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Hansa To Moti Chuge (हंसा तो मोती चुगैं) 04

Fourth Discourse from the series of 10 discourses - Hansa To Moti Chuge (हंसा तो मोती चुगैं) by Osho. These discourses were given during MAY 11-20 1979.
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करसूं तो बांटै नहीं, बीजां सेती आड।
वै नर जासीं नारगी, चौरासी की खाड।।
काया में कवलास, न्हाय नर हर की पैड़ी।
बह जमना भरपूर, नितोपती गंगा नैड़ी।।
हरख जपो हरदुवार, सुरत की सैंसरधारा।
माहे मन्न महेश, अलिल का अंत फुंवारा।।
टोपी धर्म दया, शील का सुरंगा चोला।
जत का जोग लंगोट, भजन का भसमी गोला।।
खंमा खड़ाऊ राख, रहत का डंड कमंडल।
रैणी रह सतबोल, लोपज्या ओखा मंडल।।
खेलौ नौखंड मांय, ध्यान की तापो धूणी।
सोखौ सरब सुवाद, जोग की सिला अलूणी।।
बांटो बिसवंत भाग, देव थानै दसवंत छोड़ी।
अवस जीव जा हार, टेकसी नहचै गोड़ी।।
पीछे सूं जम घेरसी, टेकरै काल किरोई।
कुण आरोगै घीव, जीमसी कूण रसोई।।
नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
राह अजानी, लोग अजाने,
जितने भी संयोग अजाने,
अनजाने से मिली मुझे जो
भूख अजानी, भोग अजाने!
एक भुलावा कड़वा-मीठा,
एक छलावा ठांव-कुठांव,
जिसको समझूं अपनी मंजिल
नहीं कहीं दिखता वह गांव,
नहीं कहीं मिलती है छांव,
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
किसे कहूं मैं अपना मीत?
किसे कहूं मैं अपनी जीत?
नित्य टूटते रहते सपने,
नित्य बिछड़ते रहते अपने,
एक जलन लेकर प्राणों में
मैं आया हूं केवल तपने!
वर्तमान हो या भविष्य हो
बन जाता है विवश अतीत।
और शून्य में लय हो जाते
सुख-दुख के ये जितने गीत!
किसे कहूं मैं अपना मीत?
किसे कहूं मैं अपनी जीत!
एक सांस है सस्मित चाह।
एक सांस है आह-कराह!
बड़ी प्रबल है गति की धारा।
मैं पथभूला, मैं पथहारा।
जिसको देखा वही विवश है--
किसको किसका कौन सहारा?
रंग-बिरंगे स्वप्न संजोए
मेरे उर का तमस अथाह--
ज्यों-ज्यों घटती जाती दूरी
त्यों-त्यों बढ़ती जाती राह!
एक सांस है सस्मित चाह,
एक सांस है आह-कराह!
कब बुझ पाई किसकी प्यास?
और सत्य कब हास-विलास?
नहीं यहां पर ठौर-ठिकाना।
सुख अनजाना, दुख अनजाना
पग-पग पर बुनता जाता है
काल-नियति का ताना-बाना!
मेरे आगे है मरीचिका।
मेरे अंदर है विश्वास,
जो कि मृत्यु पर चिरविजयी है,
वह जीवन है मेरे पास!
मेरा जीवन केवल प्यास।
यही प्यास है हास-विलास!
नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
राह अजानी, लोग अजाने,
जितने भी संयोग अजाने,
अनजाने से ही मिली मुझे जो
भूख अजानी, भोग अजाने!
एक भुलावा कड़वा-मीठा,
एक छलावा ठांव-कुठांव,
किसको समझूं अपनी मंजिल
नहीं कहीं दिखता वह गांव,
नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
प्रत्येक मनुष्य का यही अनुभव है--सदियों-सदियों से, सदा से। पहले भी यही अनुभव था, आज भी यही अनुभव है, कल भी यही अनुभव होगा। क्योंकि जहां हम खोज रहे हैं मंजिल, वहां मंजिल नहीं है। मंजिल तो जरूर है, हमारी खोज की दिशा भ्रांत है। मंजिल नहीं है ऐसा नहीं; छांव नहीं है ऐसा नहीं; गांव नहीं है ऐसा नहीं--गांव भी है, छांव भी है, और हमारे पास पहुंचाने वाले पांव भी हैं। पर अगर तुम गांव की तरफ पीठ करके चलो, तो चलोगे तो बहुत, पहुंचोगे नहीं। और अगर छांह से उलटी ही तुम्हारी जीवनधारा हो, तो तपोगे, जलोगे, मगर विश्राम न पा सकोगे।
मंजिल है भीतर और मार्ग हम खोजते हैं बाहर। खोया है जिसे, वह है भीतर; खोजते हैं बाहर।
राबिया, सूफी फकीर, अदभुत सूफी फकीर स्त्री हुई। एक सांझ खोजती है अपने द्वार पर कुछ। पास-पड़ोस के लोगों ने पूछा: क्या खोजती है? उसने कहा: मेरी सुई खो गई। वे भी खोजने लगे। बूढ़ी स्त्री है, भली स्त्री है; सांझ भी होने लगी, सूरज ढलने को है। और तभी किसी खोजने वाले ने पूछा कि ठीक-ठीक बता, किस जगह तेरी सुई गिरी है? रास्ता बड़ा है, सांझ होने लगी है, सूरज अब ढला तब ढला। अगर ठीक जगह का पता हो कि सुई कहां गिरी है तो शायद मिल भी जाए। इतनी छोटी चीज, इतना बड़ा रास्ता!
राबिया हंसने लगी, खिलखिला कर हंसने लगी, पागल की तरह हंसने लगी। उसने कहा: यह न पूछो तो अच्छा, सुई तो घर के भीतर गिरी है। तब उन लोगों ने कहा: पागल, तो फिर बाहर क्यों खोज रही है? हमें शक तो सदा से था कि तू पागल है। तेरी यह मस्ती बस पागलों की हो सकती है। इस दुनिया में समझदार तो दुखी दिखाई पड़ते हैं। बुद्धिमान तो रो रहे हैं। और तू सदा मस्त! हमें शक तो पहले ही था कि तू पागल है, आज पक्का हो गया। सुई भीतर गिरी है, बाहर क्यों खोजती है?
राबिया कहने लगी: संसार के नियम का पालन कर रही हूं। सुई तो भीतर गिरी है लेकिन भीतर अंधेरा है। और मैं गरीब, एक दीया भी जलाने की मेरे पास सुविधा नहीं। सो मैंने सोचा, जहां रोशनी हो वहां खोजनी चाहिए, अंधेरे में कैसे मिलेगी! इसलिए बाहर खोजती हूं, बाहर अभी थोड़ी रोशनी है। और मेरे गांव के लोगो, तुम मुझे पागल कहते हो! तो एक बार अपने पर विचार करना, तुम जिसे खोज रहे हो उसे कहां खोया है? आनंद को खोज रहे हो; खोया कहां, पहले यह पूछ लेना! आत्मा को खोज रहे, परमात्मा को खोज रहे, अमरत्व खोज रहे, शाश्वतता खोज रहे, स्वर्ग खोज रहे, मोक्ष खोज रहे; पहले पूछ लेना, मौलिक प्रश्न पहले उठा लेना कि जो खोज रहे हो उसे खोया कहां है? और मैं तुमसे कहती हूं कि भीतर खोया है और बाहर खोज रहे हो। लाख करो उपाय, मिलन होगा नहीं।
नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
कैसे रुकें! छांव ही नहीं मिलती, गांव ही नहीं मिलता, तो पांव रुकें तो कैसे रुकें! और मिलेगा भी नहीं। तुम सारी पृथ्वी खोजो, चांद-तारे खोजो, खोजते ही रहो। जिसे तुम खोज रहे हो वह खोजने वाले में छिपा बैठा है। जो खोज रहा है वही है वह, जिसे तुम खोजने निकल पड़े हो। तुम्हारा अंतस चैतन्य ही तुम्हारे जीवन का अंतिम गंतव्य है। तुम्हीं हो अपनी मंजिल। तुम्हीं हो वह गांव जहां तुम्हारे पांवों को पहुंचना है।
और एक बार यह बात समझ में आ जाए तो चलने की बात ही खत्म हुई। अपने तक पहुंचने के लिए चलना होगा क्या? अपने से दूर जाना हो तो चलना होता है, अपने तक आना हो तो चलने का सवाल कहां! तुम तो वहां हो ही, तुम तो वहां सदा से हो। इतने चल चुके हो, फिर भी तुम वहीं हो। क्योंकि तुम्हारा स्वरूप तो तुम्हारे साथ है। तुम उसे चाहो तो भी छोड़ नहीं सकते, और तुम चाहो तो भी उसे गंवा नहीं सकते।
मुझसे लोग पूछते हैं: ईश्वर को खोजना है, कहां खोजें? मैं उनसे पूछता हूं: तुमने खोया कहां है, पहले यह पक्का कर लो। और अगर खोया ही नहीं है तो खोज व्यर्थ है। फिर खोज भटकन में ले जाएगी। बहुत भटकन में ले जाएगी। और फिर जीवन संताप और विषाद के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होगा, क्योंकि खोजोगे और हर बार पाओगे कि नहीं पाया। खोजोगे और हर बार हारोगे। खोजोगे और हर बार पराजय हाथ लगेगी। तो जीवन आंसुओं से ही भर जाएगा। ऐसा ही जीवन आंसुओं से भर गया है।
नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
राह अजानी, लोग अजाने,
जितने भी संयोग अजाने,
अनजाने से मिली मुझे जो
भूख अजानी भोग अजाने!
एक भुलावा कड़वा-मीठा,
एक छलावा ठांव-कुठांव,
जिसको समझूं अपनी मंजिल
नहीं कहीं दिखता वह गांव,
नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
और जब तुम अपने से ही अपरिचित हो तो किससे परिचित हो पाओगे? जिसने स्वयं को नहीं जाना वह किसी और को न जान पाएगा। उसे जानने की कला ही न आई। उसके भीतर जानने वाला दीया ही न जला।
राह अजानी, लोग अजाने,
क्यों? क्योंकि तुम अपने से अजाने हो।
जितने भी संयोग अजाने,
क्यों? क्योंकि तुम अपने से अजाने हो।
अनजाने से मिली मुझे जो
भूख अजानी भोग अजाने!
