PALTUDAS

Ajhun Chet Ganwar 12

Twelth Discourse from the series of 21 discourses - Ajhun Chet Ganwar by Osho. These discourses were given during JUL 21 - AUG 10 1977.
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पहला प्रश्न:
भगवान, कभी आप कहते हैं, ‘भीतर के भाव से जीओ’ और कभी कहते हैं, ‘जीवन जो कुछ लाए उसके साथ तथाता में जीओ, सर्व-स्वीकार के साथ जीओ।’ भीतर का छंद और बाहर की स्थिति दोनों हमेशा एक कैसे रह सकते हैं? कृपापूर्वक मार्गदर्शन करें।
अस्तित्व एक है; बाहर-भीतर में कोई भेद नहीं है। जिसे तुम बाहर कहते हो, भीतर से जुड़ा है--अखंड। जिसे तुम भीतर कहते हो, बाहर से जुड़ा है। ऐसे ही जैसे तुम्हारे घर का दरवाजा है; घर के भीतर का आकाश है और घर के बाहर का आकाश है--पर दोनों अलग नहीं। और तुमने जो दीवालें उठा कर अलग कर रखा है, वे दीवालें तुम्हारी बनाई हुई हैं। और उन दीवालों से आकाश खंडित नहीं होता।
आकाश को काटने का उपाय नहीं है; न तलवार से कटता है, न दीवाल से कटता है। खंड आकाश के किए नहीं जा सकते। जैसा आकाश है, ऐसी ही आत्मा है। बाहर और भीतर--एक ही। यह तो देह की दीवाल है, जिससे बाहर और भीतर का हमें सवाल उठता है। मगर देह की दीवाल से कुछ खंडन नहीं होता।
तो खयाल रखो, जब मैं कहता हूं भीतर के छंद से जीओ और जब मैं कहता हूं बाहर की परिस्थिति को स्वीकार करके जीओ, अस्वीकार न करो--तो दोनों में कुछ विरोध नहीं है। और अगर समझोगे तो दोनों ही बातों में जो मैं कह रहा हूं वह एक ही बात कह रहा हूं। वह बात यह है: अहंकार से मत जीओे। मैं अलग हूं, इस भाव से मत जीओे। मैं अलग हूं, यह भाव गिर जाए, तो फिर भीतर और बाहर में क्या भेद! मैं गया कि दीवाल गई। मैं गया कि सीमा गई। यह मैं की ही सीमा है जो हमने खींच रखी है।
मगर हम सीमाओं में बड़ा भरोसा करते हैं। हिंदुस्तान की सीमा पाकिस्तान की सीमा हमने खींच रखी है; जमीन पर कहीं भी नहीं है, नक्शे पर है। नक्शे झूठे हैं। आदमी के बनाए हुए हैं। लेकिन नक्शों पर हमारा बड़ा भरोसा है। नक्शों के लिए हम मरते हैं, मारते हैं; जमीन की तरफ नहीं देखते। जमीन की तो छोड़ दो, आकाश भी बांटा हुआ है। हिंदुस्तान का आकाश अलग, पाकिस्तान का आकाश अलग।
जैसे नक्शे पर हमने जमीन बांट ली है, ऐसे ही हमने विचार में परमात्मा को बांट लिया है--मेरा, तेरा; बाहर का, भीतर का। लेकिन ये सारे विभाजन और रेखाएं जो हमने खींची हैं, झूठी हैं। इन रेखाओं का झूठ दिखाई पड़ जाए तो यह खो जाती हैं। तब तुम हंसोगे। कौन बाहर, कौन भीतर! एक ही विराजा है।
तो या तो बाहर से शुरू करो या भीतर से। यह तो शुरू करने के लिए दो बातें मैं तुमसे कहता हूं। क्योंकि कुछ लोग बहिर्मुखी हैं। भीतर की बात उनकी समझ में नहीं पड़ती। भीतर यानी क्या? भीतर का द्वार ही भूल गए हैं। अपने घर के बाहर इतने दिन रह लिए हैं कि घर के भीतर भी जा सकते हैं, इसकी उन्हें याद नहीं रही, विस्मरण हो गया है। उनके लिए बाहर का कहता हूं। उनसे कहता हूं: बाहर जो परिस्थिति हो, उसके साथ तथाता। बहिर्मुखी, जिसको जुंग ने एक्सट्रोवर्ट कहा है, उसके लिए बाहर के साथ तथाता। बाहर भी परमात्मा है। उसके साथ एकात्मभाव, संतोष; जो आए स्वीकार; जैसा आए वैसा स्वीकार। जो परमात्मा दे, धन्यवाद; जो न दे, उसके लिए धन्यवाद। बाहर के साथ परम एकरसता। यह बहिर्मुखी के लिए परमात्मा में पहुंचने की बात है।
कुछ हैं, जो अंतर्मुखी लोग हैं; जो मुश्किल से ही आंख खोल पाते हैं; जिनका जगत वस्तुतः भीतर है। वे तभी मस्त होते हैं, जब आंख बंद होती है। ये जो अंतर्मुखी लोग हैं, इनसे अगर बाहर की बात कहो, इन्हें समझ में न आएगी। वह भाषा इनके लिए अपरिचित है। तो ये भीतर डूबें हैं। इसलिए दोनों बातें कहता हूं। भीतर के छंद में डूब जाओ या बाहर के छंद से एक हो जाओ।
तुमने सुना होगा तो तुम्हें अड़चन हुई होगी कि ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं। बाहर की परिस्थिति और भीतर का छंद साथ-साथ चलेगा कैसे? कभी हो सकता है, भीतर का छंद कहीं जाए और बाहर की परिस्थिति कहीं जाए, तो तनाव पैदा हो जाएगा। ऐसा कभी हुआ ही नहीं है। बाहर और भीतर में कोई विरोध नहीं है। यह तो तुम हो, तुम्हारी मौजूदगी है, जो विरोध खड़ा कर रही है। जगत परम आनंद से भरपूर है। यह तो तुम हो, जो दुखी हो। दुख तुम्हारी साधना से पैदा हो रहा है। तुम बड़ी साधना कर रहे हो दुख पैदा करने के लिए।
मेरी बात सुनोगे तो तुम चौंकोगे, क्योंकि मैं निरंतर यही कहता हूं: आनंद स्वभाव है; दुख को पैदा करना पड़ता है। बीमारी लानी पड़ती है; स्वास्थ्य है। जब तुम स्वस्थ होते हो तब तुम डॉक्टर के पास नहीं जाते--पूछने कि मैं स्वस्थ क्यों हूं? क्यों का प्रश्न नहीं उठाते। यह भी नहीं पूछते कि स्वास्थ्य किसका मुझे लग गया है? यह कहां से आ गया? तुम स्वास्थ्य को स्वीकार करते हो, कि स्वास्थ्य प्राकृतिक अवस्था है; न तो किसी से लगता, न कहीं से आता--है। वही शब्द का अर्थ भी होता है--‘स्वास्थ्य’ का। स्वास्थ्य का अर्थ होता है ‘स्व’ में स्थित। अपने भीतर मौजूद है। यह शब्द बड़ा बहुमूल्य है। बीमारी बाहर से। बीमारी विजातीय है। बीमारी परदेसी है। बीमारी कीटाणुओं के सहारे आती है। बीमारी की संक्रामकता होती है। स्वास्थ्य! स्वास्थ्य है। रोग आता है, निरोगता आती नहीं।
ठीक ऐसा ही आनंद और दुख। जो आनंदित है, वह नहीं पूछता कि मैं आनंदित क्यों हूं? तुमने कभी पूछा यह प्रश्न? जब तुम आनंदित होते हो, क्या तुम पूछते हो मैं आनंदित क्यों हूं? यह प्रश्न असंगत होगा। यह अर्थहीन होगा। न तुम पूछते हो, न तुम सोचते हो। जब तुम आनंदित हो, तब तुम सहज स्वीकार करते हो। प्रश्न तो तब उठता है जब तुम दुखी हो। तब तुम पूछते हो: मैं दुखी क्यों हूं? प्रश्न इसलिए उठता है कि कुछ घट रहा है जो नहीं घटना चाहिए। प्रश्न इसीलिए उठता है कि कुछ अघट घट रहा है। प्रश्न की सार्थकता यही है कि कुछ अस्वाभाविक घट रहा है। प्रश्न हम अस्वाभाविक के संबंध में पूछते हैं; स्वाभाविक के संबंध में नहीं पूछते।
सुबह सूरज उगता है, हम नहीं पूछते: क्यों? सांझ सूरज डूबता है, हम नहीं पूछते: क्यों? एक रात, आधी रात में सूरज उग आए तो हम जरूर पूछेंगे: क्यों? एक दिन भर दोपहरी में सूरज डूब जाए तो हम जरूर पूछेंगे: क्यों? क्यों का प्रश्न ही तब उठता है जब कुछ घटता है जो नहीं घटना चाहिए था।
आनंद सहज दशा है। यह सारा जगत आनंद से भरा है। तुम दुख पैदा करते हो। और तुम्हारे दुख पैदा करने का जो पहला आधार है, वह अहंकार है। मैं हूं--बस तुम सिकुड़े। मैं हूं कि तुम छोटे बने। कहां विराट थे, जब मैं का भाव नहीं होता, तब यह सारा अस्तित्व तुम्हारा है; यह सारा आकाश तुम्हारा है। जैसे ही मैं-भाव आया, तुम छोटे हो गए, दीन हो गए, क्षुद्र हो गए। इस छोटी सी देह में बंध गए। देह में भी जिनको लगता है काफी बड़े हैं, वह छोटी सी खोपड़ी में समा गए हैं। बस उनकी खोपड़ी में ही उनका मैं रहने लगा। इतनी छोटी जगह में इतने विराट को समाने की कोशिश करोगे, दुख न पैदा होगा तो क्या होगा? असंभव को करने की कोशिश कर रहे हो। फिर शिकायतें उठती हैं।
कल मैं एक गीत पढ़ता था:
क्या मिला तुमको बना मुझको अनाश्रित दीन यों,
चाटते अरमान अपना ही लहू रहते सदा
आमरण जैसे विषम संघर्ष ही संपूर्ण है
एक क्षण का भी नहीं विश्राम प्राणों को बदा
क्या विफलता ही हुई साकार मेरे जन्म में?
व्यर्थता ही व्यर्थता मेरी समूची संपदा?
क्या मिला तुमको भला देकर मुझे इतनी जलन?
जो अभावों से भरा जीवन जलाए जा रही
क्यों बना दी जिंदगी मेरी दहकती मरुधरा?
एक जल की क्षीण धारा भी नहीं जिसमें बही
स्वप्न तो इतने दिए, जिनकी पूरन की बात क्या
बात भी जिनके दहन की थी कभी वश की नहीं
क्या मिला मुझको बना निरुपाय निःसंबंध निपट?
एक भी विश्वास मेरा जी न पाया दो घड़ी,
एक पल भी राही न जीवन के कठिन पथ पर मिला
दृष्टि जिसकी ठोकरों से तर-बतर मुझ पर पड़ी
क्या मिला तुमको समय की रेत पर जो रह गई,
लाश मेरी चिर-उपेक्षित साधना की अध-घड़ी?
क्या विफलता ही हुई साकार मेरे जन्म में?
व्यर्थता ही व्यर्थता मेरी समूची संपदा?
क्या मिला तुमको? क्या मिला मुझको? अनाश्रित दीन यों मुझको बना!
