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  रहस्यदर्शियों पर ओशो
 
 

अनूठा व्यक्तित्व अल हिलाज मंसूर

मंसूर जैसी स्थिति के शख्स के लिए परमात्मा एक उर्जा है। बुद्ध की स्थिति वाले व्यक्ति के लिए परमात्मा, परम् चैतन्य है। जीसस के लिए परमात्मा, प्रेम है। वह एक व्यक्ति नहीं है...

अल हिलाज मंसूर को कत्ल किये जाने से नौ वर्ष पूर्व ही कारागार में बंदी बनाकर डाल दिया गया था। और वह अत्यधिक प्रसन्न था क्योंकि उसने नौ वर्षों का उपयोग निरंतर ध्यान करने में किया। बाहर तो वहां हमेशा शोर व्यवधान, मित्र-शिष्य समाज, संसार और हजारों चिंताएं थी। वहां बहुत प्रसन्न था। जिस दिन उसे कारागार बंद किया गया, उसने हृदय से इसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दिया। उसने कहा-तू मुझसे इतना अधिक प्यार करता है, तभी तो तूने संसार भर से मुझे बचाने के लिए ही इतनी ऐसी सुरक्षा दी है कि वहां अब तेरे और मेरे सिवा और कुछ भी नहीं बचा। तभी तो वैसा मुझे घटा, तभी तो उस मिलन में पिघल कर मैं पूरी तरह से मिट गया।

वे नौ वर्ष अत्यधिक तल्लीनता के वर्ष थे। और उन वर्षों के बाद आखिर यह तय किया गया कि उसे कत्ल किए जाना है, क्योंकि इस सजा से वह जरा भी तो नहीं बदला, बल्कि उसके विपरीत वह उसी दिशा में और अधिक आगे बढ़ गया। उसके आगे बढ़ने की दिशा थी कि उसने यह घोषणा करना शुरू कर दिया-‘मैं ही परमात्मा हूं-अनअलहक। मैं ही सत्य हूं। मैं ही अस्तित्व हूं।’

उसके सदगुरु अल जुन्नैद ने कई तरह से उसे समझाने की कोशिश की-‘तू इस तरह की चीजों की घोषणा मत कर, उस बात को अपने अंदर ही रख, क्योंकि लोग उसे नहीं समझेंगे और तू अनावश्यक रूप से मुसीबत में पड़ जायेगा।’

लेकिन यह मंसूर के वश के बाहर की बात थी। वह जब भी उस विशिष्ट दशा में होता था, जिसे सूफी ‘हाल’ कहकर पुकारते हैं-वह जब भी इस स्थिति में होता था, वह नाचना और गाना शुरू कर देता था। और वे वाक्य अथवा उसका गाना या कुछ भी कहना, अतिरेक से छलकते उद्गार थे, जिन पर नियंत्रण करने वाला कोई था ही नहीं, सारा नियंत्रण जाता रहा था। जुन्नैद उसकी स्थिति को समझता था, लेकिन वह दूसरे लोगों की भी चित्त दशा को भली-भांति  जानता था कि देर-सबेर मंसूर को धर्म विरोधी समझा जावेगा। उसकी घोषणा-‘‘मैं ही परमात्मा हूं’’ एक तथ्य था, उसके पीछे उसका अनुभव ही यह घोषणा कर रहा था, लेकिन लोग उसे नहीं समझ सके। उन लोगों ने उसे उसका दम्भ और अहंकार समझा और फलस्वरूप परेशानी खड़ी हो गई। और उसे सजा देने का क्षण आ पहुंचा।

नौ वर्षों के बाद उन लोगों ने यह निर्णय किया कि इस बीच यह शख्स जरा भी नहीं सुधरा, और वास्तव में गहरे में उसका पागलपन और अधिक बढ़ गया है। अब तो वह निरंतर अनअलहक मैं  ही सत्य हूं की घोषणा कर रहा था। इसलिए अंतिम रूप से यह निर्णय लिया गया कि उसे फांसी पर लटका दिया जाये, उसे मृत्युदण्ड दिया जाये।

