SUNDERDAS

Hari Bolo Hari Bol (हरि बोलो हरि बोल) 04

Fourth Discourse from the series of 10 discourses - Hari Bolo Hari Bol (हरि बोलो हरि बोल) by Osho. These discourses were given during JUN 01-10 1978.
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पहला प्रश्न:
भगवान, मनुष्य की वस्तुतः अंतिम खोज क्या है?
अपनी ही खोज, अपने से ही पहचान। मनुष्य अकेला है सृष्टि में जिसे स्व-बोध है, जिसे इस बात का होश है कि मैं हूं। पशु हैं, पक्षी हैं, वृक्ष हैं--हैं तो जरूर, लेकिन अपने होने का उन्हें कोई बोध नहीं। होने का बोध नहीं है, इसलिए दूसरा प्रश्न असंभव है उठना कि मैं कौन हूं! मनुष्य अकेला है जिसे इस बात का बोध है कि मैं हूं। अनिवार्यरूपेण दूसरा प्रश्न उठेगा कि मैं हूं कौन? हूं सच, पर कौन हूं? और जिसके जीवन में यह दूसरा प्रश्न नहीं उठा, वह पशु तो नहीं है, मनुष्य भी नहीं है। कहीं बीच में अटका रह गया--घर का न घाट का। उसके जीवन में पशु की शांति भी नहीं होगी और उसके जीवन में परमात्मा की शांति भी नहीं होगी। वैसा आदमी बीच में त्रिशंकु की तरह अटका, सदा अशांत होगा।
पशु शांत हैं, चिंतित नहीं हैं, बैचेन नहीं हैं। चिंता और बेचैनी के लिए जितना बोध चाहिए, उतना बोध नहीं है। मूर्च्छा में जीए जाते हैं, बेहोशी में जीए जाते हैं। एक तरह की शांति है, एक तरह का सन्नाटा है। एक तरह की मस्ती है--मूर्च्छित है; सुंदर है फिर भी।
इसलिए प्रकृति के निकट जाओ, सौंदर्य की अनुभूति होती है। प्रकृति के पास आओ, सब शांत हो जाता है। मनुष्य के पास आओ, बैचेनी बढ़ जाती है। आदमी की भीड़ में खड़े हो जाओ, थक जाते हो। कुछ न करो तो थक जाते हो।
भीड़ से घर लौट कर बहुत बार देखा है या नहीं? कुछ गंवा कर लौटते हो। जैसे कुछ छीन लिया गया। जैसे लुट गए। जैसे विश्राम की जरूरत आ गई है। थके-मांदे, टूटे हुए! आदमी इतना बैचेन है कि उसकी बैचेनी की तरंगें तुम्हारे चित्त को भी तरंगित कर जाती हैं। और चारों तरफ भीड़ हो बेचैन लोगों की तो कैसे अपने को बचा कर आ सकोगे?
महावीर या बुद्ध समाज को छोड़ कर जंगल चले गए थे, उसके पीछे और कोई कारण नहीं था--अशांत लोगों की भीड़ में, बीमार लोगों की भीड़ में, विक्षिप्त लोगों की भीड़ में, सार क्या है? जंगल में वृक्षों से दोस्ती बना ली, पशु-पक्षियों से नाता जोड़ा, आदमी से नाता तोड़ा। जरा सोचो, आदमी का कितना बड़ा अपमान हुआ है उसमें! खयाल करो, पशु-पक्षी जीत गए तुमसे, पौधे-पहाड़ जीत गए, महावीर को उन्होंने बेचैनी न दी, न बुद्ध को परेशान किया। तुम्हारे बीच खड़ा होना मुश्किल हो गया था।
पशु, पौधे के जीवन में एक आनंदमग्नता है--मूर्च्छित। फिर बुद्धों के जीवन में, सिद्धों के जीवन में एक आनंदमग्नता है--सचेत, जागरूक। एक मस्ती वहां भी है। पर उस मस्ती में बोध का दीया जलता है। उतना ही भेद है। प्रकृति और परमात्मा में उतना ही भेद है। प्रकृति यानी सोया हुआ परमात्मा, परमात्मा यानि जाग गई प्रकृति। बस उतना भेद है। जो दोनों के बीच में है, उसकी परेशानी समझो। वहीं तुम हो। वहीं सब हैं। वह जो बीच में अटका हुआ आदमी है--न सीढ़ी के इस पार न सीढ़ी के उस पार, न इस किनारे न उस किनारे, मझधार में जिसकी नाव अटक गई है, जो दोनों तरफ खिंच रहा है.। एक मन कहता है: लौट चलो पीछे, फिर हो जाओ पशु जैसे.। इसलिए तो दुनिया में इतनी हिंसा है।. वह एक मन कहता है: लौट चलो पीछे, हो जाओ पशु जैसे।
हिंसा में इतना रस क्या है? अगर रास्ते में दो आदमी लड़ते हों तो हजार काम छोड़ कर साईकिल किनारे टिका कर खड़े होकर देखने लगते हो। इतना रस क्या है? दो आदमी लड़ रहे हैं, तुम्हें क्या मिलेगा? मगर बड़ी उत्सुकता जग जाती है। हिंसा में एक रस है। तुम न भी करो, दूसरा कर रहा है, तो भी देखने का मजा है। चले पशु के जगत में। लौट चले पशु की दुनिया में। गिरने लगे आदमी के तल से नीचे।
और कभी तुमने देखा, घड़ी भर खड़े रहो, झगड़ा चलता रहे, गाली-गलौच हो, लेकिन मार-पीट न हो, या कोई बीच-बचाव पड़ जाए या पुलिस का आदमी बीच में आ जाए, या उन दोनों को कुछ बुद्धि आ जाए तो तुम कुछ उदास से लौटते हो कि कुछ होना था जो नहीं हुआ। सब मजा किरकिरा हो गया।
फिल्म देखने तुम जाते हो, अगर हिंसा न हो फिल्म में, मार-काट न हो, हत्या न हो, कामवासना के उद्दाम वेग न उठें, तो तुम जाओगे ही नहीं। जितनी कामवासना के उद्दाम वेग हों, जितनी हत्या हो, जितनी हिंसा हो, चोरी हो, डकैती हो, उतनी फिल्म तुम्हें आकर्षित करती है। ये पशु के जगत में लौटने की इच्छाएं हैं।
या फिर कभी तुम शराब पी लेते हो, शराब पीकर तुम क्या कर रहे हो? तुम इतना ही कह रहे हो कि यह थोड़ा सा जो होश है, हे प्रभु! इसे हमसे ले लो। यह होश हमसे नहीं सम्हाला जाता। हमें बेहोश कर दो, हमें लौटा दो वापस। यह पुराना किनारा तुम्हें खींच रहा है। लेकिन तुम कुछ भी उपाय करो, तुम पशु हो नहीं सकते। अतीत में लौटने की कोई संभावना नहीं है। पीछे यात्रा होती ही नहीं। जवान कितना ही सोचे कि मैं बच्चा हो जाऊं, अब नहीं हो सकता। और बूढ़ा कितना ही सोचे कि मैं जवान हो जाऊं, अब नहीं हो सकता। मुर्दा कितना ही सोचे कि अब मैं जी जाऊं, अब नहीं हो सकता। पीछे लौटना होता ही नहीं। जहां से हम गुजर चुके, गुजर चुके। अब वहां जाना कभी नहीं होगा, लेकिन आकांक्षा बनी रहती है। इसीलिए तो लोग जवान भी हो जाते हैं, बूढ़े भी हो जाते हैं, तो भी बचपन के गीत गाते हैं। कहते हैं: ‘अहा! कैसे सुंदर दिन थे वे! यह बात मूढ़तापूर्ण है। मूढ़तापूर्ण इसलिए है कि अगर बचपन सुंदर था, तो फिर शेष जीवन तुम क्या करते रहे? उस सौंदर्य को निखारा नहीं? सौंदर्य को संवारा नहीं? उस सौंदर्य को नये-नये आयाम, नई ऊंचाइयां नहीं दीं? तो तुम करते क्या रहे जिंदगी भर!
लोग कहते हैं: बचपन में कैसा सुख था! तो शेष समय तुमने क्या किया? सुख की संपदा लेकर आए थे, उसको बढ़ाना था, कुछ और सुख कमाना था! उस सुख को और सूक्ष्म बनाना था। वह तो कुछ किया नहीं, उलटे उसे गंवा बैठे। तो पीछे की आकांक्षा बनी रहती है--फिर बच्चे हो जाएं, फिर वैसे ही दिन हों। इसलिए लोग अतीत का स्मरण करते रहते हैं कि कैसे प्यारे दिन थे--जो बीत गए। बीते दिन सदा प्यारे मालूम होते हैं। सोने के मालूम होते हैं। रामराज्य था। सतयुग था।
लोग बैठ कर चर्चा करते हैं बीते दिनों की। यह पीछे लौटने की आकांक्षा है। शराबी भी वही कर रहा है। जरा स्थूल ढंग से कर रहा है। वह यह कहता है कि हमसे तो नहीं होता लौटना, लेकिन शराब के सहारे लौट जाऊंगा। पी लूंगा शराब, भूल जाऊंगा आदमियत, भूल जाऊंगा आदमियत की चिंता, खोज, परेशानी, भूल जाऊंगा सारे उपद्रव, जाल, लौट जाऊंगा वापस, गिर पडूंगा नाली में, हो जाऊंगा पत्थर की भांति, या वृक्ष की भांति, या पौधों की भांति, जी लूंगा थोड़ी देर प्रकृति को। लेकिन वापस लौटना पड़ेगा, शराब थोड़ी-बहुत देर के लिए बेहोश कर दे, फिर होश में आना पड़ेगा। थोड़ी-बहुत देर के लिए भुलावा हो सकता है। वस्तुतः यथार्थ स्थिति नहीं बदलती। फिर वापस वहीं मझधार में।
आदमी की असली खोज इसलिए एक ही है कि उस पार कैसे पहुंचूं। एक बात का मुझे पता है कि मैं हूं, अब मुझे दूसरी बात का पता कैसे हो जाए कि मैं कौन हूं। उस दूसरी बात के पते में ही सारे धर्मों का जन्म हुआ है--उस दूसरी खोज से ही। ‘मैं कौन हूं’ का उत्तर मिल जाए, तो सब मिल गया। क्योंकि उस उत्तर में ही परमात्मा का अनुभव हो जाता है।
तुम परमात्मा हो। तत्वमसि! तुम स्वयं ब्रह्म हो--सोए हुए, भटके हुए, भ्रांत, अपने से अपरिचित। बाहर-बाहर दौड़ते रहे हो। भीतर जाने का मार्ग भूल गया। या द्वार-दरवाजे इतने दिन से नहीं खोले हैं कि जंग खा गए हैं। या चाबियां खो गई हैं, ताले खुलते नहीं हैं। या भीतर इतना अंधकार हो गया है, क्योंकि न मालूम कितनी सदियों से तुमने दीया नहीं जलाया वहां कि अब भीतर जाने में डर लगता है।
मैं कौन हूं? यह मनुष्य का एकमात्र प्रश्न है। यही उसकी एकमात्र खोज है। इसी खोज से फिर आनंद के झरने बहते हैं। यह खोज जिस दिन पूरी हो जाती है उस दिन तुम्हें वह सब मिल जाता है--जो पशुओं को है, वृक्षों को है, चांद-तारों को है--और साथ में कुछ और मिल जाता है, जो उनके पास नहीं है। साथ में प्रकाश मिल जाता है। साथ में होश मिल जाता है। इसलिए इस अवस्था को हमने बुद्धत्व कहा है। बोध मिल जाता है।
बुद्ध भी उसी आनंद में हैं जिसमें प्रकृति लवलीन है। लेकिन प्रकृति मूर्च्छित है, बुद्ध होश से भरे हैं। और होश का आनंद गुणात्मक रूप से भिन्न हो जाता है। तुम्हें कोई क्लोरोफार्म दे दे, और फिर स्ट्रेचर पर तुम्हें बगीचे में ले जाया जाए, घुमाया जाए, हवाएं आएंगी, ताजी, पक्षियों के गीत भी उठेंगे, शायद दूर मूर्च्छा में दबे हुए कहीं-कहीं कुछ स्वर सुनाई भी पड़ेंगे--टूटे-फूटे। फूलों की गंध आएगी, नासापुटों को छुएगी। शायद थोड़ी सी याद भी सरकती हुई भीतर पहुंच जाएगी। हालांकि तुम बगीचे से ले जाए जा रहे हो, लेकिन यह भी कोई ले जाना हुआ? फिर तुम एक दिन होश से बगीचे में आओ। वृक्षों के साथ नाचो, पक्षियों के साथ गीत गाओ, फूलों से दोस्ती करो, नासापुट तुम्हारे सुगंध से भरें, ताजी हवा तुम्हें डुलाए, तुम मगन होकर नाचो उस बगीचे में, वे शीतल हवाएं, तुम्हारे तन-मन को शीतल करें--इसमें और पुरानी यात्रा में फर्क होगा या नहीं? स्ट्रेचर पर लाए गए थे। क्लोरोफार्म दिया हुआ था। गुजरे यहीं से थे। मगर अब जो गुजर रहे हो होश से भरकर, इसमें और उसमें कुछ भेद है--स्थान एक है, लेकिन स्थिति भिन्न है।