यह जो सभी के मन में यह भाव उठता है कि परमात्मा को क्या मिला, जो हमें ऐसा दुखी बना दिया? क्यों इतना दीन? कितना असहाय! क्यों ऐसी अंधेरी रात हमारे चारों तरफ पैदा कर दी? यह अमावस हमारे प्राणों में क्यों रख दी? क्या मिला?...लेकिन स्मरण रहे, यह शिकायत भ्रांत है। यह अमावस तुम्हारी पैदा की हुई है। परमात्मा ने तो जलता सूरज तुम्हारे भीतर रखा है। यह अमावस तुमने बड़ी मेहनत से इकट्ठी की है; जन्मों-जन्मों की साधना इसमें लगी है।
जन्मों-जन्मों में गलत को, गलत को करते-करते जीते-जीते तुम अंधेरे को किसी तरह पैदा कर पाए हो। अंधेरे को पैदा करना तुम्हारी बड़ी सफलता है।
इसलिए संतों ने कहा है: तुम जिस दिन असफल हो जाओगे, उसी दिन दुख के बाहर होओगे। तुम्हें जब तक सफलता मिल रही है तब तक दुख रहेगा; क्योंकि हर सफलता तुम्हारे अहंकार को और मजबूत कर जाती है। थोड़ा और धन आ गया, अहंकार और अकड़ गया। थोड़े और बड़े पद पर पहुंच गए, अहंकार और अकड़ गया। थोड़ा और यश मिल गया, अहंकार और अकड़ गया। तुम्हारी हर सफलता तुम्हारी विफलता है।
तुम हारो! तुम पूर्ण रूप से हारो तो दुख समाप्त हो जाए। क्योंकि तुम्हारी हार में ही अहंकार गिर सकता है। हार में ही अहंकार विसर्जित हो सकता है। तुम्हारी जीत में तो तुम कैसे अहंकार को विसर्जित करोगे? जीतते आदमी को तो धर्म में रस नहीं होता। जीतते आदमी को परमात्मा में रस नहीं होता। जीतते आदमी को प्रार्थना में रस नहीं होता। जीतते आदमी को ध्यान की तरफ कोई रुचि पैदा नहीं होती। जीत रहा है! हां, जब हारने लगता है, पैर डगमगाने लगते हैं, जब मौत करीब आने लगती है और लगता है अब गया तब गया, तब सोचता है हारा हुआ आदमी।
हार तुम्हारा सौभाग्य है। जितनी जल्दी हार जाओ, उतना तुम्हारा सौभाग्य। क्योंकि हार से एक नई यात्रा शुरू होती है।
हार का अर्थ है: मेरे किए कुछ भी नहीं हो रहा। थक कर गिर जाते हैं। जिस क्षण तुम थक कर गिरते हो, उसी क्षण तुम चकित हो जाते हो, चौंक कर अवाक रह जाते हो। क्योंकि तुम्हारे किए जो हो रहा था, या नहीं हो रहा था, वह दुख ही था। हार कर गिरते ही तुम पाते हो परम आनंद है। हार में बड़ा गहरा विश्राम है।
हारे को हरिनाम! जैसे ही आदमी हारा कि हरिनाम पैदा होता है। यह उक्ति बड़ी अपूर्व है: हारे को हरिनाम! किस हार की बात है? इस अहंकार के हार की बात है। यह अहंकार है, जो बाहर और भीतर को अलग कर रहा है। थोड़ी देर को सोचो। थोड़ी देर को विमर्ष करो। थोड़ी देर को शांत बैठ कर सोचो मैं नहीं, फिर कौन बाहर कौन भीतर! फिर कैसे विभाजन करोगे? फिर तुम कहां हो, जो विभाजन करे? फिर तो घर गिर गया, खंडहर हो गया। फिर तो आकाश बाहर-भीतर का मिल गया। फिर तो ऐसा समझो कि घड़ा था मिट्टी का, फूट गया, तो जल बाहर था, जल भीतर था--एक हो गया।
इस एकता को लाने के दो उपाय हैं; या तो घड़े को बाहर से तोड़ो या घड़े को भीतर से तोड़ो। दो ही उपाय हो सकते हैं। या तो बाहर से चोट करो घड़े पर। अगर बहिर्मुखी हो तो बाहर से चोट करो। अगर अंतर्मुखी हो तो भीतर से चोट करो। कहीं से भी चोट करो, घड़ा टूटना चाहिए। घड़ा बनाने की जो कला है, वही घड़ा तोड़ने की भी कला है।
तुमने कभी कुम्हार को देखा घड़े को बनाते? चाक पर घड़े को चढ़ा देता है, फिर क्या करता है? एक हाथ को भीतर रखता है घड़े के, एक हाथ को बाहर रखता है घड़े के। इन दो हाथों की चोट से घड़े को बनाता है। भीतर के हाथ से सम्हालता है, बाहर के हाथ से थपकारता है--ऐसे घड़े की दीवाल उठती है। जो घड़े को बनाने की प्रक्रिया है, वही घड़े को तोड़ने की भी प्रक्रिया है। या तो बाहर से तोड़ो या भीतर से तोड़ो।
जो लोग भीतर की बात नहीं समझ पाते, वे बाहर परमात्मा को देखें--इन वृक्षों में, चांद-तारों में, आकाश में, बादलों में! इतना सुंदर जगत चारों तरफ फैला है! इससे थोड़ी मुलाकात करो। इससे थोड़े संबंध बनाओ। इसके संग थोड़े बहो, नाचो, गुनगुनाओ। जब पक्षी गाते हों, तुम भी गाओ। और जब वृक्ष हवाओं में नाचने लगें तो तुम भी नाचो। और जब नदी उमंग से भरी सागर की तरफ जाती हो, तब तुम भी थोड़े बहो। इस बाहर के परमात्मा से थोड़ा संग-साथ करो। यहां से भी घड़ा टूट जाएगा। जिस दिन संग-साथ हो जाएगा...कभी-कभी आ जाएगी घड़ी अचानक तुम पाओगे: देखते-देखते, सूरज को उगते, कुछ तुम्हारे भीतर भी उग गया। देखते-देखते धारा को बहते, कुछ तुम्हारे भीतर से बह गया, देखते-देखते आकाश में शुभ्र बादल को बिखरते, कुछ तुम्हारे भीतर बिखर गया। क्षण भर को झलक मिलेगी; कौंध जाएगी रोशनी, बिजली कौंधेगी। क्षण भर को लगेगा: कोई सीमा नहीं है--सब असीम है; विराट है, विभु है; न मैं हूं, न तू है। स्वाद आएगा। एक बूंद अमृत की टपकी। रास्ता बना। फिर बड़े घूंट आते ही हैं। फिर जल्दी ही वर्षा भी होगी।
अगर बाहर अड़चन मालूम पड़ती है तो कुछ उदास होने की जरूरत नहीं है--भीतर। स्त्रियों के लिए, जिनके पास स्त्रैण चित्त है, उनके लिए, जिनके पास निष्क्रिय चेतना है, उनके लिए आंख बंद करके भीतर ही खोजना उचित है। जिनके पास पुरुष चित्त है, आक्रामक, जो बाहर को विजय करने निकले हैं, उन्हें बाहर ही खोजना उचित है।
पश्चिम के तीनों धर्म--यहूदी, ईसाइयत, इस्लाम--तीनों बहिर्मुखी हैं। पूरब के तीन बड़े धर्म--हिंदू, बौद्ध, जैन--तीनों अंतर्मुखी हैं। पश्चिम बहिर्मुखी है। इसलिए तो पश्चिम ने विज्ञान का इतना विकास किया। इतने सुंदर मकान बनाए, इतने यंत्र बनाए, इतनी सुख-संपदा पैदा की। बाहर का खूब विकास किया। पूरब ने बाहर को तो दरिद्र छोड़ दिया, बाहर में तो कुछ विकास हुआ नहीं; लेकिन भीतर बड़े फूल खिले। अब वे फूल ऐसे हैं कि बाहर से तो दिखाई भी नहीं पड़ते। अगर कोई सौ मंजिल ऊंचा मकान खड़ा कर देता है तो दुनिया को दिखाई पड़ेगा।
हमने बुद्ध खड़े किए हैं; देखने वाले को ही दिखाई पड़ेगा, दुनिया को दिखाई नहीं पड़ सकता। जो बुद्ध के अंतर्तम में प्रवेश कर सकेंगे, उनको दिखाई पड़ेगा। यह भी शिखर है--आकाश को छूने वाला शिखर है। मगर यह आंतरिक है। यह ज्योतिर्मय है। यह सूक्ष्म है; स्थूल नहीं है। इसे बाहर से टटोल कर नहीं देखा जा सकता। जो बाहर से देखेंगे, उन्हें तो सौ मंजिल का मकान दिखाई पड़ेगा। बुद्ध तो दरिद्र-भिखारी मालूम पड़ेंगे। जो भीतर से देखेंगें, वे पाएंगे कि सौ मंजिल के मकान के भीतर जो रह रहे हैं, सब दरिद्र हैं--सौ मंजिल के मकान में रहो कि दो सौ मंजिल के मकान में रहो। वह तुम्हारे दो सौ मंजिल का मकान सिवाय कबूतरों के छोटे-छोटे डबरों के और कुछ भी नहीं है। रहने वाला आदमी दरिद्र है। उसे बुद्ध में दिखाई पड़ेगी अपूर्व संपदा।
पूरब अंतर्मुखी है; स्त्रैण है। पश्चिम बहिर्मुखी है; पौरुषेय है। मगर पूरब में भी पुरुष हैं। और पश्चिम में भी स्त्रियां हैं। और पूरब में भी वे लोग हैं जो दौड़ कर पाना चाहते हैं। और पश्चिम में भी वे लोग हैं जो बैठ कर पाना चाहते हैं।
जीसस का वचन है: खोजो--और मिलेगा। खटखटाओ--और द्वार खुलेंगे।
लाओत्सु का वचन है: खोजा--खो जाएगा। मांगा--फिर न मिलेगा। रुको, ठहर जाओ। बैठ जाओ। आंख बंद कर लो। विश्राम में डूब जाओ। जिसने नहीं खोजा, उसे मिला। जो खो गया, उसे मिला।
यह अंतर्मुखता की बात है। कुछ करने से नहीं मिलेगा--अकर्म में उतर जाने से मिलेगा। शून्य भाव में बैठ जाने से मिलेगा।
मैं दोनों ही बातें कहता हूं, क्योंकि दोनों ही तरह के लोग यहां हैं। तुम चुन लो। परिणाम एक है। अंततः सिद्धि एक है। ये दो द्वार हैं परमात्मा के। जहां से मौज हो, वहां से प्रवेश कर जाओ। और एक से प्रवेश किए तो दूसरा अपने आप हो जाने वाला है। क्योंकि जिस भवन में प्रवेश करोगे, वह वही है। कैसे तुम आए--दौड़ कर आए कि रुक कर आए; पुरुष की तरह आए कि स्त्री की तरह आए; प्रार्थना करते आए कि ध्यान करते आए; आंख खोल कर आए कि आंख बंद करके आए--इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
आ गए, तब स्वाद एक है। और एक सध जाए तो दूसरे को तुम पाओगे अनायास सध रहा है। भीतर के छंद में डूब जाओ, तो तुम हैरान हो जाओगे, चमत्कृत हो जाओगे कि जैसे तुम भीतर के छंद से जीने लगे, बाहर की परिस्थितियां उसके अनुकूल होने लगीं। यह सारा जगत तुम्हें साथ देने को तत्पर है।
देखो, तुम जब दुखी होना चाहते हो, तब भी यह साथ देता है। कहते हैं न, तुम जब दुख चाहते हो तो सब तरफ तुम्हें कांटे दिखाई पड़ने लगते हैं और तुम जब सुख चाहते हो और सुखी होना चाहते हो, तब सब तरफ फूल खिल जाते हैं। तुम्हारी दृष्टि बदलती है और यह सारा जगत रूपांतरित हो जाता है।
जिस आदमी को दुख खोजना है, वह दुख खोज लेगा। खूब अवसर हैं दुख खोज लेने के। वह हर सुख के अवसर में से भी दुख को निचोड़ लेगा। और जिसे सुख खोजना है, वह भी...खूब अवसर हैं उसे भी...वह हर अवसर में से सुख निचोड़ लेगा--दुख में से भी सुख निचोड़ लेगा। उनकी दृष्टियां अलग होती हैं। पहले तरह का आदमी जाकर खड़ा होता है गुलाब की झाड़ी के पास, कांटे गिनता है; उसे दुख खोजना है। कांटे भी हैं। दूसरा आदमी जाता है गुलाब की झाड़ी के पास, फूल गिनता है; फूल भी हैं। गुलाब की झाड़ी में सब है। परमात्मा बाहर भीतर दोनों तरह है। तुम उसे जिस रंग में देखना चाहोगे, तुम उसे जिस ढंग में देखना चाहोगे, उसी ढंग में दिखाई पड़ जाएगा। अगर तुम दुख की तरह ही जगत को लेना चाहते हो, तो खूब दुख पाओगे। और फिर तुम रोओगे, चिल्लाओगे। तुम फिर कहोगे:
क्या मिला तुझको बना मुझको अनाश्रित दीन यों
चाटते अरमान अपना ही लहू रहते सदा,
आमरण जैसे विषम संघर्ष ही संपूर्ण हैं
एक क्षण का भी नहीं विश्राम प्राणों को बदा!
क्या विफलता ही हुई साकार मेरे जन्म में
व्यर्थता ही व्यर्थता मेरी समूची संपदा!
कांटे गिनते हो, फिर रोते हो कि इतने कांटे देकर तुझे क्या मिला! और पास ही कांटों के खिला था फूल, वह नहीं देखा। जिसने बहुत कांटे गिन लिए, उसकी आंखों पर कांटों की छाया इतनी हो जाती है कि फूल दिखाई नहीं पड़ते। जिसने फूल बहुत गिने, उसमें ऐसी फूलों की मस्ती छा जाती है, ऐसी फूलों की शराब उसे घेर लेती है कि फिर कांटे कहां!
