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  ओशो जीवन रहस्य
 
 

मंत्रः एक श्रद्धा शक्ति

मंत्र का अर्थ होता हैः जो मन को रुझा ले। मंत्र का अर्थ होता हैः जो मन को भा जाए, जो मन को रंग ले, जो मन के लिए सूत्र बन जाए। तो कोई भी चीज मंत्र हो सकती है। इसलिए मां अपने छोटे बच्चे को सुलाने के लिए लोरी गाती है; वह भी मंत्र की तरह काम करता है...

मंत्रो इत्यादि में कोई शक्ति नहीं होती। शक्ति तो तुम्हारी श्रद्धा में होती है। श्रद्धा तुम्हारी कुरान पर है तो कुरान में शक्ति आ जाएगी। और श्रद्धा तुम्हारी गीता पर है तो गीता में शक्ति आ जाएगी। श्रद्धा गायत्री पर तो गायत्री में और श्रद्धा नमोकार पर तो नमोकार में। मगर ध्यान रखना, शक्ति है श्रद्धा में। न तो नमोकार में कोई शक्ति है। किसी हिंदू को तो कहो कि दोहराओ नमोकार! वह दोहरा देगा, उसे कुछ अनुभव नहीं होगा। मगर जैन जब दोहराता है तो गदगद हो जाता है। यह नमोकार नहीं है जो गदगद कर रहा है, नहीं तो सारी दुनिया को गदगद कर देता है। यह उसका भाव है।

नास्तिक को कहा कि गायत्री में बड़ी शक्ति है और तुम गायत्री उसके सामने कहो, कुछ असर न होगा। तुम बजाते रहो बीन, भैंस पड़ी पगुराय!

गायत्री में कोई शक्ति नहीं है। शब्दों में कहीं शक्ति हो सकती है शक्ति होती है तुम्हारे भाव में। तुम जहां अपना भाव उड़ेल देते हो, बस वहीं शक्ति पैदा हो जाती है। मंत्रों में उड़ेल दोगे, मंत्रो में पैदा हो जाएगी।

प्रसिद्ध आंग्ल कवि टेनिसन ने लिखा है कि बचपन से ही उसे न मालूम किस आकस्मिक रूप से यह बात पता चल गई। जब भी उसको नींद आती थी तो वह पड़ा-पड़ा करे क्या! छोटा बच्चा, नींद न आए। और अंग्रेज तो अपने बच्चों को भी अलग सुलाते हैं, अलग कमरे में सुलाते हैं। सो अंधेरा हो जाए कमरे में, मां बत्ती बुझा कर चली जाए। और अकेले में डर भी लगे और कुछ सूझे भी नहीं। क्या करे क्या न करें! तो अपना ही दोहराए-टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन। इससे थोड़ी हिम्मत आए, थोड़ी गर्मी आए। जैसे कोई और भी है, जो टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन कह कर पुकार रहा है। धीरे-धीरे उसे एक बात अनुभव में आई कि पंद्रह मिनट तक टेनिसन-टेनिसन कहते हुए बड़ी गहरी नींद आ जाती है। उसे तो आविष्कार हो गया। ट्रांसेनडेंटल मेडिटेशन! महर्षि महेश योगी को बहुत बाद में पता चला, यह तो महर्षि टेनिसन पहले ही खोज गया। अपना ही नाम! फिर तो धीरे-धीरे उसका अभ्यास इतना गहन हो गया कि दस-पंद्रह की भी जरूरत न रहे, बस तीन दफा कहे-टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन-और गहरी निद्रा में खो जाए। फिर तो उसे यह भी राज हाथ लग गया कि बस में बैठा है या ट्रेन में सफर कर रहा है, कोई काम नहीं है, तो वह बैठा-बैठा टेनिसन का पाठ करे। उसका पाठ करते ही चित्त शांत होने लगे। जैसे जागे-जागे सो जाए! आंख खुली रहे और भीतर सन्नाटा हो जाए। यह टेनिसन शब्द में हो गया।

