी तुझे।
जो मेरा हाल था एहसासे-फना से पहले।।
प्रेम महामृत्यु है। मौत से भी पहले मौत! और मृत्यु नहीं है; अगर ठीक से समझो तो आत्मघात है। क्योंकि अहंकार को अपने हाथ से मारना है, आत्मघात है। बड़ी हिम्मत चाहिए, बड़ी जोखम उठाने का साहस चाहिए! दुस्साहस चाहिए।
माला, अगर प्रेम ने पकड़ा है तो उठो और चलो इस दुस्साहस में। अपने को मिटाओ। मेरे साथ प्रेम की शर्त पूरा करने का एक ही उपाय है: अपने को मिटाओ। मैं मिट गया हूं, तुम भी मिट जाओ, तो ही मुझसे जुड़ सको। एक शून्य हो गए व्यक्ति से जुड़ने के लिए शून्य हो जाने के अतिरिक्त और कोई शर्त नहीं है। मैं तो फना हुआ, मैं तो मिटा। अब यहां कोई है नहीं। ऐसे ही तुम्हारे भीतर भी कोई न बचे, सन्नाटा हो जाए, शून्य हो जाए, तो मिलन हो सकता है। मेरे साथ होना हो तो कुछ मेरे जैसा हो जाना जरूरी है।
यह प्रेम महंगा सौदा है। मगर अगर होना शुरू हुआ है तो अब रुकने का कोई उपाय नहीं। और मैं तो रोकूंगा क्यों?
तुम मुझसे पूछती हो:
‘प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी
तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं।’
मैं तो निमंत्रण ही दे रहा हूं। इसलिए तुम्हें बुलाया है और तुमने बुलावा सुना और आए। इसलिए तुम्हें पुकार रहा हूं। ये सारे डोरे इसलिए डाल रहा हूं कि प्रेम जन्मे। तुम धीरे-धीरे मेरे द्वारा प्रेम के भेजे गए संदेशों को सुन-सुन कर सरकते आओ, सरकते आओ, मिटते जाओ। एक दिन वह शुभ घड़ी आए, जब तुम अपने भीतर कोई भी न पाओ। सन्नाटा हो, शून्य हो। उसी दिन असीम हो गए। और उस दिन तुम मुझसे ही नहीं मिल जाओगे, उस दिन अपने से भी मिले। बस उसी दिन अपने से मिले!
गुरु तो वही जो तुम्हें तुमसे मिला दे और तुम अपने से ही नहीं मिल जाओगे, उसी दिन तुम परमात्मा से भी मिल जाओगे। क्योंकि परमात्मा तुम्हारा स्व है, तुम्हारा अंतर्तम है।

तीसरा प्रश्न:
भगवान, आप प्रेम करने को कहते हैं। प्रेम मैंने भी किया था; हार खाई और घाव अभी भी भरे नहीं हैं। समाज को वह प्रेम भाया नहीं और मेरी प्रेयसी कमजोर थी; वह समाज के सामने झुक गई। मैं उसे क्षमा भी नहीं कर पाता हूं। और फिर भी आप प्रेम करने को कहते हैं?
मैं प्रेम करने को नहीं कहता--मैं प्रेम होने को कहता हूं। करना छोटी बात है, क्षुद्र है। वहां तो हार ही हाथ लगेगी और घाव ही हाथ लगेंगे।
और अच्छा ही हुआ कि समाज ने बाधा डाल दी; नहीं तो अभी मैंने तुमसे जो कहानी कही, वही दशा होती। अब तक रजत-जयंती मना रहे होते। समाज की बड़ी कृपा थी। धन्यवाद दो समाज को। अनुग्रह मानो।
और तुम उस स्त्री को क्षमा नहीं कर पा रहे हो! कैसा यह प्रेम, जो क्षमा भी न कर सके! कैसा यह प्रेम, जो प्रतिशोध से भरा हो! और ये घाव बड़े मूल्यवान घाव नहीं हैं। ये कुछ बहुत भीतर नहीं जाते। ये ऊपर-ऊपर हैं, जैसे चमड़ी छिल गई। चमड़ी से ज्यादा इनकी गहराई नहीं है। ये सब भर जाते हैं। समय भर देता है। इनको लिए बैठे मत रहो।
दोस्त मायूस न हो!
सिलसिले बनते-बिगड़ते ही रहे हैं अक्सर
तेरी पलकों पर सर अश्कों के सितारे कैसे
तुझको गम है तेरी महबूब तुझे मिल न सकी
और जो जीस्त तराशी थी तेरे ख्वाबों ने
आज वो ठोस हकाइक में कहीं टूट गई
तुझको मालूम है मैंने भी मोहब्बत की थी
और अंजामे-मोहब्बत भी है मालूम तुझे
अनगिनत लोग जमाने में रहे हैं नाकाम
तेरी नाकामी नई बात नहीं है दोस्त मेरे
किसने पाई है भला जीस्त की तल्खी से नजात
चार-ओ-नाचार ये जहराब सभी पीते हैं
जां-सुपारी के फरेबिंदा फसानों पे न जा
कौन मरता है मोहब्बत में सभी जीते हैं
वक्त हर जख्म को, हर गम को मिटा देता है
वक्त के साथ ये सदमा भी गुजर जाएगा
और ये बातें जो दोहराई हैं मैंने इस वक्त
तू भी इक रोज इन्हीं बातों को दोहराएगा
दोस्त मायूस न हो!