फूल देखने वाले को कांटे भी फूल हो जाते हैं। कांटे गिनने वाले को फूल भी कांटे हो जाते हैं। सारी बात दृष्टि की है।
तो जैसे ही तुम भीतर अपने छंद में डूबोगे, उसके साथ एकरस हो जाओगे। स्वाभाविक रूप से जीने लगोगे। जरा भी अस्वाभाविक होने की चेष्टा न करोगे। जो भीतर कहेगा, अंतर की जो वाणी होगी, उसके साथ ही चलोगे। सब दांव पर लगा दो। तुम अचानक पाओगे: सारा जगत तुम्हारे साथ हो गया।
कहते हैं, जब बुद्ध को ज्ञान हुआ, तो वृक्षों में असमय फूल खिल गए; सूखे वृक्ष हरे हो गए। यह कथा प्रीतिकर है। यह इतना ही कहती है कि जब तुम्हारे भीतर परमज्ञान की घटना घटेगी तो तुम्हारे लिए सूखा वृक्ष कैसे रह जाएगा! सूखे वृक्ष में हरे पत्ते आए या नहीं, इसमें मुझे बहुत जिद्द नहीं है; मगर इस काव्य के संकेत को समझना चाहिए। कुछ मूढ़ हैं, जो यह जिद्द करते हैं कि यह कैसे हो सकता है! बुद्ध को ज्ञान हुआ, इससे सूखे वृक्ष में, ठूंठ में कैसे पत्ते आ जाएंगे? बुद्ध के लिए आ गए। तुम्हारे लिए तो हरा वृक्ष भी ठूंठ है। तुमने तो हरे वृक्ष में भी पत्ते कब देखे हैं! तुम्हें याद है, कब से तुमने हरे वृक्ष नहीं देखे! तुम हरियाली देखना भूल गए हो। हरियाली की भाषा विस्मृत हो गई है। तुम्हें तो ठूंठों की भाषा रह गई है याद। तुम्हें रेगिस्तान ही रेगिस्तान दिखाई पड़ते हैं। तुम्हारी आंखें अंधी हो गई हैं सौंदर्य को देखने में। तुमने संवेदनशीलता खो दी है।
तो मैं नहीं कहता कि यह कोई वैज्ञानिक तथ्य है, कि ठूंठ हरे हो गए। मगर यह हो कैसे सकता है! जब बुद्ध ने आंखें खोली होंगी परम छंद में डूबने के बाद, सामने खड़े हुए ठूंठ में अगर हरे पत्ते दिखाई पड़े हों, तो मुझे कुछ आश्चर्य नहीं है; और अगर असमय उन्हें फूल खिले दिखाई पड़े हों तो कुछ आश्चर्य नहीं। तुम भी तो एक तरह की घटना जानते हो। फूल खिले रहते हैं और तुम्हें दिखाई नहीं पड़ते। तो इससे उलटा भी हो सकता है कि फूल न खिले हों और किसी को दिखाई पड़ जाएं। इस पर खयाल करो।
तुम निकल जाते हो, वृक्ष में फूल खिले हैं, कहां दिखाई पड़ते हैं! कहां फुर्सत! कहां सुविधा तुम्हें देखने की! तुम्हारे मन में इतने उपद्रव चल रहे हैं कि इनके साथ फूलों की संगति नहीं बैठती। फूल कहना भी चाहें कुछ तो तुम्हारे भीतर इतना कोलाहल है कि फूलों की वे फुसफुसी बातें, गुफ्तगू तुम्हें कैसे सुनाई पड़ेगी! वह धीमे-धीमे स्वर खो जाएंगे तुम्हारे नक्कारखाने में। तुम गुजर जाओगे। तुम्हारी आंखें फूल को देखेंगी और फिर भी तुम फूलों को नहीं देखोगे।
मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि जब किसी के भीतर बुद्धत्व पैदा होता है, तो उसे वहां भी फूल दिखाई पड़ते हैं, जहां अभी फूल नहीं हैं--आने को होंगे; आते होंगे; आ ही रहे हैं। उसे भविष्य भी दिखाई पड़ता है। जहां फूल थे, वे भी उसे दिखाई पड़ते हैं; उसे अतीत भी दिखाई पड़ता है। इसलिए हमने कहा है कि बुद्धपुरुषों को तीनों काल दिखाई पड़ते हैं--त्रिकालज्ञ। मैं इसका जैसा अर्थ लेता हूं, वह यही है। जो फूल नहीं थे, वे भी दिखाई पड़ रहे हैं; जो होंगे और वे भी दिखाई पड़ रहे हैं; जो समय की धारा में खो गए हैं--कभी थे। फूल ही फूल से जगत भर जाता है। सुगंध ही सुगंध से जगत भर जाता है।
बुद्ध ने कहा है कि जिस दिन मैं ज्ञान को उपलब्ध हुआ, मेरे साथ सारा जगत समाधि को उपलब्ध हो गया। इस वक्तव्य की बड़ी महिमा है: मेरे साथ सारा जगत समाधि को उपलब्ध हो गया! निश्चित ही यह वक्तव्य तथ्यगत नहीं है, क्योंकि तुम अभी बैठे हो। तुम कहोगे कि यह बात तो सरासर झूठ है। और कोई हुआ हो न हुआ हो, लेकिन एक बात तो पक्की है कि मैं नहीं हुआ, अभी मैं कहां संबुद्ध हुआ, अभी मुझे कहां बोधि फली! तो बुद्ध की बात असिद्ध करने को मैं अकेला ही काफी प्रमाण हूं। और बुद्ध कहते हैं कि मेरे साथ सारा जगत बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया।
और बुद्ध ठीक कहते हैं। और अच्छा हो कि तुम जिद्द मत करो। बुद्ध बिलकुल ठीक कहते हैं। मगर यह भाषा बड़ी ऊंचाइयों की है। बुद्ध यह कह रहे हैं कि जिस क्षण मैं जागा, मैंने उस दिन देखा कि सभी जागरण को अपने भीतर लिए बैठे हैं। सबके भीतर दीया जला है; उन्हें पता हो या न पता हो। तुम बुद्ध हो; तुम्हें पता हो या न पता हो। बुद्ध को तो पता है।
ऐसा ही समझो कि तुम यहां बैठे हो, तुम्हें नहीं दिखाई पड़ता कि तुम्हारी जेब में हीरा पड़ा है, मुझे दिखाई पड़ता है। तुम तो कहते हो कि मैं भिखमंगा, मैं दीन-दरिद्र और मैं कहता हूं: जब से मैंने अपना हीरा देखा, तब से तुम्हारी जेब में पड़ा हीरा भी मुझे दिखाई पड़ने लगा। हीरा अपने भीतर क्या देखा, अब जहां भी कहीं हो वहीं दिखाई पड़ने लगा। अब मैं हीरे की भाषा समझने लगा। तुम कहते हो: मेरे पास हीरा! आप भी कहां की बातें कर रहे हैं! मेरे पास कुछ नहीं है; मैं भीख मांगने निकला हूं, मैं भिखमंगा हूं!
यह हीरा ऐसा है कि इसे देखने के लिए पारखी की आंख चाहिए। बुद्ध ठीक कहते हैं कि मेरे साथ सारा अस्तित्व बोध को उपलब्ध हो गया है। उस घड़ी मैंने जाना कि सभी बुद्ध हैं--कुछ सोए हुए, कुछ जागे हुए; कुछ को पता चल गया, कुछ को पता नहीं है।
पर इससे क्या फर्क पड़ता है? अमीर आदमी सोया हो तो भी अमीर होता है; जागा हो तो भी अमीर होता है। सम्राट सो जाए तो भी सम्राट होता है; जागा हो तो भी सम्राट होता है। हालांकि यह हो सकता है कि सम्राट सो कर, हो सकता है, भिखारी का सपना देख रहा हो; लेकिन इससे भिखारी नहीं हो जाता।
तुम्हारे भीतर जब छंद जम जाता है...देखा न, संगीतज्ञ साज को बिठाते हैं, ठोक-ठाक करते हैं, तबला, तार कसते हैं--ऐसे ही जब तुम्हारे भीतर तुम अपने तबलों को ठोक-ठाक कर, तार को कस कर, साज को बिठा लेते हो; जब तुम्हारे भीतर संगीत का जन्म होने लगता है; जब तुम भीतर नाचने लगते हो, मगन हो जाते हो, मस्त हो जाते हो--तब तुम्हें अचानक दिखाई पड़ता है कि सारा जगत तुम्हारे साथ देने को तत्पर खड़ा है। सब तरफ से हाथ आ गए।
हमने इस देश में परमात्मा के हजार हाथ बनाए हैं--इसीलिए। बड़ी प्यारी धारणा है। दो हाथ का परमात्मा किस-किस को सहारा देगा! इतनों को सहारे की जरूरत है! उसके हमने हजार हाथ बनाए हैं। हजार तो प्रतीक है। उसका मतलब अनंत, अनगिनत। और हजार से ज्यादा बनाना भी कठिन था--चित्रों में, मूर्तियों में। मगर अर्थ साफ है। हम यह कह रहे हैं कि तुम एक बार जागो भर कि हजार हाथों से परमात्मा तुम्हें साथ देता है। हर तरफ से उसका हाथ तुम्हारे पास आ जाता है। उसका हाथ पास आना ही चाह रहा है; तुम भागे जा रहे हो। तुम बचते हो। तुम परमात्मा से बचाव कर रहे हो। जिस दिन तुम हाथ बढ़ाओगे, तुम अचानक पाओगे, उसका हाथ सदा से तुम्हें टटोलता था, खोजता था। तुम्हीं छिटके-छिटके, तुम्हीं भागे-भागे थे।
भीतर का छंद बैठ जाए तो बाहर से परमात्मा के हजार हाथ तुम्हें तत्क्षण उठा लेते हैं। या बाहर के जगत से छंद बैठ जाए, तथाता-भाव आ जाए, सब स्वीकार हो जाए, संतोष की दशा बन जाए--नहीं चाहिए कुछ और; जैसा है काफी है; जैसा है शुभ है; जैसा है पूर्ण है; इससे अन्यथा की कोई मांग नहीं है। जैसे हो, वैसे ही होने से परमभाव तैयार बन रहा है, बनता ही जा रहा है।
हमारे मन में हमेशा दौड़ है: धन थोड़ा ज्यादा हो जाए; पद थोड़ा बड़ा हो जाए; शरीर थोड़ा स्वस्थ हो जाए, चेहरा थोड़ा सुंदर हो जाए--कुछ न कुछ दौड़ है। कुछ हो! जैसा है काफी नहीं। कुछ और चाहिए। कुछ कमी काटती है। यह जो कमी काटती है, यही तुम्हें बाहर से नहीं जुड़ने देती है, तथाता-भाव पैदा नहीं होने देती है।
तथाता-भाव का अर्थ है: कोई कमी नहीं। और मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि कमी नहीं है। कमियां हैं, लेकिन जिसको तथाता-भाव साधना आ गया, उसके लिए कोई कमी नहीं रह जाती। अगर वह भूखा रहता है तो परमात्मा से कहता है: आज मेरी जरूरत भूखे रहने की थी। तूने मुझे भूखा रखा, तेरा धन्यवाद! अगर वह फांसी पर भी चढ़ता है तो वह धन्यवाद देता फांसी पर चढ़ता है। वह कहता है: जरूर मेरी जरूरत थी कि मेरी गरदन कटे। तेरी बड़ी कृपा कि सूली पर चढ़ा दिया। तेरी बिना कृपा के यह होता भी कैसे!
जीसस परमात्मा को धन्यवाद देते हुए सूली पर मरते हैं। मंसूर खिल-खिला कर हंसता है आकाश की तरफ देख कर। कोई पूछता है कि मंसूर, तुम हंस क्यों रहे हो? क्या पागल हो गए हो? तुम्हारे हाथ-पैर काट दिए गए हैं और तुम आकाश की तरफ देख कर क्यों हंसते हो?
