PALTUDAS

Ajhun Chet Ganwar 20

Twentieth Discourse from the series of 21 discourses - Ajhun Chet Ganwar by Osho. These discourses were given during JUL 21 - AUG 10 1977.
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पहला प्रश्न:
भगवान, कहा है--निर्बल के बल राम। क्या यह सच है?
मनुष्य का अहंकार मानने को राजी नहीं होगा। मनुष्य के अहंकार के विपरीत जाती है यह बात। मनुष्य तो मानना चाहता है कि सारे बल का स्रोत उसके भीतर है। रोज-रोज अनुभव करता है कि निर्बल है, प्रतिपल अनुभव करता कि निर्बल है; फिर भी माने चला जाता है कि बल का स्रोत मेरे भीतर है, कि मैं बलशाली हूं।
जीवन भर इसी विषाद की कथा है कि तुम सोचते हो कि बलशाली हो और सिद्ध होता है कि निर्बल हो; मगर सीखते नहीं। हारते हो, हारते चले जाते हो; मगर विजय की आकांक्षा मन में मंडराती रहती है। यह जो विजय की आकांक्षा है मन में, यह तुम्हें स्वीकार न करने देगी कि निर्बल के बल राम। यह कोई वचन मात्र नहीं है; यह एक जीवंत अनुभूति है।
अभी राम को तो छोड़ो, अभी राम से तो तुम्हारा कुछ लेना-देना नहीं है। अभी तो एक ही बात समझो कि तुम निर्बल हो। बल सिद्ध कहां हुआ! बलशाली से बलशाली को अंततः हम धूल में पड़े देखते हैं। यहां सिकंदर भी खाली हाथ ही आते हैं और खाली हाथ ही जाते हैं। यहां सब सिंहासन आज नहीं कल सूलियां बन जाते हैं। जिनको कल बहुत अकड़ते देखा था, वे सब अब कहां हैं? इस पृथ्वी पर बहुत लोग अकड़ कर चले हैं, करोड़ों लोग अकड़ कर चले हैं--उन सबकी लाशें धूल में मिल गई हैं। वे सिर जो आकाश में उठे थे और जिन्होंने बड़े दावे किए थे, वे सब दावेदार कहां हैं? आज उनका कोई नामोनिशान भी नहीं है।
अभी राम को छोड़ो, क्योंकि जब तक तुम्हें अपनी निर्बलता का पूरा-पूरा अहसास न हो जाए, तुम्हारा रोआं-रोआं न कहने लगे तुमसे कि मैं निर्बल हूं, तब तक तुम राम के बल को न जान सकोगे, राम को न जान सकोगे।
इस सूत्र में बड़ा रहस्य छिपा है। यह काव्य ही नहीं है। इसके भीतर वह चिनगारी छिपी है कि तुम्हारे सारे जीवन को रूपांतरित कर दे। इसके भीतर सारी आध्यात्मिक परिवर्तन की कीमिया छिपी है। यह सूत्र बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है। मगर शुरू करो अपनी निर्बलता से। मन तो मानने को राजी नहीं होता। मन कहता है: मैं--और निर्बल! रहे होंगे सिकंदर और दूसरे निर्बल, और रहे होंगे करोड़ों लोग जो हार गए। मैं--और हारूंगा! मैं सिद्ध करूंगा कि मैं अपवाद हूं। प्रत्येक मनुष्य का मन यही कहता है कि मैं अपवाद हूं। मुझ पर नियम लागू नहीं होते; मैं नियमों से बच जाऊंगा, कोई तरकीब निकाल लूंगा।
ये नियम अगर आदमी के बनाए नियम होते तो शायद तुम तरकीब निकाल भी लेते। मगर ये नियम शाश्वत हैं। आदमी के बनाए नहीं हैं; उलटा इन्हीं नियमों ने आदमी को बनाया है। इसलिए आदमी इनसे बच कर निकल नहीं जा सकता। यहां कोई अपवाद नहीं होता। यह नियम सार्वभौम है।
मनुष्य निर्बल है, इसका अर्थ क्या है? इससे तुम अपने मन में दीनता मत ले आना, अन्यथा फिर चूक हो गई। एक तो अहंकार है जो मानने को राजी नहीं होता कि मैं--और निर्बल; मैं और निर्बल! कभी नहीं! फिर अगर जीवन सिद्ध ही कर दे--जो कि करेगा ही--क्योंकि गलत बात को लेकर तुम चले थे कि दो और दो पांच होते हैं, आज नहीं कल, कल नहीं परसों, जिंदगी तुम्हें कहेगी, बहुत रूपों में कहेगी कि दो और दो चार होते हैं। कब तक तुम खींचोगे इस झूठ को! एक न एक घड़ी यह झूठ गिर ही जाएगा। झूठ चल नहीं सकते। बैसाखियां दे दो उन्हें सत्य की, थोड़े बहुत घिसट सकते हैं, लेकिन चल नहीं सकते; उनके पास अपने कोई पैर नहीं होते। उनके पास अपना कोई प्राण नहीं होता। तो यह झूठ रोज लड़खड़ाएगा, रोज गिरेगा, जगह-जगह गिरेगा--रास्तों पर, चौराहों पर, हर पड़ाव पर तुम्हें दिक्कत देगा। कभी न कभी तो तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि नहीं, मैं निर्बल हूं। मगर तब खतरा है कि कहीं तुम दूसरी अति पर न चले जाओ और तुम यह सोचने लगो कि मैं दीन-हीन हूं। तो फिर अहंकार वापस लौट आया--नई शक्ल में लौटा। पहचान न सकोगे, ऐसा वेश रख कर लौटा। पहले सम्राट होने का दावा करता था, अब भिखारी होने का भाव लेकर लौटा।
निर्बल का अर्थ भिखारी नहीं होता। निर्बल का इतना ही अर्थ होता है कि बल का स्रोत मैं नहीं हूं। इसमें दीनता का कोई कारण ही नहीं है। गुलाब का फूल कमल नहीं है; इसमें दीनता का क्या कारण है? कमल का फूल गुलाब नहीं है; इसमें दीनता का क्या कारण है? आंख सुनती नहीं; इसमें दीनता का क्या कारण है? कान देखते नहीं; इसमें दीनता का क्या कारण है? ऐसा है।
दीनता का भाव ही तभी पैदा होता है जब हम कुछ और चाहते थे और वैसा नहीं हो रहा है, तो दीनता पैदा होती है। तो दीनता में भी अहंकार ही छिपा हुआ है--पराजित अहंकार, हारा हुआ अहंकार, गिरा हुआ अहंकार। रस्सी जल गई--कहते हैं--लेकिन जल जाने के बाद भी रस्सी की अकड़ नहीं गई। अहंकार हार गया, लेकिन अब हार कर भी एक नये रूप में मौजूद है। अब तुम सोचने लगे मैं दीन-हीन, मैं कुछ भी नहीं; मगर अभी भी तुम्हारी पुरानी बात कहीं स्वर, किसी पृष्ठभूमि में गूंज रही है। अभी भी तुम उसी से तौल रहे हो। उसी के आधार पर तो तुम्हें लग रहा है कि तुम दीन हो। तुमने चाहा था सम्राट होना, नहीं हो सके; अब लगता है कि भिखारी हो। न तुम सम्राट हो, न तुम भिखारी हो।
निर्बल का अर्थ होता है: बल के स्रोत तुम नहीं। बल का स्रोत परमात्मा है। क्यों? क्योंकि यह अस्तित्व इकट्ठा है। इसके बल का स्रोत एक ही है, बहुत नहीं। व्यक्ति अपने को अलग मान लेता है, वहीं भ्रांति शुरू होती है, माया शुरू होती है। अहंकार का जन्म होता है। जिस क्षण तुमने समझा कि मैं अलग हूं इस विराट से, उसी क्षण झंझट शुरू हुई।
तुम अलग नहीं हो।
इन वृक्षों को देखते हो। ये वृक्ष जमीन में जड़े गड़ाए खड़े हैं; जमीन के बिना ये जी न सकेंगे। प्रतिपल जमीन इन्हें रस दे रही है और हवाओं से श्वास ले रहे हैं, पत्ते-पत्ते से श्वास ले रहे हैं। हवाओं के बिना भी न जी सकेंगे। हवाएं प्राण दे रही हैं। और सूरज की किरणों में नाच रहे हैं। सूरज की किरणें ऊष्मा दे रही हैं, गरमी दे रही हैं, ताप दे रही हैं। जीवन उसके बिना भी न हो सकेगा।
यह सारा अस्तित्व एक छोटे से वृक्ष से जुड़ा है और एक छोटा सा वृक्ष सारे अस्तित्व में फैला है। ऐसे ही हम हैं--चलते-फिरते वृक्ष। श्वास न आएगी, तो तुम जी न सकोगे। तो प्रतिपल परमात्मा तुम्हारे भीतर श्वास डाल रहा है।
बाइबिल में कथा है कि भगवान ने मिट्टी की पुतली से आदमी को बनाया और फिर उसके नासापुटों पर अपने ओंठ रख कर श्वास फूंकी। यह कहानी प्रीतिकर है। ऐसा कभी किसी दिन भगवान ने किया होगा, ऐतिहासिक रूप से, ऐसा नहीं है; मगर ऐसा प्रतिपल कर रहा है। ऐसा ही है। कौन तुम्हारे नासापुटों पर श्वास फूंक रहा है? तुम तो नहीं ले रहे हो श्वास, एक बात पक्की है। तुम अगर लेते होते, तब तो तुम मरते ही नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन बहुत बूढ़ा हो गया, सौ साल का हो गया। किसी ने उससे पूछा कि नसरुद्दीन, सौ साल के हो गए, तुम्हारे लंबे जीने का राज क्या है? उसने कहा कि इसमें राज कुछ भी नहीं, बस श्वास लेते जाओ।
मगर श्वास बंद हो जाए तो फिर क्या करोगे? फिर कैसे लोगे? बंद हो गई श्वास, फिर कैसे लोगे? न आई, फिर कैसे लोगे? यह भ्रांति है कि तुम श्वास लेते हो। श्वास चलती है, सच; लेता कोई भी नहीं। जब तक चलती है, चलती है; जब नहीं चलती, नहीं चलती। बाइबिल की कथा ज्यादा सच है, ज्यादा वैज्ञानिक; ऐतिहासिक न हो भला, मगर ज्यादा सही है, ज्यादा सत्य के करीब है--कि परमात्मा ने आदमी की मिट्टी की देह पर श्वास फूंकी, आदमी जीवित हो उठा। अभी भी फूंक रहा है। तुम्हारे नासापुटों पर भी उसी के ओंठ हैं; तुम्हें दिखाई पड़ें या न दिखाई पड़ें। और जिस दिन श्वास नहीं फूंकेगा, उस दिन श्वास नहीं आएगी।
हम जुड़े हैं।
एक मछली को भी तो खयाल नहीं आता होगा सागर में, कि मैं सागर के बिना न जी सकूंगी। कैसे खयाल आएगा? मछली को भी तो खयाल न आता होगा कि सागर में मेरा जीवन है; सागर से मेरा जीवन है; सागर का मैं अंग हूं। कैसे खयाल आएगा? मछली बाएं जाती है, दाएं जाती है, डुबकी मारती है, ऊपर आती है, सतह पर तैरती है, गहराई में उतरती है--मछली को लगता होगा: मैं अलग हूं। फिर इसे फेंक दो तट पर, तब इसे पता चलेगा। तड़फेगी, रोएगी, गुहार मचाएगी कि मेरा सागर मुझे वापस दे दो; मैं बिना सागर के नहीं जी सकती। तब इसे पता चलेगा कि मैं सागर की एक लहर हूं--जरा ठोस हो गई, बस; लेकिन हूं सागर की एक लहर। सागर में ही हो सकती हूं।
ऐसे ही हम परमात्मा के सागर में जीते हैं। हम भूल ही जाते हैं कि हम परमात्मा में ही जी रहे हैं; परमात्मा हमारा जीवन है। हमारा अपना कोई अलग जीवन नहीं है; जैसे मछली का अपना कोई अलग जीवन नहीं है। सागर में ही जन्म, सागर में ही जीवन, सागर में ही मृत्यु। सागर से ही उठना, सागर में ही एक दिन सो जाना। थोड़ी देर की क्रीड़ा और फिर विश्राम। ऐसे ही हम हैं। जिस दिन तुम जानोगे कि मैं निर्बल हूं, उस दिन सिर्फ इतना ही सिद्ध हुआ कि वह जो अहंकार की तुम घोषणा कर रहे थे, गलत थी। तुम अपने स्वयं के केंद्र न थे। तुम्हारे केंद्र पर भी परमात्मा बैठा है, विराट बैठा है। वही सबके केंद्र पर बैठा है।
इस सारे अस्तित्व का एक ही केंद्र है। होना भी ऐसा ही चाहिए। अगर इस अस्तित्व में इतने केंद्र होते जितने अहंकार हैं, तो यह अस्तित्व कभी का बिखर गया होता; इसे जोड़ कर कौन रखता! यह सारा अस्तित्व जुड़ा है--कितना घनीभूत रूप से जुड़ा है! सब चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं। सब हम ताने-बाने हैं एक ही अस्तित्व के। यहां रात-दिन, जागे-सोए, तुम्हें पता चले न पता चले, चेतन-अचेतन, प्रतिपल लेन-देन चल रहा है। जैसे श्वास आ रही जा रही, ऐसे ही और हजार तलों पर लेन-देन चल रहा है।
ये वृक्ष जब श्वास लेते हैं तो कार्बन-डाइआक्साइड को पीते हैं और जब श्वास छोड़ते हैं तो आक्सीजन को छोड़ते हैं। तुम आक्सीजन पीते हो और जब छोड़ते हो तो कार्बन-डाइआक्साइड छोड़ते हो। इन वृक्षों के बिना तुम न हो सकोगे। तुम्हारे बिना ये वृक्ष न हो सकेंगे। इसीलिए तो जैसे-जैसे जमीन को हमने काट कर वृक्षों से रहित कर दिया, वैसे-वैसे आदमी का जीवन क्षीण हो गया है। और हमने फिजूल की बातों के लिए वृक्षों को काट डाला।
कल मैं पुस्तकों के इतिहास के संबंध में एक पुस्तक पढ़ रहा था। अमरीका में न्यूयार्क टाइम्स की इतनी प्रतियां छपती हैं रोज कि डेढ़ सौ एकड़ जमीन में जितने वृक्ष होते हैं उतने उसे रोज जरूरत पड़ते हैं--उसके कागज बनाने के लिए। डेढ़ सौ एकड़ जमीन के वृक्ष न्यूयार्क टाइम्स पी जाता है एक दिन में। यह एक अखबार! और इस अखबार से किसी को कोई जीवन नहीं मिलने वाला। और वह जो डेढ़ सौ एकड़ में फैले हुए हजारों वृक्ष थे, वे गए। और उनसे न मालूम कितने जीवन क्षीण हो जाएंगे!
