Osho World Online Hindi Magazine :: April 2013
www.oshoworld.com
 
  समाचार सार
 
 

जीसस का वक्तव्य कितना अदभुत है

आज का आनंद, पुणे, 8 मार्च 2013

अच्छा, इस तौलिए को हटाओ! आशु मुझे अपना काम शुरू करना है और तुम समझ सकती हो कि एक छाती पर दो कमीजों को एक साथ रखने से बेचारी छाती के लिए कितना मुश्किल होता है! खासकर छाती के पीछे छिपे बेचारे हृदय के लिए! हृदय राजनीतिज्ञ या राजनायिक नहीं है। यह तो बच्चे जैसा और सरल है।

मैं जीसस को नहीं भूल सकता। मैं उन्हें दुनिया के किसी भी ईसाई से अधिक याद करता हूं। जीसस कहते हैं, ‘धन्यभागी हैं वे जो छोटे बच्चे जैसे हैं, क्योंकि प्रभु का राज्य उनका है।’

यहां पर जो याद रखने वाला सबसे अधिक महत्वपूर्ण शब्द है वह है ‘क्योंकि।’ जीसस के उन सब वक्तव्यों में से है जो ‘धन्यभागी हैं वे’ से आरंभ होते हैं और समाप्त होते हैं ‘प्रभु का राज्य’ के साथ, उनमें से केवल यही एक वक्तव्य अनोखा है। क्योंकि शेष सब वक्तव्य कहते हैं, ‘धन्यभागी हैं वे जो विनम्र हैं, दीन-ही हैं, क्योंकि वे प्रभु के राज्य के उत्तराधिकारी होंगे।’ वे वक्तव्य तर्कपूर्ण हैं और वे भविष्य का वायदा करते हैं--भविष्य, जिसका कोई अस्तित्व नहीं है। यही एकमात्र वक्तव्य है जो कहता है,‘...क्योंकि प्रभु का राज्य उनका है।’ इसमें न कोई भविष्य है, न तर्क है, न किसी लाभ का कोई वायदा है; तथ्य का शुद्ध वक्तव्य है या यूं कहिए कि तथ्य का सीधा सरल वक्तव्य है। मैं इस वक्तव्य से सदा बहुत प्रभावित रहा हूं, बहुत हैरान रहा हूं। मैं विश्वास ही नहीं कर सकता कि कोई तीस साल तक एक ही वक्तव्य पर बार-बार हैरान हो सकता है! हां तीस साल तक यह वक्तव्य निरंतर मेरे हृदय को आनंद से कंपित करता रहा हैः ‘क्योंकि प्रभु का राज्य उनका है।’ कितना तर्कहीन और फिर भी कितना सच्चा!

आशु! मुझे तुम्हें तौलिया को हटाने के लिए कहना पड़ा, क्योंकि दो काम एक साथ नहीं हो सकते, विशेषतः एक हृदय के ऊपर! और जब से मैं तुम्हें जानता हूं तब से तुम मेरे प्रति इतनी ही अच्छी रही हो। और जब मैं यह याद करने की कोशिश करता हूं कि मैं कब से तुम्हें जानता हूं, तो ऐसा लगता है कि जैसे सदा से तुम्हें जानता हूं। मैं मजाक नहीं कर रहा-सच में जब मैं आशु के बारे में सोचता हूं तो मुझे याद ही नहीं आता कि कब उसने मेरे धनिष्ठ लोगों की दुनिया में प्रवेश किया। ऐसा लगता है कि वह सदा मेरे पास इसी प्रकार बैठी रही है-कभी दांत की नर्स की तरह और कभी यूं ही। अब वह देवराज के साथ सह-संपादक बन गई है। यह बहुत तरक्की हो गई है! अब तुम्हरे नीचे दो डॉक्टर हो सकते हैं। क्या यह बड़ी नहीं है? तुम दोनों से कुश्ती कराओ और इसे देखने का मजा लो।

