QUESTION & ANSWER

Ek Naya Dwar (एक नया द्वार) 02

Second Discourse from the series of 5 discourses - Ek Naya Dwar (एक नया द्वार) by Osho.
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मेरे प्रिय आत्मन्‌!
कुछ प्रश्र्न मेरे सामने आए हैं। कल रात्रि मैंने आपसे कहा: मनुष्य का मन जब तक सीखे हुए ज्ञान से मुक्त नहीं होता है, तब तक वह उस ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकेगा जो कि स्वयं में ही सोया हुआ है। और जिसे बाहर से सीखने का कोई भी उपाय नहीं है। मनुष्य की चेतना में, मनुष्य की आत्मा में, मनुष्य के स्वयं के जीवन के केंद्र पर कोई शक्ति सोई हुई है, वह जागे, तो ही सत्य का ज्ञान उपलब्ध हो सकता है। सत्य के ज्ञान को पाने के लिए बाहर से जो भी हम सीख लेते हैं, वह सब बाधा बन जाती है, यह कल मैंने आपसे कहा। इस संबंध में ही कुछ प्रश्र्न हैं, पहले उनके आपको उत्तर दूं।

पूछा है:
भगवान, हम यदि अर्जित ज्ञान को छोड़ दें, जो हमने सीखा है उसे यदि छोड़ दें, तो कहीं जड़ता और निष्क्रियता पैदा न हो जाए?

अर्जित ज्ञान को दो हिस्सों में बांट लेना जरूरी है। बाहर के जगत के संबंध में जो ज्ञान है, वह तो अर्जित ज्ञान ही होगा। उस संबंध में जो हम पदार्थ के बाबत जानते हैं, संसार के संबंध में जानते हैं, उसे तो बाहर से ही पाना पड़ता है। जो ज्ञान बाहर के संबंध में है, वह बाहर से ही उपलब्ध होता है।
लेकिन जो ज्ञान स्वयं के संबंध में है, वह बाहर से उपलब्ध नहीं होता है।
आत्म-ज्ञान बाहर से उपलब्ध नहीं होता है।
गणित को, केमिस्ट्री या फिजिक्स को, या भूगोल को, या भाषाओं को जो जानना चाहता है, उसे तो बाहर से सीखना पड़ेगा। पराए के संबंध में बिना सीखे कोई उपाय नहीं है। इसीलिए जो हम ‘पर’ के संबंध में जानते हैं, उसे ज्ञान कहना भी ठीक नहीं है--वह इनफर्मेशन, सूचना से ज्यादा नहीं है।
ज्ञान तो केवल वही है, जो हम स्वयं के संबंध में जानते हैं। क्योंकि जो हमारे बाहर है, उससे हम केवल परिचित हो सकते हैं, उसे जान नहीं सकते। क्योंकि जो हमारे बाहर है, उसकी अंतरात्मा में हम प्रविष्ट नहीं हो सकते हैं, हम केवल उसके बाहर घूम सकते हैं और जान सकते हैं--एक्वेंटेंस हो सकता है, परिचय हो सकता है; ज्ञान नहीं।
विज्ञान ज्ञान नहीं है; विज्ञान केवल परिचय है। ज्ञान तो उसका हो सकता है जिसके प्राणों में हमारे प्राण प्रविष्ट हो सकें। जिसे हम भीतर से जान सकें, उसे ही जान सकते हैं। यही कारण है कि विज्ञान जितना भी खोजता है उतना ही आत्मा को नहीं पाता है। विज्ञान शरीर से गहरा नहीं जा सकता। परिचय शरीर से गहरा नहीं हो सकता।
लेकिन एक और रास्ता है। एक और रास्ता है, वही रास्ता धर्म है। विज्ञान ‘पर’ का ज्ञान है, धर्म ‘स्व’ का। विज्ञान सीखा जा सकता है विद्यालयों में, ग्रंथों से; लेकिन धर्म नहीं सीखा जा सकता--न ग्रंथ सिखा सकते हैं, न विद्यालय सिखा सकते हैं।
विज्ञान की एक ट्रेडीशन होती है, एक परंपरा होती है। अगर हम न्यूटन को, एडीसन को अलग निकाल लें, तो आइंस्टीन खड़ा नहीं हो सकेगा। विज्ञान की एक सतत परंपरा है। जो पीछे जाना गया है, आगे का विज्ञान उसी पर खड़ा होता है। लेकिन अगर हम महावीर को, बुद्ध को, कृष्ण को, क्राइस्ट को अलग निकाल लें, तो भी धर्म जाना जा सकता है। धर्म की कोई परंपरा नहीं होती। धर्म वैयक्तिक अनुभव है। और विज्ञान एक परंपरा है।
अगर दुनिया में सारे धर्मग्रंथ नष्ट हो जाएं, तो भी धर्म नष्ट नहीं होगा; लेकिन विज्ञान के ग्रंथ नष्ट हो जाएं, तो विज्ञान नष्ट हो जाएगा। दुनिया के सारे धर्मग्रंथ नष्ट हो जाएं, तो भी धर्म नष्ट नहीं होगा; क्योंकि धर्म ग्रंथों में है ही नहीं। धर्म तो, कोई भी व्यक्ति जब अपने भीतर जाएगा, तो जान लेगा अपने स्वभाव को और पहचान लेगा धर्म को। लेकिन विज्ञान के ग्रंथ नष्ट हो जाएं, तो फिर अ ब स से शुरू करना पड़ेगा। महावीर या बुद्ध जहां समाप्त करते हैं, धर्म का अनुभव वहां से शुरू नहीं होता। आइंस्टीन जहां समाप्त करता है, उसके बाद का आने वाला विचारक आइंस्टीन के बाद से शुरू करेगा। लेकिन धर्म का अनुभव तो प्रत्येक को प्रारंभ से ही शुरू करना पड़ता है, किसी के कंधे पर खड़े होने का कोई उपाय नहीं है।
धर्म की कोई परंपरा नहीं होती; लेकिन हमने धर्म की परंपरा बना ली है। और धर्म की कोई शिक्षा नहीं होती; लेकिन हम धर्म की शिक्षा देते हैं। और इसी वजह से धर्म विनष्ट हो गया है, विलीन हो गया है, हमारे प्राणों से उसका संबंध शिथिल हो गया है। हम धर्म को विज्ञान के ढंग पर समझाना और सिखाना चाहते हैं। यह संभव नहीं है।