यह तो समय भर देता है घाव। और जिन घावों को समय भर देता है उनका कोई मूल्य नहीं। घाव तो वे ही मूल्यवान है जिनको शाश्वतता ही भर सके। अभी तुमने वह घाव खाया नहीं और तुम मेरी बात भी नहीं समझ पा रहे हो। तुम समझ न पाओगे, क्योंकि तुम प्रेम का एक अनुभव लिए बैठे हो और तुम समझते हो कि वही अनुभव सारे प्रेम का अर्थ है।
मैंने सुना है, एक नेताजी संग्रहालय देखने गए। वहां मिश्र से लाई गई एक ममी रखी हुई थी। उसके नीचे लिखा था: 3 बी. सी.। गाइड बोला: यह.। नेताजी बोले: मैं जानता हूं। यह धन्नो की लाश है।
गाइड आश्चर्य से बोला: धन्नो की लाश! यह आप कह क्या रहे हैं?
नेताजी बोले: हां भाई, मेरे जिस ट्रक के नीचे आकर वह मरी थी उसका नंबर बी. सी. 3 ही था।
मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं, वह कुछ और है--तुम बता रहे हो धन्नो की लाश, जो तुम्हारे ट्रक के नीचे आने से मर गई। तुम अपनी लगाए हो, मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूं। मगर प्रेम शब्द सुन कर ही तुम्हारे भीतर तुम्हारे अनुभव से अर्थ आ जाते होंगे, तुम्हारे अर्थ खड़े हो जाते होंगे। तुम फिर सोचने लगते होओगे--वह प्रेम जो सफल नहीं हुआ।
यहां जो सफल हो जाते हैं वे भी कहां सफल होते हैं! जरा गौर से तो देखो। यहां सभी असफल होते हैं। असफल जो होते हैं, वे तो होते ही हैं; जो सफल होते हैं वे भी असफल होते हैं। इस जगत के प्रेम काम नहीं आते। इस जगत का कोई संबंध काम नहीं आता। क्योंकि इस जगत के सारे संबंध हम अज्ञान और मूर्च्छा में निर्मित करते हैं, बेहोशी में।
एक और भी प्रेम है, जो जागृति में फलता है। एक और फूल है। मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूं। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि तुम प्रेम करो; मैं कह रहा हूं: ‘तुम प्रेम हो जाओ।’ और यह बड़ी अलग बात है। प्रेम ‘करने में’ दूसरे की जरूरत पड़ती है, ‘प्रेम होने में’ दूसरे का कोई सवाल नहीं। जैसे एकांत में कहीं कोई फूल खिलता है, कोई राह से गुजरे कि न गुजरे, कोई फूल को खिला देखे कि न देखे, क्या फर्क पड़ता है? फूल खिला ही रहता है। फूल अपनी मस्ती में मस्त रहता है। कुछ ऐसा थोड़े ही है कि आर्ज देखने वाले नहीं निकले, तो फूल बड़ा उदास हो जाता है, कुम्हला जाता है; कि आज कोई चित्रकार नहीं आए, कोई फोटोग्राफर नहीं आए, अखबारनवीस नहीं आए, तो फूल एकदम सिर ढांप कर और रोने लगता है। कुछ ऐसा थोड़े ही है कि आज जनता-जनार्दन का आगमन नहीं हुआ, तो आज क्या मुस्कुराना! आज क्या हवाओं में नाचना! आज क्या सुगंध लुटाना। नहीं; फूल तो अपनी मस्ती में वैसा ही होता है; कोई गुजरे तो ठीक, कोई न गुजरे तो ठीक।
किसी ने गालिब को कहा कि आपके काव्य में लोगों को अर्थ नहीं मालूम होता। तो गालिब ने कहा:
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी, न सही।
न तो मुझे प्रशंसा की कोई इच्छा है, न पुरस्कार की कोई आकांक्षा है। अगर मेरे गीतों में कोई अर्थ नहीं है तो न सही।
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी, न सही।
जब किसी के भीतर गीत उठता है तो गाने का मजा है--स्वांतः सुखाय! जब नाच उठता है तो नाचने का मजा है--स्वांतः सुखाय। और जब प्रेम उठता है तो प्रेम लुटाने का मजा है--स्वांतः सुखाय।
मैं तुमसे प्रेम ‘होने’ को कह रहा हूं, ‘करने’ को नहीं। कृत्य वाला प्रेम तो बड़ा छोटा प्रेम है। और जब तक तुम प्रेम नहीं हो, तुम प्रेम करोगे कैसे? तुम्हारा प्रेम धोखा होगा, झूठा होगा, अभिनय होगा, पाखंड होगा, दिखावा होगा।
प्रेम करने के पहले प्रेम हो जाना जरूरी है। सुगंध देने के पहले सुगंध हो जाना जरूरी है। तुम वही तो दे सकोगे जो तुम्हारे भीतर घट गया है।
तो मैंने तुमसे कुछ और कहा। मैं रोज ही प्रेम के लिए कह रहा हूं, क्योंकि मेरे लिए प्रेम परमात्मा है। लेकिन यह प्रेम तुम सदा खयाल रखना, भ्रांति न कर लेना, भूल-चूक न कर लेना, तुम अपने प्रेम से इसे मत जोड़ लेना। नहीं तो तुम अर्थ का अनर्थ कर दोगे। तुम कुछ का कुछ समझ लोगे। और बजाय इसके कि मुझसे तुम्हें मार्ग मिलता, तुम कुमार्ग खोज लोगे।