आदमी ने बड़ी नासमझियां की हैं--इसी भ्रांति में कर ली हैं कि मैं तो अलग हूं। वृक्ष को काटने से मेरा क्या कटेगा! पर ध्यान रखना, जब तुमने वृक्ष काटा, अपना पैर काटा। वृक्ष कट जाएगा तो वर्षा न होगी, बादल न आएंगे; मरुस्थल हो जाएगा। वृक्ष कट जाएगा तो पक्षी न आएंगे। वृक्ष कट जाएगा तो हवाएं इस ढंग से न बहेंगी जैसे कल तक बहती थीं। वृक्ष कट जाएंगे तो कौन तुम्हारे जीवन में आक्सीजन को दे जाएगा। तुम्हारे द्वारा फेंकी गई कार्बन-डाइआक्साइड को कौन पचाएगा? तुम जो पूरे वक्त जहर फेंक रहे हो बाहर, उसको कौन पिएगा? ये वृक्ष नीलकंठ हैं। ये तुम्हारे श्वास से फेंके गए जहर को पी जाते हैं; उसको भी काम का बना देते हैं।
यहां सब जुड़ा है। यह तो मैंने उदाहरण के लिए बात कही। यहां सब संयुक्त है। पानी के बिना हम न हो सकेंगे। हवा के बिना हम न हो सकेंगे। आकाश के बिना हम न हो सकेंगे। चांद-तारों के बिना हम न हो सकेंगे। सूरज के बिना हम न हो सकेंगे। तो हमारे होने को अलग मानने का कारण क्या है? कोइर् एकाध आदमी तो सिद्ध करके बता दे कि मैं अलग हो सकता हूं। अपने सारे संबंध तोड़ कर एक क्षण भी तो कोई जी जाए...। दो-चार दिन भोजन नहीं करते तो अड़चन शुरू हो जाती है या नहीं? तो इसका अर्थ हुआ कि वे जो वृक्षों पर फल लगते थे, उन पर तुम निर्भर थे; वे जो गेहूं की बालें लगती थीं खेत में, उन पर तुम निर्भर थे। तो वे गेहूं की बालें और गेहूं के खेत, उनसे तुम अलग नहीं हो।
एक दिन पानी न मिले तो कैसी तड़प पैदा होती है! और उस एक दिन भी तुम जी लेते हो, क्योंकि तुम्हारे शरीर ने कुछ पानी इकट्ठा कर रखा है, अन्यथा तुम एक दिन भी नहीं जी सकते थे। वह जो भीतर पानी इकट्ठा कर रखा है, संरक्षित, उससे काम चला लेते हो एक दिन, दो दिन, तीन दिन; फिर मुश्किल होने लगती है, भीतर का संरक्षित खत्म होने लगता है। पानी चाहिए! पानी चाहिए! अब तुम तड़फते हो।
सिकंदर से किसी फकीर ने कहा था कि तू ऐसा समझ सिकंदर, अगर कभी रेगिस्तान में खो जाए और तुझे प्यास लगे और एक आदमी तेरे पास एक गिलास में पानी भर कर खड़ा हो, लेकिन वह कहे कि इसका मूल्य क्या चुकाएगा, तू कितना देने को राजी होगा? सिकंदर ने कहा कि अगर मैं प्यासा होऊंगा और मरुस्थल में होऊंगा तो मैं अपना आधा राज्य भी दे दूंगा।
उस फकीर ने कहा: वह आदमी मैं हूं, मैं कोई ऐसे सस्ते में बेचने वाला नहीं हूं। और क्या दे सकेगा?
सिकंदर ने कहा कि अगर हालत बहुत खराब हो रही होगी तो मैं पूरा राज्य भी दे दूंगा।
तो उस फकीर ने कहा: यह भी खूब मजे की रही! एक गिलास पानी में जो चला जाएगा, इस राज्य को कमाने के लिए पूरा जीवन तूने गंवा दिया! एक गिलास पानी की भी कीमत जो नहीं चुका सकेगा समय पड़ने पर...।
तो किसी क्षण में पूरा साम्राज्य सिकंदर का एक गिलास पानी की भी कीमत का नहीं होता। क्यों? क्योंकि जब पानी न मिले तो प्राण संकट में पड़ जाते हैं। पानी तो परमात्मा से आता है। राज्यों का क्या मूल्य है! जीवन ही न होगा तो राज्य का क्या करोगे!
तो जब हम कहते हैं ‘निर्बल के बल राम’--तो इसका अर्थ क्या होता है? इसका अर्थ वैसा नहीं होता जैसा तुम अपने मन में सोच लेते हो। तुम सोच लेते हो कि हम जाएंगे मंदिर में, कहेंगे कि भगवान, हम बड़े कमजोर हैं, अब तुम हमें बल दो, धंधा ठीक से चलवाओ, दुकान ठीक से चलवाओ, बाजार में प्रतिष्ठा बढ़वाओ। चलो हम तो कह देते हैं कि हम निर्बल हैं, अब अपने चमत्कार दिखलाओ। यह मतलब नहीं होता। ऐसा ही मूढ़तापूर्ण मतलब लोगों ने लिया है कि जब हम निर्बल होकर आंसू बहाएंगे और खूब रोएंगे, गिड़गिड़ाएंगे, कहेंगे कि हम पतित हैं, तुम पतितपावन हो; हम ना-कुछ हैं, तुम सब-कुछ हो; हम तुम्हारे चरणों की धूल हैं, तुम राजा हो; अब बचाओ--तब वह भागा हुआ आएगा। ये बचकानी आकांक्षाएं हैं। इसका तो मतलब यह हुआ कि तुमने उसको भी अपनी सेवा में लगा लिया। तुमने बड़ी होशियारी की। तुम्हारी खुशामद काम कर गई।
तुम्हारी प्रार्थनाएं खुशामदें हैं। इसलिए तो प्रार्थना को स्तुति कहते हैं। स्तुति यानी खुशामद। तुम्हारी प्रार्थनाएं चापलूसियां हैं। तुम्हारी प्रार्थनाएं उसको फुसलाने की कोशिश है। तुम किसको धोखा देने चले हो?
निर्बल के बल राम का ऐसा कुछ अर्थ नहीं होता कि तुम गिड़गिड़ाओ, कि तुम घुटने टेको। निर्बल के बल राम का अर्थ होता है: इस सत्य का साक्षात्कार कि मैं अलग नहीं हूं। बस मेरा केंद्र मेरे भीतर नहीं; मेरा केंद्र तेरे भीतर है। मैं तेरे साथ जी रहा हूं। मैं तेरा अंग हूं; तू अंगी है। मैं तेरा अंश हूं; तू अंशी है। तू सागर है; मैं तेरी एक छोटी सी लहर।...ऐसी साक्षात अनुभूति का नाम: वही इस छोटे से प्यारे वचन में जोड़ा गया है--‘निर्बल के बल राम।’
फिर ऐसा थोड़े ही है कि तुम मेरी दुकान ठीक से चलाओ तो इसका मतलब हुआ तुम्हारी दुकान अभी अलग है! इसका यह मतलब तो थोड़े ही है कि तुम मेरी बीमारी को मिटाओ। इसका मतलब हुआ कि तुम्हारी बीमारी अभी अलग है! जिस दिन तुमने जाना निर्बल के बल राम, तुमने जाना कि मैं निर्बल हूं।
और ध्यान रखना, फिर दोहरा दूं: निर्बल जानने का मतलब यह नहीं कि तुमने जाना कि मैं दीन-हीन हूं। दीन-हीनता तो गई अहंकार के ही साथ। वह तो अहंकार की ही छाया थी। सिर्फ अहंकारियों को पता चलता है दीन-हीन होने का। जिनका अहंकार मिट गया, उनकी कैसी दीनता? दीनता पता कैसे चलेगी उन्हें? अहंकार को ही दीनता का बोध होता है। जब अहंकार हारता है और रोज-रोज हारता है, इसलिए रोज-रोज दीनता का बोध होता है। फिर जितनी दीनता का बोध होता है, उतनी जीतने की कोशिश करता है कि एकाध बार तो सिद्ध कर दूं कि मैं कुछ हूं। जितना हारता है उतना जीतने को दौड़ता है। जितना जीतने को दौड़ता है उतना हारता है। तो अहंकार की आकांक्षा होती है कि मैं सिद्ध कर दूं कि मैं कुछ हूं। और सिद्ध हमेशा होता है कि मैं ना-कुछ हूं। इसलिए दीनता पैदा होती है।
दीनता अहंकार की छाया है। जिसका अहंकार गया, स्वभावतः छाया भी चली जाएगी। इसलिए धार्मिक व्यक्ति न तो अहंकारी होता है न विनीत। इसे तुम गांठ बांध लेना। धार्मिक व्यक्ति अहंकारी तो होता ही नहीं, विनम्र भी नहीं होता। विनम्र क्या खाक होगा? किसलिए होगा? किस कारण होगा? धार्मिक आदमी में अहंकार ही नहीं बचता, तो अहंकार की वह जो छाया थी, वह भी कहां बचने वाली है! धार्मिक आदमी यह तो कहता ही नहीं कि मैं सब-कुछ हूं; धार्मिक आदमी यह भी नहीं कहता कि मैं कुछ भी नहीं हूं। जब ‘मैं’ ही न बचा तो अब दावा क्या!
