Osho World Online Magazine :: December 2011
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विशेष रिपोर्ट

-स्वामी चैतन्य कीर्ति
आज से अस्सी वर्ष पूर्व 11 दिसंबर 1931 को ओशो देह रूप में प्रकट हुए। अजन्मा और निराकार आकार में रूपायित हुआ। 11 दिसंबर का दिन इस बात की खबर है कि पृथ्वी पर जब ऐसी घटना होती है तो यह पूरी पृथ्वी के लिए महोत्सव की घड़ी है, क्योंकि सैकड़ों-हजारों वर्षों के अंतराल में अस्तित्व को ऐसा अहोभाग्य उपलब्ध होता है जिससे समूचा विश्व पुनः धन्य होता है। मानव-देह में अभिव्यक्त संबुद्ध चैतन्य को हम रहस्यदर्शी सद्गुरु का संबोधन देते हैं...

ओशोधाम-आगामी ध्यान शिविर

ओशो जन्मदिवस महोत्सव
7 से 11 दिसम्बर
संचालन - माँ धर्म ज्योति, माँ योग नीलम

 
नया मनुष्य: नयी मनुष्यता

प्रश्न: प्यारे सद्गुरु! आपके विद्रोह का संबंध ‘जोरबा-बुद्ध’ के साथ किस तरह से है?

मेरा विद्रोही नया मनुष्य ही ‘जोरबा-बुद्ध’ है। मनुष्यता अभी तक यह विश्वास करते हुए जीती आई है कि या तो आत्मा ही एकमात्र वास्तविकता है तथा संसार और पदार्थ एक भ्रम हैं अथवा पदार्थ ही वास्तविक है और आत्मा मात्र...

ध्यान क्या है?

प्रश्न: ध्यान क्या है?

इस छोटी सी घटना को समझें। चांग चिंग के संबंध में कहा जाता है, वह बड़ा कवि था, बड़ा सौंदर्य-पारखी था। कहते हैं, चीन में उस जैसा सौंदर्य का दार्शनिक नहीं हुआ। उसने जैसे सौंदर्य-शास्त्र पर, एस्थेटिक्स पर बहुमूल्य ग्रंथ लिखे हैं, किसी और ने नहीं लिखे। वह जैसे उन पुराने दिनों का क्रोशे था। बीस साल तक वह ग्रंथों में डूबा रहा। सौंदर्य क्या है, इसकी तलाश करता रहा...

रहस्यदर्शियो पर ओशो

गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है...

गोरख

गोरख से इस देश में एक नया ही सूत्रपात हुआ, महावीर से कोई नया सूत्रपात नहीं हुआ। वे अपूर्व पुरुष हैं; मगर जो सदियों से कहा गया था, उनके पहले जो तेईस जैन तीर्थंकर कह चुके थे, उसकी ही पुनरुक्ति हैं...

कबीर

कबीर अनूठे हैं। और प्रत्येक के लिए उनके द्वारा आशा का द्वार खुलता है। क्योंकि कबीर से ज्यादा साधारण आदमी खोजना कठिन है। और अगर कबीर पहुंच सकते हैं, तो सभी पहुंच सकते हैं। कबीर निपट गंवार हैं, इसलिए गंवार के लिए भी आशा है; बे-पढ़े-लिखे हैं, इसलिए पढ़े-लिखे होने से सत्य का कोई भी संबंध नहीं है।

कृष्ण

कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पायेगा कि कृष्ण को हम समझ पायें। इसके कुछ कारण हैं...

लाओत्से

लाओत्से को बहुत कम लोग जानते हैं। जितना ऊंचा हो शिखर, उतनी ही कम आंखें उस तक पहुंच पाती हैं। जितनी हो गइराई, उतने ही कम डुबकीखोर उस गहराई तक पहुंच पाते हैं। सागर की लहरें तो दिखाई पड़ती हैं...