अब मैं अपनी कहानी पर आता हूं। कहानी से पहले छोटी सी प्रस्तावना हमेशा अच्छी होती हैं, जितनी हो सके उतनी असंगत और बेतुकी क्योंकि मेरे जैसे आदमी का तो यही एकदम सही परिचय है। कभी-कभी मैं अपने ऊपर हंसता हूं किसी कारण से नहीं क्योंकि जब कोई कारण हो तो हंसी रुक जाती है। बिना कराण के ही कोई हंस सकता है। हंसी का समझदारी से कोई संबंध नहीं है। इसलिए कभी-कभी मैं अपनी समझदारी और नासमझदारी को भी ताक पर रख देता हूं। याद रखो, वे एक ही चीज के दो पहलू हैं--और फिर खूब हंसता हूं। हां, इसे नहीं जान सकते। वह शारीरिक नहीं है, नहीं तो देवराज ओर देवगीत अपने यंत्रों से इसे जान सकते। यह तो सब यंत्रों की सीमा के पार है। मैं जो कह रहा हूं पहले उसके शब्दों को समझो, फिर शायद तुम शब्दहीन को भी समझ सकोगे। तुम सबके लिए यही मेरी आश है, यही मेरा स्वपन है।

तुम लोगों को चिंता हो रही होगी, क्योंकि आज मैं आरंभ करने में बहुत देर कर रहा हूं। तुम मुझे जानते हो, मैं तुम्हें जानता हूं। मैं जितना संभव हो सके उतना धीरे-धीरे आगे बढ़ूंगा, वह तुम्हें खाली करने में मदद करेगा। और मेरा सारा धंधा यही है--खाली करना। तुम इसको कह सकते हो--एंप्टीइंग अनलिमिटेड। 

सच्चे आनंद का अनुभव हो तो बात बने

स्वतंत्र वार्ता, हैदराबाद, 8 मार्च 2013

मित्रता दो प्रकार की हो सकती है। एक मित्रता वह होती है जिसमें तुम भिखारी होते हो, तुम अपने अकेलेपन के लिए दूसरों से मदद चाहते हो, और दूसरा भी भिखारी है; वह भी यही तुमसे चाहता है। और स्वाभाविक रूप से दो भिखारी एक दूसरे की मदद नहीं कर सकते। जल्द ही वे देखेंगे कि भिखारी से जरूरत दुगनी या कई गुना हो गयी है। अब एक भिखारी की जगह दो भिखारी हैं। और दुर्भाग्य से यदि उनके बच्चे हैं, तब एक पूरा समूह है जो मांग रहा है और किसी के पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।

तो सभी कुंठित और नाराज हैं, और सब महसूस कर रहे हैं कि उसे धोखा दिया जा रहा है, उसके साथ विश्वासघात किया जा रहा है। और वास्तव में न तो कोई धोखा दे रहा है और न कोई विश्वासघात कर रहा है, क्योंकि तुम्हारे पास है क्या?

अन्य प्रकार की मित्रता, अन्य किस्म के प्रेम की बिलकुल अलग गुणवत्ता होती है। यह जरूरत से नहीं उपजी है, बल्कि तुम्हारे पास इतना ज्यादा है कि तुम बांटना चाहते हो। नये किस्म का आनंद तुम्हारे अंतरतम में आ रहा है, बांटने का आनंद, जिसके प्रति तुम पहले जागरुक नहीं थे। तुम हमेशा मांगते रहते थे।

जब तुम बांटते हो, तो वहां पकड़ का कोई सवाल ही नहीं है। तुम अस्तित्व के साथ बहते हो, तुम जिंदगी के बदलाव के साथ बहते हो, क्योंकि इससे कोई मतलब नहीं है कि तुम किसके साथ बांटते हो। कल भी वही इंसान हो सकता है, पूरी जिंदगी वही इंसान हो सकता है, या विभिन्न लोग भी हो सकते हैं। यह अनुबंध नहीं है, यह शादी नहीं है; यह बस प्रचुरता है जिसके कारण तुम देना चाहते हो। जो कोई भी तुम्हारे नज़दीक होता है, तुम दे देते हो। और देना बड़ा आनंदायक है। भीख मांगना इतनी बड़ी पीड़ा है। मांग कर यदि तुम कुछ पाते भी हो, तुम दयनीय ही रहोगे। यह चोट पहुंचाता है। यह तुम्हारे आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाता है, यह तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाता है। परंतु बांटना तुम्हें ज्यादा केंद्रित, ज्यादा पूर्ण, ज्यादा गौरवान्वित करता है परंतु ज्यादा अहंकारी नहीं, ज्यादा गौरवान्वित कि अस्तित्व तुम्हारे प्रति करुणापूर्ण है। यह अहंकार नहीं है; यह बिलकुल अलग तथ्य हैः एक पहचान कि अस्तित्व ने तुम्हें उस बात की अनुमति दी है जिसके लिए लाखों लोग कोशिश कर रहे हैं, लेकिन गलत दरवाजे पर। तुम सही दरवाजे पर हो।

