Osho World Online Hindi Magazine :: April 2013
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  युवा-ज़ोन
 
 

सभी युवक, युवक नहीं

सभी युवक, युवक नहीं होते। सभी बूढे, बूढ़े नहीं होते। जिसे युवक होने की कला आती है, वह बूढ़ा होकर भी युवक होता है। और जिसे युवक होने की कला नहीं आती, वह युवक होकर भी बूढ़ा ही होता है। तो पहले तो इस सत्य को समझने की कोशिश करो कि युवा होना क्या है!

सभी युवक, युवक नहीं होते। सभी बूढे, बूढ़े नहीं होते। जिसे युवक होने की कला आती है, वह बूढ़ा होकर भी युवक होता है। और जिसे युवक होने की कला नहीं आती, वह युवक होकर भी बूढ़ा ही होता है...

पहली तो बात, युवक हैं कहां? इस देश में तो नहीं हैं। इस देश में तो बच्चे बूढ़े ही पैदा होते हैं; गायत्री मंत्र पढ़ते हुए ही पैदा होते हैं। कोई गीता का पाठ करते चले आ रहे हैं! कोई राम-नाम जपते चले आ रहे हैं! कोई राम-नाम जपते चले आ रहे हैं! इस देश में युवक हैं कहां? शक्ल-सूरत से भला युवक मालूम पड़ते हों, मगर युवक होना शक्ल-सूरत की बात नहीं। युवक होना उम्र की बात नहीं। युवक होना एक बड़ी और ही, बड़ी अनूठी अनुभूति है-एक आध्यात्मिक प्रतीत है!

सभी युवक, युवक नहीं होते। सभी बूढे, बूढ़े नहीं होते। जिसे युवक होने की कला आती है, वह बूढ़ा होकर भी युवक होता है। और जिसे युवक होने की कला नहीं आती, वह युवक होकर भी बूढ़ा ही होता है।

तो पहले तो इस सत्य को समझने की कोशिश करो कि युवा होना क्या है!

तुम्हारी उम्र पच्चीस साल है, इसलिए तुम युवा हो, इस भ्रांति में मत पड़ना। उम्र से क्या वास्ता? पच्चीस साल के भला होओ, लेकिन तुम्हारी धारणाएं क्या है? तुम्हारी धारणाएं तो इतनी पिटी-पिटाई हैं, इतनी मुर्दा हैं, इतनी सड़ी-गली हैं, इतनी सदियों से तुम्हारे ऊपर लदी हैं-तुम्हें उन्हें उतारने का भी साहस नहीं है। तुम जंजीरों को आभूषण समझते हो। और तुम, जो बीत चुका, अतीत, उसमें जीते हो। और फिर भी अपने को युवा मानते हो? युवा हो-और पूजते हो जो मर गया उसको! जो बीत गया उसको! जो जा चुका उसको!

तुम्हारी धारणाओं का जो स्वर्ण-युग था वह अतीत में था, तो तुम युवा नहीं हो। राम-राज्य, सतयुग सब बीत चुके। वहीं तुम्हारी श्रद्धा है। लेकिन न तुम विचार करते हो, न तुम श्रद्धा के कभी भीतर प्रवेश करते हो कि श्रद्धा है भी, या सिर्फ थोथा एक आवरण है? पक्षी तो कभी का उड़ गया, पींजड़ा पड़ा है। तुम कुछ भी मानते चले जाते हो! इतने अंधेपन में युवा नहीं हो सकते।

जैसे उदाहरण के लिए, कोई ईसाई कहे कि मैं युवा हूं और फिर भी मानता हो कि जीसस का जन्म कुंवारी मरियम से हुआ था, तो मैं उसे युवा नहीं कह सकता। ऐसी मूढ़तापूर्ण बात, कुंवारी मरियम से कैसे जीसस का जन्म हो सकता है? अगर तुम मान सकते हो, तो तुम अंधे आदमी हो, तुम्हारे पास विवके ही नहीं है, उसके पास श्रद्धा क्या खाक होगी! जिसके पास संदेह की क्षमता नहीं है, उसके पास श्रद्धा की भी संभावना नहीं होती।

लेकिन तुम्हारे पंडित-पुरोहित तुम्हें समझाते हैं संदेह न करना। हम जो कहें, मानना। और वे ऐसी-ऐसी बातें कहते हैं तुमसे कि तुम भी जरा सा सजग होओगे तो नहीं मान सकोगे। कुंवारी लड़की से कैसे जीसस का जन्म हो सकता है? हां, अगर तुम हिंदू हो तो तुम कहोगेः कभी नहीं हो सकता! यह सरासर बात झूठ है! अगर मुसलमान हो तो तुम राजी हो जाओगे कि यह बात सरासर झूठ है। मगर ईसाई, कैथलिक ईसाई, वह नहीं कह सकेगा कि सरासर झूठ है। उसके प्राण कांपेगे। उसके हाथ-पैर भयभीत...डोलने लगेंगे। वह डरेगा कि इसको मैं कैसे झूठ कह दूं! दो हजार साल की मान्यता है; मेरे पूर्वजों ने मानी, मेरे बाप-दादा ने मानी, उनके बाप-दादों ने मानी। दो हजार साल से लोग नासमझ थे, एक मैं ही समझदार हुआ हूं! वह छिपा लेगा अपने संदेह को; ओढ़ लेगा ऊपर से चदरिया श्रद्धा की, दबा देगा संदेह को। आसान है दूसरे के धर्म पर संदेह करना। युवा वह है जो अपनी मान्यताओं पर संदेह करता है।

अब जैसे हिंदू है कोई। हिंदू की मान्यता है कि गीता का जो प्रवचन हुआ, वह महाभारत के युद्ध में हुआ। और महाभारत का युद्ध हुआ कुरुक्षेत्र के मैदान में।

कुरुक्षेत्र के मैदान में कितने लोग खड़े हो सकते हैं? महाभारत कहता हैः अठारह अक्षौहिणी सेना वहां खड़ी थी। और उस युद्ध में एक अरब पच्चीस करोड़ व्यक्ति मारे गए। जिस युद्ध में एक अरब और पच्चीस करोड़ व्यक्ति मारे गए हों, उस युद्ध में कम से कम चार अरब व्यक्ति तो लड़े ही होंगे। क्योंकि इतने लोग मारे जाएंगे तो कोई मारने वाला भी चाहिए, कि यूं ही अपनी-अपनी छाती में ही छुरा मार लिया और मर गए!