तुमने कहा कि मैंने प्रेम किया और अभी तक मैं क्षमा नहीं कर पा रहा हूं। प्रेम में क्षमा तो आना ही चाहिए। प्रेम के पीछे क्षमा तो ऐसे ही चलती है, जैसे तुम्हारे पीछे छाया चलती है। प्रेम और क्षमा न कर सके, तो वह प्रेम नहीं था, कुछ और रहा होगा। तुम अधिकार करना चाहते थे किसी स्त्री पर। तुम मालिक होना चाहते थे किसी स्त्री के। तुम किसी स्त्री की गर्दन पर अपने हाथ चाहते थे। तुम किसी आकाश के पक्षी को अपने पिंजरे में बंद कर लेना चाहते थे। तुम्हारी वह मनोवांछा पूरी नहीं हुई। तुम किसी के पंख काटना चाहते थे, नहीं काट पाए, तुम तड़प रहे हो। तुम किसी को जंजीरें पहना देना चाहते थे, नहीं पहना पाए। तुम्हारी मालकियत की एक यात्रा टूट गई। तुम्हारा एक अभियान बिखर गया। तुम किसी पर आक्रमण करने निकले थे, इसलिए तुम हार शब्द का उपयोग कर रहे हो। तुम कहते हो: लेकिन मैं हार गया।
प्रेम में कभी कोई हारा? प्रेम में तो जीत ही जीत है। प्रेम में हार होती ही नहीं। तुमने प्रेम किया, बात पूरी हो गई। प्रतिकार की आकांक्षा प्रेम में होती नहीं। प्रतिफल की आकांक्षा प्रेम में नहीं होती। तुमने प्रेम नहीं किया, तुमने कुछ और किया। तुम चाहते थे कि वह स्त्री भी तुम्हें प्रेम करे। तुम चाहते थे कि तुम्हें प्रेम का प्रतिफल मिले। तुम उत्तर चाहते थे, उत्तर नहीं मिल पाया। तुमने निवेदन किया और तुम्हारा निवेदन आकाश में खो गया। तुम नाराज हो। तुम्हारी अवहेलना हुई है। तुम्हारी उपेक्षा हुई है।
ऐसा आदमी प्रार्थना तो कर ही नहीं पाएगा, क्योंकि प्रार्थना में यही तो एक खास बात है: वही प्रार्थना कर सकता है, जो प्रत्युत्तर न मांगता हो। क्योंकि तुम प्रार्थना करोगे और आकाश से कोई उत्तर थोड़े ही आएगा। तुम कहोगे: हे प्रभु! और वहां से कोई नहीं बोलेगा, कि हां जी, कहिए क्या आज्ञा है? कोई उत्तर कभी न आएगा। अगर तुमने उत्तर की आकांक्षा रखी तो प्रार्थना असंभव हो जाएगी।
प्रार्थना वही कर सकता है जो उत्तर मांगता ही नहीं, जो कहता है: मुझे तो प्रार्थना करने में ही उत्तर मिल गया। मेरी आंखें गीली हो गईं, और क्या चाहिए? मेरा सिर झुक गया, और क्या चाहिए? मेरा हृदय गदगद हुआ, और क्या चाहिए? मुझे कोई उत्तर नहीं चाहिए।
आकाश से कोई उत्तर आते भी नहीं। और जितने उत्तरों की तुमने बातें सुनी हैं, सब कहानियां हैं, और बेईमानों ने गढ़ी हैं। जब तुम सुनते हो, कोई आदमी ने प्रार्थना की और भगवान बोला, वह सिर्फ कहानी है। भगवान कभी नहीं बोला है। मगर आदमी चाहता है: बोले। वस्तुतः तो नहीं बुलवा पाता, तो कहानियों में बुलवा लेता है। कहानियां परिपूरक हैं। सोच लेता है कि चलो कहानी में तो कुछ नहीं कर सकता, बेबस है, बोलना ही पड़ेगा। जो बुलवाना है वही बुलवा लेता है।
आकाश चुप है। अस्तित्व चुप है। वहां परिपूर्ण सन्नाटा है। तुमने जो प्रार्थना की, वह गई, अनंत में खो गई। वह अनंत के साथ एक हो गई। उसका कोई उत्तर कभी नहीं आएगा। मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका कोई लाभ नहीं है। लाभ तो उसके करने के भीतर ही है। लाभ तो उसके होने के पहले ही है। वह तुम जो झुके.।
सूफी फकीर अलहिल्लाज से किसी ने पूछा कि तू इतनी प्रार्थना करता है, इतना परमात्मा को पुकारता है, तुझे कभी उत्तर मिलता है या नहीं? उसने कहा: तुम भी पागल हुए हो! उत्तर चाहता कौन है? मैं उसे कष्ट देना चाहता हूं? उत्तर तो मेरे प्रश्न के पहले मुझे मिल गया है। प्रार्थना तो मेरा धन्यवाद है; मेरी मांग नहीं, मेरी वासना नहीं। उससे मुझे कुछ चाहिए थोड़े ही! उसने इतना दिया मेरे मांगने के पहले, इसका धन्यवाद है। उसके प्रसाद का स्वीकार है। दे तो वह चुका है पहले ही, मेरे मांगने के पहले। उससे मुझे कुछ चाहिए नहीं। कोई उत्तर भी नहीं चाहिए।