कुछ नहीं हूं, यह भी दावा है। यह विपरीत दावा है। अहंकारी कहता है: मैं सिंहासन पर! और जिसको तुम विनम्र कहते हो, वह कहता है: मैं आपके चरणों की धूल--मगर हूं! फिर चरणों की धूल कभी भी तो मुकुट पर बैठ सकती है, देर क्या लगती है। चरणों की धूल को कितनी देर लगती है मुकुट पर चढ़ जाने में! मुकुट पर चढ़ने की तरकीब ही है कि चरण से शुरू करो। किसी की गर्दन दबानी हो, पैर दबाने से शुरू करो। पहले जनसेवक बन जाओ, पैर दबाओ, फिर दिल्ली पहुंच जाओगे। फिर गर्दन दबाओ।
गर्दन दबानी हो तो पैर दबाने से शुरू करना। पैर दबाओगे, आदमी निश्चिंत हो जाएगा; कहेगा: भला, जनता का सेवक है, सर्वोदयी है। दबाने दो, पैर ही तो दबा रहा है! जब तक नींद लग जाएगी तुम्हारी, वह पैर दबाने वाला बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते धीरे-धीरे गर्दन दबा लेगा। जब गर्दन दबा लेगा, तब तुम समझोगे कि सर्वोदयी जनता पार्टी में सम्मिलित हो गया है; अब सर्वोदयी सर्वोदयी नहीं है। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी। अब गर्दन से हाथ हटाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। अब काफी देर हो चुकी। अब छूटना इतना आसान नहीं।
तो वह जो पैर की धूल होने का दावा करता है, वह किसी भी क्षण मुकुट पर विराजमान हो जाएगा। वह उसी के लिए तो कर रहा है दावा। वह उसी के लिए तो झुक रहा है कि चलो कोई बात नहीं, झुके लेते हैं। अगर झुकने से रास्ता खुलता हो तो झुके लेते हैं।
धार्मिक व्यक्ति का न तो कोई अहंकार है और न कोई निर-अहंकारिता है। धार्मिक व्यक्ति यह कहता है कि मैं हूं ही नहीं, तो कैसा निर-अहंकार और कैसा अहंकार! परमात्मा है। वही है। उसका ही होना मात्र है। और स्वभावतः उसका होना परम बल से भरा है। सारी ऊर्जा उसकी है। ऐसा अर्थ है इस सूत्र का: निर्बल के बल राम।
जिस क्षण तुम मिट जाते, तुम बिलकुल शून्य हो जाते, जिस क्षण तुम जगह खाली कर देते हो--उस क्षण तुम्हारे भीतर नई हवाएं बहती हैं, द्वार-दरवाजे खुलते हैं। ये नई हवाएं परमात्मा की हैं। जब तुम अपना छोटा सा टिमटिमाता हुआ दीया, गंदा सा प्रकाश बुझा देते, तब तुम्हारे भीतर चांदनी उतर आती है, वह चांदनी परमात्मा की है।
रवींद्रनाथ ने लिखा है: एक रात बजरे पर देर तक सौंदर्यशास्त्र पर कोई किताब मैं पढ़ता रहा। एक छोटी सी मोमबत्ती को जला कर, उसका टिमटिमाता प्रकाश, बामुश्किल पढ़ पाता था। लेकिन किताब रुचिपूर्ण थी और लगा रहा। आधी रात गए, किताब बंद की, थका-मांदा मोमबत्ती बुझा कर फूंकी। फूंकते ही चमत्कृत हो गया। वह बजरे पर, नाव पर छोटा सा झोपड़ा...तत्क्षण जैसे ही मोमबत्ती फूंक कर बुझाई, वह जो धीमी सी टिमटिमाती मोमबत्ती की रोशनी थी, जैसे ही बुझी, वैसे ही पूरा चांद बाहर था! द्वार-दरवाजे से, रंध्र-रंध्र से चांद की किरणें भीतर आ गईं। चांदी नाचने लगी।
रवींद्रनाथ को एक बोध हुआ। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि आज मुझे एक बोध हुआ: यह छोटी सी टिमटिमाती रोशनी चांद को भीतर न आने देती थी! यह छोटी सी टिमटिमाती रोशनी पूरे चांद को अटका दी थी, बाहर अटका दी थी, भीतर नहीं आने देती थी! इसके बुझते ही, यह क्षुद्र के मिटते ही विराट भीतर चला आया। अपूर्व सौंदर्य भीतर चला आया! और मैं भी कैसा अंधा, सौंदर्यशास्त्र को किताब में खोज रहा हूं!
वे बाहर निकल आए। पूरा चांद आकाश में! एकांत नदी पर बंधा हुआ बजरा! सब तरफ सन्नाटा! पक्षी भी सो गए! मनुष्यों का कोई पता नहीं। गांव-ग्राम सो गए। उस अपूर्व सन्नाटे में, उस शांत स्निग्ध रात्रि में--सौंदर्य बरस रहा था। पहले तो चांद की किरणें भीतर आ गईं, जैसे ही मोमबत्ती बुझी, रंध्र रंध्र से! फिर जब चांद भीतर आ जाए तो तुम्हें बाहर ले जाएगा। जब चांद भीतर आ जाएगा तो उसी की किरणों के सहारे तुम बाहर आ जाओगे। वह तुम्हें बाहर बुलाएगा। निमंत्रण मिल गया। अब तुम रुक न सकोगे।
रवींद्रनाथ को बाहर आना पड़ा। थके-मांदे थे, सोने की तैयारी कर रहे थे, इसलिए मोमबत्ती बुझाई थी; लेकिन अब यह चांद जो बुलावा देने आ गया, ये जो भीतर आ गईं किरणें इसकी, यह जो किरणों का तिलिस्म, यह जादू भर गया कमरे में! वे बाहर निकल आए।
उस रात उन्होंने अपनी डायरी में लिखा कि जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार की मोमबत्ती जलती रहती है, तब तक परमात्मा प्रवेश नहीं कर पाता; बाहर अटका रहता है। और वह अहंकार की मोमबत्ती में हम कितने शास्त्र टटोलते हैं, कितने शास्त्र खोजते हैं! और सत्य चारों तरफ मौजूद है और सत्य को हम खोजने निकलते हैं। और सत्य ही सत्य है! सब तरफ वही है। और हम उसी को खोजने निकलते हैं; जैसे कहीं और हो; जैसे कहीं और जाना हो!
निर्बल के बल राम का अर्थ है: तुम्हें यह समझ में आ जाए कि मैं नहीं हूं। यह दावा मैं का खो जाए। यह दावा ही है; इसमें कोई असलियत नहीं है। यह सिर्फ खयाल है। मगर खयाल भी बड़ी असलियत ले लेते हैं। अगर बहुत दिन तक खयालों को पकड़ कर हम बैठे रहें तो यथार्थ बन जाते हैं। खयाल ही है।
तुम्हें अगर किसी ने कह दिया कि इस रास्ते से मत गुजरना, यहां मरघट है। चाहे मरघट न हो...।
मेरे एक मित्र मेरे पास मेहमान थे। बनारस विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर हैं। बस यूं ही बात हो रही थी। मनोवैज्ञानिक हैं। और जब मैंने उनसे यह कहा कि विचार अगर बहुत दिन तक मन में बैठे रहें तो यथार्थ हो जाते हैं। उन्होंने कहा: यह बात मुझे जंचती नहीं। सिर्फ विचार कैसे यथार्थ हो सकता है? यथार्थ यथार्थ है, विचार विचार है।
मैंने फिर उनसे कुछ कहा नहीं। जब वे रात सोने गए, मैंने उनसे कहा: इस कमरे में जरा आप खयाल से सोना। उन्होंने कहा: क्यों? मैंने कहा: इसमें एक...है तो बात ही, आपसे कहनी, मगर बता देनी ठीक है। कभी यहां कोई कब्र थी। मकान बनाने वाले ने कब्र तो मिटा दी है, मगर कब्र में जो रहने वाला था, वह गया नहीं। वह कभी-कभी रात में अभी भी आ जाता है।
अरे, उन्होंने कहा: आप भी क्या बातें कर रहे हैं! आप जैसा आदमी और ऐसी बातें कर रहा है!
मैंने कहा कि करनी तो नहीं चाहिए, मैं करना भी नहीं चाहता। मैं खुद भी नहीं मानता था, लेकिन जब प्रत्यक्ष हुआ, तो अब मजबूरी है। फिर आपको न बताऊं, फिर सुबह आप कहें कि बताया न
हीं, चेताया नहीं...। आप पहली दफा इस मकान में आए हैं; जो इसमें आते हैं, उनको तो पता है। दुबारा आपको नहीं कहूंगा। और फिर मेरी बात माननी जरूरी नहीं। आप तो निश्चिंत सोइए, आप मत मानिए। मगर है और कभी-कभी चादर खींचता है। कभी मुंह से चादर उघाड़ देता है। कभी एकदम आकर सामने खड़ा हो जाता है। उन्होंने कहा: आप भी कहां की बातें कर रहे हैं! आप से मैंने कभी आशा ही नहीं की थी कि आप भूत-प्रेत में मानते होंगे।
मैंने कहा: मैं क्या करूं, मानता मैं भी नहीं हूं।
फिर तो मैं सो गया। और रात दो बजे उन्होंने जो चीख मारी तो गया उनके कमरे में, वह बेहोश पड़े थे। पानी छिड़कवाना पड़ा, हवा करनी पड़ी, बामुश्किल होश में आए। मैंने पूछा: क्या हुआ? उन्होंने कहा कि हद हो गई, मैं भी मानता नहीं, मगर है कोई। बराबर मैंने उस कोने में खड़ा देखा। और जब मैंने खड़ा देखा तो मैं घबड़ा गया।
मैंने कहा: कोई भी नहीं है। मैं सिर्फ आपके प्रश्न का उत्तर दिया हूं। विचार भीतर बैठ जाए तो यथार्थ हो जाता है।
वे तो बड़े नाराज हुए। उन्होंने कहा: यह भी कोई बात हुई! मेरी पूरी रात खराब कर दी और मैं इतना घबड़ा गया, मुझे तो ऐसा लगा जैसे हार्ट-अटैक हो जाएगा या क्या होगा! मुझे तो ऐसा लग रहा था कि अब मैं चीख भी न सकूंगा, जब वह सामने खड़ा था। कैसे चीख निकली, क्योंकि मैं इस घबड़ाहट में पड़ गया कि अब कोई न आया तो क्या होगा, पता नहीं यह क्या करे! ऐसे भी उत्तर दिया जाता है?
