Osho World Online Hindi Magazine :: April 2013
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  ओशो दर्शन
 
 

नृत्य में डूबो और उत्सव मनाओ

निश्चित ही यही धर्म है। और अगर तुम नृत्य में डूब सकते, गीत नहीं गा सकते, उत्सव नहीं मना सकते-तो और क्या करोगे?

पहली तो बातः तुम अपनी फिकर के लिए यहां आए हो कि सबकी फिकर के लिए? तुमने कोई ठेका लिया है सारे लोगों की फिकर का? तुम कौन हो उनकी चिंता करने वाले? पहले तुम तो पा लो!

और तुम यह नहीं पूछते कि शास्त्रीय संगीत सबके लिए है या नहीं! और तुम यह नही पूछते कि शेक्सपीयर के नाटक, और कालिदास के शास्त्र, और भवभूति की रचनाएं, और रवींद्रनाथ के गीत सबके लिए हैं या नही! तब तुम यह नहीं कहते कि कोई सस्ते कालिदास क्यों पैदा नहीं किये जाते? जो सर्वसुलभ हों! धर्म के लिए ही क्यों यह आग्रह है तुम्हारा?

धर्म को लोगों ने समझ रखा है-दो कौड़ी की चीज होनी चाहिए! सस्ती होनी चाहिए! सर्वसुलभ होनी चाहिए! और धर्म इस जीवन में सबसे कीमती चीज है; सबसे बहुमूल्य। यह तो जीवन का परम शिखर है। यहां कालिदास, भवभूति, रवींद्रनाथ, शेक्सपीयर और मिल्टन जैसे लोगों की भी पहुंच मुश्किल से हो पाती है। यहा आइंस्टीन और न्यूटन और एडिंग्टन जैसे वैज्ञानिकों तक की पहुंच नहीं हो पाती। सर्व साधारण की तो बात ही तुम छोड़ दो। यहां तो कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई कृष्ण, कोई जीसस-अंगुली पर इने-गिने लोग पहुंच पाए। मैं क्या करूं! नियम यह हैः एस धम्मो सनंतनो! 

धर्म तो परम शिखर है। इसके लिए तो प्रतिभा चाहिए। इसके लिए तो बड़ी प्रखर प्रतिभा चाहिए, क्योंकि यह जीवन के आखिरी तत्व को खोज लेना है।

तुम्हारा प्रश्न सोचने जैसा है। और पहले प्रश्न के संदर्भ में इसको लेना, तो आसान हो जाएगा समझना।

कहते होः ‘आप कहते हैं कि नृत्य में डूबो, उत्सव मनाओ, गीत गाओ-यही धर्म है।’

निश्चित ही यही धर्म है। और अगर तुम नृत्य में डूब सकते, गीत नहीं गा सकते, उत्सव नहीं मना सकते-तो और क्या करोगे?

तुम कहते होः ‘इसकी फुर्सत कहां है।’

और चिलम पीने की फुर्सत है! और ताश खेलने की फुर्सत है! और अभी बरसात में चौपड़ बिछा कर बैठने की फुर्सत है! और आल्हा-ऊदल गाने की फुर्सत है! किन गंवारों की बात कर रहे हो यहां? ये ही गंवार गांवों में बैठ कर हनुमान-चालीसा पढ़ रहे हैं! और हनुमान जी की पूजा करने की फुर्सत है! और गीत गाने की फुर्सत  नहीं!  और नाचने की फुर्सत नहीं! और उपद्रव करने की फुर्सत है! हिंदू-मुस्लिम दंगा करना हो, तो बिल्कुल फुर्सत है! और बलात्कार करना हो, तो फुर्सत है! हरिजनों के झोपड़े जलाने हों, तो फुर्सत है! और चुनाव लड़ना हो, तो फुर्सत है!

जो मर गए हैं बिल्कुल, वे भी वोट देने पहुंच जाते हैं लोगों के कंधों पर  बैठ कर! अंधे, लंगड़े, लूले, इनको चुनाव में रस है! और अगर इनसे कहो-उत्सव-तो चिन्तामणि पाठक को बड़ी चिंता पैदा हो रही है!

तुम कहते होः ‘फुर्सत कहां है लोगों को। निर्धनता का अभिशाप झेल रहे हैं।’

कौन जिम्मेवार है? अगर झेल रहे हैं, तो खुद जिम्मेवार हैं। और तुम जैसे लोग जिम्मेवार हैं, जो उनकी निर्धनता का किसी तरह का सुरक्षा का उपाय खोज रहे हो। क्यों झेल रहे हैं निर्धनता का अभिशाप?