यह मैंने कल आपसे कहा कि धर्म के संबंध में, जो हममें अर्जित ज्ञान है, उसे छोड़ देना होगा। छोड़ देने का क्या अर्थ है? छोड़ देने का क्या अर्थ है? छोड़ देने का अर्थ यह नहीं है कि आप उसे भूल जाएंगे जो आपने जान लिया है। जो आपने जान लिया, उसे भूलने का कोई उपाय नहीं है। छोड़ देने का केवल इतना ही अर्थ है कि जो आप जान रहे हैं धर्म के संबंध में, अगर आपको पता चल जाए: यह मेरा ज्ञान नहीं है, तो आपके ऊपर उसकी पकड़ समाप्त हो जाएगी। अगर आपको यह प्रतीत हो जाए: यह सीखा हुआ ज्ञान ज्ञान नहीं है, अगर आपको यह खयाल में आ जाए कि यह मेरा ज्ञान नहीं है, तो आपके ऊपर उसकी जो जकड़ और बंधन है वह विलीन हो जाएगा।
ज्ञान की कोई जंजीरें नहीं होती हैं--हम मान लेते हैं, हमारी मान्यता में ही जंजीर होती है। एक आदमी दो और दो पांच समझता हो, फिर उसे कोई बताए कि दो और दो चार होते हैं, तो क्या वह पूछेगा कि मैं दो और दो पांच अब तक जानता रहा उसे कैसे छोडूं। नहीं, उसे यह समझ में आ जाए कि दो और दो चार होते हैं, तो दो और दो पांच होते थे यह अपने आप छूट गया, इसे छोड़ना नहीं पड़ेगा।
ज्ञान की कोई जंजीरें नहीं होती हैं कि उन्हें तोड़ना पड़े, वे हमारी मान्यता में और हमारे विश्र्वास में होती हैं। लेकिन हजारों वर्षों से हमको विश्र्वास करना सिखाया गया है। हमसे यही कहा जाता रहा है: विश्र्वास करो; विचार मत करो। इसका परिणाम यह हुआ है कि विश्र्वास और विश्र्वास के अंधे आधार पर हमने कुछ बातें सीख ली हैं और उनसे हम जकड़ गए हैं। और वह जकड़न हमारे चित्त को जमीन से बांधे रखती है, ऊपर की यात्रा नहीं होने देती। कोई हिंदू होकर बंद हो गया है, कोई मुसलमान होकर बंद हो गया, कोई बौद्ध, कोई जैन, कोई ईसाई। हम सब बंद हो गए हैं अपने-अपने कारागृहों में।
और स्मरण रहे, जो कारागृह मनुष्य को मनुष्य से अलग कर देते हैं, वे मनुष्य को परमात्मा से कभी भी नहीं जोड़ सकेंगे। जो दीवालें आदमी आदमी को तोड़ देती हैं, वे आदमी को परमात्मा से जोड़ने वाली सेतु नहीं बन सकेंगी। अभी मनुष्यता उस स्थान पर भी नहीं पहुंच पाई है जहां सारे मनुष्यों के बीच सब तरह की दीवालें गिर जाएं। और दीवालें किस चीज की हैं? सिवाय शब्दों के और कौन सी दीवालें हैं। कुछ शब्द मैंने सीख लिए हैं, कुछ शब्द आपने सीख लिए हैं। और हमारे शब्द भिन्न हैं। तो मैं हिंदू हूं और आप मुसलमान हैं; आप ईसाई हैं, मैं जैन हूं। कुछ शब्द हमने सीख लिए हैं और वे शब्द हमें अलग किए हुए हैं।
सत्य अलग नहीं करेगा, इकट्ठा कर देगा, जोड़ देगा। लेकिन शब्द अलग कर देते हैं। शब्द सत्य नहीं हो सकते। शब्द बहुत थोथे हैं, निर्जीव और मुर्दा हैं।
जब आप ‘आत्मा’ शब्द का विचार करते हैं, क्या खयाल आता है आपके पास? जब आप ‘परमात्मा’ शब्द का विचार करते हैं, क्या खयाल आता है? जो आपको सिखा दिया गया है वही। अगर हिंदू के सामने हम कहें ‘परमात्मा’--तो वह सोचता है राम; अगर कृष्ण को पूजता है, तो कृष्ण। क्रिश्चिएन के सामने कहें, तो वह कुछ और सोचता है। मुसलमान के सामने कहें, तो कुछ और सोचता है। हर शब्द के संबंध में उन्होंने जो सीख रखा है, वही सोचते हैं। और बड़े अर्थ की बात यह है कि सत्य को जानने के लिए मन सभी शब्दों से शून्य हो, तभी उसका अनुभव हो सकता है। क्योंकि शब्द भी एक तरह का तनाव हैं, बेचैनी हैं, शब्द भी मन पर एक तरह का बोझ हैं। जब सब भांति शब्दों से मन शून्य होता है, तो वैसा ही हो जाता है जैसे झील लहरों से शून्य हो गई हो, एक दर्पण बन जाता है, और उस दर्पण में ही अनुभव होता है।
शब्द बाधा हैं। और इन शब्दों को हमने विश्र्वास के आधार पर पकड़ लिया है। किसने आपसे कहा कि ये सत्य हैं? लेकिन परंपरा कहती है और हम विश्र्वास कर लेते हैं। हमने सोचा? हमने विचारा? नहीं। हमने मनुष्य का जो सबसे महत्वपूर्ण गुण है--विचारना; उसको भी छोड़ दिया है। आदमी करीब-करीब भेड़ों की भांति हो गए हैं। वे किसी के पीछे चलते हैं, सोचते नहीं, वे खुद विचार नहीं करते। वे अनुयायी हैं और विश्र्वासी हैं। और दुनिया के सभी शोषक यही चाहते हैं कि आदमी विश्र्वासी रहे, विचारशील न हो जाए। राजनीतिज्ञ भी यही चाहते हैं, धर्म-पुरोहित भी यही चाहते हैं। सभी यही चाहते हैं कि मनुष्य में विचार पैदा न हो। क्योंकि विचार बहुत विद्रोही है, विचार बहुत रिबेलियस है। और विचार पैदा होगा, तो दुनिया में बड़ी क्रांति हो जाएगी। इसलिए विचार न हो विश्र्वास हो, तो विश्र्वास से कभी कोई क्रांति नहीं होती। विश्र्वास आदमी को भेड़ों जैसा बना देता है, क्रांति का सवाल ही नहीं रह जाता है।
मैंने सुना है, एक स्कूल में एक अध्यापक अपने बच्चों को गणित सिखा रहा था। उसने बच्चों से पूछा कि एक छोटी सी बागुड़ में, एक बगिया में ग्यारह भेड़ें बंद हैं, उनमें से पांच छलांग लगा कर बाहर निकल गईं, तो पीछे कितनी भेड़ें बचेंगी?