महावीर

महावीर एक दार्शनिक की भांति नहीं हैं, एक सिद्ध, एक महायोगी हैं। दार्शनिक तो बैठ कर विचार करता है जीवन के संबंध में, योगी जीता है जीवन को। दार्शनिक पहुंचता है सिद्धांतों पर, योगी पहुंच जाता है सिद्धावस्था पर। सिद्धांत बातचीत है, सिद्धावस्था उपलब्धि है। महावीर पर ऐसे ही बात की है, जैसे वे कोई मात्र कोरे विचारक नहीं हैं। और इसलिए भी बात की है...

मीरा

मीरा की इस झील में तुम्हें निमंत्रण देता हूं। मीरा नाव बन सकती है। मीरा के शब्द तुम्हें डूबने से बचा सकते हैं। उनके सहारे पर उस पार जा सकते हो। मीरा तीर्थंकर है। उसका शास्त्र प्रेम का शास्त्र है। शायद ‘शास्त्र’ कहना भी ठीक नहीं। नारद ने भक्तिसूत्र कहे; वह शास्त्र है। वहां तर्क है, व्यवस्था है, सूत्रबद्धता है...

गुरुनानक

नानक ने परमात्मा को गा-गा कर पाया। गीतों से पटा है मार्ग नानक का। इसलिए नानक की खोज बड़ी भिन्न है। पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि नानक ने योग नहीं किया, तप नहीं किया, ध्यान नहीं किया। नानक ने सिर्फ गाया। और गा कर ही पा लिया। लेकिन गाया उन्होंने इतने पूरे...

 
ध्यान-विधि

ध्यान: जब द्रष्टा ही दृश्य बन जाए

संसार भर में बहुत से यंत्र विकसित किए जा रहे हैं, जो दावा करते हैं कि वे तुम्हें ध्यान दे सकते हैं; तुम्हें बस इयरफोन लगाकर विश्राम करना है, और दस मिनट के भीतर तुम ध्यान की अवस्था में...

 
अहंकार: आत्मस्मरण का अभाव

प्रश्न: ओशो, अपने अहंकार को पूरी तरह और सदा के लिए मिटाने का सबसे तेज और सबसे खतरनाक ढंग क्या है?

अहंकार को मिटाने का कोई ढंग ही नहीं है—न धीमा, न तेज; न सरल, न कठिन; न आसान...

 
मेरा संन्यास रूपांतरण है

प्रश्न: ओशो, संन्यास की पुरानी धारणा और आपके संन्यास में मौलिक भेद क्या है?

संन्यास की पुरानी धारणा जीवन-विरोधी थी। मेरा संन्यास जीवन के प्रति अनुग्रह, प्रेम और आनंद-उत्सव है। पुराना संन्यास निषेधात्मक था...

 
मृत्यु के भय से छुटकारा

प्रश्न: मृत्यु का बड़ा भय है। क्या इससे छूटने का कोई उपाय है?

मृत्यु तो उसी दिन हो गई जिस दिन तुम जन्मे। अब छूटने का कोई उपाय नहीं। जिस दिन पैदा हुए उसी दिन मरना शुरू हो गए। अब एक कदम उठा...

 
स्वास्थ्य

प्यारे ओशो, मुझे भोजन से तृप्ति क्यों नहीं होती?
हर रोज भोजन लेने से पहले चुपचाप ध्यान में बैठ जाओ। आंखें बंद कर लो और महसूस करो कि तुम्हारे शरीर को क्या चाहिए...

 
रहस्यदर्शियों का आकाश

महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं-मेरी दृष्टि में-जो सबसे चमकते हुए सितारे हैं? मैंने उन्हें यह सूची दी: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखें बंद कर लीं...

 
समन्वय का संगीत: विज्ञान और धर्म

प्रश्न: मृत्यु का बड़ा भय है। क्या इससे छूटने का कोई उपाय है?
मृत्यु तो उसी दिन हो गई जिस दिन तुम जन्मे। अब छूटने का कोई उपाय नहीं। जिस दिन पैदा हुए उसी दिन मरना शुरू हो ...