क्यों? क्योंकि तुम अपने से अजाने हो।
सारा ज्ञान दो कौड़ी का है, अगर आत्म-ज्ञान न हो। सारी पहचान व्यर्थ है अगर अपनी पहचान न हो। अपनी तो पहचान नहीं है और हम न मालूम कितना कूड़ा-करकट ज्ञान के नाम पर इकट्ठा करते चले जाते हैं! अपने घर में तो प्रवेश नहीं मिलता और चांद-तारों पर प्रवेश की चेष्टा चलती है। क्या करोगे चांद-तारों पर? चांद-तारों पर पहुंच कर भी तुम तुम ही रहोगे! तुम स्वर्ग में भी पहुंच जाओ तो क्या करोगे?
मैंने सुना है, एक आदमी बोरीबंदर पर कुली का काम करता था। मस्त था। कमा लेता था काफी। रात खूब डट कर पी लेता था। खाना-पीना, कभी वेश्यालय हो आना, मित्र संगी-साथी--और चाहिए क्या था! वह मरा। वैसे आदमी सीधा-सादा था, जीवन में कोई जाल-उलझाव न थे। समझ लेना इस बात को।
कभी-कभी जुआरी, शराबी, वेश्यागामी सीधे-सरल होते हैं। साधु, संन्यासी, महात्मा बड़े जटिल, बड़े उलझे हुए होते हैं। अपराधियों में तुम्हें सरल चित्त लोग मिल जाएंगे, लेकिन महात्माओं में सरल चित्त मिलना जरा कठिन बात है। महात्मा होना ही जटिलता का धंधा है।
वह आदमी मरा, सीधा स्वर्ग ले जाया गया। मगर उसका दिल न लगे। कहां बोरीबंदर और कहां स्वर्ग! उसका दिल न लगे। न रेलगाड़ियों की भकभक-झकझक, न यात्रियों का शोरगुल। यात्री, गाड़ियों की तो दूर, मालगाड़ियों तक का आना-जाना नहीं। और जिंदगी भर रहा वह बोरीबंदर। उसकी तो जिंदगी वही थी, रस वही था। वह तो संगीत एक ही जानता था--गाड़ी का आना-जाना, शोरगुल मचना, खोमचों की आवाज, लोगों की आवाज, सामान ढोना; फिर सांझ पी लेना, पिलाना मित्रों को; कभी जुआ खेलने बैठ जाना; कभी रात देर तक ताश! जिंदगी बड़ी मस्ती में थी। स्वर्ग पहुंचा तो बड़ी मुश्किल में पड़ गया। पूछा उसने कि यहां क्या करना होगा? रेलगाड़ियां कहां हैं? इंजन कहां हैं? बोरीबंदर कहां है?
देवताओं ने कहा: यहां कहां का बोरीबंदर! यहां कहां की रेलगाड़ियां! यहां कोई रेलगाड़ियां नहीं चलतीं। यहां किसी को कहीं जाना ही नहीं है। जो जहां है मस्त है।
मालगाड़ी? उन्होंने कहा: माल का यहां कोई सवाल ही नहीं! यहां तो आत्म-धन ही एकमात्र धन है।
तो करना क्या होगा, उसने पूछा। तो देवताओं ने कहा: यहां कुछ नहीं करना होता। राम-राम जपो--जयराम जयराम जयराम...! चुन लो अपना एक बादल, बैठ जाओ पद्मासन लगा कर, राम-राम जपो।
कहां बोरीबंदर, कहां बैठना एक बादल पर! बड़ी मजबूरी। बैठ तो गया। राम-राम जपे भी और बीच-बीच में कहे: ऐसी की तैसी! आखिर राम को खबर लगी कि यह किस प्रकार का मंत्र जपा जा रहा है! फिर कहने लगे: राम-राम, राम-राम, जयराम, जयराम, ऐसी की तैसी! भाड़ में जाए! ऐसी की तैसी!
बुलाया उसे। कहा कि तुझे मंत्र जपना नहीं आता? यह बीच-बीच में ऐसी की तैसी! भाड़ में जाए! यह कभी किसी मंत्र में देखा है?
उसने कहा: अब आपसे क्या छिपाना, बोरीबंदर चाहिए मुझे! रेलगाड़ी के बिना मैं सो ही नहीं सकता। जब तक आवाज न हो, शोरगुल न हो, यात्री न आएं, खोमचों की आवाज न उठे, बिलकुल खाली-खाली लगता है। बैठे हैं बदली पर, हम आदमी हैं कि कोई बादल हैं? और मुझे हैरानी होती है कि ये बाकी लोग अपनी-अपनी बदलियों पर बैठे दिन-रात जयराम-जयराम कर रहे हैं। आखिर कब तक यह करना है?
कहते हैं, राम ने कहा कि भाई इसे सताओ मत, इसे वापस बोरीबंदर भेजो। यह वहीं ठीक था। कभी-कभी वहां मुझे याद भी कर लेता था, यहां तो यह मुझे गालियां दे रहा है।
तुम स्वर्ग भी चले जाओगे तो क्या करोगे? तुम कहीं भी चले जाओगे तो क्या करोगे? तुम तुम ही रहोगे। इसलिए सवाल कहीं जाने का नहीं है--सवाल रूपांतरण का है; तुम जहां हो वहीं जागने का है।
मनुष्य ने कितना ज्ञान अर्जित कर लिया है। शास्त्रों पर शास्त्र संगृहीत होते चले गए हैं। ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में अब इतनी किताबें हैं कि अगर पृथ्वी पर अलमारियों के साथ लगा कर अलमारियां रखी जाएं तो तीन चक्कर पूरी पृथ्वी के लग जाएंगे। रोज किताबें बढ़ती जाती हैं। रोज आदमी का ज्ञान बढ़ता जाता है। और रोज आदमी की पीड़ा भी बढ़ती जाती है। रोज आदमी की छाती पर दुख का पहाड़ भी बड़ा होता जाता है।
नहीं; कहीं कोई चूक हो रही है। कहीं कोई मौलिक भूल हो रही है। कहीं कोई जड़ में ही भूल हो रही है। स्वयं को नहीं जाना और चल पड़े जानने सब-कुछ! जिसने स्वयं को नहीं जाना उसका सब ज्ञान अज्ञान हो जाता है। और जिसने स्वयं को जाना उसका अज्ञान भी ज्योतिर्मय है। उसका कुछ न जानना भी अपूर्व है।
बुद्ध को इतना तो पता नहीं था जितना तुमको पता है। न महावीर को इतना पता था जितना तुमको पता है। बच्चों को ज्यादा पता है आज स्कूल के, जितना मोहम्मद को पता था। बुद्ध से भी पूछते कि टिम्बकटू कहां है, तो अटक कर रह जाते। ध्यान, समाधि इत्यादि ठीक, मगर टिम्बकटू! छोटे बच्चे जवाब दे देंगे। अगर तुम बाहर के ज्ञान का हिसाब-किताब रखो तो बुद्ध की जानकारी बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी एक भीतर जलता हुआ दीया है। बुद्ध ज्योतिर्मय हैं। शाश्वत है वह ज्योति। जानने का सवाल नहीं है, जानने वाला जाग गया, ‘जानने वाले’ का सवाल है।
और खयाल रखना, मनुष्य के मन की एक अनिवार्य प्रक्रिया है: दोष को दूसरे पर डाल देना। अगर तुम सुखी नहीं हो तो तुम तत्क्षण कहने लगते हो कि संसार में सुख कहां! तुम अगर आनंदित नहीं हो तो तुम तत्क्षण कोई रास्ता खोजने लगते हो कि आनंद हो ही कहां सकता है--संसार माया है! यहां तो दुख ही दुख है! यह तो दुख का सागर है! यह तो भवसागर है! इससे तो तरना होता है!
तुमने संसार पर टाल दी बात; अपने कंधे पर न ली जिम्मेवारी। तुमने यह न कहा कि मैं अज्ञानी हूं; आत्म-अज्ञानी हूं, इसलिए दुख है। तुमने कहा संसार माया है। जरा भेद को समझ लेना। संसार को माया कह कर तुमने अपने को बचा लिया, आड़ में हो गए। यही तर्क चलता रहा है सदियों-सदियों से और इसलिए आदमी अंधेरे में है--और अंधेरे में ही रहेगा, जब तक यह तर्क टूटे नहीं, यह तर्क खंडित न हो। इस तर्क के बहुत-बहुत रूप हैं।
पहले लोग कहते थे कि ईश्वर ने जैसा बनाया है वैसा है। सब उसके हाथ में है, मालिक के हाथ में है। हम क्या करें? हमारे बस में क्या है? होइ है सोइ जो राम रचि राखा! तब उनकी मर्जी। दुख देंगे तो दुख झेलेंगे। हम क्या कर सकते हैं?
ऐसे टाल दिया राम पर। बन गए भगत जी राम पर टाल कर। न इन्हें राम का पता है; अपना ही पता नहीं तो राम का क्या खाक पता होगा! मगर यह एक बहाना मिल गया। एक खूंटी मिल गई, इस पर टांग दिया सारा दुख। मगर दुख खूंटियों पर टांग देने से कटता नहीं। यह काटने का रास्ता नहीं है।
फिर ऐसे लोग हुए जिन्होंने कहा कि नहीं, न कोई ईश्वर है, न कोई नियंता है; यह तो मनुष्य के कर्मों का कारण है। पिछले जन्मों में तुमने जो कर्म किए थे उनके कारण दुख भोग रहे हो। यह भी वही बात है। कुछ फर्क न हुआ। सिर्फ शब्द बदल गए। पहले ईश्वर के कारण--‘उसने जैसा रचा’--हम दुख भोग रहे थे; अब पिछले जन्मों के कर्मों के कारण दुख भोग रहे हैं। इस जन्म का पता नहीं है, इस जीवन का पता नहीं है; पिछले जन्मों की बात कर रहे हैं!