जब वे लोग उसे कारागार की कोठरी से बाहर निकालने के लिए गए, तो बहुत मुश्किल उत्पन्न हो गई-क्योंकि वह ‘फना’ की रहस्यमय स्थिति में डूबा हुआ था।  अब वह एक व्यक्ति नहीं रह गया था, वह केवल शुद्धतम उर्जा का पुंज था। उस शुद्ध उर्जा-पुंज को बाहर घसीट कर कैसे लाया जाये? जो लोग उसे बाहर निकालने गये थे वे हतप्रभ और मूक बने रह गये। उस अंधेरी कोठरी में जो कुछ घट रहा था, वह इतना अधिक अद्भुत था, वह इतना अधिक प्रकाशवान था कि मंसूर को चारों ओर से इस संसार का नहीं, जैसे कोई दैवी आभा मंडल घेरे हुए था। मंसूर वहां एक व्यक्ति की भांति मौजूद नहीं था। सूफि़यों के पास इस स्थिति के लिए इस बारे में दो शब्द हैं-एक है ‘बक़ा’ और दूसरा है ‘फ़ना’,। ‘बका’ का अर्थ होता है कि तुम अपनी अस्मिता को सीमाबद्ध कर रहे हो, तुम अपने चारों ओर परिभाषा खड़ी कर रहे हो, तुम्हारे पास  एक सीमा रेखा है जो यह इंगित करती है कि यह तुम हो। ‘फना’ का अर्थ है कि तुम अब पिघल कर परमात्मा में घुल गये और तुम्हारी कोई परिभाषा, या सीमा बद्धता ही नहीं रही। बक़ा एक ‘बर्फ’ के क्यूब की भांति है, और फ़ना की स्थिति है-पिघले हुए बर्फ क्यूब की, जो नदी में घुल कर उसके साथ एक हो गया।

रहस्यदर्शियों के साथ ऐसा निरंतर घटता रहता हैः वे ‘बक़ा’ से ‘फ़ना’ में और ‘फ़ना’ से ‘बक़ा’ की स्थिति में आते-जाते रहते हैं। ये लगभग दिन और रात की तरह होता हैं। धीमे-धीमे इस बारे में एक तरह की लयबद्वता आ जाती है। कभी तुम उस रहस्यदर्शी को बक़ा की स्थिति में पाओगे-और जब तुम उसे बक़ा की स्थिति में पाओगे तो तुम उसमें एक ऐसी सर्वाधिक अनूठी वैयक्तिकता  देखोगे, जो उससे पूर्व कभी न देखी होगी। बक़ा की उस स्थिति में वह अनूठी वैयक्तिकता बहुत मौलिक, बहुत पवित्र और प्रतिरोध रहित निर्मल होगी। वह आकाश के विरूद्ध खड़े एक ऊंचे पर्वत-शिखर की भांति होगी, अथवा काली अंधेरी रात में जगमगाते हुए एक सितारे की भांति-इतनी अधिक स्पष्ट, इतनी अधिक सभी से अलग और एक विशिष्ट व्यक्ति की भांति होगी। बक़ा का यही अर्थ होता है- व्यक्तिगत रूप से एक विशिष्ट व्यक्तित्व।