पांच हजार साल से क्या भाड़ झोंकते रहे! अमरीका तीन सौ साल में समृद्ध हो गया। कुल तीन सौ साल का इतिहास है। और दुनिया के शिखर पर पहुंच गया! तुम क्या कर रहे हो? तुम्हें लेकिन फुर्सत है रामचरितमानस पढ़ने की!. हर साल रामलीला खेलने की। वही गांव के गुंडे राम बन जाएंगे-और उनके पैर छूने की! और गांव का कोई मूर्ख सीता बन जाएगा, और तुम जानते हो कि कौन है यह! मूंछें मुड़ाए खड़ा हुआ है! और सीतामैया-सीतामैया कर रहे हो! तुम्हें फुर्सत है कि समय कैसे काटें! हर तरह से समय बरबाद करने की फुर्सत है! मगर आलसी हैं; बेईमान हैं।

और तुम्हारे महात्माओं ने तुम्हें बेईमानी और आलसीपन सिखाया है। वे तुम्हें सिखा गए, कि क्या करना है! अरे, सबका देखने वाला भगवान है! जब उसकी मर्जी होगी, छप्पर फाड़ कर देता है! अभी तक किसी को छप्पर फाड़ कर दिया, देखा नहीं। और देगा भी, तो सम्हल कर बैठना; खोपड़ी न खुल जाए! छप्पर ही न गिर जाए कहीं!

तुम कहते होः ‘फुर्सत नहीं है।’

और कर क्या रहे हैं गांव के लोग चौबीस घंटे? और हर तरह के दंगे-फसाद की फुर्सत है। सत्यनारायण की कथा में बैठने की फुर्सत है! डंडे चलाना हो, तो एकदम तैयार हैं! नागपंचमी में दंगल करना हो, तो दंगल के लिए तैयार हैं! सांप की पूजा करनी हो, तो ये तैयार है!

एक दूसरे सज्जन ने पूछा है कि मेरा विश्वास सनातन धर्म में है। बजरंगबली महावीर में मेरी अटूट श्रद्धा है। आपकी बातें मुझे दिलचस्प तो लगती हैं, लेकिन हमारे सनातन  धर्म से  उनका मेल नहीं बैठता। क्या आप बताने की कृपा करेंगे कि मुझमें क्या कमी है?

नाम हैः खिलिन्दा राम चौधरी। प्रधान, महावीर सेवा दल, पानीपत।

इस सबकी फुर्सत है! ये खिलिन्दा राम को तरह-तरह के खेल करने की फुर्सत है! महावीर सेवा दल के प्रधान हैं, इसकी इनको फुर्सत है! और बजरंगबली की सेवा करने की फुर्सत है!

और तुम्हें

कोई भी चीज सही कही जाए, तो तुम्हारे सनातन धर्म का सौभाग्य! न खाए, तुम जानो। कोई मैंने ठेका नहीं लिया है, तुम्हारे धर्म से मेल बिठालने का। मैं किस-किस के धर्म से मेल बिठाऊं! यहां तीन सौ धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी पर हैं। अगर इन सबका ही मेल बिठाता रहूं, तो मेरा ही तालमेल खो जाए!

किस-किस का मेल बिठालना है! यहां तरह-तरह के मूढ़ पड़े हुए हैं। और सबकी अपनी धारणांए हैं! अब तुम्हारी अटूट श्रद्धा बजरंगबली में है! तुम आदमी हो या क्या हो! और कमी पूछ रहे हो! बजरंगबली से ही पूछ लेना। वे खुद ही हंसते होंगे, कि यह देखो मूर्ख! खिलिन्दा राम! राम होकर और बजरंगबली की सेवा कर रहे हैं!

आजकल बजरंगबली तक राम की सेवा नहीं कर रहे हैं। क्योंकि उनको दूसरी रामलीला में ज्यादा पैसे पर नौकरी मिल गई!

इस तरह से लोगों से यह देश भरा हुआ है। जमाने भर की जड़ता को तुम सनातन धर्म कहते हो! हर तरह के अंधविश्वास को तुम सनातन धर्म कहते हो! और तुम्हें जब कोई अनुभव नहीं है, तुम्हें अटूट श्रद्धा कैसे हो गई? और अटूट श्रद्धा थी, तो यहां किसलिए आए हो? तुड़वाने आए हो श्रद्धा! बजरंगबली तो वहीं उपलब्ध है पानीपत में। खुद पानी पीओ, उनको पिलाओ। यहां किसलिए आए हो! श्रद्धा तुड़वानी है?