और पिछले जन्मों में तुम क्यों दुख भोग रहे थे?--और भी पिछले जन्मों के कारण! और पिछले जन्मों में?--और पिछले जन्मों के कारण! तो कभी प्राथमिक तुम्हारा जन्म हुआ था, उस दिन तुमने क्यों दुख भोगा था? नहीं; कोई प्रश्न को इतने दूर तक ले जाना भी नहीं चाहता। और जो ले जाए हम उससे नाराज होते हैं। हम कहते हैं बात से बतंगड़ न बनाओ, क्योंकि हमारे बहाने छीनो मत हमसे।
मगर यह बात भी पुरानी पड़ गई। फिर कार्ल मार्क्स जैसे लोग हुए, जिन्होंने कहा: यह तो समाज की व्यवस्था के कारण है। अब बड़ा फर्क लगता है। कहां ईश्वर, कहां कर्म का सिद्धांत, कहां समाज की व्यवस्था! लेकिन कोई फर्क नहीं है। मौलिक आधार एक है। हम जिम्मेवार नहीं हैं! हमारी सारी सैद्धांतिक चर्चा का एक ही सूत्र है: किसी भांति मेरे कंधे पर जिम्मेवारी न पड़े। समाज की व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, वर्ग-कलह--इसके कारण दुख है। जब तक वर्ग न मिटेंगे तब तक सुख नहीं होगा। जब तक सारी दुनिया से वर्ग और वर्गों के द्वारा होता शोषण न मिटेगा, जब तक वर्ग-विहीन समाज न बनेगा, तब तक सुख न होगा।
और वर्ग-विहीन समाज कभी बनेगा नहीं। बन ही नहीं सकता। रूस में भी नहीं बना है, चीन में भी नहीं बना है, कहीं बनने वाला नहीं है। यह भी बहाना है टालने का--न होगा बांस न बजेगी बांसुरी! और आदमी दुख में जीने के लिए बहाने खोज लेगा, सांत्वनाएं खोज लेगा।
सिग्मंड फ्रायड ने कहा कि नहीं, समाज की व्यवस्था का सवाल नहीं है, यह मनुष्य की अंतरवृतियों का सवाल है, अचेतन वृतियों का सवाल है; उनके कारण मनुष्य दुखी है। और उनसे छूटने का कोई उपाय नहीं। सिग्मंड फ्रायड ने कहा है: मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता। ज्यादा से ज्यादा मनोविज्ञान इतना ही कर सकता है कि आदमी को ज्यादा दुखी न होने दे; कम से कम दुखी होने दे, बस। आदमी ज्यादा से ज्यादा सामान्य रूप से दुखी रहेगा, यह अच्छी से अच्छी अवस्था है। असाधारण रूप से दुखी न होगा, साधारण रूप से दुखी होगा। बस मनोविज्ञान का काम इतना है: जो असाधारण रूप से दुखी होने लगे, उसको खींच कर समझा-बुझा कर साधारण रूप से दुखी करना है।
यह भी कोई लक्ष्य हुआ? मगर यह सारी मनुष्य-जाति की अब तक की चिंतना है। मौलिक भूल हो रही है एक। कुछ लोगों ने नहीं की भूल और वे परम आनंद को उपलब्ध हो गए। कोई बुद्ध, कोई कबीर, कोई कृष्ण, कोई क्राइस्ट, कोई लाल परम आनंद को उपलब्ध हो गए! उन्होंने यह भूल नहीं की, यह तर्कजाल नहीं किया। उन्होंने कहा कि अगर दुखी हूं तो मैं जिम्मेवार हूं। अगर दुखी हूं तो अपने भीतर मुझे झांकना होगा। अगर दुखी हूं तो मेरे भीतर का दीया बुझा हुआ है, इसलिए अंधकार है। सारी दुनिया को... और न मालूम नये-नये कारणों को खोज कर अपने दुख को छिपा लेने से कोई सार नहीं है।
नजर तुम्हारी जाली है,
सिक्का तो टकसाली है!
इस सिक्के को गढ़ा प्रकृति ने है धरती की माटी से।
इस सिक्के को गढ़ा पुरुष ने अपनी ही परिपाटी से।
इस सिक्के पर अंक पड़े हैं स्वयं नियति के हाथों से,
यह सिक्का तो चलता आया जनम-मरण की घाटी से!
इसे बजाओ, यह गाता है
गीत खुशी के, मातम के
इस सिक्के में दोष देखना
केवल खाम-खयाली है!
सिक्का तो टकसाली है!
माल तुम्हारा खोटा है
यह गाहक तो बहुत खरा
यह गाहक मीठे बोलों पर मिसरी सा घुल जाता है!
थोड़ी सी ममता पाने को निज सर्वस्व लुटाता है!
जो छल-कपट देखते हो तुम वह तो सभी तुम्हारे हैं,
इस गाहक का सच्चाई से जनम-जनम का नाता है!
अपने अंदर की करुणा को
लाकर के तो परखो तुम!
इस गाहक का हाथ खुला है
इस गाहक का हृदय भरा है!
यह गाहक तो बहुत खरा है!
तुम आए हो नये-नये।
यह तो हाट पुरानी है!
सोना-चांदी, हीरा-मोती, कितने इसमें छले गए।
जीवन भर बटोरने वाले खाली हाथों चले गए!
सुख-दुख की यह हाट अनोखी, इसमें बिकता यश-अपयश,
पाने वाले सदा पुराने, देने वाले नित्य नये!
तुम तो अपने में ही उलझे,
आंख खोल के देखो तो!
जो निज को जितना दे सकता
वह उतना ही ज्ञानी है!
यह तो हाट पुरानी है!
तुम कितने चालाक बनो,
दुनिया भोली-भाली है!
पल में रोना, पल में हंसना, यह दुनिया तो सहज-सरल,
उत्सुकता अस्तित्व यहां पर, जीवन तो है कौतूहल!
सत्य स्वप्न है, स्वप्न सत्य है--इन दोनों में अंतर क्या?
इने-गिने विश्वासों पर ही इस दुनिया की चहल-पहल!

जो मिलता है लेना होगा
राजी से, नाराजी से!
अरे व्यर्थ की तीन-पांच यह
और व्यर्थ की गाली है।
दुनिया भोली-भाली है!
नजर तुम्हारी जाली है,
सिक्का तो टकसाली है!
नजर बदलनी है। जो तुम्हारे भीतर है, परम धन है। जरा भूल-चूक नहीं है। यह अस्तित्व जैसा होना चाहिए वैसा ही है; इसमें जरा भी विसंगति नहीं है। यह अस्तित्व तो अपूर्व उत्सव है। तुम अंधे, तुम लंगड़े, तुम लूले। नाच न आवै आंगन टेढ़ा!
नजर तुम्हारी जाली है,
सिक्का तो टकसाली है!
इस सिक्के को गढ़ा प्रकृति ने है धरती की माटी से।
इस सिक्के को गढ़ा पुरुष ने अपनी ही परिपाटी से।
इस सिक्के पर अंक पड़े हैं स्वयं नियति के हाथों से,
यह सिक्का तो चलता आया जनम-मरण की घाटी से!
इसे बजाओ, यह गाता है
गीत खुशी के, मातम के
इस सिक्के में दोष देखना
केवल ़खाम-़खयाली है!
सिक्का तो टकसाली है!
नजर तुम्हारी जाली है।
नजर... नजरिया बदलने की बात है। इस बात को तुम बहुत मौलिक रूप से अपने हृदय में संजो लो। दोष न दो। कोई और जिम्मेवार नहीं है, सिवाय तुम्हारे। कष्ट होता है यह बात स्वीकार करने में कि मैं ही जिम्मेवार हूं। मन करता है कोई और होगा जिम्मेवार। कष्ट कितना ही हो, सत्य को स्वीकार किए बिना जीवन में क्रांति नहीं होती। अच्छा लगता है यह मानना कि कोई और तुम्हें कष्ट दे रहा है। यह बात तो बड़ी बेहूदी मालूम पड़ती है कि मैं खुद ही अपने को कष्ट दे रहा हूं। फिर तो कोई बहाना भी नहीं रह जाता। फिर तो कोई भी कहेगा: अगर तुम ही अपने को कष्ट दे रहे हो तो तुम्हारी मौज; देना हो तो दो, न देना हो तो न दो। दूसरा दे रहा है तो कम से कम इतना तो सहारा रहता है कि हम अपने को बचा लें। हम इतना तो कह सकते हैं कि हम क्या करें, करना भी चाहें तो क्या करें! विवशता है, असहाय अवस्था है। रोने के लिए सुविधा तो रहती है, आंसू टपकाने का उपाय तो रहता है।
लेकिन जिसने भी यह सुविधा खोजी उसके जीवन में धर्म का पदार्पण नहीं होता। और जिसने अपने दुख के लिए निमित्त बनाए बाहर, वह कभी परमात्मा को उपलब्ध नहीं होता है।
लाल के आज के सूत्र इस अंतर-खोज की दिशा में ही इशारे हैं।
करसूं तो बांटै नहीं, बीजां सेती आड।
वै नर जासीं नारगी, चौरासी की खाड।।
जिंदगी उनकी है जो बांटना जानते हैं। जिंदगी उनकी है जो लुटाना जानते हैं। जिंदगी उनकी है जो दोनों हाथ उलीचते हैं। कंजूसों की नहीं है जिंदगी।
लेकिन कंजूसी क्यों है? कंजूसी इसलिए कि हमें भीतर के धन का कुछ पता नहीं है। कंजूसी इसलिए है। इसलिए जोर से पकड़ते हैं हर चीज को कि कहीं हाथ से छूट न जाए, आई हुई चीज छूट न जाए! बामुश्किल तो आई है, आते-आते तो आई है! कितनी यात्रा और कितनी दौड़-धूप, आपाधापी के बाद आई है! हाथ से छूट न जाए!
हमें भीतर के साम्राज्य का पता नहीं है, इसलिए कौड़ियों को इकट्ठा किए बैठे हैं। तिजोरियों को पकड़े बैठे हैं, तिजोरियों में कौड़ियां भरी हैं। क्योंकि जो मौत छीन लेगी उसका कोई मूल्य नहीं है। लेकिन तुम्हारे पास एक ऐसा सर्वस्व है, एक ऐसा धन है, जिसे मौत भी नहीं छीन सकती, जिसे चिता की लपटें भी जला नहीं सकतीं।
जिसे उस धन का पता चल गया, उसे एक बात और पता चलती है कि वह धन अपार है। उसे तुम कितना ही बांटो, चुकता नहीं। चुक जाए ऐसा नहीं है। जो चुक जाए वह भी कोई धन है? जिसकी सीमा हो वह भी कोई धन है? उस लंगड़े-लूले को धन मत समझना। असीम हो--तो धन। अनंत हो--तो धन।
तुम सोचते हो, हमने परमात्मा को नाम दिया--ईश्वर! ईश्वर शब्द बनता है ऐश्वर्य से। ऐश्वर्य का अर्थ होता है: संपदा, धन। तुम्हारे भीतर इतना ऐश्वर्य है! काश तुम जरा लौटो और जरा आंख भीतर मोड़ो, तो फिर तुम लुटाने लगोगे। तुम बांटने लगोगे। क्योंकि तुम देखोगे एक अनुभव, एक नया अनुभव, कि तुम जितना बांटते हो उतने नये-नये झरने तुम्हारे भीतर फूटने लगते हैं। तुम हौज नहीं हो, कुएं हो। हौज तो डरती है कि कोई पानी न भर ले, क्योंकि जितना पानी गया उतनी हौज खाली हुई। कुआं बुलाता है। कुआं निमंत्रण भेजता है; स्नेह-पातियां लिखता है कि आओ, भरो! क्योंकि कुआं जानता है कि कोई नहीं भरेगा तो सड़ जाऊंगा। कुआं जानता है कि कोई नहीं भरेगा तो मर जाऊंगा। कुआं जानता है कि कोई भरता रहेगा तो नये झरने फूटते रहेंगे, नई जलधार आती रहेगी। नितनूतन बना रहूंगा। युवा रहूंगा। ताजा रहूंगा। स्वच्छ रहूंगा। जीवंत रहूंगा!