इसलिए पतंजलि ने अपने योग-सूत्रों में कहा है कि सुषुप्ति और समाधि में थोड़ा सा ही भेद है। दोनों ही अवस्थाओं में आदमी परमात्मा में लीन होता है। तुम रोज अपनी गहरी सुषुप्ति में परमात्मा में लीन हो जाते हो। इसलिए तो सुषुप्ति तुम्हें ताजा कर जाती है। मूल-स्रोत से जुड़ गए, एक डुबकी मार ली परमात्मा में। यद्यपि बेहोश है डुबकी, कुछ पता नहीं क्या हो रहा है, लेकिन सुबह, जिस दिन रात गहरी नींद आ गई हो, स्वप्नरहित निद्रा आ गई हो, उठ कर तुम कहते हो: बड़ा आनंद! बड़ी ताजगी! बड़ी जीवंतता! पुनरुज्जीवित हुए जैसे! सब थकान गई, सब हारापन गया, सब दुख गया--जैसे फिर से तुम नये होकर लौट आए हो! कौन कर गया नया? कौन सा जादू तुम्हें नया कर गया है? तुम्हें कुछ पता नहीं। अब होश आया है तो याद आता है इतना ही सिर्फ कि रात गहरी नींद थी, स्वप्नों की तरंगें भी न थीं। स्वप्न की तरंगें न थीं, इसका मतलब हुआ कि मन बिलकुल शांत हो गया था। कोई विचार न उठ रहे थे। समाधि लग गई थी। मगर समाधि मूर्च्छित थी।
यही समाधि बुद्ध को लगी, यही मीरा को लगी, यही कबीर को, यही दादू को, यही रज्जब को, यही सुंदरदास को--मगर होशपूर्वक लगी। गए इसी अवस्था में--तरंगरहित, विचाररहित, मनरहित--इसी अ-मनी दशा में गए, मगर होश कायम रहा। जागे-जागे रहे। देखते रहे, क्या हो रहा है। विचार जा रहे हैं, देखते रहे। विचार कम होते जा रहे हैं, देखते रहे। विचार नहीं रहे, देखते रहे। विचार समाप्त हो गए, कुछ दिखाई नहीं पड़ता, मगर देखने वाला मौजूद रहा। कुछ दिखाई नहीं पड़ता, कोई विषय-वस्तु मौजूद न रही, पर्दा बिलकुल खाली हो गया--मगर देखने वाला जागा रहा, जागा रहा, जागा रहा। आखिरी छोर तक डुबकी मारी, तलहटी तक उतर गए, गहराई से गहराई में पहुंच गए--मगर जागे रहे, जागे रहे, देखते रहे, देखते रहे। तब जो लौटना होता है, बुद्ध होकर लौटे। फिर गई सारी चिंता, फिर गई सारी बेचैनी, क्योंकि अब मझधार में न रहे।
आदमी बीच में है। आदमी संक्रमण की अवस्था है। इसलिए आदमी में तनाव है। तनाव का मतलब ही इतना है कि आदमी हो रहा है। कुछ होने के रास्ते पर है। अभी हो नहीं गया है। यात्रा चल रही है, अभी मंजिल मिल नहीं गई है। इसलिए आखिरी खोज तुम पूछते हो क्या है? प्रथम कहो, चाहे आखिरी कहो, खोज एक है--कि आदमी जानना चाहता है मैं कौन हूं? मेरा स्वभाव क्या है? उसी स्वभाव को जानने से नियति का पता चल जाएगा। क्योंकि जो स्वभाव है वही नियति है। मेरा मूल-स्रोत क्या है, उसे जानने से ही मेरा गंतव्य क्या है, यह भी पता चल जाएगा। क्योंकि अंततः मूल-स्रोत ही गंतव्य है। और जिसने जाना कि मैं कौन हूं, जिसके भीतर आत्मज्ञान का दीया जला, उसने आनंद भी जाना, सच्चिदानंद जाना।
आगोश में आ कि जिंदगानी कर लूं
कुछ रोज खुशी से जिंदगानी कर लूं
एक जाम मए-तरब पिला दे साकी
फानी है हयात जाविदानी कर लूं
जिंदगी क्षणभंगुर है। अब गई तब गई। मौत आती ही चली जाती है। और अपना पता नहीं है। इसलिए मिटने का भय भरा हुआ है। मौत पैर डगमगा रही है।
क्या है खोज आदमी की? खोज है कि किस भांति अमृत को जान लें।
फानी है हयात.
जिंदगी क्षणभंगुर है।
.जाविदानी कर लूं
इसे कैसे अमर कर लूं?
आगोश में आ कि जिंदगानी कर लूं
और परमात्मा तुम्हारी गोद में हो और तुम परमात्मा की गोद में होओ, तो ही जिंदगी मिली, अन्यथा जिंदगी बस नाम की ही थी, काम की नहीं थी। उसमें अर्थ कुछ न था, शोरगुल बहुत था।
आगोश में आ कि जिंदगानी कर लूं
यह खोज है आदमी की कि अभी जो जिंदगी है कोरी-कोरी, थोथी-थोथी, असली नहीं है।
आगोश में आ कि जिंदगानी कर लूं
कुछ रोज खुशी से जिंदगानी कर लूं
एक जाम मए-तरब पिला दे साकी
साधक, भक्त परमात्मा से कहता है कि जरा सा ढाल दो, मेरे कंठ में थोड़ी सी उतार दो सत्य की शराब।
एक जाम मए-तरब पिला दे साकी
जीवन का एक प्याला मुझे पिला दो।
फानी है हयात जाविदानी कर लूं
यह तो जो मैंने अब तक जाना है, क्षणभंगुर है, पानी का बबूला है, यह तो मिटा-मिटा, इसे मैं सम्हाल न सकूंगा, कोई कभी सम्हाल नहीं सका, मैं उसे जान लेना चाहता हूं जो अमृत है। और कभी नहीं मिटता है।
और उसे जानने के लिए मरने तक मत रुके रहना। जिंदगी में ही जानना है, अभी जानना है, यहीं जानना है--कल पर भी मत टालना, क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं। कल कभी आता है? कल सिर्फ भरमाता है। और लोग कल पर टाले चले जाते हैं।
एक मित्र ने प्रश्न पूछा है कि ‘आपने मुझे बहुत झंझट में डाल दिया। मैं तो सोचता था जिंदगी के अंत में कर लेंगे याद परमात्मा की। सोचता था कि मरते समय भी अगर नाम ले लेंगे तो मुक्ति हो जाएगी।’
शास्त्रों में कहानियां हैं ऐसी, कि किसी ने मरते समय परमात्मा का नाम ले लिया और मुक्त हो गया, अजामिल की कहानी तो तुम जानते ही हो, मरते वक्त उसने बुलाया, नारायण, नारायण। और ‘नारायण’ को बुला नहीं रहा था। उसके बेटे का नाम नारायण था, लेकिन ऊपर के नारायण धोखे में आ गए। मर गया नारायण को बुलाते, सीधा बैकुंठ गया।
किन चालबाजों ने, किन बेईमानियों ने ये कहानियां गढ़ी होंगी? किन धोखेबाजों ने? और इन धोखेबाजों ने तुम्हारे मन में भी यह धारणा बिठा दी है.।
.तो उन मित्र ने पूछा है कि ‘मैं तो सोचता था कर लेंगे याद अंत में, कर लेंगे भजन-भाव अंत में, अभी क्या पड़ी है? अभी तो जिंदगी है, जी लें। आपने सब अस्त-व्यस्त कर दिया। आप कहते हैं: अभी या कभी नहीं। आपने मुझे बेचैन कर दिया।’
जरूर बेचैनी लगेगी शुरू में, क्योंकि तुम एक सपने में जी रहे थे। मगर यह बेचैन हो जाना बेहतर है। यह सपना टूट जाए तो बेहतर है। कुछ कर लो अभी तो बेहतर है। अभी बुला लो उसे अपने आगोश में। अभी तलाश लो उसकी गोद। अभी मांग लो उससे, जब तक जबान मांग सकती है, जब तक जबान लड़खड़ा नहीं गई है। जब तक हृदय धड़क रहा है तब तक द्वार खोल लो अपने, उसे निमंत्रण दे दो।
ऐसा मत सोचो कि जिंदगी भर तो कुछ करते रहोगे और मरते वक्त परमात्मा का नाम ले लोगे। मरते वक्त तुम्हारी जिंदगी भर का निचोड़ तुम्हारे कंठ में होता है। जिस आदमी ने धन खोजा है, मरते वक्त धन की ही याद होती है। लोग गलत नहीं कहते कि धनी, कंजूस, कृपण मर कर अपने गढ़े धन पर सांप बन कर बैठ जाता है। इसमें जरूर सचाई होगी। यह बात मनौवैज्ञानिक मालूम पड़ती है। जो आदमी जिंदगी भर अपने गड़ाए धन की ही रक्षा करता रहा, वह मरने के बाद तुम सोचते हो, इतनी आसानी से छोड़ देगा। जिंदगी भर एक ही अभ्यास किया, अस्सी साल तक एक ही अभ्यास किया अपने धन पर पहरा देने का। अस्सी साल का अभ्यास एकदम से टूट नहीं जाएगा। अस्सी साल का संस्कार कहानी में अर्थ मालूम होता है। लौट आएगा सांप बन कर, बैठ जाएगा कुंडली मार कर अपने धन पर कि कोई ले न जाए।
तुमने जिंदगी भर एक काम किया, तुम सोचते हो, मरते वक्त एकदम से रूपांतरित हो जाओगे? जिंदगी में बदल न सके, जब शक्ति थी, और जब सारी शक्ति जा रही होगी, तब तुम बदल जाओगे?
मैंने सुना है, एक आदमी था एक गांव में। चम्पू नाई उसका नाम था। चम्पी करता था, चम्पू उसका नाम था। फिर आजादी आई, वह नेता हो गया। गांव भर के लोग उसकी मान्यता भी रखते थे, सबकी चम्पी करता था, सबकी मालिश करता था। तो चम्पू की जगह वह चंपालाल हो गया। चुनाव में जब जीत गया तो बाबू चंपालाल जी हो गया। फिर मौत भी आई, मौत आई तो बड़े बूढ़े सब इकट्ठे हुए। उसके मुंह से फसूकर गिर रहा है, किसी ने उसे हिलाया और कहा: बाबू चंपालाल जी, अब यह समय परमात्मा को याद करने का है। अब कुछ प्रार्थना कर लो परमात्मा से। अब कुछ कह लो, सुन लो, जिंदगी तो यूं ही गंवा दी। पहले चम्पी में गंवाई, फिर बाद में नेतागिरी में गंवाई। वह भी एक तरह की चम्पी है। उसमें भी चमचे ही काम आते हैं। ऐसे ही जिंदगी चम्पी में ही गंवा दी, चमचागिरी में गंवा दी, अब तो कुछ परमात्मा को याद कर लो।
हिलाया किसी ने, उसने बामुश्किल आंख खोली और कहा: सुन, सुन, सुन अरे बेटा सुन! इस चम्पी में बड़े-बड़े गुन! जिंदगी भर यही गाता रहा, तुम सोचते हो मरते वक्त हरिनाम निकलेगा? जिंदगी भर का अभ्यास एकदम नहीं चला जा सकता। जब उसने कहा था: सुन, सुन, सुन, तो लोगों ने सोचा, शायद भगवान से कह रहा है।
आदमी मरते वक्त एकदम रूपांतरित नहीं हो सकता। रूपांतरण इतना मुफ्त नहीं है। जीवन दांव पर लगाना होता है।
तो तुम कहते हो: ‘तुम परेशान हो गए हो।’
अच्छा है कि परेशान हो गए हो। भगवान करे इस परेशानी को तुम किसी तरह से समझा बुझा कर लीप-पोत कर मिटा मत देना। अगर तुम परेशान हो गए हो, सौभाग्य है, कुछ करो। इस दुनिया से ‘मैं कौन हूं’ यह जाने बिना मत जाना।
अब रही बात यह कि जाना तो तुम्हारे हाथ में नहीं है। जब जाना पड़ेगा, तब जाना पड़ेगा। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जब जाने का मौका आ जाए तो कहना, अभी मैंने अपने को नहीं जाना, तो मैं कैसे जाऊं? मैं तो तभी जाऊंगा जब में अपने को जान लूंगा। कोई सुनने वाला नहीं है। मौत तुम्हें ले जाएगी। मौत तुमसे पूछेगी भी नहीं। मौत खबर देकर आती भी नहीं। मौत तो आ ही जाती है। एक क्षण का भी अंतराल नहीं होता आने और ले जाने में।
नहीं, जब मैं कह रहा हूं कि बिना स्वयं को जाने नहीं जाऊंगा, तो उसका अर्थ यह है कि अभी जो क्षण मेरे हाथ में है. अभी तो जिंदा हो, इस क्षण तो अभी जिंदा हो, इस क्षण को परमात्मा की खोज में लगा दो। और परमात्मा की खोज से यह मत सोचना कि परमात्मा आकाश में बैठा हुआ कोई व्यक्ति है। परमात्मा तुम्हारे ही भीतर छिपी हुई तुम्हारी परम अवस्था है। आत्मा की परम अवस्था का नाम परमात्मा है। आत्मा को जान लेना परमात्मा को जान लेना है। और जो अपने को ही नहीं जानता, वह और क्या जानेगा?