मैंने कहा: ऐसे ही उत्तर दिया जाता है। और तो कोई उत्तर नहीं है। यह कोई भी नहीं है यहां। अब आप मजे से सो जाइए।
उन्होंने कहा: नहीं, मैं आपके ही कमरे में आता हूं। अब आप कितना ही कहो, इस कमरे में मैं सोने वाला नहीं हूं।
पर मैंने कहा: यहां कोई भी नहीं। उन्होंने कहा: हो या न हो, मुझे सोना है, तो मैं इस झंझट में नहीं पड़ता। यह कोई विवाद का मसला नहीं, मुझे मेरी पूरी रात खराब मत करो। मैं बहुत घबड़ा गया हूं।
एक दफा तुम किसी बात को स्वीकार कर लो, तुम्हारी स्वीकृति के कारण ही हो जाती है। एक सम्मोहन पैदा हो जाता है।
तुम्हारी जिंदगी में बहुत से यथार्थ ऐसे ही हैं जो तुमने स्वीकार कर लिए हैं। बस स्वीकार कर लिए हैं। कर लिए, तो हैं। जिस दिन अस्वीकार कर दोगे, उसी दिन नहीं हो जाएंगे।
यह अहंकार मनुष्य के सबसे बड़े सम्मोहनों में से एक है। यह सबसे बड़ी हिप्नोसिस है। यह हमने मान रखा है और जन्मों-जन्मों से इसको सम्हाला है, इसलिए बहुत मजबूत हो गया है। है बिलकुल नहीं; हवा है, बस हवा है--लेकिन बहुत गहरे बैठ गया है। अफवाह है। तुम हो नहीं; तुम्हारा होना एक अफवाह है। लेकिन इस अफवाह पर तुमने भरोसा कर लिया। भरोसा ही नहीं कर लिया, इसको सही सिद्ध करने की तुमने सब तरह की चेष्टाएं की हैं। और यह सही मालूम होता है। और फिर तुम जिनके बीच रहते हो, वे भी इसी अफवाह को मानते हैं। तो हम एक-दूसरे का पारस्परिक सम्मोहन बढ़ाते रहते हैं।
फिर, चौबीस घंटे हमारी भाषा ऐसी है कि मैं शब्द का उपयोग करना ही पड़ता है। जब भी तुम मैं शब्द का उपयोग करते हो, फिर यह अहंकार मजबूत होता है, फिर मजबूत होता है, फिर मजबूत होता है। इस पर रोज पर्त-दर-पर्त जमती चली जाती है।
जीवन के यथार्थ इस झूठ के कारण दिखाई नहीं पड़ते। यथार्थ परमात्मा है। अयथार्थ तुम हो। यही तो अर्थ है, संत जब कहते हैं कि संसार माया है। संसार यानी ये वृक्ष नहीं--ये विचार। संसार यानी ये पहाड़-पर्वत नहीं--यह अहंकार। संसार यानी ये चांद-तारे, सूरज नहीं--ये तुम्हारे भीतर जो धारणाएं, अफवाहें, कल्पनाएं घनीभूत हो गई हैं। इन घनीभूत धारणाओं के विसर्जन का नाम ध्यान है, भक्ति है। और तब अचानक दिखाई पड़ता है कि सब तरफ राम का ही बल है। तुम में भी, औरों में भी--सब तरफ उसी एक का बल है।
और स्वभावतः जब तुम नहीं बचते तो फिर कैसी दीनता! निर्बल के बल राम! तब जो भी होता है शुभ है, क्योंकि परमात्मा से होता है। जो भी होता है, सुंदर है। उसके हाथ से असुंदर हो ही कैसे सकता है! फिर तो मृत्यु भी आती है तो वरदान है। अभी तो जीवन भी अभिशाप है। इस अहंकार के कारण जीवन भी अभिशाप हो गया है। और फिर तो मौत भी आती है तो वरदान है। फिर तो वरदान ही घटते हैं; और कुछ घटता ही नहीं। फिर तो आशीष ही बरसते हैं; और कुछ बरसता नहीं, क्योंकि और कुछ बरस सकता नहीं।
आज पराया हुआ जा रहा है मुझसे मेरा अपनापन
पथ भूले राही सा व्याकुल भटक रहा मेरा जीवन
ले अंगड़ाई जगी वेदना, जाग गया सोया क्रंदन
डूब चला विश्वास जभी से टूट चले मन के बंधन,
कैसे चले सांस की दुल्हन, निपट अकेली राहों में
कदम कदम पर व्यथा ठगोनी विषधर पाल गई
आज उभर आई अधरों पर फिर से सहमी करुण कथा
वाणी से अधिकार मांगता गीत अधूरे जीवन का
देखो आज बिखर न जाए संचित भावों की माला
टूट न जाए छंद, अबोली रह जाए मन की भाषा
बुझी आरती थकी पुजारिन, मंदिर के पट बंद हुए
कौन सुहागिन स्वर्ण-कलश पर दीपक बाल गई!
बुझी आरती, थकी पुजारिन, मंदिर के पट बंद हुए
कौन सुहागिन स्वर्ण-कलश पर दीपक बाल गई!
वह दीया बलता ही तब है, जलता ही तब है--जब तुम्हारे अहंकार का सब हार जाता है, सब समाप्त हो जाता है, अहंकार जब पूरी तरह पराजित होकर गिर जाता है, उसकी रेखा भी नहीं बचती।
बुझी आरती, थकी पुजारिन, मंदिर के पट बंद हुए
जहां लगता है कि अंतिम पराजय आ गई, सब तरह से हार गए, सर्वहारा--उसी क्षण...
कौन सुहागिन स्वर्ण-कलश पर दीपक बाल गई!
...उसी क्षण किसी अज्ञात का दीया तुममें उतर आता है; किसी अज्ञात की रोशनी तुममें उतर आती है।
निर्बल के बल राम!
निर्बल के बल राम में राम का किसी तरह का उपयोग कर लेने की चेष्टा नहीं है। निर्बल के बल राम में राम के बल का कुछ शोषण कर लेने का आयोजन नहीं है। निर्बल के बल राम में केवल तथ्य की घोषणा है।
इसीलिए तो अहंकार तोड़ता है और आंसू जोड़ देते हैं। अहंकार दीवाल बन जाती है; आंसू द्वार बन जाते हैं। क्योंकि आंसू का अर्थ होता है: हारे हुए, पराजित।
बुझी आरती, थकी पुजारिन, मंदिर के पट बंद हुए
अब अपने पर कोई भरोसा न रहा। अब अपने से कुछ हो सकेगा, इसकी कोई आशा भी न बची। अब सारी आशा, निराशा हो गई; सारी योजनाएं हताश होकर गिर गईं। अब कोई भविष्य न बचा। सिर्फ आंख आंसुओं से गीली रह गई। सिर्फ विषाद, सिर्फ संताप...
बुझी आरती, थकी पुजारिन, मंदिर के पट बंद हुए
जैसे आदमी ने अपना आत्मघात ही कर लिया, अब मैं नहीं हूं--और जिस क्षण यह आत्मघात घटता है कि मैं नहीं हूं, उसी क्षण समाधि का दीया जल जाता है। यह बेबूझ घटना घटती है, यह रहस्यमय घटना घटती है। जिस दिन तुम नहीं होते, उसी दिन तुम्हारे भीतर परमात्मा नाचने लगता है। आंसू की कला सीखो।
यह जी चाहता है कि कुछ कर दिखाएं,
कोई नज्म लिखें, कोई गीत गाएं
जो यह भी न हो तो उसे याद करके
किसी कुंज में बैठ कर गम के आंसू बहाएं
मन तो करने का होता है। यह जी चाहता है कि कुछ कर दिखाएं! मगर क्या कर दिखाओगे? कृत्य से कोई आदमी परमात्मा से नहीं जुड़ता, क्योंकि कृत्य तो फिर-फिर अहंकार को ही मजबूत कर जाता है। इसलिए तुम क्या करते हो, इससे तुम धार्मिक नहीं होते; तुम क्या हो, इससे धार्मिक होते हो। कोई आदमी कहता है, मैंने दान किया। कोई आदमी कहता है, मैंने मंदिर बनाया। कोई आदमी कहता है कि मैंने गो-शाला खोली। कोई आदमी कहता है, इतने ब्राह्मणों को भोजन कराता हूं। कोई आदमी कहता है, देखो अनाथालय चलाता हूं, विधवा आश्रम चलाता हूं, ऐसा-ऐसा...फेहरिश्त लंबी है करने वालों की। मगर ये धार्मिक हैं?
ये धार्मिक नहीं हैं। अभी इन्हें करने का खयाल है। अभी ये कहते हैं कि मैंने धर्मशाला बनाई, मैंने मंदिर बनाया! तो यह मंदिर में जो इन्होंने मूर्ति रखी, यह मूर्ति इनके ही मैं की मूर्ति है, चाहे इसको राम कहो, चाहे कृष्ण कहो, चाहे महावीर, बुद्ध कहो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। अगर इस मूर्ति को जरा गहरे खोदोगे तो तुम इनका नाम ही लिखा हुआ पाओगे। यह मूर्ति इनकी ही है। यह बुद्ध के बहाने इन्होंने अपनी मूर्ति रख ली। अपने हस्ताक्षर कर जाने की कोशिश कर रहे हैं। पत्थरों पर नाम लिख जाने की कोशिश कर रहे हैं--टिके कुछ, बचा रहे कुछ पीछे, याद रह जाए, इतिहास के पन्नों पर कहीं कोई छोटी टिप्पणी रह जाए।
जब बोधिधर्म चीन पहुंचा और सम्राट वू ने उससे कहा कि मैंने हजारों मंदिर बनवाए और लाखों बुद्ध की मूर्तियां गड़वाईं और मैं सैकड़ों बौद्ध भिक्षुओं को भोजन कराता हूं और मैंने सैकड़ों बौद्ध शास्त्रों का अनुवाद करवाया है, मैंने अपना सारा खजाना धर्म की सेवा में लगा दिया है--मुझे इससे क्या लाभ होगा? इसका क्या पुण्य होगा?
जो और भिक्षु गए थे भारत से इसके पहले, उन सबने उसकी खूब प्रशंसा की थी कि सम्राट वू, आप चक्रवर्ती हैं! आप जैसा धर्म-राजा कभी नहीं हुआ! आप राजाओं में भी महाराजा हैं! आपकी कीर्ति सदा रहेगी। आपका पुण्य बड़ा है। स्वर्ग में आपके लिए स्वर्ण-महल बनाए जा रहे हैं। आपकी प्रतीक्षा की जा रही है। आप सातवें स्वर्ग जाओगे। ऐसी-ऐसी बातें उन्होंने कही थीं। वू बहुत प्रसन्न हुआ था। और वू ने और भी ज्यादा मंदिर बनवाए, और भी भिक्षुओं को भोजन करवाया, और भी शास्त्रों के अनुवाद करवाए, और भी लोगों को बौद्ध धर्म में दीक्षित करवाया। सम्राट वू ने चीन को बौद्ध बनाया।
लेकिन यह बोधिधर्म आया। यह कुछ और ढंग का आदमी था। यह असली आदमी था। ऐसे असली आदमियों के सामने खड़े होने में भी प्राण कंप जाते हैं।
जब बोधिधर्म से पूछा वू ने, जो उसने हमेशा पूछा था और प्रशंसित होकर आनंदित होता था, जब उसने पूछा क्या होगा इसका पुण्य--बोधिधर्म ने उसे ऐसे क्रोध से देखा, बोधिधर्म ने उसकी आंखों में इस तरह भयंकरता से देखा कि जैसे कोई सिंह खड़ा हो और खा जाने को तत्पर हो। उसने कहा कि पुण्य! कैसा पुण्य? नरक में न पड़ो तो बहुत!
नरक में न पड़ो तो बहुत। वू ने कहा: महाराज, आप कहते क्या हैं? वह तो जैसे एक नींद से जागा। अब तक तो किसी ने यह बात नहीं कही थी। उसने कहा: आप कहते क्या हैं? मैंने इतने धर्म के कृत्य किए और मैं नरक में न पडूं तो बस...!
