मा नीलम की आत्मकथा देखत, निरखत, गुरु-संग रहना अरु *सहज समाना* पथ पर चलते साधकों के लिए ---------- बाहरी परिधि पर एक अभिभूत कर देने वाली रोमांचक यात्रा, और भीतर केंद्र में एक आत्मिक मधुर धुन—यह आत्मकथा गुरु-शिष्य के रहस्यमय संबंध पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयास करती है। आस्था की छलांगों से लेकर दैनिक कामकाज तक; आध्यात्मिक परमानंद से लेकर सत्ता के खेलों तक; निर्वाण से लेकर अराजक बाज़ार तक—यह यात्रा सब कुछ देखती है। गुरुओं के गुरु, ओशो ने स्वयं नीलम को यह पुस्तक लिखने का कार्य सौंपा था—शीर्षक और उद्देश्य सहित: “पथ पर चलने वाले साधकों” की सहायता के लिए। नीलम, ओशो की भारतीय सचिव, जो पिछले जन्मों से उनकी शिष्या थीं, दशकों तक अपने गुरु के कार्य की सेवा करते हुए इस कार्य के लिए एक उपयुक्त माध्यम बन चुकी थीं। कीमोथेरेपी और शरीर की अन्य बाधाओं के बीच उन्होंने देह को शांतिपूर्वक त्यागने से पहले न केवल पांडुलिपि पूरी की, बल्कि उसके संपादन के भी दो दौर पूरे किए। (अंग्रेजी से अनुवादित)