और मंसूर कहता है: मैं हंसता हूं, क्योंकि मैं परमात्मा को यह कहना चाहता हूं, तू किसी भी शक्ल में आ, मैं तुझे पहचान लेता हूं। आज तू हत्यारों की शक्ल में आया है, लेकिन मुझे धोखा न दे पाएगा। मैं तुझे पहचानता हूं। ये जो लोग मेरे हाथ-पैर काट रहे हैं, तू ही है। इसलिए हंस कर मैं खबर कर रहा हूं उसे कि देख, मंसूर को तू धोखा न दे पाएगा। इस बार प्यारे तू इस ढंग से आया है कि कोई भी धोखा खा जाए, लेकिन मैं धोखा खाने वाला नहीं। मैं हंसता हूं। मैं तुझे कह देना चाहता हूं कि तेरी तरकीब काम नहीं आई। और मैं इसके पहले कि मेरी जबान काट दी जाए, कह देना चाहता हूं, इसलिए मैं हंसा हूं।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तथाता-भाव से जीने वाले आदमी को कोई कमी नहीं होगी। दूसरों को दिखाई पड़े भला, उसे दिखाई नहीं पड़ेगी। भिखमंगा होकर भी वह सम्राट होगा। कांटों में पड़ा होकर भी वह फूलों की सेज पर होगा। सूली पर भी सिंहासन पर होगा।
तथाता-भाव का यह अर्थ होता है कि अब जो भी होता है वही ठीक है। वही होना चाहिए था, वही हो रहा है।
तो अगर इतनी बाहर परितोष की भावदशा बन जाए, तो क्या तुम सोचते हो भीतर का छंद अप्रकट रह जाएगा! ऐसे संतोष की दशा में भीतर का संगीत फूट न पड़ेगा? हजार-हजार झरनों में फूट पड़ेगा! भीतर का संगीत फूटे तो परमात्मा हजार हाथ फैला देता है। और तुम परमात्मा के हाथों से राजी हो जाओ बाहर, तो भीतर का संगीत फूट पड़ता है। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वे एक ही घटना के दो हिस्से हैं।

दूसरा प्रश्न:
भगवान, मैं प्रार्थना नहीं कर पाता हूं, जैसे कोई रोक लेता है। आप मार्गदर्शन दें।
कौन रोकेगा? तुम्हारे अतिरिक्त और कोई रोकने वाला नहीं है। तुम प्रार्थना नहीं कर पाते, क्योंकि तुम झुकने को राजी नहीं हो। तुम प्रार्थना नहीं कर पाते क्योंकि सिर को सीधा रखने की जड़ आदत बन गई है।
झुकना सीखना पड़ेगा। कोई और नहीं रोकता; तुम्हारा अहंकार ही तुम्हें खींच लेता है। झिझक तुम्हारे अहंकार से आ रही है। ऐसा मत सोचो कि कोई और रोकता है। हमारी आदत है सदा किसी दूसरे पर दोष टाल देने की--कोई रोकता है, कोई शैतान रोक रहा है। कोई शैतान नहीं है।
तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा न कोई दुश्मन है और न तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई मित्र है--बुद्ध ने यही कहा है। मनुष्य ही अपना मित्र और मनुष्य ही अपना शत्रु। शत्रु--जब तुम झुकने से अपने को रोक लेते हो; मित्र--जब तुम झुकने में सहयोगी बन जाते हो।
कौन तुम्हें रोकेगा? लेकिन जिंदगी भर अगर अहंकार को साधा है, तो अचानक जाकर मंदिर में झुक न पाओगे। झुकने का तुम्हें अभ्यास नहीं है। हर जगह अकड़ कर खड़े रहे। हर जगह लड़ते रहे, संघर्ष किया।
पी जा हर अपमान, और कुछ चारा भी तो नहीं
तूने स्वाभिमान से जीना चाहा, यही गलत था
कहां पक्ष में तेरे किसी समझ वाले का मत था
केवल तेरे ही अधरों पर कड़वा स्वाद नहीं है,
सब के अहंकार टूटे हैं, तू अपवाद नहीं है।
तेरा असफल हो जाना तो पहले से ही तय था
तूने कोई समझौता स्वीकारा भी तो नहीं
कैसे तू रहनुमा बनेगा इन पागल भीड़ों का
तेरे पास लुभाने वाला नारा भी तो नहीं,
माथे से हर शिकन पोंछ दे, आंखों से हर आंसू
पूरी बाजी देख, अभी तू हारा भी तो नहीं।
यह अहंकार हारता है, हारता है; फिर भी तुमसे कहता जाता है: माथे से हर शिकन पोंछ दे, आंखों से हर आंसू। पूरी बाजी देख, अभी तू हारा भी तो नहीं। अभी कहां पूरी हार हुई है? अभी रास्ता है, अभी उपाय है; और लड़ ले। एक और दांव। एक और बाजी। शायद जीत जाए।
अहंकार आशा को फुसलाए चला जाता है।
और अपमान क्यों होता है जीवन में? क्योंकि सम्मान की आकांक्षा है।
पी जा हर अपमान, और कुछ चारा भी तो नहीं।
तुम अपने को समझाए चले जाते हो कि पी लो, क्या करोगे, मजबूरी है! मजबूरी जरा भी नहीं है। अपमान पीने की कोई भी जरूरत नहीं है। अगर तुम सम्मान की आकांक्षा छोड़ दो फिर कैसा अपमान? सम्मान की आकांक्षा चली जाए तो फिर कोई अपमान नहीं कर सकता।
लाओत्सु ने कहा है: मुझे कोई हरा नहीं सकता, क्योंकि मैं हारा ही हुआ हूं। मुझे कुछ और पीछे धकेलने का उपाय नहीं, क्योंकि मैं पहले से ही पीछे खड़ा हूं।
लाओत्सु कभी किसी सभा में जाता, बैठक में जाता, तो वहां बैठता जहां लोग जूते उतारते हैं। उसे लोग बुलाते भी कि आप भीतर आ जाएं, यहां आ जाएं। वह कहता कि नहीं, यहां मैं भला, क्योंकि यहां से मुझे हटाया न जा सकेगा। यह आखिरी जगह है। यहां शांति से बैठ सकूंगा।
यह उसकी पूरी जीवन-दृष्टि है; यह उसका पूरा जीवन-दर्शन है। इस आदमी को कैसे तुम अपमानित करोगे? जिस आदमी ने सम्मान नहीं मांगा, वह अपमान की संभावना से मुक्त हो गया। लेकिन अहंकार कहे चला जाता है कि रुको अभी, अभी प्रार्थना करने का समय कहां आया? अभी और संघर्ष कर लो। अरे, हार गए क्या?
अहंकार कहता है: तुम और झुकने जा रहे हो? यह तो तुम्हारी आदत नहीं है। यह तो कमजोरों, कायरों की बात है--यह प्रार्थना! यह तो दीन-हीनों की बात है प्रार्थना। तुम तो ऐसे नहीं। तुम तो अभी और लड़ो। तुम तो अभी और संघर्ष करो। अभी पूरी बाजी भी कहां हारे! एक टक्कर और सही। जरा रुको।
यही तुम्हें रोक लेता होगा भाव। प्रार्थना का मतलब होता है: झुकना। समर्पण, समग्र भाव से समर्पण।
चाहे कितनी तपन सहे तन, चाहे कितनी घुटन सहे मन
किंतु दर्द को ओठों पर आ जाने का अधिकार नहीं है
कण-कण में फागुनवा नाचे, खेत-खेत में सरसों फूली
अमराई में कूके कोयल, पछवा डोले भूली-भूली,
मैं हूं ऐसा फूल कि जिसको सांझ सताए, भोर रुलाए
मधुऋतु में भी मुझको तो खिल पाने का अधिकार नहीं है।
पहले तो जीना चाहा, पर जीने का आधार छिन गया,
अब तो तिल-तिल कर जलना ही सांसों का व्यापार बन गया
बहका-बहका घूम रहा है तुमसे दूर पतंगा मन का
इसको मनचाही लौ पर जल जाने का अधिकार नहीं है।
झुलसी जाती कंचन काया, धूप उम्र की बढ़ती जाती
मुरझे जाते फूल थाल के, बुझती जाती वंदन-बाती,
मंदिर का दरवाजा मूंदे, कब से तुम रूठे बैठे हो,
मेरे हाथों को सांकल खटकाने का अधिकार नहीं है।
अपने ही हिसाब से तुमने शर्तें बना ली हैं कि तुम्हें रोने का अधिकार नहीं, कि तुम्हें सांकल खटकाने का अधिकार नहीं है! किसने तुम्हें कहा? कुछ न कर सको, कम से कम रो तो सकते ही हो! प्रार्थना नहीं आती, रोना भी भूल गए? रो तो सकते हो! आंसू तो गिर सकते हैं आंखों से झर-झर! हो जाएगी प्रार्थना।
कभी घड़ी भर बैठ कर समग्र के समक्ष रो लेना।
मैं तुमसे कुछ यह भी नहीं कहता कि कोई बंधी हुई औपचारिक प्रार्थना करो--कि हिंदुओं की, कि मुसलमानों की, कि ईसाइयों की कोई प्रार्थना दोहराओ। जो प्रार्थनाएं कंठस्थ करके दोहराई जाती हैं, उनका कोई मूल्य ही नहीं है। क्योंकि वे हृदय से आती ही नहीं, कंठ से आती हैं। जो प्रार्थनाएं शब्दों में अटकी हैं, उनका कोई मूल्य नहीं है। निःशब्द-भाव की जरूरत है। यंत्रवत दोहराओ मत। वैसे तो की न की बराबर हो गई। भाव से उमगने दो।
कभी मौन ही बैठ जाओ। कुछ प्रार्थना कहने की ही बात नहीं है कि कुछ कहना ही है। कहने को क्या है। कभी सिर्फ उसके सामने मौन से बैठ जाओ। और सामने का मतलब नहीं कि काबा की तरफ मुंह करोगे, तब सामना। जहां भी मुंह किए हो, उसी के सामने हो। बस कभी बैठ जाओ। दैनंदिन उपद्रवों को थोड़ी देर को छोड़ कर बैठ जाओ। थोड़ी देर आंख बंद कर लो। थोड़ी देर हार्दिक बनो। थोड़ी देर हवा के झोंकों में झूलो। आंसू बहने लगें, बहने दो। चुप्पी रहे, ठीक। या कि कोई गीत फूट पड़े, तो गीत फूटने दो। जरूरी नहीं कि कोई महाकवि का लिखा हुआ हो, तुम्हारा अपना ही गीत फूटने दो। उसी को तो मैं कहता हूं स्वच्छंद। चलो तुतलाहट ही रहेगी तुम्हारी कविता में कोई बहुत बड़ा काव्य नहीं होगा। लेकिन तुतलाते-तुतलाते ही प्रार्थना जम जाती है।
देखते हैं यह पलटू निर्गुण बनिया! यह बेचारा तराजू ही तौलते-तौलते-तौलते, ऐसे अपूर्व वचन कह गया। कहता है: ‘मैं तो राम का मोदी! मैं तो राम का बनिया हूं।’ मगर गहरी पते की बातें कह गया। कहते-कहते, कहते-कहते बात जम गई। सभी बच्चे तुतलाने से ही शुरू करते हैं। सभी प्रार्थनाएं तुतलाहट से शुरू होती हैं। परमात्मा के सामने हम छोटे बच्चे हैं।
तुम बड़ी कुशलता मत दिखाओ। तुम कुछ बड़े विशेषज्ञ होकर प्रार्थना करने मत बैठ जाओ। तुतला तो सकते हो। परमात्मा यानी तुम्हारी मां। उसके सामने गिर भी गए, घुटने भी चल लिए, तो हर्ज तो नहीं। धूल-धूसरित, नग्न भी उसके सामने खड़े हुए तो कुछ हर्ज नहीं। तुम जैसे हो, वैसे हो, ऐसा उसे पता ही है। छिपाने की कोई बात भी नहीं है। बेसुरा सुर निकले, निकलने दो। तुम उसी के हो, वह तुम्हारे स्वर को भी स्वीकार करेगा। उसके सामने कुछ बनावट भी तो नहीं करनी है। कोई साज-श्रृंगार भी तो नहीं करना। रूखा-सूखा जो भी निवेदन हो, कर दो। इसमें बहुत ज्यादा गणित, ज्ञान जुटाने की जरूरत नहीं है।