बोधिधर्म ने कहा: हां, इसमें पुण्य कुछ भी नहीं, धर्म कुछ भी नहीं। कृत्य में धर्म कैसा! क्योंकि कृत्य में तो करने वाला आ गया। कृत्य में तो अहंकार आ गया। यह तो अहंकार की ही सजावट चल रही है।
वू थोड़ा नाराज हुआ। उसने प्रश्न बदल दिया, उसने विषय बदला, क्योंकि और लोग भी खड़े थे, और यह आदमी कुछ अजीब सा मालूम पड़ता है! सम्राटों से इस तरह नहीं बोला जाता। मगर उसे पता नहीं कि बोधिधर्म जिस चित्त की दशा में है, वह बुद्ध की दशा है; वह ठीक वहीं हैं जहां बुद्ध हैं। वे कुछ औपचारिक बातें नहीं बोलेंगे।
सम्राट वू ने विषय बदला, ताकि बात जरा फजीहत की न हो जाए। उसने कहा: फिर धर्म की पवित्रता के संबंध में कुछ कहें। बोधिधर्म हंसा। उसने कहा कि धर्म और पवित्रता का क्या संबंध! धर्म यानी शून्यता। पवित्रता? पवित्रता का क्या संबंध धर्म से? पवित्रता--फिर वही अहंकार। पवित्रता-अपवित्रता, पाप-पुण्य--नाम ही बदलते हो, बात वही करते हो। नीति-अनीति, अच्छा-बुरा...धर्म का अच्छे-बुरे से कोई संबंध नहीं। धर्म का संबंध है शून्य-भाव से--न अच्छा न बुरा, न कुछ पवित्र न कुछ अपवित्र। मैं का अभाव--धर्म।
तब तो जरा सम्राट वू भी नाराज हो गया। उसने कहा: फिर आप कौन हैं? अगर धर्म शून्य है, तो आप कौन हैं? यह जो मेरे सामने खड़ा बात कर रहा है, यह कौन है?
बोधिधर्म हंसा और उसने कहा: मुझे पता नहीं। यह बड़ा अपूर्व उत्तर है। उसने कहा: मुझे पता नहीं। पता भी हो तो मैं हो जाऊं। मुझे कुछ पता नहीं। आप देख लो, यह कौन खड़ा है सामने! आप झांक लो, यह कौन खड़ा है सामने! मैं खुला हूं, मेरे द्वार खुले हैं; लेकिन मैं कौन हूं, यह तो मुझे ही पता नहीं। यह तो किसी को भी पता नहीं है।
वू यह पूछ रहा था, नाराजगी में पूछ रहा था, कि आप कौन हैं महाशय, जो इस तरह के कठोर उत्तर दिए चले जा रहे हैं? आप हैं कौन?
और बोधिधर्म कहता है, मुझे पता नहीं। मैं कौन हूं, तुम देख लो। मेरे द्वार खुले हैं।
काश वू में हिम्मत होती उन द्वारों में झांकने की, तो वह पाता महाशून्य। और उस महाशून्य में पाता ज्योतिर्मय परमात्मा को। लेकिन वह न देख सका, वह लौट पड़ा। उसने कहा: यह आदमी अशिष्ट है और इसे राज-दरबारों के नियमों का कोई पता नहीं। चूक गया अवसर।
धर्म का संबंध कृत्य से नहीं है--शून्य से है--परम शून्य के भाव से है। इसलिए करने से कोई धार्मिक नहीं होता। तुम क्या करते हो, इससे धार्मिक नहीं होते--तुम क्या हो! तुम अगर शून्य हो तो धार्मिक हो। यही बात है इस वचन में: निर्बल के बल राम। निर्बल से अर्थ है: शून्य हो जाओ, तो पूर्ण उतरेगा। जहां शून्य है वहां पूर्ण उतरता ही है। शून्य यानी तुम और पूर्ण यानी परमात्मा।

दूसरा प्रश्न:
भगवान, प्रश्नकर्ता दुकानदार है। उसे भलीभांति पता है कि सुंदर वस्तु की कीमत भी बड़ी होती है। दिक्कत यह है कि वह एक कंजूस मारवाड़ी भी है। यह जानते हुए भी कि संसार और मोक्ष एक साथ नहीं सधते, उसका रस दोनों में है।
कोई हर्जा नहीं। दुकानदार होने में कोई हर्जा नहीं। संसार में सभी दुकानदार हैं। दुकानें अलग-अलग होंगी, मगर संसार में सभी दुकानदार हैं। संसार में होने का ढंग ही दुकानदारी है। और किसी ढंग से तो संसार में कोई हो ही नहीं सकता। कोई ज्ञान की दुकान करता है, कोई और सामान की दुकान; लेकिन सभी दुकानदार हैं। इसलिए चिंता न लो।
और दुकानदार भी पहुंच जाते हैं। देखते हैं पलटू--निरगुन बनिया! पलटू पहुंच गए। पलटू--राम का मोदी। पलटू पहुंच गए, तुम भी पहुंच जाओगे। कोई चिंता की बात नहीं है।
दुकानदार का अर्थ इतना ही होता है कि हिसाब-किताब रखते हो। सो सभी रखते हैं। अहंकार हिसाबी-किताबी है। दुकानदार का अर्थ होता है कि दो पैसे में चीज खरीदो और चार में बेच दो तो कुछ बचत हो जाए। दुकानदार का अर्थ होता है: कम दो और ज्यादा लो, तो कुछ बचत हो जाए। सभी लोग यही कर रहे हैं। और अच्छा है कि तुमने स्वीकार किया, क्योंकि जिसने स्वीकार किया वह पार जा सकता है। यह बात भी समझ में आ जाए कि मेरा चित्त दुकानदार का है, हिसाबी-किताबी है, गणित में लगा रहता है, हमेशा गिनती करता रहता है कि कुछ ज्यादा न चला जाए; ज्यादा आए सदा, जाए कम, आए ज्यादा। यह तो सभी की दशा है। जिस दिन इससे उलटी दशा होती है, उस दिन भक्त पैदा होता है। भक्त का अर्थ होता है: जाए ज्यादा, दूं ज्यादा, बंटे ज्यादा। लूं उतना ही जितना मुझे जरूरी है। और दे दूं सब जो मेरे पास है। मेरा काम दो रोटी से चल जाए, तो दो रोटी ले लूं और दे दूं सब, पूरा खजाना लुटा दूं! वह जो मेरे अंतर्तम में उठे हैं, स्वर वे सब बांट दूं। सारा प्रेम उंड़ेल दूं।
प्रेमी उलटा दुकानदार है। बांटने में, देने में उसका रस है। दुकानदार कभी भी प्रेमी बन सकता है; जरा सी दिशा बदलने की बात है। अभी ज्यादा लेते थे, कम देते थे; जरा सी ही बदलने की बात है--कम लेने लगे, ज्यादा देने लगे, प्रेमी हो गए, भक्त हो गए। ऐसे ही तो पलटू निरगुन बनिया परम सिद्ध को उपलब्ध हुआ। जरा सी दुकान के ही सूत्र को बदल लेने की बात है।
मैं तुम्हें दुकान छोड़ कर भागने को नहीं कहता। मैं तुम्हें सिर्फ इतना ही कहता हूं कि जहां तुम्हारे भीतर गणित बैठा है, वहां प्रेम बैठ जाए।
पूछा तुमने: ‘प्रश्नकर्ता दुकानदार है। उसे भलीभांति पता है कि सुंदर वस्तु की कीमत भी बड़ी होती है।’
ठीक ही पता है, उचित ही पता है कि जितनी सुंदर वस्तु होगी उतनी कीमत होगी। और जो परमात्मा को खोजने चला है, उसे तो अपने को पूरा का पूरा कीमत में ही दे देना होगा, इससे कम में काम न चलेगा। तुम चाहो कि धन देने से परमात्मा मिल जाए, तो नहीं होगा। स्वयं को देना होगा। अपने को पूरा ही उंडेल देना होगा। वहीं अड़चन होती है। वहीं हमारा मन कहता है कि खुद को तो न देना पड़े और कुछ भी देने से चल जाए तो दे देंगे--जमीन दे देंगे, मकान दे देंगे, पत्नी-बच्चे दे देंगे, धन-द्वार दे देंगे; लेकिन अपने को! अपने को दे दिया तो फिर लेने का मजा क्या! फिर लेने वाला कौन बचा! और यह परमात्मा कुछ ऐसा है कि मिलता ही तब है जब तुम अपने को दे देते हो। वहीं दुकानदार का मन अड़चन में पड़ता है। वहीं उसका गणित हारने लगता है। वहीं कुछ उलटा गणित शुरू होता है। अपने को ही दे दो, तभी परमात्मा मिलता है। ऐसे ही जैसे बूंद सागर में गिरती है, तो अपने को गंवा देती है--लेकिन गंवा कर ही सागर हो जाती है। और बीज जमीन में टूटता है तो अपने को गंवा देता है--और अपने को गंवा कर ही वृक्ष हो जाता है। और फिर वृक्ष में करोड़ों बीज लगेंगे और एक-एक बीज करोड़-करोड़ बीज को पैदा करता जाता है।
वनस्पतिशास्त्री कहते हैं, एक बीज से पूरी जमीन हरी हो सकती है। एक जमीन क्या, सारी जमीनें हरी हो सकती हैं। क्योंकि एक बीज फूटता है तो करोड़ बीज, फिर एक और; करोड़ फूटते हैं तो करोड़-करोड़--फैलता चला जाता है। अनंत विस्तार है। एक छोटे से बीज में ब्रह्म का विस्तार है। लेकिन मिटना पड़ता है बीज को। वहीं अड़चन आएगी। और वहीं तुम्हें अड़चन आती है, ऐसा नहीं; सभी को आती है। इसलिए चिंता मत लेना। दुकानदार हो या नहीं हो, सभी को अड़चन आती है। अपने को कैसे मिटाएं!