सामान्य संसार में तुम ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों को न खोज सकोगे। इस स्थान पर लोग तो बहुत हैं, लेकिन ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं हैं। लोग तो बहुत हैं, लेकिन ऐसी वैयक्तिकता वाले व्यक्ति नहीं है। यहां एक ऐसा व्यक्ति है जिसके पास अपनी कोई वैयक्तिकता नहीं हैं। वह भीड़ का एक गुमनाम भाग है, वह उसी तरह जीता है, जैसे भीड़ के अन्य सभी लोग जीते हैं, वह उन्हीं लोगों की तरह बातचीत करता है, वह उन्हीं की तरह भोजन करता है, वह उसी तरह फिल्म देखने जाता है, जैसे वे सभी लोग जाते हैं, वह वैसे ही कार खरीदता है। जैसे वे खरीदते हैं, वह वैसे ही घर बनाता है, जैसे वे बनाते हैं-वह निरंतर उन सभी लोगों का, जनसमूह का, अर्थात् भीड़ का अनुसरण कर रहा है। वह स्वयं में स्थित नहीं है, वह बहुत बड़ी उलझन में पड़ा हुआ है। उसकी सीमा रेखाएं बेतरतीब और अव्यवस्थित हैं। वे सीमा-रेखाएं वहां हैं तो, लेकिन वे गडडमडड हैं, वे जरा भी स्पष्ट नहीं हैं। यदि तुम उसके अंदर झाँको, तो तुम उसे वहां नहीं पाओगे। तुम वहां परिवार व समाज द्वारा थोपे गए नियमों और अनुशासन से निर्मित आदतों से निर्मित एक ढांचे अर्थात् कंडीशनिंग की पर्त पाओगे। वह एक मुसलमान होगा, क्योंकि उसका जन्म एक मुसलमाना के घर में हुआ है। वह गीता के पाठ को दोहरा रहा होगा, क्योंकि उसके पिता के पिता भी ऐसा ही किया करते थे। युगों-युगों से वे उसका पाठ करते आये हैं, इसलिए वह भी उसका पाठ कर रहा है। यह सभी कुछ एक संयोग जैसे ही प्रतीत होता है, इसके पास अपना कोई अनूठापन नहीं है। वह भीड़ भरे समाज को केवल एक भाग है। वह उसी तरह जीता है, जैसे वे लोग जीते हैं, वह उसी तरह मर जाता है, जैसे वे लोग मरते हैं। वह उनका ही जीवन जीता है और उनकी ही मौत की तरह मरता है। वह कभी भी अपने अधिकार का स्वयं अपने होने का दावा नहीं करता, वह कभी भी विद्रोह नहीं करता। सामान्य मनुष्य की यही स्थिति है और यही उसका सामान्य व्यक्तित्व है। यह कोई वैयक्तिकता है ही नहीं।

निजता और वैयक्तिकता का उदय केवल तभी होता है, जब तुम बहुत स्पष्टवादी और निर्मल होते हो। जब तुम अपने अपनी आत्मा के मौलिक चैतन्य रूप को उपलब्ध होते हो। जब तुम अपना ही कार्य करते हो। जब तुम इस  बात की जरा भी चिंता नहीं करते कि दूसरे लोग क्या कहते हैं, जब तुम अपनी स्वतंत्रता के लिए अपना पूरा जीवन बलिदान करने को तैयार होते हो। जब स्वतंत्रता तुम्हारे लिए सर्वोच्च तथा अंतिम मूल्य बन जाती है और कोई भी चीज कुछ भी अर्थ नहीं रखती तुम्हारे लिए, तभी तुम अपनी निजता में ‘बक़ा’ की स्थिति को प्राप्त करते हो। और यह भी विरोधाभास है, केवल विशिष्ट व्यक्ति ही ‘फ़ऩा’ में पूरी तरह पिघलने, मिट जाने और पूर्ण विलुप्त होने की स्थिति में जा सकता है।

पहिले तुम्हें स्वयं में होना होगा, केवल तभी तुम विलुप्त हो सकते हो। यदि तुम हो ही नहीं, तब कौन जा रहा है विलुप्त होने? पहिले तुम्हें स्वयं को भीड़ से मुक्त करना होगा, केवल तभी तुम छलांग लगा सकते हो। इसलिए विरोधाभास यही है, कि जो व्यक्ति बक़ा की स्थिति में हो, केवल  वही फ़ना की स्थिति में जा सकता है।

