Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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ओशो दर्शन
अंहिसा एक अंतर-संगीत है

हिंसक कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता, भीतर अस्वस्थ होगा ही...

जीवन का केंद्रः धन, यश...

जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। जीवन का केंन्द्र ध्यान होगा, धर्म होगा...

संसार और संन्यास

मैं जिन्हें संन्यासी कह रहा हूं वे जगत से भागे...

संतोष की सार्थकता, असंतोष...

संतोष का मतलब होता है-जो है, धन्य मेरा भाग! असंतोष कहता है-इतना ही...

संन्यास और गृहस्थः मनःस्थिति...

संन्यासी और गृहस्थी में जगह का फर्क नहीं है, भाव का फर्क है...

संन्यास त्याग नहीं

संन्यास अब तक लेखा-जोखा रखता रहा उस सबका जो छोड़ा जाता...

 ओशो कथा-सागर

संन्यासः भगौड़ापन नहीं...

संन्यास का अर्थ ही होता है, अपने अकेलेपन में रस, दूसरे में रस का त्याग

एक युवक बुद्ध से दीक्षा लेकर संन्यस्त होना चाहता था। युवक था अभी, बहुत कच्ची उम्र का था। जीवन अभी जाना नहीं था। लेकिन घर से ऊब गया था, मां-बाप से ऊब गया था-इकलौता बेटा था। मां-बाप की मौजूदगी धीरे-धीरे उबाने वाली हो गयी थी...

अहोभाव

किस्मत

तकदीर है बदलने के लिए
दूरी है तय करने के लिए
ख्वाब है पूरे करने के लिए
अरमा है साकार करने के लिए...

ध्यान-विधि

प्रार्थना-ध्यान

यह प्रार्थना तुम्हें बदल डालती है। और जब तुम बदलते हो, तो पूरा अस्तित्व भी बदल जाता है

अच्छा हो कि यह प्रार्थना ध्यान आप रात...

ओशो जीवन रहस्य

मंदिर के गुंबद का रहस्य

मेरी पुकार मुझ तक लौट के आ जाए, इसलिए मंदिर का गुंबद निर्मित किया गया

जैसे कि इस मुल्क में मंदिर बने। और कोई तीन चार तरह के मंदिर खास तरह...

विशेष

शिक्षक की भूमिका...

जब तक दुनिया में हम एक आदमी को दूसरे आदमी से कंपेयर करेंगे तब तक हम गलत रास्ते पर चलते रहेंगे

शिक्षक बुनियादी रुप से इस जगत में सबसे बड़ा विद्रोही व्यक्ति होना चाहिए। तब वह पीढ़ियों को आगे ले जायेगा...

 रहस्यदर्शियों पर ओशो

संत कवि जगजीवन

‘जगजीवन जैसे बेपढ़े-लिखे संतों की वाणी में जो बल है वह बल शब्दों का नहीं है, वह उनके शून्य का बल है। शब्दों की सपंदा उनके पास बड़ी नहीं है, कामचलाऊं हैं; बोल-चाल की भाषा है। लेकिन बोल-चाल की भाषा में भी अमृत ढाला है’’ -ओशो

छोटा बच्चा था न पढ़ा न लिखा। गांव का गंवार चरवाहा। मगर मैं तुमसे कहता हूं की अकसर सीधे सरल लोगों को जो बात सुगमता से घट जाती है। वही बात जो बुद्धि से बहुत भर गए हैं और इरछे तिरछे हो गए हैं उनको बड़ी कठिनाई से घटती है...

 भारत एक सनातन यात्रा

शासन की आवश्यकता क्यों?

शासन सुरक्षा है। शासन जरूरी है। जहां एक से ज्यादा लोग हैं, वहां कुछ नियम चाहिए, व्यवस्था चाहिए; अन्यथा बड़ी अराजकता होगी, जीना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए शासन की जरूरत है। लेकिन बस एक सीमा तक...

शासन चाहता है समाज, व्यक्ति नहीं; समूह, व्यक्ति नही; क्योंकि व्यक्ति होने में ही खतरा है...