एक बच्चे ने हाथ हिलाया, सबसे पहले एक छोटे से बच्चे ने हाथ हिलाया।
उस शिक्षक ने पूछा: कितना उत्तर है?
उस बच्चे ने कहा: एक भी भेड़ पीछे नहीं बचेगी।
शिक्षक ने कहा: तुम बिलकुल पागल हो! पांच भेड़ें बाहर निकलीं और ग्यारह भीतर थीं, भीतर बिलकुल नहीं बचेंगी?
उस बच्चे ने कहा: आप गणित जानते होंगे, मैं भेड़ों को जानता हूं। मेरे घर में भेड़ें हैं। अगर एक भेड़ भी बाहर निकल गई, तो पीछे कोई भेड़ नहीं बचेगी। आप गणित जानते होंगे, लेकिन मैं भेड़ों को जानता हूं, मेरे घर में भेड़ें हैं।
आदमी के बाबत भी क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि आदमी ने भेड़ों की तरह व्यवहार किया है? क्या हम यह कह सकते हैं कि हम मनुष्य की भांति विचारपूर्ण हैं या कि हम पीछे चलते हैं? जो भी पीछे चलता है, वह अपनी मनुष्यता खो देता है। हम सभी लोग किसी के पीछे चलते हैं। हममें से किसी ने भी इतना आत्म-गौरव नहीं समझा है कि वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो और चले, सोचे और चले।
नहीं, हम बिना सोचे चलते हैं। आप सोच कर हिंदू हैं? आप सोच कर मुसलमान हैं? आप सोच कर जैन हैं? ईसाई हैं? क्या हैं? बिना सोचे हैं, विश्र्वास से हैं। विचार से नहीं हैं। और जो विश्र्वास से जीता है, वह बंधन में जीता है। वह कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता, क्योंकि विश्र्वास अंधा है, विश्र्वास के पास कोई आंखें नहीं हैं। और विश्र्वास की ताकत, विश्वास की ताकत इस बात में नहीं होती कि जो कहा जा रहा है वह सत्य है, बल्कि इस बात में होती है कि जो कहा जा रहा है वह इतने ढंग से, व्यवस्थित रूप से प्रचारित किया जा रहा है कि सत्य जैसा प्रतीत होने लगेगा।
एडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्म-कथा में लिखा है: ऐसा कोई भी असत्य नहीं है जिसे बार-बार दोहरा कर लोगों के लिए सत्य न बनाया जा सके। ऐसा कोई भी असत्य नहीं है जिसे बार-बार दोहरा कर लोगों के लिए सत्य न बनाया जा सके! हिटलर ने लिखा है कि मैंने अपने जीवन में यही जाना: जो असत्य बार-बार प्रचारित किया जाता है, वह सत्य प्रतीत होने लगता है। बार-बार प्रचारित करने से कोई भी बात सत्य प्रतीत होने लगती है। मनुष्य के मन में बार-बार दोहराने से कंडीशनिंग पैदा होती है, संस्कार पैदा होते हैं और कोई भी बात सत्य मालूम होने लगती है।
अगर हम एक मंदिर में रोज पूजा करते हैं, और बचपन से हमें यह कहा गया है कि यह पूजा भगवान की पूजा है, तो हमें कभी यह खयाल भी नहीं उठता कि हम जो पूजा कर रहे हैं वह सच में भगवान की पूजा है या कि हम अपनी ही बनाई हुई किसी मूर्ति को पूज रहे हैं? लेकिन हमें बार-बार अगर कहा गया है, तो वह हमें सत्य प्रतीत होने लगता है।
अब तक ऐसी कोई भी बात नहीं है जो मनुष्य के किसी भी हिस्से को बार-बार दोहरा कर सत्य न बनाई जा सके। हमारे आधार क्या हैं विश्र्वास के? सिवाय इसके कि बचपन से कुछ बातें दोहरा दी जाती हैं। और क्या आधार हैं? जो बच्चा आपके घर में पैदा हुआ है--अगर आप मुसलमान हैं, उस बच्चे को बचपन से ही जैन के घर में रख दें, जवान होकर वह मुसलमान नहीं होगा, जैन होगा। क्यों? वह जैन-घर में जो बातें बचपन से सुनेगा, उनको दोहराना खुद भी सीख लेगा, वे उसके मन में बैठ जाएंगी।
पावलफ नाम का एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कुछ प्रयोग करता था। वह एक कुत्ते को भोजन कराता था। भोजन लाते ही कुत्ते की जीभ से पानी टपकने लगता था। स्वाभाविक है। पावलफ रोटी देता, साथ में घंटी भी बजाता। पंद्रह दिन बाद उसने रोटी तो नहीं दी, सिर्फ घंटी बजाई--कुत्ते के मुंह से पानी टपकने लगा।
घंटी सुन कर पानी का टपकना बिलकुल अस्वाभाविक है। इससे कोई संबंध नहीं है। घंटी बजाने से कुत्ते के मुंह से लार के टपकने का क्या संबंध है? कोई भी संबंध नहीं है। लेकिन पंद्रह दिन के प्रचार से संबंध हो गया; पंद्रह दिन रोटी के साथ घंटी बजती थी, एसोसिएशन हो गया; रोटी और घंटी में संबंध हो गया। घंटी बजती, तो कुत्ते को लगता कि रोटी आने वाली है। आज रोटी तो नहीं आई, सिर्फ घंटी बजी, लार टपकने लगी। यह प्रचारित सत्य हो गया। रोटी से लार का टपकना तो स्वाभाविक था, लेकिन घंटी से लार का टपकना प्रचारित सत्य हो गया। प्रचार किया गया पंद्रह दिन तक, कुत्ता राजी हो गया।