तुम पूछते हो: ‘मैं प्रार्थना नहीं कर पाता हूं, जैसे कोई रोक लेता है।’
तुम ही रोक लेते होओेगे। तुम ऐसी प्रार्थना करना चाहते हो जैसी मीरा ने की? तुम ऐसी प्रार्थना करना चाहते हो जैसी पलटू ने की? शुरू से तो कोई भी ऐसी प्रार्थना नहीं कर सकता। छोटा बच्चा जो अभी झूले में पड़ा है, तुम जैसा नहीं चल सकता। चलते-चलते चलेगा। कई बार गिरेगा। तुम्हारा दंभ प्रार्थना में भी समाविष्ट हो जाता है कि कुछ ऊंची चीज, कोई ऊंचा स्वर निकले। तुम परमात्मा के सामने भी प्रदर्शन करने की इच्छा रखे हो। वहां तो छोड़ो। वहां तो नाटक न करो। वहां तो सहज, सरल जैसे हो...। तुतलाहट तो तुतलाहट। लड़खड़ाना तो लड़खड़ाना। घुटनो के बल सरकना तो घुटनो के बल सरकना। उसके सामने तो अपने को बिलकुल असहाय छोड़ दो; क्योंकि तुम जब असहाय होते हो, तभी उसी का सहारा मिलता है, उसके पहले नहीं मिलता। तुम जब बिलकुल असहाय होते हो, तभी उसका सहारा मिलता है। जैसे ही उसे लगा कि तुम खुद ही अपने पैर पर खड़े हो, तुम खुद ही अपने दंभ में अड़े हो उसका सहारा हट जाता है। जरूरत ही नहीं तुम्हें। सिर्फ जरूरत का निवेदन है।
और यह निवेदन भी भाषा में प्रकट करने की जरूरत नहीं, क्योंकि भगवान तुम्हारी भाषा नहीं समझता; सिर्फ एक ही भाषा समझता है, वह भाव की भाषा है।
तुमने यह बात खयाल की? दुनिया के किसी कोने में कोई हो, जब प्रेम किसी के हृदय में उमगता है तो आंखों में एक ही झलक आती है! फिर वह चाहे हिंदी बोले, चाहे चीनी बोले, चाहे जर्मन बोले। प्रेम की एक ही भाषा है। जब कोई शांत हो जाता है तो उसके चेहरे पर एक ही तरह की ज्योति प्रकट होती है। वह इकहार्ट हो कि कबीर हो, कि लाओत्सु हो, कि मोहम्मद हो--इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
आदमी से आदमी जब बोलता है तो हमारे पास बहुत भाषाएं हैं, हजारों भाषाएं हैं। परमात्मा से जब आदमी बोलता है, तो इन भाषाओं में से कोई भाषा काम नहीं आती। न तो संस्कृत उसकी भाषा है और न अरबी और न लैटिन और न ग्रीक। छोड़ो यह बकवास कि संस्कृत देव-भाषा है। कोई भाषा देव-भाषा नहीं है। मौन देव-भाषा है। तुम जब मौन में हो, तब उससे जुड़ते हो।
तो प्रार्थना तो मौन हो सकती है। कुछ कहने की बात नहीं है। लेकिन आदमी ऐसा बेईमान है और आदमी ऐसा लोभी है प्रदर्शन का, कि जैसे अदालत में भी जाता है तो वकील को रखता है कि मेरी तरफ से बोलो, क्योंकि मैं इतना निष्णात नहीं बोलने में, यह कानून की भाषा मुझे आती नहीं, तो तुम मेरी तरफ से बोलो--तो वकील से बुलवाता है; मंदिर में जाता है तो पुजारी से बुलवाता है। घर भी लोग पंडित को बुला लेते हैं कि तुम मेरी तरफ से प्रार्थना कर दो, क्योंकि तुम विशेषज्ञ, तुम शुद्ध संस्कृत में करोगे; मुझे संस्कृत आती नहीं। और परमात्मा जैसे संस्कृत ही जानता है! ‘...तो तुम कर दो।’ तो तुमने दलाल रख लिए हैं--बिचवइए, मध्यस्थ। कम से कम परमात्मा और अपने बीच तो किसी को मत लाओ। वहां तो उठने दो तुम्हारे हृदय की पुकार।
कोई और नहीं रोक रहा है; तुम ही रोक लेते हो। शायद तुम्हें जीवन में सिखाया गया हो, क्योंकि प्रश्न किसी पुरुष ने पूछा है। शायद तुम्हें सिखाया गया हो कि रोना पुरुष के योग्य नहीं। सारी दुनिया में यह नासमझी सिखाई गई है। स्त्रियां रोएं, क्षमा कर दो, स्त्रियां हैं। पुरुष को रोना नहीं सोहता। पुरुष तो मर्द है। मर्द बच्चे को रोना नहीं सोहता। आंख में आंसू आ जाएं, यह बात जमती नहीं पुरुष को।
तो शायद तुम्हारे आंसू सूख गए हैं अभ्यास से; तुमने उनको रोक लिया है, दमन कर लिया है। लेकिन मैं तुमसे एक बात कह दूं: प्रकृति ने पुरुष की आंखों में उतनी ही आंसू की ग्रंथियां बनाई हैं जितनी स्त्री की आंखों में। उसमें जरा भी फर्क नहीं है। तुम जाकर आंख के विशेषज्ञ से पूछ लेना। आंसू की उतनी ही ग्रंथियां पुरुषों की आंखों में हैं, जितनी स्त्री की आंखों में। इसलिए प्रकृति ने दोनों के लिए रोने का उपाय बराबर रखा है।
प्रार्थना का मतलब होता है: थोड़े गीले होओ। रूखे-रूखे, सूखे-सूखे, ध्यान तो हो जाए, प्रार्थना नहीं हो सकती। प्रार्थना में थोड़ी आर्द्रता चाहिए। थोड़ा जल बरसाओ।
आंसू तुम्हारे हृदय का जल है। इससे आंख ही नहीं धुलती, इससे हृदय का कल्मष भी धुल जाता है। और जो तुम और किसी तरह नहीं कह सकते, वह आंसुओं से कह देते हो। तुम जरा रोओ और तुम बड़े हलके हो जाओेगे।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं: स्त्रियां कम पागल होती हैं, क्योंकि रो लेती हैं। स्त्रियां कम आत्मघात करती हैं, क्योंकि रो लेती हैं। दोगुने पुरुष आत्महत्या करते हैं। और दो गुने पुरुष पागल होते हैं। और तुमने देखा, पुरुष कम जीते हैं, स्त्रियां ज्यादा जीती हैं; पांच साल ज्यादा जीती हैं। पुरुष अगर सत्तर साल में मरते हैं तो स्त्रियां पचहत्तर-अस्सी तक जीती हैं। ज्यादा जीती हैं। स्त्रियों में बीमारी को सहने की क्षमता भी ज्यादा होती है; रोग के बाबत बड़ी प्रतिरोधक शक्ति होती है--रेसिस्टेंस होता है; पुरुष में नहीं होता है।
पुरुष नाहक ही अकड़ा फिरता है कि मैं बलशाली हूं। वैज्ञानिकों से पूछो। वैज्ञानिक कहते हैं: स्त्री ज्यादा बलशाली है। वह बल मसल का नहीं है, यह बात सच है। लेकिन वह बल ज्यादा गहरा है।
तुम जरा सोचो कि पुरुष हो तुम, एकाध बच्चे को भी जन्म देते तो कभी के खत्म हो गए होते। नौ महीने एक बच्चे को जरा अपने पेट में लेकर चलने की तो सोचो! फिर नौ महीने के बाद उस बच्चे को पालने की जरा सोचो! या तो तुम अपनी आत्महत्या कर लेते या बच्चे की गरदन दबा देते। तुम सह न पाते। स्त्री की सहिष्णुता बड़ी प्रगाढ़ है।
और मनोवैज्ञानिक कहते हैं: सारी सहिष्णुता के पीछे जो सबसे बड़े राज की बात है, वह यह है कि स्त्री भावों को दबाती नहीं, प्रकट कर देती है। जब नाराज होती है तो नाराज हो लेती है। और जब प्रसन्न होती है तो प्रसन्न हो लेती है। सरल है। स्त्री में थोड़ा सा बच्चों जैसा भाव कायम रहता है। इसलिए स्त्रियों के चेहरे पर थोड़े बालपन की झलक बनी रहती है। स्त्री के चेहरे पर थोड़ा सा निर्दोष भाव कायम रहता है। वही उसका सौंदर्य है। मगर उस सौंदर्य का भीतरी राज प्रसाधन के साधनों में नहीं है। उस सौंदर्य का भीतरी राज भावों के बहाव में है।
पुरुष बहुत जड़ हो गया है। न कभी तुम दिल खोल कर हंसते हो, क्योंकि कहीं अशिष्टता न हो जाए! न तुम कभी दिल खोल कर रोते हो, क्योंकि यह तो तुम्हारे मर्द होने के विपरीत हो गया। न तुम ठीक से नाराज हो सकते हो, क्योंकि यह भी तुम्हारे अहंकार के विपरीत जाता है कि तुम जैसा सज्जन और ज्ञानी नाराज हो--कि तुम चीखो-चिल्लाओ, कि पैर पटको। यह भी तुम से नहीं हो सकता। तुम इन सारे भावों को इकट्ठा करते जाते हो। और जो भाव प्रकट नहीं होते, वे घाव बन जाते हैं। उनसे ही नासूर पैदा होते हैं। इस बात की पूरी-पूरी संभावना है; वैज्ञानिक इस संदेह को धीरे-धीरे करने लगे हैं कि कैंसर का कारण भावों का दमन है। इसलिए कैंसर का शारीरिक इलाज नहीं हो पाता। क्योंकि उसका जन्म कहीं मन की गहराइयों में हो रहा है।
तुम कहते हो: ‘मैं प्रार्थना नहीं कर पाता हूं।’
इसका मतलब इतना ही हुआ कि तुम भाव-प्रवण नहीं हो पाते हो। कोई और नहीं रोक रहा है--तुम्हारे ही संस्कार रोक रहे हैं। तुम्हें अब तक जन्म से लेकर जो सिखाया गया है, वही तुम्हें अवरुद्ध कर रहा है। छोड़ो यह सब। ये संस्कार हटाओ। शुरू-शुरू में अड़चन आएगी। धीरे-धीरे बंधन खुल जाएंगे।
प्रार्थना में उतर सको तो वैसा ही अनुभव होता है...जैसा प्रेम में मन के तल पर होता है, वैसा ही प्रार्थना में आत्मा के तल पर होता है।
प्रकृति ने सींचा पुरुष को फिर सुरभि-धन से,
शरण अशरण को मिली तन मुक्त बंधन से!
ये पंक्तियां तो प्रेम के लिए लिखी गई हैं। लेकिन ये पंक्तियां प्रार्थना के लिए भी उतनी ही सच हैं, सिर्फ तल बदल जाएगा।
प्रकृति ने सींचा पुरुष को फिर सुरभि धन से,
शरण अशरण को मिली तन-मुक्त बंधन से!
दिग-दिगंतों में दिखे फिर इंद्रधनुषी रंग,
मलय-गंधा रेणु उड़ती फिर पवन के संग;
ज्योत्स्ना चर्चित निशा की किंकिणी बजती,
रतिश्रांता देह-प्रतिमा तोड़ती अंग-अंग
हेम शिखरा वर्तिका के किरणवाही कण,
कर रहे हैं फिर रस-प्लावित स्नेह-वर्षण से।
तन मुक्त बंधन से...!!
प्रणयमुखरा सजल वाणी फिर लगी कंपने,
स्वप्न-चालित पलक-पाटल फिर लगे झंपने
भुवन जेता मदन-मादन कर रहा परवश,
संयोगिता श्वास-सरि में फिर तिरे सपने;
संपुटित शब्दार्थ जैसे परिमिता बाहें,
बांधती आकाश अभिमंत्रित समर्पण से!
तन मुक्त बंधन से...!!
जैसे प्रेम में तन मुक्त हो जाता है बंधन से...