क्या तुम सोचते हो, तुम्हारी प्रार्थना परमात्मा के हृदय को बदलने के लिए है? अक्सर लोग यही सोचते हैं। जब तुम मंदिर में जाते हो और कहते हो हे प्रभु, नौकरी नहीं मिलती, कि पत्नी बीमार है, कि बेटा नालायक हुआ जा रहा है, कुछ करो, तो तुम क्या कर रहे हो? तुम यह कर रहे हो कि प्रार्थना से परमात्मा का हृदय बदलने की कोशिश कर रहे हो। नहीं; यह प्रार्थना नहीं है। वस्तुतः प्रार्थना में प्रार्थना करने वाले का हृदय बदलता है; परमात्मा का हृदय बदलने का कोई सवाल नहीं है। प्रार्थना करने में ही हृदय बदल जाता है।
विवेकानंद के जीवन में उल्लेख है। विवेकानंद के पिता मरे। पिता मौजी आदमी थे। मौजी रहे होंगे, तभी विवेकानंद जैसा बेटा पैदा हो सका। कुछ बचाया नहीं, जिंदगी भर लुटाते रहे। कमाया बहुत, मगर लुटाते रहे। जब मरे तो कर्ज छोड़ कर मरे। जो कुछ था वह भी कर्ज में चला गया। घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने को भी दो रोटी भी जुटाना मुश्किल। विवेकानंद अपनी मां को यह कह कर चले जाते कि आज मुझे किसी के घर निमंत्रण मिला है और रास्तों पर भूखे घूमते रहते। लौट कर आते हाथ फेरते हुए, डकार लेते हुए। कहीं कोई मित्र ने निमंत्रण दिया नहीं है। मां को बताने के लिए कि पेट भर गया है, तू फिकर मत कर, जो थोड़ा बहुत घर में है, तू अब भोजन कर ले। क्योंकि वह इतना थोड़ा होता कि या तो विवेकानंद कर लें या मां कर ले। मस्त तगड़े आदमी थे, काफी भोजन चाहिए पड़ता। मां यह सोच कर कि बेटा भोजन कर आया है, भोजन कर लेती जो भी रूखा-सुखा होता।
रामकृष्ण को खबर लगी तो रामकृष्ण ने एक दिन विवेकानंद को कहा कि तू पागल है! तू जाकर मंदिर में काली को क्यों नहीं कहता? यहां-वहां क्या भटक रहा है? एक दफा जा कह दे, सब मामला हल हो जाएगा। तू जा प्रार्थना कर।
अब रामकृष्ण कहें तो विवेकानंद इनकार कैसे करें? गए। घंटा भर लग गया। बाहर रामकृष्ण बैठे हैं चबूतरे पर, राह देख रहे हैं। जब निकले विवेकानंद, गदगद आंखों से आंसुओं की धार बह रही है, मस्ती की तरंग छाई हुई। तीन दिन के भूखे हैं, यह तो भूल ही गए हैं। बड़े आनंदमग्न हैं। आकर रामकृष्ण के चरणों में गिर पड़े।
रामकृष्ण ने कहा: दूसरी बात पीछे होगी, तूने कह दिया न? तूने प्रार्थना कर ली न?
विवेकानंद ने कहा: अरे, मैं तो भूल ही गया! मैं प्रार्थना में ऐसा मस्त हो गया!
रामकृष्ण ने कहा: फिर से जा। ऐसा तीन बार हुआ और तीसरी बार विवेकानंद बाहर आए और रामकृष्ण को देखा और कहा कि माफ करें, यह शायद हो नहीं सकेगा। जैसे ही मैं वहां जाता हूं, प्रार्थना ऐसा घेर लेती है कि छोटी-छोटी बातें करने का सवाल ही नहीं उठता। और छोटी-छोटी बातें करूं, यह बात बेहूदी लगती है, अभद्र लगती है। यह मुझसे नहीं हो सकेगा रामकृष्ण। परमहंसदेव, मुझे क्षमा कर दें! यह मुझसे नहीं हो सकेगा।
रामकृष्ण ने छाती से लगा लिया विवेकानंद को और कहा: इसीलिए तीन बार भेजा, मैं देखना चाहता था, क्या प्रार्थना में तू कुछ मांग सकता है अब भी या नहीं? अगर नहीं मांग सकता तो तू प्रार्थना की कला सीख गया। अब मैं निश्चिंत हूं। तुझे प्रार्थना आ गई। प्रार्थना मांग नहीं है, हालांकि प्रार्थना शब्द का ही अर्थ हमने मांगना कर लिया है। मांगने वाले को प्रार्थी कहते हैं। वह शब्द का अर्थ ही हमने भ्रष्ट कर लिया।
प्रार्थी का अर्थ मांगने वाला नहीं, प्रार्थी का अर्थ झुकने वाला है। प्रार्थना का अर्थ मांगना नहीं है, प्रार्थना का अर्थ अहोभाव, धन्यवाद।
तुमने अगर प्रेम में मांगा कुछ तो तुम प्रेम से भी चूक गए। और अब तुम मेरे पास आए हो। और अगर तुमने उस प्रेम का अनुभव अभी भी अपने भीतर संजो कर रखा है, तो तुम प्रार्थना से भी चूकोगे। तुम कहते हो: मैं क्षमा नहीं कर पाता। तुमने प्रेम किया था। यह तुम्हारी तरफ से बात पूरी हो गई। दूसरी तरफ से प्रेम का उत्तर आया या नहीं आया, समाज ने बाधा दी या क्या हुआ--इससे क्या लेना-देना है? क्या तुमने प्रेम किया, इतने से ही तुम अनुगृहीत नहीं हो गए? अहोभाव रखो!