समूह में रहने वाला सामान्य मनुष्य फ़ना की स्थिति में नहीं जा सकता, क्योंकि वह यह जानता ही  नहीं कि वह कौन है, उसके पास अभी तक न तो कोई पता है, और न उसके पास अभी तक कोई नाम है और न कोई पहिचान है। वह भीड़ में केवल एक संख्या की भांति है। उसकी आसानी से हटाकर उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को रखा जा सकता है, और उसे बदला जा सकता है। वह एक विशिष्ट तरह के कार्य करने वाला एक भाग है। वह एक कर्मचारी है। उदाहरण के लिए वह एक इंजीनियर हो सकता है। यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तुम उसके स्थान पर वहां दूसरे  इंजीनियर रख सकते हो और कोई भी उसके अभाव का अनुभव नहीं करेगा। अथवा वह डॉक्टर  हो सकता है। यदि वह मर जाता है तुम उसके स्थान पर वहां दूसरे डॉक्टर को बैठा देते हो, और कोई भी व्यक्ति उसके अभाव का अनुभव नहीं करेगा। वह बदले जाने  भाग या पुर्जे की तरह है, वह एक ड्यूटी निभाने वाला कर्मचारी है।

लेकिन वह व्यक्ति, जो ब़का की स्थिति में होता है, वह एक कर्मचारी की भांति नहीं होता, उसके पास, उसके अस्तित्व में एक पूरी तरह से भिन्न गुणात्मकता होती है। उसके अभाव को हमेशा के लिए महसूस किया जाता रहेगा। एक बार यदि वह चला गया, तो तुम उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति न पा सकोगे। तुम जीसस के स्थान पर दूसरा जीसस नहीं पा सकते। तुम वेटिकन के पोप के स्थान पर बदल कर दूसरा पोप रख सकते हो और जिसे तुमने कई बार बदला भी है। हर बार जब एक पोप मर जाता है, उसके स्थान पर दूसरा आ जाता है। तुम बहुत आसानी से पुरी के शंकराचार्य को बदल सकते हो, इस बारे में कहीं कोई समस्या ही नहीं है। एक शंकराचार्य के स्थान पर दूसरे नहीं बदल सकते। तुम जीसस को बदल कर  दूसरा जीसस नहीं ला सकते, तुम दूसरा मुहम्मद बदल कर नहीं ला सकते। एक बार वह चले गये, तो वे हमेशा के लिए चले गये। वे एक अनूठी निजता को लेकर अस्तित्व में रहे-और यही स्थिति होती है बक़ा की। और केवल ऐसे ही लोग फ़ना की स्थिति में जाने में समर्थ हैं। यह विरोधाभासी दिखाई देता है, क्योंकि फ़ना का अर्थ है तुम अपनी पूरी छवि और अपना पूरा अस्तित्व खो रहे हो।

लेकिन पहिले तुम्हारे पास खोने के लिए वह अस्तित्व तो होना चाहिए। यदि वह तुम्हारे पास है ही नहीं, तो तुम उसे कैसे खो सकते हो? तुम उसका त्याग कैसे कर सकते हो, यदि वह तुम्हारे पास है ही नहीं। इसलिए विरोधाभास, प्रत्यक्ष रूप से ऐसा आभास होता है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा सार्वभौमिक नियम काम कर रहा है। पहिले तुम्हारे पास गिराने या छोड़ने के लिए कुछ पूंजी अपने पास होनी चाहिए। पहिले उसे एक साथ इकट्ठा करो। उसे एक साथ इकट्ठा करना होता है, तभी आता है मौन। पहिले उसे एक साथ एक स्थान पर इकट्ठा करो, उसका एकीकरण करो, बका बनो, और तभी तुम फ़ना में जा सकते हो।