हम सारे लोग भी इसी तरह के प्रचारित सत्यों के भीतर जीते हैं। हमसे कहा जाता है: यह मूर्ति भगवान की है; तो हमारे हाथ जुड़ने लगते हैं। दूसरे को, हमारे पड़ोसी को कहा जाता है: यह मूर्ति भगवान की नहीं है; तो उसके हाथ नहीं जुड़ते। मूर्ति वही है--एक हाथ जोड़ता है, एक हाथ नहीं जोड़ता। क्यों? क्या फर्क है? एक आदमी मंदिर के सामने से निकलता है, तो उसका मन होता है हाथ जोड़ें; दूसरा आदमी निकलता है, उसका मन होता है इस मंदिर को तोड़ दें तो धर्म हो जाएगा। हिंदू मुसलमान की मस्जिद तोड़ देना चाहता है, मुसलमान हिंदू का मंदिर तोड़ देना चाहता है। जो एक के लिए धर्मस्थान है, वह दूसरे के लिए अधर्म का स्थान बन जाता है। क्यों? प्रचार भिन्न-भिन्न हैं। एक के मन पर एक बात सिखाई गई है, दूसरे के मन को दूसरी बात सिखाई गई है। और कुछ भी सिखाया जा सकता है। कैसी भी मूर्खतापूर्ण बात सिखाई जा सकती है। और हजारों वर्ष तक चलाई जा सकती है। और लाखों लोग उसको मानते रह सकते हैं।
दुनिया का जो पतन, आदमी के जीवन में जो आज इतना अंधकार है, उसका कोई और कारण नहीं है--नास्तिकता कारण नहीं है उस अंधकार का, न ही विज्ञान का विकास उसका कारण है, न ही भौतिक समृद्धि का बढ़ जाना उसका कारण है। उसका एक मात्र कारण है: पांच हजार वर्षों से मनुष्य को विश्र्वास सिखाया जा रहा है; विचार नहीं। मनुष्य के भीतर विचार जड़ हो गया है। उसके भीतर सोचने-समझने की क्षमता क्षीण हो गई है। वह केवल मान सकता है, बिलीफ कर सकता है, विश्र्वास कर सकता है। खोज नहीं सकता, जान नहीं सकता, पहचान नहीं सकता, अपनी तरफ से प्रयास नहीं कर सकता। कोई कह दे, तो वह मान लेगा। जितनी बड़ी ऑथेरिटी हो कहने वाली, उतनी जल्दी मान लेगा। इसलिए सभी धर्मों के लोग कहते हैं, हमारा ग्रंथ खुद भगवान का लिखा हुआ है। बड़ी ऑथेरिटी पैदा करते हैं। हमारा ग्रंथ खुद भगवान का लिखा हुआ है! दूसरों के ग्रंथ आदमियों के लिखे हुए हैं। भगवान से बड़ा प्रामाणिक और कौन हो सकता है। प्रचार करने में सुविधा हो जाती है। फिर जितनी पुराने दिनों की बात प्रचारित की गई हो उतनी मन में आसानी से बैठती है।
इसलिए हर दुनिया का धर्म कहता है, हम सबसे पुराने धर्म हैं, बाकी सब धर्म नये हैं। क्यों? इतना पुराना होने का शौक क्या है? पुराना होने का कारण है। जितनी बात पुरानी हो, लोगों को लगती है उतनी सच होनी चाहिए, नहीं तो इतने दिन जिंदा कैसे रहती। जितनी पुरानी हो उतनी सच होनी चाहिए। लेकिन बेवकूफियां भी पुरानी होती हैं, मूर्खताएं भी पुरानी होती हैं। पुराने होने से कुछ भी नहीं होता।
अरस्तू जैसा बहुत विचारशील व्यक्ति, जो कि यूनान में तर्क का पिता कहा जाता है। उसने भी अपनी किताब में लिखा है: स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं। यूनान में यह खयाल था कि स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं। और किसी समझदार को यह खयाल न सूझा कि किसी स्त्री के दांत गिन ले! अरस्तू खुद इतना बड़ा तर्कशास्त्री और विचारक था! और उसके पास एक, एक नहीं, दो-दो औरतें थीं, उसकी दो पत्नियां थीं। लेकिन उसको यह कभी खयाल न आया कि बैठ कर उनके दांत गिन ले! खयाल था यूनान में कि दांत स्त्रियों के कम होते हैं। असल बात यह है कि पुरुषों को यह कभी समझ में नहीं आता कि स्त्रियां उनके बराबर किसी भी चीज में हो सकती हैं, तो दांत भी बराबर कैसे हो सकते हैं! किसी पुरुष ने यह ठीक न समझा कि दांत गिने! और स्त्रियों ने भी अपने दांत न गिने! क्योंकि स्त्रियां तो पुरुषों की अनुयायी हैं; जहां पुरुष जाते हैं वहां वे भी चली जाती हैं।