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
मुझसे बिखरे हुए गेसू नहीं देखे जाते
सुर्ख आंखों की कसम, कांपती पलकों की कसम
थरथराते हुए आंसू नहीं देखे जाते
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
छूट जाने दो जो दामाने-वफा छूट गया
क्यूं यह नाजीदा-खिरामो ये पशीमां-नजरी
तुमने तोड़ा तो नहीं रिश्तए-दिल टूट गया
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
मेरी आहों से ये रुखसार न कुम्हला जाएं
ढूंढती होंगी तुम्हें रस में नहाई हुई रातें
जाओ कलियां न कहीं सेज की मुरझा जाएं
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
मैं इस उजड़े हुए पहलू में बिठा लूं न कहीं
लबे-शीरीं का नमक आरिजे-नमकीं की मिठास
अपने तरसे हुए ओंठों पे चुरा लूं न कहीं
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
तुमको यह रस्म भी दुनिया न निभाने देगी
बढ़ के दामन से लिपट जाएगी यूं ये ताजा बहार
मेरे आगोश-तसव्वुर में भी आने न देगी।
प्रेमी तो हर हाल राजी हो जाता है। वह कहता है:
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
मेरी कल्पना की गोद में भी मत आया करो। असली गोद में आना तो नहीं हो सका, तुम मेरी कल्पना की गोद में भी मत आया करो।
अब तुम आगोशे-तसव्वुर में भी आया न करो
मुझसे बिखरे हुए गेसू नहीं देखे जाते
ये तुम्हारे बिखरे हुए बाल मुझसे नहीं देखे जाते।
सुर्ख आंखों की कसम, कांपती पलकों की कसम
थरथराते हुए आंसू नहीं देखे जाते
प्रेमी क्षमा करने को सदा तैयार है; न केवल क्षमा करने को, बल्कि प्रेमी अपने को विदा कर लेने को भी तैयार है। अगर उससे अड़चन होने वाली है, अगर कहीं उससे पीड़ा होने वाली है तो वह चुपचाप सरक जाएगा, हट जाएगा। वह राह छोड़ देगा। और तुम बैठे हो घाव को सम्हाले हुए! और तुम घाव को कुरेद रहे हो! तुम शायद उसे भरने भी नहीं देते। शायद तुम अब घाव के प्रेम में पड़ गए हो।
ऐसा अक्सर हो जाता है, लोग बीमारियों के प्रेम में पड़ जाते हैं। फिर बीमारियों को पकड़ लेते हैं। अब शायद यह घाव ही तुम्हारा एकमात्र संगी-साथी है। अब तुम एकांत में बैठ कर इसी को कुरेदते रहते हो, इसी को भरने नहीं देते।
सम्हलो! प्रेम से कुछ तो पाठ लो। यह एक अवसर था। प्रेम तुमने किया, प्रतिफल नहीं मिला।--इससे यह समझो कि प्रेम में प्रतिफल मांगने में ही भूल है, इससे घाव लगते हैं। इससे यह सीख लो और यह सीख बहुमूल्य हो जाएगी। और अब ऐसा प्रेम करो, जिसमें प्रतिफल की आकांक्षा न हो। अब ऐसा प्रेम करो जो मांगे ही नहीं--जो दे, चुपचाप दे! जो शोरगुल न मचाए! जो आग्रह से भरा हुआ न हो! जिसका कोई आग्रह ही न हो! और तब तुम पाओगे तुम्हारे जीवन में एक नई खुशबू, एक नई सुवास, एक नई सुबह होने लगी है।
प्रेम अपना प्रतिफल आप है। प्रेम बनो। प्रेम करने की बात ही नहीं है। प्रेम तुम्हारे अंतर की दशा हो। संबंध नहीं--अंतर्दशा।

आखिरी प्रश्न:
भगवान, सैद्धांतिक रूप से सब-कुछ समझ आते हुए भी चीजें व्यवहार में क्यों नहीं आ पातीं। कृपया समझाएं।
मैं समझा दूंगा, फिर तुम सैद्धांतिक रूप से समझ लोगे, फिर व्यवहार में नहीं आएंगी। यह तो दुष्चक्र हो गया। उससे सार क्या होगा?
सैद्धांतिक रूप से चीजें समझ में आ जाती हैं, फिर भी व्यवहार में नहीं आतीं--इससे एक बात समझो कि सैद्धांतिक समझ कोई समझ ही नहीं है। समझ तो वही है जो व्यवहार में आ जाए। नहीं तो समझ का धोखा है। सैद्धांतिक समझ बिलकुल धोखे से भरी समझ है। स्वभावतः मैं जो शब्द बोल रहा हूं, सीधे-साधे हैं। ये तुम्हारी समझ में आ जाते हैं, मगर शब्दों के भीतर जो छिपा है, वह शब्दों से बहुत बड़ा है। वह चूक जाता है। तुम शब्दों की खोल तो इकट्ठी कर लेते हो, अर्थ का गूदा चूक जाता है। फिर उस खोल से क्या होगा? फिर उस खोल से कुछ सार नहीं।
और तुम्हारे मन में यह भी सवाल है कि जब सैद्धांतिक रूप से समझ में आ गया तो व्यवहार में कैसे लाऊं? सच तो यह है कि जब समझ में आता है तो व्यवहार में लाना नहीं होता, व्यवहार में आने लगता है, अगर व्यवहार में लाना पड़े तो भी मैं तुमसे कहूंगा कि समझ में नहीं आया। समझ में न आने वाले आदमी को ही व्यवहार में लाने की चेष्टा करनी पड़ती है। जिसको समझ में आ गया, बात खत्म हो गई। व्यवहार में लाने की चेष्टा का सवाल ही नहीं है। अगर तुम्हें समझ में आ गया कि सिगरेट पीने में जहर है, तो तुम्हारे हाथ में आधी जली सिगरेट आधी जली ही रह जाएगी, वहीं से गिर जाएगी, बात खत्म हो गई। अब तुम यह थोड़े ही कहोगे कि अब अभ्यास करेंगे, अब सिगरेट छोड़ने का नियम लेंगे, अब व्रत करेंगे, अभी दस पीते थे, फिर नौ पीएंगे, फिर आठ पीएंगे, फिर सात पीएंगे, ऐसे धीरे-धीरे घटाएंगे। ऐसा वर्षों में अभ्यास किया है पीने का, अब वर्षों लगेंगे घटाने में। अगर इस तरह तुमने किया तो एक बात साफ है कि तुम्हें समझ में नहीं आई बात।