यह शख्स मंसूर, एक अनूठी वैयक्तिकता का मालिक बना। वहा जहां कहीं भी गया, तुरन्त उसे पहिचान लिया गया। उसकी ओर दृष्टि न जाना, उससे चूकना असंभव था। वह भारत भी आया वास्तव में उसके सदगुरु अल जुन्नैद ने उससे कहाः तुम्हारे लिये अच्छा यही है कि तुम दूसरे देशों में जाकर रहो, अन्यथा यहां तुम पकड़ लिये जाओगे।  इसलिए दूर-दूर देशों तक उसने यात्राएं की। प्रत्येक जगह वह तुरन्त पहिचान लिया गया। वह सम्राटों का सम्राट था। तुम उसकी ओर देखे बिना रह ही नहीं सकते थे। यदि वह दस हजार लोगों की भीड़ में भी खड़ा हुआ था, तब भी तुम उसे देख और पहचान सकते थे। वह बक़ा की स्थिति में था, वह स्फटिक या बिल्लौर की भांति स्पष्ट था। उसकी उपस्थिति अत्यधिक, सघन, और विरल थी। एक बार तुमने उसकी ओर देख लिया, तो अन्य सभी व्यक्तियों के चेहरे पीले, फीके और सपाट दिखाई देने लगते थे। इसलिए देर-सबेर वह हर जगह पहिचान लिया गया और उसे उस देश को छोड़ कर जाना पड़ा, क्योंकि समस्याएं खड़ी होने लगी।

वह मध्य पूर्व के कई देशों में गया, लेकिन वह जहां कहीं भी गया, कुछ दिनों तक तो सभी कुछ ठीक-ठाक रहा-वह वहां बिना पहिचाने रहता रहा -लेकिन अधिक समय तक नहीं। इसलिए अंत में वापस आकर उसने सद्गुरु जुन्नैद से कहा-’’यह अब निरर्थक हो गया है। मैं हर जगह पकड़ा जा सकता हूं, इसलिए यहीं क्यों नहीं?’’

जब इस शख्स को कैदखाने की कोठरी से बाहर लाने का प्रयास किया गया , तो जो अधिकारी उसे बाहर ले जाने के लिए आये थे, वे उसे कोठरी में खोज ही नहीं सके, कि वह वहां है कहां? वह वहीं था। पूरी तरह से वहीं था, क्योंकि पूरी कोठरी उसकी दीप्ती; उसकी उपस्थिति से आलोकित थी। वह उपस्थिति बहुत सघन थी, पर फिर भी अव्याख्य! वे लोग कोठरी में प्रवेश ही नहीं कर सके। वे लोग भय से स्तब्ध, आश्चर्य चकित होकर खड़े सोचते रहे-आखिर क्या करना चाहिए? अंत में साहस जुटाकर उन्होंने उसे खींच कर बाहर लाने का प्रयास किया, लेकिन ऐसा करने में वे सफल न हो सके। तब इस बारें में केवल एक ही रास्ता थाः उसके सद्गुरु अल-जुन्नैद से कहा गया कि वह आकर उनकी सहायता करे, क्योंकि समय गुजरता जा रहा था और उन्हें मंसूर को फांसी पर चढ़ाना था और वे उसे बाहर भी नहीं निकाल पा रहे थे।

अल जुन्नैद आया और उसने कहाः ‘‘मंसूर अब मेरी बात सुनो। मैंने अनेक बार तुमसे कहा कि अब तुम अपने को अल्लाह के सुपुर्द कर दो। यदि वह चाहता है कि तुम सूली पर चढ़ो तो सामान्य होकर सूली पर चढ़ जाओ। उसे अपना काम पूरा करने दो। अब बहुत हुआ, यह यथेष्ट है।’’ और जब अल जुन्नैद ने चिल्ला कर कहा तो मंसूर ‘फना’ की स्थिति में वापस लौटा। अब फिर से वहां एक सीमा रेखा दिखाई दी, अब वह एक उर्जा का बादल न रहा, वह ठोस और सघन बन गया। उसके शरीर की सीमाएं प्रकट हुई। उसका सदगुरु आ पहुंचा था और उसे अपने सदगुरु की बात सुननी ही थी।