तुम हौज नहीं हो, कुएं हो। मगर भीतर देखो तो कुएं का पता चले, कि कुआं सागर से जुड़ा है! कि पीएं पीने वाले जितना पीना हो!
लुटाओ दोनों हाथों से जितना लुटाना हो। तुम्हारे पास ऐसा अमृत है जिसे तुम लुटा नहीं सकते।
करसूं तो बांटै नहीं,...
अपने हाथ से तो बांटते ही नहीं लोग।
...बीजां सेती आड।
और अगर कोई दूसरा बांटता हो तो उसको भी रोकते हैं, उसको भी अड़चन डालते हैं। खुद तो बांटते नहीं, दूसरे बांटने वाले के बीच भी बाधा डालते हैं, क्योंकि बांटने वाला अगर दूसरा है तो भी उनके अहंकार को चोट लगती है। इसलिए तो जीसस को सूली लगा दी। खुद तो बांटते नहीं, लेकिन यह आदमी बांट रहा था। यह आदमी परमात्मा को बांट रहा था। सुकरात को जहर पिला दिया। खुद तो बांटते नहीं, यह आदमी सत्य की उदघोषणा कर रहा था। मंसूर का गला काट दिया। खुद तो बांटते नहीं, मगर यह आदमी उदघोष कर रहा था: अनलहक! अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं! यह बांटे जा रहा था।
हमने बांटने वालों के साथ दुर्व्यवहार किया है। हम कंजूसों को कष्ट होता है यह देख कर कि कोई बांटने वाला! हम कंजूसों के अहंकार को चोट लगती है बांटने वाले को देख कर।
करसूं तो बांटै नहीं, बीजां सेती आड।
वै नर जासीं नारगी, चौरासी की खाड।।
ऐसे व्यक्ति नरक में गिरेंगे; गिरे ही हैं--जो न बांटते हैं, न बांटने देते हैं। और चौरासी करोड़ योनियों में भटकते रहेंगे, बार-बार गड्ढे में गिरेंगे गर्भ के और कभी भी उनको उस शाश्वत का दर्शन नहीं होगा।
बुझ गई न जो बन एक आह अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में!
मेरे पैरों को मिली थकन की सीमा,
मेरे मस्तक को गुरुता की नादानी!
दिल में घिर आया करता एक धुआं-सा,
आंखों में घिर आता है अक्सर पानी!
अनजानी दुनिया का अनजाना क्रम है,
अनजाना-सा ही सकल ज्ञान औ’ भ्रम है,
अनजान दिशा का मैं अनजाना पंथी,
केवल असफलता ही जानी-पहचानी!
खो गई न हो जो अंधकार में सहसा,
ऐसी तो कोई राह नहीं जीवन में!
उल्लास-तरंगों से जो अधर विचुबिंत,
वे लिए हुए हैं चुभती जलन तृषा की,
आंसू में उमड़ा जो अभाव का सागर,
उसमें ही लहरें हैं छवि की, सुषमा की!
मेरे पीछे अगनित खंडहर के क्रंदन
मेरे आगे बस धुंधला-सा सूनापन,
यह राग-रंग, यह चहल-पहल सब-कुछ है,
पर अपने अंदर मैं कितना एकाकी!
पल-भर का जो अवलंब मुझे दे सकती,
ऐसी तो कोई थाह नहीं जीवन में!
जिसको देखा वह खोया अपनेपन में,
जिसको पाया वह बेसुध यहां जलन में,
पागल-सा मैंने दर-दर अलख जगाया,
जिससे पूछा है वही एक उलझन में।
प्रत्येक मौन में कुछ घुटता सा भय है,
प्रति स्वर में कुछ कांपता हुआ संशय है,
कितने निःश्वासों से बोझिल है धरती,
हैं डूब चुके कितने उच्छ्‌वास गगन में।
विचलित कर सकती जो कि नियति के क्रम को,
ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में।

इस जीवन में बचाने योग्य क्या है?
बुझ गई न जो बन एक आह अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में!
खो गई न हो जो अंधकार में सहसा,
ऐसी तो कोई राह नहीं जीवन में!
पल-भर का जो अवलंब मुझे दे सकती,
ऐसी तो कोई थाह नहीं जीवन में!
विचलित कर सकती जो कि नियति के क्रम को
ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में।
इस जीवन में है क्या? जरा आंख खोलो और गौर से देखो, तुम्हारे हाथ खाली हैं। कितने ही भरे हों तो भी खाली हैं। सिकंदर के हाथ भी खाली हैं।
इस दुनिया में लोग चाहे कितने ही धन से सजे हों, भीतर का मालिक जब तक जागा नहीं, भीतर के स्वामी से जब तक पहचान न हुई, तब तक सब धोखा है। रोओगे एक दिन, पछताओगे एक दिन। मौत जब द्वार पर आकर खड़ी होगी और सब छीन लेगी जिसे तुमने कमाया था; जिसे तुमने इतनी आकांक्षा से पकड़ा था, इतनी आतुरता से पकड़ा था। जब सब छिन जाएगा तो तड़फोगे।
मेरे देखे, लोग मौत से नहीं डरते, डरते हैं मौत जो छीन लेगी उससे। मौत से तो डरोगे भी कैसे? मौत से तो पहचान ही नहीं है। अपरिचित से क्या डर? कौन जाने मौत अच्छी ही हो, मीठी हो! कौन जाने मौत और नये जीवन का द्वार हो! मौत से तो कोई पहचान नहीं है तो मौत से क्या डरोगे? फिर डर क्या है? असली डर यह है कि तुम्हें पता है, कितने ही अज्ञानी होओ, लेकिन इतनी प्रतीति तो तुम्हें है कि तुम्हारा धन, तुम्हारा पद, तुम्हारी प्रतिष्ठा, यह सब मौत छीन लेगी। इतना पक्का है। मौत क्या देगी उसका तो कुछ पता नहीं; लेकिन क्या छीन लेगी, यह बिलकुल साफ है। तुम जो हो सब छीन लेगी। तुमने जिस-जिस से तादात्म्य कर लिया है वह सब छिन जाएगा। इससे घबड़ाहट होती है। मौत की घबड़ाहट नहीं है यह। मौत से भय नहीं है यह। यह तुम्हारी पकड़ से, तुम्हारे परिग्रह से, तुम्हारी कृपणता से भय पैदा हो रहा है। काश, तुम अपने ही हाथ मुट्ठी खोल दो, मौत का भय उसी क्षण तिरोहित हो जाता है। तुम पकड़ो नहीं, जीओ! गुजरो जिंदगी से! मगर पकड़ो मत।
पांपेई के नगर में ज्वालामुखी फूटा, आज से हजारों साल पहले। सारा गांव भागा। आधी रात, ज्वालामुखी का फूटना, भयंकर लपटें, आग की वर्षा गांव पर! लोग अपना-अपना सामान जो बचा सकते थे बचाने की कोशिश की। कोई अपनी तिजोड़ी लिए है। जिसके पास जो था... लोग अपना-अपना सामान ढो रहे हैं। गरीब हैं, उनके पास भी बहुत कुछ है; नहीं है कुछ, तो कोई अपनी खाट, अपना बिस्तर... जिसके पास जो है। सिर्फ एक आदमी अपने घूमने की छड़ी लेकर मस्ती से चल रहा है। जो भी उसे देखता है हैरान होता है। वह था उस गांव का दार्शनिक--एक फकीर। यह समय था उसका रोज सुबह घूमने जाने का, तीन बजे रात। वह आज भी घूमने जा रहा है। जो उसे देखता वही कहता है: अरे, कुछ बचा न पाए! दया के भाव से देखता है--‘कुछ बचा न पाए!’
और वह फकीर हंसता है। वह कहता है: अपने को बचा लिया, और बचाने को क्या है? जो भी देखता वह पूछता है कि बड़ी शान से चल रहे हो, यह कोई वक्त शान से चलने का है! रही होगी लखनवी चाल--हाथ में छड़ी, मस्ती! शायद गीत गुनगुना रहा हो। यह कोई वक्त छड़ी लेकर घूमने निकलने का है!
और फकीर कहता है: यह मेरे रोज का समय है। ज्वालामुखियों से क्या अंतर पड़ता है? जिस दिन से अपने को जाना है, मौत से अंतर ही नहीं पड़ता। जिस दिन से अपने को जाना है, मौत झूठ हो गई।
और अपने को जानने के रास्ते पर बांटना साधन भी है, साध्य भी। बांटोगे तो जान सकोगे, जानोगे तो बांट सकोगे।
करसूं तो बांटै नहीं, बीजां सेती आड।
वै नर जासीं नारगी, चौरासी की खाड।।
काया में कवलास, न्हाय नर हर की पैड़ी।
बह जमना भरपूर, नितोपती गंगा नैड़ी।।
लाल कहते हैं: ‘काया में कवलास।’ कैलाश तो तुम्हारी काया में है, जा कहां रहे हो? किधर चले? कोई काशी, कोई काबा, कोई कैलाश, कोई गिरनार, कोई जेरुसलम। कहां जा रहे हो?
काया में कवलास, न्हाय नर हर की पैड़ी।
वहीं नहा लो! और हर की पैड़ी वहीं है, मगर तुम जा रहे हो हरिद्वार! हरि का द्वार तुम्हारे भीतर है। लेकिन तुमने कटा ली टिकट, तुम चले हरिद्वार। तुम कहते हो कि जा रहे हैं, हर की पैड़ी पर नहाएंगे। कैसी मूढ़ता है! तीर्थ को खोजने बाहर जाते हो, तीर्थों का तीर्थ तुम्हारे भीतर है!