तुम्हें अपने आनंद पर और उस सब पर जो अस्तित्व ने तुम्हें दिया है, नाज़ है। भय गायब हो जाता है, अंधेरा गायब हो जाता है, दर्द गायब हो जाता है, दूसरे के संग-साथ के लिए इच्छा गायब हो जाती है।

तुम एक व्यक्ति से प्रेम कर सकते हो, और यदि वह व्यक्ति किसी और से प्रेम करता है तो कोई ईर्ष्या नहीं है, क्योंकि तुम्हरा प्रेम अत्यधिक आनंद से उत्पन्न हुआ है। यह पकड़ नहीं है।

तुम दूसरे व्यक्ति को कैद नहीं कर रहे थे। तुम परेशान नहीं थे कि दूसरा व्यक्ति तुम्हारे हाथों से छूट जाएगा, कि कोई और प्रेम संबंध बनाना शुरू कर देगा।

जब तुम अपने आनंद को बांट रहे हो, तुम दूसरे के लिए कैद नहीं बनाते।

तुम बस देते हो। यहां तक कि तुम आभार या धन्यवाद भी नहीं चाहते क्योंकि तुम कुछ पाने के लिए नहीं दे रहे, आभार के लिए भी नहीं। तुम दे रहे हो क्योंकि तुम इतने भरे हो कि तुम्हें तो देना ही है।

अभिनय चोरी है या कला?

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ, 2 मार्च 2013

एक अमेरिकन अभिनेता का जीवन मैं पढ़ता था। कई बार संन्यासियों के जीवन थोथे होते हैं, उनमें कुछ भी नहीं होता। जिन्हें हम तथाकथित अच्छे आदमी कहते हैं, अक्सर उनके पास कोई जिंदगी नहीं होती। इसलिए अच्छे आदमी के आसपास कहानी लिखना बहुत मुश्किल है। उसके पास कोई जिंदगी नहीं होती। वह थोथा, समतल भूमि पर चलने वाला आदमी होता है, कोई उतार-चढ़ाव नहीं होते। बुरे आदमी के पास जिंदगी के गहरे अनुभवः अक्सर जिनको हम बुरा आदमी कहते हैं, उसमें एक जिंदगी होती है, और उसमें उतार-चढ़ाव होते हैं और अक्सर बुरे आदमी के पास जिंदगी के गहरे अनुभव होते हैं। अगर वह उनका उपयोग कर ले तो संत बन जाए। अच्छा आदमी कभी संत नहीं बन पाता। अच्छा आदमी बस अच्छा आदमी ही रह जाता है-सज्जन। सज्जन यानी मिडियाकर। जिसने कभी बुरे होने की भी हिम्मत नहीं की, वह कभी संत होने की भी सामर्थ्य  नहीं जुटा सकता। इस अभिनेता की मैं जिंदगी पढ़ रहा था। उसकी जिंदगी बड़े उतार-चढ़ाव की जिंदगी है। अंधेरे की, प्रकाशो की, पापो की, पुण्यों की- लेकिन उसका अंतिम निष्कर्ष देखकर मैं दंग रह गया। अंतिम उसने जो निष्कर्ष दिया है, पूरी जिंदगी में जिस बात ने उसे सबसे ज्यादा बेचैन किया है, वह आपको भी बेचैन कर सके।