और दिलचस्पी मत लो मेरी बातों में। खतरनाक हैं ये बातें। इसमें बजरंगबली से साथ छूट जाएगा। यह अटूट श्रद्धा वगैरह कुछ नहीं है। अटूट होती ही तब है, जब होती नहीं।

तुम कहते हो कि ‘मेरा विश्वास सनातन धर्म में है।’

कैसे तुम्हारा विश्वास है? किस आधार पर तुम्हारा विश्वास है? संयोग की बात है कि तुम हिंदू घर में पैदा हो गए। तुमको बचपन में उठा कर मुसलमान के घर में रख देते, तो तुम्हारी अटूट श्रद्धा इस्लाम में होती। हिंदुओं के गले काटते। तब तुम यह महावीर सेवा दल वालों की जान ले लेते। तब तुम कुछ और दल बनाते। रजाकार! तब तुम दूसरा झंडा खड़ा करते कि इस्लाम खतरे में है! और मेरा विश्वास इस्लाम में है! और तुम ईसाई घर में पैदा हो जाते, तो तुम यही उपद्रव वहां करते।

तुम्हारा विश्वास है कैसे? किसी आधार पर तुम्हारा विश्वास है? सिर्फ यही न कि तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें यह सिखा दिया कि हनुमान जी हैं, ये पत्थर की मूर्ति नहीं हैं। इनकी सेवा करो। इन्हें नाराज मत करना। हनुमान-चालीसा पढ़ो। यह बेटा, बहुत फल देंगे। ये बड़े भोले-भाले हैं। इनको मना लेना बड़ा आसान है। जो चाहोगे, ये कर देंगे!

इसी सब पागलपन के पीछे तो यह देश गरीब है। यह सारा श्रम अगर देश को समृद्ध बनाने में बनाने में लगे, तो इस देश के पास बड़ी समृद्ध पृथ्वी है। और हमारे पास पांच हजार साल का अनुभव होना चाहिए था। हमें तो दुनिया में शिखर पर होना था। मगर एक तरफ अंधविश्वास और  दूसरी तरफ तुम्हारे महात्मागण, जो कह रहे हैं, जो कह रहे हैं-सब त्यागो, सब छोड़ो; भौतिकता छोड़ो! तो गरीब न रहोगे, तो क्या होगा!

और फिर गरीब रहो, तो यहां इस तरह के प्रश्न खड़े करते हो, जैसे मेरा कोई जिम्मा है। मेरा काई जिम्मा नहीं है। तुम्हारी गरीबी के लिए तुम जिम्मेवार हो। और अभी भी तुम्हारी गरीबी टूट सकती है। मगर जो आदमी तुम्हारी गरीबी तुड़वाने के लिए कोशिश करेगा, तुम उसकी जान लोगे। तुम्हें अपनी गरीबी से मोह हो गया है!

आखिर मेरा विरोध क्या है! मेरा विरोध यह है कि मैं कह रहा हूं कि भारत को भौतिकता के ऊपर  अपनी जड़ें जमानी चाहिए, क्योंकि जिस देश की जड़ें भौतिकता में हों, उसी देश के शिखर पर अध्यात्म के फूल खिल सकते हैं। यह मेरे विरोध का कारण है।

-ओशो
पुस्तकः जो बोलैं तो हरिकथा
प्रवचन नं. 4 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

ज्योति अंश है परमात्मा का

अंधेरा कितना ही हो नीलम, और कितना ही पुराना हो, कुछ भेद नहीं पड़ता। जो दीया हम ला रहे हैं, जो रोशनी हम जला रहे हैं, वह इस अंधेरे को तोड़ देगी; तोड़ ही देगी। बस रोशनी जलने की बात है। इसलिए अंधेरे की चिंता न लो। रोशनी के लिए ईंधन बनो...