मुझे दे दे--
रसीले होंठ, मासूमाना पेशानी, हसीं आंखें
कि मैं एक बार फिर रंगीनियों में गर्क हो जाऊं
मेरी हस्ती को तेरी इक नजर आगोश में ले ले
हमेशा के लिए इस दाम में महफूज हो जाऊं
जिया-ए-हुस्न से जुल्माते दुनिया में न फिर आऊं
गुजश्ता हसरतों के दाग मेरे दिल में धुल जाएं
मैं आने वाले गम की फिकर से आजाद हो जाऊं
मेरे माझी व मुल्तकबिल सरासर महब हो जाएं
मुझे वो इक नजर इक जाविदानी सी नजर दे दे
एक अमृत की दृष्टि! मांग लो उसे, वह तुम्हारी है। तुम्हारा हक, तुम्हारा अधिकार। न मांगो तो नहीं मिलेगी। मांगो तो मिली ही है। न खोजो तो नहीं मिलेगी। खोजो तो तुम्हारे पास ही है। जितनी त्वरा से खोजोगे उतनी पास पाओगे। अगर परिपूर्ण त्वरा से खोजो तो इसी क्षण मिल सकती है। आत्मा दूर थोड़े ही है, कहीं जाना थोड़े ही है। किन्हीं पहाड़ों की यात्रा थोड़े ही करनी है--थोड़ी आंख बंद करनी है। थोड़े विराम में उतर जाना है। थोड़ी विश्रांति में शरण लेनी है। थोड़ी चुप्पी साधनी है। और सारी चिंताओं के जाल से अपने को हटा कर भीतर देखना है।
मेरे माझी व मुस्तकबिल सरासर महब हो जाएं
कहो परमात्मा से कि मेरा अतीत और मेरा भविष्य ये दोनों छीन लो मुझसे, इन्हें डुबा दो!
है ही क्या तुम्हारा मन और?
अतीत की स्मृतियां भविष्य की कल्पनाएं।
इसके अतिरिक्त तुम्हारे मन की संपदा क्या है? न तो स्मृतियों में कोई जीवन है अब, जा चुका, और कल्पनाएं अभी हुई नहीं हैं। दोनों ना-कुछ हैं। इसी कचरे में डूबे बैठे हो।
मेरे माझी व मुस्तकबिल सरासर महब हो जाएं
मुझे वो इक नजर इक जाविदानी सी नजर दे दे
बस एक नजर चाहिए, एक दृष्टि चाहिए। एक आंख चाहिए, जो अमृत को पहचान ले। यहां दोनों हैं। यहां मृत्यु भी है, यहां अमृत भी है। मृत्यु परिधि पर है। तुम्हारी देह में मृत्यु है, तुम में अमृत है। घड़ा मृत्यु का बना है, पात्र मृत्यु का बना है, क्योंकि मिट्टी का बना है। मिट्टी यानी मृत्यु। लेकिन मर्त्य में अमृत भरा है। नजर के बदलने की बात है। घड़े को ही देखते रहे तो मरते ही रहोगे। घड़े में जो भरा है, अगर उसे देख लिया, मृत्यु समाप्त हो गई। और जहां मृत्यु समाप्त होती है, वहीं जानना कि ज्ञान का अवतरण हुआ। वहीं जानना कि जाना, मैं कौन हूं।
अमृतस्य पुत्रः! तुम अमृत के पुत्र हो। तुम्हारे भीतर परमात्मा बह रहा है प्रतिपल।
जिस्म की नौ रस कली में!
एक एहसासे-जमाल--
जैसे ठंडक छाओं की
दिल की नाजुक धड़कनों में
एक नादीदा खयाल
जैसे आहट पाओं की
रात की तारीकियों में
जौफिगन शम्मे विसाल
जैसे खुल कर पौ फटे
अभी फट सकती है यह पौ। यह सुबह अभी हो सकती है।
जिस्म की नौ रस कली में!
यह तुम्हारी जो देह है, मंदिर है। इसमें परमात्मा विराजमान है। और कहां खोजते हो। किस काशी, किस काबा जाते हो? व्यर्थ की दौड़-धूप में मत पड़ो। जरा भीतर टटोलो।
जिस्म की नौ रस कली में!
यह जो देह का फूल है। इसमें ही सौंदर्य छिपा है। सौंदर्य इसके सहारे लेकर पृथ्वी पर उतरा है।
एक एहसासे-जमाल--
जैसे ठंडक छाओं की
जरा भीतर चलो और सौंदर्य की परम अनुभूति होने लगेगी। जरा अपने देह के इस फूल में उतरो, इस कमल के भीतर चलो। हजार पंखड़ियों वाला कमल है यह। इसकी सारी पंखड़ियों के पार जाना है। पंखुड़ी-पंखुड़ी के पार जाना है। और भीतर तुम पाओगे उस सन्नाटे को, उस शून्य को--जो तुम्हारी आत्मा है। पाओगे उस पूर्ण को--जो परमात्मा है।
एक एहसासे-जमाल--
सौंदर्य का एक परम अनुभव होगा।
.जैसे ठंडक छाओं की
बहुत जी लिए धूप में, बहुत जी लिए दौड़-धाप में, बहुत जी लिए आपा-धापी में। पसीने-पसीने हो गए हो, कितने तो थक गए हो। कितने जन्मों से तो चल रहे हो! कितनी तो धूल जम गई तुम्हारे चेहरे पर! जरा अपनी आंखों को खयाल तो करो--कितनी गर्द-गुबार।
दिल की नाजुक धड़कनों में
एक नादीदा खयाल
जैसे आहट पाओं की
जरा सरको तो भीतर! जरा अनदेखे को देखना शुरू करो! जरा अनचीन्हे को चीन्हना शुरू करो।
दिल की नाजुक धड़कनों में
यह जो धीमी सी नाजुक धड़कन है दिल की, इसी में परमात्मा की धड़कन भी समाई हुई है। तुम नहीं धड़क रहे हो, वही धड़क रहा है।
जैसे आहट पाओं की
जरा भीतर सरको, उसकी पगध्वनि सुनाई पड़ने लगेगी।
रात की तारीकियों में
माना कि अंधेरा है, और बहुत अंधेरा है; मगर अंधेरा सिर्फ बाहर है। भीतर तो रोशनी ही रोशनी है। भीतर तो सदा प्रभात है। बाहर सदा रात है। बाहर अमावस, भीतर पूर्णिमा है।
बुद्ध के जीवन में प्यारी कहानी है कि वे पूर्णिमा के दिन ही पैदा हुए, और पूर्णिमा के दिन ही उन्हें संबोधि मिली, और पूर्णिमा के दिन ही वे मरे। उसी पूर्णिमा के दिन--एक ही पूर्णिमा वैशाख की। ऐसा हुआ हो न हुआ हो, पर बात अर्थपूर्ण है। पूर्णिमा में ही पैदा हो, पूर्णिमा में ही जीओ, पूर्णिमा में ही जगो, पूर्णिमा में ही तिरोहित हो जाओ। यह हो सकता है। भीतर जो देखता है, उसे निश्चित हो जाता है।
रात की तारीकियों में
जौफिगन शम्मे विसाल
माना अंधेरा बहुत है, मगर भीतर एक दीया जल रहा है। ‘शम्मे विसाल।’ एक ऐसी ज्योति जल रही है। जो ज्योति परमात्मा से मिलन की ज्योति है। जो उसके आलिंगन की ज्योति है।
रात की तारीकियों में
जौफिगन शम्मे विसाल
जैसे खुल कर पौ फटे
जैसे अचानक बदलियां हट जाएं, सूरज प्रकट हो जाए, ऐसा अचानक तुम्हारे भीतर हो सकता है। इस अचानक की खोज आदमी की आत्यंतिक खोज है। प्रथम भी, अंतिम भी। और जब तक यह न हो जाए, तब तक अपने को आदमी मत मान लेना। तब तक आदमी मानने की भ्रंाति में मत पड़ जाना। तब तक इतना ही कहना कि मैं आदमी होने की तलाश कर रहा हूं। मार्ग पर हूं, अभी पहुंचा नहीं हूं।
आदमी तो बस थोड़े हुए हैं--कोई बुद्ध, कोई कृष्ण, कोई कबीर, कोई क्राइस्ट, कोई मोहम्मद। आदमी तो थोड़े हुए हैं, बाकी तो सब झूठे आदमी हैं, दिखावा है, वेष है। भीतर कुछ भी नहीं है। अनुभव नहीं है तो कुछ भी नहीं। जो है, अगर न जाना जाए तो न होने के बराबर होता है।
किसी भिखमंगे की जेब में हीरा पड़ा है और वह भीख मांग रहा है और उसे हीरे का कुछ पता नहीं। क्या तुम कहोगे, उसके पास हीरा है? कहने का कोई अर्थ न होगा। अगर उसे पता हो कि हीरा है तो भिखमंगापन बंद हो जाए।
जिसने अपने भीतर की रोशनी देख ली, इस जगत में वह भिखमंगा नहीं रह जाता। कुछ भी नहीं मांगता--न पद, न प्रतिष्ठा। कुछ भी नहीं मांगता। मांगने का सवाल ही नहीं है। देना शुरू करता है। बांटता है। उसके भीतर अजस्र स्रोत खुल जाता है। रोशनी बांटता है। आनंद बांटता है, प्रेम बांटता है, ध्यान बांटता है, असली संपदा बांटता है।

दूसरा प्रश्न:
भगवान, कल प्रवचन के पहले आपके प्रणाम के स्वीकार होते ही रोआं-रोआं कंपन से भर गया, आंखें आंसू बहाती रहीं, आंख-कान बंद हो गए, फिर भी आभा के बीच आपको देखता ही रहा और भीतर अपूर्व आनंद हो रहा था। आंखें बंद थीं, फिर भी खुली आंखों से ज्यादा आपको देख सका। भगवान, कबीर नहीं समझा, नहीं सुलझा। कृपा करके समझाने की अनुकंपा करें।
पूछा है कबीर भारती ने।
शुभ हुआ, एक संकेत मिला। उसका उपयोग करना है। एक सीढ़ी तुम्हारी आंख के सामने आई। एक द्वार खुला। कुछ है जो आंख खोल कर देखा जा सकता है और कुछ है जो केवल आंख बंद करके ही देखा जा सकता है। जो आंख खोल कर देखा जा सकता है उसका कोई बड़ा मूल्य नहीं है। मूल्य तो उसी का है जो आंख बंद करके देखा जा सकता है।
मुझसे जिनकी सच्ची पहचान होगी, वह आंख बंद करके देखने वाली पहचान है। जिन्होंने आंख खोल कर ही देखा है, वे मेरी देह को देखेंगे। आंखें देह की हैं, देह से ज्यादा उनकी पकड़ नहीं है। अगर हाथ से मुझे छुओगे तो मुझे नहीं छू पाओगे, देह को ही छुओगे। हाथ की सामर्थ्य हाथ से ज्यादा की नहीं हो सकती। अगर कानों से मुझे सुनोगे तो मेरे शब्दों को ही सुनोगे, मेरे शून्य को न सुन पाओगे। वह कान की सामर्थ्य नहीं।
आंख देख सकती है, कान सुन सकता है। कान देख नहीं सकता, आंख सुन नहीं सकती। ऐसे ही आंख खोल कर कुछ दिखाई पड़ता है और कुछ आंख बंद करके दिखाई पड़ता है। जो खोल कर दिखाई पड़ता है, वह स्थूल है। जो बंद करके दिखाई पड़ता है, वही सूक्ष्म है, वही सार है।
मेरे साथ आंख बंद करके संबंध जोड़ो; वही असली संबंध है। जो कहता हूं वह तो सुनो; जो नहीं कहता हूं, वह भी सुनो। जो मैं दिखाई पड़ता हूं वह तो देखो, लेकिन जो मैं दिखाई नहीं पड़ता हूं, वह भी देखो। क्योंकि ऐसे ही तुम अपने भीतर भी उसे देख सकोगे जो दिखाई नहीं पड़ता और वह सुन सकोगे जो सुनाई नहीं पड़ता। ऐसे अगम की यात्रा शुरू होती है। अच्छा हुआ कबीर।
तुम कहते हो: ‘कबीर नहीं समझा, नहीं सुलझा।’
समझने की बात नहीं है यह। समझने चलोगे, चूक जाओगे। यह तो दीवानों की बात है। समझदार कभी आंख बंद करते हैं? वे तो आंख खोल कर ही देखते रहते हैं। वे तो आंख फाड़ कर देखते रहते हैं। समझदार को तो जो आंख से दिखाई पड़ता है, उसको ही मानता है। वह कहता है: जो दिखाई नहीं पड़ता, उसे हम मानते ही नहीं। वह तो कहता है: जो छूने में आता है, उसे ही हम मानते हैं। जो छूने में नहीं आता उसे हम नहीं मानते।
इसलिए तो समझदारों ने ईश्वर को इनकार कर दिया है। आत्मा को इनकार कर दिया है। प्रेम को इनकार कर दिया है, सौंदर्य को इनकार कर दिया है। जीवन में जो भी बहूमूल्य है, सभी इनकार कर दिया है। यह समझदारों का परिणाम है कि दुनिया कचरा हो गई है। कचरे ही कचरे का ढेर लग गया है। क्योंकि कचरा पकड़ में आता है। जाओ, गुलाब के फूल के पास खड़े हो जाओ। और कोई कहे सुंदर है। और तुम कहो: कहां है सौंदर्य? लाल तो दिखाई पड़ता है, फूल है, यह भी दिखाई पड़ता है, लेकिन सौंदर्य कहां है? ले जाऊंगा इसे वैज्ञानिक के पास, रसायनविद के पास, केमिस्ट के पास, इसकी जांच-पड़ताल करवाऊंगा। करवा लेना जांच-पड़ताल, सब रस छांट कर रख देगा रसायनविद। बता देगा: कितनी मिट्टी है, कितना पानी है, कितना सूरज है, कितनी हवा है--सब बता देगा। पंच तत्व तोड़ देगा अलग-अलग। और जब तुम उससे पूछोगे सौंदर्य कहां है, तो कंधे बिचकाएगा। वह सौंदर्य इसमें कहीं था नहीं। और अगर तुम्हें ज्यादा दिक्कत हो तो तुम वजन तौल सकते हो। फूल का वजन तौल लिया था, ये सब चीजें रखी हैं फूल में से निकाल कर विशलिष्ट, इनका वजन तौल लो, दोनों का वजन बराबर है।
