Osho World Online Hindi Magazine :: January 2012
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ओशो का 80वां जन्मोत्सव

ओशोधाम, नयी दिल्ली

ओशो के 80वें जन्मदिवस पर ओशोधाम में 7 से 11 दिसम्बर को मा योग नीलम तथा मा धर्म ज्योति के संचालन में ओशो-जन्मोत्सव को समर्पित ध्यान-शिविर घटित हुआ। पांच दिवसीय ध्यान-शिविर में दिन भर के ध्यान प्रयोगों के बाद सांध्य-सत्संग में भी उत्सव का माहौल बना रहा। पूरे शिविर में अनगिनत ओशो-प्रेमियों की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही...

ओशो दर्शन
प्रामाणिक बनो

यह संसार नहीं चाहता कि तुम मनुष्य बनकर रहो, वह चाहता है कि तुम एक योग्य मशीन जैसे बनकर रहो। तुम जितने अधिक योग्य होगे, तुम्हारा उतना ही अधिक आदर होगा, उतना ही...

नए मनुष्य की धारणा

यदि तुम पदार्थ और चेतना दोनों के साथ-साथ मालिक बन सके, तब वह एक आमंत्रण, एक चुनौती बन जाएगा और प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए, जो तुम्हारे सम्पर्क में आता है यह एक उत्तेजना भरी यात्रा होगी...

नव-संन्यास: एक नयी संस्कृति

संन्यास को अब नाचता हुआ, आनंदमग्न रूप देना है। संन्यास को एक नया संस्कार देना है, एक नयी संस्कृति देनी है

प्रश्न: ओशो, आप हजारों लोगों को संन्यास क्यों दे रहे हो?

संन्यास का अर्थ जानते हो? संन्यास का अर्थ है-मेरा अर्थ-जीवन को जीने की कला। जीवन को सम्यक रूपेण जीना। लोग जीना भूल गये हैं, इसलिए हजारों लोगों को संन्यास...

श्रद्धालु ही शक्तिशाली है


श्रद्धालु का कहना यह है कि हाथ में कितना ही हो, वह उसके लिए गंवाने की तैयारी रखनी चाहिए जो हाथ के अभी बाहर है, तो विकास होता है...

  एक नए जीवन की ओर

-मा प्रेम सुरति

जो पीछे छूट गया था, वह अब मिल गया है

सुप्रिया भल्ला, जो कि जालंधर की रहने वाली हैं और मध्यम कद की, दुबली पतली, प्यारी सी इंटेलीजेंट युवती जालंधर के ही सत्यं इंस्टिट्यूट आफ टेक्नोलाजी में साफ्टवेयर कंप्यूटर की लेक्चरर है। बुद्धि और भाव दोनों का संतुलित तालमेल है उसमें। ओशोधाम में ध्यान शिविर व संन्यास दीक्षा के लिए आई है। और यह उसका पहला ध्यान शिविर है...

 मीडिया जगत में ओशो


ओशोधाम-आगामी ध्यान शिविर

ओशो दिवस
19 जनवरी, 2012
संचालन - स्वामी रविन्द्र भारती
स्थान - ओशोधाम, नयी दिल्ली
फोन - 011-25319026, 25319027

रहस्यदर्शियों पर ओशो

नारद

नारद सेतु हैं। इस तरफ से देखो तो बिलकुल संसारी हैं! और उस तरफ से तुम देख न सकोगे; उस तरफ से मैं देख रहा हूं। उस तरफ से देखो तो परम वीतराग हैं।

प्रश्न: एक परम्परा कहती है कि देवर्षि नारद परम मुक्ति को उपलब्ध नहीं थे। दूसरी परम्परा उन्हें सप्तऋषि में एक मानती है...

ध्यान-विधि

मुक्ति हेतु दिशा-निर्देश

तीन अनिवार्यताएं
ध्यान में कुछ अनिवार्य तत्व हैं, विधि कोई भी हो, वे अनिवार्य तत्व हर विधि के लिए आवश्यक हैं। पहली है एक विश्रामपूर्ण अवस्था: मन के साथ कोई संघर्ष नहीं, मन पर कोई नियंत्रण नहीं; कोई एकाग्रता नहीं। दूसरा, जो भी चल रहा है उसे बिना किसी हस्तक्षेप के, बस शांत सजगता से देखो भर-शांत होकर, बिना किसी निर्णय और मूल्यांकन...

स्वास्थ्य

भोजन एक नशा

अगर तुम जरूरत से ज्यादा भोजन कर लो, तो भोजन अल्कोहलिक है। वह मादक हो जाता है, उसमें शराब पैदा हो जाती है

और हे अर्जुन, जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती हैं...

 19 जनवरी, ओशो-दिवस विशेष

मृत्यु: जीवन का साथी

जिसे तुम जीवन की भांति जानते हो वह अपने भीतर मृत्यु को छिपाए है। जीवन ऊपर की ही पर्त है; भीतर मृत्यु मुंह बाए खड़ी है। और अगर तुमने जीवन को सिर्फ जीवन जाना, भीतर छिपी मृत्यु को न पहचाना, तो तुम जीवन को जानने से वंचित ही रह जाओगे।

मृत्यु जीवन के विपरीत नहीं है। मृत्यु जीवन की संगी-साथिन है। वे दो नहीं हैं; वे एक ही घटना के दो छोर हैं। जीवन जिसका प्रारंभ है, मृत्यु उसी की परिसमाप्ति है। गंगोत्री और गंगासागर अलग-अलग नहीं। मूलस्रोत ही अंत भी है। जन्म के साथ ही तुमने मरना शुरू कर दिया। इसे अगर न पहचाना, तो जो सत्य है, जो जीवन का यथार्थ है...

पुस्तक परिचय

ओशो: आज और अभी
नए भविष्य, नए मनुष्य का युग-दर्शन


सद्गुरु ओशो के 80वें जन्मदिन एवं 21वें ओशो-दिवस महोत्सव के उपलक्ष में पुणे के ज़ोरबा डिज़ाइन्स ने वर्ष 2012 की ओशो स्मारिका को प्रकाशित किया है।

स्मारिका में, ओशो को उद्धृत करते हुए स्वामी सत्य वेदांत लिखते हैं: ‘‘ओशो, चेतना के एक महासागर हैं जिसमें अनगिनत, वैविध्यपूर्ण, रंगीन जगत तैरता नज़र आता है। इस महासागर में बोध और ज्ञान है, विज्ञान और अध्यात्म है, काव्य और बोध-कथाएं हैं, बुद्धों की वाणी, संतों के वचन, जीवन का सर्वांगीण विवेचन और मुल्ला नसरुद्दीन की चुटकियां भी हैं।’’

हंसता हुआ धर्म

जीवन हंसने-हंसाने का अवसर है। आदमी खुद पर हंस नहीं सकता, क्योंकि वह मूर्ख बनने से डरता है। लेकिन मूर्खता में क्या खराबी है? ज्ञानी बनने की बजाय मूर्ख बनकर जीना ज्यादा बेहतर है। सच्चा मूर्ख वह है जो किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता। मूर्ख आदमी अकारण हंसता रहता है। उसमें मिथ्या अहंकार नहीं होता। वह सहज, सरल होता है। यह बहुत बड़ा वरदान है। क्योंकि हमारी जिंदगी इतनी बोझिल है कि हंसने के कारण खोजने जाएं तो मिलने बहुत मुश्किल हैं। जो अकारण हंस सकता है उसका जीवन मधुमास बन जाता है; उसके जीवन में आनंद की फुलझड़ियाँ छूटती हैं। अकारण ही...

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