अंधेरा कितना ही हो, चिंता न करो। अंधेरे का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। अंधेरा कम और ज्यादा थोड़े ही होता है; पुराना-नया थोड़े ही होता है। हजार साल पुराना अंधेरा भी, अभी दीया जलाओ और मिट जाएगा। और घड़ी भर पुराना अंधेरा भी, अभी दीया जलाओ और मिट जाएगा। और अंधेरा अमावस की रात का हो तो मिट जाएगा। और अंधेरा साधारण हो तो मिट जाएगा। अंधेरे का कोई बल नहीं होता। अंधेरा दिखाई बहुत पड़ता है, मगर बहुत निर्बल है, बहुत नपुंसक है। ज्योति बड़ी छोटी होती है, लेकिन बड़ी शक्तिशाली है। क्योंकि ज्योति परमात्मा का अंश है; ज्योति में परमात्मा छिपा है। अंधेरा तो सिर्फ नकार है, अभाव है। अंधेरा है नहीं।

इसीलिए तो अंधेरे के साथ तुम सीधा कुछ करना चाहो तो नहीं कर सकते। न तो अंधेरा ला सकते हो, न हटा सकते हो। दीया जला लो, अंधेरा चला गया। दीया बुझा दो, अंधेरा आ गया। सच तो यह है कहना कि अंधेरा आ गया, चला गया-ठीक नहीं; भाषा की भूल है। अंधेरा न तो है, न आ सकता, न जा सकता। जब रोशनी नहीं होती तो उसके अभाव का नाम अंधेरा है। जब रोशनी होती है तो उसके भाव का नाम अंधेरे का न होना है।

अंधेरा कितना ही हो नीलम, और कितना ही पुराना हो, कुछ भेद नहीं पड़ता। जो दीया हम ला रहे हैं, जो रोशनी हम जला रहे हैं, वह इस अंधेरे को तोड़ देगी; तोड़ ही देगी। बस रोशनी जलने की बात है। इसलिए अंधेरे की चिंता न लो। रोशनी के लिए ईंधन बनो।

इस प्रकाश के लिए तुम्हारा स्नेह चाहिए। स्नेह के दो अर्थ होते  हैं: एक तो प्रेम और एक तेल। दोनों अर्थों में तुम्हारा स्नेह चाहिए-प्रेम के अर्थों में और तेल के अर्थो में-ताकि यह मशाल जले।

अंधेरे की बिलकुल चिंता न लो। अंधेरे का क्या भय! सारी चिंता, सारी जीवन-उर्जा प्रकाश के बनाने में नियोजित कर देनी है। और प्रकाश तुम्हारे भीतर है, कहीं बाहर से लाना नहीं है। सिर्फ छिपा पड़ा है, उघाड़ना है। सिर्फ दबा पड़ा है, थोड़ा कूड़ा-कर्कट हटाना है। मिट्टी में हीरा खो गया है, जरा तलाशना है।

और तूने कहाः ‘प्रकाश के दुश्मन भी बहुत हैं!’

सदा से हैं। कोई नयी बात नहीं। मगर क्या कर पाए प्रकाश के दुश्मन? प्रकाश के दुश्मन खुद दुख पाते हैं-और क्या कर पाते हैं!

जिन्होंने सुकरात को जहर दिया, तुम सोचते हो सुकरात को दुखी कर पाए? नहीं, असंभव! खुद ही दुखी हुए, खुद ही पश्चाताप से भरे, खुद ही पीडि़त हुए। सुकारात को सूली की सजा देने के बाद न्यायाधीश सोचते थे कि सुकरात क्षमा मांग लेगा। क्षमा मांग लेगा तो हम क्षमा कर देंगे। क्योंकि यह आदमी तो प्यारा था; चाहे कितना ही बगावती हो, इस आदमी की गरिमा तो थी। असल में सुकरात जिस दिन बुझ जाएगा, उस दिन एथेंस का दीया भी बुझ जाएगा-यह भी उन्हें पता था।

सुकरात की मौत के बाद एथेंस फिर कभी ऊंचाइयां नहीं पा सका। आज क्या है एथेंस की हैसियत? आज एथेंस की कोई हैसियत नहीं है। इन ढाई हजार सालों में सुकरात के बाद एथेंस ने फिर कभी गौरव नहीं पाया; कभी फिर स्वर्ण नही चढ़ा एथेंस पर। और सुकरात के समय में एथेंस विश्व की बुद्धिमत्ता की राजधानी थी। विश्व की श्रेष्ठतम प्रतिभा का प्रागट्य वहां हुआ था। एथेंस साधारण नगर नहीं था, जब सुकरात जिंदा था। सुकरात की ज्योति से ज्योतिर्मय था, जगमग था।

जानते तो वे लोग भी थे जो सुकरात को सजा दे रहे थे। अपने स्वार्थो के कारण सजा दे रहे थे। मरना चाहते भी नहीं थे; सिर्फ सुकरात सत्य बोलना बंद कर दे, इतने चाहते थे। सोचा था उन्होंने, अपेक्षा रखी थी, कि मौत सामने देख कर सुकरात क्षमा मांग लेगा। लेकिन सुकरात ने तो क्षमा मांगी नहीं। तो बड़े हैरान हुए। तो उन्होंने खुद ही कहा कि हम दो शर्ते और रखते हैं। एक-कि अगर तुम एथेंस छोड़ कर चले जाओ तो जहर देने से हम अपने को रोक लेंगे। हम तुम्हें नहीं मारेंगे। फिर एथेंस लौट कर मत आना। अगर यह तुम न कर सको...।