जो तराजू की तौल में आता है, वही सब-कुछ है? जिंदा आदमी था, मर गया, दोनों का वजन तौल लो, बराबर है। तराजू की तौल से कुछ चूक जाता है। अभी बोलता था, अब नहीं बोलता--वजन बराबर है। अभी डोलता था, अब नहीं डोलता--वजन बराबर है। अभी इसे तुम घर में मेहमान बना कर रखने को राजी थे, अब चले अरथी पर बांध कर। कुछ फर्क हो गया। कुछ बात बदल गई। सत्तर साल यहां रहा, अब सात घंटे तुम घर में नहीं रोकना चाहते इसे। क्योंकि अब बदबू फैलेगी, अब सड़ेगा। कोई पक्षी उड़ गया भीतर से, लेकिन पक्षी कोई ऐसा उड़ा है जिसमें वजन नहीं है, जो वजन के बाहर है। कोई चैतन्य तिरोहित हो गया।
वजन में ही सब समाप्त नहीं होता। खुली आंख से ही सब दिखाई नहीं पड़ता। समझदारी सभी कुछ नहीं पकड़ पाती। और जब हम समझदारी के चमचे से सब-कुछ पकड़ने चलते हैं, समझदारी के आधार को ही सब-कुछ मान लेते हैं, मापदंड बना लेते हैं, तो जो भी महत्वपूर्ण है, चूक जाता है; जो भी सार्थक है, चूक जाता है। अगर आज दुनिया में आदमी अनुभव करता है जीवन व्यर्थ है, तो कोई और जिम्मेवार नहीं, हमारे तथाकथित समझदार जिम्मेवार हैं।
तो कबीर, समझदारी की फिकर छोड़ो। मैं यहां समझदारी देने को हूं भी नहीं। समझदार तुम वैसे ही काफी हो, मैं तुम्हें थोड़ा नासमझदार बना सकूं तो काम हो जाए। बुद्धिमान तुम वैसे ही काफी हो। मैं तुम्हें थोड़ा दीवाना बना सकूं तो काम हो।
यहां तो पागल समझ पाएंगे और समझदार पागल की तरह छूट जाएंगे। बाहर रह जाएंगे। यह दीवानों की बस्ती है। यहां समझदारी का हिसाब ही मत लगाना। वह कसौटी यहां काम की नहीं है।
तुम कहते हो: ‘कबीर नहीं समझा।’
नहीं समझ सकते हो, क्योंकि यह बात समझने की नहीं है। अगर समझ को पकड़े रहे तो यह बात चूक जाएगी। अगर इस बात को पकड़ना हो, समझ छोड़ो। इसलिए श्रद्धा का इतना मूल्य है। श्रद्धा का अर्थ क्या होता है? समझ के पार भी कुछ है। अदृश्य भी कुछ है। अगोचर भी कुछ है। श्रद्धा का और क्या अर्थ है? श्रद्धा का अर्थ इतना ही अर्थ है कि मैं बुद्धि पर समाप्त नहीं करता अस्तित्व को; बुद्धि के पार भी अस्तित्व का फैलाव है, यह अंगीकर करता हूं; यद्यपि सिद्ध न कर सकूंगा, क्योंकि सिद्ध तो वही होता है जो बुद्धि के भीतर हो। मैं असिद्ध को भी मानता हूं। असिद्ध में भी मेरी श्रद्धा है। जो तर्क से निर्णीत नहीं होता, उसका भी मुझे अहसास होता है।
तुम प्रेम को सिद्ध कर पाओगे? लेकिन प्रेम का अनुभव होता है। तुम काव्य को सिद्ध कर पाओगे? काव्य सिद्ध नहीं होता, विज्ञान सिद्ध होता है। लेकिन विज्ञान आदमी को यंत्र देता है--और यंत्रवत बना देता है। यांत्रिकता भी दे देता है। काव्य मनुष्य को पंख देता है--आकाश में उड़ने का आमंत्रण देता है। काव्य मनुष्य को अलौकिक की तरंग देता है।
आंख बंद करके जो होगा वह काव्य है। आंख खुला-खुला जो हो रहा है, वह सब ज्ञान विज्ञान है।
एक झरोखा खुला था आंख बंद करके। समझने की कोशिश मत करना, नहीं तो झरोखा बंद हो जाएगा। ये झरोखे बड़े नाजुक हैं। समझदारी जैसा पत्थर ये नहीं सह पाते। ये फूल जैसे नाजुक हैं। तुमने उठाया तर्क का पत्थर दे मारा, फूल नष्ट हो जाएगा। और यह मत सोचना कि जो नष्ट हो गया वह व्यर्थ था। और जो बच गया वह सार्थक है। क्योंकि क्षुद्र हमेशा ही बच जाता है। व्यर्थ बच जाता है सार्थक ही नष्ट होता है। जितनी बहुमूल्य चीज हो, उतनी जल्दी नष्ट हो जाती है, उतनी नाजुक होती है। इस जगत में श्रद्धा से नाजुक और कुछ भी नहीं। बड़ी छुई-मुई है। जरा में नष्ट हो सकती है। जरा सा संदेह, जरा सा तर्क और श्रद्धा तिरोहित हो जाती है। श्रद्धा को टिकाना कठिन से कठिन कला है--और जिसे आ गई, वही धार्मिक है।
तो कबीर, समझने की कोशिश मत करो।
और तुम कहते हो: ‘कबीर नहीं समझा, नहीं सुलझा।’
सुलझाने का सवाल ही नहीं है। यह कोई उलझन थोड़े ही है, जिसे सुलझाना है। यह तो रहस्य है, जिसमें उतरना है, डुबकी मारनी है।
जीवन को समस्या की तरह देखने का ढंग उचित नहीं है। अगर तुम मेरी बात ठीक से सुन रहे हो--तो जीवन को समस्या बना देने में ही भूल है। जीवन रहस्य है--जीने के लिए। नाचो! गाओ! गुनगुनाओ! सुलझाना क्या है? सुलझाओगे क्या? सुलझा-सुलझा कर मिलेगा क्या? दस हजार वर्ष से दर्शनशास्त्र सुलझा रहा है, क्या सुलझा पाया है? कुछ भी नहीं सुलझा पाया। सच तो यह है, बात और उलझ गई। सुलझाने में उलझ गई। सुलझाने चले थे, उलझती चली गई। असल में सुलझाने का भाव ही इस बात की स्वीकृति है कि तुमने मान ही ली--एक बात तो तुमने मान ही ली--कि जगत उलझा हुआ है, तुम्हें सुलझाना है।
मैं तुमसे कहना चाहता हूं: यहां कुछ उलझा ही नहीं है। सब सुलझा ही सुलझा है। सब सीधा-साफ है। लेकिन अगर तुम सुलझाने का मजा लेना चाहते हो तो फिर उलझाना पड़ेगा। फिर तुम्हें ऐसे प्रश्न उठाने पड़ेंगे जो जिंदगी को उलझा दें। फिर एक खेल में तुम पड़ गए। खुद उलझाते हो, खुद सुलझाते हो। फिर इसका कोई अंत नहीं है। अगर उलझाने की आदत बन गई तो तुम उलझाए चले जाओगे। हर नया उत्तर दस नये प्रश्न खड़े कर देगा।
इस जिंदगी को समस्या की तरह लेना ही मत। जिंदगी वरदान है, समस्या नहीं है। भेंट है परमात्मा की, प्रसाद है, अनुग्रह है। झेलो। जितना ले सको ले लो! पीयो! पचाओ! तुम्हारी मांस-मज्जा में घुल जाने दो। तुम्हारे रोएं-रोएं में समा जाने दो।
इसलिए धार्मिक व्यक्ति वह है, जो जीवन को सुलझाना नहीं चाहता--सुलझाने के उलझाव में पड़ता ही नहीं। धार्मिक व्यक्ति वह है, जो जीवन जीता है। चांद निकलता है तो चांद के साथ आनंदित होता है। चिंता में नहीं पड़ता कि चांद पर क्या है--मिट्टी है कि पत्थर है कि झील है कि पहाड़ है? सूरज निकलता है तो सूरज के सामने झुक जाता है आह्लाद से। सूर्य-नमस्कार में! प्रकाश का आगमन हुआ है। आनंदित हो उठता है। रात कटी। अंधेरा होता है तो अंधेरे की शांति अनुभव करता है। रोशनी होती है तो रोशनी की स्पष्टता अनुभव करता है।
जो भी होता है उसको अनुभव करता है; लेता है, अपने भीतर लेता है। और समस्या बनाता नहीं, प्रश्न-चिह्न लगाता नहीं। किसी चीज पर प्रश्न-चिह्न न लगाना धार्मिक आदमी का लक्षण है। वह पूछता ही नहीं क्यों।
फर्क समझना।
दार्शनिक वृत्ति का आदमी आता है मेरे पास, वह पूछता है: ईश्वर है या नहीं? आत्मा है या नहीं? मोक्ष है या नहीं? धार्मिक वृत्ति का व्यक्ति मेरे पास आता है, वह कहता है: ईश्वर को हम कैसे जीएं? ईश्वर के साथ हम कैसे लवलीन हो जाएं? अगर ईश्वर का शब्द उपयोग न करना हो, न करो--कहो, अस्तित्व के साथ हम कैसे लवलीन हो जाएं। जो है, उसके साथ हम कैसे लवलीन हो जाएं? यह आकांक्षा बड़ी भिन्न है। सुलझाव का सवाल नहीं है। वह सिर्फ इस विराट अस्तित्व में डुबकी मारने की कला सीखना चाहता है।
सुलझाना क्या है? सुलझाने योग्य समय भी कहां है? यह छोटी सी जिंदगी, इसे सुलझाने-सुलझाने में नष्ट हो जाओगे। मौत आएगी और तुम प्रश्नों से घिरे बैठे रहोगे। जाने दो प्रश्नों को।
बुद्ध के पास जब भी कोई नया आदमी आता था और प्रश्न पूछता था, तो बुद्ध अक्सर कहते थे, तू दो साल रुक। दो साल मत पूछ। दो साल मेरे पास बैठ, उठ, जी--बिना पूछे। ध्यान कर, शांत हो, प्रसन्न हो, आनंदित हो, मगर प्रश्न मत उठा। दो साल बाद फिर पूछ लेना।
एक दिन ऐसा ही हुआ। मौलुंकपुत्त नाम का प्रसिद्ध दार्शनिक बुद्ध के पास आया, और उसने कहा कि मेरे पास कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर मैं तलाश रहा हूं, जिंदगी मेरी हो गई है। बड़े-बड़े संतों के पास गया हूं, कोई उत्तर नहीं दे पाया है। अब आखिरी आशा से आपके पास आया हूं। अगर आपके पास उत्तर न मिला तो मैं बहुत निराश हो जाऊंगा, क्योंकि और सब हार गए, बड़े-बड़े हार गए।
बुद्ध ने कहा: मौलुंकपुत्त, तू दो साल रुक, चुपचाप बैठ। मुझे जी। मेरे पास रह। मेरी उपस्थिति को अनुभव कर। ध्यान में डूब। शांत हो। फिर दो साल बाद पूछ लेना। फिर जो भी तुझे पूछना हो, मैं उत्तर दूंगा। मैं आश्वासन देता हूं, जरूर उत्तर दूंगा।
मौलुंकपुत्त सोचने लगा--दो साल! प्रश्नों के उत्तर के लिए! फिर बुद्ध ने कहा कि तू जिनके भी पास गया था, उन्होंने तत्क्षण उत्तर दे दिए थे। कुछ तुझे मिला नहीं। मैं तुझे तत्क्षण उत्तर नहीं देना चाहता हूं। नहीं तो तुझे फिर भी कुछ नहीं मिलेगा। तू रुक, तू इतना धैर्य रख।
सोच कर मौलुंकपुत्त ने कि सब जगह भटक भी चुका हूं, ठीक है, दो साल ये भी जाएं। दांव पर लगाना है, जुआ खेलना है। और क्या भरोसा, दो साल बाद यह आदमी जो उत्तर देगा वे मेरे काम के होंगे कि नहीं, मुझे तृप्त करेंगे कि नहीं? जब वह यह सोच ही रहा था, तभी बुद्ध का एक दूसरा शिष्य पास के ही वृक्ष के नीचे मस्त बैठा था। वह खिलखिला कर हंसने लगा। मौलुंकपुत्त ने पूछा: इसमें हंसने की क्या बात है? उस शिष्य ने कहा: पूछना हो अभी पूछ लो। यही धोखा मुझे दिया गया था। दो साल गुजर गए, अगर पूछना हो तो अभी पूछ लो। मैं भी दो साल पहले ऐसे ही आया था। मैं धोखा खा गया।
पर बुद्ध ने कहा: तुझे पूछना है, तो तू अब पूछ। वह भिक्षु कहने लगा: यही तो मेरी मुश्किल है, इन दो साल में प्रश्न तिरोहित हो गए। जीवन में इतना आनंद है।
जीवन अपने में समाधान है।
इसलिए तो हम ध्यान की परम अवस्था को समाधि कहते हैं। ‘समाधि’ और ‘समाधान’ एक ही शब्द से बनते हैं। समाधान प्रश्नों के उत्तर में नहीं है। समाधान तो चित्त की उस समाधि-अवस्था में है जहां कोई प्रश्न नहीं रह जाते, निर्विचार दशा फलित होती है।