एक हजार साल तक यूनान के करोड़ों लोग मानते रहे कि स्त्रियों के दांत पुरुषों से कम होते हैं। जिस आदमी ने पहली दफा दांत गिने, लोगों ने उससे कहा कि तुम पागल हो, ऐसा कभी हुआ है कि बराबर दांत हुए हों? और अगर तुम्हारी स्त्री के दांत बराबर हैं, तो यह कोई प्रकृति की भूल होगी। तुम्हारी स्त्री के दांत होंगे बराबर, लेकिन स्त्रियों के दांत कभी पुरुषों के बराबर होते ही नहीं, न कभी हुए हैं! हजारों साल से अरस्तू जैसे विचारक ने लिखा है कि स्त्रियों के दांत कम होते हैं।
दुनिया में हजारों तरह की नासमझियां पुरानी होने की वजह से चलती रही हैं। लेकिन किसी ने उन पर संदेह नहीं किया और विचार नहीं किया। और जो विचार करे वह पागल मालूम पड़ेगा। क्योंकि विचार न करने वालों की भीड़ में एक आदमी जब विचार करता है, तो पागल मालूम पड़ता है। जहां सारे लोग एक तरह से सोचते हों। और एक तरह से इसीलिए सोचते हैं कि सोचते ही नहीं हैं। जहां भीड़ खड़ी हो वहां एक आदमी जरा भी पृथक सोचेगा, तो उसे खुद भी शक होगा कि मैं कहीं गलत तो नहीं हूं। क्योंकि इतने लोग उस तरफ! भीड़ की अपनी ताकत है। और इसलिए मैं कहता हूं, सत्य का भीड़ से कोई संबंध नहीं है। और केवल वे ही लोग सत्य को उपलब्ध हो पाते हैं जो भीड़ से मुक्त होने में समर्थ होते हैं। सिखाए हुए ज्ञान से केवल वही मुक्त हो सकता है जो भीड़ के प्रभाव से मुक्त हो जाए।
एक कहानी मैंने सुनी है:
एक राजा के दरबार में एक नया-नया आदमी आया। और उसने उस राजा को कहा कि आप क्या मनुष्यों जैसे वस्त्र पहने हुए हैं। आपके राज्य की सीमाएं नहीं हैं, करीब-करीब पृथ्वी आपके बस में आ गई और आप मनुष्यों जैसे कपड़े पहनते हैं! मैं आपके लिए देवताओं के वस्त्र ला सकता हूं।
राजा बहुत, बहुत प्रभावित हुआ। और उसने कहा कि कितना खर्च होगा, खर्च की कोई फिकर मत करना, लेकिन देवताओं के वस्त्र जरूर लाओ।
उस आदमी ने कहा: आज तक पृथ्वी पर देवताओं के वस्त्र नहीं आए। यह पहला मौका होगा। यह तुम पहले आदमी होओगे जो देवताओं के वस्त्र पहनेगा। लेकिन तुम्हें आदमियों के वस्त्र शोभा नहीं देते हैं।
राजा बहुत, बहुत योजनाएं बनाने लगा। और उसने उस आदमी को कहा कि देवताओं के वस्त्र लाने की कोशिश करो।
हजारों रुपये उस आदमी ने खर्च कर दिए। दरबारियों को शक था कि देवताओं के वस्त्र न तो कभी देखे गए न कभी लाए गए, यह आदमी धोखेबाज न हो?
लेकिन निश्र्चित तिथि पर--हजारों रुपये तो उस आदमी ने खर्च किए--लेकिन निश्चित तिथि पर वह एक बड़ी भारी पेटी लेकर आ गया। दरबार में तब तो लोग निश्ंिचत हो गए कि जरूर वह वस्त्र लाया है। उसने आकर दरबार में पेटी रखी और उसने राजा से कहा कि मैं पेटी खोलता हूं, आप एक-एक वस्त्र अलग करते जाएं, मैं एक-एक वस्त्र आपको निकाल कर देता जाऊंगा। लेकिन एक शर्त है: देवताओं ने मुझसे चलते वक्त कहा कि ये वस्त्र केवल उसी को दिखाई पड़ेंगे, जो अपने ही पिता से पैदा हुआ हो। ये वस्त्र सभी को दिखाई नहीं पड़ेंगे। तो यहां जो लोग अपने ही पिता से पैदा हुए हैं दरबार में, उनको ही वस्त्र दिखाई पड़ेंगे। जिनके पिता संदिग्ध हैं उन्हें वस्त्र दिखाई नहीं पड़ेंगे।
राजा ने अपना कोट निकाला। उसने पेटी में से खाली हाथ बाहर लाकर राजा से कहा: यह लो कोट, देवताओं का कोट पहनो। राजा को उसमें कुछ भी दिखाई तो नहीं पड़ा। लेकिन कोट के पीछे अपने पिता को खोना उचित न था। उसने जल्दी से वह कोट पहन लिया जो कि था ही नहीं। और एक-एक वस्त्र राजा के वह उतरवाता गया। अब राजा यह भी कहने में मुश्किल पड़ गया कि मैं नग्न हुआ जा रहा हूं। और दरबारी भी ताली पीटने लगे और कहने लगे कितने सुंदर वस्त्र हैं! ऐसे वस्त्र तो कभी देखे नहीं! और सभी दरबारी एक-दूसरे से आगे बढ़ कर प्रशंसा करने लगे, क्योंकि कौन अपने पिता को संदिग्ध करवाए।
सब देख रहे थे राजा नंगा हुआ जा रहा है। आखिर राजा नंगा हो गया। उसके सारे वस्त्र निकलवा दिए गए और देवताओं के वस्त्र पहना दिए गए। राजा देख रहा है कि मैं नंगा हूं, लेकिन सारे दरबारी तालियां पीट रहे हैं और कह रहे हैं कि वस्त्र बहुत सुंदर हैं! तो राजा ने सोचा, हो सकता है मेरे पिता मेरे पिता न रहे हों। और क्या कारण हो सकता है? क्योंकि इतने लोग जब कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। इतने लोग गलत कहेंगे क्या?