अब टेनिसन शब्द कोई न तो संस्कृत भाषा का है, न अरबी का, न किसी भगवान का नाम है। विष्णु सहस्त्र नाम में यह नाम ही नहीं है टेनिसन। हजार नाम है भगवान के, मगर टेनिसन नहीं है उसमें। अब देखते हो कितनी कमी रह गई! नए संस्करण में एक हजार एक कर देना चाहिए। टेनिसन तो जोड़ ही देना चाहिए। क्योंकि इसने जिंदगी भर इसका उपयोग किया। यह इसके लिए मंत्र बन गया।

मंत्र शब्द को समझो। मंत्र का अर्थ। होता हैः जो मन को रुझा ले। मंत्र का अर्थ होता हैः जो मन को भा जाए, जो मन को रंग ले, जो मन के लिए सूत्र बन जाए। तो कोई भी चीज मंत्र हो सकती है। इसलिए मां अपने छोटे बच्चे को सुलाने के लिए लोरी गाती है; वह भी मंत्र की तरह काम करता है। राजा बेटा सो जा! राजा बेटा सो जा! राजा बेटा सो जा। कोई ज्यादा बड़ा मंत्र नहीं है, छोटा सा मंत्र है। गायत्री शायद पढ़ो तो राजा बेटा न भी सोए, उठ कर बैठ जाए, कि यह क्या कर रही है तू? उसकी समझ में न आए। नमोकार पढ़ो तो उलटे-सीधे प्रश्न पूछने लगे कि इसका क्या अर्थ? उसका क्या अर्थ पाली, प्राकृत, संस्कृत, अरबी तुम बच्चे को पढ़ोगे तो बैठ जाएगा एकदम उठ कर और हजार तरह के प्रश्न खड़े करने लगेगा। लेकिन राजा बेटा सो जा वह भी समझता है। राजा बेटा का भी मतलब समझता है और सो जाने का मतलब भी समझता है। और सो जा शब्द में, अगर इसे बार-बार दोहराया जाए-सो जा, सो जा, सो जा-तो नींद अपने आप आनी शुरू हो जाए। इस शब्द में भी थोड़ा नींद का नशा है। यही मंत्र हो गया।

मंत्र में कोई शक्ति नहीं होती। किसी मंत्र में कोई शक्ति नहीं होती। इसलिए तो एक धर्म का मंत्र दूसरे धर्म के काम नहीं पड़ता। इसलिए तो एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के मंत्रों पर हंसते हैं, कि यह सब मूर्खतापूर्ण है। मगर अपने धर्म के मंत्र पर उनको बड़ी श्रद्धा होती है। मतलब भी पता न हो, तब भी श्रद्धा होती है। तुम्हें जो समझ में आ जाए, उससे तुम प्रभावित होओ, तब भी समझ में आ सकता है। लेकिन जो तुम्हें समझ में ही नहीं आता, उससे तुम क्या प्रभावित होते होओगे!

लेकिन करीब-करीब दुनिया के पुरोहितों ने यह व्यवस्था कर रखी है कि पुरानी मुर्दा भाषाओं को मरने नहीं देते। कम से कम मंदिरों में जिलाए रखते हैं। पुरानी मुर्दा भाषाओं की एक खूबी हैः तुम्हारी समझ में आती नहीं, तुम सोचते हो कि गजब की चीजें होंगी!

तुम कभी वेदों को उठाकर देखो, बड़े हैरान होओगे। निन्यानबे प्रतिशत कूड़ा-कर्कट! जो होना ही नहीं चाहिए वेद में, जिसको वेद कहना एकदम व्यर्थ की बात है! मगर कौन पढ़ता है? किसको देखना है? बाइबिल को उठा कर देखो, कचरा ही कचरा! जिसकी कोई जरूरत नहीं है। मगर ईसाई पढ़ता है बाइबिल को?