मौलुंकपुत्त रुका। दो साल पूरे हो गए। बुद्ध ने याद रखा था। ठीक दो साल पूरे होने पर बुद्ध ने कहा: मौलुंकपुत्त! दो साल पूरे हो गए, अब तू पूछ ले। मौलुंकपुत्त हंसने लगा। उसने कहा: आपने मुझे भी धोखा दिया। वह भिक्षु ठीक कहता था। अब मेरे पास पूछने को कुछ भी नहीं। पूछने में ही गलती थी। उत्तर सब सही थे, मगर पूछने में ही गलती हो रही थी। आज में कह सकता हूं कि जो-जो उत्तर मुझे मिले थे सब सही थे। लेकिन पूछने में ही गलती हो गई थी।
पूछा जिसने वह उत्तर कभी नहीं पा सकता। इसलिए तुम यह तो कहो ही मत कबीर, कि सुलझा नहीं। सुलझाने की बात ही नहीं है यहां। यहां हम मानते ही नहीं कि कुछ उलझा है। सब सुलझा ही है। देखते नहीं, चांद तारे कितनी व्यवस्था से चल रहे हैं! ऋतुएं कितनी व्यवस्था से आती हैं! जीवन कैसा चुपचाप कितना नियोजित, संगीतपूर्ण चल रहा है। देखते नहीं इस विराट को, यहां सब सुलझा है! उलझा कहां है। इस कोयल की कुहू-कुहू से लेकर चांद-तारों तक सब सुलझा है। उलझे हो तो तुम उलझे हो।
और तुम्हारा उलझाव क्या है। तुम्हारी पहली मान्यता कि जीवन-प्रश्न है। वहीं भूल हो गई। पहले कदम पर भूल हो गई। और जिसका पहला कदम गलत पड़ जाता है, फिर उसकी पूरी यात्रा गलत हो जाती है।
लौटो, वापस आओ! पहला कदम वापस लो। प्रश्न जाने दो--उत्तर आएंगे। और यह चमत्कार है। जब तक प्रश्न होते हैं, उत्तर नहीं आते। जब प्रश्न नहीं होते, उत्तर आते हैं। उत्तर आते हैं। यह कहना ठीक नहीं--उत्तर आता है। क्योंकि एक ही उत्तर है।

तीसरा प्रश्न:
भगवान, भारतीय मनीषी अर्थहीनता और ऊब की उतनी चर्चा नहीं करते जितनी प्रेम की, ध्यान की और आनंद की करते हैं। क्या प्रेम, ध्यान और आनंद की सीधी चर्चा जीवन की अर्थहीनता और ऊब को जानने में उपयोगी है? कृपा करके कहें।
पश्चिम में बहुत चर्चा होती है कि जीवन ऊब है, अर्थहीन है, व्यर्थ है, कोई सार नहीं, असार है। उस चर्चा का परिणाम ही यह हुआ है कि लोगों ने धीरे-धीरे यह स्वीकार कर लिया कि जीवन व्यर्थ है, असार है। लोग उदास हो गए हैं। लोगों ने जीवन में अपनी जड़ें खो दी हैं। लोग यूं ही जी रहे हैं। बस मरने की राह जैसे देख रहे हों। जीवन की उत्फुल्लता चली गई है।
और यद्यपि पश्चिम के विचारक जो कहते हैं उसमें थोड़ी सच्चाई है, पर आधी सच्चाई है। केवल आधी। जीवन ऊब है, जीवन व्यर्थ है और जीवन असार है। हमारे मनीषियों ने भी कहा है कि जीवन व्यर्थ है और असार है। लेकिन उतना ही कह कर चुप नहीं रह गए। वह आधा वचन है। जीवन असार है, क्योंकि एक और भी जीवन है, जो सार है। यह जीवन असार है, मगर जीवन मात्र असार नहीं है। यह जीवन व्यर्थ है, मगर एक और भी आयाम है जीवन का, जो सार्थक है।
यह आधा वचन है कि जीवन असार है। जीवन असार तभी कहा जा सकता है जब कहीं सार हो। नहीं तो असार भी कैसे कहोगे? किस तुलना में कहोगे? किसी आदमी को गरीब कह सकते हो, क्योंकि अमीर होते हैं। अगर अमीर होते ही न हों, तो गरीब किसको कहोगे? किसी को सुंदर कहते हो, क्योंकि असुंदर होता है कोई। अगर असुंदर कुछ होता ही न हो, तो सुंदर किसे कहोगे? और अगर सुंदर होता ही न हो, तो फिर असुंदर कहने में क्या अर्थ है।
पश्चिम के मनीषियों के वक्तव्य बेमानी हैं। यह कहना कि जीवन अर्थहीन है--पर्याप्त नहीं है, अधूरा है, किसकी तुलना में? किस अपेक्षा में? किस पृष्ठभूमि में? पूरब के मनीषी पृष्ठभूमि की भी बात करते हैं। एक आनंद की संभावना है आदमी को, इसलिए यह जीवन दुख है। यह जीवन कांटा है, क्योंकि एक फूल खिल सकता है। और स्वभावतः उनका जोर फूल पर ज्यादा है। क्योंकि कांटे पर क्या जोर देना? कांटे को तो तुम जानते ही हो। कांटा तो तुम्हारी छाती में चुभा ही है। घाव तो तुम्हारी जिंदगी में बने ही है। अब इसकी और क्या बात करनी!
तुम्हारे घावों को और क्या उकसाना!
पूरब का मनीषी उस दूसरे जगत की चर्चा करता है--ध्यान की, प्रेम की, आनंद की, महोत्सव की--ताकि तुम्हें यह याद आ जाए कि जिस जिंदगी को तुमने जिंदगी समझा, वह काफी नहीं है। अभी और बहुत बाकी है, और थोड़े आगे चलो। वह आगे की बात करता है, ताकि तुम आगे चलो।
एक सूफी कहानी है। एक लकड़हारा जिंदगी भर लकड़ी काटता रहा। एक फकीर उसे रोज लकड़ी काटते देखता। और जब भी वह फकीर के पास से गुजरता तो औपचारिक रूप से, जैसा पूरब के लोग करते हैं, फकीर के चरण छूता। फकीर उससे कहता: और आगे। वह जरा हैरान होता कि यह फकीर कुछ झक्की मालूम होता है। हम करते हैं: राम-राम, यह कहता है: और आगे! यह कोई उत्तर हुआ? लेकिन उसे यह उत्तर परेशान करने लगा। चला जाए, मगर सोचे कि और आगे, यह भी कोई उत्तर हुआ! हमने सिर्फ जयरामजी की थी, झुक कर नमस्कार किया था; और आगे का क्या मतलब? यह आदमी पागल है। मगर यह उत्सुकता उसकी बढ़ती गई कि कहीं कुछ मतलब हो ही न! एक दिन उसने पैर पकड़ लिए। उसने कहा: महाराज! और आगे का मतलब समझा दें। मेरी कुछ समझ में नहीं आता।
उस फकीर ने कहा: लकड़ी ही काटता रहेगा जिंदगी भर? और आगे! जरा आगे जा। तू यहीं से लकड़ी काट कर लौट जाता है। जरा आगे तो जा आज और देख।
वह आदमी आगे गया। वह चकित हो गया। वहां उसे एक तांबे की खदान मिल गई। अब तो वह बेच लेता एक दिन तांबा ले जाकर बाजार में, महीने पंद्रह दिन के लिए निश्चिंत हो जाता। फकीर का बड़ा अनुगृहीत था। रोज आता नमस्कार करने, लेकिन फकीर था कि वही कहे चला जाता--और आगे! एक दिन उसने कहा कि अब और क्या आगे? फकीर ने कहा: वहीं मत रुक जा पागल! और भी आगे अभी जंगल है, तू जरा जा।
वह आगे गया। और उसे चांदी की खदान मिल गई। और ऐसे ही कहानी चलती रही, और फकीर कहता रहा--और आगे! एक दिन उसे सोने की खदान मिल गई। अब तो कहना ही क्या था। अब तो उसने फकीर के पास नमस्कार करने आना भी बंद कर दिया। अब सार ही क्या था? सोना, मतलब आखिरी चीज मिल गई। लेकिन फकीर भी एक ही था, जिस दिन से उसने आना बंद किया वह उसके द्वार पर जाकर दस्तक मारने लगा कि ‘और आगे!’ उस आदमी ने कहा: मुझे माफ करो। अब मुझे कहीं नहीं जाना। अब बहुत मिल गया--अपने लिए नहीं, पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए काफी मिल गया। लेकिन फकीर था कि आता ही रहा और कहता रहा कि--और आगे! आखिर उत्सुकता जगी उस आदमी को--कब तक? जैसे मैं तुमसे रोज कहे चला जाता हूं। कब तक? और आगे! एक दिन उसने कहा: एक दफा कोशिश करके देख ली जाए, इतने दिन तक तो यह आदमी सही साबित हुआ ही, पता नहीं.। हीरों की खदान मिल गई। तब बड़ा दुखी हुआ कि सुनी नहीं मैंने बात। लेकिन वह फकीर तो एक ही था, वह तो कहे ही चला जाए। और आगे! अब तो उसने बड़ा महल बनवा लिया था। अब तो वह लकड़हारा सम्राटों की तरह रहने लगा था। लेकिन वह फकीर था कि आता चला जाए।
एक दिन उस लकड़हारे ने कहा कि अब और आगे क्या हो सकता है? अब तो बात खतम हो गई। उस फकीर ने कहा: और आगे मैं हूं। हीरे पर बात खतम नहीं होती। बात तो परमात्मा पर खतम होगी। और जब तक तू परमात्मा को नहीं खोज लेता, तब तक मैं कहे चला जाऊंगा--और आगे।
पूरब के मनीषी आनंद की बात करते हैं, क्योंकि वहां पहुंचना है। तुम्हारे दुख की चर्चा उठा कर ज्यादा सार नहीं है। थोड़ी बहुत चर्चा करते हैं, ताकि तुम्हें याद आ जाए कि तुम दुख में हो। तुम तो भुला कर बैठे हो कि दुख में हो। अगर भुलाओ न तो इतनी आसानी से बैठ भी नहीं सकते। दुकान पर बैठे हो, भुलाए बैठे हो। घर में बैठे हो, भुलाए बैठे हो। दुख बहुत है। कोई पूछता है: कहो जी कैसे हो? तुम कहते हो। सब चंगा है। चंगा कहीं दिखाई पड़ता नहीं। सब ठीक है। क्या ठीक है? खाक ठीक है। मगर एक औपचार है। कहने की बात है, कहनी चाहिए सब ठीक है, तो कहते हो।
तो पूरब के मनीषी तुम्हें थोड़ी याद भी दिलाते हैं कि सब ठीक नहीं है, सब गलत है अभी। जरा और आगे चलो, सब ठीक होने का समय आ सकता है। सब ठीक हो सकता है, मगर अभी है नहीं।
पश्चिम में जो आस्तिकवादी विचारक हैं, जिनकी इस सदी पर बड़ी छाप पड़ी है, वे सिर्फ इसी की बात करते हैं कि यह व्यर्थ, वह व्यर्थ। स्वभावतः अगर सब व्यर्थ है और कुछ सार्थक कहीं है ही नहीं। और सार्थक कभी होगा भी नहीं, तो मनुष्य के जीवन का रस एकदम छिन जाता है। फिर आदमी जीए क्यों। फिर आदमी आत्मघात क्यों न कर ले। फिर जीने का प्रयोजन क्या है। फिर यह बोझ क्यों ढोना, अगर यह बिलकुल ही निरर्थक है? अगर यह खेती से कभी कुछ मिलेगा नहीं, अगर इस फुलवारी में कभी फूल आएंगे ही नहीं, अगर यह गीत कभी जमेगा ही नहीं, यह वीणा कभी बजेगी ही नहीं--तो फिर सार क्या है, तोड़ क्यों न दें इसे? वह भी बात उठनी शुरू हो गई है।
अल्बर्ट कामू ने लिखा है: आत्मघात के अतिरिक्त और कोई असली दार्शनिक समस्या नहीं है। एक ही असली दार्शनिक समस्या है कि आदमी जीए क्यों? और पश्चिम में आत्मघात बढ़ा है--बड़ी संख्या में बढ़ा है। रोज संख्या बढ़ती जा रही है आत्मघात की। और न केवल व्यक्तिगत रूप से आत्मघात की संख्या बढ़ रही है, बल्कि किसी अचेतन प्रक्रिया में पूरी मनुष्य-जाति सामूहिक आत्मघात का आयोजन कर रही है। तुम्हारे अणुबम, तुम्हारे उद्जन बम, तुम्हारे नाइट्रोजन बम--और क्या हैं? एक सामूहिक आत्मघात का आयोजन। इस पृथ्वी को नष्ट कर डालने का आयोजन।
वैज्ञानिक कहते हैं: अब हमारे पास इतनी क्षमता है कि इस पृथ्वी को हम सात बार नष्ट कर सकते हैं। मगर फिर भी आयोजन चलते जा रहे हैं, अभी बढ़ते ही जा रहे हैं। बमों के ढेर लगते जा रहे हैं। अब तो कोई जरूरत भी नहीं, सात बार मार सकते हो एक-एक आदमी को। कहां तक बचेगा आदमी? पहली दफा में ही मर जाता है, कोई आदमी इतनी ताकतवर चीज थोड़े ही है। सात बार मार सकते हैं हम एक-एक आदमी को। हम भूत-प्रेतों को भी न बचने देंगे। अब किस लिए आयोजन? अब काफी नहीं हो गया आयोजन? मगर आयोजन चल रहा है। राशि बढ़ती चली जाती है। विस्फोट किसी भी दिन हो सकता है। यह पूरी पृथ्वी, ऐसा लगता है, किसी अचेतन आत्महत्या की आकांक्षा से भरी है। और उसके पीछे इसी तरह के विचारों का हाथ है--जो कहते हैं: कुछ भी सार नहीं। जब सार ही नहीं तो ठीक है, मरने में फिर क्या बुराई है?