अगर तुम्हारे घर में आग लगी है तो तुम बाहर निकलने का अभ्यास करते हो? तुम कहते हो, निकलते-निकलते निकलेंगे? और कोई एकदम से थोड़े ही निकल जाएं; पहले योगासन करेंगे, पहले शीर्षासन करेंगे, शास्त्र पढ़ेंगे, सत्संग करेंगे, श्रवण-मनन, निदिध्यासन, फिर निकलते-निकलते निकलेंगे। अब इस घर में रहते भी कितना समय हो गया है, एकदम से थोड़े ही निकल जाएं। लगी है आग लगी रहे। समझ में तो आ गई बात कि आग लगी है, लेकिन अब इंतजाम तो करें निकलने का।
तुम ऐसा करोगे? तुम ऐसा कहोगे? घर में आग लगी होगी तो तुम न तो शास्त्र में उलट कर देखोगे कि घर से निकलने का रास्ता क्या है, न गुरु की तलाश करोगे, न किसी से पूछोगे। झपट्टा मारोगे और बाहर हो जाओगे। अगर सामने का दरवाजा जल रहा होगा तो खिड़की से कूद पड़ोगे। लाज-संकोच भी न करोगे। अगर नंग-धड़ंग स्नान कर रहे हो तो वैसे ही भाग कर बाहर निकल आओगे। फिर यह भी न सोचोगे कि लोग कहीं जैन मुनि न समझ लें, कोई झंझट न खड़ी हो जाए! वैसे ही निकल भागोगे। फिर कहां लोक-व्यवहार, फिर कैसी लोक-लज्जा! फुर्सत कहां! और कोई तुम्हें दोष भी न देगा। कोई यह भी नहीं कहेगा, कि अरे, कम से कम तौलिया तो लपेट लेते। मगर जब घर में आग लगी हो तो तौलिया लपेटने के लिए भी कोई दोष नहीं देगा।
जब चीजें समझ में आती हैं तो तत्क्षण परिणाम होता है। तत्क्षण मैं कह रहा हूं। एक क्षण भी नहीं खोता। एक बात दिख जाती है, वहीं बात समाप्त हो जाती है। व्यवहार में लानी नहीं पड़ती। व्यवहार में लाने पड़ने का तो एक ही अर्थ है: तुम्हारी समझ में नहीं आई, तुम समझ का धोखा खा गए। भीतर-भीतर कुछ और समझते रहे, ऊपर-ऊपर कुछ और समझ लिया। तुम्हारे भीतर दोहरी समझ हो गई। ऊपर-ऊपर तुमने मान लिया कि सिगरेट पीना बुरा है, लेकिन भीतर-भीतर तुम जानते रहे कि सिगरेट पीने में कुछ भलाई है; या भीतर कारण मौजूद हैं, जो कहते हैं कि भला बुराई हो, इतनी बुराई नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन को किसी ने कहा कि तू सिगरेट पीना बंद कर दे, नहीं तो जल्दी मर जाएगा। वैज्ञानिक कहते हैं, एक साल उम्र कम हो जाती है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा: सत्तर साल की जगह उनहत्तर साल जी लेंगे, मगर एक साल ज्यादा जीने के लिए पूरी जिंदगी सिगरेट का मजा लिए बिना जीना, यह मेरी समझ में नहीं आता।
यह दोहरी बात हो गई। बात तो मानता है कि ठीक कहते हैं, वैज्ञानिक कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे कि एक साल उम्र कम हो जाएगी।
एक डॉक्टर ने उससे कहा--क्योंकि बीमारी उसकी बढ़ती गई, बढ़ती गई--कि भाई तू देख, शराब पीना बंद कर, सिगरेट पीना बंद कर, अब उम्र भी तेरी हुई, अब स्त्रियों के पीछे दौड़-धूप बंद कर; नहीं तो जल्दी मर जाएगा।
मुल्ला ने कहा: आपकी बातें सब ठीक हैं, मगर अगर ये सब मैं बंद कर दूं तो फिर जिंदा रहने का सार क्या? फिर जिंदा किसलिए रहना, यह भी मुझे बता दें। सिगरेट भी न पीऊं, शराब भी न पीऊं, स्त्रियों का पीछा भी न करूं, तो बैठे बुद्धू की तरह! फिर जीकर क्या करेंगे?
और ऐसा आदमियों के साथ ही नहीं है। मैंने एक कहानी पढ़ी है। एक आदमी मरा। ईसाई रहा होगा। जब पहुंचा स्वर्ग के द्वार पर तो संत पीटर ने उसका स्वागत किया। उस आदमी से पूछा कि भाई तेरे कर्मों का लेखा-जोखा दे-दे, खाता-बही देखना पड़ेगा। उसने कहा: बुरे कर्म मैंने कोई किए ही नहीं।
संत पीटर ने पूछा: स्त्रियों के पीछे भाग-दौड़ की?
उसने कहा: कभी नहीं! मैं सदा का ब्रह्मचारी--बाल ब्रह्मचारी! इस झंझट में कभी पड़ा नहीं।
शराब पी?
उसने कहा: कभी नहीं? तुमने मुझे पागल समझा है? मैं जहर पीऊं?
सिगरेट पी? जुआ खेला?
हर चीज में वह कहता गया: नहीं, नहीं, नहीं। आखिर संत पीटर ने अपना सिर पीट लिया और कहा: तो फिर इतनी देर क्यों लगाई? क्या करता रहा?
आदमियों की तो बात छोड़ दो, संत पीटर भी यह पूछते हैं कि फिर इतनी देर क्या करता रहा? आखिर इसका भी तो कोई उत्तर होना चाहिए, करता क्या था इतनी देर तक?