सुकरात ने कहा, यह मैं न कर सकूंगा। क्योंकि एथेंस के इस बगीचे को मैंने लगाया। यहां मैंने सैकड़ों लोगों के प्राणों में प्राण फूकें हैं। यहां मैंने न मालूम कितने लोगों की बंद आखों को खोला है। एथेंस को छोड़ कर मैं न जा सकूंगा। अब इस बुढ़ापे में फिर से काम शुरू न कर सकूंगा। मौत तो आती ही होगी, तो यहीं आ जाए। एथेंस में जीया, एथेंस में जागा, एथेंस में ही मरुंगा-अपने प्रियजनों के बीच। अब किसी परदेश में अब फिर जाकर क ख ग से शुरू करूं, यह मुझसे न हो सकेगा। और आखिर में यह वहां होना है जो यहां हो रहा है। जब एथेंस जैसे सुसंकृत नगर में ऐसा हो रहा है तो एथेंस को छोड़ कर कहां जाऊं? जहां जाऊंगा, वहां तो और जल्दी हो जाएगा। यहां कम से कम यह तो भाग्य रहेगा कि सुसंस्कृत, सभ्य, समझदार लोगों के द्वारा मारा गया था! कम से कम यह तो सौभाग्य रहेगा! जंगली  लोगों के हाथों से मारे जाने से यह बेहतर है। एथेंस मैं नहीं छोडूंगा, तुम जहर दे दो।

उन्होंने कहा, दूसरी शर्त यह है कि तुम एथेंस में रहो, कोई फिक्र नहीं, मत छोड़ो; मगर सत्य बोलना बंद कर दो।

सुकरात हंसा। उसने कहा, यह तो और भी असंभव है। यह तो ऐसे है, जैसे कोई पक्षियों से कहे गीत न गाओ, कि कोई फूलों से कहे सुगंध न उड़ाओ, कि कोई झरनों से कहे कि नाद न करो। यह तो ऐसे है जैसे कोई सूरज से कहे रोशनी मत दो। यह नहीं हो सकता। मैं हूं तो सत्य बोला जाएगा। मैं जो बोलूंगा वही सत्य होगा। अगर मैं चुप भी रहा तो मेरी चुप्पी भी सत्य का ही उद्घोष  करेगी। नही, यह नहीं हो सकेगा। यह तो मेरा धंधा है। ठीक ‘धंधे’ शब्द का प्रयोग किया है सुकरात ने। व्यंग्य में किया होगा। मरते वक्त भी इस तरह के लोग हंस सकते हैं। सुकरात ने कहा, यह तो मेरा धंधा है, मेरा प्रोफेशन। सत्य बोलना मेरा धंधा है। यह तो मेरी दुकान। यह तो मैं जब तक जी रहा हूं, जब तक श्वास आती-जाती रहेगी, तब तक मैं बोलता ही रहूंगा।

सुकरात को फांसी जहर पिला कर देनी ही पड़ी। मगर पछताए बहुत लोग, क्योंकि उसके बाद एथेंस की गरिमा मिट गई। उसके बाद रोज-रोज एथेंस का पतन होता चला गया।

जीसस को सूली लगी। जिस आदमी ने, जुदास ने, जीसस को दुश्मनों के हाथ में बेचा था, तुम्हें मालूम है उसने खुद भी दूसरे दिन सूली लगी! यह कहानी बहुत कम लोगों को पता है, क्योंकि ईसाई यह कहानी कहते नहीं। यह कहानी चाहिए, इसके बिना जीसस की कहानी अधूरी है। जीसस को तो सूली लगाई गई, जुदास ने दूसरे दिन अपने हाथ से जाकर झाड़ से लटक कर सूली लगा ली। इतना पछताया। क्योंकि जीसस के जाते ही उसे दिखाई पड़ाः जेरुसलम अंधेरा हो गया। जेरुसलम का उत्सव खो गया। जेरुसलम पर एक उदासी छा गई। एक रात उतर आई, जो फिर टूटी नहीं, जो अभी भी नहीं टूटी! जब  तक कोई दूसरा जीसस पैदा न हो, जेरुसलम की रात टूट भी नहीं सकती। दो हजार साल बीत गए, रात का अंत है, प्रभात का कोई पता नहीं है।