एक डिक्शनरी बेचने वाला एक दरवाजे पर खड़ा था और कह रहा था कि नई डिक्शनरी निकली है और हर बच्चे के काम की है। डिक्शनरी पर नीले रंग का पुट्ठा था। महिला टालना चाहती थी इसको। उसने दूर रखी टेबल पर कहा कि देखो, हमारे पास तो यह डिक्शनरी है ही। नीले रंग की, उतनी ही मोटी पुस्तक रखी थी।

वह विक्रेता मुस्कुराया और उसने कहा कि देवी जी, आप किसी और को बुद्धू बनाना! वह डिक्शनरी नहीं है, वह बाइबिल है।

इतने दूर से उसने कैसे पहचाना? उस महिला ने कहाः गजब कर दिया तुमने! इतने दूर से तुमने कैसे कहा कि वह बाइबिल है?

उसने कहाः जमी हुई धूल बता रही है कि कभी कोई उलटता भी नहीं, कभी कोई छूता भी नहीं, सफाई भी कोई नहीं करता। डिक्शनरी को तो आदमी उलटता है रोज, देखना पड़ता है आज इस शब्द का अर्थ, कल उस शब्द का अर्थ। इतनी धूल नहीं जम सकती। किसी और को आप बुद्धू बनाना।

और वह बाइबिल ही थी। शास्त्रों पर तो धूल जम रही है। मगर वे ऐसी भाषाओं में लिखे हैं कि पूजा के योग्य हैं। फूल चढ़ा दिए, चंदन लगा दिया, सिर झुका लिया, झंझट मिटाई। काश तुम्हें उनके अर्थ समझ में आ जाएं तो शायद तुम सिर भी झुकाने में संकोच करो, कि मैं किसको सिर झुका रहा हूं! क्या प्रयोजन है? क्या अर्थ है? 

जो तुम्हारे अर्थ समझ में आते हों और उनसे भाव पैदा होता हो, तो निश्चित ही शक्ति आ जाती है मंत्र में। लेकिन वह शक्ति तुम्हीं डालते हो। और यह अगर तुम्हारी समझ में आ जाए तो डालने की क्या जरूरत है मंत्र में? वह शक्ति तो तुम्हारी ही है। तुम उस शक्ति को बिना मंत्र के भी उपयोग में ला सकते हो-और वही ध्यान है। बिना मंत्र के अपनी शक्तियों के प्रति सजग हो जाना ध्यान है।

मंत्र तो बहाना है। जैसे कि कोई आईने में अपने चेहरे को देखे। आईने में थोड़े ही चेहरे होता है। चेहरा तो तुम्हारे पास है। आईने में तो केवल तस्वीर होती है। और आईना अगर इरछा-तिरछा होगा, तस्वीर इरछी-तिरछी होगी। तुमने कई तरह के आईने देखे होंगे। किसी आईने में बड़े दिखाई पड़ोगे, किसी आईने में पतले दिखई पड़ोगे, किसी में मोटे दिखाई पड़ोगे। किसी आईने में बिलकुल सींकिया पहलवान। किसी आईने में भारी-भरकम। किसी आईने में बड़े कुरूप, कि खुद को देख कर हंसी आ जाए। किसी आईने में बड़े सुंदर। ये आईने हैं, तुम नहीं हो। मंत्र तो आईने हैं, तुम नहीं हो।

पहले कभी शब्द-ध्वनि का प्रभाव हुआ करता था। इस युग में मंत्रों और शब्दों का कोई प्रभाव नहीं होता। चंदूलाल एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन से कहा।

यदि मैं कोई शब्द बोलूं और उस शब्द के प्रभाव से आप उठ कर खड़े हो जाएं, जोश आ जाए, तब तो शब्दों का प्रभाव मानोगे? मुल्ला ने पूछा।

फिर तो शब्दों का प्रभाव मानना पड़ेगा। चंदूलाल ने स्वीकृति दी।

जो शब्द-ध्वनि का प्रभाव नहीं समझते, वे बेअकल होते हैं, निरे गधे! नसरुद्दीन बोला।

गाली मत देना, नहीं तो देख लूंगा। चंदूलाल ने खड़े होते हुए कहा।

मुल्ला ने कहाः देखा शब्द-शक्ति का प्रभाव! खड़े हो गए बैठे से। और मैंने कुल इतना ही कहा है-निरे गधे!