काया में कवलास, न्हाय नर हर की पैड़ी।
लाल कहते हैं: बड़ी हैरानी की बात है, तुम जा-जा कर नदियों में नहाते हो! अपने में डुबकी मारो!
बह जमना भरपूर,...
वहां तुम पाओगे जमना भरपूर! बाहर की जमना तो कभी बाढ़ आती और कभी सूख भी जाती है और गर्मी में दीन-क्षीण हो जाती है। बाहर की जमना तो बदलती है, रूपांतरित होती है। भीतर की जमना हमेशा भरपूर है--सदा एक जैसी, एक रस!
बह जमना भरपूर, नितोपती गंगा नैड़ी।
और तुम्हारे पास ही, तुम्हारे भीतर ही प्रतिदिन बह रही है गंगा, तुम कहां जा रहे हो? हाजी होने चले? हज करने चले? तीर्थयात्री बन गए? मूढ़ता कर रहे हो!
रामकृष्ण के पास एक आदमी आया। उसने कहा: गंगा जा रहा हूं, काशी जा रहा हूं स्नान करने। परमहंस देव, आपका आशीर्वाद है न?
रामकृष्ण तो भोले-भाले, सीधे-सादे आदमी थे। कहते भी थे तो बात बड़ी मीठी कहते थे। कबीर जैसे नहीं थे कि उठाया एक टेंडपा और मार दिया सिर पर! कबीर की अपनी रौनक है, अपनी शान है!
कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर बारै आपना, चले हमारे साथ।।
कहते हैं: लट्ठ लिए खड़ा हूं, है कोई हिम्मतवर जो घर में आग लगा दे अपनी? लगा दे कोई घर में आग तो हमारे साथ चले! यह शर्त है।
रामकृष्ण तो और ढंग के व्यक्ति थे। बुद्धों में भी ढंग-ढंग के लोग हैं!... रामकृष्ण ने कहा कि ठीक है, जाते हो तो जरूर जाओ, मगर एक बात तुम्हें बता दूं...। यह मीठी चोट है, और कभी-कभी मीठी चोट कड़वी चोट से भी गहरी होती है, खयाल रखना। मुंदिमार! कोई लट्ठ से नहीं मारी जाती।
उसने कहा: जरूर कहें परमहंसदेव, क्या कहना है!
कहा: जरा पास आ, तेरे कान में कहूं। तू जा रहा है सो तो ठीक, लेकिन तूने देखा गंगा के किनारे बड़े-बड़े वृक्ष खड़े हैं!
उसने कहा: हां।
तुझे पता है वृक्ष क्यों खड़े हैं?
मुझे कुछ पता नहीं। यह तो किसी शास्त्र में इसका उल्लेख भी नहीं है कि क्यों वृक्ष खड़े हैं। नदियों के किनारे वृक्ष होते हैं, सो वृक्ष हैं।
रामकृष्ण ने कहा: तुझे फिर पता नहीं। तू जब डुबकी मारेगा गंगा में तो गंगा की पवित्रता के कारण तेरे पाप धुल जाएंगे। मगर पाप इतनी आसानी से छोड़ने वाले नहीं। वे झाड़ों पर बैठ जाते हैं। फिर तू निकलेगा गंगा से, जब तू वापस घर की तरफ चलेगा, उचक कर फिर सवार हो जाएंगे। तो अगर तू डुबकी मारे तो निकलना मत फिर, मार ही जाना डुबकी। नहीं तो बेकार हो गया सब। तेरी डुबकी वैसी होगी जैसे हाथी नहाने जाता है; खूब नहाता है, मल-मल कर नहाता है और फिर बाहर आकर धूल फेंकता है। सब नहाया-धोया खराब कर लेता है। तो तू डुबकी मारे, अगर मेरी मान तो फिर मार ही जाना डुबकी, फिर निकलना मत।
उसने कहा: परमहंसदेव, आप क्या कह रहे हैं! क्या आत्महत्या करनी है, डुबकी मारी फिर निकलूं नहीं?
तो कहा: फिर जाना बेकार है। फिर आना-जाना ही होगा। वे झाड़ पर बैठ जाएंगे चढ़ कर और रास्ता देखेंगे कि बच्चू, आओ... फिर सवार हो जाएंगे। इससे कुछ लाभ न होगा।
रामकृष्ण सीधे-सादे हैं। लट्ठ जैसा नहीं मारते। मगर मार दिया, मार दी कटार--ऐसी कि जो दिखाई भी नहीं पड़ती! यह आदमी गया नहीं फिर काशी, अब क्या खाक जाना है! अब पहले जाओ और काशी के सब झाड़ काटो और फिर पता नहीं झाड़ काटो तो वे कोई जमीन पर ही खड़े रहें। पाप ही हैं, जो झाड़ पर चढ़ते हैं, तो जमीन पर ही खड़े रहें! मकानों पर बैठ जाएं। और पापों का क्या, बड़े सूक्ष्म हैं, हवा में पर मारें! वहीं ऊपर फड़फड़ करते रहें, तुम निकलो बाहर, फिर सवार हो जाएं।
एक और गंगा है जो तुम्हारे भीतर बह रही है। उस गंगा का नाम ध्यान है।
हरख जपो हरदुवार,...
ईश्वर का स्मरण करो, हरि का द्वार खुले। हरिद्वार बने! हरख जपो! ऐसा जपो कि जपने वाला खो जाए।
...सुरत की सैंसरधारा।
ऐसा लयबद्ध हो जाए तुम्हारा स्मरण परमात्मा का, वहीं से सहस्रधारा टूटेगी।
माहे मन्न महेश,...
और जब ध्यान की प्रक्रिया से, प्रभु-स्मरण से मन का विसर्जन हो जाता है तो महेश से मिलन हो गया, तो मिल गया देवों का देव!
...अलिल का अंत फुंवारा।
और तब वर्षा होती है भीतर आनंद की। मेह बरसते अमृत के!
...अलिल का अंत फुंवारा।
चित्त की आत्यंतिक निरोधावस्था में शिव का साक्षात्कार होगा और परमानंद के निर्झर के नीचे तो ब्रह्म कलोल करेगा। कहीं जाना नहीं है; सारा अस्तित्व तुम्हारे भीतर है। पिंड में ब्रह्मांड है।
चलना है बहुत कठिन
ऊंची-नीची-संकरी
पथरीली राहों पर!
चलना है बहुत कठिन, पिंडली भर जाती है,
और धौंकनी-सी बन-बन जाती छाती है।
बाहर आलोकित रवि है, शशि है, तारे हैं,
हम अपने अंदर अंधियारे से हारे हैं!
मन कितना भारी हो,
आंखें कितनी नम हों,
प्राणों में कांटों-से
चुभते कितने भ्रम हों!
पर हमको चलना है, चलते ही रहना है।
लेकिन इतना सच है--
बन कर मिट जाना है।
फूलों का खिलना ही
उनका मुरझाना है।
मिट जाते दिन हैं औ’ मिट जाती रातें हैं।
मधु-ऋतु जल जाती, गल जाती बरसातें हैं।
चलती हैं सांसें, चलता रहता काल-समय!
औ’ चलती ही रहतीं सुख-दुख की बातें हैं!
लेकिन हम कायम हैं
हमसे जग कायम है!
बनती-मिटती बस कुछ इनी-गिनी चाहों पर!
चलना है बहुत कठिन
लेकिन हम चलते हैं
ऊंची-नीची-संकरी
पथरीली राहों पर!
हमको भी लगता, हम कुछ बहके-बहके हैं,
अपना विश्वास शिथिल, अपना स्वर धीमा है!
वरना प्रति पग पर जो हमसे टकरा जाती
वह तो बस अपने ही सपनों की सीमा है!
दिग्भ्रम है उसका ही
जिसको हो दिशा-ज्ञान!
गिरने का भय उसको
ऊंची जिसकी उड़ान!
अनजानी दुनिया का हर कण अनजाना है,
जीवन का हर क्षण उलझा-सा अफसाना है,
इस ससीम संसृति में जिसका अस्तित्व पृथक्‌?
अपने को खो देना अपने को पाना है

हम उठते रहते हैं!
प्रस्फुटित उमंगों पर,
हम गिरते रहते हैं,
घुटती आहों पर!
चलना है बहुत कठिन
लेकिन हम चलते हैं
ऊंची-नीची-संकरी
पथरीली राहों पर!
ऊंची-नीची-संकरी
पथरीली राहों पर!
चलना है बहुत कठिन, पिंडली भर जाती है,
और धौंकनी-सी बन-बन जाती छाती है।
बाहर आलोकित रवि है, शशि है, तारे हैं,
हम अपने अंदर अंधियारे से हारे हैं!
मन कितना भारी हो,
आंखें कितनी नम हों,
प्राणों में कांटों-से
चुभते कितने भ्रम हों!