प्रकाश के दुश्मन है जरूर, मगर प्रकाश के दुश्मन क्या कर पाते हैं? पीछे पछताते हैं। और प्रकाश के दुश्मन भला एक प्रकाशित दीये को बुझा देते हों, लेकिन उस प्रकाशित दीये की ज्योति को, जो तिरोहित हो जाती है आकाश में, सदा के लिए शाश्वत भी कर देते हैं।

-ओशो
पुस्तकः उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र
प्रवचन नं. 9 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

क्यों है मन में ऊबाऊपन

संसार में जितनी चीजें हैं, उनको पाने की चेष्टा में आदमी कभी नहीं ऊबता, पाकर ऊब जाता है। पाने की चेष्टा में कभी नहीं ऊबता, पाकर ऊब जाता है। इंतजार में कभी नहीं ऊबता, मिलन में ऊब जाता है। इंतजार जिंदगीभर चल सकता है; मिलन घड़ीभर चलाना मुश्किल पड़ जाता है...

संसार के संयोग से जो तोड़ दे, दुख के संयोग से जो पृथक कर दे, अज्ञान से जो दूर हटा दे, ऐसे योग को अथक रूप से साधना कर्तव्य है, ऐसा कृष्ण कहते हैं। अथक रूप से! बिना थके, बिना ऊबे।

इस बात को ठीक से समझ लें।

मनुष्य का मन ऊबने में बड़ी जल्दी करता है। शायद मनुष्य के बुनियादी गुणों में ऊब जाना एक गुण है। ऐसे भी पशुओं में कोई पशु ऊबता नहीं। बोर्डम, ऊब, मनुष्य का लक्षण है। कोई पशु ऊबता नहीं। आपने किसी भैंस को, किसी कुत्ते को, किसी गधे को ऊबता नहीं देखा होगा, कि बोर्ड हो गया है! नहीं; कभी ऊब पैदा नहीं होती। अगर हम आदमी और जानवरों को अलग करने वाले गुणों की खोज करें, तो शायद ऊब एक बुनियादी गुण है, जो आदमी को अलग करता है।

आदमी बड़ी जल्दी ऊब जाता है, बड़ी जल्दी बोर्ड हो जाता है। किसी भी चीज से ऊब जाता है। बड़ी जल्दी बोर्ड हो जाता है। किसी भी चीज से ऊब जाता है। अगर सुख ही सुख मिलता जाए, तो तबियत होती है कि थोड़ा दुख कहीं से जुटाओ। और आदमी जुटा लेता है! अगर सुख ही सुख मिले, तो तिक्त मालूम पड़ने लगता है; मुंह में स्वाद नहीं आता फिर। फिर थोड़ी-सी कड़वी नीम मुंह  पर रखनी अच्छी होती है। थोड़ा-सा स्वाद आ जाता है।

आदमी ऊबता है, सभी  चीजों से ऊबता है। बड़े से बड़े महल में जाए, उनसे ऊब जाता है। सुंदर से सुंदर स्त्री मिले, सुंदर से सुंदर पुरूष मिले, उससे ऊब जाता है। धन मिले, अपार धन मिले, उससे ऊब जाता है। यश मिले, कीर्ति मिले, उससे ऊब जाता है। जो चीज मिल जाए, उससे ऊब जाता है। हां, जब तक न मिले, तब तक बड़ी सजगता दिखलाता है, बड़ी लगन दिखलाता है; मिलते ही ऊब जाता है।

इस बात को ऐसा समझें, संसार में जितनी चीजें हैं, उनको पाने की चेष्टा में आदमी कभी नहीं ऊबता, पाकर ऊब जाता है। पाने की चेष्टा में कभी नहीं ऊबता, पाकर ऊब जाता है। इंतजार में कभी नहीं ऊबता, मिलन में ऊब जाता है। इंतजार जिंदगीभर चल सकता है; मिलन घड़ीभर चलाना  मुश्किल  पड़ जाता है।

संसार की प्रत्येक वस्तु को पाने के लिए तो हम नहीं ऊबते, लेकिन पाकर ऊब जाते हैं। और परमात्मा की तरह ठीक उलटा नियम लागू होता है। संसार कर तरफ प्रयत्न करने में आदमी नहीं ऊबता, प्राप्ति में ऊबता है। परमात्मा की तरह प्राप्ति में कभी नहीं ऊबता, लेकिन प्रयत्न में बहुत ऊबता है। ठीक उलटा नियम लागू होगा भी।