अब मैं तय नहीं कर पाता हूं कि मैं कौन हूं? आखिरी बात उसने यह कही कि मेरी सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि मैंने इतने प्रकार के अभिनय किए, जिंदगी में मैंने इतनी एक्टिंग की, मैं इतने व्यक्ति बना कि अब मैं तय नहीं कर पाता हूं कि मैं कौन हूं? कभी वह शेक्सपियर के नाटक का कोई पात्र था, कभी वह किसी और कथा का कोई और पात्र था। कभी किसी कहानी में वह संत था, और कभी किसी कहानी में वह पापी था। जिंदगी में इतने पात्र बना वह कि आखिर में कहता है कि मुझे अब समझ नहीं पड़ता कि असली में मैं कौन हूं? इतने अभिनय करने पड़े, इतने चेहरे ओढने पड़े कि मेरा खुद का चेहरा क्या है, वह मुझे कुछ पक्का नहीं रहा है। दूसरी बड़ी गहरी बात उसने कही है कि जब भी मैं किसी पात्र का अभिनय करने मंच पर जाता हूं, तब एट-ईज होता हूं। क्योंकि वहां स्वयं होने की जरूरत नहीं होती है, एक अभिनय निभाना पड़ता है, तो मैं एकदम सुविधा में होता हूं, मैं निभा देता हूं। ‘टु स्टेप इन ए रोल इज ईजीयर।’ उसने लिखा है कि एक अभिनय में कदम रखना आसान है। ‘बट टु स्टेप आउट ऑफ  इट बिकम्स कांप्लेक्स।’ जैसे ही मैं मंच से उतरता हूं, उस अभिनय को छोड़कर, ‘वैसे ही मेरी दिक्कत शुरू हो जाती हैं कि अब मै कौन हूं? तब तक तो तय होता है कि मैं कौन था, अब मैं कौन हूं? कहना चाहिए कि उसकी जिंदगी में अचैर्य का क्षण निकट आ गया है, लेकिन हमारी जिंदगी में हमें पता नहीं चलता। सच बात तो यह है कि कोई अभिनेता इतना अभिनय नहीं करता, जितना अभिनय हम सब करते हैं। मंच पर नहीं करते हैं, इससे ख्याल पैदा नहीं होता है। बचपन से लेकर मरने तक अभिनय की लंबी कहानी है। ऐसा एक आदमी भी नहीं है जो अभिनेता नहीं है। कुशल-अकुशल का फर्क हो सकता है, लेकिन अभिनेता नहीं है, कोई ऐसा आदमी नहीं है। और कोई आदमी अभिनेता न रह जाए तो उसके भीतर धर्म का जन्म हो जाता है।

चेहरों की चोरीः हम चेहरे चुराकर जीते हैं। हम शरीर को अपना मानते हैं, वह भी अपना नहीं है, और हम जिस व्यक्तित्व को अपना मानते हैं, वह भी हमारा नहीं है। वह सब उधार है। जिन चेहरों को हम अपने ऊपर लगाते हैं, जो मास्क, जो परसोना, जो मुखौटे लगाकर हम जीते हैं, वह भी हमारा चेहरा नहीं हैं। बड़ी से बड़ी जो आध्यात्मिक चोरी है, वह चेहरों की चोरी है, व्यक्तित्वो की चोरी है। हम सब बाहर से ही साधते हैं धर्म को। अधर्म होता है भीतर, धर्म होता है बाहर। चोरी होती है भीतर, अचौर्य होता है बाहर। परिग्रह होता है भीतर, अपरिग्रह होता है बाहर। हिंसा होती है भीतर, अहिंसा होती है बाहर। फिर चेहरे सध जाते हैं। इसलिए धार्मिक आदमी जिन्हें हम कहते हैं, उनसे ज्यादा चोर व्यक्तित्व खोजना बहुत मुश्किल है। चोर व्यक्तित्व का मतलब यह हुआ कि जो वे नहीं है, वे अपने माने चले जाते हैं, दिखाए चले जाते हैं। आध्यात्मिक अर्थो में चोरी का अर्थ है-जो आप नहीं हैं, उसे दिखाने की कोशिश, उसका दावा। हम सब वही कर रहे हैं, सुबह से सांझ तक हम दावे किये जाते हैं।