युवा-ज़ोन

युवा और संघर्ष

"युवक का कोई भी संबंध शरीर की अवस्था से नहीं है। उम्र से युवा होने का कोई भी संबंध नहीं है। बूढ़े भी युवा हो सकते हैं, और युवा भी बूढ़े हो सकते हैं। ऐसा कभी-कभी होता है कि युवा भी बूढ़े हो सकते हैं। ऐसा कभी-कभी होता है कि बूढ़े युवा हों, ऐसा अक्सर होता है कि युवा बूढ़े होते हैं।" -ओशो

ओशो-साहित्य परिचय

अभी, यहीं, यह

यह नई पुस्तक सूफ़ी बोध-कथाओं पर ओशो प्रवचनों का सुंदर संकलन है। जिसकी झलकियां दिव्यता की ओर ले जाती है

यात्रा की तैयारी और सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के बीच की यात्रा बहुत लंबी है...महान सूफ़ी संतो के बताए मार्गों को बड़ी ही शालीनता से...

स्वास्थ्य

मां का जन्म

बच्चा जब पैदा होता है तो बच्चा ही नहीं पैदा होता, उसके साथ मां भी पैदा होती है

लोजिम नाम के एक चिकित्सक ने आदमी की चेतना पर भरोसा किया और हजारों स्त्रियों को दुख और दर्द से रहित बच्चे पैदा करवाने की व्यवस्था की है...

ओशोधाम-आगामी ध्यान शिविर

महापरिनिर्वाण दिवस
7 से 9 सितम्बर, 2012
संचालन - स्वामी रविन्द्र भारती और स्वामी प्रेम वर्तन
स्थान - ओशोधाम, नई दिल्ली
फोन - 011-25319026, 25319027 , मोबाइल - 09717490340

 गतिविधियां

ओशो वर्ल्ड गैलेरिया

मनैं चाकर राखो जी...

कृष्णजन्मोत्सव के पावन अवसर पर 6 अगस्त की संध्या नई दिल्ली स्थित ओशो वर्ल्ड गैलेरिया में एक बैठक का आयोजन किया गया...

ध्यान जगत

आगरा,
उत्तर प्रदेश


ओशो ध्यान साधना केंद्र एवं लाइब्रेरी में एक दिवसीय मौन ध्यान शिविर लगा। ध्यान में कई दैनिक विधियां हुईं जिसका संचालन स्वामी ज्ञान दीपेश ने किया...

समाचार सार

शिष्य का पूर्णत्व
राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, 18 अगस्त
बुद्ध का एक शिष्य था। उसका नाम था पूर्ण...

सफल अभिनेता का सुनहरा सफर...
पंजाब केसरी, चण्डीगढ़, 15 अगस्त
विनोद खन्ना ने सफल अभिनेता होने के साथ...

गुरु व परमात्मा का दायित्व
नया इंडिया, नई दिल्ली, 14 अगस्त
परमात्मा तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम्हें जो...

साधना और उपासना
आज समाज, गुड़गांव, 12 अगस्त
कृष्ण के व्यक्तित्व में साधना जैसा कुछ भी नहीं...

सदगुरु का अंगरखा
दिव्य हिमाचल, चंडीगढ़, 4 अगस्त
तुम्हारा हृदय वहां पहुंच सकता है। जिस दिन...

टैरो

सितम्बर 2012
-मा दिव्यम नदीशा

"संन्यास के पक्षी के दो पंख हैं—प्रेम और ध्यान। जहां संन्यास है, वहां प्रेम है, वहां ध्यान है। ध्यान का अर्थ होता हैः अकेले में आनंदित होने की क्षमता; एकांत में भी रसमग्न होने की पात्रता। और प्रेम का अर्थ होता हैः संग-साथ में आनंदित होने की क्षमता। ध्यान तो है, जैसे कोई बांसुरी अकेली बजाए; और प्रेम है आर्केस्ट्रा—बांसुरी भी हो; तबला भी ताल दे; सितार भी बजे; और—और साज हों।" -ओशो

हास्य-ध्यान

"आनंद बरस रहा है। आनंद तुम्हारा स्वभाव है, अस्तित्व का स्वभाव है। तुम सोए हो, इसलिए अपरिचित हो। खोजना नहीं है कहीं-सिर्फ जाग सिर्फ जाग, सिर्फ होश, सिर्फ पुन; स्मृति अपने निज की-और तत्क्षण बरस उठता है आनंद, जैसे मेघ बरस जाएं!" -ओशो

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