जैसे कि हम झील के किनारे खड़े हों, तो झील में हमारी तस्वीर बनती है, वह उलटी बनेगी। जैसे आप खड़े हैं, आपका सिर ऊपर होंगे। तस्वीर झील में उलटी बनेगी।

संसार के किनारे हमारी तस्वीर उलटी बनती है। संसार में जो हमारा प्रोजेक्शन होता है, वह उलटा बनता है। इसलिए संसार में गति करने के जो नियम हैं, परमात्मा में गति करने के वे नियम बिलकुल नहीं हैं। ठीक उनसे उलटे नियम काम  आते हैं। मगर यहीं बड़ी मुश्किल हो जाती है।

संसार में तो ऊबना आता है बाद में, प्रयत्न में तो ऊब नहीं आती। इसलिए संसार में लोग गति करते चले जाते हैं। परमात्मा में प्रयत्न में ही ऊब आती है। और प्राप्ति तो आएगी बाद में, और प्रयत्न पहले ही उबा देगा, तो आप रुक जाएंगे।

कितने लोग नहीं हैं। जो प्रभु की यात्रा शुरू करते हैं! शुरू भर करते हैं, कभी पूरी नहीं कर पाते। कितनी बार आपने तय किया कि रोज प्रार्थना कर लेंगे! फिर कितनी बार छूट गया वह। कितनी बार तय किया कि स्मरण कर लेंगे प्रभु का घड़ीभर! एकाध दिन, दो दिन, काफी! फिर ऊब गए। फिर छूट गया। कितने संकल्प, कितने निर्णय, धूल होकर पड़े हैं आपके चारों तरफ!

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि ध्यान से कुछ हो सकेगा? मैं उनको कहता हूं कि जरूर हो सकेगा। लेकिन कर सकोगे? वे कहते हैं, बहुत कठिन तो नहीं है? मैं कहता हूं, बहुत कठिन जरा भी नहीं। कठिनाई सिर्फ एक है, सातत्य! ध्यान तो बहुत सरल है। लेकिन रोज कर सकोगे? कितने दिन कर सकोगे? तीन महीने, लोगों को कहता हूं कि सिर्फ तीन महीने सतत कर लो। मुश्किल से कभी कोई मिलता है, जो तीन महीने भी सतत कर पाता है। ऊब जाता है, दस-पांच दिन बाद ऊब जाता है!

बड़े आश्चर्य की बात है कि रोज अखबार पढ़कर नहीं ऊबता जिंदगीभर। रोज रेडियो सुनकर नहीं ऊबता जिंदगीभर। रोज फिल्म देखकर नहीं ऊबता जिंदगीभर। रोज वे ही बातें करके नहीं ऊबता, जिंदगीभर। ध्यान करके क्यों ऊब जाता है? आखिर ध्यान में ऐसी क्या कठिनाई है!

कठिनाई एक ही है कि संसार की यात्रा पर प्रयत्न नहीं उबाता, प्राप्ति उबाती है। और परमात्मा की यात्रा पर प्रयत्न उबाता है, प्राप्ति कभी नहीं उबाती। जो पा लेता है, वह तो फिर कभी नहीं ऊबता।

इसलिए बुद्ध को मिला ज्ञान, उसके बाद वे चालीस साल जिंदा थे। चालीस साल किसी आदमी ने एक बार उन्हें अपने ज्ञान से ऊबते हुए नहीं देखा। कोहनूर हीरा मिल जाता चालीस साल, तो ऊब जाते। संसार का राज्य मिल जाता, तो ऊब जाते।

महावीर भी चालीस साल जिंदा रहे ज्ञान के बाद, फिर किसी आदमी ने कभी उनके चेहरे पर ऊब की शिकन नहीं देखी। चालीस साल जिंदा थे। चालीस साल निरंतर उसी ज्ञान में रमे रहे, कभी ऊबे नहीं! कभी चाहा नहीं कि अब कुछ और मिल जाए!