पर हमको चलना है, चलते ही रहना है।
एक और रास्ता है, जिस पर चलना नहीं होता। एक और मार्ग है, जिस पर बैठना होता है, रुकना होता है। न ऊंची-नीची राहें हैं, न कंटरीले मार्ग हैं--चुपचाप सन्नाटा है, न शोरगुल है। न क्रम है, न विधि है। उस क्रम-विधि-हीन शांत बैठ जाने का नाम ध्यान है।
मन तो गति है; ध्यान गति-मुक्ति है। मन तो चलता ही रहता है। मन का तो चलना ही जीवन है। जिस क्षण तुम्हारे भीतर मन नहीं चलता उस क्षण ध्यान है। कैसे वह अपूर्व घड़ी आए जब मन न चले? साक्षी की कुंजी है। बैठो! बैठ कर देखते रहो। चलने दो मन को; न रोकना, न झगड़ना, न निंदा करना, न संग-साथ हो लेना। निरपेक्ष, तटस्थ! जैसे कुछ लेना-देना नहीं है--असंलग्न, दूर! जैसे मन कोई और है। जैसे राह पर चलते हुए लोग हैं। ऐसी दूरी अपने मन से करके जो बैठ गया, धीरे-धीरे एक दिन पाता है--मन कभी-कभी रुक जाता है। क्षण भर को अंतराल आ जाते हैं। उन्हीं अंतरालों में गंगा फूटती है। उन्हीं अंतरालों में हरि का द्वार खुलता है। उन्हीं अंतरालों में कैलाश के दर्शन होते हैं। फिर अंतराल बड़े होने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे वह अंतिम परम अवसर भी आ जाता है, जब मन सदा के लिए विदा हो जाता है।
हरख जपो हरदुवार, सुरत की सैंसरधारा।
माहे मन्न महेश, अलिल का अंत फुंवारा।।
टोपी धर्म दया, शील का सुरंगा चोला।
जत का जोग लंगोट, भजन का भसमी गोला।।
लाल तो सीधे-सादे गांव के आदमी हैं, गांव की भाषा बोल रहे हैं। कहते हैं: टोपी, सिर पर रखने योग्य अगर कोई चीज है, तो धर्म, दया, करुणा, प्रेम। अगर कोई चोले को रंगने के योग्य रंग है, तो शील का सुरंगा चोला। तो शील...। शील का अर्थ होता है: जिसके भीतर ध्यान जगा, उसके बाहर फूटती हुई किरणों का नाम शील है। जैसे घर में दीया जले तो खिड़की से, द्वार-दरवाजे से रोशनी दिखाई पड़ने लगे। राह से चलते हुए आदमी को भी पता चलता है घर का दीया जला है। घर का दीया बुझा हो तो खिड़की, द्वार-दरवाजे से अंधेरा झांकता है।
ध्यान की आभा है शील। जब तुम भीतर शांत होते हो, तुम्हारे बाहर शील की शीतलता होती है। जो भी पास आता है तुम्हारी शीतलता से आह्लादित होगा। ठंडा हो जाएगा। आया होगा उत्तप्त, आर्द्र हो जाएगा।
टोपी धर्म दया, शील का सुरंगा चोला।
जत का जोग लंगोट,...
और अगर संयम ही कोई बांधना है--तो अंतर-योग, अंतर-मिलन।
...भजन का भसमी गोला।
भस्म ही कोई लगानी है तो भजन की।
खंमा खड़ाऊ राख,...
अगर खड़ाऊ ही कोई पहननी हो तो खंमा... क्षमा की।
...रहत का डंड कमंडल।
और अगर कोई आचरण जीवन में लाना हो, तो जो ध्यान में उपलब्ध हो, उसको जीओ। जो ध्यान में उमगे, उसे आचरण में प्रकट होने दो। बाहर और भीतर को एक होने दो। बाहर और भीतर में भेद न रहे, द्वैत न रहे, द्वंद्व न रहे।
...रहत का डंड कमंडल।
रैणी रह सतबोल,...
और अगर कोई रहने योग्य बात है, आचरण योग्य बात है, तो वह है कि तुम्हारी वाणी में सत्य प्रकटे, सत्य का गीत उठे।
...लोपज्या ओखा मंडल।
अगर इतना तुम कर सको तो यह विराट ब्रह्मांड है, इसको भी तुम पार कर जाओगे, इसके उस पार निकल जाओगे। इतना सा तुम कर सको कि ध्यान की छोटी सी नौका, यह शील की पतवार, बस काफी है। तुम इस पूरे भवसागर को पार कर जाओगे।
खेलौ नौखंड मांय,...
और फिर तुम खेलो अनंत में--खेल अनंत का! फिर सब लीला है। नौ का आंकड़ा अनंत का सबूत है, क्योंकि नौ पर सारी संख्या समाप्त हो जाती है। फिर नौ के बाद तो पुनरुक्ति होती है। दस का मतलब है, फिर लौट गए, ग्यारह, बारह, फिर वही लौटने लगा। नौ पर संख्या समाप्त हो जाती है। नौ अनंत का प्रतीक है; सारी संख्या का अंत आ गया। नौ के बाद असंख्य है।
खेलौ नौखंड मांय,...
फिर तो यह जो अनंत जगत है, इसमें खेलो, दिल खोल कर खेलो! फिर सब लीला है। फिर कुछ बोझ नहीं। फिर कोई चिंता नहीं। फिर छाती पर कोई पत्थर नहीं। फिर कोई विषाद नहीं।
खेलौ नौखंड मांय, ध्यान की तापो धूणी।
मगर एक बात खयाल कर लेना: ध्यान की धूनी तापो तो ही पक जाओगे, तो ही फिर यह जगत लीला रह जाएगा। परम संन्यास इस जगत को लीला की भांति लेना है। शुरुआत ध्यान से, अंत लीला में।
सोखौ सरब सुवाद, जोग की सिला अलूणी।
और तुम अगर इतना कर सको कि ध्यान की धूनी को जला सको... लोग आग जला कर बैठे हैं और सोच रहे हैं कि धूनी लगाए हुए हैं! अरे, आग लगानी हो तो ध्यान की लगाओ! लपटें उठानी हों तो ध्यान की उठाओ; क्योंकि ध्यान में ही जलेगा तुम्हारा अहंकार, जलेगी विषय-वासना।
सोखौ सरब सुवाद,...
उसी में तुम्हारे सारे राग-रंग की जो आकांक्षा है, जो स्वाद की इच्छा है, जो विषय-भोग की वासना है, सब जल जाएगी। मगर लकड़ियां जला कर, धूनी लगा कर बैठोगे, इससे कुछ भी नहीं होगा। तुम किसको धोखा दे रहे? औरों को तो ठीक, मगर खुद को भी धोखा दे रहे। क्योंकि जीवन का एक-एक पल जाता है, वह बहुमूल्य है, फिर लौट कर आने का नहीं है। बैठ जाओगे योग की सिद्धशिला पर! बस ध्यान की धूनी!
पीने दे! पीने दे ओ!
यौवन मदिरा का प्याला!
मत याद दिलाना कल की;
कल है कल आने वाला।
है आज उमंगों का युग--
तेरी मादक मधुशाला!
पीने दे जी भर रूपसी
अपने पराग की हाला!
लेकर अतृप्त तृष्णा को
आया हूं मैं दीवाना,
सीखा ही नहीं यहां है
थक जाना या छक जाना,
यह प्यास नहीं बुझने की
पी लेने दे मन माना,
बस मत कर देना रूपसी
‘बस करना’ है मर जाना।
हम तो जीवन को सिर्फ भोग-विलास समझे हैं और सोचते हैं: अगर भोग-विलास का अंत आ गया तो जीवन का अंत आ गया। सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। जहां भोग-विलास का अंत आता है वहीं से वास्तविक जीवन का प्रारंभ है। और भोग-विलास के अंत का यह अर्थ नहीं कि तुम भागो जंगल। भोग-विलास के अंत का यह अर्थ नहीं कि छोड़ो पत्नी-बच्चों को, कि दुकान-बाजार को। भोग-विलास के वास्तविक अंत का अर्थ है कि ध्यान जगे और शेष सारा जीवन, सारा जीवन, उसके समस्त आयामों में एक लीला-मात्र हो जाए, एक अभिनय-मात्र हो जाए! खेलो फिर जम कर!
राम बनते हो तुम रामलीला में, सीता चोरी चली जाती है। तुम रोते भी हो, तुम वृक्षों से पूछते भी हो कि हे वृक्ष, मेरी सीता कहां? लेकिन भीतर! भीतर तुम जानते हो कि कौन सीता, क्या लेना-देना! मगर बाहर आंसू टपकाते हो। युद्ध हो जाता है, रावण से जम कर युद्ध होता है। जीवन दांव पर लग जाता है। फिर भी भीतर तुम जानते हो--किससे दुश्मनी, किससे मैत्री! पर्दा गिरा...। कभी-कभी पीछे जाकर देखा करें, रामलीला का जब पर्दा गिर जाए, तो राम, रावण, हनुमान सब साथ बैठे चाय पी रहे हैं, गपशप कर रहे हैं। सीता मैया चाय ढाल रही हैं; राम को भी पिला रही हैं, रावण को भी पिला रही हैं। हनुमान जी ने भी पूंछ-वूंछ निकाल कर एक तरफ रख दी है।
भीतर तो एक बोध बना रहे कि सब अभिनय है। फिर कोई चिंता नहीं। फिर इस संसार में रहो। और रहने को जाओगे भी कहां? सब जगह संसार है।
भोग का अंत जीवन का अंत नहीं है। लेकिन भोग से जाग जाना, भोग बाहर रह जाए और तुम्हारे भीतर एक जागरण हो, तुम साक्षी हो जाओ और भोग एक अभिनय हो जाए। भोजन भी करोगे फिर, रात सोओगे भी; सोओगे और सोओगे भी नहीं, भोजन करोगे और भोजन नहीं भी करोगे।
जैन शास्त्रों में प्यारी कथा है: नेमिनाथ का आगमन हुआ। वे कृष्ण के चचेरे भाई थे और जैनों के तीर्थंकर। नेमिनाथ आए हैं, यमुना के उस पार ठहरे हैं। कृष्ण ने रुक्मिणी को कहा है कि जाओ, सुस्वादु भोजन बनाओ और नेमिनाथ की सेवा में उपस्थित होओ। पर उन्होंने कहा कि नदी बहुत गहरी है, नदी बाढ़ पर है, पैदल पार करना संभव नहीं है। नदी इतनी बाढ़ पर है कि नाविक भी खतरा लेना चाहते नहीं। तो हम क्या करें? हम कैसे पार जाएं?
