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  भारत एक सनातन यात्रा
 
 

क्या है अच्छा और बुरा?

बुरा मैं उसे कहता हूं, जहां मन कहे कि और आगे। भला मैं उसे कहता हूं, जहां मन कहे कि बस यहीं। यानी माइंड की जो, जो-जो हम कर रहे हैं, जिस चीज पर मन कहता कि बस यहां मिल गई मंजिल...

इसके सिवाय कोई और मार्ग नहीं है। और जज करने की कोई बहुत कठिनाई नहीं है। एक तो यह बात कि जिस पर ठहर न सकें। क्योंकि बच्चे से ज्यादा बच्चे हो तुम। शरीर की एक उम्र होती है और आत्मा की उम्र उनकी बिल्कुल भी नहीं होती। और तब वे बच्चों जैसे काम करते रहते हैं। अब एक बूढ़ा आदमी रुपये इकट्ठे कर रहा है। इसको बच्चा समझिए, क्योंकि यह काम बच्चे जैसा कर रहा है। यह काम बिलकुल बच्चों जैसा कर रहा है।

यह कर क्या रहा है? इधर मौत सामने खड़ी है और वह आदमी तिजोरी पर ताले लगा रहा है। अब यह बिल्कुल बच्चा है, इसकी कोई स्प्रिचुअल एज नहीं है किसी तरह की। यह गुड्डा-गुड्डियों से खेलने वाला है। वह दूसरे तरह के गुड्डा-गुड्डियों से खेल रहा है। अब छोटे बच्चे हैं वे गुड्डा-गुड्डियों से खेल रहे हैं। और एक आदमी बड़ा है और रामचंद्र जी की बारात लिए चला जा रहा है! सब गुड्डा-गुड्डी रखे हुए है और जुलूस निकाल रहा है और शोर मचा रहा है। अब यह बच्चा है। इसकी बुद्धि गुड्डा-गुड्डियों से ज्यादा आगे नहीं गई। इसने गुड्डा-गुड्डी दूसरे बनाये, अच्छे नाम रखे हैं, बड़े नाम रखे हैं। लेकिन इसकी अकल बहुत नहीं है, इसकी मेंटल एज नहीं है कोई।

और तब कई दफा...इसलिए कई तरह कि उम्रें हमारे भीतर हैं, कई तरह की उम्रें हमारे भीतर हैं। और मेरी तो तलाश और मेरी तो अपील उस उम्र से है, वह जो भीतरी है। और यह जो आप पूछते थे कि बुरे को पहचानें कैसे? तो दो बातें हैं। एक तो जिस पर आप रुक न सकें, जिस जगह पर कभी भी खड़े न हो सकें, उस जगह को बुरी मानें। यानी मेरा कहना यह है, जो भला है, जो आनंदपूर्ण है, वहां रुकने का मन होता है; वहां मन होता है कि यहां ठहरें, यही ठहर जाएं; वहां मालूम होता है कि विराम, विश्राम; वहां मालूम होता है कि आ गई जगह। बुरी जगह का मतलब यह है कि आप वहां पहुंच तो जाते हैं, लेकिन पहुंचते से ही मन कहता है कि चलो, आगे चलो। एक आदमी दस लाख रुपये इकट्ठे करता है और मन कहता है कि करो, और करो, और करो। वह करता चला जाता है और मन कहता है, और करो।

एक सूफी फकीर था इजिप्त में जुन्नुन। और जो सम्राट था इजिप्त का वह उसके पास कभी-कभी आता था। बहुत दिन से फकीर नहीं आया था राजधानी में, तो सम्राट खुद ही बिना खबर किए उसके झोपड़े पर गया। उसकी औरत बैठी है, बगिया में काम कर रही है, फकीर कहीं पीछे काम करने गया है खेत पर। उसने सम्राट को आया देख कर उससे कहा कि आप बैठें, मैं उसे बुला लाती हूं। वही जहां मेड़ पर, जहां वृक्ष पर वह काम कर रही थी, उसने कहा, आप बैठ जाएं। तो सम्राट कहने लगा, मैं यहां टहलता हूं, तू बुला ला। उसकी औरत ने कहा कि कब तक आप टहलते रहेंगे , देर लगेगी, दूर वह है, चलें आप अंदर झोपड़े में बैठ जाएं। उसने सोचाः शायद मेड़ पर बैठना सम्राट को ठीक नहीं पड़ेगा। उसे भीतर ले गई। उसने चटाई डाल दी और कहा, आप इस पर बैठ जाएं। सम्राट फिर वही टहलने लगा दहलान में। उसने कहा, तू बुला ला, मैं यही टहलता हूं।

औरत को गुस्सा आया। उसने अपने पति को लौटते वक्त रास्ते में कहा कि कैसा आदमी है यह सम्राट! उससे मैंने दो-चार बार कहा, बैठ जाओ! दरख्त के नीचे कहा, वहां नहीं बैठा। अंदर लाई, दरी बिछा दी, वहां नहीं बैठता। कैसा आदमी है!