अगर सब पाप छोड़ दो तो करने योग्य बचता क्या है? ऊपर से तुम समझ लो भला कि शराब पीना बुरा है, सिगरेट पीना बुरा, यह बुरा, वह बुरा; लेकिन भीतर तुम जानते हो कि फिर करेंगे क्या? फिर जिंदगी में सार क्या? यही तो सार है। इसी में तो थोड़ा अपने को उलझाए हैं। फिर उलझाएंगे कहां? फिर जिंदगी बहुत बोझ-रूप हो जाएगी। फिर चिंता ही चिंता पकड़ेगी।
क्या तुम्हें पता है कि अगर तुम जिन चीजों को छोड़ना चाहते हो, एकदम छोड़ दो, तो तुम एकदम खाली हो जाओगे? अव्यस्त हो जाओगे। अचानक सन्नाटा मालूम पड़ेगा। समझ में ही न आएगा, अब क्या करें, क्या न करें? न सिनेमा जाना है, न क्लब जाना है, न नाचघर जाना है, न घुड़-दौड़ देखने जाना है--अब करना क्या है? न ताश खेलना, न शतरंज खेलना--अब करना क्या है? न गपशप करनी, न निंदा करनी, न एक-दूसरे को गाली-गलौज करनी--अब करना क्या है? जरा सोचो! तुम सब काट दो, जिसको लोग कहते हैं बुरा है, फिर तुम्हारे पास बच क्या रहता है? फिर एक ही बुराई करने को बची रहेगी--आत्मघात कर लो? और क्या करो? कूद जाओ किसी पहाड़ से जाकर, कि ट्रेन के नीचे सो जाओ।
तो ऊपर-ऊपर से तुम समझ लेते हो कि हां, बुरा होगा, आप कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे, मगर भीतर तुम्हारे बड़े न्यस्त स्वार्थ हैं।
बौद्धिक समझ, सैद्धांतिक समझ काम न आएगी। और तरह की समझ चाहिए, जिसको आंतरिक समझ कहते हैं, हार्दिक समझ कहते हैं। समग्र! पूरी की पूरी! जब मैं तुमसे कुछ कह रहा हूं, तो एक बात खयाल रखो: मैं तुम्हारा आचरण बदलने में उत्सुक नहीं हूं। जरा भी उत्सुक नहीं हूं। मैं तुम्हारी चेतना बदलने में उत्सुक हूं, आचरण बदलने में उत्सुक नहीं हूं। लेकिन तुम अब तक जितने लोगों के पास गए होओगे, वे सब तुम्हारा आचरण बदलने में उत्सुक हैं। वे तुम्हें समझाते इसलिए हैं, ताकि तुम व्यवहार में लाओ। और मैं तुम्हें इसलिए समझा रहा हूं, ताकि तुम जागो, व्यवहार इत्यादि का सवाल ही नहीं है। अगर जाग गए तो तुम्हारे जीवन में क्रांति अपने से घट जाएगी।
इतना मैं जानता हूं कि जागा हुआ आदमी बैठ कर सिगरेट नहीं पीएगा। क्यों? क्योंकि यह बात बड़ी मूढ़ता की है कि धुआं भीतर ले गए, बाहर निकाला; धुआं भीतर ले गए, बाहर निकाला। जागा हुआ आदमी शराब नहीं पीएगा, नहीं कि छोड़ देगा, नहीं कि कसम खाएगा मंदिर में जाकर। वे तो सोए हुए आदमी के लक्षण हैं। जागा हुआ आदमी शराब नहीं पीएगा, क्योंकि अब और बड़ी शराब उसके भीतर आनी शुरू हो गई। अब इस छोटी शराब में कौन पड़ता है! परमात्मा को पीएगा। रसौ वै सः! अब उसका रस पीएगा। अब परम रस बहने लगा।
जागा हुआ आदमी छोटी-छोटी जिन चीजों में तुम उलझे हो, नहीं उलझेगा। क्योंकि उसे उलझने में अब कोई रस ही नहीं रहा। अब तो खाली होने में मजा आने लगा, अव्यस्त होने में, अनआकुपाइड होने में मजा आने लगा। जब खाली हो जाता है तब ऐसा आनंद बहता है! जब शांत बैठ जाता है, तभी तार जुड़ जाते हैं। तभी स्वर परमात्मा के साथ समवेत हो जाते हैं, एक लय हो जाते हैं। परमात्मा के साथ नाच शुरू हो जाता है। रास रच जाता है। अब तो जब एकांत होता है, जब अकेला होता है, जब खाली होता है, तभी जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घड़ी होती है। अब तुम उसे कैसे कहो कि आओ भाई ताश खेलो। समय तो काटना है, चलो ताश खेलें।
मैं वर्षों तक यात्रा करता था ट्रेनों में। अक्सर ऐसा हो जाता था कि मेरे कंपार्टमेंट में मैं होता, एक आदमी और होता। वह आदमी बातचीत करने की कोशिश करता। स्वभावतः अब बैठे-बैठे क्या करना है। कभी चौबीस घंटे की यात्रा होती, कभी छत्तीस घंटे की भी होती, और ज्यादा भी होती। वह बातचीत करता। भरने का उपाय। मैं हां-हूं में उत्तर देता। वह थोड़ी देर में परेशान हो जाता। वह कहता: आप मुझमें उत्सुक नहीं मालूम होते। अब अकेले हम दोनों ही हैं तो कुछ बात करें।
मैं उससे कहता: अकेले होने में मुझे बहुत मजा है। वह कहता: समय कैसे कटेगा? मैंने कहा: समय काटना किसको है! समय काटने की जरूरत क्या है? अजीब आदमी हो! एक तरफ कहते हो: समय कैसे कटे और दूसरी तरफ कहते हो: जिंदगी लंबी कैसे हो! अजीब लोग हैं! जिंदगी मिले तो काटें कैसे और जिंदगी न मिले तो लंबी कैसे हो!