तो कृष्ण ने एक बड़ी अच्छी बात कही। कृष्ण ने कहा कि तुम नदी से कहना कि अगर नेमिनाथ जन्म भर के उपवासे हों तो नदी, राह दे दे। भरोसा तो न आया रुक्मिणी को। मगर कृष्ण कहते हैं तो करके देख लेना ठीक है। आजकल की पत्नी होती तो कहती चलो जाओ भाड़ में! किसको बनाने चले हो! पुराने जमाने की कहानी है, रुक्मिणी पति को ऐसा तो कह नहीं सकती। कहते होंगे तो कुछ ठीक ही कहते होंगे। कहते होंगे तो कुछ सार होगा। बिना किए तो कुछ कहा नहीं जा सकता।
भोजन बनाया, चली। शक है भीतर, संदेह बड़ा है--नदी कहीं रास्ता देती है! संदिग्ध मन से, लेकिन पूछा है कि अगर नेमिनाथ सदा के ही उपवासी हों... ‘सदा के उपवासी!’ इस पर भी भरोसा नहीं आता! सदा के उपवासी तो कैसे हो सकते हैं! कम से कम बचपन में मां का दूध तो पीया ही होगा! और अगर सदा के ही उपवासी हैं तो आज भोजन की इनको कौन सी जरूरत पड़ रही है! ये सब बातें बेबूझ मालूम पड़ती हैं, मगर अब कृष्ण कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे।
और जब नदी ने रास्ता दे दिया तब तो रुक्मिणी को अपनी आंखों पर भी भरोसा नहीं आया। रुक्मिणी और उसकी साथिनें नदी पार कर गईं। नेमिनाथ को भोजन कराया। भोजन कराया तो बहुत हैरान हुईं, बहुत भोजन बना कर लाई थीं, कि एक नहीं पचास आदमियों का पेट भर जाता। शाही स्वागत था। लेकिन नेमिनाथ तो सब अकेले ही उड़ा गए। तब तो और भी शक होने लगा कि ये जीवन भर के उपवासी कैसे! और तब याद आया कि बड़ी झंझट हो गई, जल्दी में हमने कृष्ण से यह तो पूछा ही नहीं कि लौटते वक्त क्या करेंगे! जाते वक्त चलो कि नेमिनाथ जीवन भर के उपवासी हैं... लौटते वक्त? भोजन करा कर लौट रहे हैं, अब किस मुंह से कहेंगे गंगा से या यमुना से कि अब राह दे दो! अब क्या करें? किंकर्तव्यविमूढ़ वे नदी के तट पर खड़ी हैं।
नेमिनाथ हंसने लगे। उन्होंने पूछा: क्या अड़चन है? उन्होंने कहा: अड़चन यह है कि हम पूछ कर आए थे। कृष्ण ने जो उत्तर दिया था, वह काम कर गया, मगर अब कैसे काम करेगा?
नेमिनाथ ने कहा: फिकर छोड़ो! तुम तो वही कहो कि अगर नेमिनाथ जीवन भर के, जन्म भर के उपवासी हों तो नदी राह दे दे। उन्होंने कहा: महाराज, कृष्ण की बात पर भरोसा नहीं आ रहा था, आपकी बात पर तो अब बिलकुल ही नहीं आ सकता।
नेमिनाथ ने कहा: भरोसे या न भरोसे का सवाल नहीं। जो मैं कहता हूं वह करो। नदी भलीभांति जानती है कि नेमिनाथ उपवासे हैं।
और रुक्मिणी को कोई राह नहीं थी तो कहना पड़ा। झिझकते-झिझकते कहा कि हे नदी, राह दे दे, यदि नेमिनाथ जीवन भर के उपवासी हों।
और नदी ने राह दे दी। कहानी बड़ी प्रीतिकर है! प्रतीकात्मक है, कोई ऐतिहासिक नहीं हो सकती। आदमियों को नहीं दिखाई पड़ता, नदियों को क्या खाक दिखाई पड़ेगा! पर बात प्रतीक की है, बात मूल्य की है।
नेमिनाथ का जीवन भर के उपवास का अर्थ केवल इतना ही है कि सब अभिनय है, भीतर साक्षी है। भोजन किया तो, भूखे रहे तो, दोनों हालत में भीतर साक्षी है। साक्षी क्षण भर को नहीं छूटता है। शाश्वत, सतत साक्षी में थिरता हो गई है। यह ध्यान की धूनी है। फिर खेलो!
खेलौ नौखंड मांय, ध्यान की तापो धूणी।
सोखौ सरब सुवाद, जोग की सिला अलूणी।।
फिर अदभुत सिद्धि की शिला है--शाश्वत, जहां न समय है, न रूपांतरण है! फिर उस सिद्धशिला पर विराजमान हो जाओ। वही सिंहासन पाने योग्य है। फिर समाधि के परम सिंहासन पर विराजो।
बांटो बिसवंत भाग, देव थानै दसवंत छोड़ी।
अवस जीव जा हार, टेकसी नहचै गोड़ी।।
जल्दी ही आती है मौत, कहते हैं लाल। फिर घुटने टेकने पड़ेंगे। मौत आए उसके पहले जिसने घुटने टेक दिए ध्यान में, उसकी मौत फिर आती ही नहीं। मौत के सामने घुटने टेकोगे! ‘टेकसी नहचै गोड़ी।’ फिर कुछ उपाय काम नहीं पड़ेगा। तो अभी झुक जाओ! तो अभी मिट जाओ! मौत मिटाए, उससे पहले मिट जाओ, तो फिर तुम्हें कोई मिटा न सकेगा। मौत झुकाए उससे पहले झुक जाओ, तो तुम्हारी विजय शाश्वत।
बांटो बिसवंत भाग, देव थानै दसवंत छोड़ी।
बड़ा प्यारा वचन है। कहते हैं: कम से कम परमात्मा के लिए अपने जीवन का दसवां हिस्सा तो दे दो। चौबीस घंटे में कम से कम दो घंटे तो दे दो! बस इतना भी अगर तुम ध्यान की धूनी रमाने लगो, चौबीस घंटे में अगर दो-ढाई घंटे भी, दसवां हिस्सा, तो आज नहीं कल क्रांति की वह अपूर्व घड़ी आ जाएगी, वह अभिनव क्षण आ जाएगा। अगर इतना भी न कर सको तो कम से कम बीसवां भाग दे दो परमात्मा को। घंटा, सवा घंटा! उतने से भी क्रांति हो जाएगी। मगर उतने से कम से क्रांति नहीं होती। लाल बात पते की कह रहे हैं।
जो लोग भी ध्यान की प्रक्रिया में उतरते हैं उन्हें धीरे-धीरे अनुभव होना शुरू हो जाता है: कोई चालीस मिनट तो मन को विदा करने में लग जाते हैं। चालीस मिनट कम से कम। चालीस मिनट मन की पकड़ है। इसीलिए स्कूलों में, कॉलेजों में, युनिवर्सिटीज में हम चालीस मिनट का पीरियड रखते हैं। उसका कारण है, मनोवैज्ञानिक कारण है। चालीस मिनट तक ही मन किसी चीज को पकड़ता है। अगर चालीस मिनट से ज्यादा का पीरियड हो तो फिर मन भागा-भागा हो जाता है। सारी दुनिया में चालीस मिनट के पीरियड की स्वीकृति हो गई--किसी खास कारण से। यह कोई आकस्मिक नहीं है, यह मन के नियम का हिस्सा है। चालीस मिनट तक तो मन किसी चीज में रमता है। फिर कहता है अब बस! बस चालीस मिनट उसकी क्षमता है।
तो अगर तुमने चालीस मिनट, कम ध्यान किया चालीस मिनट से तो तुम मन के बाहर न हो पाओगे। चालीस के बाद ही काम शुरू होता है। चालीस मिनट और साठ मिनट के बीच में झलकें आती हैं। और साठ मिनट और पचहत्तर मिनट के बीच में थिरता आती है। इसलिए सवा घंटा ठीक समय है। लाल बिलकुल पते की बात कह रहे हैं।
लेकिन अगर यह तुम दो बार कर सको, सवा-सवा घंटा, तब तो कहना क्या! और अगर यह तुम ढाई घंटा एक ही साथ कर सको तब तो डुबकी बहुत गहरी लगे और बड़ी जल्दी लगे। और ऐसी डुबकी लग जाए तुम्हारी, तो फिर मौत भी आएगी, तुम्हें घुटने न टेकने पड़ेंगे, मौत तुम्हारे सामने घुटने टेकेगी।
पीछे सूं जम घेरसी, टेकरै काल किरोई।
खयाल रखो, देर नहीं है, मौत आती ही है! यम के दूत तुम्हारे पीछे ही चल रहे हैं छाया की तरह। किसी भी दिन घेरा डाल देंगे। किसी भी दिन फंदा कस जाएगा।
पीछे सूं जम घेरसी, टेकरै काल किरोई।
और खयाल रखो, मौत हमेशा पुकार दे रही है--सावधान! सावधान! सुनो या न सुनो, मगर मौत रोज सावधान कर रही है।
कुण आरोगै घीव,...
और जब मौत आ जाएगी तो कौन भोगेगा--यह सब जो तुम सोच रहे हो, योजनाएं बना रहे हो, भविष्य की कल्पनाएं बना रहे हो।
...जीमसी कूण रसोई।
इन सारी योजनाओं में, इन सारी कल्पनाओं में तुम जो समय गंवा रहे हो, इस सारे भोजन को जीमने वाला बचेगा नहीं। ‘जीमसी कूण रसाई।’ मौत आएगी और ले जाएगी--और क्षण में ले जाएगी।
उसके पहले ध्यान साध ही लेना है। जिसने उसके पहले ध्यान न साधा, वह मूढ़ है। इस जगत में बुद्धिमान केवल वे ही हैं जो मृत्यु के पहले ध्यान को साध लेते हैं।
मानापमान हो इष्ट तुम्हें
मैं तो जीवन को देख रहा!
मैं देख रहा दानवता के
दुःसाहस के विकराल कृत्य,
मैं देख रहा बर्बरता का
भू की छाती पर नग्न नृत्य,
मैं देख रहा उठने वाली
अम्बर पर संसृति की उसांस,
मैं देख रहा यह मानवता
कितनी निर्बल कितनी अनित्य!
जमघट है रोने वालों का,
जमघट है गाने वालों का,
सब देने को लाए थे पर
जमघट है पाने वालों का,
कुछ बने लुटेरे लूट रहे
कुछ बने भिखारी लूट रहे
है जमा मिटाने को ही यह
जमघट मिट जाने वालों का
मैं जग की सुख देने वाले
जग के क्रन्दन को देख रहा
मानापमान हो इष्ट तुम्हें
मैं तो जीवन को देख रहा!
तुम साक्षी बनो। मानापमान होने दो दूसरों को इष्ट। सफलताएं-असफलताएं, यश-अपयश--छोड़ो नासमझों को, बच्चों को! खिलौने हैं ये। तुम तो जीवन को देखो, तुम तो द्रष्टा बनो। तुम तो साक्षी में डूबो।
साक्षी हरिद्वार है! साक्षी गंगा है! साक्षी कैलाश है! और इतने पास, इतने पास है कि कदम भी नहीं उठाना पड़े और पहुंच जाओ, कि आंख भी न खोलनी पड़े और देख लो! आंख बंद करके देख लो, इतने पास है। बिना हिले-डुले देख लो, इतने पास है। पास कहना ठीक नहीं, तुम्हारा स्वरूप है। तुम साक्षी हो! तुम परमात्मा के अंश हो। तुम परमात्मा हो!