अहंकार कहता है: अपने को बचा लो और परमात्मा को भी पा लो। यह नहीं हो सकता। क्योंकि अहंकार ही बाधा है। यह तो ऐसे ही हुआ कि कोई आदमी चाहे कि कमरे में अंधेरा भी बच जाए और रोशनी भी जला लूं। रोशनी जली तो अंधेरा जाएगा। अंधेरा बचाना है तो फिर रोशनी नहीं जलेगी। ये दोनों बातें साथ-साथ न हो सकेंगी। असंभव को करने की कोशिश मत करना। और मेरी ऐसी प्रतीति है कि दुकानदार इस बात को समझ सकता है। दुकानदार के पास काफी समझ होती है। दुकानदार के पास इतना गणित, इतना तर्क होता है कि वह तर्कातीत की भी थोड़ी सी बात समझ ले। तर्कातीत को समझने के लिए भी थोड़े तर्क की जरूरत होती है। जो बुद्धि के पार है, उसमें झांकने को भी बुद्धि की जरूरत होती है। और दुकानदार बुद्धि में जीता है।
इसलिए इस बात को अड़चन मत मान लेना। इसका उपयोग करो। हर राह के पत्थर को सीढ़ी बनाओ। अब जहां हो, अगर दुकानदार हो, व्यवसायी हो, तो व्यवसाय को ही सीढ़ी बनाओ।
अक्सर ऐसा होता है कि हम हर राह की सीढ़ी को पत्थर बना लेते हैं--बजाय पत्थरों को सीढ़ी बनाने के। हमारी दृष्टियां बड़ी नकारात्मक हैं।
‘प्रश्नकर्ता दुकानदार है। उसे भलीभांति पता है कि सुंदर वस्तु की कीमत भी बड़ी होती है।’
ठीक पता है। एक और बात पता कर लो कि यह जो परमात्मा है, इसकी कीमत बड़ी नहीं होती; इसकी कीमत अपने पूरे होने से चुकानी पड़ती है। और बड़ा मजा यह है कि हमारी कीमत ही क्या है, हमारा मूल्य ही क्या है! हम तो सिर्फ अफवाह हैं। हम तो एक झूठ हैं।
मैंने सुना, मुल्ला नसरुद्दीन एक ट्रेन में सफर कर रहा था। उस कमरे में, फर्स्ट क्लास के उस डब्बे में मुल्ला था और दो संभ्रांत महिलाएं थीं। एक महिला ने कहा दूसरी महिला से, कि तुम्हें भरोसा आए या न आए, लेकिन मुझे सोने-चांदी से एलर्जी है। सोने-चांदी से एलर्जी! पहली महिला जब यह बोली तो दूसरी महिला थोड़ी चौंकी। उस महिला ने कहा कि अभी कल ही ऐसा हुआ कि पति सोने का एक हार ले आए। मैंने गले में डाला और एलर्जी हो गई और मैं बेहोश हो गई। तुम मानो या न मानो...। लेकिन दूसरी महिला ने कहा: यह मैं मानूंगी, क्योंकि मुझे भी एलर्जी है। मुझे सोने-चांदी की एलर्जी नहीं है, हीरे-जवाहरात की एलर्जी है। अभी परसों ही तो पति दिल्ली से लौटे हैं, एक नौ लाख का हार ले आए और मैंने पहना कि एकदम मैं बेहोश हो गई।
ये दोनों की बातें चल रही थीं कि मुल्ला एकदम से गिरा और फर्श पर चारों खाने चित्त होकर बेहोश हो गया। दोनों महिलाएं घबड़ा गईं, चेन खींची, गार्ड आया, और लोग भी आ गए, आस-पास के डिब्बों से लोग आ गए। बामुश्किल पानी छिड़का, हवा की, किसी तरह मुल्ला को होश में लाया। मुल्ला से पूछा: मामला क्या? मुल्ला ने कहा कि मारे गए होते, अच्छा हुआ आप लोग आ गए। मुझे झूठ की एलर्जी है। इसलिए मैं स्त्रियों का सत्संग करता भी नहीं। संयोगवशात जान जाती थी। एक सीमा तक मैं झूठ बरदाश्त कर सकता हूं, उसके बाद फिर मुझे एलर्जी है, फिर मैं एकदम बेहोश हो जाता हूं।
यह जो अहंकार है, यह झूठ है, यह बिलकुल झूठ है। इसी झूठ में डूबे हुए तुम बेहोश हो। तुम्हें सत्य की एलर्जी है। तुम झूठ से तो राजी हो; सत्य से तुम्हें अड़चन है। सत्य से एलर्जी कम हो, इसलिए सत्संग। इसलिए सत्य की सुनो, सत्य को गुनो, सत्य को सोचो, ध्याओ, विचारो--ताकि धीरे-धीरे, धीरे-धीरे सत्य की एलर्जी कम हो जाए, और झूठ की एलर्जी बढ़े। तब तुम एक दिन पाओगे कि अहंकार को परमात्मा के चरणों में चढ़ाते वक्त तुमने कोई मूल्य नहीं चुकाया है, सिर्फ बीमारी छोड़ी है। परमात्मा मुफ्त मिल रहा है--बीमारी की कीमत पर मिल रहा है। परमात्मा मुफ्त मिल रहा है--झूठ की कीमत में मिल रहा है। जो तुम्हारे पास नहीं है, उसको छोड़ने से मिल रहा है।
फिर से दोहरा दूं: जो तुम्हारे पास नहीं है, उसको छोड़ने से परमात्मा मिल रहा है। जो है--मिलता है--उसे छोड़ने से--जो नहीं है। इससे सस्ता सौदा और क्या होगा! अगर तुम असली दुकानदार हो तो मेरी बात तुम्हें समझ में आ जाएगी। इससे सस्ता सौदा और क्या होगा--जो नहीं है, उसको छोड़ने से मिलता है--वह, जो है!
‘दिक्कत यह है कि वह एक कंजूस मारवाड़ी भी है।’
मारवाड़ी होना ही काफी है, कंजूस मारवाड़ी...तो कोई जरूरत ही नहीं है। ये दो-दो इकट्ठे क्यों? पुनरुक्ति क्यों करते हो? मारवाड़ी होना पर्याप्त है। मगर कौन मारवाड़ी नहीं है! जहां लोभ है, वहां मारवाड़। देखा न, कल हम सुनते थे कि जहां शील वहां अवध और जहां स्नेह वहां जनकपुरी! ऐसा ही समझो: जहां लोभ वहां मारवाड़। लोभी तो सभी हैं, सो सभी मारवाड़ी हैं। जब तक लोभ है, तब तक मारवाड़ के बाहर जाओगे कैसे? जो भी महत्वाकांक्षी है, मारवाड़ी है। जो भी लोलुप है, मारवाड़ी है। यह तो प्रतीक है। और जो भी लोभी है, कंजूस होगा ही।
कंजूस का क्या अर्थ होता है? कंजूस का अर्थ होता है...। लोभी का अर्थ होता है: जो नहीं है वह मिले। लोलुप का अर्थ होता है: जो मेरे हाथ में नहीं है, हाथ में आ जाए। कंजूस का अर्थ होता है: जो हाथ में आ गया, वह निकल न जाए। और तो कुछ मतलब नहीं होता। तो यह तो बिलकुल संगति है दोनों की; एक ही तर्क का फैलाव है। जो मेरे पास नहीं है, वह मुझे मिल जाए--यह लोभ। फिर जब मिल गया, तो कहीं यह मिला हुआ हाथ से न निकल जाए, क्योंकि और लोग भी तो झपटने को तैयार खड़े हैं। तुम अकेले ही तो नहीं हो यहां। यहां बड़े प्रतिस्पर्धी हैं। सारी पृथ्वी मारवाड़ियों से भरी है। कहां भागोगे, कहां बच कर जाओगे! और दूसरे भी झपट रहे हैं। जैसा तुमने किसी से झपट लिया है, दूसरे तुमसे झपटने को तत्पर बैठे हैं। जैसे ही तुम्हारे हाथ में आया कि झंझट शुरू होती है।
रामकृष्ण कहा करते थे, बैठे थे एक दिन मंदिर के बाहर दक्षिणेश्वर में। उन्होंने एक चील को उड़ते देखा। वह एक चूहे को लेकर उड़ रही थी। और उसके पीछे कई गिद्ध लगे थे, और चीलें लगी थीं और झपट्टे मार रही थीं उस पर। रामकृष्ण बैठे देखते रहे और उनके शिष्य भी बैठे थे। शिष्य भी देखने लगे। रामकृष्ण को ऐसा दत्तचित्त देख कर उनको लगा कि जरूर कुछ महत्वपूर्ण बात होगी; वहां कुछ खास मामला भी नहीं है। वह चील एक चूहे को लेकर उड़ रही है। और गिद्ध उस पर हमले मार रहे हैं, और चीलें भी झपट्टे मार रही हैं। फिर उस चील ने वह चूहा छोड़ दिया। चूहे के छोड़ते ही सब गिद्ध और सब चीलें--जो उस पर हमला कर रहे थे--उसे छोड़ कर चले गए। वे चूहे के पीछे चले गए; इस चील से उन्हें क्या लेना-देना था! वह चील एक वृक्ष पर बैठ गई।
रामकृष्ण ने अपने शिष्यों से कहा: देखा! जब तक तुम किसी चूहे को पकड़े हो, तब तक गिद्ध तुम पर हमला करेंगे। अब देखो, वह किस मजे में बैठी है! गिरह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम! अब वहां कोई नहीं है, सन्नाटा हो गया। अब कोई चील हमला नहीं करती, कोई गिद्ध हमला नहीं करता। अब उस चील को पता चल रहा होगा कि यह मुझ पर हमला कर ही नहीं रहे थे, इनका हमला तो चूहे पर था। मैं भी चूहे को पकड़ रही थी, ये भी चूहे को पकड़ने के प्रतियोगी थे, प्रतिस्पर्धी थे। चूहा छूट गया या छोड़ दिया--बात खत्म हो गई।
लोभ का अर्थ है: दूसरों के हाथ में जो है, वह मेरे हाथ में हो। कंजूसी का अर्थ है: जो मेरे हाथ में है, वह मेरे ही हाथ में रहे, किसी और के हाथ में न चला जाए। कंजूसी लोभ की ही छाया है और मजा यह है कि लोभी सदा दुखी रहेगा और कंजूस सदा भयभीत। लोभी सदा दुखी रहेगा, क्योंकि कितना ही तुम पा लो, बहुत कुछ सदा पाने को शेष रह जाता है। वह जो नहीं मिला है, वह पीड़ा देता है। उसका दंश चुभता है, छाती में छुरी की तरह चुभता है। एक मकान तुमने बना लिया, इससे क्या होता है; बस्ती में हजार मकान हैं; और यही कोई बस्ती तो नहीं, और हजार बस्तियां हैं। तुम कितना कर लोगे? जितना करोगे, वह सदा ही छोटा रहेगा--उसके मुकाबले में, जो कि शेष करने को है। जिंदगी छोटी है। यह सत्तर-अस्सी साल की जिंदगी में कितना कमाओगे? हमेशा पाओगे कि क्षुद्र ही हाथ में लगा। जितना होना था उतना नहीं हो पाया। इसलिए लोभी सदा दुखी। लोभी कभी सुखी नहीं हो सकता। और कंजूस सदा भयभीत, क्योंकि जो हाथ में है वह कोई छीन न ले! सारे लोग झपट्टा मारने को तैयार हैं। सब तरफ दुश्मन खड़े हैं।
तुम देखते हो, गरीब का कौन दुश्मन है! दुश्मन अमीर के होते हैं। तुम्हारे पास कुछ हो, तब कोई दुश्मन होता है। तुम्हारे पास कुछ न हो तो कौन दुश्मन होता है! तुम देखते हो बस्ती में ही तुम्हारे राजनेता घूमता रहता था, कोई दुश्मन नहीं था। जैसे ही वह मिनिस्टर हो जाता है, फिर मुश्किल खड़ी हो जाती है। फिर वह निकल कर घूम नहीं सकता। फिर खतरा है, फिर घिराव होगा, आंदोलन होगा, विरोध में प्रदर्शन निकलेगा, पत्थरबाजी होगी, जूते फेंके जाएंगे।
अभी देखा, मोरार जी भाई पर कोई जूते नहीं फेंकता था, अब लोग फेंकने लगे। फेंकेंगे जूते। अभी पूना में ही फिंके। कोई नहीं फेंक रहा था जूते, किसी को प्रयोजन नहीं था। जब तक तुम्हारे हाथ में चूहा न हो, किसी को कोई मतलब नहीं है। चूहा हाथ में आया कि सबको मतलब है, क्योंकि वह चूहा औरों को भी चाहिए। तो जैसे ही तुम्हारे हाथ में पद हो, प्रतिष्ठा हो, धन हो, वैसे ही तुम अड़चन में पड़े, फिर उसकी रक्षा करनी पड़ती है। फिर सब तरफ से इंतजाम करना पड़ता है कि कोई छीन न ले, कोई झपट न ले।
जिनके पास कुछ नहीं है, वे मजे से सो सकते हैं; लेकिन जिसके पास कुछ है, वह कैसे सोए! इसलिए कंजूस सो नहीं पाता। लोभ और कंजूसी के बीच में फंस कर, इन दो चाकों के बीच में, आदमी पिस जाता है। यह कोई बड़ी होशियारी नहीं है।
अगर तुम सच में होशियार हो, तो पलटू की सुनो, समझो, जागो। मारवाड़ के बाहर निकलो। यह भय का नरक किसी सार का नहीं है। इस भय और लोभ के बीच क्या मिला है? क्या मिलेगा?