 
शिक्षा और क्रांति

मैं आपके बीच उपस्थित होकर अत्यंत आनंदित हूं। निश्चय ही इस अवसर पर मैं अपने हृदय की कुछ बातें आपसे कहना चाहूंगा। शिक्षा की स्थिति देखकर हृदय में बहुत पीड़ा होती है। शिक्षा के नाम पर जिन परतंत्रताओं का पोषण किया...

पुस्तक परिचय

सर्वसार उपनिषद
स्वर्ण मंदिर उभर आए जो लौट कर पीछे देखा कभी


‘‘उपनिषद शब्द का अर्थ होता है: गुरु के पास बैठ कर जो मिला—सिर्फ पास बैठ कर—उसकी सन्निकटता में, उसके सामीप्य में, उसके प्रति समर्पण में, उसके प्रेम में, उसके पास मिट कर, उसके पास अपने को भूल कर जो मिला।’’ ‘‘सर्वसार उपनिषद का अर्थ है: जो भी आज तक जाना गया गुह्य ज्ञान है, इसोटेरिक नालेज है, उसमें भी जो सारभूत है—जिसमें से रत्ती भर भी छोड़ा नहीं जा सकता, वैसा यह उपनिषद है।’’ ‘‘इस एक उपनिषद को जान लेने से मनुष्य की प्रतिभा ने जो भी गहनतम जाना है, उस सबके द्वार खुल जाते हैं। इसलिए इसका नाम है: ‘सर्वसार’—दि सिक्रेट आफ दि सिक्रेट्स; गुह्य में भी जो गुह्य है और सार में भी जो सार है।’’ -ओशो

ऋतु आये फल होय

जेन फकीरों पर ओशो द्वारा फरवरी, 1975 में अंग्रेजी में दिए गए 8 प्रवचनों (The Grass Grows By Itself) का हिंदी अनुवाद है यह पुस्तक।
अंग्रेजी से हिंदी में इस पुस्तक को अनुवाद किया है स्वामी ज्ञानभेद ने।
पुस्तक के प्रथम प्रवचन ‘जेन का महत्व क्या है?’ में ओशो समझाते हैं: ‘‘जेन है एक बहुत असाधारण विकास। बहुत थोड़े से असाधारण लोग ही ऐसी संभावना को यथार्थ में बदल पाते हैं।
क्योंकि इसमें बहुत से खतरे और उलझनें आती हैं। बहुत समय पूर्व जो एक संभावना अस्तित्व में थी...

ओशो के ध्यान उपवन

राजकोट, गुजरात

ओशो सत्य प्रकाश ध्यान मंदिर द्वारा आयोजित साहित्य-प्रदर्शिनी का शुभारंभ मा धर्म ज्योति के सान्निध्य में हुआ...

 
ध्यान और सृजनात्मकता

प्रश्न: ध्यान की गहराई जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्राणों में जैसे अनेक गीत फूट पड़ने को मचल उठे हों! क्या करूं?

ध्यान की गहराई बढ़ेगी तो झरने फूटेंगे। ध्यान की गहराई बढ़ाते ही किसलिए हैं? इसीलिए कि झरने फूटें। ध्यान की गहराई की आकांक्षा ही क्यों है? ताकि भीतर छिपा हुआ गीत प्रकट हो...

हंसता हुआ धर्म

चुटकुले का उद्देश्य चुटकुला ही नहीं है। इससे पैदा होने वाला हास्य है क्योंकि हास्य के उन क्षणों में तुम्हारे विचार रुक जाते हैं। उस हंसी में, मन नहीं रह जाता और हंसी के बाद एक छोटा सा अन्तराल...और मेरी बात तुम्हारे गहनतम केन्द्र तक प्रवेश कर जाती है।

-ओशो

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