अब अमरीका ने यही झंझट कर ली है, जिंदगी को लंबी कर ली, अब इसको काटें कैसे! तो अब नये-नये मनोरंजन के उपाय खोजो, कि जिंदगी कैसे कटे, समय कैसे कटे? ताश के पत्ते बनाओ, उनमें झूठे राजा-रानी बनाओ, अब उनका खेल करो, कि शतरंज बिछाओ। लोग ताश निकाल लेते कि चलिए आइए ताश खेलें। मैं कहता कि मैं बड़े मजे में हूं, आप अकेले ही खेलें। शतरंज निकाल लेते लोग कभी-कभी कि आइए। वे समझते कि मुझ पर बड़ा उपकार कर रहे हैं।
आदमी क्यों इन व्यर्थ की बातों में व्यस्त होना चाहता है? क्योंकि अव्यस्त होने में अभी उसे रस नहीं आया। अभी अव्यस्तता का उसने स्वाद नहीं चखा, और अव्यस्तता ही ध्यान है।
तो मैं तुमसे आचरण बदलने को कह भी नहीं रहा। मगर तुम्हारी धारणाएं हैं। तुम जाते हो साधु-संतों के पास तो वहां आचरण ही बदलने का जोर है कि कुछ न कुछ आचरण बदलो। कुछ व्रत लेकर जाओ।
जैन मुनियों के पास जाते हैं लोग तो वे कहते हैं: कुछ व्रत लो। अब आए हो सत्संग, तो व्रत ले कर जाओ। अब जरा संकोच होता है भीड़-भाड़ के सामने, अब व्रत न लो, यह भी अच्छा नहीं लगता। तो कुछ न कुछ व्रत ले लेते हैं कि ठीक है, सप्ताह में एक दिन नमक न खाएंगे, कि एक दिन घी न खाएंगे, कि एक महीने में उपवास कर लेंगे। कोई न कोई व्रत ले लेते हैं।
नरेंद्र के पिता ने ठीक व्रत लिया। नरेंद्र के पिता मस्त आदमी हैं। वे गए जैन यात्रा तीर्थयात्रा को। वहां किसी मुनि के दर्शन किए। जैन मुनि तो कहते ही हैं कि भाई कुछ व्रत लो। आ गए तीर्थ तो कुछ कसम खाकर जाओ। भीड़-भाड़ थी। वे दर्शन को झुक गए। मुनि आए थे तो उनके दर्शन किए। मुनि ने कहा: कुछ व्रत लो। वे मस्त आदमी हैं। उन्होंने कहा: अच्छी बात है। अभी तक बीड़ी-सिगरेट नहीं पीता था, अब से पीऊंगा।
लोग समझते हैं उनको पागल, लेकिन मैं समझता हूं कि वे आदमी बड़े काम के हैं। मुनि भी बहुत चौंके कि यह भी कोई व्रत हुआ!
उन्होंने कहा: यह क्या कह रहे हो? होश की बातें कर रहे हो?
उन्होंने कहा: भाई! छोड़ने के व्रत तो मुझसे पलते नहीं। वे मैं कई ले चुका पहले। वे टूट-टूट जाते हैं। अब यह एक ऐसा व्रत ले रहा हूं जो कि सच में पाल सकूंगा।
तब से वे बीड़ी-सिगरेट पीते हैं। व्रत ले लिया तो अब करना ही पड़ेगा।
अब ध्यान रखना, यह पाप मुनि को ही लगेगा। ये नरक जाने वाले नहीं, मगर मुनि महाराज गए।
तुम मुझे नरक मत खींचो। मैं तुम्हें कोई कसम नहीं दिलवाना चाहता। तुम कुछ छोड़ो, कुछ पकड़ो, मेरा आग्रह नहीं है। मेरी उत्सुकता नहीं है। मैं तुम्हें आंख देना चाहता हूं, आचरण नहीं। तुम्हें दिखाई पड़ने लगे। तुम्हारे सामने सब चीजें खोल कर रख देता हूं। तुम जल्दी आचरण की सोचो ही मत। मगर तुम वहां बैठे हो, यही सोच रहे हो, हिसाब लगा रहे हो--इसमें से कौन सी बात करेंगे, कौन सी बात कर सकूंगा, यह करूं कि वह करूं? यह हो पाएगी कि नहीं हो पाएगी? इसी गणित्री में मैं जो समझा रहा हूं वह तुम समझ ही नहीं पा रहे हो। तो पीछे से तुम को लगता है कि सैद्धांतिक रूप से सब-कुछ समझ में आ जाता है और व्यवहार में कुछ भी नहीं आता।
यहां व्यवहार की बात ही मत उठाओ। यहां तो मेरे पास जो मैं तुमसे कह रहा हूं, यह फिकर ही छोड़ दो कि इसको जीवन में उतारना है। इतनी चिंता भी समझने में बाधा बन जाएगी। तुम तो आनंद लो इसे समझने का। मेरे साथ मस्त होओ। मेरे साथ डोलो। मेरे साथ उठो-बैठो। चीजें साफ होने दो। रोशनी सघन होने दो। तुम अचानक पाओगे कि जितनी-जितनी गहराई से कोई बात समझ में आती है, उतना ही उतना अपने आप आचरण हो जाता है। तुम चौंकोगे कि अरे! यह मेरा आचरण कैसे बदलने लगा! मैं रूपांतरित कैसे होने लगा! क्योंकि मैंने कोई चेष्टा नहीं की है रूपांतरित होने की।
रूपांतरित होने की चेष्टा से जो रूपांतरण होता है वह ऊपर-ऊपर होता है, थोथा होता है। थोपा हुआ होता है, इसलिए थोथा होता है। एक और रूपांतरण है जो भीतर से आता है, प्रबल वेग से आता है--और सारे जीवन को रोशन कर जाता है! सारे जीवन को नये प्रकाश से भर जाता है!
अंतस बदले तो आचरण अपने से बदलता है।
ध्यान करो। ध्यान में डूबो। प्रेम करो। प्रेम बनो। शेष सब अपने से होगा।
हरि बोलौ हरि बोल!

आज इतना ही।

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