फिर उस आदमी ने कहा कि ये वस्त्र पहली दफे पृथ्वी पर उतरे हैं, राजधानी के लोग देखने को उत्सुक होंगे, तो जुलूस निकाला जाए।
वह राजा डरा। लेकिन उसने सोचा कि होंगे दस-पांच ही तो लोग होंगे राजधानी में जिनके पिता संदिग्ध होंगे, उनको शायद मैं नंगा दिखाई पडूं, बाकी सारे लोगों को तो वस्त्र दिखाई ही पड़ेंगे। अब जो कुछ होगा, होगा। इनकार करना ठीक न था। क्योंकि इनकार का मतलब कि राजा को शक है कि वस्त्र नहीं हैं। दरबारियों ने भी कहा कि यह तो बिलकुल ठीक है।
सारे गांव में खबर फैल गई कि राजा ऐसे वस्त्र पहन कर निकलने वाला है जो केवल उनको ही दिखाई पड़ेंगे जिनके पिता सच्चे रहे हों। जुलूस निकला और सारे गांव में तालियां बजने लगीं। लाखों लोग सड़कों के किनारे खड़े होकर कहने लगे: कितने वस्त्र सुंदर हैं! ऐसे वस्त्र तो न कभी देखे, न कभी सुने!
राजा नंगा था, सारा गांव नंगा देख रहा था, लेकिन कौन कहे? एक छोटे से बच्चे ने हिम्मत की और उसने बीच सड़क पर राजा को रोक कर कहा कि कौन कहता है कि वस्त्र हैं, आप बिलकुल नंगे मालूम हो रहे हैं!
गांव के बूढ़ों ने कहा: तुम बच्चे हो, तुम अभी जानते नहीं, तुम्हें पता नहीं कि तुम क्या कह रहे हो। इससे तुम्हारे पिता संदिग्ध हो गए। और फिर तुम बच्चे हो, हम अनुभवी हैं। हम बूढ़े हैं, हम जानते हैं।
उस बच्चे को रास्ते के किनारे से हटा लिया गया। एक ही बच्चे ने हिम्मत की, किसी बूढ़े ने तो कोई हिम्मत नहीं की। क्योंकि बूढ़े सब समझदार थे। उन सबने वस्त्रों की तारीफ की और प्रशंसा की।
सारे गांव में नंगा राजा होकर वापस लौट आया महल में। हर आदमी यही सोचता रहा कि मैं ही गड़बड़ हो सकता हूं, पूरा नगर कैसे गड़बड़ होगा? और किसी आदमी ने किसी दूसरे से न कहा, क्योंकि दूसरे से कहने से बड़ी मुसीबत हो सकती थी।
हमारे विश्र्वास इससे ज्यादा भिन्न नहीं हैं। हम उन्हें केवल इसलिए पकड़े रहते हैं कि और सारे लोग भी पकड़े हुए हैं। भीड़ चूंकि उन्हें पकड़े हुए है इसलिए साहस हममें नहीं होता कि हम उन्हें छोड़ दें। और जब हमें मिट्टी की एक मूर्ति के सामने खड़े करके कहा जाता है कि ये भगवान हैं, तो हमें दिखाई तो पड़ती है मिट्टी की मूर्ति--राजा तो नंगा दिखाई पड़ता है--लेकिन जब सारे लोग कहते हैं कि ये भगवान हैं--और राजा वस्त्र पहने हुए हैं--तो हम भी हाथ जोड़ते हैं और नमस्कार करते हैं और कहते हैं, भगवान हैं!
जो आदमी भीड़ के इस सम्मोहन में, यह जो भीड़ की हिप्नोसिस है, यह जो भीड़ का प्रभाव है, इसमें बह जाता है, वह आदमी कभी सत्य को नहीं खोज पाता है। उसका चित्त कभी इतना साहस नहीं जुटा पाता कि चीजें जैसी हैं उनको वैसा देख सके। चीजें जैसी हैं वैसा उनको देख सके! तथ्य जैसे हैं उनको वैसा देख सके, नग्न और सीधा।
नहीं, भीड़ का सम्मोहन बहुत गहरा है। और इसीलिए जब भीड़ मजबूत होती है तो व्यक्ति खो जाता है। दंगे-फसाद में अगर एक हजार, दो हजार आदमी एक मकान में आग लगा रहे हैं, तो आप भी सम्मिलित हो जाते हैं। हो सकता था अकेले में आपसे कोई कहता कि इस मकान में आग लगा दो, तो आप कहते, यह तो बड़ा बुरा काम है। लेकिन जब दो हजार लोग मकान में आग लगा रहे थे, तो आप भी सम्मिलित हो गए। क्योंकि दो हजार लोगों का सम्मोहन यह कहता है कि आप गलत होओगे, दो हजार लोग थोड़े ही गलत हो सकते हैं।
इसलिए दुनिया में जितने बड़े पाप हैं, वे व्यक्तिगत आदमी कभी नहीं करते, हमेशा भीड़ में करते हैं। छोटे पाप अलग-अलग करते होंगे, बड़े पाप हमेशा भीड़ में करते हैं। दुनिया में बड़े पापों का जिम्मा आदमियों पर कभी नहीं है, भीड़ पर उनका जिम्मा है। भीड़ में आदमी अपनी व्यक्तिगत जिम्मेवारी खो देता है।
अभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, भीड़ ने क्या-क्या नहीं किया! उस भीड़ में अच्छे लोग सम्मिलित थे। ऐसे लोग जो रोज सुबह कुरान पढ़ते थे, गीता पढ़ते थे, जो मंदिरों और मस्जिदों में सत्संग करते थे, ऐसे लोग सम्मिलित थे। अगर उनसे हम अकेले में मिल कर पूछें, तो वे कहेंगे, हमारी समझ में नहीं आता कि यह कैसे हुआ? लेकिन जब भीड़ के बीच में वे खड़े थे तो उन्होंने भी किया।