तुमने अगर अपने प्रेमी को अपनी बांहों में ले लिया, तुम अगर अपने प्रेमी की बांहों में गिर पड़े, तो कैसा अनुभव होता है? जैसे सारे बंधन शरीर के खुल गए! जैसे सारी गांठें अचानक खुली गईं! जैसे सब गांठें शिथिल हो गईं! अपनी प्रेयसी या अपने प्रेमी के आलिंगन में बद्ध होकर तुम्हें कैसा लगता है? जैसे शरीर हलका हो गया, बोझ से मुक्त हो गया।
ठीक ऐसी ही घटना प्रार्थना में घटती है--और गहरे तल पर। प्रार्थना यानी परमात्मा की बांहों में अपने को गिरा देना। प्रार्थना यानी परमात्मा को आलिंगन कर लेना। प्रार्थना यानी अदृश्य प्रेमी के साथ थोड़ी देर के लिए एकात्मता में बंध जाना।
यह अपूर्व अनुभव है। और तन ही शिथिल नहीं होता, मन ही शिथिल नहीं होता, प्रार्थना में आत्मा भी शून्य हो जाती है, शांत हो जाती है। तुम होते ही नहीं प्रार्थना में। इस अपूर्व अनुभव से वंचित मत रखो अपने को। अपने शत्रु मत बनो। शुरू करो। इस जगत में जो सर्वश्रेष्ठ है, जानने योग्य है, वह प्रार्थना है। कितना ही धन इकट्ठा कर लो, निर्धन रहोगे; अगर प्रार्थना का कण भी मिल गया तो धनी हो गए। कितना ही इस जगत में तुम्हारा नाम हो जाए, तुम खाली और कोरे के कोरे रहोगे; तुम्हारे भीतर की किताब पर कुछ भी नहीं उतरेगा। और प्रार्थना की थोड़ी सी लड़खड़ाती पंक्तियां तुम्हारे भीतर की किताब पर उतर आएं, वेद का जन्म हो गया; तुम्हारे भीतर उठने लगीं कुरान की सुंदर आयतें।
और मैंने देखा कि गंवार से गंवार, अज्ञानी से अज्ञानी भी जब प्रार्थना में डूब कर, रस-प्लावित होता है, तो उसके भीतर से ऐसे अपूर्व शब्द उठते हैं कि बड़े से बड़े कवि भी झेंपें। ऐसा ही तो हुआ कबीर में। ऐसा ही हुआ पलटू में। ये कोई बड़े कवि तो न थे। इन्होंने काव्य का कभी कोई अभ्यास न किया था। इन्हें काव्य की मात्रा, छंद का कुछ पता न था। लेकिन जब भीतर का छंद खुला, जब भीतर स्वच्छंद हुए, जब सारे बंधन गिरे, जब वह परम आलिंगन हुआ--तो बह उठी। सरिता बही।
ऐसा ही तो हुआ मीरा को। नृत्य का कोई अभ्यास न था; लेकिन जब उतरा परमात्मा प्रार्थना के क्षण में, तो नाच भी उसके साथ उतर आया।
अपने को नाहक वंचित मत रखो, और कोई और नहीं रोक रहा है। इस धोखे को भी खड़ा मत करो कि कोई और तुम्हें रोक रहा है। क्योंकि कोई और रोक रहा है, यह बहाना है। तुम ही रोक रहे हो। यह तुम्हारे ही अभी तक के संस्कार रोक रहे हैं।
और यहां मेरे पास रह कर भी अगर तुम अपने संस्कारों को न गिरा सको तो कहां गिराओगे? यहां तो सारे संस्कारों को जला देने की आयोजना है। यहां तो संस्कार-मुक्त हो जाने की चेष्टा चल रही है। उसी को मैं संन्यासी कहता हूं, जो संस्कारों से मुक्त है; जो सरलता से जीता है। व्यवस्था से नहीं। अनुशासन से नहीं जीता। अंतर-प्रेरणा से जीता है। जिसके ऊपर से कोई नियम नहीं है, कोई मर्यादा नहीं है। जिसकी सारी मर्यादा और सारे नियम उसके अंतर-बोध से ही निकलते हैं।
मुझसे संन्यासी कहते हैं कि आप हमें कुछ नियम दें, जीवन की व्यवस्था दें; हम कैसे उठें, कैसे बैठें; क्या खाएं, क्या पीएं--आप हमें सब व्यवस्था से समझा दें। उनका पूछना स्वाभाविक है क्योंकि सदियों से ऐसा ही किया गया है।
बौद्ध भिक्षुओं के लिए तैंतीस हजार नियम हैं। उनको याद ही रखना मुश्किल है। बड़े-बड़े शास्त्र भरे पड़े हैं--नियम पर नियम, नियम पर नियम। और स्वभावतः जब एक नियम बनाओ तो उसके पीछे दस बनाने पड़ते हैं, क्योंकि फिर उस नियम में दिखते हैं कि दस छिद्र रह गए; जैसा कि कानून बनता है। कानून बढ़ते चले जाते हैं रोज--इसलिए बढ़ते चले जाते हैं कि एक कानून बनाया; फिर दिखता है कि इस कानून से बचने के लिए लोगों ने तरकीब निकाल ली। तो उस तरकीब को रोकने के लिए और दस कानून बनाओ। और हर कानून दस और कानून लाता है। धीरे-धीरे कानूनों का जंगल खड़ा हो जाता है। फिर उसमें सामान्य आदमी तो प्रवेश ही नहीं कर सकता। विशेषज्ञ भी खो जाते हैं। क्षुद्र सी बातों को फिर इतना बढ़ावा मिल जाता है।
तुमने देखा, कभी किसी वकील का पत्र देखा? समझ में ही नहीं आता कि वह क्या कह रहा है। कोई छोटी-मोटी बात कहने के लिए भी वह इतनी तरकीबें लगाता है, इतना गोल-गोल जाता है; क्योंकि उसे सारे के सारे नियम के हिसाब से चलना पड़ता है।
तैंतीस हजार नियम--संन्यासी के लिए! यह तो गृहस्थ से भी बुरी दशा हो जाएगी। यह तो चौबीस घंटे नियम की ही याद रखेगा। इसको फुर्सत ही और कहां रहेगी, प्रार्थना की, कि ध्यान की?
नहीं, मैं अपने संन्यासी को कोई नियम नहीं दे रहा हूं। मैं कहता हूं: तुम्हारी सहजता से जो निकले, तुम्हारी सरलता से जो निकले, वही ठीक है तुम्हारे लिए। और, अगर ठीक न होगा तो दुख पाओगे। दुख से जाग जाना। और ऐसा करना, जिससे दुख न हो। कसौटि दे रहा हूं; नियम नहीं दे रहा हूं। जिससे दुख मिले मत करना; क्योंकि कौन चाहता है दुख को! और जिससे सुख मिले, करना। जैसे सर्राफ की दुकान पर पत्थर रखा होता है, जिस पर वह सोने को कस लेता है--ऐसे ही कसौटी दे रहा हूं तुम्हें।
फिर यह भी है संभव कि जिससे तुम्हें सुख मिले, दूसरे को सुख न मिले। नियम जड़ होते हैं। यह भी हो सकता है, जिससे तुम्हें दुख मिला, दूसरे को दुख न मिले। लोग इतने भिन्न हैं! और यह प्यारा है जगत, क्योंकि लोग इतने भिन्न हैं। एक ही जैसे हों तो जगत में सारा सौंदर्य नष्ट हो जाए। लोग भिन्न-भिन्न हैं, इसलिए बड़ा संपन्न है जगत। नहीं तो बड़ा ऊब पैदा करने वाला हो जाए।
तो मैं सिर्फ कसौटी देता हूं कि जिससे तुम्हें सुख मिले, वही धर्म और जिससे तुम्हें दुख मिले, वही अधर्म। और मैंने यह अनुभव किया है कि जिससे तुम्हें दुख मिलता है, उससे दूसरों को भी दुख मिलता है। और जिससे तुम्हें सुख मिलता है, उससे दूसरों को भी सुख मिलता है। सुखी आदमी सुख देता है। दुखी आदमी दुख देता है। क्योंकि हम वही देते हैं जो हमारे पास है।
प्रार्थना के लिए कोई नियम नहीं है। प्रार्थना सरल सहज भाव-दशा है। तुम सिर्फ शुरू करो। और आज ही परिपूर्णता की अपेक्षा मत रखो। उसके कारण ही बाधा पड़ रही है। आज तो लड़खड़ाओेगे, ठीक है। परमात्मा की दिशा में लड़खड़ा कर चलना भी शुभ है और संसार की दिशा में बड़ी व्यवस्था से चलना भी शुभ नहीं है। संसार में जीतना भी अशुभ है और परमात्मा में हारना भी शुभ है।

तीसरा प्रश्न:
भगवान, आप गुणों में साहस को सर्वाधिक महिमा देते हैं। लगता है, धर्म का एकमात्र वाहन साहस है। लेकिन साहस से ही तो डाका, हत्या और युद्ध भी निष्पन्न होते हैं। सिकंदर और नेपोलियन, रॉबिन हुड और मानसिंह, हिटलर और माओ क्या कम साहसी लोग थे? या साहस और साहस में भी फर्क है?
धर्म तो साहस से पैदा होता है, इसलिए निश्चित ही अधर्म भी साहस से ही पैदा होगा। साहस जब ठीक दिशा में गति करता है तो धर्म पैदा होता है। और साहस जब गलत दिशा में गति करता है तो अधर्म पैदा होता है। साहस जब अहंकार से रहित होकर यात्रा करता है तो परमात्मा तक पहुंचा देता है। और साहस जब अहंकार के साथ यात्रा करता है तो नरक तक पहुंचा देता है।
निश्चित ही, बुरा काम करने के लिए भी साहस चाहिए। और इसलिए अक्सर एक अपूर्व घटना घटती है, अचंभे की घटना घटती है कि कभी-कभी पापी और अपराधी क्षण भर में धार्मिक हो जाते हैं। क्योंकि उनके पास एक चीज तो तैयार है--साहस। इसलिए बाल्या भील वाल्मीकि हो गया। इसलिए अंगुलिमाल हत्यारा एकक्षण में ब्राह्मण हो गया। देर न लगी। एक बात तो तैयार थी--साहस तैयार था। अब अंगुलिमाल ने एक हजार लोगों की हत्या करने का निर्णय किया था तो उसने नौ सौ निन्यानबे लोग मार डाले। अकेला आदमी, सारा देश थर-थर कांपता था! जिस पहाड़ पर रहता था, उस पर जाना लोगों ने बंद कर दिया। उसके आस-पास के रास्ते बंद हो गए। लोग दस-पचास मील का चक्कर लगा कर जाते, मगर उस पहाड़ के पास से नहीं गुजरते थे। सम्राट घबड़ाते थे। बिंबिसार के राज्य में था अंगुलिमाल। बिंबिसार उसका नाम सुन कर घबड़ाता था। यह आदमी अपूर्व हत्यारा था और अकारण हत्या कर रहा था! सिर्फ निर्णय लिया था उसने कि एक हजार आदमियों को मार कर उनकी अंगुलियों की माला बनाऊंगा। उसने नौ सौ निन्यानबे आदमियों को मार कर उनकी अंगुलियों की माला पहन रखी थी। नाराज था समाज से और उसका बदला ले रहा था।
उसकी मां कभी-कभी उसके पास जाती थी, लेकिन जब एक ही आदमी मारने को बचा तो उसकी मां ने भी जाना बंद कर दिया। लोगों ने पूछा तो उसकी मां ने कहा कि अब खतरा है; अब वह बिलकुल दीवाना हुआ जा रहा है। वह एक आदमी की तलाश करता है। पिछली बार उसने मुझसे भी कह दिया है कि अब तू सोच-समझ कर आना, क्योंकि अगर कोई मुझे नहीं मिला तो मैं तेरी हत्या कर दूंगा। मगर मुझे एक हजार की संख्या पूरी करनी है।
ऐसा आदमी--और एक क्षण में रूपांतरित हो गया! साहस तो था। साहस अहंकार से जुड़ा था। बुद्ध ने उसे कैसे बदला? बुद्ध ने उसके अहंकार को तोड़ दिया। वह जो घटना घटी बुद्ध के द्वारा बदलने की, वह समझने की है। बुद्ध ने बस इतना ही काम किया कि उसके अहंकार तो तोड़ दिया। साहस को तो बचा लिया। साहस तो चाहिए। क्या किया बुद्ध ने?
जब बुद्ध गए, उस पहाड़ के पास से गुजरे, तो लोगों ने कहा: मत जाओ। यहां अंगुलिमाल है। वह मार डालोगा। वह यह भी फिकर नहीं करेगा कि आप परम ज्ञानी हैं। वह संतों की भी चिंता नहीं करता। उसने कई फकीर पहले मार डाले हैं। यहां से कुछ मुनि निकलते थे, उसने हत्या कर दी। तो वह आपको भी छोड़ेगा नहीं। वह यह नहीं सोचे कि ये गौतम बुद्ध हैं, भगवान हैं। वह कुछ नहीं सोचेगा; वह तो मार ही डालेगा।
बुद्ध ने कहा: अगर मुझे पता न होता तो शायद मैं दूसरे रास्ते से भी चला जाता, लेकिन अब तो कैसे जाऊं! उसको मेरी जरूरत है। और वह आदमी हिम्मतवर है। उसके जीवन में कुछ हो सकता है। उसे मुझसे डरना चाहिए या मैं उससे डरूं?
यह बात बड़ी अपूर्व बुद्ध ने कही कि उसे मुझसे डरना चाहिए या मैं उससे डरूं? वह मुझे मारेगा, मैं भी उसे मार सकता हूं। और मेरा मारना ज्यादा गहरा है। वह मेरे शरीर को काट सकता है; मैं उसके अहंकार को काट सकता हूं। और वह गहरी हत्या है। मैं भी हत्यारा हूं।
बुद्ध कहते हैं: मैं भी मारता हूं।
बुद्ध गए। जो भिक्षु सदा साथ चलते थे, वे धीरे-धीरे पीछे सरक गए। बुद्ध अकेले ही गए। जब पहाड़ के करीब पहुंचे तो बिलकुल अकेले ही थे। लौट कर पीछे देखा: जो सदा होड़ लगाए रखते थे कि साथ रहेंगे, वे कोई भी नहीं थे; वे सब धीरे-धीरे गांव में सरक गए थे। उन्होंने कहा, यह खतरा कौन मोल ले!
जब अंगुलिमाल ने बुद्ध को देखा तो उसे बड़ी दया आई। जीवन में पहली दफा दया आई। दया इसलिए आई कि यह पीत वस्त्रों में आता हुआ संन्यासी इतना शांत था...। उसने कुछ मुनि मारे थे, वे मुनि न रहे होंगे। यह इतना शांत था, इसके आस-पास की हवा ऐसी शांत थी कि उसे डर लगने लगा। उसने दूर से ही चिल्ला कर कहा कि हे भिक्षु, तू लौट जा! देख मैं आदमी खतरनाक हूं। देखता है मेरा फरसा, मैं धार रख रहा हूं। मुझे एक आदमी की जरूरत है, मैं तुझे मार डालूंगा। तू लौट जा। एक कदम आगे मत बढ़।
लेकिन बुद्ध बढ़ते ही रहे। वह फिर चिल्लाया। वह बहुत घबड़ा गया। उसे बड़ा डर लगने लगा। उसे डर यह लगा कि यह आदमी ऐसा है कि कहीं मेरा फरसा काटने में झिझक न जाए। पहली दफा यह आदमी काटने जैसा नहीं लगता। वह चाहता है: यह लौट जाए, झंझट टले; कहीं ऐसा न हो कि मेरा जो हत्यारे का गर्व है, वह खंडित हो जाए! मैंने किसी आदमी की चिंता नहीं की। मैंने आदमी ऐसे काट दिए, जैसे आदमी घास काटता है। मुझे आदमियों में दो कौड़ी का मूल्य नहीं मालूम पड़ता।
सच तो यह है कि उन आदमियों में मूल्य था भी नहीं। घास-पात ही थे, आदमी तो नाममात्र को थे; अभी आदमी का जन्म नहीं हुआ था। यह आदमी आ रहा था, जिसमें आदमी का जन्म हुआ था। इसकी आभा, इसका लावण्य, इसका प्रसाद!