पूरब ने भी कहा है कि जिंदगी में सार नहीं, लेकिन सिर्फ इसीलिए कहा है: एक और जिंदगी है। बुद्ध ने भी कहा है: जीवन दुख है। अब यह बड़े मजे की बात है कि बुद्ध कहते हैं: जीवन दुख है, और बुद्ध से ज्यादा आनंदित आदमी तुमने कहीं देखा? बुद्ध कहते हैं: जीवन व्यर्थ है और बुद्ध से ज्यादा सार्थक जीवन तुमने कभी देखा? और बुद्ध कहते हैं: यहां कुछ भी नहीं है, और बुद्ध से ज्यादा समृद्धि तुमने कहीं देखी?
पूरब का मनीषी जब कहता है: जीवन असार है, तो इसीलिए कहता है ताकि तुम भीतर की तरफ मुड़ सको। पश्चिम का विचारक जीवन असार है कह कर रुक जाता है। और आधे सत्य असत्यों से भी खतरनाक हो जाते हैं। और यह जीवन असार क्यों है? फिर इतने लोग जी क्यों रहे हैं? उन्हें इसमें भी कहीं कुछ सार दिखाई पड़ रहा है। जैसे चांद झलका हो झील में; मगर झील में जो चांद झलक रहा है वह कितना ही झूठा हो, एक बात तो पक्की है कि किसी असली चांद की झलक दे रहा है। असली चांद न हो, तो झील में झूठा चांद भी नहीं झलक सकता। माना कि जब तुम आईने के सामने खड़े होते हो तो आईने में तुम्हारी जो तस्वीर होती है, वह झूठी है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन तुम्हारे बिना वह तस्वीर नहीं हो सकती। तुम हो, वह तस्वीर तुम्हारी खबर दे रही है।
दिल की धड़कन तेरी पलकों की झपक में उमड़ी
देर तक राज रहे राज तो खुल जाता है
अपनी किरनों को समेटे हुए हंगामे-सफर
चांद शबनम में उतरता है तो ढल जाता है
घास की एक पत्ती पर, ओस की बूंद जमी, पूरा चांद आकाश में दौड़ रहा है, अपनी यात्रा पर निकला है, ओस की छोटी सी बूंद में चांद झलक रहा है। चांद असली है, ओस की बूंद क्षणभंगुर; लेकिन ओस की बूंद में चांद झलक रहा है--बड़ा प्यारा चांद।
अपनी किरणों को समेटे हुए हंगामे-सफर
चांद शबनम में उतरता है तो ढल जाता है
लेकिन यह एक बूंद सरकी-सरकी, हवा का यह झोंका आया, सरकी, सरकी, गई, मिट्टी में गिरी, खो गई। इस बूंद में जो झलकता था चांद वह भी ढल गया। मगर असली चांद नहीं ढल गया है। असली चांद अब भी आकाश में है। दर्पण को तोड़ दो। तुम थोड़े ही टूट जाओगे।
हमने संसार में जो सार देखा है वह भी परमात्मा की झलक है।
संसार असार है। इसको ही जो सार मान लेता है वह गलती में पड़ रहा है। लेकिन सार की तरफ इशारा है। झलक इसमें जिसकी पड़ रही है, वह सच है। संसार दर्पण है। इसलिए हम दर्पण की भी बात करते हैं, उसके दुख की भी बात करते हैं, लेकिन ज्यादातर हम उस परमात्मा की बात करते हैं, जिसकी छाया इस दर्पण में पड़ रही है। तुम्हें छाया से मुक्त करना है। उस छाया का नाम ही माया है। और तुम्हें छाया के मालिक की तरफ ले चलना है।
पूरब का विचार तुम्हें एक यात्रा पर गतिमान करता है। पश्चिम का विचार तुम्हें घबड़ा देता है, बीच में थका कर बिठा देता है। पश्चिम का विचार तुम्हें निस्तेज कर देता है, तुम्हारे पैर की गति छीन लेता है। नाच तो दूर, चलना तक भुला देता है। पूरब का विचार चलना तो सिखाता ही है, नाच भी सिखाता है। वही पैर जो सिर्फ चलना जानते थे, जब नाचने लगते हैं, जब उनमें घूंघर बजते हैं, जब कोई मीरा नाच उठती है--तब पूरब का विचार प्रतिफलित होता है।
पूरब परम आनंद में भरोसा करता है, इसलिए कहता है कि जीवन दुख है। उतनी ही बात को मान कर जो चल पड़ेगा वह अड़चन में पड़ जाएगा। पश्चिम ने अभी पूरी बात सुनी नहीं।
और फिर मैं दोहरा दूं: अधूरे सत्य असत्यों से भी खतरनाक होते हैं, क्योंकि उनमें सच्चाई होती है। सच्चाई की वजह से बल होता है। मगर अधूरी सच्चाई लोगों को भटकाती है, भरमाती है।
आई न फिर नजर कहीं, जाने किधर गई
उन तक तो साथ गर्दशे शामो-सहर गई
कुछ इतना बेसबात था, हर जलवा-ए-हयात
लौट आई जख्म खाके जिधर भी नजर गई
आ देख मुझसे रूठने वाले तेरे बगैर
दिन भी गुजर गया, मेरी शब भी गुजर गई
नादिम है अपने-अपने करीने पर हर नजर
दुनिया लहु उछाल कर कितनी निखर गई
मिलती है हर्फे जर्क मये-गम भी ऐ नदीम
तकदीर जो बिगड़ न सकी वो संवर गई
शबनम हो, कहकशां हो, सितारे हों, फूल हों
जो शै तुम्हारे सामने आई निखर गई
‘बाकी’ दिले हजीं के सम्हलने की देर थी
हर चीज अपनी-अपनी जगह पे ठहर गई
सिर्फ दुखी हृदय के सम्हलने की बात है।
‘बाकी’ दिले हजीं के सम्हलने की देर थी
बस दुख से भरे हृदय के सम्हल जाने की बात है।
हर चीज अपनी-अपनी जगह पे ठहर गई
इधर भीतर तुम्हारे विचार रुक जाएं, बाहर सब रुक जाता है। मन रुके, सारा संसार रुक जाता है। मन रुके कि तुम परिवर्तन के बाहर हो गए। तुम प्रवाह के बाहर हो गए, तुम्हारा शाश्वत से नाता हो गया। वह शाश्वत ही परमात्मा है--जो सदा है, सदा था, सदा होगा। उस सदा के साथ संबंध जोड़ने में ही आनंद की वर्षा है।
क्षणभंगुर में तो दुख होगा ही। बबूलों से प्रेम करोगे, बबूले टूट जाएंगे, पछताओगे, रोओगे। बबूलों से आसक्ति लगाओगे, कितने दिन तक आंसुओं को रोक सकोगे? जाते के साथ संबंध जोड़ोगे, फिर पछताओगे, फिर पीड़ा उठेगी, फिर जख्म हो जाएंगे। जो न आता न जाता, जो सदा है, उससे संबंध जोड़ लो, उससे ही नाता असली नाता है।
‘बाकी’ दिले हजीं के सम्हलने की देर थी
हर चीज अपनी-अपनी जगह पर ठहर गई
शबनम हो, कहकशां हो, सितारे हों, फूल हों
जो शै तुम्हारे सामने आई निखर गई।
और एक बार शाश्वत से संबंध जुड़ जाए, तो फिर सब चीजें निखर जाती हैं। फिर कांटे भी फूल हो जाते हैं। फिर रातें भी दिन हो जाती हैं। फिर मृत्यु में भी अमृत के दर्शन होते हैं।

चौथा प्रश्न:
भगवान, हिंदू धर्म पांच हजार साल पुराना है, बौद्ध और जैन धर्म ढाई हजार साल पुराने हैं। इस्लाम केवल सोलह सौ साल पुराना है; वह नया होने के बावजूद भी इतना पुराना क्यों लगता है?
पूछा है पाकिस्तान से आए हुए मित्र फिरोज ने।
मनुष्य एक ही सदी में हों तो भी एक ही सदी में नहीं होते। यह बीसवीं सदी है। सभी लोग बीसवीं सदी में नहीं हैं। अभी तुम्हें जंगल में ऐसे आदमी मिल जाएंगे, जो पांच हजार साल पहले रह रहे हैं--आदिवासी। वे अभी भी पांच हजार साल पहले जैसा आदमी जीता था वैसे ही जी रहे हैं, उनको तुम बीसवीं सदी का हिस्सा नहीं मान सकते। उनके धर्म, उनके विचार इस सदी के नहीं हैं, पांच हजार साल पुराने हैं। अगर उन आदिवासियों से जाकर मुझे बात करनी पड़े, तो जो बात मैं तुमसे कर रहा हूं, यह बात इसी तरह उनसे नहीं कर सकूंगा। मुझे उनकी भाषा में बात करनी पड़ेगी। मुझे उनके ढंग में बात करनी पड़ेगी। मुझे अनुवाद करना होगा पांच हजार साल पुरानी बात में, तब कहीं वे समझ पाएंगे।
इसलिए धर्मों के अलग-अलग जन्म हुए, अलग-अलग देशों में, अलग-अलग परिस्थितियों में। हिंदू धर्म पांच हजार साल पुराना है, ज्यादा पुराना भी हो सकता है। पांच हजार साल पुराना है, इतना तो तय ही है। लेकिन यह देश हजारों साल से धर्म की दिशा में बड़ा मंथन करता रहा है। बड़ा चिंतन करता रहा है। इसने बड़े परिष्कार किए। तो पांच हजार साल पहले भी वेदों ने जो ऊंचाई ले ली, वह बाद में आने वाले धर्म न ले सके। क्योंकि बाद में आने वाले धर्म इतनी परिष्कृत संस्कृति में पैदा नहीं हुए।
मोहम्मद को जिन लोगों से बात करनी पड़ी, उनसे अगर वे उपनिषद की भाषा बोलते, उपनिषद जैसे वचन बोलते तो वे समझते ही नहीं। मोहम्मद को तो उनकी ही भाषा में ही बोलना पड़ा। इस्लाम जहां पैदा हुआ वह संस्कृति अपरिष्कृत थी, परिष्कृत नहीं थी। बहुत जड़ अंधविश्वासी लोग थे। मोहम्मद की पूरी जिंदगी इसी झंझट में बीती। मोहम्मद शांति का संदेश लाए, लेकिन हाथ में तलवार रखनी पड़ी। क्योंकि वहां तलवार के सिवा दूसरी कोई भाषा समझी नहीं जाती थी। मोहम्मद ने अपनी तलवार पर खोद रखा था--‘शांति मेरा संदेश है।’ तलवार पर खोदना पड़े--शांति संदेश है।
‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ होता है शांति। शांति का धर्म। खबर तो देनी थी शांति की, मगर लोग लड़ाकू थे, खूंखार थे, युद्ध के सिवाय दूसरी चीज जानते नहीं थे। मरना और मारना, यही उनकी भाषा थी। मोहम्मद जिंदगी भर भागते फिरे, अपने को बचाते फिरे।
तुम जरा सोचो, बुद्ध पर ऐसा नहीं गुजरा कि तलवार लिए और भागते फिरे, छिपते फिरे, एक गांव से दूसरे गांव। बुद्ध को अगर ऐसा झेलना पड़ता, तो बुद्ध जो बोले, वह नहीं बोल सकते थे। फिर उन्हें मोहम्मद की भाषा में बोलना पड़ता। मोहम्मद को अगर बुद्ध जैसे लोग मिले होते चारों तरफ, तो मोहम्मद बुद्ध की भाषा में बोलते। इस पर निर्भर करता है कि किन लोगों से बोली जा रही है बात।
मोहम्मद को बड़ी कठिनाई से अपनी बात पहुंचानी पड़ी। मोहम्मद का प्रयास बुद्ध के प्रयास से ज्यादा बहुमूल्य है, क्योंकि बुद्ध तो साफ-साफ कह रहे हैं, सुनने वाले लोग साफ-साफ सुनने में समर्थ हैं। तुम्हें पता है, इस देश में हमने किसी बुद्ध को सूली नहीं दी। किसी बुद्ध को मारा नहीं, हत्या नहीं की। वह इस देश की भाषा नहीं। पांच हजार साल निरंतर सोचने-विचारने का यह परिणाम हुआ कि सोचने-विचारने में एक उदारता आ गई।
मोहम्मद जिन लोगों के बीच जीए वे उदार नहीं थे--कठोर लोग थे, खूंखार लोग थे। हालांकि कठोर और खूंखार होने के बावजूद भी उनमें एक खूबी थी, जो हमेशा कठोर लोगों में होती है। जितना जंगली आदमी होता है उतना सीधा-सरल भी होता है। और जितना परिष्कृत आदमी होता है उतना जटिल और चालबाज भी होता है। बुद्ध को हमने मारा नहीं, क्योंकि यह परिष्कृत देश है। लेकिन बुद्ध को मिटाने की हमने परिष्कृत कोशिश की।
फर्क समझ लेना।
हिंदुओं ने कथा लिखी है बुद्ध के बाबत। बुद्ध को स्वीकार कर लिया कि ये दसवें अवतार हैं हमारे--वैसे ही जैसे कृष्ण, जैसे राम। ये बड़े होशियार लोग थे जिन्होंने कहा कि बुद्ध हमारे दसवें अवतार हैं--भगवान का अवतार हैं! मगर कहानी जो घड़ी वह यह कि भगवान ने दुनिया बनाई: नरक बनाया, स्वर्ग बनाया, मगर लोग पाप करते ही नहीं थे, तो नरक कोई जाता नहीं था। नरक खाली ही पड़ा था। नरक में शैतान बैठा है अपने सिंहासन पर, अपने सिपाहियों को लिए, न कोई आता न कोई जाता। सदियां बीत गई, आखिर शैतान भी परेशान हो गया। उसने भगवान से कहा कि सार क्या है नरक को रखने का? अगर कोई पाप करता नहीं, कोई दंडित होता नहीं, तो मुझे छुटकारा दो, हम नाहक दंड पा रहे हैं। हम वहां बैठे-बैठे क्या करें? यह दफ्तर चलता ही नहीं। यह बंद करो। यह खाता समाप्त करो।
तो भगवान ने कहा: तू ठहर, मैं जल्दी ही बुद्ध के रूप में अवतार लूंगा, लोगों को भ्रष्ट करूंगा। और जब लोग भ्रष्ट हो जाएंगे तो नरक में ऐसी भीड़ मचेगी कि तुझसे सम्हाले न सम्हलेगी।
अब सुन रहे हो यह कहानी, बुद्ध की गर्दन नहीं काटी, मगर किस होशियारी से काटी। शब्द से काटी। तर्क से काटी। भगवान भी मान लिया। इतने परिष्कृत लोग थे कि एकदम इनकार भी नहीं कर सके, आदमी तो महिमाशाली था! मगर इनके सारे धर्म के विपरीत था। इनके सारे क्रियाकांड के विपरीत था। इनके हवन-यज्ञ के विपरीत था। इनके पांडित्य, पुरोहित के विपरीत था। आदमी तो बहूमूल्य था, मगर इनके विपरीत था। ये इनकार भी नहीं कर सके कि इस आदमी में कुछ महत्वपूर्ण है। तो भगवान का अवतार भी मान लिया, पीछे के दरवाजे से यह कहानी भी जोड़ दी। मानना मत बुद्ध को, नहीं तो नरक जाओगे। बुद्ध भगवान के अवतार हैं। यह देखते हो तरकीब। और बुद्ध धर्म को उखाड़ फेंका भारत से।
मोहम्मद के पीछे लोग तलवार लेकर पड़े रहे। मगर मोहम्मद को उखाड़ नहीं पाए। हिंदुस्तान में बुद्ध के पीछे तलवार लेकर नहीं पड़े और बुद्ध को उखाड़ दिया। चालबाज!