भीड़ के बीच में हमारी व्यक्तिगत चेतना खो जाती है।
इसलिए मैं आपसे कहता हूं: धर्म का कोई संबंध भीड़ से नहीं है। भीड़ से संबंध होगा राजनीति का। धर्म का भीड़ से क्या संबंध है? लेकिन राजनीतिज्ञ बहुत होशियार हैं, उन्होंने धर्म का भी शोषण कर लिया है और धर्म के भी संगठन खड़े कर दिए हैं। जहां भीड़ से संबंध नहीं वहां संगठन से भी कोई संबंध नहीं होता। सच तो यह है कि आज तक सत्य उन लोगों ने जाना है, जो अकेले में गए, भीड़ से बाहर गए। उन्होंने नहीं, जिन्होंने संगठन किए और भीड़ इकट्ठी की और जो भीड़ में जाकर जुड़ गए। उन्होंने जाना है जो भीड़ से मुक्त हुए और अकेले में गए और एकांत में। और जब उनका चित्त सब भांति भीड़ से मुक्त हो गया, भीड़ की हिप्नोसिस जहां टूट गई, सम्मोहन जहां टूट गया, वहां उन्होंने जाना कि सत्य क्या है। भीड़ ने कुछ बातें सिखाई थीं, जब तक उन्होंने उन बातों को न छोड़ा, तब तक वे कुछ भी न जान सके।
महावीर एकांत में पहाड़ियों में क्या करते थे? शायद आप सोचते होंगे, शास्त्र पढ़ते होंगे। शास्त्र तो महावीर अपने साथ कोई भी नहीं ले गए थे। शायद आप सोचते हैं, कोई मूर्ति बना कर पूजा करते होंगे। महावीर के साथ तो कोई मूर्ति नहीं थी। क्या करते होंगे उस अकेले में? उस अकेले में महावीर भीड़ से मुक्त होने की कोशिश कर रहे थे। वह जो क्राउड है उससे मुक्त होने की कोशिश कर रहे थे। क्राइस्ट क्या कर रहे थे अकेले में? या मोहम्मद क्या कर रहे थे? या बुद्ध क्या कर रहे थे? भीड़ से मुक्त होने की कोशिश कर रहे थे। और इतना ही काफी नहीं है कि कोई भीड़ से भाग कर जंगल में चला जाए। इतना काफी नहीं है। भीड़ मन के साथ वहां भी चली जाएगी। जरूरी यह है कि मन पर भीड़ के प्रभाव न रह जाएं। वह जो हमें सिखाया गया है, अगर उसके प्रभाव हमारे मन से अलग हो जाएं, तो हम भीड़ के बाहर हो जाएंगे; चाहे भीड़ के बीच खड़े रहें, तो भी भीड़ से बाहर हो जाएंगे।
सब हमारे विश्र्वास, हमारी धारणाएं हमारे बंधन हैं।
पूछा है: ‘अगर इनको हम छोड़ दें तो, तो निष्क्रिय हो जाएंगे?’
हम बड़े अजीब लोग हैं। हम बिना छोड़े पूछना शुरू कर देते हैं कि छोड़ देंगे तो निष्क्रिय हो जाएंगे? जिसने छोड़ा है आज तक उसे निष्क्रिय देखा गया है? महावीर निष्क्रिय थे? बुद्ध निष्क्रिय थे? उनसे ज्यादा क्रियाशील और कौन होगा?
बुद्ध मरने की सूचना कर चुके थे कि आज मैं मर जाऊंगा। और उन्होंने अपने भिक्षुओं से पूछा कि तुम्हें कुछ पूछना हो अंतिम बात तो पूछ लो, मेरी आखिरी घड़ी आ गई और मैं विदा हो जाऊं।
भिक्षुओं ने... उनकी आंखों में आंसू थे और उनसे कुछ भी पूछते न बन सका। और बुद्ध एक वृक्ष की ओट में चले गए और आंख बंद करके बैठ गए, ताकि वे भीतर डूब सकें और शांति से विलीन हो जाएं। और तभी एक आदमी गांव से भागा हुआ पहुंचा और उसने कहा कि मुझे कुछ पूछना है बुद्ध से।
तो भिक्षुओं ने कहा: अब तो वे विदा भी ले चुके, अब तो वे आंखें भी बंद कर चुके। और वे पूछ भी चुके कि तुम्हें कुछ पूछना तो नहीं है, तो हम तो इनकार कर दिए। अब असंभव है।
लेकिन वह आदमी चिल्लाया, अगर यह अब असंभव है तो फिर कब संभव होगा, वे तो विलीन हो जाएंगे, फिर मैं किससे पूछूंगा?
तो बुद्ध ने आंख खोल दी और कहा: उस आदमी को वापस मत लौटाओ। कहीं मेरे ऊपर यह जुर्म न लगे बाद में कि मैं जिंदा था और मेरे द्वार से कोई प्यासा लौट गया। उस आदमी को ले आओ। यह आदमी निष्क्रिय है?
महावीर भाग रहे हैं नंगे और पैदल गांव-गांव, गांव-गांव। किसलिए दौड़ रहे हैं? कोई इलेक्शन जीतना है? किसलिए भाग रहे हैं? कोई धन इकट्ठा करना है? किसलिए दौड़ रहे हैं? कुछ भीतर पाया है जिसे बांटना है। वह भीतर कोई झरना है जो बंट जाना चाहता है। कोई सुगंध है फूल के भीतर। जो फूल खिल जाता है, सुगंध बंट जाती है। निष्क्रिय कौन कहेगा?