और जब तक तुम्हें अपना यह परमात्म-बोध न हो जाए, तब तक समझना कि जीवन अकारथ है। तब तक समझना, कुछ भी पाया हो तो व्यर्थ है। तब तक इतना करो जितना लाल कहते हैं। बन सके तो दसवां हिस्सा परमात्मा को दे दो। न बन सके, कठिनाइयां हों... हैं तो नहीं कठिनाइयां, लेकिन लोग खड़ी कर लेते हैं।
मेरे पास लोग आते हैं। कहते हैं: मन अशांत है, शांति चाहिए। अगर मैं उन्हें कहूं, ध्यान करो, वे कहते हैं: समय कहां! अशांत होने को समय है, अशांत होने में चौबीस घंटे लगाते हैं--शांत होने को समय कहां! मैं उनसे पूछता हूं: कभी फिल्म देखते हैं?
हां-हां, कभी जाना पड़ता है। बच्चे हैं, पत्नी है, मित्र हैं।
रोटरी-क्लब जाते हैं?
जाना ही पड़ता है; सदस्य हूं।
रोटरी-क्लब भी जा सकते हैं, फिल्म भी देख सकते हैं, क्रिकेट मैच भी देखते हैं, रेडियो भी सुनते हैं, टेलीविजन भी देखते हैं, अखबार भी पढ़ते हैं--कचरा अखबार! जिसमें सिवाय कचरे के और कुछ भी नहीं होता। और वही कचरा दोहरता रहता है रोज। सबके लिए समय है और ध्यान की बात उठती है तो बस एकदम से समय कहां है! और ये वे ही लोग हैं जिनको तुम ताश खेलते देखोगे और अगर पूछो कि क्या कर रहे हो, तो कहते हैं: समय नहीं कटता, समय काट रहे हैं! एक तरफ समय नहीं कटता, ताश के पत्ते खेलते हैं, ताश के राजा-रानी उनसे उलझते हैं। समय नहीं कटता, शतरंज बिछाते हैं। लकड़ी के हाथी-घोड़े, उनको दौड़ाते हैं। कहो ध्यान; समय कहां है!
और जब वे कहते हैं समय कहां है, तो ऐसा मत सोचना कि वे जान कर धोखा दे रहे हैं। वे मानते हैं कि समय कहां है। उनकी आंखों से बिलकुल ईमानदारी मालूम पड़ती है। वे कोई ऐसा नहीं कह रहे कि आपको धोखा दे रहे हैं। नहीं, उनको पक्का भरोसा है कि समय है ही कहां। सोने को समय है। सब कामों के लिए समय है। लड़ने-झगड़ने को समय है। गपशप करने को समय है। सिर्फ ध्यान के लिए समय नहीं है!
तुम परमात्मा के लिए एक घंटा भी नहीं देना चाहते, तो चूकोगे, बुरी तरह चूकोगे, बहुत पछताओगे! और फिर पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत! मौत ने अगर द्वार पर दस्तक दे दी, तब बहुत पछताओगे। क्योंकि उस क्षण में जितना समय ध्यान के लिए दिया था वही बचा हुआ सिद्ध होता है और जो और तरह गया वह गया। वह गया, नाली में बह गया! जो ध्यान में लगाया था वही बच जाता है। परमात्मा के सामने तुमने जो ध्यान में समय बिताया था, बस उसका ही लेखा है, बाकी कुछ नहीं लिखा जाता। बाकी तो सब दो कौड़ी का है, उसका कोई मूल्य नहीं है।
तुम परमात्मा के सामने खड़े होकर यह नहीं कह सकोगे कि रोज टेनिस खेलने जाता था, कि इतनी फिल्में देखीं, कि एक फिल्म नहीं छोड़ी।
एक सज्जन को तो मैं जानता हूं, मेरे छोटे गांव में, वहां एक ही सिनेमागृह है, एक फिल्म आती है तो चार-पांच दिन चलती है, वे एक ही फिल्म चार-पांच दिन देखते हैं। उनसे मैंने पूछा: एक ही फिल्म चार-पांच दिन देखना बड़ी हिम्मत की बात है! आदमी एकाध ही बार देखने से... हिंदी फिल्में और! करीब-करीब दूसरी फिल्मों से ही, उनकी ही चोरी और उन्हीं का पुनरुक्तिकरण होता है। तुम एक ही फिल्म पांच बार देखते हो!
उन्होंने कहा: देखता कौन है! मगर न जाएं तो करें क्या? न जाएं तो जाएं कहां? समय कट जाता है। कभी-कभी सो भी लेते हैं वहां, कभी देख भी लेते हैं। और मालूम भी है कि अब यह फिल्म तो दो दफे देख ली तो इसका पता है, क्या-क्या होने वाला है। लेकिन फिर भी जाएं तो कहां जाएं?
तुम देखते हो जीवन कैसा रिक्त है, कैसा खाली है! और हंसना मत उन पर, क्योंकि तुम भी यही कर रहे हो अलग-अलग ढंग से। वही जो तुमने कल किया था, आज भी करोगे। वही तुमने परसों भी किया था, वही तुमने नरसों भी किया था। पुनरुक्ति ही तो तुम्हारा जीवन है। तुम दोहराते ही तो रहते हो। सुबह से सांझ तक एक कोल्हू के बैल की तरह घूमते रहते हो। वही झगड़े वही प्रेम, वही मनाना, वही बुझाना! वही हार, वही जीत, वही अकड़! सब वही है! वही क्रोध, वही संबंध। अंतर क्या है?
अगर तुम अपनी जिंदगी को जरा गौर से देखो तो तुम पाओगे एक पुनरुक्ति है। लेकिन तुम देखते भी नहीं, क्योंकि देखोगे तो बहुत ऊब पैदा होगी, बहुत घबड़ाहट होगी। तुम देखते ही नहीं, भागे चले जाते हो--इस आशा में कि कोल्हू के बैल नहीं हो, कहीं पहुंच रहे हो, अब पहुंचे, तब पहुंचे।
जीवन की अंतिम घड़ी में बहुत रोओगे। मौत के कारण नहीं; वह जो जीवन गंवाया, उसके कारण। अभी समय है। अभी थोड़े से क्षण परमात्मा को देना शुरू कर दो। अभी एक घंटे भर बस बैठ ही रहो। और बहुत बाधाएं आएंगी। अगर अखबार पढ़ो, तो पत्नी बच्चों से कहती है: शांत, डैडी अखबार पढ़ रहे हैं! अगर ध्यान करोगे, तो बच्चे आकर कान में अंगुली डालेंगे और पत्नी कहेगी कि हां ठीक है, फिजूल समय गंवाना!
पत्नियां जितना ध्यान से डरती हैं उतना किसी और चीज से नहीं। क्योंकि ध्यान, फिर आखिरी कदम संन्यास। पति भी ध्यान से बहुत डरते हैं। अगर पत्नी ध्यान करने लगे तो बेचैन। यहां मुझे रोज इस तरह के अनुभव होते हैं। अगर पति ध्यान करे तो पत्नी आ जाती है कि आप क्यों हमारी गृहस्थी बर्बाद करना चाहते हैं? जैसे ध्यान से गृहस्थी बर्बाद होना कोई अनिवार्यता है! हां, पहले होती रही है बर्बाद, वह मुझे पता है। वह संन्यास गलत था। वह संन्यास भ्रांत था।
मैं उस संन्यास का पक्षपाती नहीं हूं। किसी ने उसका लेखा-जोखा नहीं किया कि बुद्ध और महावीर के पीछे जो लोग घर-द्वार छोड़ कर चले गए, उनके घर-द्वारों का क्या हुआ? पत्नियों ने भीख मांगी, बच्चे बीमारियों में मरे, कि स्त्रियां वेश्याएं हो गईं, कि बूढ़ों को सड़कों पर घिसट-घिसट कर भीख मांगनी पड़ी, कि मरने को उनको कफन भी न मिला। इसका किसी ने कोई हिसाब नहीं लगाया है। लेकिन जिस दिन भी यह हिसाब लगाया जाएगा, उस दिन बड़ी हैरानी होगी। महावीर एक तरफ तो पैर फूंक-फूंक कर रखते रहे कि चींटी न मरे, लेकिन उनके पीछे जो संन्यास खड़ा हुआ उसमें आदमी दबे और मरे, उसमें घर बर्बाद हुए, उसमें गृहस्थियां टूटीं।
हजारों साल से संन्यास एक रुग्ण अवस्था से पीड़ित रहा है, जीवन-निषेधक रहा है। इसलिए डर भी ठीक है, पत्नी अगर कहती है घबड़ा कर कि आप बचाएं मेरी गृहस्थी को तो मैं उसकी बात को समझता हूं। क्षम्य है। पुराना संन्यास ही उसकी धारणा में है।
मैं एक नये संन्यास की धारणा दे रहा हूं--संन्यास का एक नया अर्थ, एक नई भाव-भंगिमा, एक नई मुद्रा! ध्यान करो और जीवन को अभिनय समझो। न कहीं भागना है, न कुछ छोड़ना है। पत्नी पत्नी है, बच्चे बच्चे हैं। अभी तुम सोचते हो मेरे हैं, तब तुम समझोगे मेरा कौन! एक पात्र हूं मैं भी, एक अभिनय है; पूरा करना है, ठीक से पूरा करना है! और जब अभिनय ही है तो फिर क्या कंजूसी--ठीक से पूरा करना है! जब अभिनय है तो पूरी कला से पूरा करना है। न कोई चिंता है, न कोई बोझ है।
निर्भार हो जाओगे, निर्बोझ हो जाओगे--जैसे ही अभिनय का भाव समझ में आ जाएगा। फिर खेलो सब रंग, फिर खेलो होली। फिर मनाओ दीवाली। मगर एक काम न चूके, एक बात न चूके--एक घंटा कम से कम परमात्मा को दे दो। एक घंटा चुपचाप बैठ जाओ साक्षी होकर, मन की सारी गतिविधियों को देखते रहो। देखते-देखते तीन महीने से नौ महीने के बीच में साक्षी का भाव उमगना शुरू हो जाता है। और जिस दिन पहली बार क्षण भर को भी तुम्हारे भीतर ‘साक्षी’ शब्द की अनुभूति होगी, नाच उठोगे, गुनगुना उठोगे! पहली दफा वीणा बजी! पहली दफे बांसुरी सुनाई पड़ी! पहली दफा नाद का अनुभव होगा! और पहली दफे स्वाद मिलेगा--वास्तविक जीवन का, शाश्वत जीवन का! उस जीवन का ही दूसरा नाम परमात्मा है।
आज इतना ही।

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