बुद्ध के जमाने में भारत की कुल आबादी दो करोड़ थी। और कृष्ण के जमाने में तो एक करोड़ से ज्यादा नहीं थी। अभी भी भारत की कुल आबादी सत्तर करोड़ है। अगर पूरा भारत भी अभी कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा हो तो पूरी अठारह अक्षौहिणी सेना नहीं बन सकती। अभी दुनिया की आबादी चार अरब है-पूरी दुनिया की, अभी! अगर पूरी दुनिया के लोगों को तुम कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा करो, तब कहीं एक अरब पच्चीस करोड़ लोग मारे जा सकेंगे ।

मगर कुरुक्षेत्र के मैदान में इतने लोग खड़े कैसे हो सकते हैं, यह भी तुमने कभी सोचा? हां, चींटी रहें तो बात अलग; मच्छर-मक्खी रहें हों तो बात अलग। मगर आदमी अगर रहे हों इतने आदमी खड़े नहीं हो सकते। और फिर हाथी भी थे, और घोड़े भी थे, और रथ भी थे, फिर इनको चलाने वगैरह के लिए भी कोई जगह चाहिए, कि बस खड़े हैं! जो जहां अड़ गया सो अड़ गया, फंस गया सो फंस गया, न लौटने का उपाय, न जाने का उपाय, न चलने का उपाय! कुरुक्षेत्र के मैदान में एक अरब पच्चीस करोड़ लोगों की लाशें भी नहीं बन सकतीं। मैदान ही छोटा सा है। एक अरब की बात छोड़ दो, तुम एक करोड़ आदमियों को खड़ा नहीं कर सकते वहां।

मगर नहीं; मानते चले जाएंगे लोग, क्योंकि शास्त्र में जो लिखा है! कुछ भी लिखा हो, उसको मानने में कोई अड़चन नहीं होती।

तुम अब भी द्रोणाचार्य जैसे व्यक्तियों को सम्मान दिए चले जाते हो! और अब भी बड़े मनोभाव से एकलव्य की कथा पढ़ी जाती है और तुम बड़ी प्रशंसा करते हो एकलव्य की! लेकिन तुम निंदा द्रोण की नहीं करते। जब की निंदा द्रोण की करनी चाहिए। यह आदमी क्या गुरु होने के योग्य है? इसने एकलव्य को इसलिए इनकार कर दिया कि वह शूद्र था, शिष्य बनाने से इनकार कर दिया! और ये सतयुग के गुरु, महागुरु! और इस आदमी की बेईमानी देखते हो! पहले तो उसे इनकार कर दिया और फिर जब वह जाकर जंगल में इसकी मूर्ति बना कर के धनुर्धर हो गया, तो यह दक्षिणा लेने पहुंच गया। शर्म भी न आई! जिसको तुमने शिष्य ही स्वीकार नहीं किया, उससे दक्षिणा लेने पहुंच गए! और दक्षिणा भी क्या मांगा-दांए हाथ का अंगूठा मांग लिया। क्योंकि इस आदमी को डर था कि एकलव्य इतना बड़ा धनुर्धर हो गया है कि कहीं मेरे शाही शिष्य अर्जुन को पीछे न छोड़ दे! कहीं शूद्र क्षत्रियों से आगे न निकल जाए! इस बेईमान, चालबाज आदमी को तुम अब भी गुरु कहे चले जाते हो! द्रोणाचार्य! अब भी आचार्य कहे चले जाते हो। जगह-जगह इसके, जैसे रावण को जलाते हो, ऐसे द्रोणाचार्य को जलाना चाहिए। रावण ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? रावण ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा।

और एकलव्य की भी मैं प्रशंसा नहीं कर सकता। जब गुरु द्रोण पहुंचे थे लेने अंगूठा, तब अंगूठा बता देना था, देने का सवाल ही नहीं है। यह भी क्या युवा था! पिटाई-कुटाई न करता, चलो ठीक है; इनकी नाक नहीं काटी, ठीक है। लेकिन कम से कम अंगूठा तो बता सकता था। अगूंठा दे दिया काट कर!

और सदियों से फिर इसकी प्रशंसा की जा रही है। अब भी स्कूलों में पाठ पढ़ाया जा रहा है कि अहा, एकलव्य जैसा शिष्य चाहिए! कौन पढ़ा रहे हैं? तुम्हारे शिक्षक, गुरु, अध्यापक, प्रोफेसर, वे सब पढ़ा रहे हैं-एकलव्य जैसा शिष्य चाहिए! ये सब तुम्हारा अंगूठा काटने के लिए उत्सुक हैं। इनको मौका मिले तो तुम्हारी गर्दन काट लें। जेब तो काटते ही हैं। और ये प्रशंसा कर रहे हैं! और तुम भी...और फिर तुम कहे जाते हो कि युवा हो।

-ओशो
पुस्तकः प्रेम क्या है
प्रवचन नं. 6 से संकलितत