वह डरने लगा। उसकी आंखें आर्द्र होने लगीं। ऐसा आदमी उसने देखा नहीं था। वह जो कहता है कि तू चला जा, लौट जा--वह इसलिए नहीं कह रहा है कि उसे बुद्ध को बचाना है; वह इसलिए कह रहा है कि उसे खुद को बचाना है। इसलिए इस आदमी के सामने कुछ गड़बड़ हो सकती है। इस आदमी से वह कंप रहा है।
दो साहसी आदमी सामने हैं। एक साहसी बुद्ध और एक साहसी अंगुलिमाल। मगर अंगुलिमाल में एक अड़चन है कि वहां अहंकार है; उतनी खोट है। बुद्ध में वह खोट नहीं है। बुद्ध खालिस सोना है; खोट बिलकुल नहीं है। अंगुलिमाल--‘मोरारजी गोल्ड’; उसमें काफी खोट है। चौदह कैरेट। है तो सोना ही, लेकिन कुछ और भी मिला है। वह अहंकार भी मिला है। आदमी तो साहसी है; सम्राटों को कंपा दिया है; सारा जगत कंप रहा है।
लेकिन बुद्ध बढ़े ही जाते हैं। उसने कहा: भिक्षु, तुम सुनते नहीं? बहरे हो? बुद्ध ने कहा: नहीं, सुनता हूं। लेकिन मैं तुझ से एक बात कहना चाहता हूं कि मैंने तो चलना बहुत समय हुआ बंद कर दिया, मैं अब चलता ही नहीं। मैं तो रुका ही हुआ हूं। चल तो तू रहा है।
हंसने लगा अंगुलिमाल। उसने कहा कि तुम पागल भी हो। मैं बैठा हूं, मुझ बैठे को चलता हुआ कहते हो! तुम चल रहे हो और चलते हुए को कहते हो, मैंने चलना छोड़ दिया!
बुद्ध ने कहा: तू समझने की कोशिश कर। जिस दिन से मन नहीं चलता, उस दिन से मेरे चलने न चलने से क्या फर्क पड़ता है! भीतर सब बैठ गया है। भीतर कोई गति नहीं है, कंपन नहीं है, हलन-चलन नहीं है। भीतर की लौ बिलकुल थिर हो गई है। जैसे कोई दीये को जलाए ऐसे भवन में जहां हवा का झोंका न आए, निर्वात भवन में जैसे दीया जलता है, ऐसे मेरे भीतर सब ठहर गया है। यह देह का चलना तो ठीक और हालांकि तू बैठा है, मगर कहां बैठा है, तेरा मन कितना दौड़ रहा है! तू जरा मन की देख।
बात तो अंगुलिमाल को जंची; आदमी पागल नहीं है। बात तो सच ही कहता है। बात तो ठीक ही कहता है।
यह सीधा-सादा हत्यारा था अंगुलिमाल, कपटी नहीं था। कपटी होता तो राजनीतिज्ञ हो गया होता; हत्यारे होने की क्या जरूरत थी; डाकू बनने की क्या जरूरत थी? डाकू बनने के ज्यादा कुशल उपाय है। सीधा-सादा आदमी था। बुद्ध सामने आकर खड़े हो गए। अंगुलिमाल ने कहा: ठीक है। तो मुझे तुम्हारी हत्या करने का पाप भी लेना ही पड़ेगा।
बुद्ध ने कहा: इसके पहले कि तू मुझे मार, मरते हुए आदमी की एक छोटी आकांक्षा पूरा करेगा, अंगुलिमाल?
अंगुलिमाल ने कहा: कोई भी आकांक्षा पूरी कर दूंगा। क्या आकांक्षा है?
बुद्ध ने कहा: यह जो वृक्ष है सामने, इसके कुछ पत्ते तोड़ दे। अंगुलिमाल ने वहीं खड़े-खड़े फरसे से एक पूरी शाख काट दी।
बुद्ध ने कहा: यह आधी इच्छा मेरी पूरी हो गई; आधी और पूरी कर दे, इसे वापस जोड़ दे। फिर तू मुझे मार डाल।
अंगुलिमाल ने कहा कि आप होश में हैं? टूटी हुई डाल को कौन जोड़ सकता है?
तो बुद्ध ने कहा: तोड़ना तो बच्चे भी कर सकते हैं अंगुलिमाल, यह कोई बड़ी भारी साहस की बात है? जोड़ने की बात है असली। तू भी क्या बचकाने काम में लगा है--तोड़ना! तोड़ना! इतनी आदमियों की गरदन तोड़ी, कभी तूने यह सोचा एकाध गरदन जोड़ सकता है? और जब जोड़ न सके तो तोड़ना उचित नहीं है। अगर कुछ सीखनी थी कला, अगर कुछ हिम्मत थी, अगर कुछ करने का ही खयाल था, तो जोड़ने की कला सीखनी थी। अब तू मुझे मार डाल।
लेकिन अब मारना मुश्किल हो गया। उसका फरसा हाथ से नीचे गिर गया। उसने कहा: मैं पहले ही से डर रहा था। तुम्हें नीचे देखा, तब से ही मैं डर रहा था। ये मेरा फरसा, मेरा हाथ कंपता है। यह फरसा मेरा नीचे गिर गया। तुम ठीक कहते हो। तुमने मेरा अहंकार खंडित कर दिया। यह तो बच्चा भी कर सकता है। इसमें क्या खूबी है! और मैं यही करता रहा, मैंने सारा जीवन तोड़ने में बिता दिया। लेकिन मुझसे किसी ने कहा भी नहीं कि मेरी शक्ति जोड़ने में काम आ सकती है; मेरी शक्ति सृजनात्मक बन सकती है। तुम मुझे सम्हालो।
वह उनके चरणों में गिर पड़ा। जानते हैं, बुद्ध ने जब उसे अपने चरणों से उठाया तो क्या कहा? कहा: ब्राह्मण उठ! शब्द जो उपयोग किया, वह ब्राह्मण। अंगुलिमाल ने कहा: मुझे ब्राह्मण कहते हैं! मुझ हत्यारे को ब्राह्मण कहते हैं!
बुद्ध ने कहा: अब तू हत्यारा नहीं रहा। वह बात गई, वह सपना टूट गया, वह दुख-स्वप्न समाप्त हो गया। तू ब्राह्मण है।
खबर फैल गई सारे देश में कि बुद्ध ने अंगुलिमाल को रूपांतरित कर लिया है, अंगुलिमाल भिक्षु हो गया है। सम्राट बिंबिसार बुद्ध को मिलने आया। उसे भरोसा नहीं आया इस बात पर। वह अपनी आंख से देखना चाहता था। अंगुलिमाल रूपांतरित हो जाएगा, यह आखिरी संभावना है। यह बात झूठ है। शायद भिक्षुओं ने प्रचार के लिए उड़ा रखी है कि हमारे भगवान ने अंगुलिमाल को रूपांतरित कर लिया। तो बिंबिसार मिलने आया है। बुद्ध के सामने बैठ कर उसने कहा कि मैंने सुना है भंते कि अंगुलिमाल हत्यारा, वह जघन्य हत्यारा, वह महापापी आपका भिक्षु हो गया है। इस पर मुझे भरोसा नहीं आता। मैं आपसे ही पूछने आया हूं; आपके मुंह से ही सुनना चाहता हूं। दूसरे की बात पर मुझे भरोसा नहीं आता। यह हो नहीं सकता। यह चमत्कार है।
बुद्ध ने कहा: मुझसे क्या पूछते हैं, यह पास में अंगुलिमाल बैठा है। वह बुद्ध के पास ही बैठा था--पीत वस्त्र पहने। यह सुन कर कि अंगुलिमाल बुद्ध के पास बैठा है, बिंबिसार ने तो अपनी तलवार निकाल ली थी। वह तो घबड़ा गया। उसने कहा कि यह आदमी यहीं बैठा है, झपट पड़े कुछ...यह कोई ढंग का आदमी है! नौ सौ निन्यानबे आदमी सिर्फ इसलिए मारे कि उनकी अंगुली की माला बनानी है।
लेकिन बुद्ध ने कहा: तलवार तुम अपनी म्यान में रखो, बिंबिसार। वह अंगुलिमाल अब नहीं है, जिससे तुम डर रहे हो। यह ब्राह्मण अंगुलिमाल है। इसने कभी किसी को नहीं मारा। वह तो गया। वह दुख-स्वप्न गया। यह बड़ा निष्कलुष व्यक्ति है। इस जैसे पवित्र व्यक्ति बहुत कम हैं।
यह जो अंगुलिमाल में रूपांतरण हो गया, यह कैसे हो गया? साहस तो था। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं: इस जगत के जो महानतम अपराधी हैं, उनके भीतर महानतम संत होने की संभावना है। जो बड़े से बड़ा पापी है, उसके बड़े से बड़े संत होने की संभावना है। असली कठिनाई तो उनकी है, जिनमें साहस नहीं है। किसी तरह का साहस नहीं है। जिनको तुम सज्जन कहते हो, वे अक्सर नपुंसक लोग हैं, जिनमें साहस नहीं है। जिनको तुम कहते हो यह आदमी बड़ा भला है, चोरी नहीं करता है--मगर इसकी चोरी न करने का कारण यह नहीं है कि इसके जीवन में अचौर्य फला है। इसकी चोरी न करने का कुल कारण इतना है कि यह पुलिस से डरता है, कि अदालत से डरता है, कि फंस न जाए। अगर इसको पक्का भरोसा दिला दो कि नहीं फंसेगा, तो यह चोरी करेगा। इसे चोरी में जरा भी एतराज नहीं है; इसे फंसने का डर है। यह भय के कारण चोरी नहीं कर रहा है। या हो सकता है, नरक का भय हो; या भगवान नाराज न हो जाए! मगर भय ही इसके आधार में है। भय के कारण जो सज्जन है, उसकी सज्जनता बहुत गहरी नहीं है--ऊपर ऊपर है; छिलके की तरह है; उसके हार्द में, उसकी आत्मा में नहीं है।
इसलिए तथाकथित सज्जन, जिनको रिस्पेक्टेबल, सम्मानित जन कहा जाता है--गांव के पंच, मुखिया, मेयर इत्यादि, जिनको सम्मानित लोग कहा जाता है--पद्मभूषण, भारत-रत्न इत्यादि; जिनको सम्मानित कहा जाता है, क्योंकि इनके जीवन में कुछ बुराई नहीं दिखाई पड़ती--इनके जीवन में इतनी आसानी से क्रांति नहीं होती। इनके जीवन में क्रांति करने वाला मौलिक तत्व नहीं है। इनके पास अहंकार तो खूब है और साहस बिलकुल नहीं।
इस कीमिया को समझ लो। साहस हो, अहंकार हो--तो अहंकार तोड़ा जा सकता है बहुत आसानी से। जितना साहस हो, उतनी ही आसानी से तोड़ा जा सकता है। वही साहस अहंकार के विपरीत लड़ाया जा सकता है और अहंकार टूट जाएगा। लेकिन जिनके जीवन में अहंकार तो खूब हो और साहस बिलकुल न हो, उनको बदलना बहुत कठिन है। क्योंकि उनके पास साहस न होने से अहंकार को तोड़ने के उपाय नहीं हैं, व्यवस्था नहीं है; अहंकार की अग्नि नहीं है; साहस की अग्नि नहीं है कि अहंकार को जला दे। राख है साहस के नाम पर।
इसलिए मैं तुमसे यह बात कहना चाहूंगा: साहस बहुत निर्णायक है। अगर तुम बुरे आदमी हो और साहस है, तो संभावना है। तुम भले आदमी हो और साहस है, तो भी संभावना है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सभी भले आदमियों में साहस नहीं होता। असल में भलाई करने के लिए भी साहस होता है; साहस की जरूरत होती है। जो आदमी झूठ नहीं बोलता, चाहे कुछ भी दांव पर लग जाए, उसके लिए भी साहस चाहिए। आदमी झूठ साहस की कमी से ही बोलता है। सोचता है फंस जाऊंगा, तो झूठ बोल दूं। साहसी आदमी झूठ नहीं बोलता।
फर्क समझ लेना। एक तो सज्जन है, जो भय के कारण सज्जन है। और एक संत है, जो साहस के कारण संत है। वह कहता है: चाहे नरक जाना पड़े, लेकिन झूठ नहीं बोलूंगा, चाहे कुछ भी परिणाम हो जाए झूठ नहीं बोलूंगा, चोरी नहीं करूंगा। भय के कारण नहीं कर रहा है। अगर उलटी भी हालत आ जाए...समझ लो कि परमात्मा का दिमाग खराब हो जाए और वह नियम बदल दे...वे तो कहते हैं न कि सर्वशक्तिमान है, नियम बदल दे--कि अब जो-जो चोरी करेंगे वे स्वर्ग जाएंगे और जो-जो अचौर्य-व्रत का पालन करेंगे, वे-वे नरक जाएंगे--तो यह जो सज्जन हैं, यह चोरी करेगा। इसे स्वर्ग जाना है, नरक से बचना है। और वह जो संत है, वह चोरी नहीं करेगा और नरक जाने की तत्परता रखेगा। वह कहेगा कि ठीक है। नरक और स्वर्ग का कोई मूल्य नहीं है। परिणाम का कोई मूल्य नहीं है। परिणाम भयभीत आदमी के लिए मूल्यवान मालूम होता है। साहसी व्यक्ति को कृत्य का मूल्य है, फल का नहीं।
इसलिए कृष्ण ने अर्जुन को कहा है: सारी फलाकांक्षा छोड़ कर...क्योंकि फल की आकांक्षा ही भयभीत आदमी को होती है। साहसी व्यक्ति तो कृत्य करता है जो कृत्य सामने आ जाए, उसे समग्रता से कर लेता है। फिर परिणाम जो हो। उसे अच्छा अच्छा लगता है तो अच्छा करता है। और उसे बुरा अच्छा लगता है तो बुरा करता है--परिणाम कुछ भी हो।
तो जिसको हम पापी कहते हैं, वह भी परिणाम की फिकर नहीं करता है; और जिसको हम संत कहते हैं, वह भी परिणाम की फिकर नहीं करता। दोनों साहसी होते हैं; फर्क थोड़ा सा है। पापी का अहंकार खोट की तरह मौजूद है। संत की खोट भी चली गई है; संत खालिस सोना है। लेकिन पापी भी सोना है, मौका आ जाए तो रूपांतरण हो सकता है।
लेकिन वे जो बीच में खड़े हैं, जिनमें साहस है ही नहीं, जिनमें रीढ़ है ही नहीं; जो बिलकुल ही निष्प्राण जी रहे हैं; जो सिर्फ डरे-डरे जी रहे हैं; बस हवा में कंपते हुए पत्ते की तरह चौबीस घंटे कंप रहे हैं--यह न हो जाए, यह न हो जाए, हर चीज से भयभीत हैं; जिनका जीवन भय की एक लंबी कथा है; बुराई नहीं करते तो, भय के कारण; और अगर भलाई करते हैं, तो भी भय के कारण; जिनका सारा आधारभूत जीवन भय है--ऐसे व्यक्ति के जीवन में धर्म की क्रांति नहीं हो पाती।
ऐसा ही समझो, वीणा है: अगर बजाना आ जाए तो परम संगीत पैदा होता है; बजाना न आए तो बड़े बेसुरे राग वीणा से निकलते हैं। साहस को ठीक से जीना आ जाए, तो संत पैदा होता है। साहस को ठीक से जीना न आए, तो पापी पैदा हो जाता है। मगर वीणा वही है।
जिसको कहते हैं नालाए बरहम साज में वह सदा भी होती है।
जिसको क्रुद्ध आर्तनाद कहते हैं...