फकीर कहने लगा, तू नहीं जानती, सम्राट है वह, सिंहासन से नीचे नहीं बैठेगा। सिंहासन पर बिठाएगी, फौरन बैठ जाएगा। तो जहां बैठने को तूने जो जगह बताईं, वहां नहीं बैठेगा। और उस औरत से वह कहने लगा, तू यह भी ध्यान रखना, आदमी का मन भी ऐसा ही है। सम्राट है, जब तक सिंहासन न मिल जाए नहीं बैठेगा।  तुम बताओ-इस पर बैठ जाओ! वह जाएगा और कहेगा कि नहीं बैठते, और कुछ चाहिए, और कुछ चाहिए, और कुछ चाहिए।

बुरा मैं उसे कहता हूं, जहां मन कहे कि और आगे। भला मैं उसे कहता हूं, जहां मन कहे कि बस यहीं। यानी माइंड की जो, जो-जो हम कर रहे हैं, जिस चीज पर मन कहता कि बस यहां मिल गई मंजिल, यहां! मन कहे रुको यहां। ऐसे क्षण हैं जिनमें आप मर जाना चाहें, कहें कि बस। ऐसे क्षण हैं जिनमें आप मर जाना चाहें, कि कहें बस! अब और क्या? जाना, और इतना ऊंचा जाना कि बस यहीं! और ऐसे क्षण हैं जिनमें आप अनंतकाल तक भागते रहें और ठहरना न चाहें। तो एक तो मैं पहचान कहता हूं कि जहां मन ठहरना न चाहे, जहां मन कहे कि चलो, और पहुंचते ही से कहे कि फिर चलो।

दूसरी बात यह है कि आमतौर से कहा जाता है, बुरा वह है जो दूसरे को दुख दे। मैं ऐसा नहीं कहता। मैं कहता हूं, दूसरे के दुख का तो आपको पता ही नहीं चल सकता। बुरा वह है जो आपको दुख दे। और ऐसा नहीं कि अगले जन्म में दे। इसको मैं बेईमानी को हिसाब कहता हूं। क्योंकि अगले जन्म मे कैसे हो सकता है? अभी आग में हाथ डालूंगा तो अभी जल जाऊंगा; अगले जन्म में थोड़े ही जलूंगा। बुरा वह है जो अभी इसी वक्त दुख दे। और बुरा बहुत दुख देता है। और भला वह है जो इसी वक्त सुख दे, नगद, आगे नहीं। और भला बहुत सुख देता है। इतना छोटा सा भला कि कोई बच्चा रास्ते में गिर पड़ा और आपने उठा कर उसे किनारे खड़ा कर दिया, और अपने रास्ते पर चले गए हैं आप-और किस ऊंचाई पर पहुंच गए हैं, कैसी छलांग लग गई है! और एक बीमार है और आपने एक फूल तोड़ कर उसके हाथ में दे दिया, और आप लौट पड़े-आप दूसरे आदमी है! जो फूल देने गया था वह नहीं है अब, वह दूसरा ही सम्राट लौट रहा है।

और एक छोटा सा एक्ट जिसमें कोई मतलब नहीं है। कई बार आप सिर्फ मुस्करा दिये हैं एक आदमी को देख कर, और आप कुछ और हो गए हैं। और आप जरा जोर से किसी पर आंख करके देखें, और एक गाली देकर देखें, और एक चोट करके देखें, और आप पाएंगे कि आप नीचे ऐसे गिर गए हैं जैसे कोई पहाड़ से गिरा दिए गये हों। दूसरे का सवाल ही नहीं है। यह भी हो सकता है, आप ऐसा बुरा करें जिससे दूसरे को फायदा हो जाए। लेकिन ऐसा बुरा आप नहीं कर सकते, जिससे आपको फायदा हो जाए। क्योंकि दूसरा बात दूर है आपसे, बहुत फासले पर है।

तो दो बातें मैं मानता हूं बुरे की डेफियनीशन में  एक तो जहां आप ठहर न सकें, मन कहे, चलो, बसे चलो; और दूसरा, जहां मन दुख पाए। अगर इन दो बातों की थोड़ी जांच चलती रहे तो बहुत कठिनाई नहीं है कि हम पहचान लें कि कहां बुरा है। और इससे ठीक उलटा भला है, जहां मन रुकने का होने लगे कि यहां ठहर जाओ, अब कहां और खोजना है!

-ओशो
पुस्तकः नये समाज की खोज
प्रवचन नं. 5 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री एवं पुस्तक में उपलब्ध है