फिर तुम पूछते हो: ‘यह जानते हुए भी कि संसार और मोक्ष एक साथ नहीं सधते, उसका रस दोनों में है।’
समझो। पहली बात: रस तो एक ही है। दुनिया में दो रस नहीं हैं। रसो वै सः। वह परमात्मा रसरूप है। संसार में भी तुम उसे ही खोज रहे हो। संसार उसी को खोजने की गलत दिशा है। जैसे नदी तो पश्चिम में है और तुम पूरब जा रहे हो--नदी की तलाश में। जा रहे हो नदी की तलाश में। तुम्हारी तलाश में कोई भूल-चूक नहीं है। तुम्हारी दिशा जरूर गलत है। आकांक्षा तुम्हारी बिलकुल दुरुस्त है। मगर नदी तुम्हें मिलेगी नहीं, क्योंकि नदी वहां है नहीं। संसार में भी आदमी उसी को खोज रहा है। यही मेरा निरंतर तुम से निवेदन है। आदमी कुछ और खोजता ही नहीं, आदमी परमात्मा को ही खोजता है। और कुछ खोज ही नहीं सकता। और कुछ खोजने योग्य है ही नहीं। वही तड़प है--नाम कुछ भी रखो, दिशा कोई भी पकड़ो; लेकिन हम सब परमानंद को खोज रहे हैं, सच्चिदानंद को खोज रहे हैं। भगवान कहो, ईश्वर कहो, ब्रह्म कहो। न देना हो नाम, मोक्ष निर्वाण कहो। कुछ भी नाम न देना हो, तो आनंद ही कहो चलो। आनंद शब्द ठीक है। मगर हर आदमी आनंद ही खोज रहा है।
फिर, दो तरह के लोग हैं। एक, जो गलत दिशा में खोज रहे हैं और कभी न पाएंगे। खोज-खोज कर थकेंगे, टूटेंगे, मरेंगे, सड़ेंगे--और कभी न पाएंगे। और कुछ लोग, जो ठीक दिशा में खोज रहे हैं। और मजा ऐसा है कि ठीक दिशा में मुड़ते ही मिलन हो जाता है।
ऐसा समझो कि एक आदमी सूरज की तरफ पीठ करके भागा जा रहा है। सूरज की खोज में सूरज की तरफ पीठ किए भागा जा रहा है। नहीं मिल रहा है सूरज, तो और तेजी से दौड़ रहा है। सोचता है: शायद तेजी से दौड़ने से मिलेगा। यह हमारा तर्क होता है। जब कोई चीज नहीं मिलती तो हम तेजी से दौड़ते हैं, स्पीड बढ़ाते हैं, गति बढ़ाते हैं। खूब तेजी से दौड़ता जा रहा है। पंख लगा लिए हैं, उड़ रहा है। मगर सूरज की तरफ पीठ है, सूरज नहीं मिलेगा। और जिस दिन उसको यह समझ में आ जाएगा, उस दिन लौटते ही मुड़ कर खड़ा होगा--और सूरज सामने है। मुड़ते ही सूरज सामने है।
यही ‘पलटू’ शब्द का अर्थ है: लौट पड़ना। गुरु ने उनको इसीलिए ‘पलटूदास’ कहा। वणिक थे, संसार में डूबे थे। गुरु का बोध सुन कर उन्हें समझ आ गई, पलट पड़े तो पलटूदास कहा। एक क्षण में पलट पड़े। हिम्मतवर रहे होंगे। दुकानदार थे, लेकिन दुकानदार होना उनकी आत्मा में प्रविष्ट नहीं हो गया था। आत्मा अभी भी जुआरी की थी, हिम्मतवर की थी, क्षत्रिय की थी, योद्धा की थी। सुनी बात, समझी बात, लौट पड़े। एक क्षण में लौट पड़े।
जैन शास्त्रों में उल्लेख है: एक युवक महावीर के वचन सुन कर घर लौटा। पुराने दिन की कहानी है; अब तो वैसा होता नहीं। तो उसकी पत्नी उबटन लगा कर उसे स्नानागार में स्नान करवा रही है। उसके शरीर पर मालिश कर रही है, उबटन लगा रही है, उसे स्नान करवा रही है। वह नग्न बैठा है, स्नान कर रहा है। उसकी पत्नी बात भी करती जाती है। वह कहती है कि महावीर को सुनने गए थे, मेरे भाई भी उन्हें सुनते हैं; मेरे भाई उनमें बड़ा रस लेते हैं, बड़ा सत्संग करते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी तय कर रखा है कि कभी न कभी एक दिन वे संन्यास की दीक्षा लेंगे।
वह युवक स्नान करते-करते हंसने लगा। उसकी पत्नी ने कहा: आप हंसे क्यों? अचानक आप हंसे क्यों? क्या बात आ गई?
उसने कहा: मैं हंसा इसलिए कि अगर महावीर की बात जंच गई है तो कभी...! कभी का क्या सवाल है? अभी क्यों नहीं? कभी की बात का तो मतलब यह होता है: तेरा भाई क्षत्रिय नहीं है। मैं तो यही सोचता था, तू क्षत्रिय घर से आती है, क्षत्राणी है। तेरा भाई क्षत्रिय नहीं है?
वह ऐसे मजाक ही में बात चल रही थी, मगर बिगड़ गई बात। कभी-कभी मजाक खिंच जाता है लंबा। पत्नी ने कहा: तुम कहते क्या हो? तो तुम क्या समझते हो तुम क्षत्रिय हो?
वह उठ खड़ा हुआ। दरवाजा खोल कर बाहर निकलने लगा। उसकी पत्नी ने कहा: कहां जाते हो? नग्न कहां जाते हो?
उसने कहा: बात खत्म हो गई।
क्षत्रिय को छेड़ दिया। वह तो बाहर ही निकल गया। उसने कहा: मैं संन्यस्त हो गया! बात खत्म हो गई। नग्न हूं ही, अब ऐसे ही चला जाऊंगा महावीर के पास।
महावीर तो नग्न रहते ही थे। पत्नी चिल्लाने लगी। घर भर के लोग इकट्ठे हो गए, पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए। उन्होंने कहा: मजाक को इतना आगे नहीं खींचते। उसने कहा: बात ही खत्म हो गई। क्षत्रिय से मजाक करते ही नहीं। बात जंच ही गई मुझे, कि मैं...आखिर मुझे भी तो महावीर की बात जंची है। यह पत्नी ने मुझे याद दिला दी, मैं उसका धन्यवादी हूं। जो बात जंच गई, फिर कर लेनी है, फिर दांव पर लगा देना है।
फिर वह संन्यस्त ही हो गया। फिर वह दिगंबर मुनि हो गया। यह कथा मुझे प्रीतिकर लगती है। हिम्मत, साहस, दुस्साहस--जरा सी चिनगारी से प्रदीप्त हो जाता है। मजाक की बात भी कभी गहरी हो जाती है, साहस हो तो। और नहीं तो सदगुरु तुम्हारे सिर पर डंडे मारता रहे, मारता रहे--और तुम झपकी खाते रहोगे और सोए रहोगे।
‘यह जानते हुए भी कि संसार और मोक्ष एक साथ नहीं सधते, उसका रस दोनों में है।’
दो तो हैं ही नहीं, इसलिए दो में से तो रस हो नहीं सकता। वह भ्रांति छोड़ दो। मेरा सारा शिक्षण यही है कि एक ही है। हां, उसको पाने का ठीक ढंग है और उसको खोने का भी एक ठीक ढंग है। परमात्मा को खोने का ठीक ढंग--संसार। और परमात्मा को पाने का ठीक ढंग--संन्यास। परमात्मा को खोना हो तो उलझे रहो क्षुद्र बातों में, हजार बातों में, दो कौड़ी की बातों में उलझाए रहो अपने मन को; भागे रहो--यहां से वहां, इस लोभ में उस लोभ में, इस पद, उस आकांक्षा में, अहंकार की मानो।
अगर परमात्मा से बचना है तो अहंकार सुनिश्चित तरकीब है। कभी नहीं धोखा खाओगे। अगर परमात्मा से बचना है, अहंकार की सुनो और अगर परमात्मा में थोड़ा भी रस है तो समझो कि संसार में रस मिलता कहां है, किसको मिला है, कब मिला है! एक भी तो खबर नहीं है सदियों-सदियों में। इतने लंबे इतिहास में एक आदमी भी तो गवाह नहीं है कि जो कह सके: मुझे संसार में रस मिला। चाहा सभी ने, मिला किसको! चाहोगे तुम भी, गंवाओगे तुम भी--पाओगे नहीं। तो अगर सिर्फ चाहने में ही बात हो तो तुम्हारी मर्जी। लेकिन अगर पाना हो, अगर उत्सुकता पाने में हो, तो रस तो एक ही है--परमात्मा का।
तुम जब अपनी पत्नी में डूबते हो या अपने पति में डूबते हो, तब भी तुम परमात्मा का ही रस लेना चाह रहे हो। सिर्फ तुमने जरा लंबा रास्ता चुना है देह, फिर देह के भीतर मन है, और मन के भीतर आत्मा है--और आत्मा के भीतर परमात्मा छिपा है। तुम पत्नी की देह में ही उलझ गए, तो ऐसा हुआ कि छीलने चले थे प्याज की गांठ को, बस पहली ही पर्त उघाड़ पाए। पत्नी के मन तक पहुंचो--दूसरी पर्त उघड़ेगी। पत्नी की आत्मा तक पहुंचो--तीसरी पर्त उघड़ेगी। और पत्नी के भीतर भी तुम्हें परमात्मा के दर्शन होंगे, पत्नी मंदिर बन जाएगी। और जब तक पत्नी मंदिर न बन जाए और पति मंदिर न बन जाए, तब तक समझना कि प्रेम था ही नहीं, वासना ही थी।
तुमने जहां भी खोजना चाहा है, वहीं परमात्मा को खोजो। दुकान पर ग्राहक आए तो उसकी आंख में भी झांको और राम को तलाशो। और तुम चकित हो जाओगे: राम का खयाल आते ही ग्राहक से तुम्हारा संबंध बदल जाता है। अब तुम इसको लूट नहीं लेना चाहते। अब तुम इसकी सिर्फ सेवा कर देना चाहते हो। राम आया दरवाजे पर, तो लूटना कैसे चाहोगे! तुम सिर्फ सेवा कर देना चाहते हो। अगर तुम इससे दो पैसे लाभ भी लेते हो तो उससे कह देते हो कि दो पैसे लाभ ले रहा हूं, वह भी सिर्फ इसीलिए कि तुम्हारी सेवा के लिए कल भी मौजूद रहूं; और कोई कारण नहीं है। तुम कल भी आओ तो मौजूद रहूं। तो तुम से दो पैसे लाभ भी ले रहा हूं। यह दस रुपये की चीज है, इसमें दो पैसे यह लाभ है।
तुम्हारा ग्राहक से संबंध बदल जाता है। यह ग्राहक अब ग्राहक न रहा--यह ‘राम जी’ हो गए!
ऐसे ही तो कबीर कपड़ा बेचने जाते थे। बेचते ही रहे आखिरी तक। भक्तों ने बहुत कहा कि अब आप बेचते हैं, अच्छा नहीं लगता। हम इतने आपके सेवक हैं। आपको क्या कमी? आप कपड़ा बुनें अब इस वृद्धावस्था में और बाजार बेचने जाएं, हमें बड़ी लज्जा आती है। लोग हमसे पूछते हैं कि तुम्हारा गुरु कपड़े बेचता है!
लेकिन कबीर कहते: तुम मेरी तो सोचते हो, रामजीयों की भी तो सोचो! वे जो सदा से मेरा कपड़ा पहनने का रस लेते रहे हैं, उनका क्या होगा! वे मेरी प्रतीक्षा करते हैं। मैं जितने प्रेम से कपड़ा बुनता हूं, कौन उनके लिए बुनेगा!
कबीर जब अपने ग्राहक से भी बोलते थे तो उसे रामजी ही कह कर उदबोधित करते थे। कहते थे: राम जी, सम्हाल कर रखना, यह चदरिया बड़ी मेहनत से बुनी है। झीनी-झीनी बीनी रे चदरिया! खूब जतन से बीनी रे चदरिया! यह ऐसी चदरिया नहीं है--इसमें राम-राम जप-जप कर भरा है। इसमें ध्यान उंड़ेला है। यह जिंदगी भर तुम्हारे साथ चलेगी। यह मैंने बड़े भाव से भरी है। यह तुम्हारे लिए ही बनाई है। मैं धन्यभागी कि तुम यह चादर ले जा रहे हो। राम ने पसंद की, मैं अनुगृहीत!