मुस्कराहट आसुओं को छिपाने का इंतजाम हैः वह अमेरिकी अभिनेता ही अगर भूल गया हो कि मेरा ओरिजनल-फेस, मेरा अपना चेहरा क्या है, ऐसा नहीं है, हम भी भूल गए हैं। हम सब बहुत से चेहरे तैयार रखते है। जब जैसी जरूरत होती है, वैसा चेहरा लगा लेते हैं। और जो हम नहीं हैं, वह दिखाई पड़ने लगते हैं। किसी आदमी की मुस्कुराहट देखकर भूल में पड़ जाने की कोई जरूरत नहीं है, जरूरी नहीं है कि भीतर आंसू न हों। अक्सर तो ऐसा होता है कि मुस्कराहट आंसुओं को  छिपाने का इंतजाम ही होती है। किसी आदमी को प्रसन्न देखकर ऐसा मान लेने की कोई जरूरत नहीं है कि उसके भीतर प्रसन्नता का झरना बह रहा है, अक्सर तो वह उदासी को दबा लेने की व्यवस्था होती है।

आदमी जैसा भीतर है, वैसा बाहर दिखाई नहीं पड़ रहा है, यह आध्यात्मिक चोरी है। और जो आदमी इस चोरी में पड़ेगा, उसने वस्तुएं तो नहीं चुराई, व्यक्तित्व चुरा लिए। और वस्तुओं की चोरी बहुत बड़ी चोरी नहीं है, व्यक्तित्वों की चोरी बहुत बड़ी चोरी है।

व्यक्तित्व चोर को किसी जेल में बंद करें :  ध्यान रहें, वस्तुओं के चोरों को तो हम जेलों में बंद कर देते हैं, व्यक्तित्वों के चारों के साथ हम क्या करें? जिन्होंने पसर्नेलिटीज चुराई हैं, उनके साथ क्या करें? उन्हें हम सम्मान देते हैं, उन्हें हम मंदिरों में, मस्जिदों में, गिरजाघरों में आहत करते हैं। ध्यान रहें, वस्तुओं के चोर ने कोई बहुत बड़ी चोरी की है। और वस्तुओं की चोरी बहुत जल्दी बंद हो जाएगी, क्योंकि वस्तुएं ज्यादा हो जाएंगी, चोरी बंद हो जाएगी, क्योंकि व्यक्तित्वों की चोरी जारी रहेगी। हम चुराते ही रहेंगे, दूसरे को ओढ़ते ही रहेंगे। इसे आप जरा सोचना कि आप स्वयं होने की हिम्मत जिंदगी में जुटा पाए या नहीं जुटा पाएं? अगर नहीं जुटा पाए तो आपके व्यक्तित्व की अनिवार्य आधारशिला चोरी की होगी। आपने कोई और बनने कोशिश तो नहीं की है? आपके चेतन-अचेतन में कहीं भी तो किसी और जैसा हो जाने का आग्रह तो नहीं है? अगर है, तो उस आग्रह को ठीक से समझ कर उससे मुक्त हो जाना जरूरी है। अन्यथा अचौर्य, नो-थेफ्ट की स्थिति नहीं पैदा हो पाएगी और यह चोरी ऐसी है कि इससे आपको कोई भी रोक नहीं सकता, क्योंकि व्यक्तित्व अदृश्य चोरियां हैं। धन चुराने जाएंगे, पकड़े जा सकते हैं। व्यक्तित्व चुराने जाएंगे, कौन पकड़ेगा? कैसे पकड़ेगा? कहां पकड़ेगा? और व्यक्तित्व की चोरी ऐसी है कि किसी से कुछ छीनते भी नहीं और आप चोर हो जाते हैं। व्यक्तित्व की चोरी आसान और सरल है। सुबह से उठकर देखना जरूरी है कि मैं कितनी बार दूसरा हो जाता हूं। हम व्यक्ति नहीं हो पाते व्यक्तित्वों के कारण। पसर्नेलिटीज के कारण पर्सन पैदा नहीं हो पाता।

ध्यान बढ़ता है तो सृजनात्मकता भी बढती है

स्वतंत्र वार्ता, हैदराबाद, 1 मार्च 2013

तो पिता ने कहा, निश्चित। मैं उसके ही शब्द दोहराता हूं। तो उस बेटे ने कहा, फिर एक सवाल उठता है आप जो प्रवचन लिख रहे हैं, इसमें  इतनी काट-पीट क्यों कर रहे हैं? अगर ये शब्द उसके हैं, तो आप कौन हैं काट-पीट करने वाले? और अगर आप काट-पीट कर रहे हैं, तो ये शब्द उसके कैसे रहे?