तब उसे कत्लगाह तक ले जाया गया। लेकिन उसे मारना बहुत कठिन था उसके शरीर पर तलवार के प्रहारों से एक हजार घाव हो गए-लेकिन वह फिर भी जीवित था। तब उन्होंने उसके एक-एक अंग को काटना शुरू किया, लेकिन वह फिर भी जीवित था-क्योंकि कत्लगाह पर वह फिर ब़का की स्थिति से फ़ना की स्थिति में चला गया। वह फिर से परमानंद में, परमात्मा की उस उर्जा में लीन हो गया।

मंसूर जैसी स्थिति के शख्स के लिए परमात्मा एक उर्जा है। बुद्ध की स्थिति वाले व्यक्ति के लिए परमात्मा, परम् चैतन्य है। जीसस के लिए परमात्मा, प्रेम है। वह एक व्यक्ति नहीं है। यह तीन ‘एल’, ‘लव’(प्रेम), ‘लाइफ’ (जीवन) और ’लाइट’ (प्रकाश) सीखने जैसे हैं। परमात्मा प्रेम, जीवन और प्रकाश है। तुमने तीन ‘आर’ के बारे में सुना होगा। यह तीन ‘आर’ तुम्हें सम्य बनाते हैं और यह तीन ‘एल’ तुम्हें धार्मिक बनाते हैं।

और अधिक जीवंत बना-इतने अधिक जीवंत कि तुम जीवन के साथ एक हो जाओ। और तब प्रेम को उमगने दो, वह इतना अधिक हो जाए, कि उसका प्याला छलकना शुरू हो जाए। तब तुम सीमाओं को अतिक्रमण कर देते हो। तब तुम्हीं में से एक नई तरह का प्रकाश झरना शुरू हो जाता है, तुम दीप्तिवान हो उठते हो। ये तीन ‘एल’ सीखने जैसे हैं, और वे तीन आर भुलाने जैसे हैं।

सूफी धर्म का पूरा तत्वज्ञान उस परमात्मा तक पहुंचना है, जिसकी कोई भी धारणा नहीं है और जो एक ब्रह्याण्डीय उर्जा जैसा है। लेकिन हम सभी की उसके बारे में अपनी-अपनी धारणाएं है और सभी धारणाएं और विचार बचकाने हैं, अपरिपक्व हैं। परमात्मा को किसी विचार या धारणा में आबद्ध नहीं किया जा सकता।

हमारे पास दूसरो के द्वारा  ही दिये गए विचार और धारणाएं हैं और हमने उन्हें सीखा हुआ है। वे सभी साधारणा जन समूह द्वारा दिये गये संकेत और सुझाव हैं, और इन विचारों को  तुम्हारे मन में ठूस दिया गया है। ईसाइयों की धारणा है कि वह एक सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा व्यक्ति है। वह देखने में बहुत प्राचीन लगता है, और वह चारों ओर से फरिश्तों से घिरा हुआ स्वर्ण-सिंहासन पर बैठा हुआ पूरे संसार को नियंत्रित कर रहा है। इसमें गलत कुछ भी नहीं है, पर इसमें कोई भी चीज ठीक भी नहीं है। छोटे बच्चों के कौतूहल को संतुष्ट करने के लिए तो यह ठीक है, क्योंकि बच्चों को भी परमात्मा के बारे में किसी विचार या धारणा की आवश्यकता होती हैं, लेकिन इस बचकानेपन से प्रत्येक व्यक्ति को विकसित होना होता है।

-ओशो
पुस्तकः अभी, यहीं, यह
प्रवचन नं. 3 से संकलित