जितना सुसंस्कृत आदमी होता है, उतना ही चालबाज भी हो जाता है। चालाक हो जाता है।
मोहम्मद कठोर लोगों के बीच में थे, मगर सीधे-सादे, भोले-भाले लोगों के बीच में थे। जंगली आदमी अक्सर भोले-भाले होते हैं। दोनों बातें होती हैं। जूझेंगे तो तलवार से लड़ लेते हैं और अगर झुक गए तो गर्दन सामने कर देते हैं। न मारने से डरते हैं, न मरने से डरते हैं। और मरने-मारने की सीधी भाषा बोलते हैं। कोई तर्क वगैरह का सवाल नहीं है। एक ही तर्क जानते हैं--सीधा प्रकृति का तर्क। तो मोहम्मद को कठिनाई भी बहुत थी। बिलकुल अविकसित लोगों के बीच धर्म की खबर पहुंचानी थी। और दूसरी तरफ सरलता भी बहुत थी।
तो इस्लाम अपरिष्कृत धर्म है। इसलिए तुम्हारा कहना ठीक है, फिरोज, कि चौदह सौ साल पुराना धर्म है, लेकिन ऐसा लगता है बहुत पुराना हो। उससे तो हिंदू धर्म बहुत पुराना है, लेकिन उतना पुराना नहीं लगता। अब जैसे कोई चोरी करे, उसके हाथ काट दो। अब यह बात बेहूदगी की है। यह ऐसा लगता है जैसे बहुत जंगली जमाने की बात आ गई। और पाकिस्तान में अभी किया जा रहा है। कोई चोरी करे, उसके हाथ काट दो। बलात्कार कोई कर दे, तो उसकी गर्दन काट दो। सजा मिलनी ठीक है, मगर यह जरा जरूरत से ज्यादा हो गई।
मेरी एक संन्यासिनी ईरान में थी, कमल। उसे तो रीति-रिवाज ईरान के कुछ पता नहीं हैं। पश्चिम की लड़की है। पश्चिम की खुली हवा में पली है। वह एक पहाड़ी झरने पर मस्त होकर नहा रही थी और वहां पर कोई था भी नहीं, कि चार-पांच ईरानी आ गए और उन्होंने बलात्कार किया। फिर वे पकड़े गए। जब वे पकड़े गए, तब कमल बहुत घबड़ाई। उसने मुझे पत्र लिखा वहां से, कि जल्दी से मुझे खबर करें कि मैं क्या करूं? क्योंकि अगर मैं कहती हूं कि मेरे साथ बलात्कार हुआ है तो ये पांच आदमियों को फांसी लग जाएगी।
यह जरा जरूरत से ज्यादा है। जिसके साथ बलात्कार हुआ है, वह लड़की लिख रही है कि यह जरा जरूरत से ज्यादा है। इनको सजा तो मिलनी चाहिए, मगर फांसी! और ये पांच आदमी मारे जाएं, तो मैं जिंदगी भर इस अपराध से मुक्त न हो सकूंगी कि मुझे लगेगा कि मेरी जिम्मेवारी है।
तो मैंने उसे लिखा कि तू जो ठीक समझे वैसा कर! उसने इनकार कर दिया अदालत में कि मेरे साथ बलात्कार नहीं हुआ है।
यह एक परिष्कृत संस्कृति की बात हुई। बलात्कार हुआ है, वह क्रुद्ध थी बहुत। उसके साथ ज्यादती की गई। उसके साथ जो बुरा से बुरा हो सकता है, वह किया गया। लेकिन फिर भी एक परिष्कृत संस्कृति का लक्षण है कि अदालत में उसने इनकार कर दिया कि मेरे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है। यह खबर झूठी है।
यह पांच आदमियों की हत्या हो जाए, यह बात उसकी समझ में नहीं आई। उसको भरोसा ही नहीं आया। इनको दो-चार साल की सजा हो जाती, ठीक था। लेकिन इनको रास्ते पर खड़ा करके इनकी गर्दन काट दी जाएगी। तो वह घबड़ा गई कि यह पांच आदमियों की कटती हुई गर्दन सदा मेरा पीछा करेगी। मुझे लगेगा मेरा हाथ है। इतना तो कुछ बड़ा कसूर न था।
इस्लाम चौदह सौ साल पुराना धर्म है, लेकिन उसकी अपरिष्कृत दशा देख कर अगर सोचो तो वह हिंदुओं से ज्यादा पुराना धर्म है। और बौद्धों से तो बहुत ही ज्यादा पुराना धर्म है। जैनों से तो बहुत ही पुराना धर्म है। क्योंकि कहां बुद्ध की करुणा और कहां चोर चोरी कर ले, उसके हाथ काट डालना।
ताओ पांच हजार साल पुरानी परंपरा है चीन में और मुझे सदा से कहानी प्रिय रही है, मैंने बहुत बार कही है। लाओत्सु एक दफा न्यायाधीश बना दिया गया था। तो पहला ही मुकदमा आया, एक आदमी ने चोरी की थी। गांव के सबसे बड़े साहूकार के घर चोरी की थी। और उसने मुकदमा सुना और उसने दोनों को छह-छह महीने की सजा दे दी--साहूकार को भी, और चोर को भी।
यह ढाई हजार साल पुरानी घटना है। मार्क्स इत्यादि को पीछे छोड़ दिया। साहूकार तो समझा ही नहीं। उसने कहा कि यह माजरा क्या है! होश में हो? मेरे घर चोरी हुई और मुझे सजा दी जा रही है।
लाओत्सु ने कहा: हां। क्योंकि तुमने इतना धन इकट्ठा कर लिया है कि अब चोरी न हो तो और क्या हो? यह आदमी नंबर दो का कसूरवार है, नंबर एक कसूरवार तुम हो। तुमने सारे गांव का धन इकट्ठा कर लिया है। चोरी तो होगी ही। तुम चोरी पैदा करने का मूलस्रोत हो। तुम धन्यभागी हो कि मैं तुम्हें बराबर सजा दे रहा हूं; नहीं तो तुम्हें ज्यादा सजा मिलनी चाहिए। इस आदमी ने तो सिर्फ चोरी की है थोड़ी-बहुत, यह करे क्या।
सम्राट तक अपील गई। सम्राट को भी बात तो जंची, लेकिन यह तो खतरनाक बात है। अगर यह बात सच है तो सम्राट खुद ही चोर है। उसने लाओत्सु से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी कि आप विदा हों, यह आपका काम नहीं।
मगर देखते हो यह परिष्कार! ढाई हजार साल पहले लाओत्सु वह कह रहा है जो कम्यूनिज्म को भी पीछे छोड़ दे, साम्यवाद को पीछे छोड़ दे, समाजवाद को पीछे छोड़ दे। चीन परिष्कृत देश है। कनफ्यूशियस और लाओत्सु जैसे लोगों ने चीन को परिष्कार दिया। हजारों साल की पुरानी कथा है, लाओत्सु के पहले हजारों साल तक चीन परिष्कृत होता रहा। मोहम्मद के पहले तुम कोई नाम ले सकते हो अरब में? कोई नाम नहीं है। मोहम्मद से अरब का इतिहास शुरू होता है। मोहम्मद के पहले कोई नाम नहीं है, एक भी नाम नहीं है। इस देश में तुम नामों की गिनती करो तो गिनते चले जाओ, गिनती न कर पाओ। फिर मोहम्मद के बाद भी कोई ऐसा नाम नहीं है जो मोहम्मद की ऊंचाई पर आता हो। इस देश में बुद्धों पर बुद्ध हुए हैं, एक-दूसरे से बढ़-चढ़ कर हुए हैं। चमकते सूरज। उनका सिलसिला जारी रहा है।
मोहम्मद को बड़े अंधेरे से लड़ना पड़ा है--बड़े पुराने अंधेरे से। और बड़े जंगली लोगों के बीच संदेश देना पड़ा। इसलिए भाषा संदेश की बहुत जड़ है।
मुझसे लोग कहते हैं कि मैं कुरान पर क्यों नहीं बोल रहा हूं? इसलिए बचाए जाता हूं। क्योंकि कुरान पर बोलूं तो मैं ईमानदारी नहीं कर सकूंगा। मुझे कुछ बातें छोड़ देनी पड़ेंगी। वे मैं नहीं कह सकूंगा। मुझे कुछ बातों का विरोध भी करना पड़ेगा। जिस भांति मैं उपनिषद से पूरा-पूरा राजी हो जाता हूं, वैसा मैं पूरा-पूरा कुरान से राजी नहीं हो सकूंगा। क्योंकि मैं जिनसे बोल रहा हूं वे दूसरे तरह के लोग हैं।
मोहम्मद ऐसे हैं जैसे प्राइमरी स्कूल में कोई शिक्षक। इस देश में बोलने का मतलब होता है, विश्वविद्यालय की अंतिम कक्षा। इसलिए फिरोज तुम्हारा कहना ठीक है, कि चौदह सौ साल पुराना होने पर भी इस्लाम इतना पुराना क्यों मालूम होता है? अपरिष्कृत है। और फिर एक तरह की जड़ता पकड़ गई, क्योंकि जड़ लोग थे जिन्होंने मोहम्मद का अनुगमन किया। जो लड़े, वे भी जड़ थे; जो उनके साथ आए, वे भी जड़ थे। वहां जड़ ही लोगों का जमाव था। जो साथ आ गए, वे भी जड़ थे। उन्होंने मतांध होकर मोहम्मद ने जो कहा, उसे पकड़ लिया। फिर उसमें कोई तरतीम नहीं की, फिर कोई सुधार नहीं किया।
यह जान कर तुम हैरान होओगे, कुरान पर कोई टीका नहीं लिखी जाती। इधर हम परिष्कार करते चले जाते हैं। हर सदी में हम फिर से टीका लिखते हैं ब्रह्मसूत्र पर, उपनिषद पर, गीता पर, क्योंकि सदी में कुछ बढ़ाव हो गया। हमें उपनिषद को खींच कर इस सदी तक लाना पड़ता है। इस सदी को हमें समाहित कर देना होता है।
जब मैं बुद्ध पर बोलता हूं, तो क्या तुम सोचते हो सिर्फ बुद्ध पर बोल रहा हूं? ढाई हजार साल में जो हुआ है वह भी उसमें सम्मिलित कर रहा हूं। बुद्ध को मैं आधुनिक कर रहा हूं। क्योंकि मैं बोल ही नहीं सकता बुद्ध पर बिना ढाई हजार साल को सम्मिलित किए। मैं ढाई हजार साल बाद आया हूं, तो ढाई हजार साल में जो कुछ घट गई हैं दुनिया की बातें, आदमी ने जो-जो अनुभव कर लिए हैं, जो विचार कर लिए हैं, वे सब उसमें सम्मिलित हो रहे हैं। कुरान वहीं के वहीं है। चौदह सौ साल पुराना था, वहीं के वहीं है। कुरान बंद डबरा हो गया, उपनिषद अभी भी बहती धारा है। अभी भी लोग आते हैं उपनिषद को आगे बढ़ा देते हैं। इसलिए उपनिषद का रोज-रोज नया संस्करण होता जाता है। कुरान वहीं का वहीं ठहरा हुआ है।
तो एक अर्थ में हिंदू, जैन, बौद्ध बहुत पुराने हैं और एक अर्थ में बहुत नये हैं। और कुरान नया है एक अर्थ में और दूसरे अर्थ में बहुत पुराना है। फिरोज का प्रश्न ठीक है। कुरान को भी खींच कर लाने की जरूरत है। कुरान को भी आधुनिक बनाने की जरूरत है, उसमें भी हीरे पड़े हैं। उसमें भी बड़ी बहुमूल्य बातें छिपी हैं। मगर वे हीरे अनगढ़ हैं। जैसे खदान से निकाले गए हों। उन पर बड़ी छैनी मारनी पड़ेगी। उनको बड़ा तराशना पड़ेगा। उनको बड़ा काटना पड़ेगा।