ऐसा कबीर का भाव था।
दुकान पर ही बैठे-बैठे मंदिर हो सकता है। बाजार में ही हिमालय आ सकता है। दृष्टि की बात है। मगर एक खयाल ले लो: रस तो एक ही है। उसी रस को स्मरण करो। और उस एक ही रस को सब तरफ खोजो। तब तुम पाओगे: कुछ जगह मिलता है, कुछ जगह नहीं मिलता। जहां नहीं मिलता, वह अपने आप व्यर्थ होती जाएगी जगह।
मनोवैज्ञानिक चूहों पर प्रयोग करते हैं, तो उनको एक भूल-भुलैया बना देते हैं। डब्बे...अनेक कटघरे बना देते हैं एक डब्बे में। और एक समझो कि बीस कमरे हैं उस डब्बे में--छोटे-छोटे कमरे। और सब में चूहा जा सकता है। फिर एक ही कमरे में उसका भोजन रखा है। तो वह पहले सब कमरों में भागता है--इस कमरे में जाता है, उस कमरे में जाता है; फिर जब एक दफा उसको भोजन मिल जाता है, फिर उसको छोड़ो, उसका ढक्कन खोला कि वह भागा और सीधा उसी कमरे में पहुंच जाता है। फिर तुम उसे धोखा नहीं दे सकते। फिर वह यहां-वहां नहीं जाता। एक दो दफे भूल-चूक भी करता है। फिर धीरे-धीरे-धीरे निकला अपने कमरे से और सीधा वहां पहुंच जाता है जहां उसका भोजन रखा है।
ऐसी ही स्थिति है। यह जगत एक भूल-भुलैया है। यहां तुम सब जगह तलाश रहे हो, लेकिन तलाश परमात्मा को रहे हो। जहां-जहां नहीं मिलता है, इतना तो समझदारी बरतो कि वहां-वहां दुबारा-दुबारा न जाओ। और मैं यह तुम से नहीं कहता कि एक बार न जाओ; एक बार जरूर जाओ, नहीं तो जानोगे कैसे? जरूर जाओ। भूल करनी ही पड़ेगी। नहीं तो भूल सुधरेगी कैसे? मगर एक भूल एक ही बार करो, दुबारा न करो। फिर जहां मिलता हो, उस दिशा में ज्यादा जाओ। धीरे-धीरे-धीरे सब तरफ जाना बंद हो जाएगा। उसी एक रस में तुम डूबने लगोगे।
लेकिन याद रखो: रस एक ही है। संसार और परमात्मा दो नहीं हैं। संसार में भी वही समाया हुआ है। अगर तुम गहरी खोज करोगे, प्राणपण से खोज करोगे तो उसे पा लोगे। बाहर भी वही विराजमान है। लेकिन बाहर पाने के पहले उसे भीतर पा लेना आवश्यक है। नहीं तो बाहर पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि भीतर तुम्हारे बिलकुल निकट है। वहां पाना मुश्किल हो रहा है तो बाहर तो दूर हो गया; यात्रा करनी पड़ेगी। पहले भीतर उसकी झलक। पहले अपने भीतर उससे मिलन, फिर सबके भीतर उससे मिलन होने लगता है।
और इसे कल पर मत टालो। क्षत्रिय बनो। पलटू कहते हैं: राजपूत बनो। इसे कल पर मत टालो। कल का क्या भरोसा? कल तुम हो, न हो। कल तुम्हें जगाने वाला हो, न हो। कल यह सत्संग चले, न चले। कल पर मत टालो। जो करना है, आज कर लो, अभी कर लो।
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?
मगर आदमी बड़ा उलटा है। इस बात के भी बड़े उलटे अर्थ ले लेता है।
मैंने सुना, मुल्ला नसरुद्दीन की दुकान में अड़चन थी, दफ्तर में कठिनाई थी। किसी मनोवैज्ञानिक से उसने पूछा कि क्या करूं, कोई काम ही नहीं करता! तो उसने कहा: तुम यह तख्ती टांग दो अपने दफ्तर में ले जाकर:
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?
यह तख्ती टांग दो। इससे जरा बोध आएगा।
पांच-सात दिन बाद गया मनोवैज्ञानिक अपनी फीस की तलाश में। मुल्ला को बैठा देखा, सिर पर पट्टी बंधी है, हाथ-पैर पर पलस्तर चढ़ा है। बड़ा उदास। दुकान भी कुछ टूटी-फूटी हालत में। पूछा कि नसरुद्दीन, क्या हुआ? परिणाम नहीं हुआ तख्ती का?
नसरुद्दीन ने कहा: परिणाम हुआ। यह देख रहे हो परिणाम! परिणाम हुआ। वह जो खजानची था मेरा, लेकर भाग गया सब। काल करै सो आज कर! वह जो मेरा मैनेजर था टाइपिस्ट को उड़ा कर नदारद हो गया। और वह जो मेरा दरबान था, उसने मेरा सिर खोल दिया। पता चलाने पर पता चला कि दरबान सदा से सोचता था कि कब इसका सिर खोल दूं। जब उसने यह तख्ती देखी, उसको बोध आया। उसने सोचा, यह बात तो सच है; कल अगर प्रलय हो गई तो फिर कब करोगे! तो कर ही लो। जो निबटाना है निबटा ही दो। यही परिणाम हुआ। आपकी सलाह का बड़ा गजब का परिणाम हुआ। दुकान चौपट है। फीस लेने शायद आप आए हैं, हम ही चले चलते हैं आपके घर, क्योंकि अब और कुछ फीस नहीं है।
आदमी ऐसा ही है। गलत को तो अभी कर लेता है; सही को कल पर टाल देता है। चोरी करनी हो तो अभी। क्रोध करना हो तो अभी। जब तुम्हें कोई गाली देता है तो तुम यह नहीं कहते कि कल करूंगा क्रोध, सोचूंगा, विचारूंगा, पत्नी-बच्चों से भी सलाह लूंगा, कल करूंगा क्रोध। जब तुम्हें क्रोध करना होता है तब तुम अभी करते हो। किसी की हत्या करनी होती है तो अभी करते हो। और जब तुम्हें जीवन में कुछ शुभ का भाव उठता है, उमंग उठती है--संन्यास लेना, कि ध्यान करना, कि प्रार्थना में उतरना--तो तुम सोचते हो, सोचेंगे। सोचने का मतलब होता है टालोगे। टालने का मतलब होता है हिम्मत नहीं है।
तो जो करना हो उसे कर लो। परमात्मा में रस है तो खोजो। और मैं तुमसे यह कहे देता हूं: कम से कम मेरे पास उठने-बैठने वाले सत्संगियों को तो भूल कर भी यह भेद नहीं खड़ा करना चाहिए संसार और परमात्मा का। यह दो की बात ही नहीं उठानी चाहिए। मैं तो कहता हूं एक ही है। यह संसार भी उसी का है। संसार में भी वही छिपा है। अगर थोड़ी मेहनत करोगे तो वहां भी उसी को पाओगे। मगर वहां मेहनत करके पा सकोगे, बड़ी कठिन होगी बात। अपने भीतर सुगमता से पा लोगे। पहले भीतर साक्षात्कार कर लो, फिर बाहर हो जाएगा।
और कल पर टालो ही मत।
आज जी भर कर देख लो तुम चांद को
क्या पता यह रात फिर आए न आए
दे रहे लौ स्वप्न भीगी आंख में
तैरती हो ज्यूं दीवाली धार पर
ओंठ पर कुछ गीत की लड़ियां पड़ीं
हंस पड़े जैसे सुबह पतझार पर
पर न यह मौसम रहेगा देर तक
हर घड़ी मेरा बुलावा आ रहा
कुछ नहीं अचरज अगर कल ही यहां
विश्व मेरी धूल तक पाए न पाए
आज जी भर कर देख लो तुम चांद को
क्या पता यह रात फिर आए न आए।

ठीक क्या किस वक्त उठ जाए कदम
काफिला कर कूच दे इस ग्राम से
कौन जाने कब मिटाने को थकन
जा सुबह मांगे उजाला शाम से
काल के अद्वैत अधरों पर धरी
जिंदगी यह बांसुरी है चाम की
क्या पता कल श्वास के स्वरकार को
साज यह आवाज यह भाए न भाए
आज जी भर देख लो तुम चांद को
क्या पता यह रात फिर आए न आए।

यह सितारों से जड़ा नीलम नगर
बस तमाशा है सुबह की धूप का
यहां बड़ा-सा मुस्कुराता चंद्रमा
एक दाना है समय के सूप का
है नहीं आजाद कोई भी यहां
पांव में हर एक के जंजीर है
जन्म से ही जो पराई है मगर
सांस का क्या ठीक कब गाए न गाए
आज जी भर देख लो तुम चांद को,
क्या पता यह रात फिर आए न आए।

स्वप्ननयना इस कुमारी नींद का
कौन जाने कल सबेरा हो न हो
इस दीये की गोद में इस ज्योति का
इस तरह फिर से बसेरा हो न हो
चल रही है पांव के नीचे धरा
और सर पर घूमता आकाश है
धूल तो संन्यासिनी है सृष्टि से
क्या पता वह कल कुटी तक छाए न छाए
आज जी भर देख लो तुम चांद को
क्या पता यह रात फिर आए न आए।

हाट में तन का पड़ा मन का रतन
कब बिके किस दाम पर अज्ञात है
किस सितारे की नजर किसको लगे
ज्ञात दुनिया में किसे यह बात है
है अनिश्चित हर दिवस हर एक क्षण
सिर्फ निश्चित है अनिश्चितता यहां
इसलिए संभव बहुत है, प्राण
कल चांद आए चांदनी लाए न लाए
आज जी भर देख लो तुम चांद को
क्या पता यह रात फिर आए न आए।
एक-एक क्षण बहुमूल्य है; उसे क्षुद्र में मत गंवाओ। एक-एक क्षण बहुमूल्य है; उसे कौड़ियां, कंकड़-पत्थर, शंख-सीपी बीनने में मत लगाओ।
यह एक-एक क्षण परमात्मा का अनुभव बन सकता है।
यह एक-एक क्षण समाधि बन सकता है।
और ध्यान रहे, उसी की तलाश है। संसार में भी तुम उसी को खोज रहे हो। जहां भी कोई खोज रहा है, उसी को खोज रहा है। जान कर खोजो, अनजान खोजो--उसी की खोज चल रही है। जाग कर खोजो, सोए खोजो--उसी एक की तलाश और टटोल चल रही है। रस तो एक ही है: रसो वै सः! उस परमात्मा का ही रस!
इस बात के प्रति जैसे-जैसे तुम जागरुक होते जाओगे, वैसे-वैसे तुम पाओगे: बाजार तो रहा लेकिन बाजार न रहा; दुकान तो रही, लेकिन दुकान न रही; परिवार तो रहा, लेकिन परिवार न रहा। पहले जैसा कुछ भी न रहा। सब बदल गया। तुम बदले कि सब बदला। दृष्टि बदली कि सृष्टि बदली।
तुम्हारी आंख का ही सारा खेल है। और आंख का ही संन्यास है। आंख का ही संसार है। आंख का एक ढंग--संसार; आंख का दूसरा ढंग--संन्यास। ऐसा सोच कर जो चलता है कि परमात्मा के अतिरिक्त कोई रस है, वह संसारी। और ऐसा सोच कर जो चलने लगा कि परमात्मा ही एकमात्र रस है, वही संन्यासी।

आज इतना ही।

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