जिसको कहते हैं नालाए बरहम साज में वह सदा भी होती है।
वह भी छिपी है वीणा में।
साहस में अधर्म भी छिपा है, धर्म भी छिपा है; दोनों छिपे हैं। दोनों पहलू हैं दो। यह तुम पर निर्भर होगा कि साहस का तुम कैसे उपयोग कर पाओगे।
सिकंदर में साहस है निश्चित, लेकिन उतना नहीं जितना डायोजनीज में है। सिकंदर में साहस है निश्चित; सारी दुनिया को जीतने चला है। डायोजनीज में भी साहस है। दोनों समसामयिक थे। इसलिए दोनों का उल्लेख कर लेना ठीक होगा। दोनों साहसी हैं। सिकंदर का साहस है: दूसरों को जीतने चला है। डायोजनीज का साहस है: अपने को जीतने चला है। सब छोड़ दिया डायोजनीज ने, क्योंकि उसे लगा कि जितना सामान हो, उतना बंधन होता है; जितना सामान हो उतनी चिंता होती है। जितना सामान हो, उतनी ही फिकर रखनी पड़ती है: चोरी न चला जाए; कहीं कोई छीन न ले; कहीं खो न जाए।
तो उसने सब छोड़ दिया, वस्त्र भी छोड़ दिए, नग्न हो गया; सिर्फ एक पात्र रखता था हाथ में--वह भी पानी पीने के लिए। एक दिन प्यासा नदी की तरफ जा रहा था--पानी भरने पात्र में। उसके साथ ही साथ भागता हुआ एक कुत्ता गया; उससे पहले नदी में पहुंच कर उसने जल्दी से पानी पी लिया। उसे बड़ी हैरानी हुई। उसने कुत्ते को नमस्कार किया। उसने कहा: तूने खूब पाठ दिया! बिना ही पात्र के! पात्र भी नहीं तेरे पास! तू हमसे भी आगे गया! उसने पात्र को वहीं नदी में बहा दिया। उसने कहा: जब कुत्ता बिना पात्र के जी लेता है तो मैं तो आदमी हूं, मैं बिना ही पात्र के...अब यह एक पात्र भी क्यों लिए फिरता हूं? इसकी भी फिकर लगी रहती है; रात सो जाओ तो खयाल रखना पड़ता है, एक-दो दफा टटोल कर देखना पड़ता है कि कोई ले तो नहीं गया।
भिखमंगा आदमी है डायोजनीज, नग्न रहता है; कुछ और तो पास नहीं है। पात्र भी बहा दिया। एक तरफ सिकंदर है; सारी दुनिया को जीतने चला है। एक तरफ डायोजनीज है; पात्र था, वह भी बहा दिया, सब खो दिया। दोनों के लिए साहस चाहिए।
और तुम चकित होओगे जान कर कि सिकंदर तक भी खबरें पहुंचने लगी थीं डायोजनीज की। जब सिकंदर भारत आता था तो डायोजनीज को मिलने गया। चमत्कृत था। सिकंदर को भी लगता था कि आदमी तो गजब का है। होना तो मुझे भी ऐसा चाहिए कि क्या रखा है दुनिया में, जीत कर भी करूंगा क्या? जीत-जीत कर भी मिलेगा क्या? इतना तो जीत लिया, इससे कुछ मिला नहीं; पूरी दुनिया भी जीत लूंगा तो क्या मिलेगा? आदमी अगर हो तो डायोजनीज जैसा हो।
ऐसे मन में उसके भी भाव तो उठते ही रहे होंगे। तभी तो मिलने गया; नहीं तो मिलने भी क्यों जाता? जब मिलने गया, डायोजनीज नदी के तट पर लेटा था। सुबह की सूरज की किरणों में, सूर्य-स्नान ले रहा था--नग्न। सिकंदर ने देखी उसकी मस्ती। बहुत लोग देखे थे। सिकंदर के पास सुंदरतम लोग थे, शूरवीर थे, सेनापति थे, सैनिक थे; मगर ऐसी देह और ऐसी मस्ती, ऐसी कंचन जैसी काया--उसने नहीं देखी थी! जैसे कभी किसी हरिण के पास होती है, ऐसी काया थी! नग्न! और डायोजनीज लेटा था मस्त जैसे दुनिया में कोई फिकर ही नहीं; जैसे दुनिया में कोई चिंता होती नहीं! चेहरे पर एक शिकन नहीं।
सिकंदर थोड़ी देर खड़ा रहा और उसने कहा कि मेरे मन में तुमसे ईर्ष्या होती है। मेरे मन में तुम ईर्ष्या जगाते हो। इतनी शांति, इतने प्रसन्न, इतने आनंदित--और पास तुम्हारे कुछ भी नहीं! और मेरे पास सब है और मैं बड़ा अशांत हूं। अगर दुबारा मुझे जगत में आने का मौका मिला तो भगवान से मैं कहूंगा, मुझे डायोजनीज बनाओ, सिकंदर नहीं।
एक साहसी आदमी दूसरे आदमी के महासाहस को देख रहा है, समझ रहा है। डायोजनीज हंसने लगा। उसने कहा कि दुबारा जन्म होगा कि नहीं होगा, भगवान है या नहीं--किसको पता! फिर तुम्हें याद रह जाएगी कहने की वहां तक, भूल तो न जाओगे? अच्छा तो यह हो कि इसी जिंदगी में क्यों डायोजनीज नहीं हो जाते? अभी क्यों नहीं हो जाते? कौन तुम्हें रोकता है। देखते हो, यह नदी किनारा खाली पड़ा है, यहां काफी जगह है, मैं कुछ सारी जगह रोके नहीं हूं; बस यह छह फुट जमीन मैं रोके हुए हूं, पूरा घाट पड़ा है--तुम भी लेट जाओ, फेंक दो कपड़े, जैसे मैं मस्त हूं, तुम भी हो जाओ। अभी क्यों नहीं हो जाते? आगे सोचते हो कि दुबारा जब जन्म मिलेगा...। कौन जाने दुबारा होता जन्म कि नहीं! फिर, परमात्मा है या नहीं? फिर, तुम जब दुबारा जन्म लेने जाओेगे तो याद रहेगी? यह बात याद रह जाएगी? इस झंझट में न पड़ो। यह घाट काफी बड़ा है--हम दो के लिए पर्याप्त है; और भी दो हजार आ जाएं, उसके लिए भी पर्याप्त है। तुम अभी ही क्यों नहीं हो जाते?
यह एक दूसरे किस्म के साहस ने चुनौती दी। डायोजनीज ने चुनौती दी। सिकंदर थोड़ा शरमाया होगा, झेंपा होगा। उसने कहा कि कहते तो ठीक हो। तुम्हारे तर्क का जवाब तो नहीं। मगर अभी यह न कर सकूंगा। अभी तो दुनिया जीतने निकला हूं और आधा ही काम हुआ है। जब तक यह काम पूरा न हो जाए।
डायोजनीज फिर हंसा। उसने कहा: यह काम कभी पूरा नहीं होगा, क्योंकि दुनिया में कभी कोई काम पूरा नहीं होता है। यह अधूरा रहेगा और तुम मरोगे। और याद रखना मरते वक्त मेरी बात।
यहां कोई काम कभी पूरा होता है? और यही हुआ। जब सिकंदर मरा तो पूरी दुनिया नहीं जीत पाया था। और मरते वक्त उसके मन में अगर कोई याद थी तो वह जीते हुए साम्राज्यों की नहीं, स्वर्ण-महलों की नहीं, राज्य-सिंहासनों की नहीं, पत्नी-बच्चों की नहीं, मित्र-शत्रुओं की नहीं--डायोजनीज की याद थी। वह नंगा फकीर ठीक ही कहता था कि यहां सब अधूरा रह जाता था। जितना बड़ा काम हो उतना ही अधूरा रह जाता है।
सिकंदर ने कहा कि धन्यवाद तुमने जो कहा उस बात का मैं जवाब नहीं दे सकता। और यह भी बात ठीक ही मालूम पड़ती है कि काम पूरे नहीं होते; लेकिन अभी तो चल पड़ा हूं, तो अभी तो न आ सकूंगा। इतना अगर तुम्हारे लिए कुछ कर सकूं तो मुझे कहो। मैं जरूर खुशी से करना चाहूंगा। कुछ करना चाहता हूं तुम्हारे लिए। मैं तुमसे प्रभावित हूं। मुझे अपना भक्त गिनो।
डायोजनीज ने कहा: तो इतना ही करो कि जरा धूप छोड़ कर खड़े हो जाओ; क्योंकि तुम जब से आए हो मेरे शरीर पर छाया पड़ रही है। नाहक तुमने मेरी धूप छीन ली। और तो क्या कर सकते हो? और तो सब है। और तो कोई अड़चन नहीं; सब पूरा है।
एक साहस है--डायोजनीज जैसा, महावीर जैसा। एक साहस है सिकंदर जैसा, हिटलर जैसा। लेकिन सिकंदर डायोजनीज बन सकता है। आकांक्षा तो है उसके भीतर; वह कहता है अगले जन्म में। अभी हिम्मत नहीं है, लेकिन अगले जन्म में। प्रभावित तो है।
पापी संत बन सकता है। लेकिन सज्जन; सज्जन तो पापी भी नहीं बन सकते, संत बनने की तो बड़ी दूर की बात है। सज्जन होने से सावधान रहना। बनना हो तो संत। सज्जन मत बन जाना। सज्जन यानी झूठा सिक्का। दिखते सज्जन और भीतर बड़ा दुर्जन भरा हुआ है। ऊपर-ऊपर सुंदर, भीतर-भीतर बहुत कुरूप। दो ढंग का जीवन। दोहरी भाषा। पाखंड।
साहस एकमात्र मूल्य है और साहस एकमात्र ऊर्जा है: अहंकार-शून्य हो जाए तो परमात्मा से मिला देती है; अहंकार-पूर्ण हो जाए तो अतल गर्त में गिरा देती है।

आज इतना ही।

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