तुम्हें पता है, जब कोहिनूर हीरा मिला था, तो अभी जितना उसका वजन है, इससे तीन गुना ज्यादा था। वजन तो ज्यादा था लेकिन कीमत कुछ भी नहीं थी। अब वजन तो तीन गुना कम है लेकिन कीमत करोड़ गुनी है। क्या हुआ, वजन कम हुआ और कीमत बढ़ी! खूब तराशा गया है! नये-नये पहलू निकाले गए हैं। जो-जो व्यर्थ था झाड़ दिया गया है।
कुरान अनतराशा है। हीरा है खदान से निकला हुआ। उस पर तराशा नहीं गया। और जिन लोगों ने कुरान को स्वीकार किया उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसको तराशें। उन्होंने तो जैसा है बस वैसे का वैसा रखने की कोशिश की। उन्होंने उसे सुरक्षित रखा है--ठीक वैसा का वैसा सुरक्षित रखा है। जरा भी हेर-फेर नहीं होने दिया। रक्षा तो पूरी की है, लेकिन हीरा अनगढ़ रह गया है। उस पर नई टीकाएं चाहिए। उस पर नये वक्तव्य चाहिए। उस पर नये मनीषियों के बोल चाहिए। मगर नये मनीषियों के बोल सहने की हिम्मत मुसलमान की नहीं है। वह तो नाराज हो जाए। वह तो बरदाश्त ही न करे, अनुग्रह की तो बात अलग।
सारी दुनिया में मेरे संन्यासी हैं--पाकिस्तान को छोड़ कर। पाकिस्तान से मित्र आते हैं, ऐसा नहीं है कि नहीं आते--आते हैं, छिपे-छिपे आते हैं। फिरोज का ही आना हुआ है छिपे-छिपे। फिरोज संन्यासी होना चाहता है, लेकिन नहीं हो सकता, क्योंकि वहां गैरिक वस्त्र. कि जिंदा रहना मुश्किल हो जाए। गले में माला. कि गले का बचना मुश्किल हो जाए।
मुसलमान स्वागत नहीं करेंगे, अगर कुरान में नये विचारों के आविर्भाव हों, नई शाखाएं उगाई जाएं, नई कलमें लगाई जाएं अर्थ की--तो बजाय इसके कि वे धन्यवाद करें, वे एकदम नाराज हो जाएंगे। इसलिए कुरान जड़ हो गया है। होना नहीं चाहिए ऐसा।
कुरान प्यारी किताब है। थोड़ी सी प्यारी किताबों में एक किताब है। उसमें खूब रहस्य हैं, मगर निखार की जरूरत है। बड़े निखार की जरूरत है। और मुसलमान की तैयारी नहीं है उस निखार के लिए। मुसलमान छूने नहीं देता। वह कहता है: कुरान में संशोधन हो ही नहीं सकता। तो कहता है: कुरान आखिरी किताब है; परमात्मा ने अपना अंतिम संदेश भेज दिया।
परमात्मा अपना अंतिम संदेश कभी भेज नहीं सकता। परमात्मा के सभी संदेश आते रहेंगे, बदलते रहेंगे। समय बदलेगा, स्थिति बदलेगी, लोग बदलेंगे, संदेश बदलेगा। अंतहीन है यह सिलसिला। इसलिए इस्लाम पुराना मालूम पड़ता है।
मैंने सूफियों पर बोलना शुरू किया, क्योंकि मुसलमानों में सूफी ही एकमात्र थोड़े हिम्मतवर लोग हैं। लेकिन उनके साथ मुसलमानों ने कोई अच्छा सलूक नहीं किया है। मुसलमान उन्हें कुछ मुसलमान मानने को राजी नहीं हैं। मंसूर को फांसी लगा दी। सूफी फकीरों को सताया गया है, परेशान किया गया है। और सूफी फकीर भी बोलते हैं तो जैसे जबान पर ताले पड़े हों।
घटना प्यारी है, तुम्हारी समझ में आए तो अच्छा होगा।
अलहिल्लाज मंसूर ने जब घोषणा की अनलहक की--अहं ब्रह्मास्मि। इस देश में कोई घोषणा करता है तो कोई ऐसी घबड़ाहट नहीं हो जाती। हम जानते हैं कि यह परम सत्य है। कभी-कभी लोग वहां तक पहुंचते हैं। और चाहे कोई पहुंचे, चाहे न पहुंचे, यह हमारा अनुभव है कि वस्तुतः हम सब वही हैं; या कम से कम हमारी श्रद्धा है कि वस्तुतः हम सब वही हैं--परमात्म-स्वरूप हैं।
तो जब अलहिल्लाज मंसूर ने कहा: अनलहक, मैं सत्य हूं, मैं परमात्मा हूं. अगर हिंदुस्तान में कहा होता तो हमने उसे सिर पर उठा लिया होता; हमने उसे उपनिषद के ऋषियों के साथ गिना होता। लेकिन मुसलमानों ने बड़ी दिक्कत दे दी, मारने को तैयार हो गए। मंसूर का गुरु था, जुन्नैद। खुद भी उपलब्ध व्यक्ति था, सिद्धपुरुष था। जुन्नैद ने मंसूर को पास बुलाया और कहा: सुन, तू क्या सोचता है, तुझे ही पता चला है अनलहक का, हमको पता नहीं चला? हमको भी पता है, लेकिन मुंह पर ताले डाले हैं। मुंह बंद कर ले, नहीं तो जिंदगी गंवानी पड़ेगी।
मंसूर ने कहा: अगर मैं कह रहा होता तो मुंह बंद कर लेता, वही कह रहा है। अब उसका मुंह मैं कैसे बंद करूं? जब कहेगा तो कहेगा, जब नहीं कहेगा तो नहीं कहेगा। और आपने मुंह पर ताले डाले हुए हैं, यह बात सुन कर शर्म से मेरा सिर झुका जाता है, कि मेरे गुरु ने अपने मुंह पर ताले डाले हुए हैं।
जुन्नैद व्यर्थ की झंझट में नहीं पड़ना चाहता था। जो बातें उसे कहनी होती थीं, अपने शिष्यों को कहता था। समूह में कहना व्यर्थ की झंझट थी। लेकिन मंसूर ने घोषणा समूह में करनी शुरू कर दी। वही हुआ जो होना था। जुन्नैद ने उसको फिर बुला कर कहा कि देख तू अपनी मृत्यु को पास बुला रहा है। तू नाहक मारा जाएगा। मुझे दुख होता है। तू मेरे प्यारे शिष्यों में एक है, मेरे पहुंचे हुए शिष्यों में एक है। और तू जो कह रहा है, ठीक कह रहा है; लेकिन अब तेरी मौत करीब आ रही है। क्योंकि राजा के संदेशे मेरे पास आने लगे हैं, संदेशे मेरे पास आने लगे हैं कि मंसूर को रोको। राजा तो यह भी धमकियां दे रहा है, चूंकि मेरा शिष्य है तू, मैं भी झंझट में पडूंगा। तो राजा ने कहा: या तो मंसूर को रोको या मंसूर को त्याग दो। जाहिर कर दो कि वह तुम्हारा शिष्य नहीं है।
मंसूर ने कहा जैसी आपकी मर्जी। लेकिन मैं क्या कर सकता हूं? जब घोषणा होगी तो होगी।
जुन्नैद ने यह सोच कर कि यह यहां से जाए, कहा कि तू जा काबा की परिक्रमा कर आ।
पता है मंसूर ने क्या किया? वह उठा और उसने जुन्नैद की परिक्रमा की। उसने कहा: मेरे काबा आप! मेरे मंदिर आप!
जुन्नैद ने उसे त्याग दिया। हिम्मतवर न रहा होगा जुन्नैद। जुन्नैद के त्यागे जाने पर उसकी हत्या की गई, उसे मारा गया। एक लाख आदमी इकट्ठे हुए थे उसकी हत्या देखने। उस पर पत्थर मारे गए, कूड़ा-करकट फेंका गया। गालियां दी गईं। लोग जब पत्थर फेंक रहे थे, तब वह हंस रहा था। यह दिखाने को कि जुन्नैद भी उसकी हत्या से सहमत है, जुन्नैद भी गया था। और उसने सिर्फ एक फूल फेंक कर मारा, ताकि लोग समझें कि वह भी कुछ मार रहा है फेंक कर। उसके फूल के गिरते ही मंसूर रोया। पास खड़े किसी आदमी ने पूछा कि इतने पत्थर मारे जा रहे हैं, तुम हंसते रहे हो, इस फूल के मारे जाने से क्यों रोते हो? तो उसने कहा: और सब तो अनजाने मार रहे हैं, वो माफ किए जा सकते हैं; लेकिन यह जिसने मारा है, वह जानता है कि मैं सही हूं। यह फूल भी चोट करता है। वे पत्थर भी चोट नहीं करते थे।
मंसूर को इस तरह मारा गया, जैसे कभी किसी को नहीं मारा गया था--जीसस को भी नहीं मारा गया था। पहले उसके पैर काट दिए। फिर उसके हाथ काट दिए। फिर उसकी आंखें फोड़ दीं। ऐसा अंग-अंग. घंटों चला यह काम। फिर उसकी जबान काट दी। फिर उसे, तड़फती उस लाश को पड़ा रहने दिया वहां कि वह मर जाए अपने आप।
सुकरात को यूनानियों ने जहर दिया था, मगर जहर दे दिया, बात खतम हो गई। जीसस को सूली पर लटका दिया, बात खतम हो गई। लेकिन यह कौन सी सूली थी? यह सताया जाना था। मगर मंसूर भी खूब था। पैर काटे गए, वह हंसता रहा। हाथ काटे गए, वह हंसता रहा। आंखें फोड़ी गईं और उसने आंखें ऊपर उठाईं और हंसा और जबान काटने के पहले उसने फिर उदघोषणा की--अनलहक। उसने कहा: अब इसके बाद मेरी जबान न बचेगी, फिर मैं घोषणा न कर सकूंगा, फिर परमात्मा मुझसे न बोल सकेगा। तो आखिरी बार घोषणा कर देता हूं--अहं ब्रह्मास्मि।
लोगों ने उससे पूछा कि तुम इतने आनंद से क्यों मर रहे हो? मरता कोई आनंद से नहीं है। तो उसने कहा: मैं नहीं मर रहा हूं, इसलिए आनंद से मर रहा हूं। मैं जानता हूं कि जो मेरे भीतर है वह अमृत है। तुम कितना ही मारो मुझे, मार न सकोगे।
कृष्ण ने कहा न: नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि, नैनं दहति पावकः। न मुझे शस्त्र छेद सकते हैं, न मुझे आग जला सकती है।
मगर इस्लाम सूफियों को भी न पचा सका। सूफियों को पचा लेता तो इस्लाम नया धर्म हो जाता। सूफी इस्लाम के गहरे से गहरे व्यक्ति हैं। और ऊंचे से ऊंचे फूल। सूफियों को इस्लाम पचा लेता तो इस्लाम आधुनिक रहता। इस तरह का जड़ न रहता, जैसा है। मगर सूफियों को न पचा सका। सूफियों को भी मारा। सूफियों को भी त्याग दिया। इस्लाम बुरी तरह पंडित-पुरोहित और मौलवी के हाथ में पड़ा है। इसलिए पुराना मालूम पड़ता है। मगर हीरे वहां हैं, और कीमती हीरे वहां हैं। उनको अगर निखारा जा सके, उनको अगर तराशा जा सके, तो बड़े कोहिनूर पैदा हो सकते हैं।

आज इतना ही।

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