क्राइस्ट को सूली पर लटका दिया और कहा कि तुम्हें कुछ अंतिम बात कहनी हो तो कहो? तो क्राइस्ट ने कहा: हे परमात्मा, इन सबको माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं! तभी और तभी उनके शिष्यों ने समझा कि यह वही आदमी है जिसने कहा था: जो बाएं गाल पर चाटा मारे तो तुम दायां उसके सामने कर देना। इसने कहा ही नहीं था, यह आदमी कर भी रहा है। जो लोग इसे सूली पर चढ़ा रहे हैं उनके लिए भगवान से प्रार्थना कर रहा है: इन्हें माफ कर देना, ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं। मरने की आखिरी घड़ी में भी यह आदमी निष्क्रिय है, कौन कहेगा?
सुकरात को जहर दिया जा रहा था। जो आदमी हाथ में प्याला लेकर जहर का देने गया, उसका हाथ कंप रहा था। स्वाभाविक था। सुकरात जैसे प्यारे आदमी को जहर देना! लेकिन जल्लाद के ऊपर जिम्मेवारी थी, नौकरी थी। उसका मन तो दुखी हो रहा था। लेकिन उसका हाथ कंप रहा था। जहर की प्याली कंपती थी।
सुकरात ने उससे क्या कहा? कि मेरे मित्र, हाथ क्यों कंपता है तुम्हारा? हाथ नहीं कंपना चाहिए। जो भी हम काम करें उसमें हाथ नहीं कंपना चाहिए।
वह बोला: मेरा हृदय दुखी है, मैं तुम्हारी मृत्यु का कारण बन रहा हूं।
सुकरात ने कहा: तुम पागल हो। तुम्हें यह पता ही नहीं है कि सुकरात मरेगा नहीं। इसलिए बेफिकर हो जाओ। सुकरात मरेगा नहीं। और तुम्हारे जहर से जो मर जाएगा वह सुकरात नहीं है। तुम बेफिकर हो जाओ। हाथ को मत कंपाओ, हाथ को निष्कंप हो जाने दो। दुखी भी मत होओ, आंखों के आंसू पोंछ लो। यह आदमी जो खुद के मरते वक्त... जहर का प्याला पी गया, उसके मित्र इकट्ठे थे, सुकरात ने कहा: कुछ पूछना हो तो पूछ लो।
वे बोले कि हम क्या पूछें? आप जहर पी लिए हैं।
सुकरात ने कहा: थोड़ा वक्त लग जाएगा, अभी मेरे पैर ठंडे होने शुरू हो गए हैं। फिर और ऊपर के पैर ठंडे हो जाएंगे। फिर हाथ ठंडे हो जाएंगे। लेकिन अभी थोड़ी देर मैं बोल सकूंगा। तो जब तक मैं बोल सकूं अगर मुझसे कुछ तुम्हारा हित हो सकता हो तो हो लेने दो। अभी थोड़ी देर है मेरे मरने में। अभी यह शरीर मरेगा, इसमें थोड़ा समय लगेगा। तो जब तक मैं हूं तब तक कुछ करूं। इस आदमी को कौन निष्क्रिय कहेगा? आज तक कौन निष्क्रिय हुआ है?
सत्य से बड़ी और कोई सक्रियता नहीं है। और जो सक्रियता शांति से पैदा होती है, वही सक्रियता शुभ है। जो अशांति से पैदा होती है, वह अशुभ है।
हम सारे लोग सक्रिय हैं, लेकिन चित्त अशांत है। अशांति से जो सक्रियता पैदा होगी वह खतरनाक है, उससे दुनिया में दुख बढ़ेगा, पीड़ा बढ़ेगी, हिंसा बढ़ेगी। शांति से जो सक्रियता आती है उसी से जीवन में शुभ का जन्म होता है, मंगल का जन्म होता है।
लेकिन हम किए बिना पूछते हैं क्या होगा? हम पूछते हैं कि ‘अगर हमने सारा सीखा हुआ ज्ञान छोड़ दिया तो हम निष्क्रिय हो जाएंगे?’
थोड़ा छोड़ कर देखें। क्योंकि किसी आदमी को हम तैरने के लिए सिखाने को कहें, वह कहे, मैं तो पानी में गिरूंगा तो डूब जाऊंगा; क्योंकि पानी में कोई भी गिरता है तो डूब जाता है। तब भी हम उसे कहेंगे, थोड़ा तैर कर देखें, तैरने वाला नहीं डूबता है। लेकिन वह कहेगा, जब तक मैं तैरना न सीख लूं तब तक मैं पानी में उतरूंगा नहीं। तो बिना पानी में उतरे कोई तैरना कभी सीख नहीं सकता। और जो तैरना नहीं जानता, वह कहे कि जब तक मैं सीख न लूं तब तक मैं उतरूंगा नहीं, क्योंकि पानी में जो उतरता है डूब जाता है। फिर तो बड़ी कठिनाई हो गई। पहले कदम तो बिना तैरना सीखे पानी में रखने पड़ेंगे, तो ही तैरना सीखा जा सकता है। अधिक लोग इसी भय से कि कहीं डूब न जाएं तैरने के सुख से ही वंचित रह जाते हैं।
और क्या आपको पता है, जो बीच मझधार में डूबता है, वह उस आदमी से बेहतर है जो किनारे पर बैठा हुआ बचा रह जाता है। क्योंकि बीच मझधार में डूबने वाला भी कहीं पहुंचता है--कम से कम साहस तो किया। लेकिन जो किनारे पर ही बैठा रह जाता है, वह तो कहीं भी नहीं पहुंचता।
कबीर ने कहा है:
मैं बौरी खोजन गई, रही किनारे बैठ।

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