समझ में आए, तो निरे गधे कोई कह दे, तो बैठे होओगे तो खड़े हो जाओगे। इसको क्या तुम समझते हो कि शब्द-शक्ति का प्रभाव है? अगर तुम्हें भाषा हिंदी न आती हो और कोई तुमसे गधा कह दे, तो तुम बिलकुल परेशान न होओगे। तुम मुस्कुराते ही रहोगे। तुम्हें पता ही नहीं चलेगा कि कोई अड़चन की बात हो रही है। कोई दूसरी भाषा में तुम्हें गाली देता रहे...।

मेरी इटैलियन संन्यासी है-काव्या। दो साल यहां थी। अब काव्या तो हमारी भाषा में सुंदरतम शब्दों में एक है-कविता। कविता का शास्त्र। जब मैंने उसे काव्या नाम दिया था, तब भी मैंने थोड़ी सी झिझक उसके चेहरे पर देखी थी। मगर मैं भी कुछ बोला नहीं, वह भी कुछ बोली नहीं। बात आई-गई हो हो गई। दो साल यह यह यहां थी, उसने कभी कुछ कहा नहीं। अभी इटली गई। वहां भी छह महीने से है, छह महीने बाद अभी पत्र उसका चार दिन पहले आया। लिखाः अब कहना ही पड़ेगा। पहले ही दिन कहना चाहती थी, लेकिन आपने इतने प्रेम से नाम दिया, सो मैंने कुछ कहा नहीं। फिर मैंने सोचा कि यहां किसको पता है! लेकिन लब से इटली में आई हूं तो बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई, जिसको भी मैं नीम बताती हूं वही हंस देता है एकदम से ।

इटैलियन भाषा में काव्या का अर्थ होता है-सुअर का बच्चा। तो उसने मुझे लिखाः मैं घर से नहीं निकलती, क्योंकि किसी ने पूछा कि तेरा नाम क्या है, तो मैं अपना पुराना नाम बताना नहीं चाहती ; क्योंकि वह तो बात खत्म हो गई, मेरा नाम तो काव्या है। और मैं किसी को अपना नया नाम बताऊं कि बस फौरन लोग लोग हंसने लगते हैं। वे कहते हैं, हद हो गई! अरे मूरख तो तूने कहा क्यों नहीं? तो अब मैं हिम्मत जुटा रही हूं ढाई साल के बाद कि कृपा करके मेरा नाम बदल दो।

यहां तो हम सोच भी नहीं सकते थे कि काव्या, सुअर का बच्चा, इनका कोई संबंध हो सकता है। अगर मुझे जरा भी अंदाज होता तो मैंने कभी भूल कर उसे यह नाम नहीं दिया होता।

समझ में आ जाए तो तुम प्रभावित होते हो, नहीं समझ में आए तो तुम कैसे प्रभावित होओगे? तुम्हारा प्रभाव तुम्हारे ही भीतर से आता है। तुम शक्ति डालते हो।

मंत्रो  इत्यादी में कोई शक्ति नहीं होती। शब्दों में कोई शक्ति नहीं होती। दुनिया में कोई तीन हजार भाषाएं हैं, शब्दो में क्या शक्ति होगी? गुलाब के फूल के लिए तीन हजार नाम हैं दुनिया में। और गुलाब का फूल तो गुलाब है-चाहे इस नाम से पुकारो, चाहे उस नाम से पुकारो। और परमात्मा के हजारों नाम हैं, चाहे इस नाम से पुकारो, चाहे उस नाम से पुकारो। कुछ फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जिस नाम को तुम परमात्मा का नाम मान लेते हो, उसमें अर्थ आ जाता है, उसमें गहराई आ जाती है। वह गहराई तुम्हारी  है, वह अर्थ तुम्हारा है।

-ओशो
पुस्तक-प्रेम क्या है
प्रवचन नं. 7 से संकलित