नहीं; परमात्मा की यात्रा पर प्राप्ति के बाद कोई ऊब नहीं है। लेकिन प्राप्ति तक पहुंचने के रास्ते पर अथक...।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, बिना ऊबे श्रम करना कर्तव्य है, करने योग्य है।

यहां एक बात और खयाल में ले लेनी जरूरी है कि कृष्ण कहते हैं, करने योग्य है। अर्जुन कैसे माने और क्यों माने? अर्जुन को तो नहीं है। अर्जुन तो जब प्रयास करेगा, तो ऊबेगा, थकेगा। कृष्ण कहते हैं।

इसलिए धर्म में ट्रस्ट का, भरोसे का एक कीमती मूल्य है। श्रद्धा का अर्थ होता है, ट्रस्ट। उसका अर्थ होता है, ट्रस्ट। उसका अर्थ होता है, कोई कह रहा है, अगर उसके व्यक्तित्व से वे किरणें दिखाई पड़ती हैं, जो वह कह रहा है, उसका प्रमाण देती है; वह जो कह रहा है, जिस प्राप्ति की बात, वहां खड़ा हुआ मालूम पड़ता है...।

अर्जुन भलीभांति कृष्ण को जानता है। कृष्ण को भी विचलित नहीं देखा है। कृष्ण को उदास नहीं देखा है। कृष्ण की बांसुरी से कभी दुख का स्वर निकलते नहीं देखा है। कृष्ण सदा ताजे हैं।

इसीलिए तो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें इस मुल्क के चिंतन के ढंग का पता नहीं है। यह मुल्क तस्वीरें शरीरों की नहीं बनाता, मनोभावों की बनाता है। कृष्ण कभी भी बूढ़े नहीं होते, कभी बासे नहीं होते; सदा ताजे हैं। बूढ़े तो होते ही हैं,शरीर तो बूढ़ा होता ही है। शरीर तो  जराजीर्ण होगा, मिटेगा। शरीर तो अपने नियम से चलेगा। पर कृष्ण की चेतना अविचलित भाव से आनंदमग्न बनी रहती है, युवा बनी रहती है। वह कृष्ण की चेतना सदा नाचती ही रहती है।

कृष्ण की हमने इतनी तस्वीरें देखी हैं। कई दफे शक होने लगता है कि कृष्ण ऐसा एक पैर पर पैर रखे और बांसुरी पकड़े कितनी देर खड़े रहते होंगे! यह ज्यादा दिन नहीं चल सकता। यह कभी-कभी तस्वीर उतरवाने को, फोटोग्राफर आ गया हो, बात अलग है। बाकी ऐसे ही कृष्ण खड़े रहते हैं?

नहीं, ऐसे ही नहीं खड़े रहते हैं। लेकिन यह आंतरिक बिंब है, यह भीतर तस्वीर है। यह खबर देती है कि भीतर एक नाचती हुई, प्रफुल्ल चेतना है, एक नृत्य करती हुई चेतना है, जो सदा नाच रही है। भीतर  गीत गाता मन है, जो सदा बांसुरी पर स्वर भरे हुए है।

यह बांसुरी सदा ऐसी होंठ पर रखे बैठे रहते होंगे, ऐसा नहीं है। यह बांसुरी तो सिर्फ खबर देती है भीतर की। ये तो प्रतीक हैं, सिंबलिक हैं। ये गोंपियों चारों वक्त, चारों पहर चौबीस घंटे आस-पास नाचती रहती होंगी, ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि कृष्ण इसी गोरखधंधे मे लगे रहे। नहीं; से प्रतीक हैं, बहुत आंतरिक प्रतीक हैं। असल में इस मुल्क की मिथ, इस मुल्क के मिथिक, इस मुल्क के पुराण प्रतीकात्मक हैं। गोपियों से मतलब वस्तुतः स्त्रियों से नहीं है। स्त्रियां भी कभी कृष्ण के आस-पास नाची होंगी। कोई भी इतना प्यारा पुरूष पैदा हो जाए, स्त्रियां न नाचे, ऐसा मौका चूकना संभव नहीं है। स्त्रियां नाची होंगी। लेकिन यह प्रतीक कुछ और है। यह प्रतीक गहरा है।

यह प्रतीक यह कह रहा है कि जैसे किसी पुरूष के आस-पास चारों तरफ सुंदर, प्रेम से भरी हुई, प्रेम करने वाली स्त्रियां नाचती रहें और वह जैसा प्रफुल्लित रहे, वैसे कृष्ण सदा हैं। वह उनका सदा होना है। वह उनका ढंग है होने का। जैसे चारों तरफ सौंदर्य नाचता हो, चारों तरफ गीत चलते हों, चारों तरफ संगीत हो, और घूंघर बजते हों, ऐसे कृष्ण चौबीस घंटे ऐसी हालत में जीते हैं। ऐसा चारों तरफ उनके हो रहा हो, ऐसे वे भीतर होते हैं।

-ओशो
पुस्तकः गीता दर्शन भाग-3
प्रवचन नं. 12 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी. थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है