यह बात मुझे प्रीतिकर लगी, उस छोटे से बच्चे ने बड़ा महत्वपूर्ण सवाल उठायाः आप-काट करने वाले कौन हैं? उतरने दो उसे-जैसा उतरता हो, जिस भंगिमा में, जिस मुद्रा में; जैसी उसकी मर्जी।

आप पूछते हैं : ‘मैं क्या करूं?’

कुछ नहीं करना है। आपको बीच से हट जाना है। बस इतना ही करना है। बिलकुल हट जाना है। ध्यान की गहराई बढ़ रही है, और गहराई बढ़ेगी, आप बिलकुल बीच से हट जाओ! और जो होता हो, होने दो।

मगर नहीं, खोपड़ी लौट-लौट कर कहती हैः कुछ करो! ऐसे छोड़ मत देना, उन्माद हो जाएगा, पागलपन हो जाएगा, पागलपन हो जाएगा। बीच रास्ते पर समझो कि गीत उठ आया, कि बीच रास्ते पर नाच शुरू हो गया.... वैसा हुआ है! तो बुद्धि कुछ एकदम गलत कहती है, ऐसा भी नहीं। मीरा ऐसे ही तो नाच उठी बीच रास्तों पर। सब लोकलाज खोई रे। मीरा भी सोच सकती थी कि कहां नाचना, कहां नहीं नाचना! बीच बाजारों में नहीं नाचना। मगर नहीं, छोड़ दिया उसकी मर्जी पर! फिर जहां उसने नचाया। फिर हम उसके हाथ की कठपुतली हो गए। अब वह बीच बाजार में नचाए, तो लोकलाज जाती हो तो जाए।

लोकलाज बच-बच कर भी क्या बचता है हाथ में?  एक दिन मौत आती है, मुंह में राख भर रह जाती है, सब मिट्टी में मिल जाता है। लोकलाज में रखा भी क्या है?

यह भी मत सोचना कि मेरे गीत पसंद के पूछने की बातें नहीं हैं। प्रशंसा मिलेगी या नहीं मिलेगी?

ये सब बाते व्यर्थ हैं। ये संन्यासी के पूछने की बातें नहीं है। प्रशंसा मिले कि अपमान, और सिंहासन मिले कि सूली, संन्यासी का तो सीधा, साफ-सुथरा व्यवहार है। वह सह है कि जो वह करवाएगा, वही करेंगे। जहां ले जाएगा, वहीं जाएंगे। दुनिया पागल समझें तो पागल समझें। दुनिया बुद्धिमान समझे तो बुद्धिमान समझे। न दुनिया के पागल समझने से तुम पागल होते हो। तुम जो हो उसका निर्णय, परमात्मा क्या समझता है, इस पर आधारित है। तुम्हारा अंतिम निर्णय उसके और तुम्हारे बीच होना है। वही होने दो निर्णय उसी को निर्णायक होने दो। वही एक मालिक निर्णय लेगा। कि तुम्हारे गीत गाने योग्य थे या नहीं। और अगर तुमने उसे ही गाने दिया, तो स्वभाव वे गाने योग्य हैं ही।

ध्यान बढ़ता है तो सृजनात्मकता स्वभावतः बढती है। मैं तो इसे कसौटी मानता हूं। अगर ध्यान बढ़ने से कोई बिलकुल सुस्त, काहिल, निष्क्रिय, अकर्मण्य बैठ जाए, तो समझना ध्यान नहीं बढ़ा। ध्यान के नाम से सिर्फ आलस्य को आरोपित कर लिया। तो समझना यह ध्यान नहीं है, सिर्फ काहिल है, सुस्ती है, तामस है।

ध्यान होगा तो ऊर्जा प्रकट होगी। किस रंग में, किस ढ़ंग में इसका कोई निर्णय बाहर से नहीं हो सकता। मीरा नाचेगी, बुद्ध बोलेंगे, महावीर चुप खड़े रहेंगे। क्या होगा, क्या रूप होगा-कोई भी नहीं जानता। उस रूप की कोई भविष्याणी नहीं हो सकती है। पर एक बात सुनिश्चित है कि ध्यान गहरा होगा तो कुछ होगा-कुछ अपूर्व, कुछ अद्वितीय।